Sunday, 11 April 2021

हमारे प्राणों से ज्यादा प्रिय श्री महाराज जी ।

हमारे प्राणों से ज्यादा प्रिय श्री महाराज जी ।
आप हम साधकों का प्राण हैं । आप हमारे ह्रदय सम्राट हैं । आपको गुरू रूप में पाकर हम धन्यातिधन्य हैं । 
आपकी महिमा का बखान करना हम साधारण जनों के लिए असंभव हीं हैं । 
मैं इसे अपना पुण्य पूंज मानु या आपकी कृपा मानु जो आप मिले ।
मैं तो यही जानता हुं और मानता हूँ कि मेरा कोई पुण्य है हीं नहीं , ए तो आपकी करूणा है जो आप मुझे मिले ।
आपके कृपा का थाह नहीं पाता हूँ ।
ये तो आपकी कृपा शक्ति ने मेरे जीवन को संवार दिया ।
मेरे जैसे तुक्ष जीव पर आपकी कृपा का परिणाम है, जिससे मेरे जीवन की दशा और दिशा दोनों श्री हरि की ओर उन्मुख हो गई ।
नहीं तो मैं भी अर्थ , और यश के प्राप्ति के अंधे दौड़ में पड़कर अपने किमती , बहुमूल्य मानव जीवन को यूं हीं गमा डालता ।
आप ने क्या क्या नहीं दिया मुझे भी, इस का लिस्ट बनाना मूश्किल सा है । 

सब आपको कहतें हैं कि आप हरि हैं । मैं भी जानता हूँ और मानता हुँ कि आप हीं साक्षात श्री हरि हैं । अनुभव भी किया है ।

लेकिन मेरे लिए अब एक मात्र आप हीं सबकुछ हैं ।
मेरे गुरूदेव, मेरी मां , मेरे पिता , मेरा भाई , मेरे सारे रिस्ते नातेदार अब आप से शुरू और आप हीं से खत्म होता है ।
अब आपको मैं प्यार इसलिए नहीं करता कि आप हरि का अवतार है ।
वल्कि अब तो आप से अगाध प्रेम इसलिए करता हूं कि आप हीं एक मात्र मेरे सरकार मेरे नाते रिस्तेदार , मेरे मां बाप , दोस्त सबकुछ हैं । 
आपसे बढ़कर अब कोई नहीं है मेरा ।
अब मेरी मृत्यू के समय मैं खुद को अधुरा कभी नहीं समझूंगा । 
मैं आपको पाकर अपना यह मानव जीवन सफल मानता हूं । पूर्ण मानता हूं । भगवद् प्राप्ती पाकर कैसा लगता है मुझे मालुम नहीं । इसका मुझे अनुभव नहीं है ।

मैं तो आपको पा लिया इसी को भगवद् प्राप्ती समझता हूँ।

आपको अपने ह्रदय में पा कर , चौबिसों घंटे महसूस कर मैं कृत कृत हो रहा हूँ आपकी कृपा से ।

अब मुझे लगता है कि कुछ भी पाना शेष नहीं हैं ।

भगवान आप से ज्यादा सुंदर नहीं होंगें ऐसा मुझे लगता है ।
मैंने आपके प्राकृत शरीर में आपकी कृपा से उस दिव्य शरीर को प्रतिपल अनुभव करता रहता हुँ जो आपका वास्तविक स्वरूप है - "श्री राधामहाभाव "।
हे गुरूदेव आपकी सुरत से अलग भगवान की सुरत क्या होगी ! 
आप ने मेरे मन के चंचलता को हर लिया है । आपने मुझको अपने श्री चरणों में बसा लिया हैं । मुझ जैसे तुक्ष प्राणी के दहकते मन को असीम दिव्य शीतलता प्रदान किया है ।

आपने मुझे तत्त्वज्ञान देकर मेरे घोर अज्ञानता को समाप्त किया । 
आपने मुझे अपने साधकपरिवार में सम्मिलित किया है ।

आपने मुझे पूज्यनियां मां रासेस्वरी देवी जैसी उच्च कोटी का गाईड दिया जो माता सम मुझे स्नेह देतीं हैं ।

आपने मुझे उच्चकोटी का गुरूभाई बहन जैसा परिवार दिया । 
आपने मुझे मनगढ सा दिव्य गुरूधाम दिया ।
आपने अपने प्राण सम तीनों अपने पुत्रियों सा दीदी दिया, जो बहुत स्नेह करती है हमें ।।
मैं आपका अनंत काल तक ऋणीं हूँ ।
आपके इस ऋण से ऊऋण होना असंभव है । और मैं चाहता भी नहीं ऊऋण होना ।
मैं आपका पुत्र हु़ँ , आपका दास हूँ ।
मेरी आत्मा पर अब केवल आपका एकाधिकार है गुरूदेव ।
मुझे आपने लक्ष्य भी दिया , साधना भी दी और साध्य भी आपके रूप में मिल गया । और बल भी आप हीं हैं ।
मुझे कुछ भी फिकर नहीं अब । 
अब सारी ईक्छा समाप्त । 
अब तो जब तक यह मानव शरीर है तबतक आपके हीं यादों के सहारे जी रहा हुँ ।
आपके कर्मयोग की शिक्षा, प्रेरणा और बल से मैं जीवन जी रहां हूं । एक ऐसा जीवन जो अनासक्त हैं संसार से ।
अब मेरी आसक्ति तो केवल आपके चरणों से है गुरूदेव ।
मैं आपके प्रेरणा से यह समझ गया हूंँ और आस्वस्त हूंँ, विस्वस्त हूँ कि मेरी मृत्यू के पश्चात आपके श्री चरणों की सेवा हीं मिलेगी और इस आवागमन से छुट्टी मिलेगी ।

अब तो आप जब आऐंगे धरा धाम पर अपनी परकिया भाव की लीला करने तब मैं भी आऊंगा आपके चरणों का दास बनकर । बस अब आपकी सेवा हीं मेरी अंतिम एक मात्र कामना हैं गुरूदेव ।
हे गुरूदेव चीर सनातन मेरे प्राणाधार आपके श्री चरणों में मेरा साष्टांग प्रणाम हैं । मैं एक मात्र आपकी शरण में हूँ।
 आपका और एक मात्र आपका ही संजीव ।
श्री राधे ।

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