Sunday, 14 December 2025

जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मुरत देखी तिन तैसी

इस संसार में भगवान राम भी मनुष्य के जैसा प्राकृत शरीर के धारण करके आए , कृष्ण भी आए, अनेक अवतार हुआ भगवान का नर रूप में ।  

 मूल जगद्गुरू के रूप में वही भगवान श्री कृष्ण आए प्राकृत शरीर धारण करके जीव कल्याण हेतु , अपने अनुग्रहित श्रद्धावान मनुष्य का उद्धार करने हेतु । अनेकों जीवों का कल्याण हुआ , वो इस संसार के आवागमन से छुट गए । और आज भी श्रद्धालु जीवो का कल्याण लगातार हो रहा है अंदर ही अंदर । आज भी अपने गुरू के कृपा से अनन्य शिष्यों के आंतरिक स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है , अनेकों का अंत:करण शुद्ध हो रहा है तथा लक्ष्य कि प्राप्ति भी गुप्त रूप से निरंतर हो रहा है अंदर ही अंदर , जिसको वो शिष्य हीं समझता है तथा गुरूदेव एवं ईष्ट जानते हैं किसका अंत:करण कितना शुद्ध हुआ है , कितना लाभ हुआ है ? बाहरी मनुष्य भला क्या समझेगा ? वो तो बेचारा स्वयं के हाल के जैसा हीं दुसरे को समझेगा । जैसा उसका चश्मा है, जैसा उसका अंत:करण है वैसा ही उसे दुसरा भी दिखाई देता है । क्या समझेगा बेचारा वो ? ऐसे लोग दया के पात्र हैं । 

इसलिए तुलसीदास ने लिखा है रामचरितमानस में :- " जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मुरत देखी तिन तैसी "

अरे भगवान तथा वास्तविक महापुरूष को कोई जीव उनके कृपा के बिना कैसे समझ सकता है भला , बेचारे कृपा का पात्र ही नहीं है ? 

राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई।।
जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।। 

जब भगवान गुरू बन कर आए तो उस समय भी बहुत श्रद्धालु भावुक जीव उनको भगवान माना , तत्वदर्शी उस परमतत्व को पहचाना , उनके प्राकृत शरीर के अंदर छुपे दिव्य स्वरूप को देखा , पहचाना और खुले दिल से घोषणा कि ए मनुष्यों ये साक्षात भगवान है धरती पर गुरू रूप में आएं हैं , जो जो जीव अपना कल्याण चाहते हो वो इनको अपना गुरू मानकर इनका दर्शन , सेवा तथा भक्ति कर सकते हैं तथा इनके बतलाए मार्ग का अनुसरण करके भगवान के लोक परम धाम प्राप्त करके इस संसार के आवागमन से मुक्त हो सकते हैं, अपना परम कल्याण कर सकते हो । 

लेकिन जो मनुष्य अपने क्षूद्र ज्ञान के पराकाष्ठा पर थे और आज भी है वो सभी उनको साधारण मनुष्य ही समझा । आज भी ऐसे क्षूद्र मनुष्यों कि कमी नहीं है इस संसार में , वल्कि ऐसे नीच लोगों कि संख्या अधिक है आजकल । 

तुलसीदास जी ने ऐसे लोगो के लिए कहा है :- 
"जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ। 
सो कृतघ्न मंदमति आत्माहन गति जाइ॥"

तुलसीदास जी के इस चौपाई का भावार्थ इस प्रकार है :- वे कहते है कि ऐसे क्षूद्र लोगों को उसके हाल पर छोड़ देना हीं उत्तम है , ऐसे श्रद्धाहीन लोगों का मुंह कभी नहीं लगना चाहिए और न ऐसे जीवों के साथ बहस करना चाहिए कभी । ऐसे अधम दुराचारी आत्महंता जीव के किसी भी बात का कोई उत्तर कभी नहीं देना चाहिए। और सबसे विशेष बात कि ऐसे बेचारे लोगों के साथ न कोई दुर्भावना रखना चाहिए और न राग , न द्वेष। ऐसे लोगो से विल्कूल उदासीन रहना चाहिए । 

हमारे ईष्ट भगवान श्री कृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय के चालिसवे श्लोक में स्पष्ट कहा :- 

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।4.40।। गीता ।
 
इस श्लोक का भावार्थ इस प्रकार है :- 
इस संसार में तीन प्रकार का मनुष्य है , एक वो जो अज्ञ है यानि महान मुर्ख है, चपाट है ,‌नास्तिक है जो भगवान उगवान नहीं मानता , वो स्वयं को ही भगवान मानता है । 

दुसरा वो जो किसी तत्वदर्शी के द्वारा बताए जाने पर भी , सब सुनने समझने के बाद भी श्रद्धाहीन है, अविश्वासी है ।उसका मन मानने के लिए तैयार नहीं । 

तीसरा वो जो तत्वज्ञान सुनने समझने के बाबजूद कभी तो मानता है पर कभी नहीं मानता , उपर के दो प्रकार के लोगों के बातों में आकर , प्रभाव में आकर उसका विश्वास डगमगाते रहता है , ऐसे लोगों का ढुलमुल रवैया होता है , विल्कूल शंकालु प्रवृति । 

तो इस तीनों प्रकार के मनुष्य के बारे में भगवान कहते हैं इसी श्लोक के दुसरे पंक्ति में कि ऐसे संशयात्मा को न तो इस लोक यानि इस संसार में कभी सुख और आनंद नसीब हो सकता है और न कभी परलोक में । यानि स्वर्ग के सुख कि तो ऐसा नीच मनुष्य , शंकालु मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता है । तो ऐसे जीवों का क्या हर्ष होता है ? तो ऐसे मनुष्य का पतन हो जाता है करोड़ो कल्पों तक के लिए , और पतन भी ऐसा वैसा नहीं ! ऐसे मनुष्य को अगले अरबों जन्म तक तिर्यक योनियों यानि कुत्ता बिल्ली , नाली का कीड़ा मकोड़ा आदि योनियों में भगवान के द्वारा भेज दिया जाता है । यह भगवान श्री कृष्ण द्वारा गीता में इस श्लोक के माध्यम से खुल्लमखुल्ला उद्घोष है । श्री राधे :- संजीव कुमार।

ईष्ट और गुरू कि कृपा तथा गुरू द्वारा बतलाई साधना करने का परिणाम क्या है , लक्षण क्या हैं फल क्या है ?

ईष्ट और गुरू कि कृपा तथा गुरू द्वारा बतलाई साधना करने का परिणाम क्या है , लक्षण क्या हैं फल क्या है ? 

साधना और गुरू कृपा का परिणाम निम्नलिखित है :- 
1. पहला लक्षण या फल - शास्त्रों का सही सही ज्ञान तथा शास्त्र युक्ति में निपुणता । (यानि तत्वज्ञान पक्का होना तथा तत्वज्ञान का व्यवहारिक उपयोग ) .

2.दुसरा फल - साधक के मन में संसार से Detachment and attachment with GOD and GURU . संसार से वैराग्य तथा हरि गुरू से प्रेम कि उत्तरोत्तर बृद्धि। 
अंत:करण कि शुद्धि जिससे जीवन में संतोष , शांति,भगवद् आनंद का उत्तरोत्तर बृद्धि। 

3. तीसरा - साधक के अंदर सद्गुणों यानि दैविक गुणों का विकास । 

4.चौथा - निम्नलिखित पंचक्लेशों यानि पांचों प्रकार के विपत्तियों का क्रमिक शमन यानि लगातार नाश :- 

A) पहला पंचक्लेश - अविधा माया से मुक्ति यानि साधक के अंदर स्वाभाविक दिव्य ज्ञान कि उत्पत्ति तथा अज्ञानता रूपी अंधकार का नाश एवं विवेक का जागरण । 

B) दुसरा - अस्मिता यानि अहंकार तथा देहाभिमान का स्वाभाविक नाश , तृण से बढ़ कर दीनता तथा वृक्ष से बढ़ कर सहनशिलता यानि सहिष्णुता, नम्रता- विनम्रता आदि गुणों कि उत्पत्ति ।   

C) तीसरा - राग यानि किसी भी मायाबद्ध जीवों से अटैचमेंट यानि आसक्ति का नाश एवं केवल हरि गुरू से राग यानि केवल उनके प्रति ही हृदय में प्रेम कि उत्त्पति। 

D ) चौथा - द्वेष यानि दुसरे किसी भी मायाबद्ध व्यक्ति, विषय तथा वस्तु से घृणा के भाव का आभाव तथा संसार के प्रत्येक जीवों में हमारे ही ईंष्ट विद्यमान है इसका हर क्षण एहसास, अनुभूति। मन में अच्छे विचारों कि स्वाभाविक उत्पत्ति। मन के अंदर सर्वजन हिताय तथा सर्वजन सुखाए भाव कि उत्पत्ति बिना भेद भाव के । 

E) पांचवा- अभिनिवेश यानि मृत्यु के भय से मुक्ति। जीवन में निर्भयता , निश्चिंतता, निडरता का समावेश एवं उदंडता , उद्विग्नता, बेचैनी‌ आदि के भाव कि समाप्ति। संसार का कोई भी सामान मेरा नहीं है , यह नष्ट होने वाला है । समाप्त होने वाला है । यह देह भी अल्प समय के लिए मुझे भगवान के कृपा से मिला है ताकि मैं अपने भगवद् संबंधित लक्ष्य को हासिल कर सकूं । 

तथा इस भाव कि उत्पत्ति एवं अनुभूति कि हरि गुरू हर क्षण हमारे साथ है , मैं एक दिव्य आत्मा हूं , मैं देह नहीं हूं । मैं भी अनादि हूं , शाश्वत हूं , सनातन हूं , अविनाशी हूं , दिव्य हूं , क्योंकि मैं उस दिव्य , अनंत, अनादि , अविनाशी, सर्वसमर्थ, सर्वभूत , सर्वांतर्यामी , सर्वसुहृत, सर्वशक्तिमान, सर्वसुंदर, सर्वगुणों का खान, सत् चित् आनंदकंद भगवान श्री कृष्ण का सनातन अंश हूं । वो मेरे अंशी हैं , वो मेरे सर्वस्व हैं । मेरा सभी रिश्ता नाता केवल उन्हीं से है । हम उनके दास हैं , हम उनके पुत्र हैं , उनके दैविक संपत्ति पर मेरा अधिकार है जिसे देने के लिए वो मुझे अनुग्रहित करने लगे हैं । 

अत: मैं नश्वर , विनाशी , प्रतिक्षण घटने वाला , मिटने वाला , कम होने वाला , समाप्त होने वाले वस्तु , विषय तथा मायाबद्ध जीव से एवं इस संसार से आसक्ति क्यों रखूं ? 
मायाबद्ध विषय वस्तु तथा जीव से आसक्ति रखना ही मेरे दुख का एक मात्र कारण है । 

अत : साधना के फलस्वरूप जब ऐसे भावों का स्वाभाविक जागरण , उदय , उत्त्पति जीव के अंत:करण में होने लगे एवं हरि गुरू के लिए प्रेम का अनुभूति होने लगे तो समझना चाहिए कि हम ठीक ठीक रास्ते पर है, हमारी साधना ठीक चल रही है एवं मेरे उपर मेरे गुरू एवं मेरे एक मात्र ईष्ट श्री राधाकृष्ण कि अपार कृपा बरसने लगी है :- 
संजीव कुमार ।

"जिंदगी भर बस हम एक ही गलती करते रहे , धुल हमारे चेहरे पर थी और हम आइना साफ करते रहे । "

"जिंदगी भर बस हम एक ही गलती करते रहे , 
धुल हमारे चेहरे पर थी और हम आइना साफ करते रहे । " 

हम सभी मायाबद्ध जीव किसी भी दुसरे जीव के अंत:करण का हाल, सच्चाई नहीं जान सकते ठीक तरह से , क्योंकि हम अंतर्यामी नहीं है । 

हम मायाबद्ध जीव केवल अपने दृष्टिकोण से ही दुसरे के बात व्यवहार आदि का आकलन करके अक्सर अपना जजमेंट दे देते हैं जो जरूरी नहीं कि सही हो । जैसा हमारे स्वयं का व्यक्तित्व होता है , अंत:करण होता है , दृष्टिकोण होता है नजरिया होता है वैसा ही हम दुसरे के बारे में आइडिया लगा लेते हैं, जो सबसे बड़ा दोष है हममें । 

हो सकता है दुसरा सही हो सहज रूप से  , इसलिए अगर किसी भी दुसरे व्यक्ति या वस्तु या बिषय में अगर हमें कोई भी पोजिटिव बात नज़र आए तो,  तो हमें पोजीटिव सोच रख कर पौजिटिव आइडिया ही लगाना चाहिए उसके प्रति, न कि prejudice के कारण हम गलत अनुमान लगा कर अपने गलत दृष्टिकोण से गलत निर्णय किसी के बारे में दे दे। हमें जल्दबाजी में किसी दुसरे के लिए जजमेंटल होने से बचना चाहिए। ऐसा बुद्धिमान तथा वास्तविक रूप से पढ़े-लिखे लोगों का पहला लक्षण व निशानी है । 

भगवद् कृपा से , साधना से, अच्छी शिक्षा एवं माता पिता द्वारा दिए गए अच्छे संस्कारों का जब मनुष्य में उदय होता है, तत्पश्चात् जैसे जैसे हमारे खूद का अंत:करण शुद्ध होता है वैसे वैसे हमारा दृष्टिकोण, नजरिया, सोच पौजिटीव होने लगता है, हम किसी दूसरे व्यक्ति तथा वस्तु के बारे में सही सही आईडिया बनाने लगते हैं । बस यही प्रमाण है अंत:करण शुद्धि का , अच्छी शिक्षा तथा अच्छे संस्कारों का । 

हर दुसरे व्यक्ति में जो हमें दोष नजर आता है वो दरअसल हमारे अपने ही चरित्र का चित्रण होता है । भ्रम के कारण  हम अपने अंदर के ही दोष का रिफ्लेक्शन पाते हैं लेकिन हम समझते हैं कि यह दोष दुसरे में है , मेरे में नहीं और हम बहुत साफ सुथरा मनुष्य है । ऐसा हम सभी मायाबद्ध  मनुष्य का वास्तविक हाल है । 

इसलिए एक शेर प्रस्तुत है:- 
जिंदगी भर बस हम एक ही गलती करते रहे , 
धुल हमारे चेहरे पर थी और हम आइना साफ करते रहे । 
श्री राधे :- संजीव कुमार।

दो शब्द हमारे देश के युवाओं से , बच्चों से

दो शब्द हमारे देश के युवाओं से , बच्चों से :- 

पैसे के पीछे हमे नही भागना चाहिए | हमें स्वयं में मानवता के गुणों के विकास पर जोर देना चाहिए | जब गुण विकसित होंगे , तब पैसा हमारे पीछे भागेगी | अगर हम पैसे के पिछे भागेंगें तो पैसा हमसे दुर भागेगी | यह नियम है संसार का । 
 हमे केवल अपने सर्किल औफ इंफुलेंस पर ध्यान देना चाहिए , सर्किल औफ कंसंर्न तो कंसंर्न हीं था और रहेगा | 
पहले पता करो की किस उदेश्य के लिए तुम्हारा जन्म हुआ हैं | क्योंकि विना कारण और उदेश्य का एक पत्ता भी पेड़ से नही गिरता हैं | फिर तुम तो ईश्वर की सर्वश्रेष्ट रचना हो | 
हम क्या अच्छा काम करते हैं यह जरुरी है | हम बदले में क्या पाते हैं यह जरुरी नही | हम क्या समाज को राष्ट्र को देते है यह आवश्यक है | समाज हमे क्या देता है | गाली या सम्मान यह महत्वपूर्ण नही | 
सारे अच्छे काम करो और प्रभु को समर्पित कर दो , क्रेडिट अपने को नही प्रभु को दो , गुरु को दो , कहो हर रात में सोते समय की हे गुरु देव जो भी मैने अच्छा काम किया वो आपकी मेहरवानी से किया | और जो भी बुरा किया मेरी नादानी थी | आप हमें इतनी शक्ति दिजिए की कल कोई बुरा काम हमसे ना हों |
समय की धारा में अपने आपको मत बहाओ , वल्कि समय का भरपुर उपयोग करो , दुरुप्योग नही | 
भगवान ने केवल एक चीज ही सबको समान रुप से दी है वो है समय , भगवान ने 24 घण्टे सब को बराबर दिया है | इसका जो भी जितना सदुप्योग किया है वह सफल हैं | 
उपलब्धि कुछ हांसिल करने में नही हैं | उपलब्धि प्राप्त कर बांटने में हैं | अपने लिय तो हर जीव जी लेता हैं पर दुसरो के लिए जीना हीं सच्ची उपलब्धि हैं | संतोष तब मिलेगा | और जब संतोष मिलेगा तब जीवन सार्थक होगा | 
दुसरे को दिखाने के लिय मत करो | हमको करना है बस इसलिये करों |
 किसी की आलोचना मत करो , आलोचना करने का अधिकार सिर्फ उसी को है जो पूर्णत: निर्दोष और ज्ञानवान हो | आलोचक बनने से पहले योग्य बनों । आलोचित या आलोच्य से ऊपर उठो और उपर पहुंचो ज्ञान में , बुद्धि में, विवेक में , यश में , प्रतिष्ठा में , पद में , और धर्म कर्म में । 
चरित्रवान बनने पर जोर दो | 
अपने जन्म के उदेश्य को जिस क्षण समझ जाओगे आधी सफलता तुम्हे मिल जाऐगी | बाकीं तुम कर्म करके सफल हो जाओगे |
परिक्षा में मार्क्स लाने के लिए मत पढ़ो , मुझे अच्छी तरह रुची से पढना है इसलिए पढों , मार्क्स तो आउट कम है | वो तो अच्छा आएगा ही | :- तुम्हारा संजीव कुमार 

Don't go behind money . Develop your quality, than money will automatically follow you . If you will run behind the money than money will be always far from you. And use your money for humanity . Don't misuse your money . Otherwise one day you will be in trouble. 
Always focus on your circle of influence don't go behind circle of concern .  
Select your careers as per your choice because every youth is made for some deeds . Always trust on yourself than other will trust on you . Be with truth always.
 . You will get sustainable success . No body will brake your record. :- Your sanjeev

Thursday, 30 January 2025

कुंभ मेले तथा कुंभ स्नान इतिहास और उत्पत्ति

कुंभ मेले का इतिहास और उत्पत्ति:- 
सनातन वैदिक धर्म का अल्टीमेट संविधान चार वेदों में "कुंभ मेला या कुंभ स्नान " का जिक्र कही नहीं है । वेदों में कुंभ शब्द का प्रयोग घट यानी घड़ा के लिए आया है ,‌ न कि कुंभ मेले तथा स्नान के लिए । 
ऐसा माना जाता है कि कुंभ स्नान कि शुरुआत आदि जगद्गुरू श्री शंकराचार्य के द्वारा चेतना के उच्चतम स्तर को प्राप्त जीवों के लिए किया गया था। 
चेतना के उच्चतम स्तर को प्राप्त योगभ्रष्ट व्यक्ति, साधन चातुष्ट्य संपन्नता हेतु अपनी अध्यात्मिक साधना के लिए पहाड़ , जंगल , नदी आदि को अपने साधना और सिद्धि के लिए अनुकूल मानते हैं । इसलिए आदि जगद्गुरू शंकाराचार्य ने इस मेले की शुरुआत की थी जो केवल वैरागी साधुओं के लिए थी । वैरागी वो साधु जो चेतना, चरित्र के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुके थे, ऐसे लोग अपने मन को अष्टांग योग तथा साधन चातुष्टय के बल पर शूद्ध कर चुके हो या करने कि प्रक्रिया में हो, तो ऐसे साधन चातुष्ट्य संपन्न योगभ्रष्ट जीव अपने अनुगत शिष्यों को साधना कराने के लिए त्रिवेणी घाट पर लेकर आते थे और वहां अष्टांग योग कि साधना आदि करते थे ।

बाद में ढोंगी आडंबरी , पाखंडियों और अंधविश्वासियों ने इसे अपना लिया , इनका नकल करने लगा और व्यापारियों द्वारा इसका बाजारीकरण हो गया । 
आम आदमी को इस कुंभ मेले से कोई लाभ नहीं होता । उल्टा नुकसान ही होता है । 

मानविए चेतना तथा चरित्र के निम्न स्तर का लोग जो जूआ , मांस , मदिरा , नशा, ड्रग आदि का सेवन करते हैं ठगी , चोरी , धोखाधरी , अत्याचार , दुराचार , पापाचार व्यभिचार आदि में लगे रहते हैं उनके लिए ज्ञान , ध्यान, साधना, पुण्य, भगवान की सेवा , भक्ति और मौक्ष असंभव है हमारे वेदों के अनुसार , ऐसे लोग अनाधिकारी माने जाते हैं शास्त्रों के सिद्धांतों के अनुसार। क्योंकि ये सब महापाप के केटेगरी में रखा गया है शास्त्रों में । इस तरह के पाप को करने वाले जीव का अंत:करण अत्यंत गंदा होता है । ऐसे लोगों का अन्नमयकोष दुषित होता है , अन्नमयकोष दूषित होने के कारण ऐसे लोगों का मनोमय कोष और बिचार दोनों प्रदूषित होते हैं । मन में गंदे गंदे विचार उत्पन्न होते हैं, मन अशांत तथा खिन्न रहता है , क्या अच्छा है क्या बुरा है इनके समझ में नहीं आता है ।  
इसलिए सही शिक्षा देने वाले का ऐसे लोग विरोध करते हैं काटने दौड़ते हैं , अपने चाल चारित्र तथा कुकर्म को सही ठहराने के लिए ऐसे असुर प्रवृत्ति के लोग वास्तविक धर्म को नहीं समझते । असुरों को अत्याचार , दुसरे को गाली देना , मारना सताना , ढोंग , पाखंड आडंबर तथा अंधविश्वास के सहारे अपना जीवन जीने की प्रवृत्ति होती है । 
अमृत के घड़े को असुर लेकर भागे थे लेकिन उसका कल्याण नहीं हुआ । वो और भी उग्र हो गय और देवाताओ से युद्ध किया । 
राक्षसी बिचार धारा , आसुरी बिचारधारा वाले जीव तमोगुणी होते हैं , उनपर अमृत के गुणों का उल्टा असर होता है । उदंड लोग किसी विषय और बस्तू का हमेशा ही दूरूपयोग किया है और करता रहेगा । 
ऐसे राक्षसी सोच वाले जीव को सात्विक बातें, धर्म का असली अर्थ नही समझ में आता कभी । ऐ लोग ढोंग पाखंड , आडंबर तथा अंधविश्वास को ही मुर्खता के कारण धर्म समझते हैं । 

तो ये कुंभ स्नान केवल उन सतोगुणी जीवों के लिए आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने कि थी जो योगभ्रष्ट हो चुके थे तथा चेतना के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुके थे । पहले से जिनका मन शूद्ध हो चुका था ऐसे लोग मौक्ष कि कामना से कर्म कांड और साधना के लिए त्रिवेणी को चुना था जो आगे चलकर परंपरा का रूप ले लिया और ढोंग , पाखंड , आडंबर तथा अंधविश्वासियों का अड्डा बन गया ।
अत: आम लोगो को सिद्ध संत , महापुरुषों का नकल नहीं करना चाहिए कभी । नहीं तो यह दैविक प्रकोप का कारण बनता है और दैविक दुख के सीवा और कुछ प्राप्त नहीं होता इन सब से । 

कल कुंभ मेले में इसी दैविक प्रकोप के कारण सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों लोग अपना का टांग हाथ फसली और गर्दन तुड़वाकर होस्पीटल में हैं , अपाहिज हो चुके हैं , जो दैविक प्रकोप का एक ताजा उदाहरण है आज 29 जनवरी 2025 का  ।

Tuesday, 26 November 2024

लक्ष्मी कौन है क्या है ?

*कितने अजीब लोग हैं!*

जरा अपने संसार को देखो कैसे अजीब लोग हैं हमारे संसार में। ये बड़े-बड़े पैसे वाले वो दुकानदार हो छोटे-छोटे या बड़े-बड़े खरबपति हों। ये लोग इस दिवाली पर हिसाब करते हैं और अपने बहीखाता में लिखते हैं- सदा लक्ष्मी सहाय! सदा कुबेर सहाय! लक्ष्मी सदा हमारे पास रहे। कुबेर सदा हमारे पास रहे। ये पंडित लोग जो पूजा कराते हैं आपके यहां शादी ब्याह में, यज्ञ बगैरा में, तो पूजा के बाद में एक श्लोक बोलते हैं- 

*यान्तु देवगणा: सर्वे पूजामादाय मामकीम्।* 
  
सब देवता अपने-अपने धाम को जाओ, हम पूजा कर चुके। पहले बुलाते हैं ना! गणेश जी और दुर्गा जी और षोडस मातृका, नवग्रह और अंत में कहते हैं- सब लोग जाओ। *लक्ष्मीम कुबेरेण च विहाय* लक्ष्मी और कुबेर तुम दोनों रहो और बाकी लोग जाओ। ये कितने अजीब लोग हैं अजीब! अजीब मायने समझते हैं आप लोग ना? हां! जिनकी खोपड़ी उल्टी हो वो अजीब होते हैं। भगवान सबसे अधिक अजीब हैं क्योंकि वो अन्यथाकर्तुम समर्थ है। वह आंख से सुनते हैं, कान से देखते हैं। अजीब हैं ना? हां!
तो ये हमारे संसार के लोग भी अजीब है और इनको बताने वाले पंडित जी वगैरह भी अजीब हैं! इनको यह नहीं पता है कि लक्ष्मी बिना भगवान के कैसे रहेंगी। वो तो सदा भगवान के बाएं तरफ रहती हैं। जब तुम भगवान को भेज रहे हो कि सब जाओ अपने-अपने लोक में और लक्ष्मी तुम रह जाओ। तो लक्ष्मी कहेंगी- तुम्हारा दिमाग खराब है, मैं अपने पति को छोड़कर तुम्हारे यहां रह जाऊं? यह तो संसारी स्त्री को भी अगर कोई ऐसे कहे कि आज जितनी स्त्रियां आई हैं वो सब रुकें हमारे घर में और जितने पति आए हैं वह जाएं अपने-अपने घर! तो लोग पिटाई कर देंगे। यह पागल हो गया है! तो लक्ष्मी तो तभी रहेंगी जब भगवान को बुलाओ। ना! कोई नहीं लिखता बही खाता में- 'राम सहाय', 'श्री कृष्ण सहाय', 'भगवान सहाय'। लक्ष्मी सहाय, कुबेर सहाय! यह लक्ष्मी कैसे रहेंगी भगवान के बिना? और कुबेर कैसे रहेगा? वह तो सर्वेंट है। तुलसीदास ने लिखा है, बड़ा मजेदार- 

*बिंधि न ईंधन पाइऐ सागर जुरै न नीर।*
*परै उपास कुबेर घर जो बिपच्छ रघुबीर।।*

अगर भगवान को आप नहीं मानते और ये कुबेर और लक्ष्मी की भक्ति करते हैं तो आपका क्या हाल होगा? विंध्याचल पहाड़ में इतने वृक्ष हैं और खाना पकाने को लकड़ी नहीं मिलेगी आपको। हां! इतना पानी भरा है समुद्र में, उंगली डूबोने को भी पानी नहीं मिलेगा। और अनंत धन है कुबेर के पास लेकिन वहां उपवास शुरू हो जाएगा, फाके पड़ेंगे। तो लक्ष्मी और कुबेर की भक्ति कर रहे हो और भगवान को विदा कर रहे हो! ये अजीब लोग हैं ना? हां! यह कृपालु बोल रहा है और कोई नहीं बोला आज तक। हां ! पूजा करवाते हैं और लक्ष्मी को सिर झुकाते हैं। और एक बात और बताएं आपको बड़ी मजेदार कि लक्ष्मी तो भगवान की अंतरंग शक्ति है। दिव्यानंद उनके पास है। और यह माया को लोग लक्ष्मी कहते हैं, माया को! यह जो संसारी संपत्ति है- सोना, चांदी, रुपया, मकान, जमीन इसको कहते हैं- लक्ष्मीवान है यह बड़ा! धनवान है इसलिए लक्ष्मीवान है! लक्ष्मीपति है! यह लक्ष्मी नहीं है यह तो माया है। संसारी वस्तु तो माया कहलाती है। यह पृथ्वी है ना! इसी से तो पैदा हुआ सोना, चांदी, हीरा। जितना भी आप लोग वैभव कहते हैं यह पत्थर सब है ना! यह मिट्टी से तो बने हैं। सोना कहां से निकलता है? इसी पृथ्वी से, चांदी इसी पृथ्वी से, हीरा इसी पृथ्वी से। वो जिसके पास अधिक हो गया वो लक्ष्मीपति हो गया! वो तो मायापति है। लक्ष्मीपति नहीं है कोई। लक्ष्मी तो भगवान की अंतरंग शक्ति है वो तो दिव्यानंद देती हैं मैटेरियल नहीं, स्पिरिचुअल हैप्पीनेस। लेकिन सब अजीब हैं ,अजीब काम करते हैं और चल रहा है परंपरा बस उसी प्रकार। आप लोग समझे रहिए आपको राधा कृष्ण की भक्ति करना है अनंत कोटि दुर्गा, लक्ष्मी, कुबेर सब अपने आप भागे आएंगे। आप सुप्रीम पावर की शरण में रहें और सबको अपने आप बिना बुलाये आने दें, डरे नहीं। लेकिन किसी का अपमान नहीं करें। हां! सबको नमस्कार है लेकिन मन बुद्धि का समर्पण श्यामा श्याम और उनके जन गुरु के प्रति होना है। ये रहस्य आज धनतेरस को आप लोग मस्तिष्क में रख लें।

*-प्रवचनांश भक्तियोगरसावतार अनंतश्रीविभूषित पंचम मूल जगद्गुरुत्तम १००८ स्वामि श्री कृपालु जी महाराज*

Saturday, 16 November 2024

प्रश्न - भगवान को भाव का भुखा क्यों कहा गया है ?

श्री महाराज जी द्वारा दी गई बहुत बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत ज्ञान और यह सावधानी बहुत जरूरी है, नहीं तो भगवान और गुरू के निमित्त कि गई सब सेवा, साधना ,दान , भजन-किर्तन निष्फल हो जाएगा ! सब किया हुआ जीरो गुणा सौ बराबर जीरो हो जाएगा । 
प्रश्न - भगवान को भाव का भुखा क्यों कहा गया है ?
उत्तर :- एक भुख का मतलव है आभाव में भुख और दुसरा आभाव नही है किसी चिज़ की , किसी चिज़ की कमी नहीं है , हर तरह से पूर्ण है फिर भी अपेक्षा करते हैं कि लोग हमें भोजन के लिए पुछे प्रेम भाव से । तो यहां भुख का मतलव है प्रेम भाव की अपेक्षा करना है । 
भगवान को सच में कोई व्यक्ति अगर किसी चिज़ का भुखा माने तो वो अज्ञानी है, भगवान को भावकग्राही कहना शास्त्र सम्मत है लेकिन उनको भाव का भुखा कहना और मानना शास्त्र विरुद्ध बातें हैं । 

भगवान प्रत्येक जीव के हित के लिए , उसके कल्याण हेतु उसके भावना को रीड करते हैं , इसलिए उनको भावक ग्राही कहा है शास्त्रों ने , लेकिन भगवान को भाव का भुखा कहना भारी मूर्खता है ।
भगवान किसी भी विषय वस्तु या भाव-वाव के भुखे नहीं है , उनको किसी चीज की कोई आवश्यकता या आभाव नहीं है । वो पूर्णकाम है निष्काम है , भला वो किसी चीज का भुखे क्यों रहेंगे ? उनको किस बात का आभाव है जो वो किसी भी चिज़ के भुखे रहेंगे ? 

भगवान का गुण है - पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते' -वृहदारण्यक उपनिषद ।
 वो परंब्रह्म भगवान श्री कृष्ण तो सभी प्रकार से सदा से परिपूर्ण है और परिपुर्ण रहेंगे । 
तो फिर भगवान को किसी चीज का भुख हो, यह सर्वदा असंभव है । इसलिए भगवान को भाव का भुखा कहना एक अपराध है । 

हां भगवान भावक ग्राही अवश्य हैं, वो भी अपने भक्तों के हितों के लिए केवल । भक्तों के दिव्य स्वार्थ (भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, विवेक ) को प्रदान करने के लिए अपने अकारण करूण स्वाभाव के कारण वो अपने भक्तों के द्वारा उनके प्रति अर्पित प्रेम भावना को, भक्ति भाव को , मायिक सेवा , मायिक साधना आदि को रीड करते हैं, नोट करते हैं और फल के रूप में उसे अपना प्रेम प्रदान करते हैं, आनंद प्रदान करते हैं , भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, विवेक, प्रदान करते हैं । 

चूकि जीव भगवान को और गुरू को केवल श्रद्धा भाव , प्रेम भाव , पूर्ण समर्पण, शरणागति भाव से , निष्काम सेवा भाव से हीं प्राप्त कर सकता है, इसलिए भगवान जीवों को अपनी भक्ति प्रदान करने के लिए अपने भक्तों से निष्काम प्रेम भाव की अपेक्षा करते हैं इसलिए उनको भावक ग्राही कहा गया है । 

हमारे गुरूदेव श्री महाराज जी भी तो सिर्फ हमारे कल्याण के लिए इस मायालोक में गोलोक से आए , इतना कष्ट उठाए वर्णा उनको किस चिज़ की कमी थी , वो तो पुर्णकाम हैं । भला उनको किस चिज़ की भुख थी या है , वो तो स्वयं भगवान का स्वरूप है , भगवान की सभी शक्तियां, सभी धन गुण के वे स्वामी है उनको इस गंदे संसार से भला क्या लेना देना । 

वो आए इस मृत्यु लोक में सिर्फ और सिर्फ हमारे कल्याण हेतु तथा अपने अकारण स्वभाव वश हमसे अपेक्षा करते हैं कि हम उनके अनुगत होकर , शरणागत होकर उनके बतलाए मार्गों का, सिद्धांतों का ठीक ठीक पालन करके सदा के लिए उनको प्राप्त करके इस मायालोक से मुक्त होकर सदा के लिए आनंदमय हो जाए । इसमें हमारा स्वार्थ है , उनका कोई स्वार्थ नहीं है । वो तो हर तरह से परिपूर्ण है , पुर्णकाम हैं , निष्काम है , उनको भला किस चीज की कमी ? 
अत: यह कभी मत सोचिएगा कि हम उनके निमित्त दानादि या किसी प्रकार से कोई सेवा करके उनका उपकार कर रहे हैं , यह भारी नामापराध हो जाएगा । 

हमेशा ध्यान रहे, हम हरि और गुरू के निमित्त जो भी सेवा , दान तथा साधना करते हैं, उनका रूपध्यान करते हैं , उनका गुन गाते हैं भजन किर्तन करते हैं, उनके सुख के लिए जी भी काम करते हैं वो दरअसल केवल और केवल अपने ही कल्याण हेतु कर रहे हैं, वर्णा भारी नामापराध हो जाएगा, आपका नुकसान हो जाएगा , सावधानी अति आवश्यक है । 

याद रहे यह सिद्धान्त ज्ञान कि एक समर्थ ही असमर्थ की सेवा कर सकता है , असमर्थ समर्थ की सेवा कभी नहीं कर सकता । 
इसलिए भगवान और गुरू सर्वदा समर्थ है और वे असमर्थ जीव की सेवा करते हैं उसको तत्वज्ञान देकर , उसका मायिक दान स्वीकार करके , उसकी मायिक साधना तथा सेवा स्वीकार करके । उसका मार्ग दर्शन करके , अपने साधकों का योगक्षेम वहन करके , उसकी हर तरह से रक्षा करके । 

इसलिए किसी भी जीव के मन में दान , सेवा , और साधना भजन किर्तन का अहंकार रत्ति भर भी न हो कि हम यह यह किए हैं और करते हैं और हम उनका बहुत बड़ा भक्त हैं ,बड़ा सेवक है, बड़ा साधक है , वर्णा सबकुछ समाप्त । अहंकार आया कि दीनता और आंसु गए और फिर सब जीरो बटा सौ बराबर जीरो हो जाएगा । 

जीव जब भगवद् प्राप्त कर लेगा , गुरू कृपा से समर्थ बन जाएगा तब उसको दिव्य सेवा मिलती है भगवान और गुरू की उनके गोलोक में । उस सेवा को प्राप्त करके वो अपना कल्याण सदा के लिए कर लेता है । 

:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन से प्रश्नों का उत्तर ।