ये मोहब्बत का शहर है जनाब ,
यहां सवेरा, सुरज से नहीं किसी के दिदार से होती है,
यहां फुल भंवरों से नहीं किसी के मुस्कुराहटों से खिलती है
यहां खुशबु फुलों से नहीं किसी के शरीर से निकलती है
फिजाओं में रंग गुलों से नहीं,किसी के शरीर से निखरती है
यहां नशा शराब से नहीं किसी के दिव्य आंखों से चढ़ती है ।
यहां मौज चमन से नहीं गोलोक वाले से मिलती है ,
यहां प्रेम में दिलों जां किसी संसारी पे नहीं बंशीवारे पे लुटती है
यहां हर शय में, हर लय में, हर धुनों में पांव, संसारी गीतों पे नहीं, हमारे " कृपालु" महाप्रभु के लिखे और गाए पदो के बोल पे थिरकती है ।
🙏❤️🙏
:- आपके दास संजीव की भावना, रचना नंबर 56।
🙏
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