Tuesday, 3 October 2023

"सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ।लाभ हानि, जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।।"

*विधि का विधान* प्रारब्ध सबको भोगना परता है , भगवान या संत अपने अवतार काल में अपने व्यवहारिक लीला द्वारा अपने लिए ऐसा प्रारब्ध स्वयं बनाकर भोग कर दिखाते हैं कि हमें अपने प्रारब्ध को कैसे भोगना चाहिए ।

भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर किया गया था । फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ ,न ही राज्याभिषेक।

और जब मुनि वशिष्ठ से इसका जवाब मांगा गया ,तो उन्होंने साफ कह दिया।

"सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ।
लाभ हानि, जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।।"

अर्थात जो विधि ने निर्धारित किया है ,वही होकर रहेगा।

न भगवान श्री राम के जीवन को बदला जा सका, न भगवान श्री कृष्ण के।

न ही शिव सती की मृत्यु को टाल सके, जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आवाहन करता है ।

श्री रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने कैंसर को न टाल सके।

न रावण अपने जीवन को बदल पाया ,न ही कंस जबकि दोनों के पास समस्त शक्तियाँ थी ।

मानव अपने जन्म के साथ ही जीवन मरण, यश अपयश, लाभ हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह रंग, परिवार ,समाज, देश-स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।

प्रत्येक जीव अपने साथ ही साथ अपने विशेष गुण धर्म, स्वभाव और संस्कार सब पूर्व जन्म से लेकर आता है । जिसे सिर्फ साधना और सत्कर्मों से ही बदला जा सकता है।

इसलिए सरल रहें । सहज,मन कर्म वचन से युक्त रहना जरूरी है , मुहूर्त न जन्म लेने का है, न मरने का फिर शेष अर्थहीन है। 
     :- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।

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