चाँद कही बादलों के झुरमुठ में छुप गया हैं |
चाँदनी बहुत ही व्याकुल हो चली हैं |
कोई तो धीर बंधा दो और बता दो मुझे
मेरा कृष्ण न जाने कहां छुप गया है |
गोपियाँ विह्वल है | वेचैन है |
लतायें भी रो रही है |
कैसे कोई जिय भला उनके विना
प्राण भी गले में अटकी पड़ी हैं |
धड़कने भी निस्तेज हो चली है |
समग्र चेतना शुन्य सा हो चला है |
अब तो आ जाओ पिया |
कि सांसो की डोर टुटने लगी है |
चाँदनी बहुत ही व्याकुल हो चली हैं |
कोई तो धीर बंधा दो और बता दो मुझे
मेरा कृष्ण न जाने कहां छुप गया है |
गोपियाँ विह्वल है | वेचैन है |
लतायें भी रो रही है |
कैसे कोई जिय भला उनके विना
प्राण भी गले में अटकी पड़ी हैं |
धड़कने भी निस्तेज हो चली है |
समग्र चेतना शुन्य सा हो चला है |
अब तो आ जाओ पिया |
कि सांसो की डोर टुटने लगी है |
गोपी भाव - मेरी अभी की रचना में :- संजीव

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