Saturday, 21 November 2020

मानव का प्रकार :- संजीव कुमार

मेरा यह पोस्ट आध्यात्मिक्ता से तटस्थ लेख है जिसमें भौतिक , अभौतिक दोनों का समावेश है  । है तो यह श्री महाराज जी द्वारा दिया दृष्टि के प्रभाव का हीं फल । पर उनके अनुयायियों से एक प्रार्थना है कि इस लेख को केवल एक लेख और बिचार के समझ से पढ़े और देखें। 
और अपना स्वतंत्र बिचार बिना किसी पुर्वाग्रह के रख सकतें बिना भेद भाव‌ राग और द्वेष के  , इसमें किसी से राग और द्वेष की भावना नहीं है । बस एक चिंतन है ।

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।
1. परमात्म केंद्रित ( GOD Centric ) Suprime soul.
2. आत्म  केन्द्रित ( Soul Centric )
3. मन केंद्रित       ( Self Centric )
4. परिवार केंद्रित ( Family Centric)
5. समाज केंद्रित ( Society Centric )
6. संप्रदाय केंद्रित ( community centric )
7. विश्व केंद्रित।    ( Universe centric ) 

१. God centric - इसमें वो महान जीव है जो भगवान को पुर्ण निष्काम भाव से प्रेम करतें हैं । ऐसे जीव पराकाष्ठा का भगवद् प्रेमी होतें हैं । यहां तक की वो भगवान या अपने गुरु से इतना प्यार करतें हैं कि भगवान या गुरू की इच्छा हीं उनकी इच्छा हैं । वो दर्शन दें नहीं दें , बदले में प्यार करें या न करें , कोई अपनी कामना नहीं इनको । आध्यात्मिक कामना भी नहीं , भौतिक की तो बात हीं नहीं । ए पुर्ण निष्काम मनुष्य अति दुर्लभ भगवद् अवस्था का प्रतिरूप होतें हैं । परमात्म प्रेम भाव में लीन भीतर से । दुनियां से या किसी से कोई लेना देना नहीं , विल्कूल स्थित प्रज्ञ । भौतिक शरीर , भौतिक संसार में होते हुए भी निर्विकल्प , ना शरीर का भान न ‌संसार का ना अपने आत्मा का । पुर्णपरमहंसावस्था। अद्वैत अवस्था में हरि स्वरूप होते हैं । और जन हित हेतु द्वैत भाव से अपने भगवद् स्वरूप में स्थित होते हुए विश्व के सभी जीवों के आत्मिक कल्याण हेतु शरीर धारण करतें हैं । 

२. Soul centric - ऐसे मनुष्य आत्म केन्द्रित वाले सकाम भक्त होतें हैं । इनको अपने आत्मा का प्रैक्टिकल अनुभूति , आत्म साक्षात्कार  या आत्मा का ज्ञान हो  गया होता है । आत्माराम होतें हैं पर ए पूर्ण निष्काम नहीं होतें हैं । हां भौतिक बस्तुओं की कामना इनको नहीं होती , ये भौतिक शरीर और संसार को एक साधन समझ कर इसका ख्याल रखतें हैं । अपने संसार का सदुपयोग भर बस ।  ए भगवद्‌प्रेम चाहतें हैं यही लक्ष्य होता है । आत्मा से परमात्मा के प्रेम को महसुस करना , उनको देखने , सुनने , बातें करने , आलिंगन करने , रस रूप का स्वाद और सुगंध की कामना होती है । ये भक्त होतें हैं । अपने ईष्ट व गुरू से अटूट और अनन्य प्रेम करतें हैं । 

३. Mind centric ( self centric ) ऐसे जीव भगवान और गुरू से अपने आध्यात्मिक प्यास के साथ साथ भौतिक प्यास के पूर्ति की भी  कामना रखतें हैं । यानि केवल मैं और मेरा तु । लेकिन पहले मैं तब तु। इनका ध्येय वाक्य है - पहले आत्मा यानि मन तब परमात्मा, ऐसा सोचते हैं   । ए मन को हीं आत्मा समझते हैं ।
भौतिक कामना की पूर्ति में व्यवधान आया तो प्यार खत्म , जिस मात्रा में भौतिक कामना की पूर्ति हुई उतना प्यार छलक गया । प्यार का उतार चढ़ाव अपने संसारिक इच्छा के पूर्ति के हिसाब से । तो ऐसे लोग आध्यात्म से और भौतिक संसार दोनों से तटस्थ होतें हैं लेकिन खुद के लिए केवल । खुद को खुद से प्यार है और भगवान से भी प्यार है पर स्व हित के लिए । पुर्ण स्वार्थी , ए भगवान, महापुरूष ,संसार , संसारिक रिस्तों  का यानि परिवार , दोस्त , मां बाप , भाई बहन  ,‌बेटा वेटी यानि सभी resources का इस्तेमाल खुद के संतुष्टी के लिए करतें हैं । यह खुद का भक्त होतें हैं । 
भगवान का कभी नहीं । हां भ्रम है इनको की हम भगवान का भक्ति करतें हैं , भक्त हैं पर यह सिर्फ भ्रम है ।
इनके लिए मन हीं देवता , मन हीं ईश्वर , इससे बड़ा ना‌ कोई । इनको बहुत अहंकार होता है। जरा सा बात बर्दास्त नहीं अपने मन के खिलाप । 

४. Family centric - परिवार केंद्रित , ऐसे जीवों के लिए खुद के priority के साथ परिवार का भी priority है । तो ऐसे लोग खुद और अपने परिवार तक सिमित होतें हैं । और इसी हित के लिए भगवान को पुजते है ( इनको भी भक्त नहीं कह सकते हैं ) ए पुर्णत: स:स्वार्थी होतें हैं । समाज रहे या नहीं, मैं और मेरा परिवार, जिसमें बहुत अगर है तो मां वाप को भी शामिल कर लिया नहीं तो‌ केवल मैं मेरा पति हैं मेरी पत्नी और मेरा बच्चा है  बस इससे आगे कुछ नहीं । वांकी सब नाते , रिस्तेदार साधन है इनके लिए । जरूरत परे मां बाप को भगवान , भाई को भगवान , बहन को देवी स्वार्थ बस और गद्हा को भी बाप बना लेतें हैं ।  कोई कोई अपवाद स्वरूप मां वाप भाई से , बहन से प्रेम पर १००% निष्काम नहीं और अपने अहंकार का चरम और उसकी तूष्टि से मतलव है । आप सही वोले तो विरोध गलत बोले तो विरोध । इनका आरती उतारिए , ऐ खुश । कल भुल गए आपका विरोध । ऐसे को समझना और संतुष्ट करना असंभव है । कब किस बात पर नाराज़ हो जाए आपको बताऐंगें भी नहीं । बस खफा । 

५. Society centric - ऐ समाज सेवी होतें हैं । मानव‌मात्र , जीव मात्र के लिय दयालु  ,‌ लेकिन  अपने समाज तक केंद्रित होतें हैं । समाज सेवा के बदले यश , सम्मान आदर चाहिए होता है । नाम भी चाहिए होता है । ऐसे लोगों से समाज चलता है । देश सेवी भी इसी में है। 

६. Community centric ( संप्रदाय विशेष केंद्रित ) ऐ लोग कट्टर होतें हैं , अपने संप्रदाय विशेष को मानने वाले और उसके लिए ही काम करने और लड़ने बोलने बाले। ए लोग सभी चीजों का इस्तेमाल अपने संप्रदाय के अहंकार को तुष्ट करने के लिए करतें हैं । चाहे धर्म ग्रंथ हो या भगवान , जय श्री राम हो या जय शंकर या जय हनुमान या अल्लाह हो या अकबर‌ खुदा हो या कुरान  , ईश्वर जीसस हो या खुदा , भौतिक रिसोर्स हो या आध्यात्मिक । पर सब अपने संप्रदाईक अहंकार की पूर्ति के लिए । एक दूसरे को निचा दिखाना और खुद को ऊंचा साबित करने का प्रयास करना ,  यह विशेषता होती है इन लोंगों की । इनको लगता है कि दुनिया में 12 आना अक्ल सिर्फ मेरे पास है और 4 आने में पुरी दुनियां है । 

७. Universe centric ( विश्व केंद्रित ) ऐसे लोग संसार में महान होतें हैं यह जाति पांति , धर्म , संप्रदाय , चर अचर से उपर उठकर सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय कि चिंता और प्रयास करने वाले होतें हैं । "बसुधैव कुटूंबकं"
ऐसे जीव महात्मा भी होतें हैं और समग्र जीवों के भौतिक कल्याण की भावना वाले होतें हैं , इनका मुख्य ध्यये होता है अपने भौतिक आवश्यकता को कम करो और प्रकृति से तटस्थ होकर जियो । जो आजकल बहुत कम है इस भोगवादी युग में । भगवान ऐसे लोगों को अपना माध्यम बना कर जग कल्याण का काम करतें हैं । ए संत की भांति संसार के जीवों के प्रति निष्काम भाव से समर्पित होते हैं , इनको नाम और बदनामी की कोई चिंता नहीं । बस इनमें सेवा का लक्ष्य सर्वोपरि होता है । 

तो पहला तो अति उत्तम पर्सनैलिटी है । दुसरा उत्तमतर है और सातवां उत्तम पर्सनैलिटी है, पांचवां  ठीक हीं है । 
अत: हमको इन चार प्रकार से हीं मतलव रखना चाहिए ।‌ :- संजीव कुमार ।। 

( मेरा यह लेख एक भुमिका है आगे के संसारिक लेख के लिए , उस लेख में इनका इस्तेमाल  होगा आगे  ) 
श्री राधे ।

मेरे जीवन कि दिशा का बदलना गुरूदेव के कृपा से ।।

किस प्रकार सदगुरू जीव को उसके जन्म से पहले और फिर उसके बाद अपने शिष्य को संभालते हैं प्रेरणा देते हैं और दिलवाते भी हैं संसार के महान जीवों के द्वारा भी  !
किस प्रकार गुरू अपने लीला संवरण के बाद सर्वव्यापक होकर सबका कल्याण करतें हैं !

युवाओं को और हमारे भाई बहनों  को मैं वहीं कहना चाहता हुं जो मुझे 1988 में बाबा आमटे ने विवेकानन्द पुरम कन्याकुमारी में कहा था ।

 उस दिन से मेरी उच्श्रृखंलता, चंचलता  समाप्त हो गई और मैं अपने कोर्स के अलावा अच्छी अच्छी पुस्तकों को पढ़ने का आदत शामिल कर  लिया अपने जीवन में । और करीब लगभग  दो हजार से उपर पतली व मोटी पुस्तके/पत्रिकाएं पढ़ी है आज तक , इसमें मेरे गुरूदेव की चालिस से अधिक पुस्तकें और लगभग साठ से उपर पत्रिकाएं भी शामिल है ।
यह कैसे हुआ तो बाबा आमटे और डॉ सुब्बाराव साहब ( भाई जी कहतें है सभी इनको ) के प्रेरणा से । और इनकी प्रेरणा ने संसार में मेरे जीवन की दिशा बदल दी थी । मैं जीवन को एक गंभीर अध्ययन बना लिया , दुसरे को सिखाने के लिए नहीं वल्कि खुद को पहले संवारने के लिए । वर्णा मेरा भी जीवन आम हो जाता , मजाक हो जाता , फुहर हो जाता ।
दुसरा सबसे बड़ा आत्मिक और मानसिक , बैचारिक या आध्यात्मिक परिवर्तन श्री कृपालु जी महाप्रभु एवं पूज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी  से मिलने के बाद हुआ । 
ऐसा लगता है कि मेरा जीवन भी जन्म से पहले ही विल्कूल प्रोग्राम्ड था श्री कृपालु जी  महराज जी द्वारा ।

श्री कृपालु महाप्रभु श्री  गुरूदेव हीं मेरे जीवन का पुरा रोड मैप पहले से तैयार कर रखा था और अपने मिलाने से पहले मुझे अध्ययन के मामले में एकाकी बनाया , हर तरह के अच्छी से अच्छी शिक्षा , पुस्तकों द्वारा हीं नहीं वल्की  संसार में भी महान लोगों के सानिध्य के द्वारा  और फिर बाद अपने तत्वज्ञान से ओतप्रोत कर दिया ।
इसलिए यह महसूस करता हुं कि गुरू का संबंध एक जन्म का नहीं होता , यह रिस्ता जन्म जन्मांतर का होता है । 
 मैं विवेकानन्द पुरम में कुछ दिन  प्रत्येक शाम समुद्र के किनारे बाबा आम्टे के  साथ टहलता था ।
एक शाम टहलते हुए उन्होंने मुझसे कहा था उस समय मै छात्र  था कौलेज में , एन एस एस में था  । " अच्छी अच्छी पुस्तकें पढ़ने की आदत डालो  , इससे सोंच अच्छी और उदार होगी , चरित्र और संस्कार का निर्माण होगा, जीवन को सही दिशा मिलेगा, सही दृष्टिकोण बनेगा , वृत्ति शुद्ध होगी जिससे प्रवृत्ति उदार और संयमित होगा । भोगवादी संस्कृति से उपर उठोगे और अपने जीवन को शांती मय बना पाओगे "
" इससे आचरण बदलेगी, और खुद बदल जाओगे ,आचरण बदलेगा तो तुम्हारे कथनी और करनी में फर्क नहीं दिखेगा । इससे परिवार अच्छा होगा , परिवार अच्छा होगा तो समाज भी अच्छा होगा  और समाज अच्छा होगा तो राष्ट्र बदलेगा, और फिर दुसरे युवा को भी प्रेरित करो  " 

उन्होंने कहा था कि  जीवन के अंतिम समय तक स्वध्याय करते रहना चाहिए अच्छी अच्छी पुस्तकों  का  । लोग सोचते हैं क्या होगा उम्र गुजर गई । अब तो मरना है !

नहीं ऐसा नहीं सोचना चाहिए । जीवन के अंतिम समय में अच्छी अच्छी पुस्तकों का अध्ययन , ध्यान और साधना और बढ़ा देना चाहिए । जिससे अंत गति अच्छी होती है और एक नया बढ़िया शरीर मिलता है एक अच्छे संस्कारों के साथ नया जीवन मिलता है । आत्मा दुसरा शरीर धारण कर लेता है और यह एक युग पुरूष के निर्माण की प्रक्रिया है इसमें कई जन्म लेने परतें हैं अध्ययन शील साधक को  । 

अब तो श्री कृपालु महाप्रभु के पुस्तकों के अध्ययन बार बार और साधना में हीं मन लगता है संसार के काम के बाद और संसार के काम के दौड़ाने भी गुरूदेव हीं हमेशा साथ रहतें हैं । लेकिन इसके लिए जीवन की चंचलता उच्श्रृखंलता को समाप्त करना होता है । नहीं तो ध्यान साधना में ऐसे लोगों को मन नहीं लगता चाहे कितना भी प्रयास कर लें । अंदर से शांत होना होता है गंभीर होना होता है तब सहज ज्ञान उतारा जाता है गुरूदेव के द्वारा अंत:करण में , फिर रूपध्यान सहज बनता है ।

 व्यक्ति केवल हाड़ मांस का पुतला नहीं है वल्कि विचारो का भंडार है । अच्छे विचारों का भंडार होने के लिए, बहुत अच्छे अच्छे विचारकों और महापुरूषों के पुस्तकों का अध्ययन लगातार करना होता है , साधना एवं उनका संग करना परता है । फिजिकल संग ना हो कोई बात नहीं । 
महापुरुषों का पुस्तक हीं उनका विचार होता है उनका निज स्वरूप होता है । उनकी पुस्तकें हीं उनका साकार रूप होता है उनके जाने के बाद ।
 इसलिए उनके पुस्तकों का संग हीं , अध्ययन हीं और उनके बतलाए सिद्धांतों का अनुसरण हीं उनका  वास्तविक संग है । वर्णा तो लोग उनके भौतिक स्वरूप के संग होते हुए भी संग नहीं होते वास्तव में , लाभ नहीं ले पाते हैं  । 
इसलिए महापुरुष अपने  लीला संवरण के बाद और भी व्यापक हो जातें हैं  कडोरों को वास्तविक संग देने के लिए अपना विस्तार कर लेतें हैं । जिससे बहुतों का कल्याण होता है । 
आज हमारा सौभाग्य है कि श्री महाराज जी की दो सौ से अधिक पुस्तकें साधकों के लिए उपलब्ध है । और फिर वार्षिक पत्रिकाएं भी है । हम साधकों के लिए बहुत है । और बांकी लोगों के लिए , बहुत से महापुरुषों के पुस्तके हैं ।‌ पढना चाहिए ।
यह मेरा निजी अनुभव है जो चल रहा है लगातार ।
श्री राधे 
 मैंने अपना अनुभव शेयर किया । धन्यवाद ।

Friday, 20 November 2020

सूक्ष्म संवेदिता

"संवाद के दृष्टिकोण से गुरु और शिष्य के बीच दो प्रकार के संबंध होते हैं- एक मौखिक तत्त्वज्ञान संप्रेषन का और दूसरा आन्तरिक भाव संप्रेषन का । 
तत्त्वज्ञान प्रदान करने हेतु गुरु सदैव शिष्य को मौखिक उपदेश-निर्देश देते रहते हैं,
परन्तु सूक्ष्म संप्रेषन में शिष्य को उसी ज्ञान का अनुभवात्मक बोध होता है । संप्रेषन पूर्णरुपेण चेतना पर आधारित होता है । गुरु जो हमारी सर्वोच्च चेतना में स्थापित है, वे कोई स्थूल व्यक्तित्व नहीं , सनातन तत्त्वज्ञान हैं । वे साधक से कभी भी संपर्क स्थापित कर सकते हैं, किन्तु शर्त यह है कि साधक भी अच्छा रिसीवर पर बना रहे । अर्थात् अपनी चेतना को गुरु से जोड़े रखे और पूर्ण शरणागति की पात्रता विकसित करे । 

"संप्रेषण के माध्यम से गुरु के द्वारा दिय गय तत्त्वज्ञान का अच्छा रिसीवर बनने के लिय हम साधकों को अपने अवरोध का त्याग करना पड़ेगा । हमें बाँसुरी बननी पडे़गी । अन्त:करण की शुद्धिकरण की ओर बढ़ना पड़ेगा । उस सम्प्रेषण को रिसीव करने के लिए एकाग्रचित होना पड़ेगा । पूर्ण आस्थावान बनना पड़ेगा । 
साधक को अपने मन-व्यक्तित्व को बस एक पहचान देनी पड़ेगी - 'गुरु जो चाहें वही मेरा मन और जैसा वे गढ़ें वही मेरा व्यक्तित्व ।' तभी उसमें भक्ति-प्रेम रुपी संगीत का प्रवाह संभव है । गुरु से समस्वरित होते ही उनकी कृपा का प्रवाह साधक में होने लगेगा । यदि साधक अपने गुरु से आन्तरिक रुप से जुड़ा है तो वे एक-दूसरे से संपर्क स्थापित कर सकते हैं । इसे ही अध्यात्म में समर्पण कहते हैं । जिस साधक का अपने गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण हो जाता है, उसका मन गुरु से एकाकार हो जाता हैं ।

यही गुरु और शिष्य का वास्तविक संबंध है । यही वह अवस्था है जब आप भी गुरु तक अपने भाव संप्रेषित कर सकते हैं और उनका मार्गदर्शन, उनके निर्देश, प्रत्यक्ष दर्शन सब प्राप्त कर सकते हैं ।

 :- मां रासेश्वरी देवी ।

सूक्ष्म संवेदिता एक रहस्य , एक सच्चाई । निज अनुभव ।

पुज्यनिया मां रासेस्वरी देवी जी के श्री मुख से  - 
सूक्ष्म संवेदिता एक रहस्य , एक सच्चाई  । निज अनुभव । 
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विचारों का संचार बिना किसी स्थूल माध्यम के करने की प्रक्रिया को दूर संवेदिता या सूक्ष्म संप्रेषण कहा जाता है । एक सामान्य मस्तिष्क दूर संवेदों को न तो पूरी तरह भेजने और न ही उसे प्राप्त करने में सक्षम होता है । हाँ , इसे अवश्य ही विकसित किया जा सकता है समुचित अभ्यास द्वारा । सूक्ष्म संवेदना में समय,  दूरी और भाषा बाधक बनकर खड़ी नही होती । क्योंकि विचार शब्द के रुप में संप्रेषित नहीं होता वरण् जो वास्तविक विचार किसी के मस्तिष्क में चलता है, वह भाव रुप में दूसरे मस्तिष्क तक पहूँचकर पुन: विचार रुप में रुपांतरित होकर उस तक संप्रेषित होता है । यहां मस्तिष्क की सचेतना ही कार्य करती है । 
आध्यात्मिक जगत में इस प्रकार के संप्रेषण का बड़ा महत्व है । अनेकों प्रमाण , आख्याण भारतीय परंपरा में भरे परे हैं जब गुरु अपना मार्गदर्शन सूक्ष्म संप्रेषण रुपी आन्तरिक पथ द्वारा अपने शिष्यों को प्रदान किया करते थे और आज भी कर रहें हैं ।

यानि मार्गदर्शन सीधे मन-से-मन, ह्रदय-से-ह्रदय और आत्मा-से-आत्मा तक ।
एक समय आता है जब शिष्यत्व की परिपक्वता पर शिष्य वह सबकुछ भी बिना किसी माध्यम के दूर से  सबकुछ सुनने लगता है, जो गुरुवर मूक संप्रेषण के द्वारा उस तक पहूँचाना चाहते हैं या शिष्य के किसी भी प्रश्न , जिज्ञांसा का समाधान या मार्गदर्शन मूक संप्रेषण के द्वारा करने लगते हैं । अब वह अपने गुरुवर की कही-अनकही बातों, उनके मनोभावों को ही नही समझता, वल्कि उनके बीच संवादो का आदान प्रदान के लिए किसी माध्यम की जरुरत ही नही रह जाती है ।
इसे आज के वैज्ञानिक युग मे विज्ञान ने भी माना है और नाम दिया है मूक संप्रेषण, इस पर शोध भी चल रहे हैं ।
ऐसे मे जहां तक हमारे श्री महाराज जी की बात है ! जिस प्रकार वे प्रवचन और सत्संग के माध्यम से अपनी अहैतुकी कृपा आम लोगों के मध्य वितरित करते हैं उसी प्रकार वे अपनी विशेष कृपा सूक्ष्म संप्रेषण द्वारा अपने कृपा पात्रो को बाँटते हैं ।

श्री महाराज जी अकसर ही कहा करते थे कि जो साधक मेरी स्थूल उपस्थिति तक ही सीमित रहते हैं, मुझसे आन्तरिक तार नहीं जोड़े रखते, उनका संबन्ध मेरे स्थूल अस्तित्व तक हीं सीमित रह जाता है और मैं भी उससे उसी स्तर पर संबंध रख पाता हूँ । , किन्तु जो दूर रहकर भी आन्तरिक स्तर पर मेरी उपस्थिति का सदैव अनुभव करते हैं, वे सदा मेरे करीब हैं । तभी तो अनेकानेक साधकों का यह दावा है कि उन्हे दूर रहकर भी अपने गुरुवर के दर्शन , उनका मार्ग दर्शन प्राप्त होता था और आज भी प्राप्त हो रहें हैं ।
जब कोई आध्यात्मिक क्षेत्र में कदम रखता है तो उसे अपने गुुरु से आन्तरिक संबंध अवश्य ही स्थापित करना चाहिए क्योंकि तभी आन्तरिक सम्प्रेषण संभव है ।
साधक के लिए अपने गुुरु से संबंध बनाए रखने की यही एक सबसे कारगर विधि है । और इसी विधि द्वारा गुरु अपने शरणागतों से जुड़े रहते हैं । 

एक रहस्य की बात आपको बतलाऊँ ! जो साधक सुदूर क्षेत्रों में रहते थे, वे कई बार उन साधकों की तुलना में अधिक गहरा संबंध जोड़ पाए जो श्री महाराज जी के सन्निकट रहे ।
साधकों द्वारा श्री महाराज जी से आन्तरिक संबंध स्थापित करते ही उन्हे संदेश ठीक उसी प्रकार प्राप्त होने लगते हैं जैसे तार को सर्किट हाऊस से जोड़ते ही उसमें विद्युत का प्रवाह स्वयं: ही होने लगता है । अर्थात् गुरु की ऊर्जा उस शिष्य की ओर बहने लगती है । 

तन-मन-धन की सेवा के माध्यम से  श्री महाराज जी अपने अनुयायियों को उनके आन्तरिक परिवर्तन में सहायता करते हैं ताकि वे अपनी ऊर्जा और अपने ज्ञान को प्रवाहित करने का उपयुक्त संवाहक उन्हे बना सकें । 
गुुरु और साधक के बीच संप्रेषण की स्थिति उसकी शरणागति विशेष पर निर्भर करती है ।

:- मां रासेश्वरी देवी । अगस्त २०१५ ।

धनवान कौन ?

यह पोस्ट जरूर पढ़िए एक बार :- 
धनवान ऐसे लोगों को कहा जाता है , उनको नहीं जो सौ से ऊपर महंगी महंगी गाड़ी । अरबों अरब का मकान , सौ करोड़ से ऊपर अपनी बीबी के बर्थडे पर उड़ाना, हजारों जोड़ी महंगे जूते,  बेटी बेटा के शादी में एक एक लाख का एक निमंत्रण पत्र , अरबों रूपया एक शादी में उड़ाने वाले और करोड़ो की साड़ी पहनने वाले सो कौल्ड हमारे देश भारत के बिजनेस मैन , हिरो , हिरोईन , नेता , अभिनेता आदि हैं । 

इनलोगों को  " मि. सादियो माने सेनेगल"  विश्व प्रसिद्ध फुटबौल खिलाड़ी, प. अफ्रिका  से  सिखना चाहिए की धनवान कैसा होता है और किसको कहते हैं । पढ़िए इस आदरणीय असली धनवान को :- 

 विश्वप्रसिद्ध फुटबॉल खिलाड़ी 27 वर्षीय "सादिओ माने सेनेगल" (पश्चिम अफ्रीका), की कमाई भारतीय रुपयों में गिनें तो प्रति सप्ताह 1 करोड़ 40 लाख रुपये है,इन्हें कई जगह पर टूटे हुए फोन के साथ देखा गया हैं।।
एक इंटरव्यू में जब उनसे उसके बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा मैं उसे ठीक करवा लूंगा,जब उनसे पूछा गया कि आप नया क्यों नही ले लेते,तब उन्होंने कहा मैं ऐसे हजार खरीद सकता हूँ, 10 फरारी , 2 जेट प्लेन , डायमंड घड़ियां खरीद सकता हूँ।। लेकिन मुझे ये सब क्यों चाहिए ?

मैंने गरीबी देखी है मैं पढ़ नही पाया उस वजह से,मैंने स्कूल्स बनवाये हैं ताकि लोग पढ़ पाए,मेरे पास जूते नही थे, मैं बिना जूतों के खेलता था,अच्छे कपड़े नही थे,खाने को नही था।। आज मुझे इतना कुछ मिला है तो मैं उसका दिखावा करने के बजाए मैं उसे अपने लोगों के साथ बांटना चाहता हूं । 

इस पोस्ट को हमारे देश के सभी ऐसे धनी को भेज दिजिए जो अपने धन पर अहंकार करते हैं। और सेवा किसे कहते हैं सीखे इनसे । 
"मत भूलिए, भगवान ने आपको शक्ति दिया है निर्बलों की रक्षा के लिए , ज्ञान दिया है अशिक्षितों को शिक्षा देने के लिए और धन दिया है सही पात्र को दान देने के लिए , अईयासियों के लिए नहीं, नहीं तो अगला जन्म..?"

और हां  मुकेश अंबानी , अदानी , सभी खान अभिनेता ,  अनील कपूर जी, कपूर खानदान, ह्रितीक रौशन जी , करण जौहर जी , क्रिकेट के भगवान कहलाने वाले सचीन जी , और धोनी आदि लोगों को तो जरूर भेजिए मेल से । क्या हमारे देश में एक भी ऐसा धनवान है जो मिशाल बने ?
कुछ लोग हमारे देश में अपने सालों के कमाई का मात्र एक दो प्रतिशत दान करके अपना फर्ज पुरा समझते हैं । और हल्ला ऐसे करते हैं जो बहुत एहसान कर दिया हो देश के गरीबों पर । इनको यह आइना दिखाना जरूरी है।

आज के शहरिकरण , बाजारवाद , भौतिक भोगवाद के युग में शादी विवाह में बहुत सावधानी की जरूरत है :-

मेरी सलाह :- आज के शहरिकरण , बाजारवाद , भौतिक भोगवाद के युग में शादी विवाह में बहुत सावधानी की जरूरत है :- 

 जो परिवार परोपकारी नहीं है । जो मां बाप परोपकार का काम कभी नहीं किया जीवन में या नाम मात्र का किया है  , उसका लड़का भी परोपकारी नहीं होगा कभी ज्यादातर केस में । और जो परोपकारी नहीं होगा तो उसके सीने में दया नहीं होगा । और दया नहीं होगा तो ऐसा लोग कुछ भी ग़लत कर सकता है किसी के साथ । 

संस्कार सबसे पहले मां बाप , दादा दादी से परिवार में मिलता है । तो जो परिवार सामाजिक कामों में , गरीबों के लिए , समाज में धन दान नहीं किया, सेवा भाव नहीं उसमें  । सामान दान ( जैसे अन्न , धन आदि ) नहीं किया या किया तो बस नाम मात्र का औपचारिकता के लिए दिखाने के लिए केवल  । 
बस एक दो दस रूपया किसी भिखाड़ी  के कटोरे में कभी कभी डाल दिया । और मंदिर मंदिर , तिरथ विरथ, पुजा पाठ , कर्मकांड जैसे सत्यानारायण भगवान आदि का पुजा आदि  केवल करता है उनमें से सभी लोग आध्यात्मिक नहीं होता  , यानि परोपकारी नहीं होता ।

दरअसल  ऐसे लोग भगवान को , रिस्तों को , अपनी इच्छा पूर्ती का साधन समझते हैं केवल  , इसलिए कर्म कांड यानि सत्यनारायण का पुजा , हवन आदि करते रहते  है लोग अपनी इच्छा पूर्ति के लिए ।

 ऐसे लौंग जो self centred  होते हैं चाहे धन कितना भी हो , नौकड़ी कितनी भी अच्छी हो । बंगला कितना भी बड़ा हो , गाड़ी कितनी भी बड़ी हो , घर में सोफासेट हो , बढीया फरनिचर हो , झाड़फानुष हो , शरीर पर चमकता दमाकता लिवास हो , मंहगे जुते हो , हाई स्टेटस हो पर जरूरी नहीं कि ऐसे सभी परिवार में बढीया  माइंड सेट हो , चरित्र वरित्र बढीया हो , तो ऐसे घर में आप लड़की देंगे तो एक दिन आपके लड़की को तड़पाऐगे ही ।

तो जिसमें दैविक गुण नहीं है जैसे ईमानदारी , जीवों के लिए दया , प्रेम,  करूणा , त्याग , वलिदान , क्षमा , नैतिकता आदि  मानवता का गुण नहीं है तो वो मनुष्य के रूप में भेड़िया होता है । वो समाज , देश के ऊपर बोझ होता है । ऐसे लोग अयीयास होते हैं । 
तो  ऐसे लोगों के घर में अपनी वे
बेटी का व्याह कभी नहीं करना चाहिए । और बेटी वाले को भी चाहिए की वो अपने बेटी को अच्छा संस्कार दे और बेटी के व्याह के बाद उसको प्रत्येक दिन फ़ोन करके उसके किचन में क्या बन रहा है का खोज खबर ना ले । इससे बेटी का घर बसता नहीं तबाह होता है । अपनी बेटी को संस्कार का शिक्षा दे पहले ।
और अगर बेटा बाला संस्कारी हैं और परोपकारी है तो उसको अपने घर में बहु लाने से पहले वो भी यह चेक करें की जीस घर का वो बहु ला रहा है वो कितना परोपकारी है , कैसा संस्कार दिया है अपने बेटी को ? और दोनों लड़का पक्ष और लड़की पक्ष एक दुसरे के बारे में यह पता लगाएं की दोनों का परिवार परोपकार के लिए कितना काम किया है , कितना धन अपने उपर खर्च किया और अपने आमदनी का कितना प्रतिसत सही सही दान किया । अगर नहीं तो वो परोपकारी नहीं , नैतिक चरित्र का स्वामीं नहीं । दुसरे जीवों के लिए उसमें  दया का भाव , करूणा का भाव , प्रेम का भाव नहीं है ।

 तो ऐसे परिवार में शादी करने के बाद लोग पछताते हैं । और पछताऐगे हीं । 
आज कल लोग शादी तय करते हैं इस आधार पर कि लडका लडकी कितना पढ़ा लिखा है , कितना धन है , कितना बढ़िया नौकड़ी व्यापार है । कैसा बंगला मकान है , कैसा समाजिक स्टेटस है आदि ।
पढ़ाई लिखाई , बंगला गाड़ी , नौकर चाकर , स्टेटस यह कभी गारंटी नहीं देता की परिवार कितना  परोपकारी है । धन का लोलुप , मानवता के दुश्मन , धन के रेस का  स्वामी  जरूरी नहीं चरित्रबान हो । आजकल लोग शादी को ऊंचे घर , पावर , दौलत , पैरवी , ऊंचा स्थान , आदि के लोभ में करते हैं । स्टेटस सिंबल मानते हैं रिस्ते को जिस कारण लड़का लड़की के वैबाहिक जीवन के सफलता का ध्यान कहीं से नहीं रखा जाता । शादी विवाह आदी  में खुब खर्च , पैसों का दुरूप्योग स्टेटस सिंबल से जोड़ दिया जाता है । तो ऐसी घटना शादी के बाद घटना स्वाभाविक है कि संबंध में दरार पैदा हो जाए और दोनों घर तबाह हो जाए ।  
अत: दोनों परिवार परोपकारी है या नहीं , लड़का लड़की परोपकारी है या नहीं । अगर है तो लड़के के स्टुडेंट लाइफ में लड़का के पास कितना ऐसा सर्टिफिकेट्स है जो उसको सोसल वर्क , समाजिक काम में भाग लेने पर मिला है ? फिर जब से वो नौकड़ी या व्यापार कर रहा है तो उसने कितना दान पुण्य अपने कमाई से किया है ? चेक करें पहले । उसके मां बाप का भी समाजिक काम , परोपकार के काम को चेक करें । नहीं तो वो केवल मुख से अपना बड़ा बड़ा बड़ाई कर देगा पर अंदर कोई काम ऐसा नहीं किया है पता चलेगा बाद में । 

अत: यहां आध्यात्मिक परिवार से मतलव यह है कि उसमें त्याग , दान पुण्य , परोपकार , दया का काम कितना किया है । नहीं तो आपको बोल देगा की हम बहुत पुजा पाठ करते हैं , एक एक घंटा घंटी डोलाते है घर में , खुब धार्मिक यात्रा करते हैं । और समझ लेंगे वो आध्यात्मिक है फिर आप ठगा जाएंगे ।  कारण ऐसा लोग भगवान को , समाज को , देश को ,  रिस्तो को केवल अपने ईच्छा पूर्ति का साधन समझते हैं और किसी के जीवन का इस्तेमाल अपने हित के लिए करतें हैं , यही कारण है कि इन दैविक गुणों और कर्मो के अभाव में लोग लड़का लड़की का जीवन बर्बाद करने में भी नहीं चुकते । 
अत: जो वास्तविक परोपकारी होगा वो अनैतिक काम कभी नहीं करेगा । 
आज ऐसा अच्छा बहुत लोग हैं , बहुत परिवार अच्छा है नहीं तो धरती समाप्त हो गया होता । अभी साठ सत्तर  प्रतिशत से ऊपर अच्छे लोग हैं इसलिए समाज रहने लायक बचा है । पर हम खोजना नहीं चाहते , हम बाहरी चकाचौंध के तरफ,  स्टेटस के तरफ जाते हैं और परेशानी खुद मोल लेते हैं । 
- संजीव कुमार , रांची , मुजफ्फरपुर।।

तेरा हर फैसला‌ मंजूर है , कबुल है ।।

किस्मत है वो हमारी जो तेरा फैंसला है,
राजी हैं हम उसी में जिस में तेरी रजा है,

होता वही है जो तुम चाहते हो , 
तो जो तुम चाहते हो उसी को मैं भला क्यूं न चाहुँ ?
 तुम तो हो भगवन , मां बाप एक हमारे ,  
तुम अपने बच्चे का भला हीं चाहते हो
 करते हो भला हमेशा ,अपनी बुद्धि क्यों लगाऊं ?
तुमसे अलग ऐ हमदम चाहत मैं क्यों सजाऊँ ? 
खुद की चाह और चिंता दोनो को बंद करके,
भजता हुं सिर्फ तुमको , मैं औरों को कैसे चाहुं ?

हाथो को दुआ की खातिर मैं उठाऊंँ कैसे ,
सजदे में तेरे आकर सर को झुकाएं कैसे,
मजबूरियांँ हमारी बस तू ही जानता है ,
राजी हैं हम उसी में जिस में तेरी रजा है,

रो कर कटे या हंस कर, कटती है जिंदगानी,
तू गम दे, या ख़ुशी दे सब तेरी मेहेरबानी,
तेरी ख़ुशी समझ कर सब गम भुला दिया है,
राजी हैं हम उसी में जिस में तेरी रजा है 
किस्मत है वो हमारी जो तेरा फैंसला है, 
करो हर फैसले तुम , वो मेरे लिए सही है,
राजी है हम उसी में जिसमें तेरी रजा है ।।