Monday, 4 January 2021

उत्तम गति कौन पाता है ?

बिना धर्म के किसी का भी अस्तित्व संभव हीं नहीं । 
चाहे वो जड़ हो , जंगम हो , स्थावर हो या चेतन हो ।
राक्षस हो या मनुष्य हो , देव हो या दानव हो ।
जो खुद को नहीं जानता और बाहरी दुनिया में हीं भटकता रहता है वो ही कहता है कि मैं धर्म को नहीं मानता । ऐसा व्यक्ति बाहर के दुनिया में भटकते भटकते एक दिन ऐसा मरता है जैसे कभी जिया हीं नहीं । ऐसे जीव का मृत्यु बड़ा दुखदाई होता है । जीवन के अंतिम क्षणों में वो खुद को खोखला पाता है । मानसिक वेदना के दलदल में फंसा कराहता रहता है पर शांति नहीं मिलती, और यही अशांती उसको एक नया शरीर में प्रवेश करा देती है पर अफसोस की यह शरीर मानव का नहीं होता , वल्कि अशांत निकृष्ट यौनि का होता है , फिर वो उस शरीर के धर्म के अनुसार जीता है और 84 लाख यौनियो के अंतहीन पथ के चक्की में पिसता रहता है । 
अतः जो धर्म को जीता है वो उत्तम गति पाता है और जो अधर्म को जीता है वो दुर्गति को प्राप्त होता है ।
और एक हीं धर्म सर्वोत्तम है - हरि गुरू से प्रेम । श्री राधे जय जय श्री राधे ।:-  संजीव

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