Friday, 2 April 2021

प्रश्न :- भक्ति मार्ग में भी दु:ख सु:ख की परिस्थितियों के पैदा होने का कारण क्या है ?

प्रश्न :- भक्ति मार्ग में भी दु:ख सु:ख की परिस्थितियों के पैदा होने का कारण क्या है ? 

उत्तर :- जीव जब वास्तविक भक्ति मार्ग में कदम रखता है तो उसके अपने पीछले कर्मों का फल प्रारब्ध के रूप साथ साथ रहता है । यही प्रारब्ध उसके संसारिक सुख और दुख का कारण है । 
प्रारब्ध हर किसी को भोगना ही पड़ता है । 
अतः वास्तविक साधक इन माईक सुख दुख की परवाह नहीं करता कभी । वो अपने भगवद् प्राप्ति के लक्ष्य पर गंभीर होता है और अटल होता है । 
उसके पास अपने गुरू के द्वारा दिय गय तत्त्वज्ञान का और उनके कृपा का बल होता है । अपने गुरू के ऊपर दृढ़ विश्वास, अटूट श्रद्धा और निष्काम प्रेम का बल उसकी रक्षा करता रहता है ।
और शरणागत जीव सदा अपने लक्ष्य पर अग्रसर होता है । हालाकी भक्ति से खड़ाब प्रारब्ध की तीव्रता कटती है , आंशिक हो जाती है । और इस प्रकार साधक का परीक्षा भी हो जाता है भगवान की दासी माया के द्वारा । 

जीव और माया का शासक भगवान हैं , लेकिन अनादि काल से जीव भगवान से विमुख है , नेचुरली जीव भगवान को छोड़ कर माया की दासता अनादि काल से कर रहा है ।
अनादि काल से आनंद प्राप्ति के एक मात्र उद्देश्य से हीं माया के पीछे जीव भाग रहा है । लेकिन असली आनंद की प्राप्ति नहीं हुई आज तक । कारण संसार में असली आनंद है हीं नहीं । 
जीव कि दशा माया के पीछे भागने के कारण बहुत दयनिए हैं । इसलिए संसारिक सुख को हीं अपना सुख और संसारिक दु:ख को हीं जीव अपना दु:ख समझता है । और इन्हीं मृग मरीचिका रूपी सुख के पीछे भागते भागते अंतत्वोगत्वा मानव देह छिन जाता है और जीव फिर से चौरासी लाख का चक्कर लगाने के लिए बाध्य हो जाता है ।
इस प्रकार जीव की दशा उस कुत्ते के समान है जिसको घाव ( खुजली ) हो गया है । और वेचारा उसी माया रूपी घाव को चाटकर जीव क्षणिक दैहिक सुख का अनुभव करता है और अंत में फिर उसी से दैहिक दु:ख पाता है ।

यह दैहिक क्षणिक सुख उसे घाव को पल पल चाटने के लिए प्रेरित करता है और चाटते चाटते गहरी घाव एक दिन उसके जीवन लीला को समाप्त कर देता हैं । 

ठीक उसी प्रकार जीव भगवान की दासी माया यानि संसारिक सुख के पीछे भागते भागते अपना तमाम उम्र ( मानव जीवन ) को गवां कर अपना जीवन लीला समाप्त कर लेता है ।

वहीं एक बड़भागी जीव गुरू कृपा से जब यह बात समझ जाता है तब वो माया के पीछे भागना बंद करके ईश्वर के तरफ भागना शुरू करता है ।
जैसे हीं जीव ईश्वर के तरफ भागता है , भगवान की दासी माया जीव को कुछ देर तक पीछा करती है , परेशान करती है ।
माया का गुण है अहंकार , माया अहंकार बस जीव के पीछे भागता है । पर अब हरि गुरू उन्मुख जीव ( संसार का ) माइक डायन का परवाह कहां करने वाला ।
जीव तो माया रूपी डायन से, गुरू के दिय तत्त्व ज्ञान के वल और कृपावल पर तेज भागते भागते माया के मालिक श्री भगवान के शरण में पहुंच जाता है । 
अब जब वो माया देखती है कि अरे ये तो हमारे मालिक का हो गया , इसका हम कुछ न बिगाड़ सके , लाखों बार परीक्षा लिया , कभी संसारिक सुख का लालच तो कभी विपत्ति के झंझावातों का अनुभव कराया , फिर भी यह विचलित नहीं हुआ , और अंततः यह मेरे मालिक को पा लिया , तब वही माया उस जीव के पास आकर सर झुका कर उस हरिगुरू शरणागत जीव का अभिवादन करती है । और सदा के लिए उसका पीछा छोड़ देती है , फिर माया कभी भी ऐसे शरणागत जीव का कुछ नहीं विगाड़ सकती है । इस प्रकार वो जीव आनंद कंद सच्चिदानंद भगवान को प्राप्त कर सदा के लिय आनंदमय हो जाता है । 
श्री राधे । 


No comments:

Post a Comment