Wednesday, 21 August 2024

आज कल अधिक पुजा पाठ के बाबजूद पापाचार बढ़ रहा है उसका कारण क्या है ?

आजकल हमारे देश में अधिकांश संख्या में लोग जप तप व्रत पूजा पाठ, उपवास तीर्थ-विर्थ हवन यज्ञ रूद्राभिषेक सत्यनारायण की पुजा , दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा , गणेश पूजा , लक्ष्मी पूजा , काली पूजा , सुंदरकांड की पाठ, आदि तमाम तरह के कर्मकांड करने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही है , बड़े बड़े मंदिरों में रात रात भर भजन कीर्तन, जागरण, दान आदि करते पाए जाते हैं । 

आजकल तो इतने प्रवचन करने वाले बाबा लोगों की भरमार हो चुकी है हमारे देश में जितना की आम लोगों की जनसंख्या भी नहीं थी सतयूग तथा त्रेता आदि में हमारे देश भारत में । आजकल इतना अधिक लोग ये सब कर्मकांड करते पाये जाते हैं जितना की सतयुग, त्रेता तथा द्वापर आदि का लोग भी नहीं किया होगा कभी । और करेंगे कैसे द्वापर में आज के तुलना में जनसंख्या ही कितनी थी ? आज भारत में हीं केवल एक सौ चालीस करोड़ लोग रहते हैं । 

लेकिन आज एक भी आदमी यह दावा नहीं कर सकता कि ए सब करने से उनके मन की एक प्रतिशत भी शुद्धि हुई है, मनों रोग - काम क्रोध , मद , मोह, लोभ , मातषर्य , ईर्ष्या घृणा , राग द्वेष चिंता आदि लेश मात्र भी कम हुआ है, सुख शान्ति तो बहुत दूर कि बात है ।

अरे आम लोगों कि कौन कहे स्वयं को बड़े बड़े पंडित , पुजारी , आचार्य , प्रवचन करने वाले लोग , कर्म कांड कराने वाले पंडितो के भी ये रोग कम नहीं हुए हैं । 

जरा सा कुछ प्रतिकूल बातें कोई इनके खिलाफ बोल दे , तुरंत गुस्सा , और लोभ लालच , राग द्वेष, अहंकार आदि इतना अधिक इनके मन में पाय जाते हैं कि उसी मंदिर के दुसरे पंडितो के प्रति राग द्वेष भरा परा है । जब इन पंडितो पुजारियों , आचार्यों का यह हाल है तो आम लोगों कि कौन कहे , अपने ही मंदिर के दुसरे पुजारी , आचार्य का बुराई करते मिल जाते हैं आज । आपस में एक दुसरे कि बुराई तो छोड़िये ये कर्मकांडी पंडित आचार्य लोग तो बड़े बड़े जगद्गुरुओं को भी नहीं छोड़ते , उनके बारे में गलत-सलत बातें बोलते रहते हैं , बड़े बड़े जगद्गुरुओं के प्रति भी दुर्भावना तथा द्वेष रखते हैं अपने मन में । 99% पंडितो में आचार्यों में दीनता , नम्रता, सहिष्णुता नहीं मिलेगा आज आपको , तो फिर पुजा पाठ हवन यज्ञ आदि कराने वाले गृहस्थों की तो बात ही छोड़िए । 

जब पंडितो पंडों, आचार्यों आदि का यह हाल है जो मंदिर में दिन रात भगवान के विग्रह कि सेवा करते हैं पुजा पाठ करते और कराते हैं तो भला साधारण लोग , इनसे कर्म कांड कराने तथा करने वाले गृहस्थों के मन बुद्धि चित्त अहंकार कि शूद्धि कि बात कौन सोचें ? 
तो इन सबका क्या कारण है ? तो पहला और सबसे प्रमुख कारण है आजकल केवल शरीर से भक्ति कि जा रही है । मन इंभौल्व हो या न हो कोई मतलव नहीं । दुसरा कारण कलयुग में कर्मकांड के सभी नियम तथा निषेधों का ठीक ठीक पालन असंभव है ।

अगर कोई पंडित यह कहता है कि भगवान कि फिजिकल सेवा , शरीर से पूजा पाठ , व्रत उपवास हवन यज्ञ करने से अभीष्ट यानि भौतिक बस्तूओं तथा संसारिक सुख सुविधा के साधनों कि प्राप्ति होती है तो जरा उनको देखा जाए जो लोग यह सब नहीं करते और न कभी किया आज तक फिर भी उनके पास आज रूप्या पैसा धन जन आदि पुजा पाठ जप तप हवन यज्ञ व्रत तीर्थ-विर्थ उपवास करने वालों कि अपेक्षा कई गुणा अधिक क्यों हैं ? 

नंबर दो अगर वो यह कहते हैं कि इन सब कर्मकांड से पाप समाप्त होता है कष्ट मिटते हैं तो आज ये सब करने बाले वेचैन क्यों है , इतना चिंता निराशा आदि से ये लोग घिरे क्यों रहते हैं ? आगे पाप करने के प्रवृत्ति का नाश क्यों नहीं हूआ ? 

नंबर तीन अगर यह दावा करते हैं पंडित लोग कि इससे लोगों के संस्कार का निर्माण होता है मन कि शूद्धि होती है तो जरा यह देखिए आज कि कितने लोगों यहां तक पंडितो तथा पंडों के खुद राग द्वेष काम क्रोध ईर्ष्या आदि समाप्त हुए हैं या कम हूए है ? 

तो यह सब वेकार कि बातें हैं । शास्त्र कहता है कलयुग में मंत्र तंत्र पुजा पाठ , जप तप हवन यज्ञ व्रत उपवास तीर्थ विर्थ संसारिक गानों के साथ भजन कीर्तन, नृत्य , उछल कूद सब निर्थक है इन सबका कोई लाभ नहीं है और न भगवान इन सब कर्मों से एक रत्ती भी खुश होते हैं , और न कृपा करते हैं । 

यहां तक कि इस कलयुग में इनसे न कोई आध्यात्मिक लाभ है और न कोई भौतिक लाभ है । 

भौतिक बस्तुएं तो जीव के केवल पुर्व जन्मों के संचित कर्मों जिसे प्रारब्ध कहते हैं प्लस इस जन्म के क्रियामान कर्मो से ही मिलता है । 
और अपवाद रूप में कोई सतयुग तथा त्रेता एवं द्वापर आदि के जैसे नियम तथा पुरे विधान से जो कि आज असंभव है, अगर कर भी ले ठीक ठीक तो उसके कुछ पिछले संचित पाप आदि धुल सकते हैं लेकिन जीव का उद्धार नहीं हो सकता , क्योंकि जीव के अनंत जन्मों के पाप की गठरी उसके माथे पर है । इन सबका क्षय इन सबसे नहीं हो सकता जब तक जीव के पंचकोष , पंचक्लेश , त्रिविध ताप आदि पुरी तरह भस्म न हो जाए ।
और जहां तक आध्यात्मिक लाभ एवं मन बुद्धि चित्त अहंकार, साधन चातुष्ट्य आदि कि शूद्धि आदि कि बात है तो यह केवल मन से भगवान तथा योग्य गुरू कि निरंतर तथा अनन्य भक्ति , पुर्ण शरणागति एवं साधना से हीं संभव है वरना कलयुग में कोई अन्य साधन फलदायी नहीं है । 
:- गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज द्वारा प्राप्त सिद्धांत ज्ञान से । श्री राधे ।

Tuesday, 20 August 2024

गुरू द्वारा प्राप्त वैदिक सिद्धांतो तथा तत्वज्ञान से अपने मन पर कंट्रोल तथा विजय हासिल करने का अभ्यास हमें हर रोज करना होगा, और यह अभ्यास एकांत में हरि गुरू के रूपध्यान साधना से हीं संभव है अन्यथा मानवीय चंचल मन कि उच्छृंखलता कभी दूर नहीं हो सकती ।

पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी :- अपने गुरू द्वारा प्राप्त वैदिक सिद्धांतो तथा तत्वज्ञान से अपने मन पर कंट्रोल तथा विजय हासिल करने का अभ्यास हमें हर रोज करना होगा, और यह अभ्यास एकांत में हरि गुरू के रूपध्यान साधना से हीं संभव है अन्यथा मानवीय चंचल मन कि उच्छृंखलता कभी दूर नहीं हो सकती । 

 उच्छृंखल मन हमेशा उदंडता करता रहेगा तथा यह तर्क , कुतर्क , वितर्क एवं अति तर्क में हीं उलझा रहेगा हमेशा और यही उदंड मन जीवन के हर क्षेत्र में असफलता का सबसे बड़ा कारण है । एक उच्छृंखल मन मनुष्य का पतन करा देता है । उच्छृंखल मन मनुष्य को अपने लक्ष्य पर कभी पहुंचने नहीं दे सकता है ।
अनेक बिचारों का प्रवाह यह मानवीय मन जीव के आत्मशक्ति को छिन्न-भिन्न करके रखता हैं जिस कारण यह मन किसी भी शुभ कर्म में केंद्रित नहीं हो सकता । 

इसलिए मन को ध्यान ( Meditation ) द्वारा "साधना" होगा । एकांत रूपध्यान साधना के द्वारा मन को दिव्य शक्ति यथा ज्ञान शक्ति के मूल स्रोत हरिगुरू में जमाना होगा, केंद्रित करना होगा । रूपध्यान साधना द्वारा इसको नियोजित करने की कला सिखनी होगी । मन को अनावश्यक बिषयों के चिंतन , चिंता तथा नकारात्मक बिचारो के प्रवाह से हटाने कि क्रिया को मन का निग्रह कहते हैं, दुसरे शब्दों में चित्त का मार्जन करना भी इसी क्रिया को कहते हैं तथा इसे हरिगुरू द्वारा दिया ज्ञान एवं सकारात्मक चिंतन में लगा कर दिव्य गुणों को ग्रहण के क्रिया को परिग्रहण कहते हैं । 

मन को अनेको अनुपयोगी बिषयों के चिंतन से हटाकर किसी एक परम उपयोगी तथा कल्याणकारी बिषय में लगाने की कला को मन को नियोजन करना कहते हैं । इंग्लिश में इसे Mind Management कहते हैं । 

अनियोजित मन अज्ञानता के कारण अनादि काल से अनित्य को हीं नित्य मान बैठा है , यह अपने शरीर तथा इस संसार को ही नित्य मान बैठा है , अत: यह सदा से अविद्या माया का शिकार है । इसी अविद्या माया के कारण जीव का मन भ्रम , प्रमाद , विप्रलिप्सा तथा कर्णपाटव जैसे मानसिक रोगों से ग्रसित है । 

यही अविद्या माया अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश का भी मुख्य कारण है । और यही पांचों अवगुण जीव के मन को चिंता तथा भय से ग्रसित कर रखा है । 
जब तक मनुष्य का मन इनसे मुक्त नहीं होगा तब तक जीव अपने लक्ष्य को कभी हासिल नहीं कर सकता । 
जब तक मनुष्य का मन स्थिर नहीं होगा, जीव हमेशा अशांत रहेगा , दुखी रहेगा , हताशा तथा निराशा का शिकार रहेगा चाहे वो कितना भी अनित्य संसाधनो को अपने लिए जमा करके रख ले ।
जब तक जीव अपने मन के अनंत शक्तियों को नियंत्रित करने का कला नहीं सिखेगा तब तक मनुष्य का पंचकोष भष्म नहीं हो सकता , और जब तक पंचकोष भष्म नहीं होगा, जीव पर त्रिताप तथा पंचक्लेश हमेशा हावी रहेगा और जीव दुखी हीं रहेगा , चाहे वो कितना भी धन , जन वैभव तथा अन्य अनित्य भौतिक बस्तूओं को इकट्ठा कर लें । 

आज कलयुग में भगवान तथा गुरू कि भक्ति तथा उनकी बतलाई साधना ही एक मात्र ऐसा साधन है जिससे जीव अपने मन को अपने वश में कर सकता है दुसरा कोई अन्य साधन नहीं है, क्योंकि अनादि काल से संसार में हीं आवागमन के कारण चतुर्युगी युग चक्र के अंतिम युग कलयुग में जीव का मन इतना उच्छृंखल हो चुका है कि वो अंधविश्वास तथा रूढ़िवादिता को ही कर्म तथा धर्म एवं ज्ञान समझ बैठा है । 
अत: कलयुग में जीव कर्म धर्म एवं ज्ञान के मूल स्वरूप को समझने में असमर्थ है । 
यही वजह है कि जीव आज कर्म धर्म के रूप में जो भी कर रहा है वो निष्फल होता जा रहा है चाहे वो पुजा पाठ हो , जप, तप, व्रत, उपवास तीर्थ, विर्थ, हवन या कोई भी अन्य कर्म कांड क्यों न हो । 

अत: कलयुग में केवल भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ तथा कल्याणकारी है, लेकिन अफसोस कि आज कलयुग में अधिकतर लोग भक्ति के मूल स्वरूप तथा वास्तविक अर्थ को भी नहीं जानते। 

इस कलयुग के परमाचार्य पंचम मौलिक जगद्गुरूत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु ने भक्ति कि जो परिभाषा कि है तथा भक्ति के जिस मार्ग को प्रशस्त किया है जीव केवल उसी को अपना कर अपने जीवन को सफल बना सकता है अन्यथा इस कलयुग में अन्य कोई मार्ग सक्षम नहीं है । अन्य सभी मार्ग भ्रम में डालने वाले हैं तथा मानसिक रोग को और भी बढ़ाने वाले मार्ग है । श्री राधे ।

Sunday, 23 June 2024

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।1. परमात्म केंद्रित ( GOD Centric ) Suprime soul.2. आत्म केन्द्रित ( Soul Centric )3. मन केंद्रित ( Self Centric )4. परिवार केंद्रित ( Family Centric)5. समाज केंद्रित ( Society Centric )6. संप्रदाय केंद्रित ( community centric )7. विश्व केंद्रित। ( Universe centric )

मेरा यह पोस्ट आध्यात्मिक्ता से तटस्थ लेख है जिसमें भौतिक , अभौतिक दोनों का समावेश है  । है तो यह श्री महाराज जी द्वारा दिया दृष्टि के प्रभाव का हीं फल । पर उनके अनुयायियों से एक प्रार्थना है कि इस लेख को केवल एक लेख और बिचार के समझ से पढ़े और देखें। 
और अपना स्वतंत्र बिचार बिना किसी पुर्वाग्रह के रख सकतें बिना भेद भाव‌ राग और द्वेष के  , इसमें किसी से राग और द्वेष की भावना नहीं है । बस एक चिंतन है ।

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।
1. परमात्म केंद्रित ( GOD Centric ) Suprime soul.
2. आत्म  केन्द्रित ( Soul Centric )
3. मन केंद्रित       ( Self Centric )
4. परिवार केंद्रित ( Family Centric)
5. समाज केंद्रित ( Society Centric )
6. संप्रदाय केंद्रित ( community centric )
7. विश्व केंद्रित।    ( Universe centric ) 

१. God centric - इसमें वो महान जीव है जो भगवान को पुर्ण निष्काम भाव से प्रेम करतें हैं । ऐसे जीव पराकाष्ठा का भगवद् प्रेमी होतें हैं । यहां तक की वो भगवान या अपने गुरु से इतना प्यार करतें हैं कि भगवान या गुरू की इच्छा हीं उनकी इच्छा हैं । वो दर्शन दें नहीं दें , बदले में प्यार करें या न करें , कोई अपनी कामना नहीं इनको । आध्यात्मिक कामना भी नहीं , भौतिक की तो बात हीं नहीं । ए पुर्ण निष्काम मनुष्य अति दुर्लभ भगवद् अवस्था का प्रतिरूप होतें हैं । परमात्म प्रेम भाव में लीन भीतर से । दुनियां से या किसी से कोई लेना देना नहीं , विल्कूल स्थित प्रज्ञ । भौतिक शरीर , भौतिक संसार में होते हुए भी निर्विकल्प , ना शरीर का भान न ‌संसार का ना अपने आत्मा का । पुर्णपरमहंसावस्था। अद्वैत अवस्था में हरि स्वरूप होते हैं । और जन हित हेतु द्वैत भाव से अपने भगवद् स्वरूप में स्थित होते हुए विश्व के सभी जीवों के आत्मिक कल्याण हेतु शरीर धारण करतें हैं । 

२. Soul centric - ऐसे मनुष्य आत्म केन्द्रित वाले सकाम भक्त होतें हैं । इनको अपने आत्मा का प्रैक्टिकल अनुभूति , आत्म साक्षात्कार  या आत्मा का ज्ञान हो  गया होता है । आत्माराम होतें हैं पर ए पूर्ण निष्काम नहीं होतें हैं । हां भौतिक बस्तुओं की कामना इनको नहीं होती , ये भौतिक शरीर और संसार को एक साधन समझ कर इसका ख्याल रखतें हैं । अपने संसार का सदुपयोग भर बस ।  ए भगवद्‌प्रेम चाहतें हैं यही लक्ष्य होता है । आत्मा से परमात्मा के प्रेम को महसुस करना , उनको देखने , सुनने , बातें करने , आलिंगन करने , रस रूप का स्वाद और सुगंध की कामना होती है । ये भक्त होतें हैं । अपने ईष्ट व गुरू से अटूट और अनन्य प्रेम करतें हैं । 

३. Mind centric ( self centric ) ऐसे जीव भगवान और गुरू से अपने आध्यात्मिक प्यास के साथ साथ भौतिक प्यास के पूर्ति की भी  कामना रखतें हैं । यानि केवल मैं और मेरा तु । लेकिन पहले मैं तब तु। इनका ध्येय वाक्य है - पहले आत्मा यानि मन तब परमात्मा, ऐसा सोचते हैं   । ए मन को हीं आत्मा समझते हैं ।
भौतिक कामना की पूर्ति में व्यवधान आया तो प्यार खत्म , जिस मात्रा में भौतिक कामना की पूर्ति हुई उतना प्यार छलक गया । प्यार का उतार चढ़ाव अपने संसारिक इच्छा के पूर्ति के हिसाब से । तो ऐसे लोग आध्यात्म से और भौतिक संसार दोनों से तटस्थ होतें हैं लेकिन खुद के लिए केवल । खुद को खुद से प्यार है और भगवान से भी प्यार है पर स्व हित के लिए । पुर्ण स्वार्थी , ए भगवान, महापुरूष ,संसार , संसारिक रिस्तों  का यानि परिवार , दोस्त , मां बाप , भाई बहन  ,‌बेटा वेटी यानि सभी resources का इस्तेमाल खुद के संतुष्टी के लिए करतें हैं । यह खुद का भक्त होतें हैं । 
भगवान का कभी नहीं । हां भ्रम है इनको की हम भगवान का भक्ति करतें हैं , भक्त हैं पर यह सिर्फ भ्रम है ।
इनके लिए मन हीं देवता , मन हीं ईश्वर , इससे बड़ा ना‌ कोई । इनको बहुत अहंकार होता है। जरा सा बात बर्दास्त नहीं अपने मन के खिलाप । 

४. Family centric - परिवार केंद्रित , ऐसे जीवों के लिए खुद के priority के साथ परिवार का भी priority है । तो ऐसे लोग खुद और अपने परिवार तक सिमित होतें हैं । और इसी हित के लिए भगवान को पुजते है ( इनको भी भक्त नहीं कह सकते हैं ) ए पुर्णत: स:स्वार्थी होतें हैं । समाज रहे या नहीं, मैं और मेरा परिवार, जिसमें बहुत अगर है तो मां वाप को भी शामिल कर लिया नहीं तो‌ केवल मैं मेरा पति हैं मेरी पत्नी और मेरा बच्चा है  बस इससे आगे कुछ नहीं । वांकी सब नाते , रिस्तेदार साधन है इनके लिए । जरूरत परे मां बाप को भगवान , भाई को भगवान , बहन को देवी स्वार्थ बस और गद्हा को भी बाप बना लेतें हैं ।  कोई कोई अपवाद स्वरूप मां वाप भाई से , बहन से प्रेम पर १००% निष्काम नहीं और अपने अहंकार का चरम और उसकी तूष्टि से मतलव है । आप सही वोले तो विरोध गलत बोले तो विरोध । इनका आरती उतारिए , ऐ खुश । कल भुल गए आपका विरोध । ऐसे को समझना और संतुष्ट करना असंभव है । कब किस बात पर नाराज़ हो जाए आपको बताऐंगें भी नहीं । बस खफा । 

५. Society centric - ऐ समाज सेवी होतें हैं । मानव‌मात्र , जीव मात्र के लिय दयालु  ,‌ लेकिन  अपने समाज तक केंद्रित होतें हैं । समाज सेवा के बदले यश , सम्मान आदर चाहिए होता है । नाम भी चाहिए होता है । ऐसे लोगों से समाज चलता है । देश सेवी भी इसी में है। 

६. Community centric ( संप्रदाय विशेष केंद्रित ) ऐ लोग कट्टर होतें हैं , अपने संप्रदाय विशेष को मानने वाले और उसके लिए ही काम करने और लड़ने बोलने बाले। ए लोग सभी चीजों का इस्तेमाल अपने संप्रदाय के अहंकार को तुष्ट करने के लिए करतें हैं । चाहे धर्म ग्रंथ हो या भगवान , जय श्री राम हो या जय शंकर या जय हनुमान या अल्लाह हो या अकबर‌ खुदा हो या कुरान  , ईश्वर जीसस हो या खुदा , भौतिक रिसोर्स हो या आध्यात्मिक । पर सब अपने संप्रदाईक अहंकार की पूर्ति के लिए । एक दूसरे को निचा दिखाना और खुद को ऊंचा साबित करने का प्रयास करना ,  यह विशेषता होती है इन लोंगों की । इनको लगता है कि दुनिया में 12 आना अक्ल सिर्फ मेरे पास है और 4 आने में पुरी दुनियां है । 

७. Universe centric ( विश्व केंद्रित ) ऐसे लोग संसार में महान होतें हैं यह जाति पांति , धर्म , संप्रदाय , चर अचर से उपर उठकर सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय कि चिंता और प्रयास करने वाले होतें हैं । "बसुधैव कुटूंबकं"
ऐसे जीव महात्मा भी होतें हैं और समग्र जीवों के भौतिक कल्याण की भावना वाले होतें हैं , इनका मुख्य ध्यये होता है अपने भौतिक आवश्यकता को कम करो और प्रकृति से तटस्थ होकर जियो । जो आजकल बहुत कम है इस भोगवादी युग में । भगवान ऐसे लोगों को अपना माध्यम बना कर जग कल्याण का काम करतें हैं । ए संत की भांति संसार के जीवों के प्रति निष्काम भाव से समर्पित होते हैं , इनको नाम और बदनामी की कोई चिंता नहीं । बस इनमें सेवा का लक्ष्य सर्वोपरि होता है । 

तो पहला तो अति उत्तम पर्सनैलिटी है । दुसरा उत्तमतर है और सातवां उत्तम पर्सनैलिटी है, पांचवां  ठीक हीं है । 
अत: हमको इन चार प्रकार से हीं मतलव रखना चाहिए ।‌ 

( मेरा यह लेख एक भुमिका है आगे के संसारिक लेख के लिए , उस लेख में इनका इस्तेमाल  होगा आगे  ) 
श्री राधे ।

Sunday, 2 June 2024

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय"-कबीर ।आज कल कबीरदास जी के इस दोहे का दुरूप्योग अक्सर तकिया कलाम के जैसे करते हुए बहुत से तथाकथित विद्वान और भोले भाले लोगों को सुन रहें हैं आप सब । जरूरी है इन बातों को समझना पहले श्री महाराज जी द्वारा ।

श्री महाराज जी द्वारा इस दोहे की व्यवहारिक व्याख्या -
"निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय"-कबीर ।

आज कल कबीरदास जी के इस दोहे का दुरूप्योग अक्सर तकिया कलाम के जैसे करते हुए बहुत से तथाकथित विद्वान और भोले भाले लोगों को सुन रहें हैं आप सब । 
जरूरी है इन बातों को समझना पहले श्री महाराज जी द्वारा ।
मैंने श्री महाराज जी से एक पिकनिक के कार्यक्रम के दौरान एक व्यक्ति के इस दोहे के उपयोग संबधी मार्ग दर्शन सुना है । वो आपसे शेयर करता हुं । बहुत जरूरी है ।
श्री महाराज ने समझाएं हैं ( मैं अपने शब्दों में उनका दिशा निर्देश लिख रहा हुं ) कि कौन से निंदक को अपने आंगन में कुटी छवा कर रखने की सिफारिश कबीर दास करतें हैं तो यह उस दोहे में उन्होंने स्वयं लिखा है - कि जो आपको बिना‌ पानी और साबुन का निर्मल बना दे । आपके बिचारों को शुद्ध कर दे । आपको आपकी गलती बतलाकर आपको सही रास्ता दिखाएं और आपके हित का सोंचें , बिना राग द्वेष के आपका भला चाहे ।

अब ए जो आपका निंदक है जिसके लिए आपको उसका कुटी बनबाना है वो कैसा है ? यह समझना जरूरी है पहले आपके लिए ।
हां तो वो निंदक स्वयं शुद्ध होना चाहिए सबसे पहले , यानि जो स्वयं शुद्ध है , निर्मल है । जिसका मन बुद्धि निर्मल है , वहीं तो आपको भी शुद्ध करेगा ।

 जो खुद गंदा है , जिसका अंत:करण मलिन हैं , बुद्धि क्षूद्र है । मन गंदा है वो आपको तो और गंदा हीं करेगा । और ऐसा निंदक निंदक क्या होगा भला , एक क्षूद्र बुद्धि है तमाम बुराई है उसमें । वो क्या किसी को शुद्ध करेगा ? उससे तो दुर हीं रहना श्रेयकर है ।

निर्मल जल में हीं चेहरा साफ नजर आता है । कोई गंदा पानी में जाकर देखें तो चेहरा और गंदा नजर आएगा और आएगा भी नहीं ।
अतः ऐसा जीव जो निर्मल हो चुका हो या निर्मल है मिलेगा नहीं संत को महापुरुष को छोड़कर इस संसार में कलयुग है , सब गंदा है संत और महापुरूषों को छोड़ कर। 
तो कबीरदास ने ऐसे संत और महापुरूषों को जो स्वयं निर्मल है और आपको आपके गलती को सुधारने के लिए आपके सामने रखता है , तो ऐसे निंदक को अपने घर में कुटी छवा कर यानी उसका संग करने के लिए कबीरदास ने कहा है । वो किसी गंदे जीव को मत रख लिजिएगा आंगन में कुटी बनवाकर, वो तो कुसंग का माध्यम बनेगा , खुद गंदा है तो भला आपको तो और गंदा हीं करेगा । 

आजकल लोग बोल देतें ए दोहे दुसरे की निंदा करतें हैं और अपने बचाव के लिए ऐसा ज्ञान दे देतें हैं । इन लोगों से बच करके रहें । श्री राधे ।

Friday, 24 May 2024

प्रश्न :- मन और चेतना क्या अलग अलग वस्तु है या एक हीं है अन्तर क्या है? सुख और दुख कि कारक चेतना है या मन? कृपा करके मेरे संसयकाे दुर करेगें ?

प्रश्न :-   मन और चेतना क्या अलग अलग वस्तु है या एक हीं है अन्तर क्या है? सुख और दुख कि कारक चेतना है या मन? कृपा करके मेरे संसयकाे दुर करेगें ?

मेरा उत्तर :- अंत:करण चातुष्ट मन बुद्धि, चित तथा अहंकार को कहते हैं । संक्षिप्त में :- बिचारो का प्रवाह है मन  और चेतना प्राण वायु या प्राण उर्जा का प्रवाह है । 
संक्षिप्त में बताऊं आपको कि अंतःकरण चातुष्ट्य मन बुद्धि चित्त  और अहंकार को कहते हैं । 
यह हमारे सुक्ष्म शरीर का अंग है ।
मानव शरीर में आत्मा अपने कारण शरीर ( अपनी अतृप्त इच्छा, वासना  और प्रारब्ध ) एवं सुक्ष्म शरीर के साथ प्रवेश करती है । हमारा यही कारण शरीर भगवान द्वारा फल के रूप में निहित प्रारब्ध के कारण तय योनि में स्थूल शरीर के प्रकार को प्राप्त करता है । अगर मानव शरीर मिला तो फिर कुल , गोत्र,  धर्म,  जाति , देश , गांव,  अमीर , गरीब परिवार , गुण प्रकार परिवार (जैसे सात्विक ,राजसिक या तामसिक ) में जन्म होता है । 
जैसे हीं शरीर में आत्मा का प्रवेश होता है वैसे ही शरीर का यह सौफ्ट वेयर जिसको अंत:करण चातुष्ट्य कहते हैं  एक्टीभ हो जाता है । यानि शरीर में दस प्रकार के प्राण 72000 नाड़ियो द्वारा पुरे शरीर को चेतन मान कर देती है।
जिसमें पांच प्रमुख प्रान , यानि 1 प्राण ,2 अपान ,‌3 व्यान , 4 समान, और 5 उदान  , एवं तीन मुख्य नाड़ियां इड़ा , पिंगला , सुषुम्ना नाड़ी है । 
और अंतिम दसवां प्राण धनंजय कहलाता है जो मरने के बाद जब तक देह का फुनरल यानी जलाने के बाद हीं शरीर से निकलता है अग्नी मार्ग द्वारा ।

तो अब विज्ञान से भी साबित है ( सिगमंड फ्रायड का नाम सुना होगा मशहुर साईक्लोजीस्ट  ) 
जिसने भी सिद्ध किया की 
जीव तीन अवस्था में ही जीता है जब तक जीता है तबतक , ये तीन अवस्था है - 
१. जागृत ( जिसको conscious  mind कहते हैं )
 २. अर्ध जागृत ( जिसको subconscious mind ,) 
३. पूर्ण सुसुप्ति ( जिसको unconscious mind ) कहते हैं ।
और 99.9% मानव इड़ा और पिंगला में हीं तमाम उम्र गुजार देते़ है । 

पर संत महापुरुष , असली भक्त , योगी आदि सुषुम्ना में अपने प्राणों के संचार को तीव्र और स्थिर कर लेतें हैं । जिससे वो जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर अपनी इच्छा से इस मृत्यु लोक में आते जाते हैं । उनपर काल का बस नहीं चलता । वे स्वेच्छाचारी होते हैं , सुसुप्ति अवस्था में भी हमेशा जागृत रहते हैं । या यूं कहिए की वे हमेशा हर अवस्था में जागृत रहतें हैं । जिसको जागृत महावस्था कहते हैं सर्वांतर्यामी अवस्था, सर्व दैविय शक्ति और ईश्वरीय गुणों से सम्पन्न । (always awakening ) जैसे हमारे प्रभु श्री कृपालु महाप्रभु जी ।

और हम लोग इड़ा या पिंगला नाड़ी में ही जीते हैं तो जिसका जो नाड़ी अधिक एक्टींभ होगा वो उसी प्रकार के दो प्रकार के गुणों यानि रजोगुण या तमो गुणी स्वाभाव का होगा । उसका प्रसनैलटी , सोच बुद्धि आदि उसी गुणों के सापेक्ष में होती है । जिसका अनुभव सबको है । कि वो किस प्रकार के सोंच व व्यक्तित्व  का जीव है । 

पर जो जीव ( साधक ) महान महापुरूषों के संग में आ जाता है तो धीरे धीरे उनका सुषुम्ना नाड़ी में दिव्य प्राण उर्जा का  प्रवाह अपने आप शुरू होने लगता है  पर यह साधना के स्तर पर निर्भर करता है । चाहे वो भक्ति मार्गी हो या जप तप , योग मार्गी । पर कलयुग में केवल भक्ति मार्ग जल्दी और तुरंत फलदाई है । 

वांकी आज के तथाकथित योग केवल दो नाड़ी यानि इड़ा और पिंगला को ही मैनेज करती है रामदेव बाबा वाला योग  , जिससे कफ पीत वात को ठिक करके जीव रोग  मुक्त हो सकता है । पर भक्ति से सुषुम्ना नाड़ी एक्टिभ हो जाता है , जिसका प्रारंभिक  प्रमाण है तत्वज्ञान , यादास्त आदी काफी मजबुत हो जाना ।  मैं यह आपको अपनी यादाश्त से लिख के ज़बाब दे रहा हुं । और अगर आप फिजाकली सामने होते तो और भी डिटेल्स में आपको बता पता ।

सुषुम्ना नाड़ी में प्राणों की ज्यादा प्रवाह जीव को पहले सतोगुणी बनाता है । फिर भगवद् प्राप्ति के साथ हीं निर्गुण हो जाता है । और जैसे हीं निर्गुण होता है उसी क्षण गुरू द्वारा शरीर दिव्य हो जाता है और फिर कमाल होता है। उस जीव कि चेतना दिव्य होकर उसका प्रवाह भगवान के तरफ होने लगती है , और भगवान को इन्हीं आंखों से देखने लगता है । तो मन तभी एक्टीभ होता है जब शरीर चेतन मान हो , अतः चेतना प्राण उर्जा का प्रवाह है और मन बिचारों के प्रवाह है । दोनों अलग है । पर यह तभी काम करेगा जब शरीर चेतन मान हो , जैसे कार तभी चलेगी जब उसमें पेट्रौल हो ,फिर उस पेट्रोल से अग्नी रूपी प्राण उत्पन्न होकर कार को चलाएमान करता है और मन ड्राईवर है जो उस कार का संचालन और दिशा देता है  । 

और सुख दूख का कारण मन है , यही सुख दुख का अनुभव अपने तीन गुणों के प्रभाव वश करता रहता है । जिस समय जिस गुण में स्थिर या लय रहता है जीव को उसी प्रकार का अनुभव होता है । एक ही परिस्थितियों को अपने इन्हीं गुणों के प्रभाव के वश अलग अलग सुख दुख के मात्रा और प्रकार को फिल करता है जीव ।
  श्री राधे । : -  संजीव कुमार ।

Thursday, 23 May 2024

एक और अवतार इसी बैवस्वत मन्वंतर में होगा , श्री कृपालु महाप्रभु फिर आएगें । जानने के लिए पढ़िय :-

एक और अवतार इसी बैवस्वत मन्वंतर में होगा , श्री कृपालु महाप्रभु फिर आएगें । जानने के लिए पढ़िय :- 
यह सभी जानतें हैं कि श्री कृपालु महाप्रभु जी श्री राधाकृष्ण के अवतार हैं राधाकृष्ण का कृपावतार , सर्वोतकृष्ट अवतार । ऐसा अवतार एक कल्प में सिर्फ एक बार होता है । 
गौरांग महाप्रभु, भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी का हीं युगल अवतार थे । इस‌ श्रीगौरांग अवतार काल में भगवान श्री कृष्ण अपने हीं आत्मा श्री राधा रानी के ह्रदय को धारण करके अपने हीं रस रूप गुण और लीला का पान किय थे । 
जो वो ब्रज में आज से 5,178 बर्ष परकीया भाव के लीलावतार मे खुद न पा सके । 
ब्रज के वृन्दावन में वो लगभग एगारह वर्ष हीं रहे और पुर्व निर्धारित अनुग्रहित जीवों ( गोपियां जो की ऋषि मुनि थी रामावतार काल के जनकपुर , अयोध्या , दणडकारण्य आदि की ) पर प्रेम रस लुटाया , किन्तु खुद अपने प्रेम रस से वंचित रह गए । 

उसी प्रेम रस का ( यानि अपनी आत्मा श्री राधा रानी के अपने प्रति प्रेमरस का आस्वादन हेतु ), पान करने के लिय गौरांग अवतार लेकर आए । 
फिर वो कृपालु कृपावतार में उसी विलक्षण प्रेम रस को अपने पुर्व निर्धारित जनों में वितरित करने हेतु एक और अवतार लिए । इसलिए यह पुर्वनिर्धारित हम सब जीव बहुत गुढ़ रहस्य हैं । जो करोड़ो जीव पांच हजार दो सौ साल पहले उनके ब्रज में भी उनके प्रेम रस से वंचित रह गए थे और कामना की थी प्रार्थना की थी , भक्ति की थी उनके ब्रज से जाने के बाद उनके प्रेम रस को पाने के लिए । उन उन जीवों को वहीं युगल सरकार कृपालु अवतार में अपने उसी प्रेम रस को वितरित किय उन जीवों को जो उस समय तीव्र भक्ति किया था । उन जीवों को अपने भक्ति भावों की तीव्रता और गहराई के अनुसार मिला । इस अवतार में उनके द्वारा गुढ़ दिव्य तत्त्व ज्ञान हमें मिला , मार्ग दर्शन मिल गया और मिल रहा है लगातार । उनके द्वारा अपने इस‌लीला के कुछ प्रेम का झलक भी मिला और मिल रहा है हमें ताकी हम और प्रयास बढ़ा‌ दें अपना , आगे जुड़ने वाले को भी मिलेगा । यह जन्म तैयारी के लिय है हमें अधिकारित्व प्राप्त करने हेतु ।

 अतः भगवान श्रीराधाकृष्ण की श्री गौरांग लीलावतार अपने राधाभावमयी प्रेम रस का स्वपान हेतु हुआ था और वो अपनी मां, "शची माता" को कह कर गय थे कि मेरा दो अवतार और होगा । और दोनों अगले अवतार में तुम हीं मेरी मां बनोगी । 
उन्होने एक अवतार पांच सौ साल बाद लेने का संकेत दिया था । उनका यही अवतार श्री राधाकृष्ण का कृपावतार श्री कृपालु महाप्रभु अवतार है ।
जो अनुग्रहित पुनर्निर्धारित जीवों के कल्याण के लिए सर्वोत्कृष्ट अवतार है । इस अवतार में श्री महाप्रभु ने अपने जिस रस का पान किया था गौरांग अवतार काल में , वही वो अपने पुर्वनिर्धारित जीवों के मध्य वितरित किए और कर रहें हैं आज लीला संवरण के बाद भी अपने प्रचारक जनों के द्वारा ।
अब आगे एक और अवतार होगा इसी बैवस्वत् मन्वंतर में । ( याद रखिए भगवान श्री राधाकृष्ण का प्रत्यक्ष अवतार , गौरांग अवतार और श्री कृपालु महाप्रभु अवतार इसी बैवस्वत मन्वंतर में हुआ था ) 
हां श्रीराधाकृष्ण फिर आऐगें एक बार , अंतिम बार इस बैवस्वत मन्वंतर में फिर कृपालु कृपावतार होगा । 
इसका उदेश्य अपने कृपालु अवतार में जो लोग श्रीकृपालु महाप्रभु को हीं अपना गुरू मान कर उनका भजन कर रहें हैं उसकी तृप्ति के लिए , अपने परम दिव्य रस का पान कराने के लिए आऐगें । इसलिए सिरियस हो जाईए, अवसर चुके ना । यह चुके तो फिर ऐसा अवसर कबहु नहीं मिलेगो । कितनी भी परीक्षा हो इस जीवन में , लगे रहिए । 
उनका अगला अवतार होगा हम प्रेम रस से वंचित रह गए जीवों को प्रेम रस देने के लिए , हमें एक बार फिर मानव देह मिलेगा उनकी कृपा से और माहौल भी मिलेगा और हमारा यह जन्म भी उनकी कृपा से याद हो जाएगा प्रेम रस मिलने के बाद की हम कितना भक्ति कर रहे हैं अभी ।
जो जो लोग उनका भजन कर रहें जिस भाव से उसको उसी प्रकार अधिकारी बना कर वो प्रेम रस देने के लिए एक अंतिम अवतार, इसी कल्प के इसी बैवस्त मंवतर में लेंगें । यह चैतन्य महाप्रभु जी द्वारा उनका आप्त वचन है अपनी शची मां को ।
और श्रीकृपालु महाप्रभु जी ने भी अपने कुछ प्रवचन में हमें स्पष्ट संकेत देते हुए कहें हैं कि " मुझे एक बार फिर नाक के बल आना होगा " , उन्होंने यह भी कहें हैं कि "हमारे अनुयायियों को फिर से मानव देह मिलेगा क्योंकि ए लोग राधे राधे रटते हैं" । श्री राधे । :- मां रासेश्वरी देवी जी और स्वामी श्री युगल शरण जी के प्रवचन के आधार पर ।

" जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः। केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोस्मि तथा करोमि॥' :- दुर्योधन

प्रश्न - कुछ लोग धर्म कर्म तथा तत्वज्ञान जानते हुए भी भगवान कि ओर नहीं चलते और कुछ लोग किसी महापुरुष से थोड़ा सा जानते हीं तुरंत संसार से एवाऊट टर्न लेकर गुरू के शरणागत होकर भगवान के हो जाते हैं , क्या कारण है ? 
उत्तर :- इस बात को समझने के लिए दो सबसे बढ़िया उदाहरण है - एक अर्जुन का और दुसरा दुर्योधन । दोनो महत्त्वपूर्ण है इस बिषय को जानने ,‌ समझने के लिए ।

याद होगा सबको कि भगवान पांडवों के तरफ से शांतिदूत बन कर गए थे हस्तिनापुर में । धृतराष्ट्र के दरवार में दरवारियों कि सभा बैठी हुई थी । 
भगवान श्री कृष्ण दुर्योधन को समझा रहें हैं कि पांच गांव हीं दे दो पांडवों को सिर्फ। भगवान ने बहुत लौजिक दिया कर्म धर्म का भरी सभा में ।
पर दुर्योधन कहता है भगवान् को कि - 

" जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः। 
केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोस्मि तथा करोमि॥' 
यानि मैं जानता हूँ कर्म-धर्म अच्छी तरह से लेकिन मेरी प्रवृत्ति इनमें नहीं है , मेरी रूचि इन बिषयों में नहीं है । और मैं अधर्म भी जानता हूँ अच्छी तरह से , लेकिन मेरी निवृत्ति न हुई इससे , यानि संसार से आसक्ति समाप्त नहीं हुआ । भोग विलास तथा सत्ता से मुझे वैराग्य नहीं हुआ है इसलिए मैं कर्म धर्म को जानते हुए भी इससे विमुख हुं । 

मतलव वो कह रहा है कि " हे कृष्ण मुझे प्रवचन मत दिजिए धर्म क्या है अधर्म किसे कहते हैं यह मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं, पर मैं क्या करूं ? मेरा न धर्म में प्रवृत्ति हो पा रही और ना अधर्म से निवृत्ति हो पा रही है ।‌ क्योंकि मेरी मनोवृत्ति हीं ऐसी है । मतलव मेरी ( व्यक्तित्व )पर्सनैलिटी हीं ऐसी है ।
हे कृष्ण एक हीं गुरू द्रोण और कृपाचार्य कुल गुरू के हम सब शिष्य हैं (यानि कौरव सौ भाई और पांडव पांचों भाई ) । दस हजार हाथियों का बल भीम में हैं तो मुझमें भी दस हजार हाथियों का बल है पर हम दोनों की मनोवृत्ति अलग अलग है । इसलिए प्रवृत्ति भी अलग अलग है। "

अब आप सब यह भी जानते हैं कि अर्जुन क्या पुछा भगवान से, जब गीता का ज्ञान दे रहे थे भगवान कुरूक्षेत्र में । 
अर्जुन पुछ रहा है :- 
चंचलं हि मन:कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।। ( गीता.६.३४)
वो कहतें हैं भगवान से की यह मन हीं तो बश में नहीं है , मन का ही गुलाम हुं मैं , आप कहें तो मैं हवा का रूख को मोड़ दु़ , नदी के धारा को बदल दुं , पर मन को बश में करना बहुत कठीन है । इसलिए हे श्री कृष्ण यह बतलाइए मैं अपने मन को बश में कैसे करूं ? हे जगद्गुरु श्री कृष्ण मैं अपने मन बुद्धि को आपमें कैसे निवेश कर दूं । यानि आपकी शरणागति कैसे करूं ? 
तब भगवान बोलते हैं कि - 
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।(गीता 6.35।।)
(आप सब भावार्थ जानते हैं इसका । लिखने की जरूरत नहीं है ।)
 अर्जुन को तत्वज्ञान में रूचि है , वो तत्वज्ञान अपने सखा श्री कृष्ण से नहीं वल्कि उनको गुरू मान कर समझने में रूचि दिखाई और इस प्रकार गीता का प्रकटीकरण हुआ जगद्गुरु श्री कृष्ण के मुख से । 

अर्जुन जानता था यह बात कि ज्ञान तो भगवद स्वरूप गुरू से हीं मिल सकता है भगवान से डायरेक्ट नहीं , इसलिए बड़े बुद्धिमत्ता से उसने श्री कृष्ण को गुरू मान कर , तथा बोल कर संबोधित किया । 
अब गुरू को अपने शिष्य के अज्ञान को मिटाना हीं होगा । इसलिए भगवान सत्तरह अध्याय तक अर्जुन के प्रश्नों तथा परिप्रश्नों का जबाब देते रहे । यह संबाद हीं गीता है । 
अंत में अर्जून शरेंडर कर देता है खुद को ( हालाकी अर्जुन पहले से हीं महापुरुष हैं, हम जीवों के शिक्षा के लिए वो यह सब कर रहा हैं , पांडव शरेंडर तो पहले से हीं है भगवान के प्रति । इसलिए तो अर्जुन भगवान‌ से सेना ना मांगकर भगवान को ही मांग लिया था । )

तो दोनों में अंतर है । अर्जुन को प्रपत्ति यानि शरणागत है ।
प्रपत्ति मूला भक्त हैं अर्जुन यानि शरणागत भक्त है वो , इसलिए उसका मनोवृत्ति बदल गया है , मनोवृत्ति बदल गया तो उसकी प्रवृत्ति यानि आचरण धर्मानुकूल हो गया है। इसलिए उसका व्यक्तित्व बदल गया है , इसलिए आज भी अर्जुन के प्रति लोगों का आकर्षण है, आदर है , अर्जुन का व्यक्तित्व आकर्षित करता है सज्जन को । 
पर दुर्योधन का वृत्ति नहीं बदला ,, वो प्रपत्त नहीं है। किसी का भी नहीं , भगवान‌ को तो छोड़िए यहां तक कि ना भीष्म का , न तत्वज्ञानि ताऊ श्री विदुर जी का और न अपने गुरू का ।

 क्योंकि वो माया के दुर्गुण रूपी शकुनी से प्रभावित हैं इसलिए उसकी निवृत्ति अधर्म से नहीं हुआ अंत तक । जैसी संगती वैसी मनोवृत्ति, जैसी मनोवृत्ति वैसी प्रवृत्ति , जैसी प्रवृत्ति वैसी वृत्ति , जैसी वृत्ति वैसा संकल्प , जैसा संकल्प वैसा दृष्यमाण कर्म - यह सिद्धांत है वेद का ।
अत: उसकी मनोवृत्ति अशुद्ध है इसलिए वो उपहास का पात्र है आज भी । और यही कारण था कि अग्नी पुत्री यानि यज्ञशैनी द्रोपदी उस पर व्यंग करते हुए कहा की अंधे का पुत्र अंधा , क्योकि एक स्वाभाविक विकर्षण था उसके प्रसनैल्टी में । मजाक का पात्र बना लिया था खुद को दुर्योधन । अत: गलत लोगो से दुर रहना श्रेयकर है । 

यही कारण है कि तत्वज्ञान केवल जानने से , या समझने से या सुनने से कुछ नहीं होगा । हम संगति किसका कर रहे हैं ? यह महत्वपूर्ण है । जिसकी जैसी संगति उसकी वैसी प्रवृत्ति अपने आप हो जाती है । जिसकी जैसी प्रवृत्ति वैसा आचरण हो जाता है । 
इसलिए हमारे गुरूवर ने कहा है , आदेश दिया है हमें कि सत्संग भले न मिले , या कम मिले लेकिन कुसंगी से दुर रहो । संगति अच्छे लोगों का करो, अच्छे साधकों का करो । 
तब व्यक्तित्व बदलेगा , व्यक्तित्व बदलेगा तो संकल्प भक्ति अनुकूल होगा । संकल्प भक्ति अनुकूल होगा तो वृत्ति शुद्ध होगी । अंत:करण शुद्ध होगा । अंत:करण शुद्ध होगा तो गुरू उसमें दिव्य शक्ति देगा । जब दिव्य शक्ति मिलेगा तो लक्ष्य मिल जाएगा । 

तो यही कारण है कि कलयुग में अधिकतर लोगों कि रूचि हीं नहीं है तत्वज्ञान में । गलत संगति के कारण प्रसनैल्टी डिजऔर्डर का शिकार है अधिकतर लोग आज और कष्ट पाने के बाद भी समझ नहीं । अच्छी बातें न पढ़ना चाहते हैं और न सुनना । केवल मादक बिषयों को सुनने में और उसमें लिप्त रहने में ही रूचि है अधिकतर की । 

 अब बात करते हैं कि यह व्यक्तित्व बनता बिगड़ता कैसे हैं । तो यह अंत:करण चातुष्ट्य के विज्ञान का कमाल है ।
आप सब जानते हैं कि यह अंत:करण चातुष्ट्य क्या हैं ?
मन , बुद्धि , चित् और अहंकार को अंत:करण चातुष्ट कहते हैं । तो ऐ मन क्या है बुद्धि क्या है ,‌ चित् किसे कहतें हैं , अहंकार क्या हैं ? यह कहां रहता है शरीर में कैसे काम करता है यह ? कैसे यह संस्कार को शुद्ध करता है !
फिर यह मशीन‌ कैसे हमारा उद्धार करता है और बर्बाद भी ? 
कैसे यह शुद्ध होता है कैसे और कैसे अशुद्ध हो जाता है ?
तो यह एक विज्ञान है इस पर चर्चा अगले पोस्ट में होगी । 
:- पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन का जीस्ट ( सार )