एक नट एक रस्सी पर खेल दिखा रहा था । रस्सी 20 फीट के ऊंचाई पर बंधा था और निचे आग जल रहा था । नट अपने बच्चे को गोद में लेकर रस्सी पर चल कर दुसरे छोर पर पहुंच गया । फिर दर्शक खुब ताली बजा रहा था उसको सफलता से मौत के कुंए को पार करने पर ।
फिर वो नट पब्लिक से पुछा कि :- मैंने अभी अभी आग के जलते शोलों के उपर बंधी रस्सी के पहले छोर से इस छोर आ गया , आपलोगों ने देखा अभी अभी । अब फिर क्या आपलोगों को मुझ पर पुर्ण भरोसा है कि मैं फिर इस छोर से उस छोर लौट जाऊंगा ?
पब्लिक जोर से उसका हौसला बढ़ाते हुए बोला की तुम यह अवस्य कर सकते हो । जरूर कर सकते हो , मुझे पुरा विश्वास है तुम पर ।
तो फिर वो नट ने पब्लिक से बोला की मेरे जैसे आपलोगो में से भी कुछ लोगों के गोद में बच्चा है आपका , आपको मुझ पर पुरा विश्वास भी है , आपने अभी अभी देखा कि मैं अपने बच्चे को अपने पीठ पर बांध कर पहले छोर से इस छोर सफलता से पार किया इस रस्सी पर । तो इस बार आपलोगो में से कोई अपना बच्चा मुझे दे मैं उसको अपने पीठ पर बांध कर उस पर अवस्य पहुचुंगा । आप का मुझ पर विस्वास (believe ) है इसलिए भरोसा ( trust ) भी जरूर होगा मुझ पर ।
पर सभी अपना पैर पीछे खिंच लिया । किसी ने अपना बच्चा नहीं दिया उसको ।
यानि कहने का मतलव सिर्फ विस्वास करने वाले तो बहुत है भगवान और गुरू पर भरोसा करने वाले बहुत कम ।
अब आप हीं देखिए बहुत से लोग जो विश्वास की बड़ी बड़ी बात करते हैं भगवान और गुरू पर, उनको दो पैसा दान के लिए बोलिए तो पैर पीछे खिंच लेंगे ।
बहुत कम लोग हीं दान करने के लिए तैयार होते हैं ।
बहुत विरले हीं होंगें जो अपनी कमाई का एक हिस्सा से ज्यादा उनके ( हरि गुरू के )निमित्त दान दें दें ।
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