Friday, 17 May 2024

पुष्पक विमान।

शरीर छुटने के वाद कृष्ण दिवानो को श्री कृष्ण स्वयं अपना निज विमान भेज कर लिवाने भेजते है. दुनिया से मत उम्मीद रखो भइया ये तो आज साथ कल भुल जाते हैं , राधे राधे बोल राधे राधे बोल .

अतुलनीय पुष्पक विमान- बाल्मीकि रामायण मे स्पष्ट लिखा है कि शिल्पाचार्य विश्वकर्मा ने ब्रह्मदेव के लिये दोव्य पुष्पक विमान की रचना की। प्रभास नामक बसु की पत्नी महासती योग सिद्धा श्री देव शिल्पी विश्वकर्मा की माता है। देवताओं के समस्त विमानादि तथा अस्त्र-शस्त्र इन्ही के द्वारा निर्मित है। 
लंका की स्वर्ण पुरी द्वारका धाम भगवान जगन्नाथ का दारुक श्री विग्रह इन्होने ही निर्मित किया। इनका नाम त्वष्टा है। सूर्य पत्नी संज्ञा इनकी पुत्री है। इनके पुत्र विश्वरुप ओर वृत हुए सर्वमेघ के द्वारा इन्होने जगत की सृष्टि की ओर आत्म बलिदान करके निर्माण कार्य पूर्ण किया। समस्त शिल्प के ये अआदि देवता है। 
भगवान राम के लिये सेतु निर्माण करने वाले वानर राज नल इन्ही के अंश से उत्पन्न हुये थे। हिन्दू शिल्पी अपने कर्म की उन्नति के लिए भाद्रपद की संक्रान्ति को इनकी आराधना करते है। देवताओं के गृहकार उत्तम विमानों मे सबसे अधिक आदर पुष्पक विमान का ही होता था। जिसके निर्माता श्री विश्वकर्मा है। उस पुष्पक विमान का वाल्मीकि रामायण मे बडा विस्तृत वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है। 
मेघ के समान ऊंचा सुवर्ण के समान सुन्दर कान्तिवाला पुष्पक भूतल पर बिखरे हुए स्वर्ण के समान जान पडता था। अनेकानेक रत्नों से जडित, भाति-भांति के वृक्षों के फूलों से आच्छादित तथा पुष्पों के पराग से भरे हुए उस पर्वत शिखर के समान शोभा पाता था। विन्ध्यमालाओं से पूजित मेघ के समान रमणी रत्नों से देदीप्यमान था।
श्रेष्ठ हंसों द्वारा आकाश मे ढाये जाते हुए देखता था। बहुत ही सुन्दर ढंग से उसका निर्माण किया गया था जो अद्रात शोभा सम्पन्न दिखता था। अनेक धातुओं के कारण पर्वत शिखर गृहों और चन्द्रमा के कारण आकाश और अनेक वर्णों से युक्त होने के कारण वह विमान विचित्र शोभा सम्पन्न दिखता था। 
उस विमान की आधारभूमि सोने के द्वारा निर्मित कृत्रिम पर्वतमालाओं से बनाई गई थी। वे पर्वत वृक्षों की विस्तृत पंक्तियों से हरे भरे रचे गए थे। वे वृक्ष फूलों के बाहुल्य से व्याप्त बनाए गये थे। तथा फुलों की पंखुडियों से पूर्ण निमित्त थे उस विमान मे श्वेत भवन बने हुए थे। पुष्पक विचित्र वन और अद्धैत सरोवरों से चित्रित किया गया था। वह पुष्पक रत्नों की आभा से प्रकाशमान था और कही भी भ्रमण करता था। 
नाना प्रकार के रत्नों से विचित्रवर्ण के सर्पों का नक्काशी किया गया था। अच्छी जाति के घोडों के सुन्दर अंग वाले अश्व भी बनाए गये थे। उस पर पक्षियों के सुन्दर मुख और मनोहर पंख वाले बहुत से ऎसे विंहगम चित्र निर्मित थे जो साक्षात कामदेव के सहायक जान पड्ते थे। उनकी सारे फर्श , दिवाल मूंगे और सुवर्ण के बने फूलों से युक्त थी। तथा पक्षियां रूपी परियां लीलापूर्वक अपने पंखों को समेट रखा था। जो लक्ष्मी का अभिषेक करते हुए से नियुक्त थे। उनके साथ ही तेजस्विनी लक्ष्मी की प्रतिमा भी विराजमान थी। जिनका उन हाथियों द्वारा अभिषेक हो रहा था। इस प्रकारसुन्दर कंदराओं वाले पर्वत के समान तथा बसंत ऋतु मे सुन्दर कोटरों वाले परम सुगंध युक्त वृक्ष के समान वह विमान बडा मनोहारी था।  
उस विमान की विशेषता थी कि वह समयानुसार छोटा या बडा किया जा सकता था तथा उसमे मन की गति से चलने की क्षमता भी थी। अपने स्वामी की इच्छानुसार उसमे गति होती थी तथा चाहे जितने लोगों को यात्रा करवाने की पूर्ण क्षमता थी। जो आकाश मे स्वामी की इच्छानुसार भ्रमण कर सकता था। 
आज के अति वैज्ञानिक कहे जाने वाले युग के बने अति आधुनिक विमान भी उस पुष्पक विमान की जो श्री विश्वकर्मा द्वारा निर्मित था, कोई तुलना नही की जा सकती। ऎसा था वह विमान "पुष्पक विमान:। पुष्पक विमान का परारुप एवं निर्माण विधि ब्रह्मर्षि अंगिरा ने दी औए निर्माण साज-सजा भगवान विश्वकर्मा द्वारा"। जिससे वे शिल्पी कहलाये ।

Tuesday, 14 May 2024

वो सनातन धर्म , ( हिन्दु संस्कृति ) और इनमें और भगवान में दृढ़ आस्था रखने वाले साधु जन , सज्जन की रक्षा वो स्वयं करते हैं ।

पंचम मूल जगद्गुरूत्तम श्री कृपालू जी महाप्रभु के सिद्धांतों पर आधारित लेख, इस लेख का अंतिम भाग अवश्य पढ़ें :- 
हमें अगर अपने भगवान श्री कृष्ण पर भरोसा है तो फिर हम सनातनी इतना बैचैन क्यूं हैं कि सनातन धर्म को कोई समाप्त कर देगा ? ऐसा सोचने वाला गलत है। फुल मैड है ।
सनातन धर्म का उद्भव और अंत ।। ( एक सत्य चिंतन )

जिस प्रकार भगवान अनादि है उसी प्रकार हमारी आत्मा अनादि है और ठीक उसी प्रकार सनातन वैदिक धर्म आनादि है । 
हम कब से ? जब से भगवान हैं। भगवान कब से ? जब से हम है यानि आत्मा , शरीर नहीं है हम । भगवान और हम कब से जब से सनातन धर्म हैं । 

"यानि भगवान श्री कृष्ण हीं सनातन है । अत: भगवान श्री कृष्ण हीं सनातन वैदिक धर्म है । जिसको श्री कृष्ण में अनुराग नहीं वो अधर्मी है । ऐसे धर्म को त्याग देना चाहिए जो श्री कृष्ण चरणार वृंद में अनुराग न पैदा करता हो । श्री कृष्ण के चरणों में रति हीं धर्म है वांकि सब अधर्म है । वांकि सब कर्म धर्म चौरासी लाख योनियों में घुमाने वाला कर्म है । जबतक जीवात्मा भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अनुरक्ति प्राप्त नहीं करता , वो भव सागर में अन्य कर्म धर्म के चक्कर में बंधा हुआ दुख पाता रहेगा " :- श्री कृपालु जी महाराज ।।

तो हम तीनो का तीनों सनातन है । सनातन मतलब सदा से है ‌। तीनों की उत्पत्ति नहीं होती । न जन्म होता है । 
सिर्फ प्रकटिकरण होता है भगवान श्री कृष्ण के महोदर से । यानि भगवान श्री कृष्ण के संकल्प मात्र से सृष्टि होती है और उसी के साथ साथ सनातन धर्म ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों के साथ साथ प्रकट हो जाते हैं ।

और इन तीनों को अंत भी नहीं है । यानि भगवान , हमारी आत्मा और सनातन तीनों अजन्मा हैं ।
और इन तीनों को कोई भी समाप्त नहीं कर सकता कभी । स्वयं भगवान भी नहीं । 

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।।२३।। गीता ।

तो इसका भावार्थ तो आप सब लोग जानते हैं कि आत्मा हो या परमात्मा इसको किसी भी बिधि से कोई समाप्त नहीं कर सकता है स्वयं भगवान भी नहीं । 

तो यह स्वत: सिद्ध है कि तीनों का जन्म नहीं होता , तीनों का अंत किसी भी विधि नहीं हो सकता । 
तो तीनों को समाप्त करने का कोई सोचें अगर तो वो फुल मैड है । थोड़ा या हाफ नहीं फुल मैड । 

तो फिर हम सनातनी इतना बैचैन क्यूं हैं कि कोई सनातन धर्म को समाप्त कर देगा ? ऐसा सोचने बाला अगर कोई है तो उसका दिमाग ठीक नहीं है , उसे डौक्टरों के पास जाना चाहिए ।
 कुछ लोग परेशान रहते हैं फलां फलां धर्म बाले , अपना जनसख्यां विस्फोट करके पुरे धरती पर फ़ैल जाएंगे और सनातन एक दिन खत्म हो जाएगा , मैं कहता हुं वो भोले हिन्दु है जो ऐसा सोचतें है । उनको खुद पे अपने सनातन धर्म पे और अपने ईष्ट पर भरोसा विल्कूल नहीं है यह उनकी चिंता साबित करती है । 

कलयुग में सनातन धर्म नहीं लुप्त होगा । हां इसको मानने वाले कि संख्या कम जरूर होती जाएगी , कोई नहीं रोक सकता इसको । उसका कारण कलयुग कि प्रकृति है । कलयुग कि प्रकृति हीं ऐसी है कि दिव्यता धीरे धीरे अंतर्ध्यान होती जाएगी । धर्म कुछ लोगों तक सीमित हो जाएगा । पाखंडियों , विधर्मियों , अधर्मियों कि संख्या बढ़ती जाएगी । पाप बढ़ेगा पृथ्वी पर , लोग अवसाद में रहेंगे । रोग बढ़ेगा । पुण्य का क्षय होगा । धर्म के नाम पर बाचालो कि संख्या बढ़ेगी । मानवता समाप्त होगी । दैविक गुणों का क्षय होगा । 

पृथ्वी पर आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग होंगे । कुछ बचे हुए वास्तविक सनातन वैदिक धर्मावलंबी को सताया जाएगा । भगवान के वास्तविक भक्तों को सताया जाने लगेगा । 
फिर भगवान श्री कृष्ण अपने वास्तविक भक्तों के दुख को नहीं बर्दास्त कर पाएंगे और फिर उनका एक क्रोधावेशित अवतार कल्कि के रूप में होगा । 
पुरी पृथ्वी के आसुरी वृत्ति वाले जीव का संहार करेंगे और सनातन वैदिक धर्म कि पुर्नस्थापना करेंगे वो । 

भगवान सर्व समर्थ है । वो अपनी सत्ता की रक्षा स्वयं करते हैं । वो किसी भी जीव और महापुरुष को भी यह अधिकार नहीं देते । 
वाकी सब शक्ति अपने संत अपने जन और महापुरूषों को दे देते हैं , पर दो कार्य सदा अपने पास रखते हैं ‌ । सत्ता कि रक्षा और मानव के कर्म फल नोट करके उसे फल प्रदान करना स्वयं करते हैं । 

"सुनहु तात यह अकथ कहानी। 
समुझत बनइ न जाइ बखानी॥ 
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। 
चेतन अमल सहज सुख रासी॥1॥" - उत्तरकांड 7.117

और उसी प्रकार सनातन धर्म भी अजन्मा है और अविनाशी है । स्वयं भगवान भी स्वयं को , किसी भी आत्मा को और ना सनातन धर्म का मिटा सकते हैं कभी । तो फिर मानवों दानवों कि औकात ही भला क्या है ? भोले सनातनी इतना हाय तोबा , चित्कार क्यूं कर रहें हैं मुझे समझ में नहीं आता ?

भगवान का काम है रक्षा करना , उनका पहला काम है अपने सत्ता की रक्षा करना, सत्ता मतलव जीवात्मा , माया यानि संसार और दुसरा काम है अनंत ब्रह्माण्ड के अनंत जीवों के मन में उठे संकल्पों को नोट करना । याद करिए श्री कृपालु महाप्रभु जी का दिया तत्वज्ञान ।
तो जब भगवान अपनी सत्ता , मतलब सनातन धर्म यानि नियम , यानि उनका संविधान यानि वेद् पुराण उपनिषद आदि सब की रक्षा वो स्वयं करते हैं । और अपने जन खुद पर भरोसा करने वाले , आस्था रखने वाले सज्जनों की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं । और जिस बसुंधरा पर अवतरित होते हैं उस भारत देश की रक्षा भी वही करते हैं तो चिंता कैसी ?
उन्होंने स्वयं कहें है :- 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ :- गीता ।

उनका उद्घोष है - वो सनातन धर्म , ( हिन्दु संस्कृति ) और इनमें और भगवान में दृढ़ आस्था रखने वाले साधु जन , सज्जन की रक्षा वो स्वयं करते हैं ।

 दुष्ट कुधर्मी , व्यभिचारी , राक्षसों , असुरों का उत्पात जब जब लिमिट से बढ़ जाता है तो वो खुद इन सबका एक साथ काम तमाम कर देतें हैं । 
और किए भी है । हम सभी जानते हैं । हिरण्यकशिपु का और उसके साम्राज्यों का , हिरण्याक्ष का और उसके साम्राज्य से लेकर त्रेता में रावण और उसके साम्राज्य लंका से लेकर द्वापर में कंश आदि सब का बजूद मिटा दिए ।
तो फिर हम सनातनी इतना भयभीत क्यों ?
भय का मतलब की हमें अपने भगवान पर , अपने इष्ट पर अपने सनातन हिन्दु धर्म पर भरोसा नहीं । 

सभी जानते हैं कि एक सनातन धर्म ही अजन्मा है और इसका अंत कभी नहीं हो सकता । 
और वांकी सभी बिचारधारा है , पंथ है जो मानवकृत है , जिसका प्रदुर्भाव हुआ है अलग अलग समय में किसी के बिचार के कारण । पीछले हजार दो हजार तो ढाई हजार साल में जिस पंथों कि उत्पत्ति हुई है मानवों द्वारा उसकी समाप्ति निश्चित है । 
क्योंकि जिसकी उत्पत्ति होती है उसका एक दिन समाप्ति अवश्य होता है । 

एक और बात , सभी बिचार धारा उसी सनातन धर्म रूपी मूल( जड़ ) से निकला जिसका मूल जड़ तना हिन्दु है और वांकी‌ सब शाखा हीं तो है ।
अब कोई बिचार धारा यह सोचे , कोई शाखा यह सोंचे की अपने हीं मूख्य तना और जड़ को समाप्त कर देंगे तो वो फुल मैड है । फुल मैड । वो खुद ही समाप्त हो जाएगा ।

और फिर भी नहीं माना तो भगवान तो कहा है हीं कि :- 
 यदा यदा हीं धर्मस्य ..... 

तो होना ही है कल्कि अवतार और फिर एक बार असुर और उनका साम्राज्य समाप्त होगा । 
और वो भी नहीं बचेंगे जो हिन्दु में जन्म लेकर अपने ही जड़ में जहर घोलने का प्रयास कर रहें हैं , जैसे कौरव समाप्त हो गए जो सनातन धर्म के विधान के विरूद्ध काम किया । भगवान कृष्ण के विरूद्ध खड़ा हो गया था दुर्योधन , वो भी समाप्त हो गया । 

तो मेरी आप सभी हमारे सनातन धर्मावलंबी भाइयों से प्रार्थना है कि चिंता ना करें , विधर्मियों से न उलझे । अपने भगवान की भक्ति करें , अपने महापुरुषों और संतों का , देश भक्तों का सम्मान करें । और दृढ़ आस्था रखें । दूसरे की बुराई ना करें । अपने सनातन का प्रचार करें , अपने असली संतों के बारे में और भगवान ईष्ट की चर्चा करें । सत्संग करें । 
और अपने शरीर के लिए जिविका के लिए सनातन धर्म के पथ पर चल कर शुभ कर्म करें । 
सबसे प्रमुख सिद्धांत कि अगर आप किसी से भी नफरत करेंगे , द्वेष करेंगे , और यह आपके मन में चरित्र में , सोंच में संकल्प में जम जाएगा तो फिर आप अगले जन्म में उसी धर्म में , उसी पंथ में हीं नहीं उसी धर्मावलंबी के घर जन्म लेंगे । 

जहां आपका राग द्वेष अधिक होगा उसी की प्राप्ति आपको अगले जन्म में होगी ।‌
तो अगर आप किसी भी पंथ विशेष, धर्म विशेष या विचारधारा विशेष , समुदाय विशेष या व्यक्ति विशेष से नफरत करेंगे तो फिर समझ लीजिए कि उसी में आपको अगला जन्म मिलेगा । 
तो यह तो आप खुद के लिए गढ़ा खोद रहे हैं । याद रखिए धर्म हमारी रक्षा करता है, हम धर्म कि रक्षा नहीं कर सकते । हम धर्म का पालन कर सकते हैं केवल । और श्री कृष्ण भक्ति हीं धर्म है । वांकि से उदासीन रहना श्रेयकर है ।। 
:- पंचम मूल जगद्गुरूत्तम श्री कृपालू जी महाप्रभु के सिद्धांतों पर आधारित लेख । - संजीव कुमार ।

प्रश्न - कुछ लोग धर्म कर्म तथा तत्वज्ञान जानते हुए भी भगवान कि ओर नहीं चलते और कुछ लोग किसी महापुरुष से थोड़ा सा जानते हीं तुरंत संसार से एवाऊट टर्न लेकर गुरू के शरणागत होकर भगवान के हो जाते हैं , क्या कारण है ? उत्तर :- इस बात को समझने के लिए दो सबसे बढ़िया उदाहरण है - एक अर्जुन का और दुसरा दुर्योधन । दोनो महत्त्वपूर्ण है इस बिषय को जानने ,‌ समझने के लिए ।

प्रश्न - कुछ लोग धर्म कर्म तथा तत्वज्ञान जानते हुए भी भगवान कि ओर नहीं चलते और कुछ लोग किसी महापुरुष से थोड़ा सा जानते हीं तुरंत संसार से एवाऊट टर्न लेकर गुरू के शरणागत होकर भगवान के हो जाते हैं , क्या कारण है ? 
उत्तर :- इस बात को समझने के लिए दो सबसे बढ़िया उदाहरण है - एक अर्जुन का और दुसरा दुर्योधन । दोनो महत्त्वपूर्ण है इस बिषय को जानने ,‌ समझने के लिए ।

याद होगा सबको कि भगवान पांडवों के तरफ से शांतिदूत बन कर गए थे हस्तिनापुर में । धृतराष्ट्र के दरवार में दरवारियों कि सभा बैठी हुई थी । 
भगवान श्री कृष्ण दुर्योधन को समझा रहें हैं कि पांच गांव हीं दे दो पांडवों को सिर्फ। भगवान ने बहुत लौजिक दिया कर्म धर्म का भरी सभा में ।
पर दुर्योधन कहता है भगवान् को कि - 

" जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः। 
केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोस्मि तथा करोमि॥' 
यानि मैं जानता हूँ कर्म-धर्म अच्छी तरह से लेकिन मेरी प्रवृत्ति इनमें नहीं है , मेरी रूचि इन बिषयों में नहीं है । और मैं अधर्म भी जानता हूँ अच्छी तरह से , लेकिन मेरी निवृत्ति न हुई इससे , यानि संसार से आसक्ति समाप्त नहीं हुआ । भोग विलास तथा सत्ता से मुझे वैराग्य नहीं हुआ है इसलिए मैं कर्म धर्म को जानते हुए भी इससे विमुख हुं । 

मतलव वो कह रहा है कि " हे कृष्ण मुझे प्रवचन मत दिजिए धर्म क्या है अधर्म किसे कहते हैं यह मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं, पर मैं क्या करूं ? मेरा न धर्म में प्रवृत्ति हो पा रही और ना अधर्म से निवृत्ति हो पा रही है ।‌ क्योंकि मेरी मनोवृत्ति हीं ऐसी है । मतलव मेरी ( व्यक्तित्व )पर्सनैलिटी हीं ऐसी है ।
हे कृष्ण एक हीं गुरू द्रोण और कृपाचार्य कुल गुरू के हम सब शिष्य हैं (यानि कौरव सौ भाई और पांडव पांचों भाई ) । दस हजार हाथियों का बल भीम में हैं तो मुझमें भी दस हजार हाथियों का बल है पर हम दोनों की मनोवृत्ति अलग अलग है । इसलिए प्रवृत्ति भी अलग अलग है। "

अब आप सब यह भी जानते हैं कि अर्जुन क्या पुछा भगवान से, जब गीता का ज्ञान दे रहे थे भगवान कुरूक्षेत्र में । 
अर्जुन पुछ रहा है :- 
चंचलं हि मन:कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।। ( गीता.६.३४)
वो कहतें हैं भगवान से की यह मन हीं तो बश में नहीं है , मन का ही गुलाम हुं मैं , आप कहें तो मैं हवा का रूख को मोड़ दु़ , नदी के धारा को बदल दुं , पर मन को बश में करना बहुत कठीन है । इसलिए हे श्री कृष्ण यह बतलाइए मैं अपने मन को बश में कैसे करूं ? हे जगद्गुरु श्री कृष्ण मैं अपने मन बुद्धि को आपमें कैसे निवेश कर दूं । यानि आपकी शरणागति कैसे करूं ? 
तब भगवान बोलते हैं कि - 
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।(गीता 6.35।।)
(आप सब भावार्थ जानते हैं इसका । लिखने की जरूरत नहीं है ।)
 अर्जुन को तत्वज्ञान में रूचि है , वो तत्वज्ञान अपने सखा श्री कृष्ण से नहीं वल्कि उनको गुरू मान कर समझने में रूचि दिखाई और इस प्रकार गीता का प्रकटीकरण हुआ जगद्गुरु श्री कृष्ण के मुख से । 

अर्जुन जानता था यह बात कि ज्ञान तो भगवद स्वरूप गुरू से हीं मिल सकता है भगवान से डायरेक्ट नहीं , इसलिए बड़े बुद्धिमत्ता से उसने श्री कृष्ण को गुरू मान कर , तथा बोल कर संबोधित किया । 
अब गुरू को अपने शिष्य के अज्ञान को मिटाना हीं होगा । इसलिए भगवान सत्तरह अध्याय तक अर्जुन के प्रश्नों तथा परिप्रश्नों का जबाब देते रहे । यह संबाद हीं गीता है । 
अंत में अर्जून शरेंडर कर देता है खुद को ( हालाकी अर्जुन पहले से हीं महापुरुष हैं, हम जीवों के शिक्षा के लिए वो यह सब कर रहा हैं , पांडव शरेंडर तो पहले से हीं है भगवान के प्रति । इसलिए तो अर्जुन भगवान‌ से सेना ना मांगकर भगवान को ही मांग लिया था । )

तो दोनों में अंतर है । अर्जुन को प्रपत्ति यानि शरणागत है ।
प्रपत्ति मूला भक्त हैं अर्जुन यानि शरणागत भक्त है वो , इसलिए उसका मनोवृत्ति बदल गया है , मनोवृत्ति बदल गया तो उसकी प्रवृत्ति यानि आचरण धर्मानुकूल हो गया है। इसलिए उसका व्यक्तित्व बदल गया है , इसलिए आज भी अर्जुन के प्रति लोगों का आकर्षण है, आदर है , अर्जुन का व्यक्तित्व आकर्षित करता है सज्जन को । 
पर दुर्योधन का वृत्ति नहीं बदला ,, वो प्रपत्त नहीं है। किसी का भी नहीं , भगवान‌ को तो छोड़िए यहां तक कि ना भीष्म का , न तत्वज्ञानि ताऊ श्री विदुर जी का और न अपने गुरू का ।

 क्योंकि वो माया के दुर्गुण रूपी शकुनी से प्रभावित हैं इसलिए उसकी निवृत्ति अधर्म से नहीं हुआ अंत तक । जैसी संगती वैसी मनोवृत्ति, जैसी मनोवृत्ति वैसी प्रवृत्ति , जैसी प्रवृत्ति वैसी वृत्ति , जैसी वृत्ति वैसा संकल्प , जैसा संकल्प वैसा दृष्यमाण कर्म - यह सिद्धांत है वेद का ।
अत: उसकी मनोवृत्ति अशुद्ध है इसलिए वो उपहास का पात्र है आज भी । और यही कारण था कि अग्नी पुत्री यानि यज्ञशैनी द्रोपदी उस पर व्यंग करते हुए कहा की अंधे का पुत्र अंधा , क्योकि एक स्वाभाविक विकर्षण था उसके प्रसनैल्टी में । मजाक का पात्र बना लिया था खुद को दुर्योधन । अत: गलत लोगो से दुर रहना श्रेयकर है । 

यही कारण है कि तत्वज्ञान केवल जानने से , या समझने से या सुनने से कुछ नहीं होगा । हम संगति किसका कर रहे हैं ? यह महत्वपूर्ण है । जिसकी जैसी संगति उसकी वैसी प्रवृत्ति अपने आप हो जाती है । जिसकी जैसी प्रवृत्ति वैसा आचरण हो जाता है । 
इसलिए हमारे गुरूवर ने कहा है , आदेश दिया है हमें कि सत्संग भले न मिले , या कम मिले लेकिन कुसंगी से दुर रहो । संगति अच्छे लोगों का करो, अच्छे साधकों का करो । 
तब व्यक्तित्व बदलेगा , व्यक्तित्व बदलेगा तो संकल्प भक्ति अनुकूल होगा । संकल्प भक्ति अनुकूल होगा तो वृत्ति शुद्ध होगी । अंत:करण शुद्ध होगा । अंत:करण शुद्ध होगा तो गुरू उसमें दिव्य शक्ति देगा । जब दिव्य शक्ति मिलेगा तो लक्ष्य मिल जाएगा । 

तो यही कारण है कि कलयुग में अधिकतर लोगों कि रूचि हीं नहीं है तत्वज्ञान में । गलत संगति के कारण प्रसनैल्टी डिजऔर्डर का शिकार है अधिकतर लोग आज और कष्ट पाने के बाद भी समझ नहीं । अच्छी बातें न पढ़ना चाहते हैं और न सुनना । केवल मादक बिषयों को सुनने में और उसमें लिप्त रहने में ही रूचि है अधिकतर की । 

 अब बात करते हैं कि यह व्यक्तित्व बनता बिगड़ता कैसे हैं । तो यह अंत:करण चातुष्ट्य के विज्ञान का कमाल है ।
आप सब जानते हैं कि यह अंत:करण चातुष्ट्य क्या हैं ?
मन , बुद्धि , चित् और अहंकार को अंत:करण चातुष्ट कहते हैं । तो ऐ मन क्या है बुद्धि क्या है ,‌ चित् किसे कहतें हैं , अहंकार क्या हैं ? यह कहां रहता है शरीर में कैसे काम करता है यह ? कैसे यह संस्कार को शुद्ध करता है !
फिर यह मशीन‌ कैसे हमारा उद्धार करता है और बर्बाद भी ? 
कैसे यह शुद्ध होता है कैसे और कैसे अशुद्ध हो जाता है ?
तो यह एक विज्ञान है इस पर चर्चा अगले पोस्ट में होगी । 
:- पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन का जीस्ट ( सार )

Sunday, 12 May 2024

सत्य कि स्थापना असत्य के द्वारा नहीं हो सकता कभी । धर्म कि स्थापना अधर्म से नहीं किया जा सकता कभी । सत्य को झूठ के द्वारा कभी सावित नहीं किया जा सकता है । न्याय को अन्याय से नहीं पाया जा सकता है कभी । यह अकाट्य सिद्धांत है ।

सत्य कि स्थापना असत्य के द्वारा नहीं हो सकता कभी । 
धर्म कि स्थापना अधर्म से नहीं किया जा सकता कभी ।
 सत्य को झूठ के द्वारा कभी सावित नहीं किया जा सकता है । 
न्याय को अन्याय से नहीं पाया जा सकता है कभी । यह अकाट्य सिद्धांत है । 
धर्म के आर में कुछ लोग अधर्म करते हैं ।‌ धर्म के नाम पर आज कलयुग में लोग अधर्म करते हैं । भगवान के नाम पर कुछ लोग पाखंड करते हैं । 
ऐसे लोगों का अंत गति बहुत भयावह होती है । और मरने के बाद रो रो नरक में जाते हैं , हनुमान जी को चमत्कार दिखाने की लालसा नहीं होती है । वो भगवान है । भगवान अपने बनाए नियम को नहीं तोड़ते । हनुमान जी स्वयं भगवान है और उनके भी ईष्ट श्री राम अल्टिमेट भगवान हैं । उनके लिखे विधान का निरादर हनुमान जी करेंगे ऐसा सोंचना भी महापाप है । 
भगवान श्री राम ने किसी के पुर्व कर्म का फल लिख दिया उसको भला हनुमान जी कैसे बदल सकते हैं ?
भगवान के नाम पर अपनी मर्जी चलाना और अनाधिकारी के कर्म फल को बदलने का दावा करना सनातन वैदिक धर्म तथा वेद के प्रतिकूल है । ऐसे पाखंडियों से आस्तिकों को बचना चाहिए। 
भला चाहते हैं अपना तो हमेशा शुभ कर्म करने का संकल्प लें और आज से करना शुरू कर दें , देखिए किस्मत कैसे बदलती है । भाग्य कैसे बदलती है आपकी । 
मनुष्य का भाग्य मनुष्य का शुभ कर्म हीं बदलने में सक्षम है । और कोई नहीं । 

कर्म प्रधान विश्व करि राखा , जो जस करहीं सो तस फल चाखा ,- भगवान का यह सिद्धांत सभी संसारी लोगों के लिए है । संसारिक भोग कि बस्तुओं की प्राप्ति के लिए विश्व में कर्म का विधान है । 

और "होईहे वहीं जो राम रची राखा" को करि तर्क बढ़ावही शाखा - यह नियम भगवान तथा गुरू के शरणागत जीवों के लिए है । शरणागत जीव का काम तथा फल भगवान की इच्छा से होता है । भगवान हीं शरणागत जीव का कर्म करते हैं । वो जीव उनके इच्छा के विरुद्ध नहीं जाता । भगवान के प्रत्येक इच्छा को वो सहर्ष स्वीकार करता है ।‌

शरणागत जीव भगवान से भगवान का प्रेम , उनकी सेवा , उनकी भक्ति , उनका ज्ञान और वैराग्य चाहता है ,‌संसार नहीं ।‌

संसार की प्राप्ति के लिए तो कर्म का विधान है । और भगवान की प्राप्ति के लिए पुर्ण शरणागति का विधान है । 

एक असली महापुरूष और संत कभी आशिर्वाद का नाटक नहीं करता है । असली संत कभी भगवान के कर्म फल विधान में दखल नहीं देते हैं ‌। और जो देने का नाटक करता है , वो संत के भेष में बहुरूपिया है ‌, उसका विनाश उसके पाप का घड़ा भरने के बाद स्वत: हो जाता है । ऐसे लोग अपना तो अहित करते हीं है धर्म विरूद्ध आचरण, भगवान विरोधी आचरण करके अपने अनुयायियों को भी रौ रो नरक में पहुंचाने का गंभीर पाप करते हैं । इनको कहीं मुक्ति नहीं मिलती । इनको फिर कभी मानव शरीर नहीं मिलता ।

 इसलिए हमेशा वास्तविक महापुरूष के यहां जाएं । कभी संसार कि कामना न हो । सब उन पर छोड़ दें । वो जो करते हैं जीव के कल्याण के लिए करते हैं । वास्तविक संत पर पुर्ण श्रद्धा और विश्वास रखें । 

अनाधिकार कुछ भी पाने के लिए पाखंडियों के शरण में न जाएं ‌ । 
क्योंकि पाखंडियों के पास न खुदा यानि न भगवान हीं मिलेगें और न कभी विशाले सनम ( यानि संसारिक वैभव ) मिलेगा । 
आप न इधर के रहेंगे और न‌ उधर के । 
जो है आपके पास धर्म , कर्म पुण्य वो भी छीन जाएगा पाखंडियों के यहां जाने से । 
इसलिए समझदारी से काम लें । 
हर पीला बस्तु सोंना नहीं होता । 
हर चमकने वाला पत्थर हीरा नहीं होता । 
अत: संत के भेष में अधिकतर बहुरूपिया भरा परा है , पाखंडी भरा परा है । 
असली संत न मिले न सही लेकिन बहुरूपिया के चक्कर में अपना सबकुछ न‌ गवाएं । सत्संग न मिले न सही लेकिन कुसंग में न फंसे कभी ।। 
असली संत को पाने के लिए भगवान के सामने रोया करें ह्रदय से । असली संत मिल जाएंगे । :- संजीव कुमार। 
श्री राधे ।

Tuesday, 30 April 2024

श्री महाराज जी द्वारा रचित पुस्तकें तथा अन्य शास्त्र।

सबसे पहले तो यह बता दूं कि श्री महाराज जी कि यह तस्वीर हाथों से बनाई गई है । और उनके द्वारा प्रकट किए गए तथा संकलित किए गये दुर्लभ दिव्य तत्वज्ञान से भरे पुस्तकों का नाम जो गागर में सागर के तुल्य है तथा जिसे पढ़ने एवं ग्रहण करने का सौभाग्य अति सौभाग्यशाली जीवों को हीं मिलता है, पुस्तक का नाम आगे दी गई है । शेष जीव दुर्भाग्य बस श्री महाराज जी के दिव्य तत्वज्ञान के प्रति लालसा , जिज्ञासा , उत्कंठा आदि उत्पन्न नहीं कर पाते हैं क्योंकि तत्त्वदर्शन काफी दुर्लभ वस्तु है जो संसारिक बिषय भोग से परे है । 
मानव शरीर पाकर भी 99% में से अनेकों भाग्यशाली जीव किसी के द्वारा समझाने के बाबजूद भी इन पुस्तकों का अवलंब नहीं ले पाते हैं क्योंकि उनकी प्रवृत्ति केवल संसारिक बिषय भोग के तरफ हीं है । 

साथ ही साथ कुछ हमारे सनातन धर्म परंपराओं के पवित्र शास्त्रों का नाम जो भारत को विश्व गुरू का गौरव प्रदान किया जो आजकल कुछ अति कुतर्की, कुबुद्धि, अधर्मी, लोभी , स्वार्थी, भ्रांत ज्ञानी , प्रमादी , कर्णपाटव से ग्रसित तथा भ्रमित चंद लोगो के कारण कलयुग में धुमिल हुआ है जिसे फिर से श्री कृपालु जी महाप्रभु द्वारा आसान बना कर सरल भाषा में समन्वय करके पुनर्जीवित किया गया है । जिस बल से हमारा भारत एक बार फिर से अपने खोय हुए गौरव को पुनर्स्थापित करने की ओर बढ़ रहा है । 

हमारे हिन्दू संस्कृति का स्थान दुनिया में सबसे ऊंचा था , कारण हमारे पुर्वजों ने पुरे दुनिया को उच्च कोटी के आदर्शों के साथ तमीज और तहजीब से रहना और जीना सिखाया , भारत विश्वगुरू था , ज्ञान में अव्वल , विज्ञान में अव्वल , आध्यात्म में अव्वल , संस्कार और संस्करण में अव्वल , चरित्र और नैतिकता में अव्वल , मानवता में अव्वल , भक्ति में अव्वल , क्षमा ,त्याग , दया , करूणा और दानादि दैविक गुणों में अव्वल । पर कालक्रम में आताताईयों ने इन‌सबको खत्म कर अपना झूठा इतिहास सामने रख दिया और इन सबको लुप्त कर दिया । 

लेकिन भारत विश्व का गुरू था , है और रहेगा हमेशा क्योंकि यह सौभाग्य भगवद् कृत है, मानव कृत नहीं जो इसे मिटा सके कोई । 
भारत के बिना विश्व शांति कि परिकल्पना हीं व्यर्थ है । जैसा कि नाम के उद्बोधन से स्पष्ट है ।
 'भा' का मतलव ज्ञान और 'रत' का मतलव रचित , बसित खोजित , प्रकटित तथा कण कण में व्याप्त।  

अत: भारत के कण कण में दिव्य ऋषि मुनि महापुरूषों , संतो के चरण रज के साथ साथ उनका दिया ज्ञान भी व्याप्त है । जिस कारण यह भारत भूमि परम पवित्र और दिव्य है । लेकिन इसका अनुभव , महत्व और आभास केवल उनके लिए है जो मानव है, मनुष्य है । जो मानव के भेष में असुर है , राक्षस है, उनको न तो इसका अनुभव हो सकता है और न कभी वो अपने कल्याण के प्रति जागरूक हो सकते हैं । 
ऐसे जीव कुतर्क , विचित्र तर्क , अति तर्क में ही अपने दुर्लभ मानव यौनि के जीवन को गवां कर फिर से तिर्यक यौनियों के तरफ बढ़ने के तरफ अपने ही हाथों बाध्य है । 

इसलिए मैं सबसे अपील करता हुं कि अगर आप अपना मानव जीवन सफल बनाना चाहते हैं तो श्री कृपालु जी महाराज जी का पुस्तक पढ़िए । उनकी पुस्तकें सभी ग्रंथों का सार है , जो कठिन से कठिन ग्रंथों को आसान भाषा में समझाने में सक्षम है । 

आज सौभाग्य से हमारे पास निम्नलिखित सभी भारतीय शास्त्रों का सार हमारे श्री कृपालु महाप्रभु जी द्वारा रचित इन उच्चतम कोटी के शास्त्र के रूप में उपलब्ध है जैसे :- 

1. प्रेम रस सिद्धांत 
2. मैं कौन मेरा कौन 
3. नारद भक्ति दर्शन
4. दिव्य स्वार्थ 
5. रास पंचाध्यायी
6. कामना और उपासना 
7.जीव का लक्ष्य 
8.गुरूकृपा 
9.रूपद्यान 
10.प्रेम रस मदिरा 
11.भक्ति शतक 
12.गुरू तत्त्व
13.युगल शतक 
14. राधा गोविंद गीत 
15.गुरू भक्ति 
16.गुरू कृपा 
17.प्राणधन जीवन कुंज बिहारी 
18.गुरु गोविंद आदि 

ध्यान रखिए ये श्री महाराज जी के शास्त्र भगवान की आप्त वाणी हीं है ।‌क्योंकि श्री महाराज जी स्वयं राधाकृष्ण के युगल अवतार हैं । इनके पुस्तक निम्नलिखित पुस्तकों का आसान भाषा में सार है । 

1-अष्टाध्यायी पाणिनी
2-रामायण वाल्मीकि
3-महाभारत वेदव्यास
4-अर्थशास्त्र चाणक्य
5-महाभाष्य पतंजलि
6-सत्सहसारिका सूत्र नागार्जुन
7-बुद्धचरित अश्वघोष
8-सौंदरानन्द अश्वघोष
9-महाविभाषाशास्त्र वसुमित्र
10- स्वप्नवासवदत्ता भास
11-कामसूत्र वात्स्यायन
12-कुमारसंभवम् कालिदास
13-अभिज्ञानशकुंतलम् कालिदास  
14-विक्रमोउर्वशियां कालिदास
15-मेघदूत कालिदास
16-रघुवंशम् कालिदास
17-मालविकाग्निमित्रम् कालिदास
18-नाट्यशास्त्र भरतमुनि
19-देवीचंद्रगुप्तम विशाखदत्त
20-मृच्छकटिकम् शूद्रक
21-सूर्य सिद्धान्त आर्यभट्ट
22-वृहतसिंता बरामिहिर
23-पंचतंत्र। विष्णु शर्मा
24-कथासरित्सागर सोमदेव
25-अभिधम्मकोश वसुबन्धु
26-मुद्राराक्षस विशाखदत्त
27-रावणवध। भटिट
28-किरातार्जुनीयम् भारवि
29-दशकुमारचरितम् दंडी
30-हर्षचरित वाणभट्ट
31-कादंबरी वाणभट्ट
32-वासवदत्ता सुबंधु
33-नागानंद हर्षवधन
34-रत्नावली हर्षवर्धन
35-प्रियदर्शिका हर्षवर्धन
36-मालतीमाधव भवभूति
37-पृथ्वीराज विजय जयानक
38-कर्पूरमंजरी राजशेखर
39-काव्यमीमांसा राजशेखर
40-नवसहसांक चरित पदम् गुप्त
41-शब्दानुशासन राजभोज
42-वृहतकथामंजरी क्षेमेन्द्र
43-नैषधचरितम श्रीहर्ष
44-विक्रमांकदेवचरित बिल्हण
45-कुमारपालचरित हेमचन्द्र
46-गीतगोविन्द जयदेव
47-पृथ्वीराजरासो चंदरवरदाई
48-राजतरंगिणी कल्हण
49-रासमाला सोमेश्वर
50-शिशुपाल वध माघ
51-गौडवाहो वाकपति
52-रामचरित सन्धयाकरनंदी
53-द्वयाश्रय काव्य हेमचन्द्र
54- विनय पत्रिका। तुलसीदास
55- रामचरितमानस। तुलसीदास

आज हमको जो इतिहास पढ़ाया जाता है वो फरेव हीं फरेव है । उसमें मुगलों और विदेशियों का और देश के कुछ गद्दारों का महिमा मंडन है जिसको पढ़के आज की पीढ़ी भ्रम विप्रलिप्सा , कर्णपाटव और प्रमाद का शिकार हो गए हैं और हो रहे हैं । मैं आज अपने देश के सभी हिन्दु युवाओं को आवाहन करना चाहता हुं कि स्कूली शिक्षा के अलावा श्री कृपालु जी महाराज जी के पुस्तकों कि सहायता से तत्वज्ञान का अध्ययन करें तो अपने दिव्य विरासत को समझ पायेंगे और चरित्र ऊंचा होगा नहीं तो पतन तो निश्चित है हीं । 
:- संजीव कुमार, रांची ।

Monday, 29 April 2024

सनातन वैदिक शास्त्रों का डिटेल्स ।

वेद-के बारे में महत्वपूर्ण ज्ञान :-

प्र.1-  वेद किसे कहते है ?
उत्तर-  ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है। भगवान की आप्त वाणी को वेद कहते हैं । 

प्र.2-  वेद-ज्ञान किसने दिया ?
उत्तर-  ईश्वर ने दिया।

प्र.3-  ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?
उत्तर-  ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।

प्र.4-  ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?
उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण  के लिए।

प्र.5-  वेद कितने है ?
उत्तर- चार ।                                                  
1-ऋग्वेद 
2-यजुर्वेद  
3-सामवेद
4-अथर्ववेद

प्र.6-  वेदों के ब्राह्मण ।
        वेद              ब्राह्मण
1 - ऋग्वेद      -     ऐतरेय
2 - यजुर्वेद      -     शतपथ
3 - सामवेद     -    तांड्य
4 - अथर्ववेद   -   गोपथ

प्र.7-  वेदों के उपवेद कितने है।
उत्तर -  चार।
      वेद                     उपवेद
    1- ऋग्वेद       -     आयुर्वेद
    2- यजुर्वेद       -    धनुर्वेद
    3 -सामवेद      -     गंधर्ववेद
    4- अथर्ववेद    -     अर्थवेद

प्र 8-  वेदों के अंग हैं ।
उत्तर -  छः ।
1 - शिक्षा
2 - कल्प
3 - निरूक्त
4 - व्याकरण
5 - छंद
6 - ज्योतिष

प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?
उत्तर- चार ऋषियों को।
         वेद                ऋषि
1- ऋग्वेद         -      अग्नि
2 - यजुर्वेद       -       वायु
3 - सामवेद      -      आदित्य
4 - अथर्ववेद    -     अंगिरा

प्र.10-  वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?
उत्तर- समाधि की अवस्था में।

प्र.11-  वेदों में कैसे ज्ञान है ?
उत्तर-  सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान। वेद चराचर जगत का ईश्वर प्रदत एक मात्र संविधान है । इसके आधिन समुचा ब्रह्मांड और तमाम जीव जगत है । सब पर यह लागु है और प्रलय कल तक लागु रहेगा ।

प्र.12-  वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-   चार ।
        ऋषि        विषय
1-  ऋग्वेद    -    ज्ञान
2-  यजुर्वेद    -    कर्म
3-  सामवेद     -    उपासना व भक्ति
4-  अथर्ववेद -    विज्ञान

प्र.13-  वेदों में।

ऋग्वेद में।
1-  मंडल      -  10
2 - अष्टक     -   08
3 - सूक्त        -  1028
4 - अनुवाक  -   85 
5 - ऋचाएं     -  10589

यजुर्वेद में।
1- अध्याय    -  40
2- मंत्र           - 1975

सामवेद में।
1-  आरचिक   -  06
2 - अध्याय     -   06
3-  ऋचाएं       -  1875

अथर्ववेद में।
1- कांड      -    20
2- सूक्त      -   731
3 - मंत्र       -   5977
          
प्र.14-  वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ?                                                                                                                                                              उत्तर-  भगवद् प्राप्त संतों , महापुरूषों  को वेद पढ़ने , पढ़ाने और समझाने का अधिकार है, असंत और साधारण मनुष्य उसको पढ़के गलत अर्थ हीं करेगा जो विनाशकारी है  ।

प्र.15-  क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ?
उत्तर-   नहीं है उनके लिए जो भगवद् प्राप्त कर चुके हैं और उच्च कोटी के ऋषि-मुनि हैं संत हैं जिनको भगवान का दर्शन हटात् और साक्षात होता रहता है , पर सधारण मनुष्यों के लिए वेद में यह स्पष्ट है कि वो सगुण साकार भगवान की मुर्ती का सहारा लेकर  उसमें भगवद् भावना करके अपना कल्याण कर सकता है ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है  , वेद कण कण में भगवान की उपस्थिति को मानता है इसलिए भगवान का उपासक मुर्ति में भी अपने इष्ट की उपस्थिति को मानता है जो सत्य है ,वेद सम्मत है  ।

प्र.16-  क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ?
उत्तर-  नहीं है कारण यह अलौकिक वह सनातन ग्रंथ है , पुराणों में, उपनिषदों में अवतार का प्रमाण है जो वेद का हीं अंग है।

प्र.17-  सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?
उत्तर-  ऋग्वेद।

प्र.18-  वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?
उत्तर-  वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 43 हजार वर्ष पूर्व । 

प्र.19-  वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों का क्या नाम है ?
उत्तर- 
1-  न्याय दर्शन  - गौतम मुनि।
2- वैशेषिक दर्शन  - कणाद मुनि।
3- योगदर्शन  - पतंजलि मुनि।
4- मीमांसा दर्शन  - जैमिनी मुनि।
5- सांख्य दर्शन  - कपिल मुनि।
6- वेदांत दर्शन  - व्यास मुनि।

प्र.20-  शास्त्रों के विषय क्या है ?
उत्तर-  आत्मा,  परमात्मा, प्रकृति,  जगत की उत्पत्ति,  मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक  ज्ञान-विज्ञान आदि।

प्र.21-  प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?
उत्तर-  केवल ग्यारह।

प्र.22-  उपनिषदों के नाम बतावे ?
उत्तर-  
01-ईश ( ईशावास्य )  
02-केन  
03-कठ  
04-प्रश्न  
05-मुंडक  
06-मांडू  
07-ऐतरेय  
08-तैत्तिरीय 
09-छांदोग्य 
10-वृहदारण्यक 
11-श्वेताश्वतर ।

प्र.23-  उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?
उत्तर- वेदों से।
प्र.24- चार वर्ण।
उत्तर- 
1- ब्राह्मण
2- क्षत्रिय
3- वैश्य
4- शूद्र

प्र.25- चार युग।
1- सतयुग - 17,28000  वर्षों का नाम ( सतयुग ) रखा है।
2- त्रेतायुग- 12,96000  वर्षों का नाम ( त्रेतायुग ) रखा है।
3- द्वापरयुग- 8,64000  वर्षों का नाम है।
4- कलयुग- 4,32000  वर्षों का नाम है।
कलयुग के  4,976  वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक।
4,27024 वर्षों का भोग होना है। 

पंच महायज्ञ
       1- ब्रह्मयज्ञ   
       2- देवयज्ञ
       3- पितृयज्ञ
       4- बलिवैश्वदेवयज्ञ
       5- अतिथियज्ञ
   
स्वर्ग  -  जहाँ सुख है, पर यह सुख माईक है । स्वर्ग भी मायाधिन है , । 
नरक  -  जहाँ दुःख हीं दु:ख है।.

प्र.26 पुराणों की संख्या कितनी है ?
ऊ- पुराणों की संख्या 18 है ।

प्र. 27 पुराणों के नाम ? 

उत्तर - ब्रह्म पुराण
पद्म पुराण
विष्णु पुराण -- (उत्तर भाग - विष्णुधर्मोत्तर)
वायु पुराण -- (भिन्न मत से - शिव पुराण)
भागवत पुराण -- (भिन्न मत से - देवीभागवत पुराण)
नारद पुराण
मार्कण्डेय पुराण
अग्नि पुराण
भविष्य पुराण
ब्रह्मवैवर्त पुराण
लिङ्ग पुराण
वाराह पुराण
स्कन्द पुराण
वामन पुराण
कूर्म पुराण
मत्स्य पुराण
गरुड पुराण
ब्रह्माण्ड पुराण

प्र28- उप पुराणो की संख्या कितनी है ? 
ऊ- उप पुराणो की संख्या 24 है ? 

प्र 29- उप-पुराणों के नाम ? 

ऊ- आदि पुराण (सनत्कुमार द्वारा कथित)
नरसिंह पुराण
नन्दिपुराण (कुमार द्वारा कथित)
शिवधर्म पुराण
आश्चर्य पुराण (दुर्वासा द्वारा कथित)
नारदीय पुराण (नारद द्वारा कथित)
कपिल पुराण
मानव पुराण
उशना पुराण (उशनस्)
ब्रह्माण्ड पुराण
वरुण पुराण
कालिका पुराण
माहेश्वर पुराण
साम्ब पुराण
सौर पुराण
पाराशर पुराण (पराशरोक्त)
मारीच पुराण
भार्गव पुराण
विष्णुधर्म पुराण
बृहद्धर्म पुराण
गणेश पुराण
मुद्गल पुराण
एकाम्र पुराण
दत्त पुराण

प्र30- पुराणों में श्लोकों की संख्या ? 
ऊ- 
पुराण श्लोकों की संख्या
ब्रह्मपुराण- चौदह हजार 
पद्मपुराण - पचपन हजार 
विष्णुपुराण -तेइस हजार
शिवपुराण -चौबीस हजार
श्रीमद्भावतपुराण -अठारह हजार
नारदपुराण -पच्चीस हजार
मार्कण्डेयपुराण -नौ हजार
अग्निपुराण- पन्द्रह हजार
भविष्यपुराण- चौदह हजार पाँच सौ
ब्रह्मवैवर्तपुराण -अठारह हजार
लिंगपुराण ग्यारह हजार
वाराहपुराण- चौबीस हजार
स्कन्धपुराण -इक्यासी हजार एक सौ
वामनपुराण -दस हजार
कूर्मपुराण -सत्रह हजार
मत्सयपुराण- चौदह हजार
गरुड़पुराण- उन्नीस हजार
ब्रह्माण्डपुराण- बारह हजार

प्र31-पुराणों के नाम और उनका महत्त्व संपादित करें ?

उत्तर - १८ पुराण के नाम और उनका महत्त्व संपादित करें
(१) ब्रह्मपुराण : इसे “आदिपुराण” भी का जाता है। प्राचीन माने गए सभी पुराणों में इसका उल्लेख है। इसमें श्लोकों की संख्या अलग- २ प्रमाणों से भिन्न-भिन्न है। १०,०००…१२.००० और १३,७८७ ये विभिन्न संख्याएँ मिलती है। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में लोमहर्षण ऋषि ने किया था। इसमें सृष्टि, मनु की उत्पत्ति, उनके वंश का वर्णन, देवों और प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन है। इस पुराण में विभिन्न तीर्थों का विस्तार से वर्णन है। इसमें कुल २४५ अध्याय हैं। इसका एक परिशिष्ट सौर उपपुराण भी है, जिसमें उडिसा के कोणार्क मन्दिर का वर्णन है।

(२) पद्मपुराण : इसमें कुल ६४१ अध्याय और ४८,००० श्लोक हैं। मत्स्यपुराण के अनुसार इसमें ५५,००० और ब्रह्मपुराण के अनुसार इसमें ५९,००० श्लोक थे। इसमें कुल खण़्ड हैं—(क) सृष्टिखण्ड : ५ पर्व, (ख) भूमिखण्ड, (ग) स्वर्गखण्ड, (घ) पातालखण्ड और (ङ) उत्तरखण्ड। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में सूत उग्रश्रवा ने किया था। ये लोमहर्षण के पुत्र थे। इस पुराण में अनेक विषयों के साथ विष्णुभक्ति के अनेक पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। 

(३) विष्णुपुराण : पुराण के पाँचों लक्षण इसमें घटते हैं। इसमें विष्णु को परम देवता के रूप में निरूपित किया गया है। इसमें कुल छः खण्ड हैं, १२६ अध्याय, श्लोक २३,००० या २४,००० या ६,००० हैं। इस पुराण के प्रवक्ता पराशर ऋषि और श्रोता मैत्रेय हैं।

(४) वायुपुराण : इसमें विशेषकर शिव का वर्णन किया गया है, अतः इस कारण इसे “शिवपुराण” भी कहा जाता है। एक शिवपुराण पृथक् भी है। इसमें ११२ अध्याय, ११,००० श्लोक हैं। इस पुराण का प्रचलन मगध-क्षेत्र में बहुत था। इसमें गया-माहात्म्य है। इसमें कुल चार भाग है : (क) प्रक्रियापाद – (अध्याय—१-६), (ख) उपोद्घात : (अध्याय-७ –६४ ), (ग) अनुषङ्गपादः–(अध्याय—६५–९९), (घ) उपसंहारपादः–(अध्याय—१००-११२)। इसमें सृष्टिक्रम, भूगो, खगोल, युगों, ऋषियों तथा तीर्थों का वर्णन एवं राजवंशों, ऋषिवंशों,, वेद की शाखाओं, संगीतशास्त्र और शिवभक्ति का विस्तृत निरूपण है। इसमें भी पुराण के पञ्चलक्षण मिलते हैं।

(५) भागवतपुराण : यह सर्वाधिक प्रचलित पुराण है। इस पुराण का सप्ताह-वाचन-पारायण भी होता है। इसे सभी दर्शनों का सार “निगमकल्पतरोर्गलितम्” और विद्वानों का परीक्षास्थल “विद्यावतां भागवते परीक्षा” माना जाता है। इसमें श्रीकृष्ण की भक्ति के बारे में बताया गया है। इसमें कुल १२ स्कन्ध, ३३५ अध्याय और १८,००० श्लोक हैं। कुछ विद्वान् इसे “देवीभागवतपुराण” भी कहते हैं, क्योंकि इसमें देवी (शक्ति) का विस्तृत वर्णन हैं। 

(६) नारद (बृहन्नारदीय) पुराण : इसे महापुराण भी कहा जाता है। इसमें पुराण के ५ लक्षण घटित नहीं होते हैं। इसमें वैष्णवों के उत्सवों और व्रतों का वर्णन है। इसमें २ खण्ड है : (क) पूर्व खण्ड में १२५ अध्याय और (ख) उत्तर-खण्ड में ८२ अध्याय हैं। इसमें १८,००० श्लोक हैं। इसके विषय मोक्ष, धर्म, नक्षत्र, एवं कल्प का निरूपण, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, गृहविचार, मन्त्रसिद्धि,, वर्णाश्रम-धर्म, श्राद्ध, प्रायश्चित्त आदि का वर्णन है।

(७) मार्कण्डयपुराण : इसे प्राचीनतम पुराण माना जाता है। इसमें इन्द्र, अग्नि, सूर्य आदि वैदिक देवताओं का वर्णन किया गया है। इसके प्रवक्ता मार्कण्डय ऋषि और श्रोता क्रौष्टुकि शिष्य हैं। इसमें १३८ अध्याय और ७,००० श्लोक हैं। इसमें गृहस्थ-धर्म, श्राद्ध, दिनचर्या, नित्यकर्म, व्रत, उत्सव, अनुसूया की पतिव्रता-कथा, योग, दुर्गा-माहात्म्य आदि विषयों का वर्णन है।

(८) अग्निपुराण : इसके प्रवक्ता अग्नि और श्रोता वसिष्ठ हैं। इसी कारण इसे अग्निपुराण कहा जाता है। इसे भारतीय संस्कृति और विद्याओं का महाकोश माना जाता है। इसमें इस समय ३८३ अध्याय, ११,५०० श्लोक हैं। इसमें विष्णु के अवतारों का वर्णन है। इसके अतिरिक्त शिवलिंग, दुर्गा, गणेश, सूर्य, प्राणप्रतिष्ठा आदि के अतिरिक्त भूगोल, गणित, फलित-ज्योतिष, विवाह, मृत्यु, शकुनविद्या, वास्तुविद्या, दिनचर्या, नीतिशास्त्र, युद्धविद्या, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, छन्द, काव्य, व्याकरण, कोशनिर्माण आदि नाना विषयों का वर्णन है।

(९) भविष्यपुराण : इसमें भविष्य की घटनाओं का वर्णन है। इसमें दो खण्ड हैः–(क) पूर्वार्धः–(अध्याय—४१) तथा (ख) उत्तरार्धः–(अध्याय़—१७१) । इसमें कुल १५,००० श्लोक हैं । इसमें कुल ५ पर्व हैः–(क) ब्राह्मपर्व, (ख) विष्णुपर्व, (ग) शिवपर्व, (घ) सूर्यपर्व तथा (ङ) प्रतिसर्गपर्व। इसमें मुख्यतः ब्राह्मण-धर्म, आचार, वर्णाश्रम-धर्म आदि विषयों का वर्णन है। 

(१०) ब्रह्मवैवर्तपुराण : यह वैष्णव पुराण है। इसमें श्रीकृष्ण के चरित्र का वर्णन किया गया है। इसमें कुल १८,००० श्लोक है और चार खण्ड हैं : (क) ब्रह्म, (ख) प्रकृति, (ग) गणेश तथा (घ) श्रीकृष्ण-जन्म।

(११) लिङ्गपुराण : इसमें शिव की उपासना का वर्णन है। इसमें शिव के २८ अवतारों की कथाएँ दी गईं हैं। इसमें ११,००० श्लोक और १६३ अध्याय हैं। इसे पूर्व और उत्तर नाम से दो भागों में विभाजित किया गया है। 

(१२) वराहपुराण : इसमें विष्णु के वराह-अवतार का वर्णन है। पाताललोक से पृथिवी का उद्धार करके वराह ने इस पुराण का प्रवचन किया था। इसमें २४,००० श्लोक सम्प्रति केवल ११,००० और २१७ अध्याय हैं।

(१३) स्कन्दपुराण : यह पुराण शिव के पुत्र स्कन्द (कार्तिकेय, सुब्रह्मण्य) के नाम पर है। यह सबसे बडा पुराण है। इसमें कुल ८१,००० श्लोक हैं। इसमें दो खण्ड हैं। इसमें छः संहिताएँ हैं—सनत्कुमार, सूत, शंकर, वैष्णव, ब्राह्म तथा सौर। सूतसंहिता पर माधवाचार्य ने “तात्पर्य-दीपिका” नामक विस्तृत टीका लिखी है। इस संहिता के अन्त में दो गीताएँ भी हैं—-ब्रह्मगीता (अध्याय—१२) और सूतगीताः–(अध्याय ८)। इस पुराण में सात खण्ड हैं—(क) माहेश्वर, (ख) वैष्णव, (ग) ब्रह्म, (घ) काशी, (ङ) अवन्ती, (रेवा), (च) नागर (ताप्ती) तथा (छ) प्रभास-खण्ड। काशीखण्ड में “गंगासहस्रनाम” स्तोत्र भी है। 

(१४) वामनपुराण : इसमें विष्णु के वामन-अवतार का वर्णन है। इसमें ९५ अध्याय और १०,००० श्लोक हैं। इसमें चार संहिताएँ हैं—(क) माहेश्वरी, (ख) भागवती, (ग) सौरी तथा (घ) गाणेश्वरी । 

(१५) कूर्मपुराण : इसमें विष्णु के कूर्म-अवतार का वर्णन किया गया है। इसमें चार संहिताएँ हैं—(क) ब्राह्मी, (ख) भागवती, (ग) सौरा तथा (घ) वैष्णवी । सम्प्रति केवल ब्राह्मी-संहिता ही मिलती है। इसमें ६,००० श्लोक हैं। इसके दो भाग हैं, जिसमें ५१ और ४४ अध्याय हैं। इसमें पुराण के पाँचों लक्षण मिलते हैं। इस पुराण में ईश्वरगीता और व्यासगीता भी है। 

(१६) मत्स्यपुराण : इसमें पुराण के पाँचों लक्षण घटित होते हैं। इसमें २९१ अध्याय और १४,००० श्लोक हैं। प्राचीन संस्करणों में १९,००० श्लोक मिलते हैं। इसमें जलप्रलय का वर्णन हैं। इसमें कलियुग के राजाओं की सूची दी गई है। 

(१७) गरुडपुराण : यह वैष्णवपुराण है। इसके प्रवक्ता विष्णु और श्रोता गरुड हैं, गरुड ने कश्यप को सुनाया था। इसमें विष्णुपूजा का वर्णन है। इसके दो खण्ड हैं, जिसमें पूर्वखण्ड में २२९ और उत्तरखण्ड में ३५ अध्याय और १८,००० श्लोक हैं। इसका पूर्वखण्ड विश्वकोशात्मक माना जाता है।

(१८) ब्रह्माण्डपुराण : इसमें १०९ अध्याय तथा १२,००० श्लोक है। इसमें चार पाद हैं—(क) प्रक्रिया, (ख) अनुषङ्ग, (ग) उपोद्घात तथा (घ) उपसंहार ।

Saturday, 20 April 2024

एक व्यक्ति का प्रश्न :- क्या मां बाप भगवान है हम तो मां बाप को ही भगवान मानते हैं ?

एक व्यक्ति का प्रश्न :- क्या मां बाप भगवान है हम तो मां बाप को ही भगवान मानते हैं ? 
उत्तर :- शारीरिक मां बाप को केवल शरीर का जन्म दाता मानो वो भी भगवान के कृपा से हमको और तुमको मानव शरीर मिला और उन्हीं के कृपा से हमारे माता पिता को भी मानव शरीर मिला है जिस कारण उनके गर्भ में हमको भगवान द्वारा मानव शरीर देकर भेजा गया , इसमें हमारे मां बाप का कोई कमाल नहीं है । इसिलिए शारीरिक माता पिता भगवान कि कृपा से शरीर को जन्म देने का एक माध्यम भर है वो हमारे आत्मा का पिता माता नहीं हैं । 

शारीरिक माता पिता को भगवान बोल कर हम तुम अपने आत्मा के माता पिता तथा अपने शारीरिक माता पिता के भी आत्मा के माता पिता का अपमान मत करो । 
सभी जीवों के माता पिता परम पिता है , उनका अपमान मत करो । 
अपने शारीरिक माता पिता का सम्मान करो , उनके प्रति अपना फर्ज पुरा जरूर करो। लेकिन उन्हें भगवान मत मानो । 
क्या तुम्हारे माता पिता को मालुम था तुम्हारे जन्म से पहले कि तुम उसका पुत्र या पुत्री बनने बाले हो , क्या जन्म से पहले वो तुमको जानते भी थे ? उनके कोख में भगवान ने तुम्हें बनाया है तुम्हारे मां बाप तो तुमको जन्म के बाद जाना समझा है । 
जब वो जाना तक नहीं तो किसी भी अल्पज्ञ को भगवान बोल कर सर्वज्ञ , सर्वांतर्यामी, भगवान का अपमान मत करो । नहीं तो रो रो नरक भोगना होगा अगले जन्मों में ।

हमारे तुम्हारे अनंत जन्म हो चुके हैं , हर जन्म में अलग अलग प्रकार का शरीर मिला अपने कर्म के अनुसार और न जाने कितने को मां बाप , बेटा बेटी बहन भाई बनाया होगा हमने । 
अत: भगवान श्री कृष्ण को ही अपना माता पिता मानो और उनकी भक्ति करो । 

शारीरिक माता पिता को भगवान मानने , मदिरा पान करने , मांस मछली भक्षण करने , विष्णु भगवान को भगवान न मानने , मौज मस्ती करने, लुट मार करने , अपहरण करने , दुसरों का धन छिनने  तथा अधर्म पर पर चलने आदि की शिक्षा आसुरी शिक्षा है । असुर गुरू शुक्राचार्य ने ही यह आसुरी शिक्षा असुर बच्चों को दिया था ताकि वो देवताओं से , भगवान से युद्ध करें , और देवताओं के लोक पर कब्जा करके  अपने आसुरी सत्ता को कायम रखें । 
हिरण्यकश्यप जैसे असुर ने प्रह्लाद को कहा कि मैं ही तुम्हारा भगवान हूं क्योंकि माता पिता भगवान होते हैं इसलिए तुम हमको भगवान मानो । लेकिन प्रह्लाद ने नहीं माना । हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को सताया तो भगवान नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का बध कर दिए । 
आज कल बहुत से लोग आसुरी शिक्षा का ही प्रसार करते हैं इसलिए लोग ऐसा भ्रामक बात मानते हैं , ऐसे लोगों के दुर रहना चाहिए। 

ध्यान रहे कहीं इसी भ्रम में न रहना तुम भी , तुम भी तो किसी का माता पिता हो इसलिए खुद को भगवान न समझ लेना गलती से । 

ये शरीर के माता पिता को भगवान बोल कर अपने चिर सनातन माता पिता श्री राधा कृष्ण का अपमान मत करो । नहीं तो अगले जन्म से घोर नरक में परे रहोगे । 

न मानव शरीर मिलेगा और न किसी को मां बाप बनाने लायक रहोगे और न बोलने लायक । अगर यह समझ में न आवे तो करो जो मन में आए वो । 
लेकिन कर्म फल का भोग तो सबको भोगना ही होगा ।
गुरू कृपा से प्राप्त ज्ञान के आधार पर :- संजीव कुमार