'वेद' , पुराण , 'श्री रामायण' , 'श्री माहाभारत ' और ' श्रीमद्भागवत, गीता' आदि किन प्रकार के शास्त्र है ?
उत्तर :-
नंबर 1 कृत ग्रन्थ: यह मयाबद्द जीवो द्वारा लिखें जाते है। इसमें लिखने वाले न तो भगवद् प्राप्त हैं , न हीं प्रत्यज्ञ भगवद् अनुभवी , ये अपनी अक्ल से प्रसेप्शन से , अपनी समझदारी से ग्रंथ लिखें है , इसलिए ऐसे ग्रंथों में बहुत सारी त्रुटियां है । जो हमारे लिए भक्ति मार्ग में बाधक है , तथा इनको पढ़ना कुसंग कहा गया है । जब कोई भगवद् अनुभव हीन मनुष्य बिना समर्थ गुरू के , केवल अपनी संकल्पना के आधार पर गीता , रामायण और वेद पढ़ कर अपने अनुसार उसका अर्थ करके कोई किताब लिखता है तो उसको कृत ग्रंथ कहते हैं । यह ग्रंथ सर्वदा दोष सहित है क्योंकि वो जीव माया बद्ध है जिसने यह लिखा है । और मया बद्ध जीव अपने माईक मन बुद्धि से जो भी लिखेगा वो दोषयुक्त हीं होगा ।
नंबर 2 स्मृत ग्रन्थ : यह भगवद् प्राप्त महापुरूषों द्वारा प्रकट किय जाते है लिखे जाते है। यानि भगबद् प्राप्त ,महापुरूषों द्वारा ,अवतार धारण करके पृथ्वी पर प्रकट भगवान द्वारा , जैसे गीता, भागवत, रामायण आदि ग्रंथ आते है। इसलिए यह ग्रंथ दोष रहित है ।इसमें कोइ दोष नहीं हैं । क्योंकि लिखने वाले महापुरूष माया से परे थे। वो भगवान की शक्ति से अपना कोई भी काम करतें हैं , भगवद् प्राप्ति के बाद भगवान की पर्सनल पावर योगमाया शक्ति उन महापुरुषों को मिल जाती है । वो
मायिक दोषों से विल्कूल मुक्त हैं । प्रैक्टिकल महापुरूष होतें है , भगवान को प्रत्यक्ष देखा और सुना और गले लगाया है इन्होने , कोई सपने वपने में नहीं । तमाम उदाहरण है ऐसे महापुरुषों के आप सब जानते हैं , शंकराचार्य , रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य , वल्लभाचार्य, निंबारकाचार्य सुरदास , तुलसीदास , और हमारे श्री महाराज जी श्री कृपालु महाप्रभु जी आदि ।
नंबर 3 विनिर्गत ग्रन्थ: यह भगवान की वाणी है । उनकी आप्त वाणी है , यानि उनसे हीं प्रकट हुआ है ,ऐसे ग्रंथ सृष्टि के समय प्रकट हो जाते है और प्रलय में भगवान मे लीन हो जाते है। वेद पुराण आदि विनिर्गत ग्रंथ है ।और यह पूर्णत: निर्दोष निष्कलंक ग्रंथ है । परंतु ऐसे ग्रंथ को स्वयं पढ़ कर या किसी ऐसे गुरू और शिक्षक से समझा नहीं जा सकता जो केवल थ्योरिटिकल मैन हो , भगवद् प्राप्त ना किया हो ।
थ्योरिटिकल मैन इसको समझने में और समझाने में अपनी बुद्धि लगा देगा जिससे वो वास्तविक अर्थ को ना तो खुद समझ सकता है और ना दुसरे को ठीक ठीक समझा सकता है । थ्योरिटिकल मैंन अपनी बुद्धि से अपनी बात डाल देगा इन ग्रंथों को समझाने में । अतः कोई भी थ्योरिटिकल कथा बाचक , बाबा जी, पंडीत आदि और बहुत सारे स्वघोषित विद्वान लोग हमारे देश में हुए हैं और है जो अपने अपने हिसाब से गीता , रामायण , भागवद् , वेद , पुराण का गलत अर्थ करके अनर्थ कर रहें हैं किताब लिख रहे हैं इन पर । इनसे सुनकर अधिकांश लोग गलतफहमी के शिकार हो रहें है ऐसे लोग ऐसे ही जीव से ज्ञान सुन कर , इनपर , धर्म पर अपने अपने हिसाब से अपनी माईक बुद्धि से बहस करते मिलते हैं । इनसे साधकों को बचना चाहिए , नहीं तो यह कुसंग है ।
हां कोई श्रोत्रिए , ब्रह्मनिष्ठ भगवद् प्राप्त संत महापुरुष मिल जाए तो उनसे समझना चाहिए , ध्यान दिजिए श्रोत्रिए और ब्रह्मनिष्ट का मतलब थ्योरिटिकल मैन के साथ साथ प्रैक्टिकल मैन भी हो , मतलब जिसने सगुन साकार भगवान को अपनी आंखों से देखा हो , छुआ हो ,बातें किया हो , सपने में नहीं , आभासीए नहीं । साक्षात सामने खुली आंखों से उनको देखा हो छुआ हो , गले लगाया हो , वैसे महापुरुष किसी को मिल जाए और उनको अपना गुरू बना लें , मान लें उनको गुरू फिर उनके मुख से सुनें , जाने तो सही सही ठीक ठीक तत्वज्ञान मिलेगा ।
नहीं तो पांच अंधे वाली बात होगी , एक ने हांथी का पैर छुआ और अनुमान लगाया यह खंभा है और सबकों डिक्लियर कर दिया यह खंभा है , एक ने सुंड को छुआ और कह दिया सबसे यह पाइप है । दोनों गलत ज्ञान का शिकार , बोलने वाला अनुभव हीन बाबा भी और उनसे सुनने बाला भी ग़लत फहमी का शिकार ।
अतः ध्यान दिजिए , स्मृत ग्रंथ और विनिर्गत ग्रंथ को ठीक ठीक समझाने के लिए केवल भगवद् प्राप्त संत महापुरुष ही सक्षम है और उन्हीं के शरण में जाना होगा , अन्य दुसरा मार्ग नहीं है , नहीं तो तमाम हानि हो जाएगी ।
:- स्वामीं श्री युगलशरण जी महाराज ।
श्री राधे।
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