Friday, 18 October 2024

संसार में भौतिक सम्पन्नता के बावजूद लोग इतना दुखी क्यों हैं , और हमारा उद्धार कैसे होगा ? मन को कब शांति मिलेगी ? हमारा कल्याण कैसे होगा ?

एक साधक का प्रश्न :- संसार में भौतिक सम्पन्नता के बावजूद लोग इतना दुखी क्यों हैं , और हमारा उद्धार कैसे होगा ? मन को कब शांति मिलेगी ? हमारा कल्याण कैसे होगा ? 
मां का उत्तर :- बड़ा अच्छा प्रश्न है तुम्हारा , श्री महाराज जी ने कई बार इस पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि यही बात एक बार शौनकादिक ऋषियों के द्वारा सुत जी से पुछा गया की कलयुग में लोगों का कल्याण कैसे होगा ? 
सुत जी ने कहा कि कलयुग में लोगों की यादास्त बहुत कमजोर होगी , लोगों को भुलने की बीमारी होगी , प्रारब्ध बहुत कमजोर होगा , लोग शारीरिक रुप से बहुत कमजोर होंगें , मानसिक शक्ति क्षीण होती जाएगी , लोग पाप और पूण्य में , धर्म अधर्म में फर्क नही समझ पाऐंगें , अच्छे बुरे के ज्ञान का आभाव होगा , लोग तर्क , कुतर्क , वितर्क में समय गवाऐंगें , 
झूठ बोलने , पापादी कर्मों तथा चिंतन में लिप्त रहने के कारण जीव के पुण्य बल तथा आयु क्षीण होती जाऐगी | कुसंगादि के कारण अपना नुकसान ही नुकसान करेंगें | काम-क्रोध, अहंकार, विनाश का प्रमुख कारण होगा | लोगों की रूचि भगवान का प्रेम प्राप्त करने में नहीं होगा । कामनाओ के पूर्ति मात्र के लिए लोग तीरथ 
-विरथ मंदीर मस्जिद गुरुद्वारे में जाएंगे । लोग भगवान के भक्ति का प्रदर्शन मात्र करेंगे । भगवान से निष्काम प्रेम के जगह लोग भक्ति, दान, धर्म का प्रदर्शन अधिक करेंगे । धन वैभव का अहंकार जीवों के उपर हावी रहेगा । धर्म के आड़ में लोग व्यभिचार तथा पाखंड में लिप्त रहेंगे । व्यभिचारी पूजित होंगे, तथा वास्तविक संतों के प्रति कम लोग ही आस्थावान होंगे । 
अत: भगवान से सच्चे तथा निस्वार्थ प्रेम के आभाव में लोग भौतिक सपन्नताओं के बाबजूद दुखी रहेंगे । जीवो का मन अशांत रहेगा । जीव रोगादि से ग्रस्त रहेंगे । चरित्र और सुसंकार का आभाव होगा । घोर कामनाओं तथा वासनात्मक भोगेच्छा के वशिभूत जीवो का नैतिक पतन होगा । 
केवल भगवान की निष्काम भक्ति करके उनका प्रेम प्राप्त करने के बाद ही लोग आनंदमय तथा सुखी होंगे । 

श्री महाराज जी ने समझाया है कि "जीव समझ नही पाते है कि वो जो कष्ट भोग रहे है वो उसके ही अनन्त जन्मो पल्स वर्तमान जन्मों के बुरे कर्मो का फल है | "

लोग देवी देवता का चक्कर काटते हैं , मंदिरो में जाकर तमाम मनता मनौती मनाते है , जादु मंतर के चक्कर में पड़ते है | नकली बाबाओं के चक्कर में पड़कर अपना तमाम तरह का नुकसान पँहुचाते हैं | 
समय आने पर दो चार का खड़ाब प्रारब्ध कट जाने पर कष्ट कम हो जाने पर , रोग ठीक हो जाता है तो लोग उसके द्वारा ढोल पिटवाते है कि अमुख बाबा बड़े सिद्ध हैं फिर कुछ लोग और इस चक्कर में पड़कर अपना और नुकसान कर बैठते हैं | 

वो समझते है देवी देवता खुश हो गये और हम ठीक हो गए | अरे क्या खाक ठीक हो गए , जिसको भगवान ने उसके प्रारब्ध का फल दिया उसे कौन ठीक कर सकता है , वो तो भोगने बाद ही ठीक होगा | देवी देवता में ऐसी हिम्मत कहां जो विधाता के दिये हुऐ फल को काट सके | ये देवी देवता के अवलम्ब , आधार तो खुद श्रीकृष्ण है | इनकी ऐसी हिम्मत कहां जो वो अपने अबलंब के खिलाफ जाऐं ?

अरे ये देवी देवता भी तभी खुश होते है जब वे देखते है कि ये हमारे इष्ट को ही भज रहा है उन्हीं की भक्ति कर रहा है | ये उनका हीं हो गया | ध्यान दो - श्री कृष्ण का हीं हो गया है , श्री कृष्ण का भी नहीं | 

अत: देखते हो संसार में तमाम तरह के नए नए रोग बढ़ रहें हैं कीड़े मकोड़े की संख्या बढ़ रही है , लोग काल का ग्रास बन रहें हैं फिर भी नही चेतते , क्योंकि बुद्धि भ्रष्ट हो चूकि हैं | शास्त्रों , पुराणों को अपने अपने तरीके से अर्थ निकाल कर अनर्थ के तरफ बढ रहे हैं | पाप में लिप्त है , धन का दुरुपयोग बढ रहा है | 

अत: इन चीजों को समझों , कुसंग मत करो , हरिगुरु के शरण में जाओ , बार बार सिद्धान्तो को पढ़ो , हरिगुरु का हीं संग करो , गुरुधाम जाओ , हरिगुरु के बुद्धि से अपनी बुद्धि को जोड़ दो , हरिगुरु के बताऐ मार्ग पर चलों , रुपध्यान करो , हरिगुरु निर्दिष्ट साधना करो , साढ़े छ अरब मनुष्यों मे हम सब बड़भागी हैं कि कृपालु जैसा गुरु मिला , जो स्वयं परम तत्व हैं उनका दामन कभी मत छोड़ों । 
मन को वास्तविक शांति सुख और आनंद श्री राधाकृष्ण प्रेम पाने के बाद ही मिलेगी , तर्क , कुतर्क मत करो , अपनी तुक्ष बुद्धि मत लगाओ , ज्यादा से ज्यादा उनके पुस्तकों को पढो , बार बार पढो , उनकी पुस्तके मामुली पुस्तकें मत समझो , यह उनके द्वारा रचित महानतम ग्रन्थ है | 
:- पूज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।

Saturday, 12 October 2024

सन्यासियों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी के लिए संक्षिप्त लेख ।सन्यासियों के प्रकार :- नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार कूल छः प्रकार के सन्यासी होते हैं जो निम्नलिखित हैं ।


 सन्यासियों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी के लिए संक्षिप्त लेख ।
सन्यासियों के प्रकार :- 
नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार कूल छः प्रकार के सन्यासी होते हैं जो निम्नलिखित हैं - 
😇✍🏻
साधारण सन्यासी कुटिचक होते हैं जो मंत्रादि की साधना भी करते है लेकिन मन भगवान में ही स्थित यानि ध्यान मग्न होतें है यानि अधिकतर समय साधना में लगाते हैं । ये शिखा और यज्ञोपवीत ( सूत्र) भी धारण करतें है त्रिदण्ड, कमण्डलु , कौपीन ( लंगोटी ) और कन्था ( कथरी ) धारण करतें है । झोली और पात्र भी रखतें है। ये मिट्टी खोदने वाला खनती भी अपने पास रखते हैं। ये पराविज्ञानी नहीं होते अर्थात अपरोक्ष ज्ञाननिष्ठ नहीं होते। ये  श्वेत ऊर्ध्व पुण्ड्र लगाते हैं। 
ये गुरु के अलावा  माता पिता की भी सेवा कर सकते हैं। 
😇✍🏻
बहुदक सन्यासी - जनेऊ, चोटी( शिखा ), दण्ड कमण्डलु लंगोटी, और कथरी के अलावा त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं।ये उत्तम  सज्जन लोगों से ही आठ ग्रास भोजन ग्रहण करते हैं । एक ग्रास उतना ही होता है जो शान्ति से मुख में रखकर चबा सकें न कि बड़ा कौर। ये अपने मन को भगवान में ध्यानस्थ कर कठिन साधना करते हैं 
😇✍🏻
हंस :- ये जब चाहे मानसिक स्तर पर भगवान के ध्यान में चले जाएं और पूर्ण जागृत अवस्था में भी भगवान में मन को स्थित रख कर संसार में कर्मयोग करते हैं , ये भिक्षु किसी गांव में एक रात , नगर में पाँच रात और तीर्थ क्षेत्र में अधिक से अधिक  सात रात निवास कर सकते हैं वे अपने आपमें ही मगन रहते हैं और स्वागत सत्कार से दूर रहते हैं। ये जटा जूट धारण करते हैं। ये एक जगह अड़के नहीं बैठते इनको भोजन या आश्रम की सुविधाओं से कोई संबंध नहीं होता।   नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार ये मधुकरी ( भिक्षा) से ही शरीर का पोषण करते हैं।
ये तीनों यानि कुटिचक , बहुदक तथा हंस क्रमशः घासफूस के आश्रम वाले होते हैं प्रायः गृहस्थ जीवन काटकर फिर वानप्रस्थ स्वीकार  करते हैं तदोपरान्त ही अपनी अवस्था के अनुसार कुटिचक या बहुदक अथवा हंस हो पाते हैं। 
😇✍🏻
परम हंस :- ये हर क्षण मानसिक स्तर पर भगवान के ध्यान में स्थित होते हैं और शारिरिक और से    शिखा और यज्ञोपवीत धारण नहीं करते ये मात्र 5 घरों से अन्न पाकर एक ही बार पाते हैं दूसरे समय नहीं पाते। ये बांस का दण्ड पास में रखते हैं। ये सम्पूर्ण अंगों में भस्म धारण करते हैं यही इनका वस्त्र है पर ये दिगम्बर हो भी सकते हैं नहीं भी तो एक लंगोटी और एक चादर अपने शरीर पर ओढ़ कर भी रख सकते हैं। परम हंस नामक संन्यासी वृक्ष के मूल अथवा श्मशान में रहते हैं। यज्ञशाला, नदीतट, गड्ढा, झोंपड़ी में भी रह सकते हैं। 
इनको लाभ या अलाभ से कोई संबंध नहीं होता। इनको कोई स्वर्ण भी दे तो उसे मिट्टी या नाशवान समझकर स्वीकार नहीं करते । इनको शुद्ध द्वैत या अशुद्ध द्वैत से कोई भी मतलब नहीं होता ये पूर्णतः आत्माराम होते हैं ये ब्रह्म से अभिन्न होते हैं किसी भी नियम या कर्मकांड आदि से इनको कुछ भी संबध नहीं होता ये सदा ब्रह्मानंद से युक्त होते हैं। ये चाहे चाण्डाल के घर प्राण त्याग करें या काशी या मथुरा में ये मुक्त ही होने से परम निर्वाण को ही पाते हैं।
जड़भरत , श्वेतकेतु व शुकदेव लीलावश परमहंस हैं।और ये सभी वर्णों से भिक्षा ले सकते हैं इनको ब्रह्म के सिवाय कुछ नहीं दिखता स्वयं भी सर्वमय भी। मात्र देह के लिए ही ये किसी से भी भिक्षा ले सकते हैं।
😇✍🏻
तुरीयातीत सन्यासी - यह कभी किसी से कुछ भी नहीं मांगते। यदि स्वेच्छापूर्वक कोई दे दे तो ग्रहण कर सकतें है अथवा  ये देह के लिए मात्र तीन घरों से अन्नाहार मांग भी सकते हैं पर धन , वस्त्र और वस्तु नहीं मांगते।  यह नग्न होते हैं। और हर क्षण भीतर से , मानसिक स्तर पर साधना में निमग्न रहते हैं । 
😇✍🏻
अवधूत सन्यासी - ये अजगर वृत्ति से जीवित रहते हैं ये बंधन को मिथ्या मानते हैं इनके अनुसार तुमको किसी ने बंधन में नहीं डाला तुम तो मुक्त ही हो अपने अज्ञान के कारण ही तुम मुक्ति चाहते हो वास्तव में जो मुक्त है उसे किस प्रकार की मुक्ति चाहिए बस अज्ञान का नाश कर ले यही मुक्ति है। ये मंत्र और उपासना से रहित सोऽहम् भाव में ( इससे भी अतीत) स्थित होते हैं । :- नारद परिव्राजक उपनिषद । ( संजीव कुमार )

Thursday, 10 October 2024

श्री कृपालुजी महारप्रभु के अनुयायी भगवान श्री राधाकृष्ण के अनन्य भक्त ।

पुर्व जन्मों का पुण्य पुंज तथा उस पर भगवद् कृपा से जबतक किसी भी जीव के कुसंस्कारों का नाश नहीं होगा तथा उनके चित्त में सर्वश्रेष्ठ संस्कारों का उदय नहीं होगा तबतक वो जीव श्रीमद्पदव्याक्य, प्रमाणपारावरीण, वेदमार्ग-प्रतिष्ठापन, निखिलदर्शन समन्वयाचार्य, सनातन वैदिक धर्म प्रतिष्ठापन सत्संप्रदाय परमाचार्य, भक्तियोग रसावतार, भगवदनन्त श्री विभूषित पंचम मूल जगद्गुरूतमई १००८ स्वामी श्री कृपालु जी महाराज द्वारा दिए गए वैदिक दर्शन, तत्वज्ञान , विशुद्ध एवं श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्तिरस एवं भक्ति सिद्धांतों में रूचि नहीं रख सकता, चाहे वो आज कलयुग में किसी भी धर्म , किसी भी संप्रदाय , किसी भी मत , किसी भी मार्ग के बड़े से बड़े धर्मपीठ पर बैठे बड़े बड़े धर्माधिकारियों , कर्मकांडी पंडितों तथा दुनियां में महान कहलाने वाला जीव या ज्ञानी ध्यानी विज्ञानी आदि ही क्यों न हो । इन बड़े बड़े पंडितो तथा ज्ञानियो से वो चंडाल श्रेष्ठ तथा बंदनिए है जो श्री राधाकृष्ण की अनन्य तथा निष्काम भक्ति करते हैं , उनमें रूचि रखते हैं, उनसे प्रेम करते हैं । 

परम दिव्य तत्व , अवतारी महापुरूषों में सर्वश्रेष्ठ श्री कृपालु जी महाप्रभु द्वारा श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्ति में रूचि इस युग में केवल उन्हीं सौभाग्यशाली जीवों को है जो अपने पुर्व जन्मों में परम तत्व श्री राधाकृष्ण की भक्ति की है तथा भगवान श्री कृष्ण के परमगुप्त,अद्वितीय,अनुपम , अलौकिक अति दुर्लभ प्रेम रस को प्राप्त करने के लिए लालायित हुए थे और हैं । 

श्री राधाकृष्ण के अनुपम , अपरिमेय , अद्भुत, अतुलनीय, अलौकिक, दुर्लभ भक्तिरस के प्रति आकर्षित जीव ही केवल श्री कृपालु जी महाप्रभु को अपना गुरू मानते हैं और आने वाले समय में मानेंगे भी तथा उनके प्रति अनन्य, दृढ़ श्रद्धावान, आस्थावान तथा संकल्पित है तथा होंगे । 

श्री कृपालु जी महाप्रभु जैसे महानतम अवतारी संत के प्रति जिज्ञासु, पिपासु श्रद्धावान, निष्ठावान, अनन्य तथा समर्पित जीवों के सौभाग्य की सराहना करना स्वर्ग के देवी देवताओं तथा सरस्वती एवं बृहस्पति के लिए भी कठीन है ।

अति धन्य हैं वो जीव जो श्री महाराज जी का अनन्य अनुगामी होकर श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्ति करते हैं । 

 मैं संजीव कुमार एक क्षूद्र सा अधम एवं पतित जीव , हमारे गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज के सभी अनुयायियों एवं निष्काम सेवकों के श्री चरणों में मन ही मन नित्य प्रति अपना मस्तक नवाकर स्वयं को धन्य समझता हूं । जय जय श्री राधे , जय जय श्री कृपालु महाप्रभु की जय जय जय, जय जय श्री महाराज जी के साधक समुदाय की जय ।। :- संजीव कुमार ।

Wednesday, 21 August 2024

आज कल अधिक पुजा पाठ के बाबजूद पापाचार बढ़ रहा है उसका कारण क्या है ?

आजकल हमारे देश में अधिकांश संख्या में लोग जप तप व्रत पूजा पाठ, उपवास तीर्थ-विर्थ हवन यज्ञ रूद्राभिषेक सत्यनारायण की पुजा , दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा , गणेश पूजा , लक्ष्मी पूजा , काली पूजा , सुंदरकांड की पाठ, आदि तमाम तरह के कर्मकांड करने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही है , बड़े बड़े मंदिरों में रात रात भर भजन कीर्तन, जागरण, दान आदि करते पाए जाते हैं । 

आजकल तो इतने प्रवचन करने वाले बाबा लोगों की भरमार हो चुकी है हमारे देश में जितना की आम लोगों की जनसंख्या भी नहीं थी सतयूग तथा त्रेता आदि में हमारे देश भारत में । आजकल इतना अधिक लोग ये सब कर्मकांड करते पाये जाते हैं जितना की सतयुग, त्रेता तथा द्वापर आदि का लोग भी नहीं किया होगा कभी । और करेंगे कैसे द्वापर में आज के तुलना में जनसंख्या ही कितनी थी ? आज भारत में हीं केवल एक सौ चालीस करोड़ लोग रहते हैं । 

लेकिन आज एक भी आदमी यह दावा नहीं कर सकता कि ए सब करने से उनके मन की एक प्रतिशत भी शुद्धि हुई है, मनों रोग - काम क्रोध , मद , मोह, लोभ , मातषर्य , ईर्ष्या घृणा , राग द्वेष चिंता आदि लेश मात्र भी कम हुआ है, सुख शान्ति तो बहुत दूर कि बात है ।

अरे आम लोगों कि कौन कहे स्वयं को बड़े बड़े पंडित , पुजारी , आचार्य , प्रवचन करने वाले लोग , कर्म कांड कराने वाले पंडितो के भी ये रोग कम नहीं हुए हैं । 

जरा सा कुछ प्रतिकूल बातें कोई इनके खिलाफ बोल दे , तुरंत गुस्सा , और लोभ लालच , राग द्वेष, अहंकार आदि इतना अधिक इनके मन में पाय जाते हैं कि उसी मंदिर के दुसरे पंडितो के प्रति राग द्वेष भरा परा है । जब इन पंडितो पुजारियों , आचार्यों का यह हाल है तो आम लोगों कि कौन कहे , अपने ही मंदिर के दुसरे पुजारी , आचार्य का बुराई करते मिल जाते हैं आज । आपस में एक दुसरे कि बुराई तो छोड़िये ये कर्मकांडी पंडित आचार्य लोग तो बड़े बड़े जगद्गुरुओं को भी नहीं छोड़ते , उनके बारे में गलत-सलत बातें बोलते रहते हैं , बड़े बड़े जगद्गुरुओं के प्रति भी दुर्भावना तथा द्वेष रखते हैं अपने मन में । 99% पंडितो में आचार्यों में दीनता , नम्रता, सहिष्णुता नहीं मिलेगा आज आपको , तो फिर पुजा पाठ हवन यज्ञ आदि कराने वाले गृहस्थों की तो बात ही छोड़िए । 

जब पंडितो पंडों, आचार्यों आदि का यह हाल है जो मंदिर में दिन रात भगवान के विग्रह कि सेवा करते हैं पुजा पाठ करते और कराते हैं तो भला साधारण लोग , इनसे कर्म कांड कराने तथा करने वाले गृहस्थों के मन बुद्धि चित्त अहंकार कि शूद्धि कि बात कौन सोचें ? 
तो इन सबका क्या कारण है ? तो पहला और सबसे प्रमुख कारण है आजकल केवल शरीर से भक्ति कि जा रही है । मन इंभौल्व हो या न हो कोई मतलव नहीं । दुसरा कारण कलयुग में कर्मकांड के सभी नियम तथा निषेधों का ठीक ठीक पालन असंभव है ।

अगर कोई पंडित यह कहता है कि भगवान कि फिजिकल सेवा , शरीर से पूजा पाठ , व्रत उपवास हवन यज्ञ करने से अभीष्ट यानि भौतिक बस्तूओं तथा संसारिक सुख सुविधा के साधनों कि प्राप्ति होती है तो जरा उनको देखा जाए जो लोग यह सब नहीं करते और न कभी किया आज तक फिर भी उनके पास आज रूप्या पैसा धन जन आदि पुजा पाठ जप तप हवन यज्ञ व्रत तीर्थ-विर्थ उपवास करने वालों कि अपेक्षा कई गुणा अधिक क्यों हैं ? 

नंबर दो अगर वो यह कहते हैं कि इन सब कर्मकांड से पाप समाप्त होता है कष्ट मिटते हैं तो आज ये सब करने बाले वेचैन क्यों है , इतना चिंता निराशा आदि से ये लोग घिरे क्यों रहते हैं ? आगे पाप करने के प्रवृत्ति का नाश क्यों नहीं हूआ ? 

नंबर तीन अगर यह दावा करते हैं पंडित लोग कि इससे लोगों के संस्कार का निर्माण होता है मन कि शूद्धि होती है तो जरा यह देखिए आज कि कितने लोगों यहां तक पंडितो तथा पंडों के खुद राग द्वेष काम क्रोध ईर्ष्या आदि समाप्त हुए हैं या कम हूए है ? 

तो यह सब वेकार कि बातें हैं । शास्त्र कहता है कलयुग में मंत्र तंत्र पुजा पाठ , जप तप हवन यज्ञ व्रत उपवास तीर्थ विर्थ संसारिक गानों के साथ भजन कीर्तन, नृत्य , उछल कूद सब निर्थक है इन सबका कोई लाभ नहीं है और न भगवान इन सब कर्मों से एक रत्ती भी खुश होते हैं , और न कृपा करते हैं । 

यहां तक कि इस कलयुग में इनसे न कोई आध्यात्मिक लाभ है और न कोई भौतिक लाभ है । 

भौतिक बस्तुएं तो जीव के केवल पुर्व जन्मों के संचित कर्मों जिसे प्रारब्ध कहते हैं प्लस इस जन्म के क्रियामान कर्मो से ही मिलता है । 
और अपवाद रूप में कोई सतयुग तथा त्रेता एवं द्वापर आदि के जैसे नियम तथा पुरे विधान से जो कि आज असंभव है, अगर कर भी ले ठीक ठीक तो उसके कुछ पिछले संचित पाप आदि धुल सकते हैं लेकिन जीव का उद्धार नहीं हो सकता , क्योंकि जीव के अनंत जन्मों के पाप की गठरी उसके माथे पर है । इन सबका क्षय इन सबसे नहीं हो सकता जब तक जीव के पंचकोष , पंचक्लेश , त्रिविध ताप आदि पुरी तरह भस्म न हो जाए ।
और जहां तक आध्यात्मिक लाभ एवं मन बुद्धि चित्त अहंकार, साधन चातुष्ट्य आदि कि शूद्धि आदि कि बात है तो यह केवल मन से भगवान तथा योग्य गुरू कि निरंतर तथा अनन्य भक्ति , पुर्ण शरणागति एवं साधना से हीं संभव है वरना कलयुग में कोई अन्य साधन फलदायी नहीं है । 
:- गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज द्वारा प्राप्त सिद्धांत ज्ञान से । श्री राधे ।

Tuesday, 20 August 2024

गुरू द्वारा प्राप्त वैदिक सिद्धांतो तथा तत्वज्ञान से अपने मन पर कंट्रोल तथा विजय हासिल करने का अभ्यास हमें हर रोज करना होगा, और यह अभ्यास एकांत में हरि गुरू के रूपध्यान साधना से हीं संभव है अन्यथा मानवीय चंचल मन कि उच्छृंखलता कभी दूर नहीं हो सकती ।

पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी :- अपने गुरू द्वारा प्राप्त वैदिक सिद्धांतो तथा तत्वज्ञान से अपने मन पर कंट्रोल तथा विजय हासिल करने का अभ्यास हमें हर रोज करना होगा, और यह अभ्यास एकांत में हरि गुरू के रूपध्यान साधना से हीं संभव है अन्यथा मानवीय चंचल मन कि उच्छृंखलता कभी दूर नहीं हो सकती । 

 उच्छृंखल मन हमेशा उदंडता करता रहेगा तथा यह तर्क , कुतर्क , वितर्क एवं अति तर्क में हीं उलझा रहेगा हमेशा और यही उदंड मन जीवन के हर क्षेत्र में असफलता का सबसे बड़ा कारण है । एक उच्छृंखल मन मनुष्य का पतन करा देता है । उच्छृंखल मन मनुष्य को अपने लक्ष्य पर कभी पहुंचने नहीं दे सकता है ।
अनेक बिचारों का प्रवाह यह मानवीय मन जीव के आत्मशक्ति को छिन्न-भिन्न करके रखता हैं जिस कारण यह मन किसी भी शुभ कर्म में केंद्रित नहीं हो सकता । 

इसलिए मन को ध्यान ( Meditation ) द्वारा "साधना" होगा । एकांत रूपध्यान साधना के द्वारा मन को दिव्य शक्ति यथा ज्ञान शक्ति के मूल स्रोत हरिगुरू में जमाना होगा, केंद्रित करना होगा । रूपध्यान साधना द्वारा इसको नियोजित करने की कला सिखनी होगी । मन को अनावश्यक बिषयों के चिंतन , चिंता तथा नकारात्मक बिचारो के प्रवाह से हटाने कि क्रिया को मन का निग्रह कहते हैं, दुसरे शब्दों में चित्त का मार्जन करना भी इसी क्रिया को कहते हैं तथा इसे हरिगुरू द्वारा दिया ज्ञान एवं सकारात्मक चिंतन में लगा कर दिव्य गुणों को ग्रहण के क्रिया को परिग्रहण कहते हैं । 

मन को अनेको अनुपयोगी बिषयों के चिंतन से हटाकर किसी एक परम उपयोगी तथा कल्याणकारी बिषय में लगाने की कला को मन को नियोजन करना कहते हैं । इंग्लिश में इसे Mind Management कहते हैं । 

अनियोजित मन अज्ञानता के कारण अनादि काल से अनित्य को हीं नित्य मान बैठा है , यह अपने शरीर तथा इस संसार को ही नित्य मान बैठा है , अत: यह सदा से अविद्या माया का शिकार है । इसी अविद्या माया के कारण जीव का मन भ्रम , प्रमाद , विप्रलिप्सा तथा कर्णपाटव जैसे मानसिक रोगों से ग्रसित है । 

यही अविद्या माया अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश का भी मुख्य कारण है । और यही पांचों अवगुण जीव के मन को चिंता तथा भय से ग्रसित कर रखा है । 
जब तक मनुष्य का मन इनसे मुक्त नहीं होगा तब तक जीव अपने लक्ष्य को कभी हासिल नहीं कर सकता । 
जब तक मनुष्य का मन स्थिर नहीं होगा, जीव हमेशा अशांत रहेगा , दुखी रहेगा , हताशा तथा निराशा का शिकार रहेगा चाहे वो कितना भी अनित्य संसाधनो को अपने लिए जमा करके रख ले ।
जब तक जीव अपने मन के अनंत शक्तियों को नियंत्रित करने का कला नहीं सिखेगा तब तक मनुष्य का पंचकोष भष्म नहीं हो सकता , और जब तक पंचकोष भष्म नहीं होगा, जीव पर त्रिताप तथा पंचक्लेश हमेशा हावी रहेगा और जीव दुखी हीं रहेगा , चाहे वो कितना भी धन , जन वैभव तथा अन्य अनित्य भौतिक बस्तूओं को इकट्ठा कर लें । 

आज कलयुग में भगवान तथा गुरू कि भक्ति तथा उनकी बतलाई साधना ही एक मात्र ऐसा साधन है जिससे जीव अपने मन को अपने वश में कर सकता है दुसरा कोई अन्य साधन नहीं है, क्योंकि अनादि काल से संसार में हीं आवागमन के कारण चतुर्युगी युग चक्र के अंतिम युग कलयुग में जीव का मन इतना उच्छृंखल हो चुका है कि वो अंधविश्वास तथा रूढ़िवादिता को ही कर्म तथा धर्म एवं ज्ञान समझ बैठा है । 
अत: कलयुग में जीव कर्म धर्म एवं ज्ञान के मूल स्वरूप को समझने में असमर्थ है । 
यही वजह है कि जीव आज कर्म धर्म के रूप में जो भी कर रहा है वो निष्फल होता जा रहा है चाहे वो पुजा पाठ हो , जप, तप, व्रत, उपवास तीर्थ, विर्थ, हवन या कोई भी अन्य कर्म कांड क्यों न हो । 

अत: कलयुग में केवल भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ तथा कल्याणकारी है, लेकिन अफसोस कि आज कलयुग में अधिकतर लोग भक्ति के मूल स्वरूप तथा वास्तविक अर्थ को भी नहीं जानते। 

इस कलयुग के परमाचार्य पंचम मौलिक जगद्गुरूत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु ने भक्ति कि जो परिभाषा कि है तथा भक्ति के जिस मार्ग को प्रशस्त किया है जीव केवल उसी को अपना कर अपने जीवन को सफल बना सकता है अन्यथा इस कलयुग में अन्य कोई मार्ग सक्षम नहीं है । अन्य सभी मार्ग भ्रम में डालने वाले हैं तथा मानसिक रोग को और भी बढ़ाने वाले मार्ग है । श्री राधे ।

Sunday, 23 June 2024

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।1. परमात्म केंद्रित ( GOD Centric ) Suprime soul.2. आत्म केन्द्रित ( Soul Centric )3. मन केंद्रित ( Self Centric )4. परिवार केंद्रित ( Family Centric)5. समाज केंद्रित ( Society Centric )6. संप्रदाय केंद्रित ( community centric )7. विश्व केंद्रित। ( Universe centric )

मेरा यह पोस्ट आध्यात्मिक्ता से तटस्थ लेख है जिसमें भौतिक , अभौतिक दोनों का समावेश है  । है तो यह श्री महाराज जी द्वारा दिया दृष्टि के प्रभाव का हीं फल । पर उनके अनुयायियों से एक प्रार्थना है कि इस लेख को केवल एक लेख और बिचार के समझ से पढ़े और देखें। 
और अपना स्वतंत्र बिचार बिना किसी पुर्वाग्रह के रख सकतें बिना भेद भाव‌ राग और द्वेष के  , इसमें किसी से राग और द्वेष की भावना नहीं है । बस एक चिंतन है ।

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।
1. परमात्म केंद्रित ( GOD Centric ) Suprime soul.
2. आत्म  केन्द्रित ( Soul Centric )
3. मन केंद्रित       ( Self Centric )
4. परिवार केंद्रित ( Family Centric)
5. समाज केंद्रित ( Society Centric )
6. संप्रदाय केंद्रित ( community centric )
7. विश्व केंद्रित।    ( Universe centric ) 

१. God centric - इसमें वो महान जीव है जो भगवान को पुर्ण निष्काम भाव से प्रेम करतें हैं । ऐसे जीव पराकाष्ठा का भगवद् प्रेमी होतें हैं । यहां तक की वो भगवान या अपने गुरु से इतना प्यार करतें हैं कि भगवान या गुरू की इच्छा हीं उनकी इच्छा हैं । वो दर्शन दें नहीं दें , बदले में प्यार करें या न करें , कोई अपनी कामना नहीं इनको । आध्यात्मिक कामना भी नहीं , भौतिक की तो बात हीं नहीं । ए पुर्ण निष्काम मनुष्य अति दुर्लभ भगवद् अवस्था का प्रतिरूप होतें हैं । परमात्म प्रेम भाव में लीन भीतर से । दुनियां से या किसी से कोई लेना देना नहीं , विल्कूल स्थित प्रज्ञ । भौतिक शरीर , भौतिक संसार में होते हुए भी निर्विकल्प , ना शरीर का भान न ‌संसार का ना अपने आत्मा का । पुर्णपरमहंसावस्था। अद्वैत अवस्था में हरि स्वरूप होते हैं । और जन हित हेतु द्वैत भाव से अपने भगवद् स्वरूप में स्थित होते हुए विश्व के सभी जीवों के आत्मिक कल्याण हेतु शरीर धारण करतें हैं । 

२. Soul centric - ऐसे मनुष्य आत्म केन्द्रित वाले सकाम भक्त होतें हैं । इनको अपने आत्मा का प्रैक्टिकल अनुभूति , आत्म साक्षात्कार  या आत्मा का ज्ञान हो  गया होता है । आत्माराम होतें हैं पर ए पूर्ण निष्काम नहीं होतें हैं । हां भौतिक बस्तुओं की कामना इनको नहीं होती , ये भौतिक शरीर और संसार को एक साधन समझ कर इसका ख्याल रखतें हैं । अपने संसार का सदुपयोग भर बस ।  ए भगवद्‌प्रेम चाहतें हैं यही लक्ष्य होता है । आत्मा से परमात्मा के प्रेम को महसुस करना , उनको देखने , सुनने , बातें करने , आलिंगन करने , रस रूप का स्वाद और सुगंध की कामना होती है । ये भक्त होतें हैं । अपने ईष्ट व गुरू से अटूट और अनन्य प्रेम करतें हैं । 

३. Mind centric ( self centric ) ऐसे जीव भगवान और गुरू से अपने आध्यात्मिक प्यास के साथ साथ भौतिक प्यास के पूर्ति की भी  कामना रखतें हैं । यानि केवल मैं और मेरा तु । लेकिन पहले मैं तब तु। इनका ध्येय वाक्य है - पहले आत्मा यानि मन तब परमात्मा, ऐसा सोचते हैं   । ए मन को हीं आत्मा समझते हैं ।
भौतिक कामना की पूर्ति में व्यवधान आया तो प्यार खत्म , जिस मात्रा में भौतिक कामना की पूर्ति हुई उतना प्यार छलक गया । प्यार का उतार चढ़ाव अपने संसारिक इच्छा के पूर्ति के हिसाब से । तो ऐसे लोग आध्यात्म से और भौतिक संसार दोनों से तटस्थ होतें हैं लेकिन खुद के लिए केवल । खुद को खुद से प्यार है और भगवान से भी प्यार है पर स्व हित के लिए । पुर्ण स्वार्थी , ए भगवान, महापुरूष ,संसार , संसारिक रिस्तों  का यानि परिवार , दोस्त , मां बाप , भाई बहन  ,‌बेटा वेटी यानि सभी resources का इस्तेमाल खुद के संतुष्टी के लिए करतें हैं । यह खुद का भक्त होतें हैं । 
भगवान का कभी नहीं । हां भ्रम है इनको की हम भगवान का भक्ति करतें हैं , भक्त हैं पर यह सिर्फ भ्रम है ।
इनके लिए मन हीं देवता , मन हीं ईश्वर , इससे बड़ा ना‌ कोई । इनको बहुत अहंकार होता है। जरा सा बात बर्दास्त नहीं अपने मन के खिलाप । 

४. Family centric - परिवार केंद्रित , ऐसे जीवों के लिए खुद के priority के साथ परिवार का भी priority है । तो ऐसे लोग खुद और अपने परिवार तक सिमित होतें हैं । और इसी हित के लिए भगवान को पुजते है ( इनको भी भक्त नहीं कह सकते हैं ) ए पुर्णत: स:स्वार्थी होतें हैं । समाज रहे या नहीं, मैं और मेरा परिवार, जिसमें बहुत अगर है तो मां वाप को भी शामिल कर लिया नहीं तो‌ केवल मैं मेरा पति हैं मेरी पत्नी और मेरा बच्चा है  बस इससे आगे कुछ नहीं । वांकी सब नाते , रिस्तेदार साधन है इनके लिए । जरूरत परे मां बाप को भगवान , भाई को भगवान , बहन को देवी स्वार्थ बस और गद्हा को भी बाप बना लेतें हैं ।  कोई कोई अपवाद स्वरूप मां वाप भाई से , बहन से प्रेम पर १००% निष्काम नहीं और अपने अहंकार का चरम और उसकी तूष्टि से मतलव है । आप सही वोले तो विरोध गलत बोले तो विरोध । इनका आरती उतारिए , ऐ खुश । कल भुल गए आपका विरोध । ऐसे को समझना और संतुष्ट करना असंभव है । कब किस बात पर नाराज़ हो जाए आपको बताऐंगें भी नहीं । बस खफा । 

५. Society centric - ऐ समाज सेवी होतें हैं । मानव‌मात्र , जीव मात्र के लिय दयालु  ,‌ लेकिन  अपने समाज तक केंद्रित होतें हैं । समाज सेवा के बदले यश , सम्मान आदर चाहिए होता है । नाम भी चाहिए होता है । ऐसे लोगों से समाज चलता है । देश सेवी भी इसी में है। 

६. Community centric ( संप्रदाय विशेष केंद्रित ) ऐ लोग कट्टर होतें हैं , अपने संप्रदाय विशेष को मानने वाले और उसके लिए ही काम करने और लड़ने बोलने बाले। ए लोग सभी चीजों का इस्तेमाल अपने संप्रदाय के अहंकार को तुष्ट करने के लिए करतें हैं । चाहे धर्म ग्रंथ हो या भगवान , जय श्री राम हो या जय शंकर या जय हनुमान या अल्लाह हो या अकबर‌ खुदा हो या कुरान  , ईश्वर जीसस हो या खुदा , भौतिक रिसोर्स हो या आध्यात्मिक । पर सब अपने संप्रदाईक अहंकार की पूर्ति के लिए । एक दूसरे को निचा दिखाना और खुद को ऊंचा साबित करने का प्रयास करना ,  यह विशेषता होती है इन लोंगों की । इनको लगता है कि दुनिया में 12 आना अक्ल सिर्फ मेरे पास है और 4 आने में पुरी दुनियां है । 

७. Universe centric ( विश्व केंद्रित ) ऐसे लोग संसार में महान होतें हैं यह जाति पांति , धर्म , संप्रदाय , चर अचर से उपर उठकर सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय कि चिंता और प्रयास करने वाले होतें हैं । "बसुधैव कुटूंबकं"
ऐसे जीव महात्मा भी होतें हैं और समग्र जीवों के भौतिक कल्याण की भावना वाले होतें हैं , इनका मुख्य ध्यये होता है अपने भौतिक आवश्यकता को कम करो और प्रकृति से तटस्थ होकर जियो । जो आजकल बहुत कम है इस भोगवादी युग में । भगवान ऐसे लोगों को अपना माध्यम बना कर जग कल्याण का काम करतें हैं । ए संत की भांति संसार के जीवों के प्रति निष्काम भाव से समर्पित होते हैं , इनको नाम और बदनामी की कोई चिंता नहीं । बस इनमें सेवा का लक्ष्य सर्वोपरि होता है । 

तो पहला तो अति उत्तम पर्सनैलिटी है । दुसरा उत्तमतर है और सातवां उत्तम पर्सनैलिटी है, पांचवां  ठीक हीं है । 
अत: हमको इन चार प्रकार से हीं मतलव रखना चाहिए ।‌ 

( मेरा यह लेख एक भुमिका है आगे के संसारिक लेख के लिए , उस लेख में इनका इस्तेमाल  होगा आगे  ) 
श्री राधे ।

Sunday, 2 June 2024

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय"-कबीर ।आज कल कबीरदास जी के इस दोहे का दुरूप्योग अक्सर तकिया कलाम के जैसे करते हुए बहुत से तथाकथित विद्वान और भोले भाले लोगों को सुन रहें हैं आप सब । जरूरी है इन बातों को समझना पहले श्री महाराज जी द्वारा ।

श्री महाराज जी द्वारा इस दोहे की व्यवहारिक व्याख्या -
"निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय"-कबीर ।

आज कल कबीरदास जी के इस दोहे का दुरूप्योग अक्सर तकिया कलाम के जैसे करते हुए बहुत से तथाकथित विद्वान और भोले भाले लोगों को सुन रहें हैं आप सब । 
जरूरी है इन बातों को समझना पहले श्री महाराज जी द्वारा ।
मैंने श्री महाराज जी से एक पिकनिक के कार्यक्रम के दौरान एक व्यक्ति के इस दोहे के उपयोग संबधी मार्ग दर्शन सुना है । वो आपसे शेयर करता हुं । बहुत जरूरी है ।
श्री महाराज ने समझाएं हैं ( मैं अपने शब्दों में उनका दिशा निर्देश लिख रहा हुं ) कि कौन से निंदक को अपने आंगन में कुटी छवा कर रखने की सिफारिश कबीर दास करतें हैं तो यह उस दोहे में उन्होंने स्वयं लिखा है - कि जो आपको बिना‌ पानी और साबुन का निर्मल बना दे । आपके बिचारों को शुद्ध कर दे । आपको आपकी गलती बतलाकर आपको सही रास्ता दिखाएं और आपके हित का सोंचें , बिना राग द्वेष के आपका भला चाहे ।

अब ए जो आपका निंदक है जिसके लिए आपको उसका कुटी बनबाना है वो कैसा है ? यह समझना जरूरी है पहले आपके लिए ।
हां तो वो निंदक स्वयं शुद्ध होना चाहिए सबसे पहले , यानि जो स्वयं शुद्ध है , निर्मल है । जिसका मन बुद्धि निर्मल है , वहीं तो आपको भी शुद्ध करेगा ।

 जो खुद गंदा है , जिसका अंत:करण मलिन हैं , बुद्धि क्षूद्र है । मन गंदा है वो आपको तो और गंदा हीं करेगा । और ऐसा निंदक निंदक क्या होगा भला , एक क्षूद्र बुद्धि है तमाम बुराई है उसमें । वो क्या किसी को शुद्ध करेगा ? उससे तो दुर हीं रहना श्रेयकर है ।

निर्मल जल में हीं चेहरा साफ नजर आता है । कोई गंदा पानी में जाकर देखें तो चेहरा और गंदा नजर आएगा और आएगा भी नहीं ।
अतः ऐसा जीव जो निर्मल हो चुका हो या निर्मल है मिलेगा नहीं संत को महापुरुष को छोड़कर इस संसार में कलयुग है , सब गंदा है संत और महापुरूषों को छोड़ कर। 
तो कबीरदास ने ऐसे संत और महापुरूषों को जो स्वयं निर्मल है और आपको आपके गलती को सुधारने के लिए आपके सामने रखता है , तो ऐसे निंदक को अपने घर में कुटी छवा कर यानी उसका संग करने के लिए कबीरदास ने कहा है । वो किसी गंदे जीव को मत रख लिजिएगा आंगन में कुटी बनवाकर, वो तो कुसंग का माध्यम बनेगा , खुद गंदा है तो भला आपको तो और गंदा हीं करेगा । 

आजकल लोग बोल देतें ए दोहे दुसरे की निंदा करतें हैं और अपने बचाव के लिए ऐसा ज्ञान दे देतें हैं । इन लोगों से बच करके रहें । श्री राधे ।