साधु में भी हैं और दुष्ट में भी, लेकिन फिर भी गुण का फर्क है, अत: गुरू युक्त बुद्धि यानि गुरू प्रदत्त ज्ञान , विवेक से बिना किसी के साथ दुर्भावना किए गुणात्मक अंतर पहचान करके सांप और साधु में फर्क करके साधु का हीं संग करना कल्याणकारी है ।
अगर जहर और अमृत में फर्क नहीं समझेंगे तो जहर से दुर और अमृत को ग्रहण कैसे करेंगे हमलोग ??? फर्क तो करना पड़ेगा । अच्छे बुरे जीव का पहचान करना पड़ेगा, पर गुरू प्रदत बुद्धि से , अपनी नजरिया से कदापी नहीं ।
और विवेक के लिए श्रोत्रिए एवं ब्रह्मनिष्ट महापुरुषों का संग करना पड़ेगा और तभी उनकी कृपा से विवेक प्राप्त कर पाएंगे । और हां संग भी मन से हीं करना होगा । शरीर से हो या ना हो कोई बात नहीं ।
क्योंकि :-
बिनु सत्संग विवेक न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।।
दुष्ट को , दुर्जन को , राक्षसों को , आसुरी वृत्ति बाले जीव को गलत समझने में , पहचान करके अलग रहने में , दुष्ट को दुष्ट कहने में , गलत को गलत कहने में कोई पाप नहीं । पाप तो तब होता है जब हम उससे मन के भीतर से दुर्भावना रखें और फिर गलत कहें गलत जीव को ।
तो श्री महाराज जी के तत्वज्ञान को हमें ठीक से समझना होगा , ग्रहण करना होगा । उत्तम जीव और निम्न कोटी के जीव में फर्क समझना , गलत का पहचान करना और उससे दुर रहना गलत नहीं है । वल्कि गलत जीव से भी किसी प्रकार का दुर्भावना करना , उसके प्रति राग और द्वेष मन में रखना गलत है ।
अगर यह बात हर हमेशा ध्यान में रहे कि श्री महाराज जी कि पुरी फिलौसफी मन पर केंद्रित है । किसी भी जीव के शारीरिक व्यवहार , बाहरी व्यवहार , एक्टींग से उनके फिलौसफी का कोई मतलव नहीं । हरि गुरू मन में उठे संकल्पों को हीं केवल नोट करते हैं और उसी के अनुरूप फल मिलता है जीव को ।
अर्जुन ने , हनुमान जी ने , बड़े बड़े ऋषि मुनियो ने अनेकों मर्डर किए हैं , दुष्टों पर , असुरों पर , गलत जीवों पर क्रोध किए हैं पर बिना किसी दुर्भावना के । इसि प्रकार हमें भी बिना किसी दुर्भावना के गलत का त्याग , या उससे उदासीन और फिर भी वो न माने तो उस पर भीतर से मन से बिना दुर्भावना किए क्रोध करने में कोई पाप नहीं है । किसी के भलाई के लिए उस पर क्रोध करना ग़लत नहीं है बशर्ते कि यह लिमिट में हो तथा स्वार्थमूक्त हो । बच्चे के भलाई के लिए उसे डांटना गलत नहीं है ।
जो व्यक्ति श्री महाराज जी के फिलौसफी को केवल किसी के शारीरिक आचरण , बाहरी व्यवहार तक सिमित समझते हैं वो श्री महाराज जी के फिलौसफी को कभी समझ हि नहीं पाएंगे और न कभी कोई लाभ लें पाएंगे ।
श्री महाराज जी का पुरा फिलौसफी मन को शुद्ध करने और तथा मन के द्वारा चिंतन, संकल्पों पर हीं आधारित है ।
श्री महाराज जी गीता के श्लोक को कोट करके बार बार हमें समझाया है :-
मनएव मनुष्यानाम् कारणम् बंध्य मौक्षयो ।। ( ब्रह्म बिंदु उपनिषद)
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुष्मर युद्ध च :- गीता ।
भगवान कहते हैं अपनी मन बुद्धि को मुझे समर्पित करके युद्ध करो, शरीर को नहीं ।
आज गीता अधिक प्रासंगिक है हमारे लिए ।
आज हम युद्ध किससे करें तो अपने दुर्गुणों से (अपने ही मन के गलत प्रवृतियों जैसे - काम क्रोध मद् मोह लोभ , ईर्ष्या राग द्वेष आदि से ) हथियार क्या है? तो सत्संग? । भगवन नाम है ? रुपध्यान सहित उनका गुणगान है ? स्मरण , भजन , किर्तन है , गलत संगती का त्याग और उत्तम का हमेशा संग , भगवद् जनों का संग शरीर के साथ साथ मन से करना है । केवल शरीर से दुर रहें पर मन में गलत लोगो का चिंतन हो यह बड़ा घातक है ।
अत: जबतक श्री महाराज जी के फालौसफी हम ठीक से मन से ग्रहण नहीं करेंगे , अनंत जन्म बीत जाएगा साधना करते कोई लाभ नहीं होगा हमें ।
श्री राधे ।
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