और यह अनंत काल से है और अनंत काल तक होता रहेगा, कोई बदल नहीं सकता , न मिटा सकता है इसे ।
वेद भगवान से प्रकट दिव्य शास्त्र है । यह सृष्टी के समय भगवान से प्रकट हुआ है , इसको भगवान ने बनाया नहीं , यह उन्हीं से प्रकट हुआ है , इसलिए विनिर्गत ग्रंथ कहलाता है । इसको कोई जीव या महापुरुषों ने नहीं प्रकट किया है या लिखा नहीं है ।
वांकी सभी धर्मों का मूल शास्त्र उस धर्म के प्रवर्तकों के द्वारा लिखा गया है समय समय पर , इसलिए यह कृत ग्रंथ कहलाता है , कृत मतलव बनाबटी , अपने अपने मन बुद्धि के अनुसार अपनी अपनी समझ से लिखा हुआ किताब ।
सभी जीवों का नियमन वेद हीं है और नियामक एक मात्र भगवान श्रीकृष्ण हैं । दूसरी सत्ता पुरे ब्रह्मांड में नहीं है । अगर दुसरी सत्ता होती तो दोनों आपस में टकरा कर समाप्त हो गई होती सृष्टि के पूर्व हीं ।
इसलिए एक मात्र भगवान श्री कृष्ण है और उन्हीं के सब भक्त कह लो , दूत कह लो , एंजल कह लो समय समय पर अनेकों रूपों में आकर काल, क्रम , युग , परिस्थिति , देश ,प्रकृति , वातावरण के अनुसार अपने अपने अनुयायियों को जीने का , मानवता का , धर्म का , कर्म का , योग का , ध्यान का, एवं प्रेम और भक्ति का ज्ञान कराया है ।
किंतु मूढ़ लोग अपना अपना बुद्धि लगा करके अपने समझ के अनूसार अर्थ का अनर्थ करके भोले भाले लोगों को गुमराह किया । इसलिए अनेक धर्म बन गए विश्व में ।
याथार्थ में एक हीं धर्म है पुरे विश्व में - सनातन धर्म , वांकी सभी पंथ है ।और सभी का अंतिम मूल लक्ष्य भगवान की प्राप्ति और सेवा हीं वतलाया गया है ।
वांकी सब अज्ञानता है पंडितों के, मूल्ला के , मोलवियों के , पोप के , अपने अपने निजी बिचार हैं जो कृत ग्रथं है, कृत ग्रंथ दोष युक्त है , क्योंकि लोगों के अपनी अपनी खोपड़ी के भंजन का परिणाम है ।
दस अंधे के सामने एक हाथी खड़ा कर दिया गया और पुछा गया कि बताओ यह क्या है । तो एक ने हांथी के पैर को पकड़ा और कहा ये तो पेंड़ हैं , दूसरा पूंछ को पकड़ा और कहा की नहीं नहीं ये तो रस्सी टंगा है । एक ने सूंढ को पकड़ा , कहा कि नहीं भाई ये तो पानी का पाइप है । एक ने कान को पकड़ा कहा की नहीं ये तो पंखा है । एक ने पेट को पकड़ा और कहा की नहीं ये तो पहाड़ है ।
तो इसी प्रकार अनेक धर्म , संप्रदाय , मतावलम्बी अनेक देशों में पैदा हो गए अलग अलग ।
लेकिन किसी के मानने या न मानने , जानने या ना जानने , स्वीकार करने या न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता है । सभी के उपर वेद का कानून हीं लागु है अनंत काल से, और लागु रहेगा अनंत काल तक , चाहे वो हिंदु हो , मुसलमान हो , सिख हो , इसाई हो , पारसी हो या ताओ हो , कन्फूसियस हो , बौद्ध हो , जैन हो देवी देवता हो गंधर्व हो या किन्नर हो , यक्ष हो , राक्षस हो ,असुर हो या कोई भी हो ।
भगवान और भगवान का कानून एक हीं है हरेक देश , जाति ,धर्म और सम्प्रदाय के लिए । वो ऐसा नहीं है कि भारत के लिए वेद है और अमेरिका के लिए कुछ और , इंग्लैंड के लिए कुछ और हिंदुओं के लिए कुछ और , दुसरे धर्मों के लिए अलग अलग कुछ और ।
ऐसा समझना कि सबके लिए अलग अलग कानून हैं , अलग अलग भगवान है , यह घोर अज्ञानता है । :- श्री कृपालु महाप्रभु जी ।
No comments:
Post a Comment