Tuesday, 28 November 2023

प्रश्न :- भाग्यवादि कहते हैं कि कुछ भी करने कि आवश्यकता नहीं है भाग्य में लिखा है वो मिल हीं जाएगा बैठे बैठे , चाहे कर्म करो या ना करो , चाहे वो भौतिक हो या आध्यात्मिक धन । कर्मवादी कहते हैं कि भाग्य-वाग्य कुछ नहीं होता , कर्म करो जो चाहो मिल जाएगा । दोनों में से कौन सही है ?

प्रश्न :- भाग्यवादि कहते हैं कि कुछ भी करने कि आवश्यकता नहीं है भाग्य में लिखा है वो मिल हीं जाएगा बैठे बैठे , चाहे कर्म करो या ना करो , चाहे वो भौतिक हो या आध्यात्मिक धन । कर्मवादी कहते हैं कि भाग्य-वाग्य कुछ नहीं होता , कर्म करो जो चाहो मिल जाएगा । दोनों में से कौन सही है ? 

उत्तर - दोनों में से कोई सही नहीं है , दोनों गलत है । 
क्योंकि भाग्य में जो लिखा है , प्रारब्ध में जो लिखा है वो भी क्रियामाण कर्म करने से हीं मिलेगा, पुरूषार्थ तो करना ही होगा हर हाल में । और अगर प्रारब्ध में नहीं लिखा तो कर्म करने के बाद भी असफलता हीं हाथ लगती है । 
इसलिए दोनों आवश्यक है । भाग्य भी और कर्म भी । 

मान लिजिए आपका पहले का कमाया हुआ आपके बैंक एकाउंट में परा हुआ है । अब जब तक आप उस धन को निकालने के लिए जाएंगे नहीं तो बैठे बैठे तो नहीं मिलेगा । चेक भरना होगा या औन लाइन ट्रांजेक्शन करना हीं होगा या ए टी एम जाना हीं होगा । 

और जिसके प्रारब्ध में कुछ है हीं नहीं बैंक एकाउंट खाली है तो ए टी एम जाएगा भी कार्ड स्वीप करने का कर्म करेगा भी क्या मिलेगा उसको ? ए टी एम के स्क्रीन पर ऐसा इमोजी फेस दिखाई देगा ☹️☹️☹️ और क्या ? 

हमलोग रात दिन देखते हैं एक अति मेहनती छात्र कल्क्टर नहीं बन पाता और एक साधारण आ ई एस हो जाता है एक हीं अटैंप्ट में । 
तीसरा दो बार में सफल होता है । चौथा चौथे बार में सफल होता है । पांचवां अनेकों बार प्रयास करता है वो क्लर्क भी नहीं बन पाता क्लक्ट्रियट में । एक कम पढ़ा लिखा है साहब बन जाता है और दुसरा अधिक पढ़ा लिखा है वो उसका चपरासी है । 

तो कर्म तो सभी ने किया । किसी को अधिक संघर्ष करना परा किसी को विल्कूल नहीं , किसी को लाख कर्म करने के बाद भी कोई सफलता नहीं मिलती । 

तो मनुष्य एक कर्म प्रधान योनि है पर भोग प्रधान तो है हीं । कर्म करने में मनुष्य स्वतंत्र है पर फल कि स्वतंत्रता नहीं है । फल तो भाग्य तथा क्रिमामाण कर्म दोनों के आधार पर भगवान देते हैं । अब कर्म के बाद फल के रूप में सफलता मिले या असफलता उसे स्वीकार करना हीं होता है मनुष्य को , सफलता और असफलता रूपी फल को भोगना ही पड़ता है जीव को क्योंकि जीव कर्म करने में स्वतंत्र है फल भोगने में नहीं । फल तो हर हाल में भोगना ही पड़ता है सभी को । चाहे खुशी से भोगे या दुखी होकर भोगें , भोगना हीं पड़ता है सभी को । 

अब भाग्य रूपी एकाऊंट खाली है तो लाख कर्म करने पर भी कुछ नहीं मिलता मनुष्य को, असफलता के सीवा । या भाग्य में है लेकिन कर्म करेगा ही नहीं जीव तो फिर कैसे मिलेगा उसे । भाग्य भी टल जाता है आगे के लिए , कैरी एंड फारवर्ड । 
आध्यात्म में भी दिव्य बस्तु की प्राप्ति में सफलता के लिए साधना , सेवा , शरणागति ठीक ठीक करना हीं पड़ेगा जीव को, नहीं तो कृपा नहीं होती है भगवान कि , गुरू की । बिना पुरूषार्थ का किसी को कुछ नहीं मिलता । 

इस प्रकार भाग्य में हो ठीक ठीक संचित कर्म से और कर्म भी हो ठीक ठीक तो उसको मिल जाता है सफलता और जिसका दोनों में से कोई भी एक गड़बड़ है तो उसे कभी नहीं मिलता । रात दिन देखते हैं हम लोग स्वयं के जीवन में । :- पुज्यनियां मां के उत्तर से । 
श्री राधे ।

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