असली संतों , वास्तविक संतों के पास अपेक्षाकृत कम लोग क्यों जातें हैं ? क्योंकि असली संत मुख देखा बात नहीं करते , झूठा आशिर्वाद नहीं देते । असली संत कटु सत्य सामने रखते हैं , वे वेद् , शास्त्र सम्मत वास्तविक बात और उसका असली अर्थ बतातें हैं एवं हमेशा सही एवं उचित मार्ग दर्शन करतें हैं दिर्घकालिक परम कल्याण हेतु लोगों का । जो बहुतों को अच्छा नहीं लगता है आज के युग में।
किसी भी संस्कृति में सभी लोग बुरे नहीं होते ।सभी संगीतकार और फिल्मी संगीत ग़ज़ल ,शेरो शायरी बुरे नहीं होते , चाहे वो किसी भी भाषा में क्यूं ना हो । कुछ भटके हुए इंसानों को देखकर , सभी को एक तराजु में तौल देना , यह अच्छे लोगों का , विद्धानो ( सही सही ज्ञानी Real literate people ) का काम नहीं है ।
In this world nothing is perfect except real Sant . Every things has two side like coin , one side is good second is evil . So every things has composition of good and evil except God and real Sant .
So man of learned always thinks according to good side of coin .
Where evil always thinks according to bad insight .
आज व्यास पीठ पर बैठने वाले कुछ दो चार कथा बाचक तत्वज्ञानी तो क्या संसार का भी उनको ठीक से ज्ञान नहीं है । कथा बांचना एक साधारण पेशा बना दिया गया है ।
क्षूद्र लोकेशना ( घटिया लोकप्रियता ) की मंशा से और स्वार्थ हेतु धन कमाने की लालसा से ग्रसित व्यक्ति फुहर लोकरंजन का समावेश व्यासपीठ पर बैठकर अपने कथा में करतें है । लोग अज्ञानतावस, शास्त्रों से दुर होने के कारण, जल्दी इनके झांसे में आ जातें हैं । क्योंकि इनको झूठ के बुनियाद पर आधारित गलत दिलासा भगवान के नाम पर दिया जाता है । भोगवादी कथा कहानियों का समावेश आजकल ऐसे कथाकार अपने कथा में खुब करतें हैं।
घटिया फिल्मी गानों पर घटिया फिल्मी डांस का नूमाईस कुछ कथाकारों द्वारा खुब हो रहा है। जबकि फिल्मों में भी भावयुक्त भक्ति गाने हैं और भक्ति में भावयुक्त क्लासिकल नृत्य का समावेश किया जा सकता है ।
पर कुछ लोग सही सही भक्ति भावयुक्त फिल्मी भक्ति संगीत का भी चुनाव नहीं करतें हैं ।
गलत गानों को अपनातें है ताकी उसपर फुहर ठुमका अच्छे से लग सके और लोग भी उसी स्टाइल में इनके प्रवचनों में खुब ठुमके लगा लगा कर अपने को बहुत बड़ा भक्त मान बैठतें हैं , दिखातें हैं । वो उछल कुद भक्ति नहीं हैं । धोखे में हैं ।
हरेक धर्म में ऐसे लोग हैं । कोई गला फार फार कर हितोपदेश दे रहें हैं । तो कोई ऊंची ऊंची मिनार पर लाउडिसपिकर से जोर जोर से वाग दे रहें है । ऐसे कथावाचक कुछ संस्कृति में कम तो कुछ में बहुत ज्यादा है ।
दु:खी लोगों को भगवान, ईश्वर , खुदा , अल्ल्लाह, जीसस आदि के नाम पर आए दिन हाथ की सफाई से जादुई चमत्कार दिखा कर ठगा जाता है , खुब गुमराह किया जा रहा है । और अनपढ़ हीं नहीं वल्कि तथाकथित पढ़ें लिखे लोग ( कुशिक्षित लोग ) भी इनके पास दौड़ लगातें हैं , यहां खुब भीड़ जुटती है ।
अभाव ग्रस्त लोग , दु:खी जीव अपने स्वसांत्वना हेतु इनका हांथ अपने सर पर रखवाना चाहतें हैं, इसलिए झांसे में आकर लोभ और लालचबस , दु:ख निवृति की आकांक्षा से ऐसे लोगों का चरण छुते हैं और वेचारे के हांथ कुछ नहीं लगता है , उल्टे बरबाद होकर वापस लौटते हैं और फिर इल्जाम लगाते हैं कि फलाने ने मेरी अस्मिता लुट ली , तो धन लुट ली । अपनी गलती नहीं मानतें हैं । शौर्ट कट दु:ख निवृति और सुख की प्राप्ति के लालसा में अंधे होकर पहले तो ए लोग उनके पीछे दौड़तें हैं फिर अपना सबकुछ लुटने के बाद बाप-बाप करते हुए कोर्ट और कचहरी के चक्कर लगातें है और फायदा होता है मिडिया को ,वकिलों को , तो राजनैतिक पार्टी को । और यह कहानी बन जाता है लोकरंजन के लिए । वांकी लोग बड़े मजे से ऐसे ऐसे कहानी को मिडिया एवं सोसल मिडिया में डालकर खुब लाईक और टी आर पी पाकर सस्ती और घटिया प्रसिद्धि पाने चेष्टा करतें हैं । यही चल रहा है आज कलयुग में ।
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