Tuesday, 5 January 2021

धन के तीन प्रकार की गति होती है ।

धन के तीन प्रकार की गति होती है
 पहला- गति, 
दूसरा- सद्गति , 
तीसरा - दुर्गति । ( यानी - सात्त्विक गति, राजसिक गति , तामसिक गति ) 
अगर हम आप अपने धन का सदुपयोग नहीं करेंगे तो धन का नाश और दुरूपयोग निश्चित है। धन रहेगा नहीं । लक्ष्मीं चंचला हैं । आए बंद हो जाएगी , दरिद्रता आएगी हीं । यह निश्चित है । 

धन का गति - अपने शरीर को तथा अपने आश्रितों के शरीर के जरूरी तत्त्वों के उपर खर्च करना धन की गति है । अपने शरीर और अपने उपर आश्रित जीवों के आवश्यक आवश्यकता पर खर्च करना धन की गति है । यह आवश्यक हैं । जो कंजुसी करता है , अपने आवस्यक आवस्यकता के उपर , अपने उपर आश्रित जीवों के उपर खर्च नहीं करता तो उसके धन का नाश , रोग और शोक में होता है ।

धन की सद्गति - अपने कमाई से या संचित धन का एक हिस्सा सत्पात्र को दान करना । हरि -गुरू के निमित्त दान करना धन की सद्गति है । इससे इह्लोक और परलोक दोनों का लाभ मिलता है । इससे जीवों के अच्छे प्रारब्ध का निर्माण होता हैं । धन के सदुप्योग से भौतिक सुख-शारीरिक सुख और दान से जीव हरि-गुरून्मुख होकर असीम मानसिक सुख का , अध्यात्मिक सुख का, भगवद्‌प्रेम की लालसा का बढ़ना और भगवद् कृपा का सुख मिलता है । हरि गुरू की विषेश कृपा प्राप्त होती है । हरि गुरू इस दान में प्राप्त धन को भोले भाले दुसरे जीवों के लिए खर्च करतें हैं । वो धन को इसी लोक में जीवों के उपर लुटातें हैं । एक स्वस्थ व्यक्ति को रक्त दान भी करना आवश्यक है । जिसको रक्त की जरूरत हो मिल जाए , वो बेचारा बच जाए । 
हरि गुरू धनवान वेटे से धन लेकर अपने निर्धन पुत्र के निमित्त खर्च करतें हैं और धन की सेवा करने वाले के अच्छे प्रारब्ध का निर्माण करतें हैं चुप चाप , बिन बोले , बिना बतलाए । योगक्षेम बहन करतें हैं , सम्भालतें रहते हैं ।

धन की दुर्गति - अब अगर धन का उपर्युक्त बिधि से गति और सद्गति नहीं होता हैं तो धन का दुर्गति तो होगा हीं , चौथा रास्ता तो है हिं नहीं ।
ऐसे में धन का लुट जाना , डकैती हो जाना , चोरी हो जाना , संचित धन का नाश कुपुत्र के द्वारा । तामसिक पदार्थों के उपर धन का खर्च होकर नाश , जैसे शराब, कबाब , जुआ , ( शेयर मार्केट ) व्यापार में नुकसान व घाटा , रोग , दुर्घटना , केस , मुकदमा आदि के माध्यम से धन का नाश होगा हीं । और इनकम भी बंद हो जाता है । आय बंद । दरिद्रता आ जाती है । 
आवस्यक आवस्यकता से अधिक की बस्तु पर धन खर्च करना , भोग बिलास की बस्तुओं पर खर्च करना धन का दुरूपयोग है , दुर्गति है ।
:- मां के बहुत पुराने प्रवचन के आधार पर ।

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