" सर्वेषु कालेषु मांमनुस्मर युध्द च "
हरेक समय हरेक में अपने इष्ट को महसुस करो , इसको कहते है कर्मयोग की साधना ,
जैसे हम औफिस जा रहे है | हां ! एक को देख कर मुड खड़ाव हो गया !
ये कौन है ? एक सुपरिटेण्डीगं इंजीनियर है , नाम क्या है ? रमेश श्रीवास्तव , धाम क्या है ? वांका वाले है , गुण ? ये बड़ा बदमाश है , परेशान करता है , इसके कारण बहुत मेरा बील अटका परा है , पैसा अटका परा है !
तो नाम रमेश श्रीवास्तव, ठीक , धाम - वांका वाले , ठीक , गुण - बड़ा बदमाश है , ठीक |
परन्तु अरे ये कौन है , ये तो जीव शक्ति है , ये जीव शक्ति के संधिनी अनुभाव के परिणाम है ,
ये जीव शक्ति कौन है ? ये परा शक्ति का वैभव है !
ये परा शक्ति कौन है ? ये हमारे इष्ट श्री कृष्ण की शक्ति है | तो इसके पिछे कौन खड़ा है | अरे इसके पिछे तो हमारे प्रियतम खड़े है |
अरे ये तो हमारे इष्ट सब करा रहे है भाई, हमारी परीक्षा ले रहें हैं , और हम गाली किसको दे रहे है ?
अरे ये तो गलत हो रहा है | इसमें तो हमारे इष्ट है और हम बुरी भावना किए जा रहे है |
इस प्रकार हम बुरे भाव से बच जाऐगें और साथ साथ हर पल हमारी साधना भी हमेशा होती जा रही है , इसी को कहते है कर्मयोग की साधना |
केवल दो घण्टे की साधना करें और वांकी समय पाप करें यह नही चलेगा | हरेक में हर समय हमारे प्रियतम है ! ऐसा हमेशा ही महसुस करें |
किसी का , किसी का भी , ध्यान दिजिए , किसी का भी अपमान मत करिए ,
कठोर मत बनिए |
नही तो आपकी दो घण्टे की साधना से कुछ लाभ नही होने बाला | :- श्री महाराज जी
पुस्तक :- एकांत साधना भाग -३
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