Sunday, 4 April 2021

हमारी मानसिकता जीवन के हरेक क्षेत्र मेनिम्नस्तरकी होती जा रही है ऐसा हम महसूस करते रहते हैं ? ऐसा क्युं है ? संत महात्माओं की भरमार होने के बावजूद हम अपने हरेक व्यवहार में क्युंअप्रमाणिक बनते जा रहे हैं ?

हमारी मानसिकता जीवन के हरेक क्षेत्र मे
निम्नस्तरकी होती जा रही है ऐसा हम महसूस करते रहते हैं ? ऐसा क्युं है ? संत महात्माओं की भरमार होने के बावजूद हम अपने हरेक व्यवहार में क्युं
अप्रमाणिक बनते जा रहे हैं ? 
****************************************** क्यूंकि हम लोग संत महात्माओं , भगवान , महापुरुषों "को" मानतें हैं सुनतें हैं पढ़ते हैं लेकिन उनकी मानते नहीं । गांधी जी पर माला चढ़ातें हैं उनको मानतें हैं , पर "उनकी" मानतें नहीं । कारण यही है । विवेकानंद जयंति मनाते हैं पर उनके आदर्शों से दुर हैं । गौरांग ज्यंति मनाते हैं पर भक्ति से कोसों दुर हैं ।

मानवत कहता है - मांस मदिरा का सेबन मत करो , 
चोरी मत करो , दुसरे में दोष मत देखो , खुद में दोष देखो ,दुसरे में दुर्भावना मत करो ।
झूठ मत बोलो कि किसी का नुक़सान हो जाए , दूसरे को दु:ख मत दो , हर समय खुद में भगवान को महसूस करों , एक क्षण को भी उनको ना भूलो , राग द्वेष , काम क्रोध , मद् मोह लोभ अहंकार आवे तो दमन करो इन दुर्गुणों का , जैसे सारी के एक छोड़ में आग लग जाती है खाना बनाते समय महिलाओं को तो वो तुरंत दवा देती है । ठीक उसी तरह क्रोध आवे तो दवा दो , शांत हो जाओ ।
अपने शरीर का ध्यान रखो , समय पर सोओ , समय पर उठो , काम करते समय हर आधे घंटे पर भगवान हमारे साथ है एक पल सोंचों , वो हमारे सब काम देख रहें हैं , नोट कर रहे हैं यह गांठ पार लो ।"
पर कितने प्रतिशत लोग , अपनी जिंदगी में अपनाऐं हैं ?
हद की झूठ बोलना हम सिख गए हैं , हर पल हर ओर हर समय पाप बढ़ रहा है , हर ओर निर्दोष जीव के भ्रूण तक को खा रहे हैं । 

आज भाई भाई से झूठ बोलते है , मां से झूठ बोलते है लोग पिता से झूठ बोलते है , बुजुर्गो का सम्मान नहीं , आज हम अपने बच्चों कों सही संस्कार नहीं देतें , सही शिक्षा नहीं देते ताकि उनको संस्कार मिले । 
भारतीय संस्कृति पर पश्चात्य संस्कृति हावी है ,खास कर आज के 70% युवाओं और बच्चों में और परिवार में, आज के महानगर में उपनगर में रहने वाले भारतीय दम्पत्ति अपनी संस्कृति को भुल रहे हैं । कहतें हैं हम मोडर्न हैं । तुमने हमारे कपड़े पर सवाल उठाया , तुम्हारी हीं‌ नियत खड़ाब है आदि आदि । 

लड़के फटा जींस पहनतें हैं जो पश्चिम के गाय , याक् आदि के चरवाहे पहनते हैं , क्योंकि उनका जींस फट जाता है घीस कर कठीन परिश्रम से , वह यहां फैशन बन गया है ।‌ जींस का मैं विरोधी‌ नहीं लेकिन जींस फटा खड़ीद कर पहनना गलत है , बोलीवूड का असर हैं , बोलीवुड के अच्छा चीज से मतलव नहीं लेकिन एक्टिंग का नकल अच्छा लगता हैं ।
वो तो एक्टिंग में ऐसा पहनतें हैं करतें हैं फिल्म में , लेकिन हम लोग तो अपने सार्वजनिक जीवन में उनका एक्टिंग अपनातें हैं जिसकी वो लोग सार्वजनिक जगह पर सारी पहन कर आतें हैं , हीरो मर्यादित कपड़े पहन कर आतें हैं लोगों के बीच । और हम ????

हम भौतिकबाद में जितना आगे बढ़ रहें हैं‌ संस्कार उतना ही पीछे छुटते जा रहा है हमारा , नैतिकता समाप्त होती जा रही है , हम आगे बढ़ने की जगह पीछे जा रहें हैं ।
हम अर्थ का अनर्थ करते हैं , शराब कबाब आदी में पैसे खर्च करते हैं , घुमने फिरने मौज मस्ती , शादि विवाह में अनावश्यक खर्च करतें हैं । पर सही जगह पर कंजूसी करते हैं ।

हाय डेड हाय मम कहतें हैं । हमारी बोलीवुड के हिरो हिरोइनी के फिल्मों की नकल करतें हैं , मोटर साईकिल पर युवा स्टंट करतें हैं गर्लस कौलेज के सामने ।
दुसरे के बहु वेटी , पत्नी , धन पर गलत निगाह है ।

तो जैसा मैं अपने कुछ महीने पहले पीछले पोस्ट में लिखा था और अब भी कहता हुं भगवान अपनी माया शक्ति प्रकृति के द्वारा कलयुग में समय समय पर कभी कभी आकाल , आपदा रूपी तांडव करवा कर हमारा विनाश करवातें हैं अपनी योग माया से । 

इसलिए हम सब अगर अपने गुरू और इष्ट को मानतें हैं तो उनकी बातों को भी माने , उनके सिद्धांत को अपनावे , तो हमारे पीछले पापों का शमन होगा और आगे ना करें इसकी जिम्मेंदारी ले । तो प्रकृति के प्रकोप से बच जाऐंगें । हंसना खेलना कुदना व्यायाम करना छोड़ चुकें हैं । यह सब भी अपनाने का प्रयास करें । जो ज्ञान हम दुसरे को देंतें हैं पहले खुद अपनावें । 

हम लोग राम जैसा वेटा भाई पति चाहते है , सीता जैसी पत्नी चाहतें हैं लेकिन खुद दसरथ जैसा बाप , शत्रुध्न , भरत जैसा भाई बनने की जरा भी कोशिश नहीं करतें हैं 
 राम के आदर्शों का एक अंश अपना कर भी उनके जैसा पति बेटा , भाई नहीं बनतें ।
इसलिए हमारे देश में इतने अवतार भगवान कें संत के और महापुरुषों के होने के बाबजूद ज्यादातर लोगों पर पर कोई असर नहीं हुआ । कुछ बीस तीस % पर हुआ होगा , अंदाज से बोल रहा हुं क्योंकि अभी भी भारत हीं रहने लायक हैं , लेकिन अब इसका भी लोग स्वरूप बदलने पर उतारू हैं ।

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