हमारा सबसे बड़ा अवगुण एक मात्र अहंकार है। ये अहंकार हीं सबसे बड़ा बाधक है प्रेम मार्ग में , भक्ति मार्ग में । और संसारिक कार्य में भी , यही अहंकार सभी झगड़े का जड़ हैं । हमारा यही अवगुण , conflicts का कारण है ।
इस एक मात्र अवगुण के कारण , काम, क्रोध , ईष्या , द्वेश आदि अन्य दोष उत्पन्न होता है ।
यह अवगुण जबतक नहीं मिटेगी दीनता नहीं आएगी ।
जबतक दीनता नहीं आएगी भक्ति नहीं होगी ।
ए अहंकार इतना खड़ाब अवगुण है कि हम इसी कारण किसी भी भगवद् विषय को महत्त्व नहीं देते ।
हम तत्त्वज्ञान पाने के बाद भी इस सूक्ष्म लेकिन सबसे बड़े अवगुण को समझ नहीं पाते ।
इसी एक मात्र अवगुण के कारण हम दुसरे को छोटा और तुक्ष समझते हैं । अपने को हर जगह बड़ा मानते हैं ।
यहां तक कि भगवद् क्षेत्र में भी हम अहंकार ले आते हैं । हम समझने लगते हैं कि हम बड़ा भारी हरि भक्त और गुरूभक्त हैं । हम भला दुसरे को क्यों महत्त्व दें ।
हम जो काम करते हैं वहीं अहंकार ले आता है हमारे मन में । इसे दूर करने का प्रैक्टिस करना जरूरी है । नहीं तो यह हमें किसी भी चीज में आगे नहीं बढ़ने देगा ।
चाहे संसार हो या अध्यात्म अहंकार का राज हर जगह हमें नीचे हीं गिराता है ।
अरे जब हम खुद भगवान स्वरूप गुरू को पाकर भी , उनके द्वारा दिए गय तत्व ज्ञान पा कर भी हम अहंकारी हीं हैं, तो हम से अच्छा तो वो संसारी है जिनको ऐसा दिव्य चिन्नमय भगवान स्वरूप गुरू नहीं मिला अबतक और अज्ञानता वश अहंकार करता हैं ।
हमें इस अहंकार को समझना होगा । यह बहुत सूक्ष्मतम से सूक्ष्मतम और बड़ा से बड़ा होता हैं ।
हर समय खुद में झांकते रहना होगा ।
Intorspaction करते रहना होगा कि कहीं हममें अहंकार तो नहीं है ।
श्री महाराज जी ने बड़ा अच्छी शिक्षा दिए हैं अहंकार को समाप्त करने के लिए :-
एक सन्यासी एक पत्थर के मूर्ती के पास खड़ा होकर उस पत्थर की मूर्ति से भिक्षा मांगता था ।
एक व्यक्ति ने उससे पुछा ,' ऐ तुम इस पत्थर के मूर्ति से भिक्षा क्यूं मांगते रहते हो बार बार '
तो वो वोला कि मैं इस पत्थर की मुर्ती से भिक्षा इस लिए मांगता हूंँ यह जानते हुए कि यह भिक्षा नहीं देगा ।
और इस तरह हमारा अहंकार धीरे धीरे कम होगा और जब किसी व्यक्ति से भिक्षा मांगुंगा और वह नही देगा तो मुझे क्रोध नहीं आएगा ।
अहंकार हीं क्रोध की जननी है ।
मैं भी अपने प्यारे गुरूदेव के तत्त्व ज्ञान से लाभ लेता हूँ ।
मैं संसार में या सोसल मिडिया में सबको अपने ऊंचा मानता हूँ । खुद को वास्तव में सबसे नीचा मानता हूं ।
जब कभी अहंकार सूक्ष्मतर रूप में मेरे मन में आता है तो मन को खबरदार करता करता रहता हूं ।
और अहंकार के विपरीत जाकर सबको अच्छा मानता हूं । सबको अहमियत देता हूं । सबमें अपने ईष्ट के उपस्थिति को देखता हुं । सभी जीव हमसे महान है । बड़ा है ।
यह वास्तव में मैं करता हूं । बड़ा लाभ हुआ है मुझे ।
सदगुरू देव के दिए गय ज्ञान को याद रखना काफी नहीं है वल्कि हरेक तत्व ज्ञान को अपने जीवन में लागु करने का प्रैक्टिस के साथ साथ रूपध्यानसाधना बड़ा आवश्यक है । बड़ा लाभ है । जय जय श्री राधे
श्री महाराज जी की जय ।
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