प्रश्न - भगवान को भाव का भुखा क्यों कहा गया है ?
उत्तर :- एक भुख का मतलव है आभाव में भुख और दुसरा आभाव नही है किसी चिज़ की , किसी चिज़ की कमी नहीं है , हर तरह से पूर्ण है फिर भी अपेक्षा करते हैं कि लोग हमें भोजन के लिए पुछे प्रेम भाव से । तो यहां भुख का मतलव है प्रेम भाव की अपेक्षा करना है ।
भगवान को सच में कोई व्यक्ति अगर किसी चिज़ का भुखा माने तो वो अज्ञानी है, भगवान को भावकग्राही कहना शास्त्र सम्मत है लेकिन उनको भाव का भुखा कहना और मानना शास्त्र विरुद्ध बातें हैं ।
भगवान प्रत्येक जीव के हित के लिए , उसके कल्याण हेतु उसके भावना को रीड करते हैं , इसलिए उनको भावक ग्राही कहा है शास्त्रों ने , लेकिन भगवान को भाव का भुखा कहना भारी मूर्खता है ।
भगवान किसी भी विषय वस्तु या भाव-वाव के भुखे नहीं है , उनको किसी चीज की कोई आवश्यकता या आभाव नहीं है । वो पूर्णकाम है निष्काम है , भला वो किसी चीज का भुखे क्यों रहेंगे ? उनको किस बात का आभाव है जो वो किसी भी चिज़ के भुखे रहेंगे ?
भगवान का गुण है - पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते' -वृहदारण्यक उपनिषद ।
वो परंब्रह्म भगवान श्री कृष्ण तो सभी प्रकार से सदा से परिपूर्ण है और परिपुर्ण रहेंगे ।
तो फिर भगवान को किसी चीज का भुख हो, यह सर्वदा असंभव है । इसलिए भगवान को भाव का भुखा कहना एक अपराध है ।
हां भगवान भावक ग्राही अवश्य हैं, वो भी अपने भक्तों के हितों के लिए केवल । भक्तों के दिव्य स्वार्थ (भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, विवेक ) को प्रदान करने के लिए अपने अकारण करूण स्वाभाव के कारण वो अपने भक्तों के द्वारा उनके प्रति अर्पित प्रेम भावना को, भक्ति भाव को , मायिक सेवा , मायिक साधना आदि को रीड करते हैं, नोट करते हैं और फल के रूप में उसे अपना प्रेम प्रदान करते हैं, आनंद प्रदान करते हैं , भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, विवेक, प्रदान करते हैं ।
चूकि जीव भगवान को और गुरू को केवल श्रद्धा भाव , प्रेम भाव , पूर्ण समर्पण, शरणागति भाव से , निष्काम सेवा भाव से हीं प्राप्त कर सकता है, इसलिए भगवान जीवों को अपनी भक्ति प्रदान करने के लिए अपने भक्तों से निष्काम प्रेम भाव की अपेक्षा करते हैं इसलिए उनको भावक ग्राही कहा गया है ।
हमारे गुरूदेव श्री महाराज जी भी तो सिर्फ हमारे कल्याण के लिए इस मायालोक में गोलोक से आए , इतना कष्ट उठाए वर्णा उनको किस चिज़ की कमी थी , वो तो पुर्णकाम हैं । भला उनको किस चिज़ की भुख थी या है , वो तो स्वयं भगवान का स्वरूप है , भगवान की सभी शक्तियां, सभी धन गुण के वे स्वामी है उनको इस गंदे संसार से भला क्या लेना देना ।
वो आए इस मृत्यु लोक में सिर्फ और सिर्फ हमारे कल्याण हेतु तथा अपने अकारण स्वभाव वश हमसे अपेक्षा करते हैं कि हम उनके अनुगत होकर , शरणागत होकर उनके बतलाए मार्गों का, सिद्धांतों का ठीक ठीक पालन करके सदा के लिए उनको प्राप्त करके इस मायालोक से मुक्त होकर सदा के लिए आनंदमय हो जाए । इसमें हमारा स्वार्थ है , उनका कोई स्वार्थ नहीं है । वो तो हर तरह से परिपूर्ण है , पुर्णकाम हैं , निष्काम है , उनको भला किस चीज की कमी ?
अत: यह कभी मत सोचिएगा कि हम उनके निमित्त दानादि या किसी प्रकार से कोई सेवा करके उनका उपकार कर रहे हैं , यह भारी नामापराध हो जाएगा ।
हमेशा ध्यान रहे, हम हरि और गुरू के निमित्त जो भी सेवा , दान तथा साधना करते हैं, उनका रूपध्यान करते हैं , उनका गुन गाते हैं भजन किर्तन करते हैं, उनके सुख के लिए जी भी काम करते हैं वो दरअसल केवल और केवल अपने ही कल्याण हेतु कर रहे हैं, वर्णा भारी नामापराध हो जाएगा, आपका नुकसान हो जाएगा , सावधानी अति आवश्यक है ।
याद रहे यह सिद्धान्त ज्ञान कि एक समर्थ ही असमर्थ की सेवा कर सकता है , असमर्थ समर्थ की सेवा कभी नहीं कर सकता ।
इसलिए भगवान और गुरू सर्वदा समर्थ है और वे असमर्थ जीव की सेवा करते हैं उसको तत्वज्ञान देकर , उसका मायिक दान स्वीकार करके , उसकी मायिक साधना तथा सेवा स्वीकार करके । उसका मार्ग दर्शन करके , अपने साधकों का योगक्षेम वहन करके , उसकी हर तरह से रक्षा करके ।
इसलिए किसी भी जीव के मन में दान , सेवा , और साधना भजन किर्तन का अहंकार रत्ति भर भी न हो कि हम यह यह किए हैं और करते हैं और हम उनका बहुत बड़ा भक्त हैं ,बड़ा सेवक है, बड़ा साधक है , वर्णा सबकुछ समाप्त । अहंकार आया कि दीनता और आंसु गए और फिर सब जीरो बटा सौ बराबर जीरो हो जाएगा ।
जीव जब भगवद् प्राप्त कर लेगा , गुरू कृपा से समर्थ बन जाएगा तब उसको दिव्य सेवा मिलती है भगवान और गुरू की उनके गोलोक में । उस सेवा को प्राप्त करके वो अपना कल्याण सदा के लिए कर लेता है ।
:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन से प्रश्नों का उत्तर ।
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