श्री महाराज जी का एक पद् है गुरु बंदना जिसमें एक लाईन है ।
" रहत ना रह संसार , जाऊं गुरू चरण कमल वलिहार "
इसका अर्थ ही काफी है यह समझने के लिए ।
तो इस लाइन का अर्थ जरा समझना होगा हमें , तो जेनरली हमलोग यही समझते हैं कि संसार में रहते हुए भी संसार में आसक्ति ना हो । एक बार कई लोगों से जब पुछा गया आश्रम में कुछ पद के लाईन का अर्थ इसी तरह से तो अस्सी प्रतिशत हमलोग सही सही पूर्ण उत्तर नहीं दे सके ।
और इसका डिटेल्स में जो अर्थ है वहीं काफी है यह समझने के लिए कि महाराज जी अपने शिष्य को डौक्टर , प्रोफेसर आदी बनते देखना चाहते हैं ।
तो मैं जब सबसे पहले यह पद् समझा था , जो श्री महाराज जी की कृपा से समझा मां से वो यह कि-
यह कर्मसन्यास को समझने बाला सबसे बढ़िया पद् जिससे मुझे बड़ा प्यार है और अर्थ ठीक से समझे बिना मैं समझता हुं पद गाना उतना लाभप्रद नहीं होता है ।
इसका लाईन का मतलव , हमारा संसार यानि संसार में कोई डौक्टर बने , इंजीनियर बने या व्यापारी बने , घर बसाया , शादी किया, मां वाप है , दोस्त रिस्तेदार है । अब एक डौक्टर है उदाहरण के लिए तो यह उसका संसारिक पद हुआ प्रोफेशन में । और फिर उसका परिवार है , यह भी उसका संसार है ,दोस्त रिस्तेदार यह भी उसका संसार है और उसका पेसेंट है तो यह भी उसके कार्य क्षेत्र का , प्रोफेशन का, सेवा का परिवार है ।
तो इस प्रकार कोई यह सब संसार के होते हुए भी सेवा भाव से परिवार का भरण पोषण , पेसेंट को सेवा भाव से देखें पर मन से अनासक्त ही रहे इस अपने बाहर के संसार से , भीतर से यानि मन से इन सभी से अनासक्त रहे बाहर के संसार से हमेशा सब काम ठीक ठीक करते हुए ।
तो इस प्रकार हमें हमारे संसार का होते हुए भी संसार हमारे भीतर नहीं है । हमारे भीतर केवल हमारा गुरू और हमारा श्याम सुंदर हीं है ।
तो यह असली अर्थ है स्पष्ट रूप से "रहत ना रह संसार " का ।
श्री महाराज जी का सिद्धांत मन के सन्यास से है ना की शरीर के सन्यास से । मन से सन्यास का मतलव माया से मन कि आसक्ति का मिटना । अनासक्त भाव से संसार में डोक्टर आदि बनने से मना कतई नहीं है । जबकि वो चाहते हैं कि उनका शिष्य डौक्टर आदि हो ।
उन्होंने यह नहीं कहा कि शरीर से डौक्टर इंजिनियर , आइ ए एस ना बनो । वो तो यह सब बनने के लिए कहें हैं कर्मयोग के लिए । भक्तियोग के लिए । वो तो पक्षधर थे कि बढ़िया से बढ़िया आदमी बनों पोस्ट पाओ , पर आसक्ति ना हो पोस्ट में , पैसा में , संसार में । पोस्ट पा कर सेवा करो ज्यादा बढ़िया से । लोगों को जोड़ों । अपने बच्चे को जोड़ों उसके बच्चे को जोड़ों । आसक्ति विहिन भौतिक विकाश के साथ आसक्ति युक्त आध्यात्मिक विकास ज्यादा से ज्यादा हो यह उदेश्य है हमारा ।
तो हम लोग सत्संग तो करते है रात दिन पर उनके प्रचारक का ध्यान से नहीं सुनते जब वो पद की व्याख्या करते हैं तो हमारा ध्यान कहीं और चला जाता है और हमें पता भी नहीं चलता की हमारा ध्यान भटक गया था और महत्वपुर्ण व्याख्या छूट गया । इसिलिए कुछ बच्चे लोग पद आदि टाईप करके पोस्ट तो करते हैं पर उसका उल्टा अर्थ लगा लेते हैं कि श्री महाराज जी संसार हीं छोड़ देने के लिए कहा है । यह बड़ा खतरनाक है ।
और फिर लाईन बाई लाईन अर्थ समझे गवईया के तरह गाना और झुमने से कोई लाभ कभी भी होगा क्या ?
इसलिए तो श्री महाराज जी बराबर गौरांग महाप्रभु का यह बात बोल देते हैं कि
बहु जन्म यदि करें श्रवन किर्तन ,
तऊ नाई पाए श्री कृष्ण पदे प्रेम धन।।
तो इस प्रकार ना पद गाने से कुछ लाभ होगा और ना मंदिर में भगवान की तरह फुल माला चढ़ा कर आरती उरती करने से , रह सब तो संसार में अनेकों साल से लोग करते ही आए हैं भगवान का पुजा , आरती आदि ।
जब गुरू बंदना का सही अर्थ कुछ भोले बालक नहीं समझते तो वांकी पदों का बात हीं छोड़िए ।
तो हमें बहुत सतर्क होकर सुनना चाहिए प्रचारकों का। इसलिए उनके द्वारा पहले कह दिया जाता है कि अब आपलोग समाहित चित् हो जाईए और होकर सुने । पर हम शरीर से केवल सतर्क होकर बैठ जाते हैं , मन कहीं और रहता है । जब की कहा जाता है समाहित चित् यानि मन से सावधान ।
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