Thursday, 7 January 2021
हमारा प्यारा प्रेम मंदिर , वृंदावन , हमारे प्यारे श्री कृपालु महाप्रभु जी का देश ।
प्रेम मंदिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले के समीप वृंदावन में स्थित है। इसका निर्माण जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा भगवान कृष्ण और राधा के मन्दिर के रूप में करवाया गया है।[2] प्रेम मन्दिर का लोकार्पण १७ फरवरी को किया गया था। इस मन्दिर के निर्माण में ११ वर्ष का समय और लगभग १०० करोड़ रुपए की धन राशि लगी है। इसमें इटैलियन करारा संगमरमर का प्रयोग किया गया है और इसे राजस्थान और उत्तरप्रदेश के एक हजार शिल्पकारों ने तैयार किया है। इस मन्दिर का शिलान्यास १४ जनवरी २००१ को कृपालुजी महाराज द्वारा किया गया था।[3] ग्यारह वर्ष के बाद तैयार हुआ यह भव्य प्रेम मन्दिर सफेद इटालियन करारा संगमरमर से तराशा गया है।[2] मन्दिर दिल्ली – आगरा – कोलकाता के राष्ट्रीय राजमार्ग २ पर छटीकरा से लगभग ३ किलोमीटर दूर वृंदावन की ओर भक्तिवेदान्त स्वामी मार्ग पर स्थित है। यह मन्दिर प्राचीन भारतीय शिल्पकला के पुनर्जागरण का एक नमूना है। सम्पूर्ण मन्दिर ५४ एकड़ में बना है तथा इसकी ऊँचाई १२५ फुट, लम्बाई १२२ फुट तथा चौड़ाई ११५ फुट है।[3] इसमें फव्वारे, राधा-कृष्ण की मनोहर झाँकियाँ, श्री गोवर्धन लीला, कालिया नाग दमन लीला, झूलन लीला की झाँकियाँ उद्यानों के बीच सजायी गयी है। यह मन्दिर वास्तुकला के माध्यम से दिव्य प्रेम को साकार करता है। सभी वर्ण, जाति, देश के लोगों के लिये खुले मन्दिर के लिए द्वार सभी दिशाओं में खुलते है। मुख्य प्रवेश द्वारों पर आठ मयूरों के नक्काशीदार तोरण हैं तथा पूरे मन्दिर की बाहरी दीवारों पर राधा-कृष्ण की लीलाओं को शिल्पांकित किया गया है। इसी प्रकार मन्दिर की भीतरी दीवारों पर राधाकृष्ण और कृपालुजी महाराज की विविध झाँकियों का भी अंकन हुआ है। मन्दिर में कुल 94 स्तम्भ हैं जो राधा-कृष्ण की विभिन्न लीलाओं से सजाये गये हैं। अधिकांश स्तम्भों पर गोपियों की मूर्तियाँ अंकित हैं, जो सजीव जान पड़ती है। मन्दिर के गर्भगृह के बाहर और अन्दर प्राचीन भारतीय वास्तुशिल्प की उत्कृष्ट पच्चीकारी और नक्काशी की गयी है तथा संगमरमर की शिलाओं पर राधा गोविन्द गीत सरल भाषा में लिखे गये हैं। मंदिर परिसर में गोवर्धन पर्वत की सजीव झाँकी बनायी गयी है।
ये याद रखिये की भारत में सबसे ज्यादा मौते कोलस्ट्रोल बढ़ने के कारण हार्ट अटैक से होती हैं। इसका परमानेंट समाधान ।
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ये याद रखिये की भारत में सबसे ज्यादा मौते कोलस्ट्रोल बढ़ने के कारण हार्ट अटैक से होती हैं। इसका परमानेंट समाधान ।
आप खुद अपने ही घर मैं ऐसे बहुत से लोगो को जानते होंगे जिनका वजन व कोलस्ट्रोल बढ़ा हुआ हे।
अमेरिका की कईं बड़ी बड़ी कंपनिया भारत मैं दिल के रोगियों (heart patients) को अरबों की दवाई बेच रही हैं !
लेकिन अगर आपको कोई तकलीफ हुई तो डॉक्टर कहेगा angioplasty (एन्जीओप्लास्टी) करवाओ।
इस ऑपरेशन मे डॉक्टर दिल की नली में एक spring डालते हैं जिसे stent कहते हैं।
यह stent अमेरिका में बनता है और इसका cost of production सिर्फ 3 डॉलर (रू.150-180) है।
इसी stent को भारत मे लाकर 3-5 लाख रूपए मे बेचा जाता है व आपको लूटा जाता है।
डॉक्टरों को लाखों रूपए का commission मिलता है इसलिए व आपसे बार बार कहता है कि angioplasty करवाओ।
Cholestrol, BP ya heart attack आने की मुख्य वजह है, Angioplasty ऑपरेशन।
यह कभी किसी का सफल नहीं होता।
क्यूँकी डॉक्टर, जो spring दिल की नली मे डालता है वह बिलकुल pen की spring की तरह होती है।
कुछ ही महीनो में उस spring की दोनों साइडों पर आगे व पीछे blockage (cholestrol व fat) जमा होना शुरू हो जाता है।
इसके बाद फिर आता है दूसरा heart attack ( हार्ट अटैक )
डॉक्टर कहता हें फिर से angioplasty करवाओ।
आपके लाखो रूपए लुटता है और आपकी जिंदगी इसी में निकल जाती हैं।
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अब पढ़िए
उसका आयुर्वेदिक इलाज
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अदरक (ginger juice) -
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यह खून को पतला करता है।
यह दर्द को प्राकृतिक तरीके से 90% तक कम करता हें।
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लहसुन (garlic juice)
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इसमें मौजूद allicin तत्व cholesterol व BP को कम करता है।
वह हार्ट ब्लॉकेज को खोलता है।
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नींबू (lemon juice)
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इसमें मौजूद antioxidants, vitamin C व potassium खून को साफ़ करते हैं।
ये रोग प्रतिरोधक क्षमता (immunity) बढ़ाते हैं।
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एप्पल साइडर सिरका ( apple cider vinegar)
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इसमें 90 प्रकार के तत्व हैं जो शरीर की सारी नसों को खोलते है, पेट साफ़ करते हैं व थकान को मिटाते हैं।
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इन देशी दवाओं को
इस तरह उपयोग में लेवें
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1-एक कप नींबू का रस लें;
2-एक कप अदरक का रस लें;
3-एक कप लहसुन का रस लें;
4-एक कप एप्पल का सिरका लें;
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चारों को मिला कर धीमीं आंच पर गरम करें जब 3 कप रह जाए तो उसे ठण्डा कर लें;
अब आप
उसमें 3 कप शहद मिला लें
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रोज इस दवा के 3 चम्मच सुबह खाली पेट लें जिससे
सारी ब्लॉकेज खत्म हो जाएंगी।
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परिवर्तन एवं रुपांतरण( change and transformation )
परिवर्तन एवं रुपांतरण( change and transformation )
आज समुचे संसार की शिक्षा का फोकस परिवर्तन के उपर है , सैद्धान्तिक शिक्षा के द्वारा बैचारिक परिवर्तन ! शिक्षकों का फोकस संसारिक शिक्षा के द्वारा स्टुडेण्ट का बैचारिक परिवर्तन कराना है । उँचे उँचे , बड़े बड़े कौलेजों, युनिभरसिटियों में परिवर्तन के उपर ध्यान दिया जाता है । यही कारण है फेल्योर का । परिवर्तन कभी स्थाई नही हो सकती । कारगर नही हो सकती !
आप खुद देखिय आप प्रण करते हैं , संकल्प करते हैं कि मै आज से झुठ नही बोलुंगा , क्रोध नही करुँगा आदि आदि पर यह कितने दिन चलता है । दो दिन , तीन दिन चार दिन या बैचारिक परिवर्तन के फलस्वरुप कुछ और दिन , पर जैसे हीं बाहरी परिस्थिति बदलती है , आपके सामने प्रतिकूल परिस्थिति आता है आपका प्रण , संकल्प समाप्त हो जाता है और आप क्रोध कर लेतें हैं , झुठ बोल लेते हैं ।
तो फिर क्यों हुआ ऐसा । ऐसा इसलिए हुआ की ज्ञान के परिणाम स्वरुप आपका केवल बैचारिक परिवर्तन हुआ है , आन्तरिक रुप से आप वही है जो पहले थे ।
लेकिन एक व्यक्ति का जब वास्तविक समर्थ सद्गुरु , संत व महापुरुष के संगति के फलस्वरुप , मेडिटेशन के फलस्वरुप जब रुपांतरित हो जाता है तो वह व्यक्ति हमेशा के लिए बदल जाता है , उसका रुपांतरण (Transformation ) हो जाता है ।
इसलिए ट्रांसफौर्मेशन स्थाई है । चेंज (परिवर्तन )कभी स्थाई नही हो सकता ।
ट्रांसफौर्मेशन केवल वास्तविक संत व महापुरुष के संसर्ग से ही संभव है ।
जैसे डाकु रत्नाकर का नारद जैसे संत के प्रभाव से ट्रांसफौर्मेशन हो गया और एक डाकु "रत्नाकर" महान संत - वाल्मिकि बन गया ।
इस लिए एक डाकु रत्नाकर संत कृपा से वाल्मिकि बन सकता है परंतु वाल्मिकि कभी फिर डाकु नही बन सकता , क्योकि उसका काया पलट हो गया , रुपांतरण हो गया , ट्रांसफौर्मेशन हो गया ।
दुसरा उदाहरण : एक कैटरपिलर वटरफ्लाई बन जाता है । पर एक वटरफ्लाई फिर कभी कैटरपिलर नही बन सकता ।
इसलिए ट्रांसफौर्मेशन जरुरी है , परिवर्तन नही ।
और ट्रांसफौर्मेशन के लिए वास्तविक समर्थ हमारे श्री कृपालु महाराज जी जैसे संत की आवश्यकता है । और महाराज जी ने जो मेडिटेशन बताई है वो परम आवस्यक है करना । नही तो केवल बैचारिक स्तर पर परिवर्तन होगा जिससे कोई लाभ नही है । इसलिए इस युथ शीविर ( पौजिटीभ एवेयरनेश कैंप) का फोकस आप लोगों के ट्रांसफौर्मेशन पर है जिसका लाभ संसार और आध्यात्म दोनो जगत मे आपको मिलेगा ।
:- संजीव , उड़िसा , टांगी जनवरी 2018
Tuesday, 5 January 2021
हृदय की इच्छाएं कुछ भी पाकर शांत नहीं होती हैं। क्यों?
हृदय की इच्छाएं कुछ भी पाकर शांत नहीं होती हैं। क्यों?
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एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ लगी थी।
किसी फकीर ने सम्राट से भिक्षा मांगी थी। सम्राट ने उससे कहा,''जो भी चाहते हो, मांग लो।''
दिवस के प्रथम याचक की कोई भी इच्छा पूरी करने का उसका नियम था।
उस फकीर ने अपने छोटे से भिक्षापात्र को आगे बढ़ाया और कहा,''बस इसे स्वर्ण मुद्राओं से भर दें।''सम्राट ने सोचा इससे सरल बात और क्या हो सकती है! लेकिन जब उस भिक्षा पात्र में स्वर्ण मुद्राएं डाली गई, तो ज्ञात हुआ कि उसे भरना असंभव था।
वह तो जादुई था। जितनी अधिक मुद्राएं उसमें डाली गई, वह उतना ही अधिक खाली होता गया! सम्राट को दुखी देख वह फकीर बोला,''न भर सकें तो वैसा कह दें। मैं खाली पात्र को ही लेकर चला जाऊंगा!
ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा कि लोग कहेंगे कि सम्राट अपना वचन पूरा नहीं कर सके !
''सम्राट ने अपना सारा खजाना खाली कर दिया, उसके पास जो कुछ भी था, सभी उस पात्र में डाल दिया गया, लेकिन अद्भुत पात्र न भरा, सो न भरा।
तब उस सम्राट ने पूछा,''भिक्षु, तुम्हारा पात्र साधारण नहीं है। उसे भरना मेरी सामर्थ्य से बाहर है। क्या मैं पूछ सकता हूं कि इस अद्भुत पात्र का रहस्य
क्या है?''
वह फकीर हंसने लगा और बोला,''कोई विशेष रहस्य नहीं। यह पात्र मनुष्य के हृदय से बनाया गया है।
क्या आपको ज्ञात नहीं है कि मनुष्य का हृदय कभी भी भरा नहीं जा सकता?
धन से, पद से, ज्ञान से- किसी से भी भरो, वह खाली ही रहेगा, क्योंकि इन चीजों से भरने के लिए वह बना ही नहीं है। इस सत्य को न जानने के कारण ही मनुष्य जितना पाता है, उतना ही दरिद्र होता जाता है।
हृदय की इच्छाएं कुछ भी पाकर शांत नहीं होती हैं। क्यों?
क्योंकि, हृदय तो परमात्मा को पाने के लिए बना है।''
धन के तीन प्रकार की गति होती है ।
धन के तीन प्रकार की गति होती है
पहला- गति,
दूसरा- सद्गति ,
तीसरा - दुर्गति । ( यानी - सात्त्विक गति, राजसिक गति , तामसिक गति )
अगर हम आप अपने धन का सदुपयोग नहीं करेंगे तो धन का नाश और दुरूपयोग निश्चित है। धन रहेगा नहीं । लक्ष्मीं चंचला हैं । आए बंद हो जाएगी , दरिद्रता आएगी हीं । यह निश्चित है ।
धन का गति - अपने शरीर को तथा अपने आश्रितों के शरीर के जरूरी तत्त्वों के उपर खर्च करना धन की गति है । अपने शरीर और अपने उपर आश्रित जीवों के आवश्यक आवश्यकता पर खर्च करना धन की गति है । यह आवश्यक हैं । जो कंजुसी करता है , अपने आवस्यक आवस्यकता के उपर , अपने उपर आश्रित जीवों के उपर खर्च नहीं करता तो उसके धन का नाश , रोग और शोक में होता है ।
धन की सद्गति - अपने कमाई से या संचित धन का एक हिस्सा सत्पात्र को दान करना । हरि -गुरू के निमित्त दान करना धन की सद्गति है । इससे इह्लोक और परलोक दोनों का लाभ मिलता है । इससे जीवों के अच्छे प्रारब्ध का निर्माण होता हैं । धन के सदुप्योग से भौतिक सुख-शारीरिक सुख और दान से जीव हरि-गुरून्मुख होकर असीम मानसिक सुख का , अध्यात्मिक सुख का, भगवद्प्रेम की लालसा का बढ़ना और भगवद् कृपा का सुख मिलता है । हरि गुरू की विषेश कृपा प्राप्त होती है । हरि गुरू इस दान में प्राप्त धन को भोले भाले दुसरे जीवों के लिए खर्च करतें हैं । वो धन को इसी लोक में जीवों के उपर लुटातें हैं । एक स्वस्थ व्यक्ति को रक्त दान भी करना आवश्यक है । जिसको रक्त की जरूरत हो मिल जाए , वो बेचारा बच जाए ।
हरि गुरू धनवान वेटे से धन लेकर अपने निर्धन पुत्र के निमित्त खर्च करतें हैं और धन की सेवा करने वाले के अच्छे प्रारब्ध का निर्माण करतें हैं चुप चाप , बिन बोले , बिना बतलाए । योगक्षेम बहन करतें हैं , सम्भालतें रहते हैं ।
धन की दुर्गति - अब अगर धन का उपर्युक्त बिधि से गति और सद्गति नहीं होता हैं तो धन का दुर्गति तो होगा हीं , चौथा रास्ता तो है हिं नहीं ।
ऐसे में धन का लुट जाना , डकैती हो जाना , चोरी हो जाना , संचित धन का नाश कुपुत्र के द्वारा । तामसिक पदार्थों के उपर धन का खर्च होकर नाश , जैसे शराब, कबाब , जुआ , ( शेयर मार्केट ) व्यापार में नुकसान व घाटा , रोग , दुर्घटना , केस , मुकदमा आदि के माध्यम से धन का नाश होगा हीं । और इनकम भी बंद हो जाता है । आय बंद । दरिद्रता आ जाती है ।
आवस्यक आवस्यकता से अधिक की बस्तु पर धन खर्च करना , भोग बिलास की बस्तुओं पर खर्च करना धन का दुरूपयोग है , दुर्गति है ।
Monday, 4 January 2021
उत्तम गति कौन पाता है ?
बिना धर्म के किसी का भी अस्तित्व संभव हीं नहीं ।
चाहे वो जड़ हो , जंगम हो , स्थावर हो या चेतन हो ।
राक्षस हो या मनुष्य हो , देव हो या दानव हो ।
जो खुद को नहीं जानता और बाहरी दुनिया में हीं भटकता रहता है वो ही कहता है कि मैं धर्म को नहीं मानता । ऐसा व्यक्ति बाहर के दुनिया में भटकते भटकते एक दिन ऐसा मरता है जैसे कभी जिया हीं नहीं । ऐसे जीव का मृत्यु बड़ा दुखदाई होता है । जीवन के अंतिम क्षणों में वो खुद को खोखला पाता है । मानसिक वेदना के दलदल में फंसा कराहता रहता है पर शांति नहीं मिलती, और यही अशांती उसको एक नया शरीर में प्रवेश करा देती है पर अफसोस की यह शरीर मानव का नहीं होता , वल्कि अशांत निकृष्ट यौनि का होता है , फिर वो उस शरीर के धर्म के अनुसार जीता है और 84 लाख यौनियो के अंतहीन पथ के चक्की में पिसता रहता है ।
अतः जो धर्म को जीता है वो उत्तम गति पाता है और जो अधर्म को जीता है वो दुर्गति को प्राप्त होता है ।
Saturday, 2 January 2021
परलोक कब बनेगा । जीवन सदा के लिए सुखी कैसे होगा ?
एक फ़कीर नदी के किनारे बैठा था किसी ने पूछा बाबा क्या कर रहे हो? फ़कीर ने कहा इंतज़ार कर रहा हूँ की पूरी नदी बह जाएं तो फिर पार करूँ।उस व्यक्ति ने कहा कैसी बात करते हो बाबा पूरा जल बहने के इंतज़ार मे तो तुम कभी नदी पार ही नही कर पाओगे।
फ़कीर ने कहा यही तो मै तुम लोगो को समझाना चाहता हूँ की तुम लोग जो सदा यह कहते रहते हो की एक बार जीवन की ज़िम्मेदारियाँ पूरी हो जाये तो हरि गुरू सेवा, रूपध्यान संकिर्तन ,सत्संग शुरू करेंगे;
जैसे नदी का जल खत्म नही होगा, हमको इस जल से ही पार जाने का रास्ता बनाना है इस प्रकार याद रखो जीवन खत्म हो जायेगा पर जीवन के काम खत्म नही होंगे इन कार्यो , जिम्मेदारियों के बीच मे से ही आगे की तैयारी यानि हरि गुरू सेवा, रूपध्यान संकिर्तन ,सत्संग का मार्ग बनाना है ,जिससे परलोक बनेगा , गोलोक मिलेगा , परमानंद की प्राप्ति होगी , सदा के लिए सुखी हो जायेंगें ।
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