Tuesday, 14 May 2024

वो सनातन धर्म , ( हिन्दु संस्कृति ) और इनमें और भगवान में दृढ़ आस्था रखने वाले साधु जन , सज्जन की रक्षा वो स्वयं करते हैं ।

पंचम मूल जगद्गुरूत्तम श्री कृपालू जी महाप्रभु के सिद्धांतों पर आधारित लेख, इस लेख का अंतिम भाग अवश्य पढ़ें :- 
हमें अगर अपने भगवान श्री कृष्ण पर भरोसा है तो फिर हम सनातनी इतना बैचैन क्यूं हैं कि सनातन धर्म को कोई समाप्त कर देगा ? ऐसा सोचने वाला गलत है। फुल मैड है ।
सनातन धर्म का उद्भव और अंत ।। ( एक सत्य चिंतन )

जिस प्रकार भगवान अनादि है उसी प्रकार हमारी आत्मा अनादि है और ठीक उसी प्रकार सनातन वैदिक धर्म आनादि है । 
हम कब से ? जब से भगवान हैं। भगवान कब से ? जब से हम है यानि आत्मा , शरीर नहीं है हम । भगवान और हम कब से जब से सनातन धर्म हैं । 

"यानि भगवान श्री कृष्ण हीं सनातन है । अत: भगवान श्री कृष्ण हीं सनातन वैदिक धर्म है । जिसको श्री कृष्ण में अनुराग नहीं वो अधर्मी है । ऐसे धर्म को त्याग देना चाहिए जो श्री कृष्ण चरणार वृंद में अनुराग न पैदा करता हो । श्री कृष्ण के चरणों में रति हीं धर्म है वांकि सब अधर्म है । वांकि सब कर्म धर्म चौरासी लाख योनियों में घुमाने वाला कर्म है । जबतक जीवात्मा भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अनुरक्ति प्राप्त नहीं करता , वो भव सागर में अन्य कर्म धर्म के चक्कर में बंधा हुआ दुख पाता रहेगा " :- श्री कृपालु जी महाराज ।।

तो हम तीनो का तीनों सनातन है । सनातन मतलब सदा से है ‌। तीनों की उत्पत्ति नहीं होती । न जन्म होता है । 
सिर्फ प्रकटिकरण होता है भगवान श्री कृष्ण के महोदर से । यानि भगवान श्री कृष्ण के संकल्प मात्र से सृष्टि होती है और उसी के साथ साथ सनातन धर्म ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों के साथ साथ प्रकट हो जाते हैं ।

और इन तीनों को अंत भी नहीं है । यानि भगवान , हमारी आत्मा और सनातन तीनों अजन्मा हैं ।
और इन तीनों को कोई भी समाप्त नहीं कर सकता कभी । स्वयं भगवान भी नहीं । 

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।।२३।। गीता ।

तो इसका भावार्थ तो आप सब लोग जानते हैं कि आत्मा हो या परमात्मा इसको किसी भी बिधि से कोई समाप्त नहीं कर सकता है स्वयं भगवान भी नहीं । 

तो यह स्वत: सिद्ध है कि तीनों का जन्म नहीं होता , तीनों का अंत किसी भी विधि नहीं हो सकता । 
तो तीनों को समाप्त करने का कोई सोचें अगर तो वो फुल मैड है । थोड़ा या हाफ नहीं फुल मैड । 

तो फिर हम सनातनी इतना बैचैन क्यूं हैं कि कोई सनातन धर्म को समाप्त कर देगा ? ऐसा सोचने बाला अगर कोई है तो उसका दिमाग ठीक नहीं है , उसे डौक्टरों के पास जाना चाहिए ।
 कुछ लोग परेशान रहते हैं फलां फलां धर्म बाले , अपना जनसख्यां विस्फोट करके पुरे धरती पर फ़ैल जाएंगे और सनातन एक दिन खत्म हो जाएगा , मैं कहता हुं वो भोले हिन्दु है जो ऐसा सोचतें है । उनको खुद पे अपने सनातन धर्म पे और अपने ईष्ट पर भरोसा विल्कूल नहीं है यह उनकी चिंता साबित करती है । 

कलयुग में सनातन धर्म नहीं लुप्त होगा । हां इसको मानने वाले कि संख्या कम जरूर होती जाएगी , कोई नहीं रोक सकता इसको । उसका कारण कलयुग कि प्रकृति है । कलयुग कि प्रकृति हीं ऐसी है कि दिव्यता धीरे धीरे अंतर्ध्यान होती जाएगी । धर्म कुछ लोगों तक सीमित हो जाएगा । पाखंडियों , विधर्मियों , अधर्मियों कि संख्या बढ़ती जाएगी । पाप बढ़ेगा पृथ्वी पर , लोग अवसाद में रहेंगे । रोग बढ़ेगा । पुण्य का क्षय होगा । धर्म के नाम पर बाचालो कि संख्या बढ़ेगी । मानवता समाप्त होगी । दैविक गुणों का क्षय होगा । 

पृथ्वी पर आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग होंगे । कुछ बचे हुए वास्तविक सनातन वैदिक धर्मावलंबी को सताया जाएगा । भगवान के वास्तविक भक्तों को सताया जाने लगेगा । 
फिर भगवान श्री कृष्ण अपने वास्तविक भक्तों के दुख को नहीं बर्दास्त कर पाएंगे और फिर उनका एक क्रोधावेशित अवतार कल्कि के रूप में होगा । 
पुरी पृथ्वी के आसुरी वृत्ति वाले जीव का संहार करेंगे और सनातन वैदिक धर्म कि पुर्नस्थापना करेंगे वो । 

भगवान सर्व समर्थ है । वो अपनी सत्ता की रक्षा स्वयं करते हैं । वो किसी भी जीव और महापुरुष को भी यह अधिकार नहीं देते । 
वाकी सब शक्ति अपने संत अपने जन और महापुरूषों को दे देते हैं , पर दो कार्य सदा अपने पास रखते हैं ‌ । सत्ता कि रक्षा और मानव के कर्म फल नोट करके उसे फल प्रदान करना स्वयं करते हैं । 

"सुनहु तात यह अकथ कहानी। 
समुझत बनइ न जाइ बखानी॥ 
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। 
चेतन अमल सहज सुख रासी॥1॥" - उत्तरकांड 7.117

और उसी प्रकार सनातन धर्म भी अजन्मा है और अविनाशी है । स्वयं भगवान भी स्वयं को , किसी भी आत्मा को और ना सनातन धर्म का मिटा सकते हैं कभी । तो फिर मानवों दानवों कि औकात ही भला क्या है ? भोले सनातनी इतना हाय तोबा , चित्कार क्यूं कर रहें हैं मुझे समझ में नहीं आता ?

भगवान का काम है रक्षा करना , उनका पहला काम है अपने सत्ता की रक्षा करना, सत्ता मतलव जीवात्मा , माया यानि संसार और दुसरा काम है अनंत ब्रह्माण्ड के अनंत जीवों के मन में उठे संकल्पों को नोट करना । याद करिए श्री कृपालु महाप्रभु जी का दिया तत्वज्ञान ।
तो जब भगवान अपनी सत्ता , मतलब सनातन धर्म यानि नियम , यानि उनका संविधान यानि वेद् पुराण उपनिषद आदि सब की रक्षा वो स्वयं करते हैं । और अपने जन खुद पर भरोसा करने वाले , आस्था रखने वाले सज्जनों की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं । और जिस बसुंधरा पर अवतरित होते हैं उस भारत देश की रक्षा भी वही करते हैं तो चिंता कैसी ?
उन्होंने स्वयं कहें है :- 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ :- गीता ।

उनका उद्घोष है - वो सनातन धर्म , ( हिन्दु संस्कृति ) और इनमें और भगवान में दृढ़ आस्था रखने वाले साधु जन , सज्जन की रक्षा वो स्वयं करते हैं ।

 दुष्ट कुधर्मी , व्यभिचारी , राक्षसों , असुरों का उत्पात जब जब लिमिट से बढ़ जाता है तो वो खुद इन सबका एक साथ काम तमाम कर देतें हैं । 
और किए भी है । हम सभी जानते हैं । हिरण्यकशिपु का और उसके साम्राज्यों का , हिरण्याक्ष का और उसके साम्राज्य से लेकर त्रेता में रावण और उसके साम्राज्य लंका से लेकर द्वापर में कंश आदि सब का बजूद मिटा दिए ।
तो फिर हम सनातनी इतना भयभीत क्यों ?
भय का मतलब की हमें अपने भगवान पर , अपने इष्ट पर अपने सनातन हिन्दु धर्म पर भरोसा नहीं । 

सभी जानते हैं कि एक सनातन धर्म ही अजन्मा है और इसका अंत कभी नहीं हो सकता । 
और वांकी सभी बिचारधारा है , पंथ है जो मानवकृत है , जिसका प्रदुर्भाव हुआ है अलग अलग समय में किसी के बिचार के कारण । पीछले हजार दो हजार तो ढाई हजार साल में जिस पंथों कि उत्पत्ति हुई है मानवों द्वारा उसकी समाप्ति निश्चित है । 
क्योंकि जिसकी उत्पत्ति होती है उसका एक दिन समाप्ति अवश्य होता है । 

एक और बात , सभी बिचार धारा उसी सनातन धर्म रूपी मूल( जड़ ) से निकला जिसका मूल जड़ तना हिन्दु है और वांकी‌ सब शाखा हीं तो है ।
अब कोई बिचार धारा यह सोचे , कोई शाखा यह सोंचे की अपने हीं मूख्य तना और जड़ को समाप्त कर देंगे तो वो फुल मैड है । फुल मैड । वो खुद ही समाप्त हो जाएगा ।

और फिर भी नहीं माना तो भगवान तो कहा है हीं कि :- 
 यदा यदा हीं धर्मस्य ..... 

तो होना ही है कल्कि अवतार और फिर एक बार असुर और उनका साम्राज्य समाप्त होगा । 
और वो भी नहीं बचेंगे जो हिन्दु में जन्म लेकर अपने ही जड़ में जहर घोलने का प्रयास कर रहें हैं , जैसे कौरव समाप्त हो गए जो सनातन धर्म के विधान के विरूद्ध काम किया । भगवान कृष्ण के विरूद्ध खड़ा हो गया था दुर्योधन , वो भी समाप्त हो गया । 

तो मेरी आप सभी हमारे सनातन धर्मावलंबी भाइयों से प्रार्थना है कि चिंता ना करें , विधर्मियों से न उलझे । अपने भगवान की भक्ति करें , अपने महापुरुषों और संतों का , देश भक्तों का सम्मान करें । और दृढ़ आस्था रखें । दूसरे की बुराई ना करें । अपने सनातन का प्रचार करें , अपने असली संतों के बारे में और भगवान ईष्ट की चर्चा करें । सत्संग करें । 
और अपने शरीर के लिए जिविका के लिए सनातन धर्म के पथ पर चल कर शुभ कर्म करें । 
सबसे प्रमुख सिद्धांत कि अगर आप किसी से भी नफरत करेंगे , द्वेष करेंगे , और यह आपके मन में चरित्र में , सोंच में संकल्प में जम जाएगा तो फिर आप अगले जन्म में उसी धर्म में , उसी पंथ में हीं नहीं उसी धर्मावलंबी के घर जन्म लेंगे । 

जहां आपका राग द्वेष अधिक होगा उसी की प्राप्ति आपको अगले जन्म में होगी ।‌
तो अगर आप किसी भी पंथ विशेष, धर्म विशेष या विचारधारा विशेष , समुदाय विशेष या व्यक्ति विशेष से नफरत करेंगे तो फिर समझ लीजिए कि उसी में आपको अगला जन्म मिलेगा । 
तो यह तो आप खुद के लिए गढ़ा खोद रहे हैं । याद रखिए धर्म हमारी रक्षा करता है, हम धर्म कि रक्षा नहीं कर सकते । हम धर्म का पालन कर सकते हैं केवल । और श्री कृष्ण भक्ति हीं धर्म है । वांकि से उदासीन रहना श्रेयकर है ।। 
:- पंचम मूल जगद्गुरूत्तम श्री कृपालू जी महाप्रभु के सिद्धांतों पर आधारित लेख । - संजीव कुमार ।

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