Monday, 16 October 2023

प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवया अर्थात् सेवा. ये तीनों क्या हैं?

हमें तीन चीजें करनी होगी - प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवया अर्थात् सेवा. ये तीनों क्या हैं?

- प्रणिपात - अर्थात् शरण होना. तीन 'पात' होते हैं - पात, निपात और प्रणिपात. 'पात' याने खाली अपना चमड़े का सर गुरु के चरणों में पटक देना. 'निपात' याने श्रद्धायुक्त होकर गुरु चरणों में शरणागति करना और 'प्रणिपात' याने मन-बुद्धि युक्त सर्व कामनाओं का त्याग करके गुरु चरणों में शरणागति करना. हमें यही 'प्रणिपात' करना है.

- परिप्रश्न - अर्थात् उनसे श्रद्धायुक्त होकर परम जिज्ञासु भाव से भगवद् विषय पूछना है. इसका अर्थ यह नहीं है कि हम गुरु की परीक्षा लेने के लिए कुछ भी मनमाना प्रश्न करें. गुरु के प्रति आदर भाव रखकर उनसे तत्वज्ञान प्राप्त करना है. बिना तत्वज्ञान के भगवद् राह में आगे नहीं बढ़ा जा सकता है. बिना तत्वज्ञान के भक्ति टिकाऊ नहीं होती, इसलिए गौरांग महाप्रभु जी ने भी कहा कि 'सिद्धांत बलिया चित्ते न कर आलस' अर्थात् तत्वज्ञान प्राप्ति में आलस नहीं करना चाहिए. इस तत्वज्ञान का बार-बार चिंतन करना चाहिए.

- सेवया - अर्थात् हमें गुरु की सेवा करनी है. सार तो यही समझना चाहिए कि 'सेवा' ही सर्वप्रमुख है. यह सेवा भी अपने मन के अनुसार नहीं करनी है. जैसी गुरु आज्ञा दें, वे जैसा कहें, वैसा ही सहर्ष करें. 'आज्ञा सम न सुसाहिब सेवा'. गुरु आज्ञा में बिना किन्तु, परंतु, तर्क, वितर्क, शंका, कुशंका आदि किये सेवा करना है. इसी सेवा से अंतःकरण शुद्ध होगा, और दिव्य प्रेम ग्रहण करने के लिए पात्र तैयार होगा.
हम लोगों को साधकों को सदा यही समझना चाहिये कि हमसे जो अच्छा काम हो रहा है वह गुरु एवं भगवान् की कृपा से ही हो रहा है क्योंकि हम तो अनादिकाल से मायाबद्ध , घोर संसारी , घोर निकृष्ट , गंदे आइडियाज़ ( ideas ) वाले बिल्कुल गन्दगी से भरे हैं। हमसे कोई अच्छा काम हो जाये , भगवान् के लिये एक आँसू निकल जाय , महापुरुष के लिये , एक नाम निकल जाय मुख से , अच्छी भावना पैदा हो जाये उसके प्रति हमारी , यह सब गुरु कृपा से हुआ , यही मानना चाहिये। अगर वे सिद्धांत न बताते , हमको अपना प्यार न देते तो हमारी प्रवृत्ति ही क्यों होती। कभी यह न सोचें कि यह मेरा कमाल है। अन्यथा अहंकार पैदा होगा। अहंकार आया दीनता गई। दीनता गई तो भक्ति का महल ढह गया। सारे दोष भर जायेंगे एक सेकण्ड में इसलिये कोई भी भगवत्सम्बन्धी कार्य हो जाय तो उसको यही समझना चाहिये कि गुरु कृपा है , उसी से हो रहा है ताकि अहंकार न होने पाये। अगर गुरु हमको न मिला होता , उसने हमको न समझाया होता , उसने अपना प्यार - दुलार न दिया होता , आत्मीयता न दी होती तो हम ईश्वर की ओर प्रवृत ही नहीं होते। अतः अन्हीं की कृपा से सब अच्छे कार्य हो रहे हैं, ऐसा मानकर चलो।
- श्री महाराज जी ।

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