यह सभी जानतें हैं कि श्री कृपालु महाप्रभु जी श्री राधाकृष्ण के अवतार हैं राधाकृष्ण का कृपावतार , सर्वोतकृष्ट अवतार । ऐसा अवतार एक कल्प में सिर्फ एक बार होता है ।
गौरांग महाप्रभु, भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी का हीं युगल अवतार थे । इस श्रीगौरांग अवतार काल में भगवान श्री कृष्ण अपने हीं आत्मा श्री राधा रानी के ह्रदय को धारण करके अपने हीं रस रूप गुण और लीला का पान किय थे ।
जो वो ब्रज में आज से 5,178 बर्ष परकीया भाव के लीलावतार मे खुद न पा सके ।
ब्रज के वृन्दावन में वो लगभग एगारह वर्ष हीं रहे और पुर्व निर्धारित अनुग्रहित जीवों ( गोपियां जो की ऋषि मुनि थी रामावतार काल के जनकपुर , अयोध्या , दणडकारण्य आदि की ) पर प्रेम रस लुटाया , किन्तु खुद अपने प्रेम रस से वंचित रह गए ।
उसी प्रेम रस का ( यानि अपनी आत्मा श्री राधा रानी के अपने प्रति प्रेमरस का आस्वादन हेतु ), पान करने के लिय गौरांग अवतार लेकर आए ।
फिर वो कृपालु कृपावतार में उसी विलक्षण प्रेम रस को अपने पुर्व निर्धारित जनों में वितरित करने हेतु एक और अवतार लिए । इसलिए यह पुर्वनिर्धारित हम सब जीव बहुत गुढ़ रहस्य हैं । जो करोड़ो जीव पांच हजार दो सौ साल पहले उनके ब्रज में भी उनके प्रेम रस से वंचित रह गए थे और कामना की थी प्रार्थना की थी , भक्ति की थी उनके ब्रज से जाने के बाद उनके प्रेम रस को पाने के लिए । उन उन जीवों को वहीं युगल सरकार कृपालु अवतार में अपने उसी प्रेम रस को वितरित किय उन जीवों को जो उस समय तीव्र भक्ति किया था । उन जीवों को अपने भक्ति भावों की तीव्रता और गहराई के अनुसार मिला । इस अवतार में उनके द्वारा गुढ़ दिव्य तत्त्व ज्ञान हमें मिला , मार्ग दर्शन मिल गया और मिल रहा है लगातार । उनके द्वारा अपने इसलीला के कुछ प्रेम का झलक भी मिला और मिल रहा है हमें ताकी हम और प्रयास बढ़ा दें अपना , आगे जुड़ने वाले को भी मिलेगा । यह जन्म तैयारी के लिय है हमें अधिकारित्व प्राप्त करने हेतु ।
अतः भगवान श्रीराधाकृष्ण की श्री गौरांग लीलावतार अपने राधाभावमयी प्रेम रस का स्वपान हेतु हुआ था और वो अपनी मां, "शची माता" को कह कर गय थे कि मेरा दो अवतार और होगा । और दोनों अगले अवतार में तुम हीं मेरी मां बनोगी ।
उन्होने एक अवतार पांच सौ साल बाद लेने का संकेत दिया था । उनका यही अवतार श्री राधाकृष्ण का कृपावतार श्री कृपालु महाप्रभु अवतार है ।
जो अनुग्रहित पुनर्निर्धारित जीवों के कल्याण के लिए सर्वोत्कृष्ट अवतार है । इस अवतार में श्री महाप्रभु ने अपने जिस रस का पान किया था गौरांग अवतार काल में , वही वो अपने पुर्वनिर्धारित जीवों के मध्य वितरित किए और कर रहें हैं आज लीला संवरण के बाद भी अपने प्रचारक जनों के द्वारा ।
अब आगे एक और अवतार होगा इसी बैवस्वत् मन्वंतर में । ( याद रखिए भगवान श्री राधाकृष्ण का प्रत्यक्ष अवतार , गौरांग अवतार और श्री कृपालु महाप्रभु अवतार इसी बैवस्वत मन्वंतर में हुआ था )
हां श्रीराधाकृष्ण फिर आऐगें एक बार , अंतिम बार इस बैवस्वत मन्वंतर में फिर कृपालु कृपावतार होगा ।
इसका उदेश्य अपने कृपालु अवतार में जो लोग श्रीकृपालु महाप्रभु को हीं अपना गुरू मान कर उनका भजन कर रहें हैं उसकी तृप्ति के लिए , अपने परम दिव्य रस का पान कराने के लिए आऐगें । इसलिए सिरियस हो जाईए, अवसर चुके ना । यह चुके तो फिर ऐसा अवसर कबहु नहीं मिलेगो । कितनी भी परीक्षा हो इस जीवन में , लगे रहिए ।
उनका अगला अवतार होगा हम प्रेम रस से वंचित रह गए जीवों को प्रेम रस देने के लिए , हमें एक बार फिर मानव देह मिलेगा उनकी कृपा से और माहौल भी मिलेगा और हमारा यह जन्म भी उनकी कृपा से याद हो जाएगा प्रेम रस मिलने के बाद की हम कितना भक्ति कर रहे हैं अभी ।
जो जो लोग उनका भजन कर रहें जिस भाव से उसको उसी प्रकार अधिकारी बना कर वो प्रेम रस देने के लिए एक अंतिम अवतार, इसी कल्प के इसी बैवस्त मंवतर में लेंगें । यह चैतन्य महाप्रभु जी द्वारा उनका आप्त वचन है अपनी शची मां को ।
और श्रीकृपालु महाप्रभु जी ने भी अपने कुछ प्रवचन में हमें स्पष्ट संकेत देते हुए कहें हैं कि " मुझे एक बार फिर नाक के बल आना होगा " , उन्होंने यह भी कहें हैं कि "हमारे अनुयायियों को फिर से मानव देह मिलेगा क्योंकि ए लोग राधे राधे रटते हैं" । श्री राधे । :- मां रासेश्वरी देवी जी और स्वामी श्री युगल शरण जी के प्रवचन के आधार पर ।
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