इस ध्येयवाक्य का अर्थ महाभारत के श्लोक 'यतः कृष्णस्ततो धर्मो , यतो धर्मस्ततो जयः से आता है. कुरुक्षेत्र के दौरान, अर्जुन अपने बड़े भाई युधिष्ठिर की अकर्मण्यता को दूर कर उन्हें प्रेरित करने की कोशिश कर रहे थे. वो युधिष्ठिर से कहते हैं, "विजय सदा धर्म के पक्ष में रहती है, और जहां भगवान श्रीकृष्ण हैं, वहां धर्म है।
हमें गर्व है कि यतो धर्मः ततो जयः (या, यतो धर्मस्ततो जयः) जो कि एक संस्कृत श्लोक है और यह भारत के सर्वोच्च न्यायालय का ध्येय वाक्य है। यह महाभारत में कुल ग्यारह बार आता है और इसका मतलब है "जहाँ धर्म है वहाँ जय (जीत) है। पर आज हमारे न्यायालयों के कुछ न्यायाधिपति इस मूल ध्येय वाक्य को भुल जातें हैं । जिससे न्याय में बहुत देरी होती है । और न्याय में देरी या न्यायालय में व्याप्त भ्रष्टाचार एक बहुत बड़ा अन्याय है एवं एक बहुत बड़ा अभिशाप है , महापाप है । पैसे के बल पर न्याय को खरीदनेवाले और बिकने वाले जजों एवं वकीलों को अपने ईमान को नहीं बेचना चाहिए ।
अधिवक्ता का धर्म है सच्चाई को सामने लाना न कि अपने प्रोफेशन का हवाला देकर , अर्थ को बदल करके या अनर्थ करके किसी भी मुजरिम का साथ देना । चाहे वो असली मुजरिम का वकील क्यों ना हों । जब अधिवक्ता को पता चल जाए कि हम जिसका केस हाथ में लिए है , वो सचमुच दोषी है तो अहंकार त्याग कर मुजरिम के खिलाफ हो जाना चाहिए । यही एक सच्चे अधिवक्ता का कर्तव्य और धर्म है ।
सत्यमेव जयते (संस्कृत विस्तृत रूप: सत्यं एव जयते) भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है।
इसका अर्थ है : सत्य ही जीतता है / सत्य की ही जीत होती है। यह श्लोक तीन मुख बाला सिंह, हमारे भारत देश के राष्ट्रीय प्रतीक के नीचे देवनागरी लिपि में अंकित है। यह प्रतीक उत्तर भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में वाराणसी के निकट सारनाथ में 250 ई.पू. में सम्राट अशोक द्वारा बनवाये गए सिंह स्तम्भ के शिखर से लिया गया है, और 'सत्यमेव जयते' जो हमारे भारत देश के प्रतीक चिन्ह के नीचे लिखा गया संस्कृत श्लोक है यह मुण्डकोपनिषद से लिया गया है :-
'सत्यमेव जयते' मूलतः मुण्डक-उपनिषद का सर्वज्ञात मंत्र 3.1.6 है से लिया गया है ।
पूर्ण मंत्र इस प्रकार है:-
सत्यमेव जयते नानृतम सत्येन पंथा विततो देवयानः।
येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत् सत्यस्य परमम् निधानम्॥
अर्थात अंततः सत्य की ही जय होती है न कि असत्य की। यही वह मार्ग है जिससे होकर आप्तकाम (जिनकी कामनाएं पूर्ण हो चुकी हों) मानव जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।:- संजीव कुमार ।
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