Saturday, 6 March 2021

स्वामी विवेकानंदजी

स्वामी विवेकानंदजी ने देवी जगदंबा माता के पास केवल ‘ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य' की मांग की थी । यह क्यूं किया, इसका स्पष्टीकरण देते हुए स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं, ‘संसार में रहने वाले सैकडो विचार मेरे मनमें भरे रहते थे । पहले की तरह धन कमाने हेतु घरसे बाहर निकल पडा । अनेक प्रयास कर इधर-उधर घूम रहा था । एक एटर्नी के कार्यालय में थोडा-बहुत कार्य कर साथ ही कुछ पुस्तकों का अनुवाद कर कुछ धन कमाया तथा बडी कठिनाई से दिन कटने लगे थे; परंतु स्थायी तौर पर कुछ कार्य प्राप्त नहीं हुआ । अतएव मां एवं भाई के पोषण का स्थायी प्रबंध नहीं हुआ । कुछ दिनों पश्चात मन में विचार आया कि ईश्वर ठाकुर जी के (रामकृष्ण परमहंस) कथनानुसार करूंगा, इसलिए मां एवं भाईको अन्न-वस्त्र के अभाव के कारण होने वाले दुःख दूर करने हेतु उनसे विनती कर उनकी ओर से प्रार्थना करवा लूंगा । मेरे कारण ऐसी प्रार्थना करने के लिए वे कभी भी अस्वीकारकृत नहीं करेंगे । ऐसा विचार कर शीघ्र ही मैं दक्षिणेश्वर को पहुंचा तथा ठाकुरजी के पास हठ कर पुनःपुनः उन्हें कहने लगा, ‘मां एवं भाईके आर्थिक कष्ट दूर करने हेतु आपको जगन्माताके समक्ष प्रार्थना करनी ही होगी ।' ठाकुर जी ने उत्तर दिया, ‘पुत्र, यह बात मैं माता को नहीं बता सकता । तू ही स्वयं माता को यह बात क्यों नहीं बताता ? क्या तू माताजी को नहीं मानता ? अतएव इतने कष्ट तू भुगत रहा है ।’ मैंने बता दिया, ‘मैं तो माता को पहचानता भी नहीं हूं; आप ही मेरे लिए उन्हें बताइए । आपको बताना ही पडेगा । वैसा किए बिना मैं आपको बिलकुल नहीं छोडूंगा ।' ठाकुर जी ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया, ‘अरे, कितनी बार मैंने माता को बताया है कि माता, नरेंद्र के दुःख-कष्ट दूर कर; तू उसे नहीं मानता, अतएव माता सुनती नहीं है । ठीक है, आज मंगळवार है; मैं बताता हूं कि आज रात्री को तू काली मंदिर में जाकर माता को प्रणाम कर । तू जो कुछ मांगेगा, माता तुझे वह अवश्य ही प्रदान करेगी । मेरी माता चिन्मयी ब्रह्मशक्ति है । उसने अपनी इच्छा के अनुसार इस जगत को जन्म दिया है । उसकी इच्छा हो, तो उसके लिए क्या करना असंभव है ?' 

         ‘मेरा दृढ विश्वास था कि यदि ठाकुर जी ने इस प्रकार से सूचित किया है, तो उनके प्रार्थना करते ही निश्चित रूप से मेरे सभी दुःख दूर होंगे । अत्यंत बेचैन होकर मैं रात्रि की प्रतीक्षा करने लगा । धीरे धीरे रात्रि होने लगी । एक प्रहर बीत जानेके पश्चात ठाकुर जी ने मुझे काली मंदिर में जानेके लिए कहा । मंदिर में जाते-जाते एक प्रकार की गहरी नशा मुझपर छा गई, मेरे पांव लडखडाने लगे तथा क्या मैं माताको वास्तवमें देख सकूंगा एवं उनके मुंखसे निकलेवाले शब्द सुन सकूंगा इस प्रकार के स्थिर विश्वास के कारण अन्य सभी विषयों को भूलकर मैंने मेरा मन अत्यंत एकाग्र एवं तल्लीन किया तथा उसी बातपर विचार करने लगा । मंदिर में उपस्थित होने पर देखा कि वास्तव में माता चिन्मयी हैं, वास्तव में वह जीवंत हैं साथ ही अनंत प्रीति एवं सौंदर्य का उत्पत्ति स्थान हैं । भक्ति एवं प्यार से हृदय उछलने लगा; व्याकुल होकर पुनःपुनः प्रणाम कर कहता गया, ‘माता, मुझे विवेक, वैराग्य, ज्ञान एवं भक्ति प्रदान करें, वह भी ऐसे कि मुझे निर्विघ्न रूप से निरंतर आपका दर्शन प्राप्त होता रहे ।' हृदय शांति से भर गया । सारा जगत पूरी तरह अदृश्य हो गया केवल माता ही मेरे हृदय में व्याप्त हो गई । 

         पुनः ठाकुर जी के पास पहुंचते ही उन्होंने पूछा, ‘क्या संसार की न्यूनता दूर करने हेतु तुमने माता को प्रार्थना की ?' उनके प्रश्न से विस्मित होकर मैंने बताया, ‘नहीं महाराज, मैं भूल गया । अब मैं क्या करूं ?' उन्होंने उत्तर दिया, ‘जाओ, पुनः जाओ एवं प्रार्थना करो ।’ पुनः मैं मंदिर में गया । माताके सामने उपस्थित होने पर पुनः मोहित होकर सबकुछ भूल गया एवं पुनःपुनः प्रणाम कर ज्ञान-भक्ति प्राप्त होने हेतु प्रार्थना कर लौटकर आया । ठाकुर जी ने हंसते हंसते पूछा, ‘क्या इस समय तूने बताया ?' पुनः विस्मित होकर मैंने उत्तर दिया , ‘नहीं महाराज, माता का दर्शन होते ही एक दैवी शक्ति के प्रभाव के कारण सभी बातें भूलकर केवल ज्ञान-भक्तिलाभ के विषयमें ही मैंने बताया । अब क्या होगा ?' ठाकुर जी ने बताया, ‘वाह रे पुत्र, क्या तुमने स्वयं को थोडा संभाल कर यह प्रार्थना की ! यदि संभव हो, तो पुनः एक बार जाकर वह बातें बताकर आओ । जाओ, शीघ्र जाओ ।' लौटकर पुनः मंदिर में गया; मंदिर में प्रवेश करते ही अत्यंत शरम से मेरा हृदय भर गया । विचार करने लगा कि वास्तव में क्षुद्र सी यह बात माता को बताने हेतु आया था । यह तो ठाकुरजीके कथनानुसार ‘राजा को प्रसन्न कर लेने पर उसके पास कद्दु मांगने जैसी मूर्खता होगी ! क्या मेरी बुद्धि इतनी हीन हो गई है! शरम एवं घृणा से उमडकर माता को पुनःपुनः प्रणाम कर कहने लगा, ‘माता, मुझे अन्य कुछ नहीं चाहिए, केवल ज्ञानभक्ति प्रदान करें ।' मंदिर के बाहर आने पर मन में विचार आया कि निश्चित ही यह ठाकुर जी की लीला है । अन्यथा तीन-तीन बार माता के पास जाने पर कुछ भी बताने में असमर्थ रहना । तदुपरांत ठाकुरजी को मैंने अनुरोध से बताया कि निश्चित रूप से आपने ही मुझे ऐसे मोह में डाल दिया है, अब आपको ही बताना पडेगा कि मेरी मां एवं भाईको अन्नवस्त्र का अभाव न रहे । उन्होंने उत्तर दिया ‘अरे, इस प्रकारकी प्रार्थना मैं किसी के लिए कभी भी नहीं कर सका । मेरे मुंह से इस प्रकार की प्रार्थना बाहर निकलती ही नहीं है । तुझे मैंने बताया था कि माता के पास जो कुछ मांगेगा, वहीं तुझे प्राप्त होगा । तू माता के पास मांग न सका । तेरे भाग्य में सांसारिक सुख नहीं है, उसके लिए मैं क्या कर सकता हूं ?' मैंने बताया, ‘महाराज, यह कुछ नहीं चलेगा । मेरे लिए आपको यह बात बतानी ही होगी; मेरा दृढ विश्वास है कि आपके कहने पर मेरी मां तथा भाई के दुःख शेष ही नहीं रहेंगे । इस प्रकार जब मैं बारबार उनके पीछे पडा, तो उन्होंने बताया, ‘ठीक है, उन्हें खुरदरे अन्नवस्त्र की कभी भी न्यूनता प्रतीत नहीं होगी ।'

        सारांश, चित्तशुद्ध रहनेवाला उपासक मांग करेगा, तो केवल परमार्थ की ही ! जनकल्याण की ही ! तनिक भी स्वार्थका अंश उसकी मांगमें नहीं होगा । ऐसे उपसकोंकी इच्छापूर्ति द्वारा ही जगत का कल्याण निःसंशय होगा !

Thursday, 11 February 2021

संसार में संगति का सदैव ध्यान रखना चाहिये। जो मन, कार्य और बुद्धि से हंस हैं उन्हें कौओं की सभा से दूरी बनायें रखना चाहिये।

पद्मपुराण में एक कथा है- एक बार एक शिकारी शिकार करने गया, शिकार नहीं मिला, थकान हुई और एक वृक्ष के नीचे आकर सो गया। 
पवन का वेग अधिक था, तो वृक्ष की छाया कभी कम-ज्यादा हो रही थी, डालियों के यहाँ-वहाँ हिलने के कारण। वहीं से एक अतिसुन्दर हंस उड़कर जा रहा था, उस हंस ने देखा की वह व्यक्ति बेचारा परेशान हो रहा हैं, धूप उसके मुँह पर आ रही हैं तो ठीक से सो नहीं पा रहा हैं, तो वह हंस पेड़ की डाली पर अपने पंख खोल कर बैठ गया ताकि उसकी छाँव में वह शिकारी आराम से सोयें। 

जब वह सो रहा था तभी एक कौआ आकर उसी डाली पर बैठा, इधर-उधर देखा और बिना कुछ सोचे-समझे शिकारी के ऊपर अपना मल विसर्जन कर वहाँ से उड़ गया। 

तभी शिकारी उठ गया और गुस्से से यहाँ-वहाँ देखने लगा और उसकी नज़र हंस पर पड़ी और उसने तुरंत धनुष बाण निकाला और उस हंस को मार दिया। हंस नीचे गिरा और मरते-मरते हंस ने कहा: मैं तो आपकी सेवा कर रहा था, मैं तो आपको छाँव दे रहा था, आपने मुझे ही मार दिया?

इसमें मेरा क्या दोष? उस समय उस पद्मपुराण के शिकारी ने कहा: यद्यपि आपका जन्म उच्च परिवार में हुआ, आपकी सोच आपके तन की तरह ही सुंदर हैं, आपके संस्कार शुद्ध हैं, यहाँ तक की आप अच्छे इरादे से मेरे लिए पेड़ की डाली पर बैठ मेरी सेवा कर रहे थे, लेकिन आपसे एक गलती हो गयी, की जब आपके पास कौआ आकर बैठा तो, आपको उसी समय उड़ जाना चाहिए था। उस दुष्ट कौए के साथ एक घड़ी की संगत ने ही आपको मृत्यु के द्वार पर पहुंचाया हैं। 

शिक्षा: संसार में संगति का सदैव ध्यान रखना चाहिये। जो मन, कार्य और बुद्धि से हंस हैं उन्हें कौओं की सभा से दूरी बनायें रखना चाहिये।
कुसंग यानि गलत संगती , बुरे लोगों का संग भूल से भी हो जाए तो सज्जन को भी मौत मिल जाती है । इसलिए बुरे लोगों का संग , या बुरे लोगों से बहस या बुरे लोग जहां पर बैठे वहां से उठ कर समय रहते चला जाना चाहिए ।     :- संजीव ।

Saturday, 6 February 2021

आनंद पाने के लिए तो आज सारी दुनिया दौड़ रही है। खाने-पीने व मौज-मस्ती में लोग आनंद पाने के लिए ही संलग्न होते हैं। किंतु संसार के सभी सुखों का अंत दुख के रूप में होता है।

प्रत्येक जीव परमात्मा का ही अंश है , इसलिए हर जीव परमात्मा को प्राप्त करने के लिए हीं छटपटा रहा है। परन्तु परामात्मा से मिलने का आनंद जीव सांसारिक पदार्थों में ढूंढ़ा करता है। किन्तु क्षणभंगुर संसार में वह शाश्वत परम आनंद मिल ही नहीं पाता, क्षणभंगुर विषयों के आनंद में मस्त होकर जीव अपना परम लक्ष्य भुला देता है।

इस प्रकार बार-बार ८४ लाख योनियों में जन्म लेने व मरने के चक्र में फंसकर जीव दुःखी होता रहता है। लेकिन सामान्य तौर पर जीव ऐसा सोचता है कि यदि परमानंद न मिले तो सांसारिक आनंद तो मिले, लेना आनंद ही है क्योंकि यह आनंद से बिछड़ा हुआ उस परमआनंद को ढूंढता फिरता हैं-
आनंद आनंद सब कोई कहे, आनंद गुरु ते जानेयां।

आनंद पाने के लिए तो आज सारी दुनिया दौड़ रही है। खाने-पीने व मौज-मस्ती में लोग आनंद पाने के लिए ही संलग्न होते हैं। किंतु संसार के सभी सुखों का अंत दुख के रूप में होता है। अंत में मनुष्य को खाली हाथ ही इस दुनिया से कूच करना पड़ता है। वास्तव में शाश्वत आनंद पाने की युक्ति तो सद्गुरु की अनुकंपा से ही हासिल होती है। संसार के आनंद तो एक अवधि के बाद निश्चित रूप से समाप्त हो जाते हैं और जीव दुखी होकर हाथ मलता रह जाता है। 

जीव मन की कल्पनाओं में खोया-खोया संसारिक सुखों को ही शाश्वत समझ उसी में लीन हो जाता है। एक दिन ऐसा आता है कि संसार का सारा ऐश्वर्य छोडक़र उसे सदा के लिए इस संसार से विदा हो जाना पड़ता है। लेकिन उल्टे-सीधे विचारों में खोकर मनुष्य परम सत्य सिद्घांत को भूल जाता है और सांसारिकता की बेड़ी में जकड़ा रहता है। इस बात को इस दृष्टांत से समझा जा सकता है।

एक समय की बात है कि सांसारिकता में पूरी तरह से डूबे एक सेठ को देखकर एक महात्मा को दया आ गयी। वे सेठ के पास परलोक सुधारने का उपदेश देने के लिए पहुंचे। काफी दिनों तक वे सेठ को नाना प्रकार के दृष्टांत देते हुए यह समझाने का प्रयत्न करते रहे कि यह संसार सपने की तरह है। इसका मोह त्याग कर भगवान की भक्ति करने में ही भलाई है। महात्मा के उपदेश को सेठ ढंग से समझ नहीं पाया और सोचा कि ये तो खुद विरक्त संन्यासी हैं और चाहते हैं कि मैं भी घर-बार त्याग दूं।

उसने महात्मा से प्रार्थना की - महाराज! आप की बात पूरी तरह सही है। मैं भी चाहता हूं कि भगवान की भक्ति करना। किंतु अभी बच्चे अबोध हैं, बड़े होने पर जब उनकी शादी कर लूंगा तब परलोक सुधारने का यत्न करूं। तब महात्मा बोले - ये सांसारिक काम तो तेरे न रहने पर भी होते रहेंगे। यह तो तुम्हें अपने घर की चौकीदारी मिली है भगवान द्वारा। लेकिन तुम खुद मालिक बन बैठ गये। ठीक है, तुम अभी अपनी घर-गृहस्थी संभालो। बाद में भगवान की भक्ति कर लेना। लेकिन याद रहे, भवसागर से मुक्ति तो भगवान की भक्ति करने से ही मिलेगी। 

सेठ के सभी बच्चे बड़े हुए और शादी होने के बाद अलग हो गये। फिर वह महात्मा सेठ के पास आए और बोले- सेठ जी! अब ईश्वर की कृपा से सब कार्य सिद्घ हो गए हैं, कुछ समय निकाल कर भगवान का भजन-सुमिरन करो। बेड़ा पार हो जाएगा। सेठ बोला- महाराज! अभी तो पोते भी नहीं हुए। पोतों का मुंह तो देख लेने दीजिए। तब महात्मा बोले- मैं तुझे त्यागी बनने के लिए नहीं कहता। तू मूर्खतावश मेरे भाव को नहीं समझ पा रहा है। मेरे कहने का भाव तो यह है कि संसार के मोह और अज्ञानता के चंगुल से मन को हटाकर प्रभु की भक्ति में लगाओ। 

तब सेठ बोला- यदि मन प्रभु की भक्ति में लग गया तो संसार के धंधे कौन करेगा? वह मन कहां से लाऊंगा? बिना मन लगाये दुनिया के काम-धंधे और सांसारिक कर्तव्य पूरे नहीं हो पाते। महात्मा बोले- मैं तुम्हारे ही उद्घार के लिए कह रहा हूं कि बिना भगवान की भक्ति किए कल्याण नहीं होगा। सेठ बोला- पहले संसार के काम-धंधों से मुक्त तो हो लेने दो। परिवार का कल्याण पहले कर लूं, फिर आपकी सुनूंगा।

समय गुजरता गया और एक दिन सेठ का स्वर्गवास हो गया। प्रारब्धवश वह सेठ छोटा पिल्ला के रूप में पैदा होकर पुन: उसी घर में आ गया। तब उसके पोते ने रसोई में उसे घुसा देखकर जोर से डंडा मारा। डंडा लगते ही वह मर गया और फिर सांप का जन्म लेकर उसी घर में रहने लगा। एक दिन घर वाले सांप देखकर डरे और उसे मार दिया। फिर मोहपाश में बंधकर पुन: उसी घर की गंदी नाली में एक मोटे कीड़े के रूप में पैदा हुआ। 

उस कीड़े को देखकर सब घर वाले बड़े विस्मित थे। उन्हीं दिनों वे महात्मा भी घर में पधारे। सबने महात्मा जी को वह मोटा कीड़ा दिखाया। तब अन्तर्दृष्टि से उस महात्मा ने देखा तो पाया कि यह तो वही सेठ है। उसकी ऐसी दुर्गति देखकर उस महात्मा ने अपने जूते से उस पर प्रहार किया जिससे वह कीड़ा वहीं मर गया और सद्गति पाकर अगले जन्म में मानव शरीर पाया और फिर उसी महात्मा का सेवक बना जो उस समय के सद्गुरु भी थे।

यह दृष्टांत कोई ऐसी कथा नहीं जिसके सत्य होने का दावा किया जाए। किंतु इसे असत्य भी नहीं कहा जा सकता। इस दृष्टांत के माध्यम से लोगों को जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पाने के लिए प्रेरणा दी गई है जिससे मनुष्य क्षणभंगुर संसार के मोहपाश में न फंसे और अविनाशी सत्य से जुडऩे की चेष्टा आज और अभी से प्रारंभ कर दें। अंतत: मनुष्य को परमात्मा की भक्ति करके ही अपना जीवन कृतार्थ करना चाहिए। इसी वजह से सभी महापुरुषों ने मानव शरीर का सदुपयोग भगवान की भक्ति करने में ही बताया है। गुरुवाणी भी कहती है -

कहु नानक भजु राम नाम नित जाने होत उधार।

अर्थात भगवान के नाम का भजन सुमिरण करने में ही जीवन का अधिकांश समय बिताना चाहिए। ऐसा करने से ही भवसागर से जीव का उद्घार होता है।

वास्तव में संसार के काम धंधे जिनसे पेट भरता है और सांसारिक वैभव व सुख-समृद्घि की अभिवृद्घि होती है किंतु अंत समय में उन्हें यहीं छोडक़र जाना पड़ता है। कोई भी चीज साथ नहीं जाती। अविनाशी प्रभु की भक्ति से जो आनंद मिलता है, वही शरीर छूटने के बाद भी काम आता है। मानव तन के रूप में जीव को एक सुअवसर मिला हुआ है, कभी भी इस मौके से नहीं चूकना चाहिए।:- संजीव कुमार , रांची ।

Sunday, 31 January 2021

इन्हीं संतों के कृपा से हमारा देश और हमारा संस्कार‌ और संस्कृति जीवित है अमीट है ।

इन्हीं संतों के कृपा से हमारा देश और हमारा संस्कार‌ और संस्कृति जीवित है अमीट है । 
और ऐसें हीं संतों के कृपावल से , हमारे देश का अस्तित्व अमीट है । हम इन सबका ह्रदय से सम्मान करतें हैं । और अपने भावी पीढ़ी को शिक्षा देतें हैं कि हमेशा संतों का सम्मान करना , चाहे दुनिया कुछ भी कहे । किसी में दुर्भावना मत करना । 
इनके चरण रज को अपने मस्तक पर लगाना । 
जो एक वार भी ह्रदय से राधा नाम लेता है । हम उनके सेवक हैं । हमें अपने संतों पर नाज हैं । हम अपने सदगुरू देव कृपालु महाप्रभु का भक्त हैं‌। और उनकी हर आज्ञा हमारे लिए सिरोधार्य है । हम उनके संतों का अति सम्मान करतें हैं , उनके भक्तो का सेबक हैं । उनके जनों का दास हैं । यह हमारी भारतीए संस्कृति हैं । वैदिक संस्कृति और वैदिक आज्ञा का पालन करना हमारा आत्मीक कर्तव्य है । 
सियाराम मय सब जग जानी 
करहु़ं प्रणाम जोरी जुग पाणी ।।

अगर हम किसी संसारी के अपने प्रति या किसी भी दुसरे जीव के प्रति रूखे व्यवहार का विरोध करें , तो वो भी शालीनता से , संयमित और मर्यादित भाषा का प्रयोग से , सहजता , दीनता , सहिष्णुता पहले हमें खुद अपनाने के लिए हमारे गुरूदेव ने कहा हैं । 

राष्ट्र के नागरिक होने का फर्ज कैसे पुरा किया जाता है । यह भी हमारे गुरू देव ने मिशाल पेश किए हैं और अब दीदी लोग और मां कर रहीं हैं तिरंगा लहराकर और उसी सेवा को और आगे बढ़ा कर । केदार नाथ , कोशी बाढ़ पीड़ितों कि सहायता करना , तीन तीन होस्पिटल गरीबों के लिए, नी:शूल्क स्कूल , कौलेज आदि का निर्माण और संचालन उनके जन सेवा का परिचायक है , गौशाला आदि मिशाल तो है हिं परन्तु सबसे बड़ी सेवा है उनकी हम सभी को भगवद् संबंधी ज्ञान का दान करके हमारा परम कल्याण करना । 

देश का सम्मान , देश के शहिदों का सम्मान , और देश के प्रति हमारे फर्ज निर्वहन , निरीह जीवों के लिए , साधु संतों के लिए , गरीवों की सेवा के लिए हमारे कृपालु महाप्रभु का योगदान समुचे भारत के बुद्धिजीवियों के लिए मिशाल हैं ।
प्रेम मंदीर , प्रेम भवन , कीर्ति मंदीर , भक्ति मंदीर , भक्ति भवन आदि उनका देन है हमें प्रेरणा देने के लिए कि हरि गुरू की सेवा और उन्हीं से प्रेम करना हमारा अंतिम और सर्वोपरि लक्ष्य है।

श्री महाराज जी ने यह सब करके विश्व सेवक होने का एहसास हमें कराया है ठीक श्री कृष्ण की तरह । 
यह श्री कृष्ण के सीवा और कोई नहीं कर सकता , ममता की अपार समुद्र श्री महाराज जी में ऐसे हैं जैसे साक्षात राधारानी की करूणा बरसती है । वहीं गुण उन्होंने तीनों दिदियों और पुज्यनियां हमारी मां रासेस्वरी देवी जी को दिए हैं ।
हमने ऐसा गुरू पाया है । कि जो जीव उनको अपने ह्रदय में सच्ची निष्ठा से जैसे हीं धारण करना शुरू करता हैं , ह्रदय भगवद् प्रेम से भर कर अंखियां हरि दर्शन के लिए तरप उठती है । यही उनकी कृपा है , कृपा हो गयी , अब पाना क्या शेष है !
श्री राधे ।

एक प्रेरक प्रसंग हमारे देश के युवा से ( Must read):-आप बन्दर मत बनिए: -संजीव

एक प्रेरक प्रसंग हमारे देश के युवा से ( Must read):-
आप बन्दर मत बनिए

एक बार कुछ वैज्ञानिकों (scientists) ने एक बड़ा ही रोचक प्रयोग (interesting experiment) किया। उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से पिंजरे (cage) में बंद कर दिया और बीचों-बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे। जैसा की उम्मीद थी, जैसे ही एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ पड़ा। पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं, उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी। इससे वह घबरा गया और उसे उतर कर भागना पड़ा। 

पर प्रयोग (experimenters) यहीं नहीं रुके। उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया। बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए।

पर वे कब तक बैठे रहते? कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया। वह भी उछलता-कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा। लेकि अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया। और पहले की तरह इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी। उन्हें एक बार फिर पानी की ठंडी धार का सामना करना पड़ा।

एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए। थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाक्य हुआ। बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया, ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..

अब वैज्ञानिकों ने एक और interesting चीज़ की। उन्होंने अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया। नया बन्दर वहां के नियम (rules) क्या जाने, केले देखते ही उसके मुंह में पानी भर आया और वह तुरंत केलों की तरफ दौड़ पड़ा। पर यह देखकर बाकी बंदर अपने आप को रोक न सके। उन्होंने मिलकर उस नये बंदर पिटाई कर दी। नये बंदर को यह समझ में नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे। लेकिन एक बार पिटने के बाद उस भी यह समझ में आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया बंदर अंदर कर दिया। इस बार फिर वही हुआ। नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने वालों में शामिल था, जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!

प्रयोग (experiment) के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था। पर उनका व्यवहार (behaviour) भी पुराने बंदरों की तरह ही था। वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते थे।

दोस्तो, आप सोच कर देखि‍ए, क्या हमारे समाज (society) में भी यही बंदरों वाला व्यवहार (behaviour) देखने को नहीं मिलता है? जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है, चाहे वो पढ़ाई, खेल, एंटरटेनमेंट, business, राजनीती, समाजसेवा या किसी और field से related हो, उसके आसपास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं, उसे असफलता (failure) का डर दिखाया जाता है। और मजेदार (interesting) बात ये है कि उसे रोकने वाले ज्यादातर (maximum) लोग वो होते हैं जिन्होंने ख़ुद उस क्षेत्र (field) में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..

इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आसपास के लोगों के विरोध (opposition) का सामना (face) करना पड़ रहा है तो थोड़ा संभल कर रहिये। अपने तर्कों (logic) और क्षमताओं (guts) की ओर देखि‍ए, ख़ुद पर और अपने लक्ष्य पर विश्वास क़ायम रखिये और बढ़ते रहिये। कुछ बंदरों की ज़िद के आगे आप भी बन्दर मत बन जाइए...
:- Sanjeev Kumar , Ranchi 

Thursday, 28 January 2021

भगवान ने जवाब दिया :" संसार कीहर वस्तु तुझे मैनें हीं दी है। तेरे पास अपनीचीज सिर्फ तेरा अहंकार है, जो मैनेंनहीं दिया ।उसी को तूं मुझे अर्पण कर दे।

एक बार एक मेहमान किसी के घर
गया। वह अंदर
गया और मेहमान कक्ष मे बैठ गया। 
वह खाली हाथ
आया था तो उसने सोचा कि कुछ
उपहार देना अच्छा रहेगा।
तो
उसने वहा उसके घर में से टंगी एक पेन्टिंग उतारी
और जब घर का मालिक
आया, उसने पेन्टिंग देते हुए कहा, यह मै
आपके लिए
लाया हुँ। घर का मालिक, जिसे पता
था कि यह मेरी चीज
मुझे ही भेंट दे रहा है, सन्न रह गया !!!!!
अब आप ही बताएं कि क्या वह भेंट
पा कर, जो कि पहले
से ही उसका है, उस आदमी को खुश
होना चाहिए ??
मेरे ख्याल से नहीं....
लेकिन यही चीज हम भगवान के साथ
भी करते है। हम
उन्हे रूपया, पैसा चढाते है और हर चीज
जो उनकी ही बनाई
है, उन्हें भेंट करते हैं! लेकिन
मन मे भाव रखते है कि ये चीज मै
भगवान को दे रहा हूँ!
और सोचते हैं कि ईश्वर खुश हो
जाएगें। यह हमारी नादानी है !
हम यह नहीं समझते हैं कि उनको इन सब
चीजो कि जरुरत
नही। अगर हम सच मे उन्हे कुछ देना
चाहते हैं
तो हमें श्रद्धा के साथ, उन्हे अपने
हर एक श्वास मे याद
करना है , 
विश्वाश करना है हरि पर , गुरु पर , प्रभु जरुर खुश
होगें !!
किसी ने सच कहा है कि -

अजब हैरान हूँ भगवन
तुझे कैसे रिझाऊं मैं;
कोई वस्तु नहीं ऐसी
जिसे तुझ पर चढाऊं मैं ।

भगवान ने जवाब दिया :" संसार की
हर वस्तु तुझे मैनें हीं दी है। तेरे पास अपनी
चीज सिर्फ तेरा अहंकार है, जो मैनें
नहीं दिया ।
उसी को तूं मुझे अर्पण कर दे। अपने गुरु की हर बात मान , उनकी चरण- शरण में जा , तेरा
जीवन सफल हो जाएगा |

Saturday, 16 January 2021

हमारा सनातन माता पिता ।

याद रखो इस संसार में सभी का आसक्ति केवल धन से है , धन के बिना मां वाप भी नहीं पुछेगा एक समय एक बेटा आवारा हो जाए तो ।   अगर पति काम न करके धन से बीबी को , मां वाप , पुत्र पुत्री को या बीबी पति को खुश करेगा तो ।
इस लिए सबको केवल धन से आसक्ति है , पर भ्रम बस मां बाप कमाऊ पुत्र को मेरा बेटा , मेरा बेटा और पत्नी मेरा पति और बच्चा मेरा बाप करता रहता है , मर जाने पर प्रेम के लिए नहीं रोता है कोई वल्कि इस लिए रोता है सब की अब मेरा सहारा कौन होगा , कौन करेगा हमको ।
इसलिए संसार में स्वार्थ आधारित प्रेम है । निस्वार्थ नहीं । 
और मृत्यू के कुछ दिन सब लोग अपने मां बाप दादा दादी को भुल जातें हैं । 
अगर नहीं तो देखो अपने आप में कितनी बार आप अपने पुरखे , दादा दादी को याद करते हो । कितने लोग अपने दादा दादी , को याद करता है वो आज कल के जमाने में तो बच्चा अपने मां बाप का तस्वीर भी नहीं रखता है अपने बर्तमान निवास पर । पैतृक घर पर कहीं लटका हो तस्वीर तो अलग बात है । फिर वो दादा दादी का बात हीं मत पुछो । मैने तो युथ शीविर में बहुत से बच्चों से जब पुछता हुं उसके दादा दादी का नाम तो वो बता नहीं पाता है । 
अतः केवल और केवल हमारा सबका एक ही सनातन मां वाप है राधा कृष्ण , क्या हम उनके लिए कभी रोए , उनसे प्रेम करतें हैं ?
जबकी सारा बल उन्हीं से हमें प्राप्त होता है । 
और हम गद्दार कभी उनके लिए नहीं‌ रोए । धिक्कार है हमारे मानव जीवन को ।
उनके लिए मात्र रोओ ।
वही एक हमारे माता पिता हैं सनातन । हम आत्मा है शरीर नहीं । शरीर के सारे रिश्ते हैं संसार में । पर हम शरीर नहीं । शरीर त्यागा रिस्ते समाप्त  ।
पर  हमारा सब ख्याल रखने वाला सिर्फ और सिर्फ एक जगरनाथ जी हैं । उनसे प्रेम करो , उनके प्रेम में आंसु वहाओ केवल ।
संसारी के लिए नहीं , संसारी के प्रति अपना फर्ज पुरा करो इमानदारी से ।
किसी के धन संपत्ति का नूकसान ना करो ,‌किसी से रंग द्वेष मत करो , झूठ मत बोलो , नही तो अगले जनम में उसका नौकर बन कर चूकाना होगा । कम पैसे मिलेंगें , काम ज्यादा लेगा मालिक , चूकाना परेगा हीं । नहीं बच पाओगे ।
भगवान का संविधान हैं । उससे कोई नहीं बचेगा  और ना बचा है । 
इसलिए संसार के लिए अपना फर्ज निष्ठा के साथ पुरा करो और आसक्ति , प्रेम , केवल जगरनाथ जी से रखो । जगन्नाथ जी हीं राधा कृष्ण हैं । वहीं राम और सिता है । कोई अंतर नहीं । वे हीं हमारा असली  मां बाप है । 
श्री राधे । :- पुज्यनियां मां राजेश्वरी देवी ।