Tuesday, 13 April 2021

ज्ञान, तत्त्वज्ञान और सिद्धांत क्या है ? क्या अंतर है ?

ज्ञान, तत्त्वज्ञान और सिद्धांत क्या है ? क्या अंतर है ? 
श्री महाराज जी बार बार कहतें हैं कि 
" यह सब ज्ञान की बातें हैं ,इसको छोड़ो , केवल तत्त्वज्ञान को और सिद्धांत को हमेशा अपने मस्तिष्क में बैठाए रखो , यह जरूरत के समय सुरक्षा करेगा , तुम्हारी रक्षा करेगा , पतन नहीं होने देगा । "
अब हमको यह अंतर अगर मालुम नहीं है कि कौन ज्ञान है और कौन तत्त्वज्ञान है तो हम किसको छोड़ें , किसको रखें ? 
तो ज्ञान जो है वो तमाम तरह का है भौतिक ज्ञान , संसार का ज्ञान । इतिहास, भूगोल , मैथ जीव विज्ञान आदि ज्ञान है , और भौतिक में सिद्धांत भी है जैसे -तमाम तरह का वैज्ञानिक जैसे - न्यूटन , का आर्कमिडीज आदि का सब जानते हैं , यह सब भी ज्ञान है , पर हमको जानना है केवल आध्यात्मिक- ज्ञान , तत्त्वज्ञान और सिद्धांत ।

तो सबसे पहले हमसब यह जानते है कि ज्ञान चाहे वो भौतिक हो या आध्यात्मिक वो हमेशा सत्य होता है , जो असत्य है वो परिकल्पना है , वो मिथ्या है, यह ज्ञान नहीं है इसमें कोई बहस नहीं ।

अब अध्यात्म में जो जानकारी है वो ज्ञान है और आध्यात्म में जो विज्ञान है वो तत्त्वज्ञान है । और आध्यात्म में जो सिद्धांत है जो संतों द्वारा शास्त्रों से मथ कर वनाया गया है हमारे आध्यात्मिक लाभ के लिए , आध्यात्मिक जीवन मुल्यों के लिए वो सिद्धांत हैं ।

तो जैसे भौतिक विज्ञान का सिद्धांत खोजा गया , दिया गया आर्कमिडीज के द्वारा "प्लवन का सिद्धांत" ठीक उसी प्रकार आध्यात्म का वैज्ञानिक -उनके संत जो सिद्धांत का प्रतिपादन किए और जिसका आदेश , उपदेश हमे दिए , जिससे हमारा परम कल्याण हो सके वो सिद्धांत है । 

अब उदाहरण -नारियल का फल - जिस प्रकार नारियल का फल होता है उसका ऊपरी परत अज्ञान है मान लिजिए थोड़ी देर के लिए , तो उसके अंदर का रेशा , वो ज्ञान है परत दर परत , उसके वाद उसके अंदर फल है उजला , जिसको हम खातें हैं तो यह तत्त्वज्ञान है , और उसका पानी सिद्धांत हैं । और किसी नारियल में फुल है वो भक्ति है ।

तो इस उदाहरण से यह समझ आया की ज्ञान में तत्त्वज्ञान , सिद्धांत और भक्ति छुपा रहता है । यह एक साथ रहता है ‌।
बिना ज्ञान का अज्ञान नहीं जाएगा । और बिना अज्ञान समाप्त हुए तत्त्वज्ञान नहीं होगा । और बिना तत्त्वज्ञान के भक्ति करना असंभव है । असंभव । 
बिना भक्ति किए भगवद् भक्ति "ओरिजनल भक्ति" गुरू द्वारा नहीं मिलेगा ।

अब अच्छे से समझते हैं । एक जीव वो शास्त्र पढ़ लिया और आध्यात्मिक शिक्षक ( विना भगवद् प्राप्त शिक्षक ) से ज्ञान पाया इतिहास की तरह उपर ही उपर वो केवल ज्ञान है उनको तत्वज्ञान नहीं है । तो यह मृत ज्ञान हुआ ।
बिना तत्त्वज्ञान के ज्ञान मृत कहलाता है । क्योंकि तत्वज्ञान ज्ञान का प्राण होता है । 

ज्ञान का उदाहरण- अब वो शिक्षक तमाम प्रोफैशनल प्रवचन कर्ता है बिना प्रैक्टिकल के केवल थ्योरी है उनके पास वो स्पीच देतें हैं जैसे राम की कहानी कह दिया , श्रीकृष्ण की कहानी आदि । मतलब इतिहास की तरह कि दशरथ के पिता का नाम ए था उनके चार पुत्र हुए फिर आगे कथा की तरह कह दिया सभी कांड रामायण का और बोल दिया की भगवान के अवतार थे राम और कृष्ण । फिर और कोई थोड़ा और बोल दिया विष्णु के अवतार थे , फिर पुछा विष्णु कौन थे तो शास्त्रों का शाब्दिक अर्थ बोल दिया विष्णु भगवान थे , पालन कर्ता है यह सब उपर उपर का बात ज्ञान हैं । वो ए भी बोल दिय कि हम आत्मा है । फिर आत्मा क्या है तो बोल दिय परमात्मा का अंश है बस इसके आगे उनको नहीं पता जो तत्वज्ञान है वो नहीं मालुम उनको ठीक ठीक ।

तत्त्वज्ञान का उदाहरण - पर असली संत प्रैक्टिकल संत , भगवद् प्राप्त ओरिजनल जगद्गुरू हीं अपने प्रैक्टिकल अनुभव से तत्त्वज्ञान बता सकते है । क्योंकि तत्वज्ञान थ्योरि की चीज नहीं अनुभव की बात है ‌ ।
जैसे आत्मा किस प्रकार से भगवान का अंश हैं । जैसे यह भगवान श्रीकृष्ण के हीं जीव शक्ति विशेष का अंश है । उनके उर्जा का अंश है, छोटा है ,लिमिट है ,जैसे एक लाख वाट का सौ वाट बल वो है और परमात्मा से हीं प्रकाशित है । परमात्मा प्रकाशक हैं , आत्मा प्रकाशित है परमात्मा सर्वशक्तिमान हैं तो कैसें हैं आत्मा अल्पशक्ति धारक कैसे है आदि आदि।

इसी प्रकार भगवान कौन है? परमात्मा और ब्रह्म कौन हैं क्या अंतर है ? क्या क्या शक्ति प्रकट है अलग अलग तीनों में तो यह तत्वज्ञान हुआ ।

भगवान का , उनका लीला का "नौलेज" ज्ञान है पर भगवान के बारे में और उनके उनके लीला विशेष का उद्देश्य , रहस्य , तत्त्वज्ञान है । ठीक उसी प्रकार भगवान का गुण , भगवान का धाम , उनके संत, उनके शक्ति की बिशेष जानकारी तत्वज्ञान है । माया के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान भी तत्वज्ञान है ।
तो रामायण में , गीता में तमाम ज्ञान है और उनमे छुपा तत्वज्ञान है जो मूल है शास्त्रों का । प्राण है शास्त्रों का ।

जैसे और समझ लिजिए क्लियर हो जायगा उदाहरण से गीता में भगवान अर्जुण को उपदेश दिए तो सतरह अध्याय तक अर्जुण पुछता रहा भगवान ज़बाब देते रहे सब प्रकार का ज्ञान जैसे कर्म , धर्म , राजयोग , जप ,तप , यज्ञ , आसन , प्राणायाम , आदि का वो ज्ञान है ।
फिर अंत में अर्जुण जब यह पुछा कि हे माधव आप कौन हैं , मैं कौन हुं , ए सब कौन है , संसार क्या है लोक परलोक क्या है आदि आदि , तभी वो तत्वज्ञान दिय भगवान और अपना वास्तविक स्वरूप भी दिखाय। 

तो जो तत्वज्ञान दिया । तत्त्व यानी परम तत्त्व यानी भगवान कौन ? उनका रूप , गुण , शक्ति आदि सहित तमाम बातें तत्वज्ञान हैं । और अंत में सिद्धांत बोल दिए भगवान कि तमाम ज्ञान , कर्म , धर्म , पाप पुण्य की चिंता छोड़ मेरे शरण में मन और बुद्धि से शरण में आ जाओ ‌ । तो यह सिद्धांत हुआ ।

अब सिद्धांत - तो भगवान को पाने के लिए उनके संत जो शास्त्रों से मथ कर या स्वयं जो नियम बना दिय साधको के लिए वो सिद्धांत है । जैसे श्री महाराज जी ने चौबिस मुख्य सिद्धांत बतलाए हैं ।जो कितनी बार यहां फेसबुक पर घूमा है सबके सामने से, कुछ उदाहरण तोर पर यह है- जैसे - 
किसी के प्रति दुर्भावना ना करो ।
किसी निंदनिय की भी निंदा ना करों , आज का नास्तिक कल का उच्च साधक हो सकता हैं ।
तो इस प्रकार ऐसी तमाम निर्देश जो है वो सिद्धांत हैं ।
और रूपध्यान का विज्ञान तो हमें दिया ही हैं उन्होंने सभी को कि कैसे इसे करना है ।
तो अब जब भी श्री महाराज जी का यह बात सुनिय कि 'तमाम ज्ञान को फेंक दो , तत्वज्ञान मस्तिष्क में बैठा लो और अपने गुरू द्वारा दिया गया , बनाया गया नियम को फौलो करो । और केवल चार बातें याद रखो,और साधना करो ( चार बातें कौन सी है सबको मालुम ही है ) " तो समझ जाइए कि वो किसको छोड़ने के लिए वोले और क्या याद रखने और क्या करने के लिए । फिर हमें कनफ्युजन नहीं होगा । श्री राधे ।

सच्ची घटना । भगवान के एक भक्त की कहानी ।

सच्ची घटना । 
एक व्यक्ति भगवान को हमेशा गाली देता रहता था अकेले में या सबके सामने । वो भगवान को बहुत से गाली देता रहता था । वो किसी की बातों पर ध्यान नहीं देता था , अपनी मस्ती में रहता था , और भगवान को गाली देता था । 

गांव के लोग जब उसके झोंपड़ी के पास‌ से होकर गुजरते थे भगवान की पुजा अर्चना के लिए मंदिर में सुबह और किर्तन करने जाते थे शाम में तो उसको गाली देता सुनते थे । और फिर सब मिल कर उस बेचारे को भला बुरा कहता था , कोई कोई तो ढेला भी फेंक कर उसको मारता था , पर वो सब हंसी के साथ खुशी खुशी सह लेता और किसी के उपर कोई गुस्सा नहीं करता था । 
उल्टे किसी के कांधे से गिरा गमक्षा संभाल कर रख देता और उसके लौटते समय उसको वापस दे देता था मूस्कुराते हुए ।

कई दिन बीत गया , एक दिन वो व्यक्ति अपने झोपड़ी से गायब हो गया । 
लोगों ने सोचा चलो अच्छा हुआ । वला ठली , एक पापी जो भगवान को चौबिसो घंटे गाली देता रहता था और हम सबके कान में परता था तो हमको भी सुनकर पाप होता था , इससे निजात मिला । वो कहीं जाकर मर गया होगा , अच्छा हुआ , दफा हो गया , अच्छा हुआ ।

अब जिस दिन से वो गायब हुआ उस दिन से वर्षा बंद हो गया गांव में और जिला में । पेड़ पौधा जलने लगा । पक्षी चहकना बंद कर दिया । गाय दुध देना बंद कर दिया ।
गांव के गाय का सभी बच्चे , कुत्ता , बंदर आदि रोने लगता था सुबह शाम ।
चारों तरफ रोग , शोक आ गया । त्राहि-त्राहि मचने लगा ।

गांव वाले एक पहुंचे हुए संत के पास गय और पुछे क्या करूं रात दिन कुत्ता रोता है , गाय दुध नहीं देती है । फुल नहीं खिलते डाली पर , रात को शियार और कुत्ते रोतें हैं सब विमार हो रहे हैं । बहुत उपाय किया कुछ समझ नहीं आता है । अब आपके शरण में हुं । बताईए कौन‌ सा अपराध हो गया हम सबसे । हम सब सुबह शाम भक्ति करतें हैं भगवान का ।
 एक हीं गाली देने बाला पापी था , वो चला गया , अब तो कोई गांव में ऐसा नहीं जो उसके जैसा पापी हो । 
फिर भी हम सब पर विपत्ति आ गई है । ऐसा क्यों ।

तो वो भगवद् प्राप्त संत ने ध्यान किया । फिर कुछ देर वाद वोले ।
तुम्हारे गांव में एक मात्र वही तो धरमात्मा था , वांकी तुम सब लोग पापी हो । भक्ति का दिखावा करते हो नाटक करते हो ।
वो चला गया जो एक हीं पुण्यात्मा था तुम्हारे गांव में। जिसके बल पर तुम सब खुशहाली से थे । पेड़ पौधा , गाय , बछड़ा कुत्ता आदि सब यह जानते हैं । उसके जाने से भगवान श्री कृष्ण उसके पीछे पीछे चले गए । उनके पीछे लक्ष्मीं भी चली गई । अब भोगों ।
सब लोग रोने लगे । पांव पकड़ लिया संत का । आप कुछ करिय । 
संत बोले जिसके प्रति तुम दुर्भावना किया है माफी तो वही देगा । भगवान और मैं भी नहीं माफ कर सकता हुं ।
अब गांव बाले सब मिलकर दर दर का खाक छानने लगा उसको ढुढने के लिए ।
तीन महीने बाद वो मिला । सब उसके पैड़ों में गिर कर माफी मांगा । उन्होंने माफ भी कर दिया ।
 सब लोग बहुत धन चढ़ाया उनके पैर में, वो किसी चीज को हाथ भी नहीं लगाया और अपना झोली उठाया फिर भगवान को गाली देता हुआ , मुस्कुराता हुआ चल दिया किसी अनजान रास्ते की तरफ ।
तो इससे आपको क्या शिक्षा मिली । अपना काम करिए किसी पर अंगुली मत उठाईए । अपनी दो अंगुली की खोपड़ी से । आप सर्वांतर्यामी नहीं जो कौन क्या है जान लेंगें , किसी के बाहरी चाल चलन से आप नहीं जान सकते । नहीं तो आपको हीं बहुत नुक्सान उठाना पड़ेगा । आपका दोस्त आपको छोड़ कर चल देगा । जिसको आप अपना दुश्मन मानने की भूल कर रहें हैं ।
श्री राधे ।

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।

मेरा यह पोस्ट आध्यात्मिक्ता से तटस्थ लेख है जिसमें भौतिक , अभौतिक दोनों का समावेश है । है तो यह श्री महाराज जी द्वारा दिया दृष्टि के प्रभाव का हीं फल । पर उनके अनुयायियों से एक प्रार्थना है कि इस लेख को केवल एक लेख और बिचार के समझ से पढ़े और देखें। 
 बस एक चिंतन है ।

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।
1. परमात्म केंद्रित ( GOD Centric ) Suprime soul.
2. आत्म केन्द्रित ( Soul Centric )
3. मन केंद्रित ( Self Centric )
4. परिवार केंद्रित ( Family Centric)
5. समाज केंद्रित ( Society Centric )
6. संप्रदाय केंद्रित ( community centric )
7. विश्व केंद्रित। ( Universe centric ) 

१. God centric - इसमें वो महान जीव है जो भगवान को पुर्ण निष्काम भाव से प्रेम करतें हैं । ऐसे जीव पराकाष्ठा का भगवद् प्रेमी होतें हैं । यहां तक की वो भगवान या अपने गुरु से इतना प्यार करतें हैं कि भगवान या गुरू की इच्छा हीं उनकी इच्छा हैं । वो दर्शन दें नहीं दें , बदले में प्यार करें या न करें , कोई अपनी कामना नहीं इनको । आध्यात्मिक कामना भी नहीं , भौतिक की तो बात हीं नहीं । ए पुर्ण निष्काम मनुष्य अति दुर्लभ भगवद् अवस्था का प्रतिरूप होतें हैं । परमात्म प्रेम भाव में लीन भीतर से । दुनियां से या किसी से कोई लेना देना नहीं , विल्कूल स्थित प्रज्ञ । भौतिक शरीर , भौतिक संसार में होते हुए भी निर्विकल्प , ना शरीर का भान न ‌संसार का ना अपने आत्मा का । पुर्णपरमहंसावस्था। अद्वैत अवस्था में हरि स्वरूप होते हैं । और जन हित हेतु द्वैत भाव से अपने भगवद् स्वरूप में स्थित होते हुए विश्व के सभी जीवों के आत्मिक कल्याण हेतु शरीर धारण करतें हैं । 

२. Soul centric - ऐसे मनुष्य आत्म केन्द्रित वाले सकाम भक्त होतें हैं । इनको अपने आत्मा का प्रैक्टिकल अनुभूति , आत्म साक्षात्कार या आत्मा का ज्ञान हो गया होता है । आत्माराम होतें हैं पर ए पूर्ण निष्काम नहीं होतें हैं । हां भौतिक बस्तुओं की कामना इनको नहीं होती , ये भौतिक शरीर और संसार को एक साधन समझ कर इसका ख्याल रखतें हैं । अपने संसार का सदुपयोग भर बस । ए भगवद्‌प्रेम चाहतें हैं यही लक्ष्य होता है । आत्मा से परमात्मा के प्रेम को महसुस करना , उनको देखने , सुनने , बातें करने , आलिंगन करने , रस रूप का स्वाद और सुगंध की कामना होती है । ये भक्त होतें हैं । अपने ईष्ट व गुरू से अटूट और अनन्य प्रेम करतें हैं । 

३. Mind centric ( self centric ) ऐसे जीव भगवान और गुरू से अपने आध्यात्मिक प्यास के साथ साथ भौतिक प्यास के पूर्ति की भी कामना रखतें हैं । यानि केवल मैं और मेरा तु । लेकिन पहले मैं तब तु। इनका ध्येय वाक्य है - पहले आत्मा यानि मन तब परमात्मा, ऐसा सोचते हैं । ए मन को हीं आत्मा समझते हैं ।
भौतिक कामना की पूर्ति में व्यवधान आया तो प्यार खत्म , जिस मात्रा में भौतिक कामना की पूर्ति हुई उतना प्यार छलक गया । प्यार का उतार चढ़ाव अपने संसारिक इच्छा के पूर्ति के हिसाब से । तो ऐसे लोग आध्यात्म से और भौतिक संसार दोनों से तटस्थ होतें हैं लेकिन खुद के लिए केवल । खुद को खुद से प्यार है और भगवान से भी प्यार है पर स्व हित के लिए । पुर्ण स्वार्थी , ए भगवान, महापुरूष ,संसार , संसारिक रिस्तों का यानि परिवार , दोस्त , मां बाप , भाई बहन ,‌बेटा वेटी यानि सभी resources का इस्तेमाल खुद के संतुष्टी के लिए करतें हैं । यह खुद का भक्त होतें हैं । 
भगवान का कभी नहीं । हां भ्रम है इनको की हम भगवान का भक्ति करतें हैं , भक्त हैं पर यह सिर्फ भ्रम है ।
इनके लिए मन हीं देवता , मन हीं ईश्वर , इससे बड़ा ना‌ कोई । इनको बहुत अहंकार होता है। जरा सा बात बर्दास्त नहीं अपने मन के खिलाप । 

४. Family centric - परिवार केंद्रित , ऐसे जीवों के लिए खुद के priority के साथ परिवार का भी priority है । तो ऐसे लोग खुद और अपने परिवार तक सिमित होतें हैं । और इसी हित के लिए भगवान को पुजते है ( इनको भी भक्त नहीं कह सकते हैं ) ए पुर्णत: स:स्वार्थी होतें हैं । समाज रहे या नहीं, मैं और मेरा परिवार, जिसमें बहुत अगर है तो मां वाप को भी शामिल कर लिया नहीं तो‌ केवल मैं मेरा पति हैं मेरी पत्नी और मेरा बच्चा है बस इससे आगे कुछ नहीं । वांकी सब नाते , रिस्तेदार साधन है इनके लिए । जरूरत परे मां बाप को भगवान , भाई को भगवान , बहन को देवी स्वार्थ बस और गद्हा को भी बाप बना लेतें हैं । कोई कोई अपवाद स्वरूप मां वाप भाई से , बहन से प्रेम पर १००% निष्काम नहीं और अपने अहंकार का चरम और उसकी तूष्टि से मतलव है । आप सही वोले तो विरोध गलत बोले तो विरोध । इनका आरती उतारिए , ऐ खुश । कल भुल गए आपका विरोध । ऐसे को समझना और संतुष्ट करना असंभव है । कब किस बात पर नाराज़ हो जाए आपको बताऐंगें भी नहीं । बस खफा । 

५. Society centric - ऐ समाज सेवी होतें हैं । मानव‌मात्र , जीव मात्र के लिय दयालु ,‌ लेकिन अपने समाज तक केंद्रित होतें हैं । समाज सेवा के बदले यश , सम्मान आदर चाहिए होता है । नाम भी चाहिए होता है । ऐसे लोगों से समाज चलता है । देश सेवी भी इसी में है। 

६. Community centric ( संप्रदाय विशेष केंद्रित ) ऐ लोग कट्टर होतें हैं , अपने संप्रदाय विशेष को मानने वाले और उसके लिए ही काम करने और लड़ने बोलने बाले। ए लोग सभी चीजों का इस्तेमाल अपने संप्रदाय के अहंकार को तुष्ट करने के लिए करतें हैं । चाहे धर्म ग्रंथ हो या भगवान , जय श्री राम हो या जय शंकर या जय हनुमान या अल्लाह हो या अकबर‌ खुदा हो या कुरान , ईश्वर जीसस हो या खुदा , भौतिक रिसोर्स हो या आध्यात्मिक । पर सब अपने संप्रदाईक अहंकार की पूर्ति के लिए । एक दूसरे को निचा दिखाना और खुद को ऊंचा साबित करने का प्रयास करना , यह विशेषता होती है इन लोंगों की । इनको लगता है कि दुनिया में 12 आना अक्ल सिर्फ मेरे पास है और 4 आने में पुरी दुनियां है । 

७. Universe centric ( विश्व केंद्रित ) ऐसे लोग संसार में महान होतें हैं यह जाति पांति , धर्म , संप्रदाय , चर अचर से उपर उठकर सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय कि चिंता और प्रयास करने वाले होतें हैं । "बसुधैव कुटूंबकं"
ऐसे जीव महात्मा भी होतें हैं और समग्र जीवों के भौतिक कल्याण की भावना वाले होतें हैं , इनका मुख्य ध्यये होता है अपने भौतिक आवश्यकता को कम करो और प्रकृति से तटस्थ होकर जियो । जो आजकल बहुत कम है इस भोगवादी युग में । भगवान ऐसे लोगों को अपना माध्यम बना कर जग कल्याण का काम करतें हैं । ए संत की भांति संसार के जीवों के प्रति निष्काम भाव से समर्पित होते हैं , इनको नाम और बदनामी की कोई चिंता नहीं । बस इनमें सेवा का लक्ष्य सर्वोपरि होता है । 

तो पहला तो अति उत्तम पर्सनैलिटी है । दुसरा उत्तमतर है और सातवां उत्तम पर्सनैलिटी है, पांचवां ठीक हीं है । 
अत: हमको इन चार प्रकार से हीं मतलव रखना चाहिए ।‌ 

( मेरा यह लेख एक भुमिका है आगे के संसारिक लेख के लिए , उस लेख में इनका इस्तेमाल होगा आगे ) 
श्री राधे ।
आपका संजीव ।

Sunday, 11 April 2021

हमारे प्राणों से ज्यादा प्रिय श्री महाराज जी ।

हमारे प्राणों से ज्यादा प्रिय श्री महाराज जी ।
आप हम साधकों का प्राण हैं । आप हमारे ह्रदय सम्राट हैं । आपको गुरू रूप में पाकर हम धन्यातिधन्य हैं । 
आपकी महिमा का बखान करना हम साधारण जनों के लिए असंभव हीं हैं । 
मैं इसे अपना पुण्य पूंज मानु या आपकी कृपा मानु जो आप मिले ।
मैं तो यही जानता हुं और मानता हूँ कि मेरा कोई पुण्य है हीं नहीं , ए तो आपकी करूणा है जो आप मुझे मिले ।
आपके कृपा का थाह नहीं पाता हूँ ।
ये तो आपकी कृपा शक्ति ने मेरे जीवन को संवार दिया ।
मेरे जैसे तुक्ष जीव पर आपकी कृपा का परिणाम है, जिससे मेरे जीवन की दशा और दिशा दोनों श्री हरि की ओर उन्मुख हो गई ।
नहीं तो मैं भी अर्थ , और यश के प्राप्ति के अंधे दौड़ में पड़कर अपने किमती , बहुमूल्य मानव जीवन को यूं हीं गमा डालता ।
आप ने क्या क्या नहीं दिया मुझे भी, इस का लिस्ट बनाना मूश्किल सा है । 

सब आपको कहतें हैं कि आप हरि हैं । मैं भी जानता हूँ और मानता हुँ कि आप हीं साक्षात श्री हरि हैं । अनुभव भी किया है ।

लेकिन मेरे लिए अब एक मात्र आप हीं सबकुछ हैं ।
मेरे गुरूदेव, मेरी मां , मेरे पिता , मेरा भाई , मेरे सारे रिस्ते नातेदार अब आप से शुरू और आप हीं से खत्म होता है ।
अब आपको मैं प्यार इसलिए नहीं करता कि आप हरि का अवतार है ।
वल्कि अब तो आप से अगाध प्रेम इसलिए करता हूं कि आप हीं एक मात्र मेरे सरकार मेरे नाते रिस्तेदार , मेरे मां बाप , दोस्त सबकुछ हैं । 
आपसे बढ़कर अब कोई नहीं है मेरा ।
अब मेरी मृत्यू के समय मैं खुद को अधुरा कभी नहीं समझूंगा । 
मैं आपको पाकर अपना यह मानव जीवन सफल मानता हूं । पूर्ण मानता हूं । भगवद् प्राप्ती पाकर कैसा लगता है मुझे मालुम नहीं । इसका मुझे अनुभव नहीं है ।

मैं तो आपको पा लिया इसी को भगवद् प्राप्ती समझता हूँ।

आपको अपने ह्रदय में पा कर , चौबिसों घंटे महसूस कर मैं कृत कृत हो रहा हूँ आपकी कृपा से ।

अब मुझे लगता है कि कुछ भी पाना शेष नहीं हैं ।

भगवान आप से ज्यादा सुंदर नहीं होंगें ऐसा मुझे लगता है ।
मैंने आपके प्राकृत शरीर में आपकी कृपा से उस दिव्य शरीर को प्रतिपल अनुभव करता रहता हुँ जो आपका वास्तविक स्वरूप है - "श्री राधामहाभाव "।
हे गुरूदेव आपकी सुरत से अलग भगवान की सुरत क्या होगी ! 
आप ने मेरे मन के चंचलता को हर लिया है । आपने मुझको अपने श्री चरणों में बसा लिया हैं । मुझ जैसे तुक्ष प्राणी के दहकते मन को असीम दिव्य शीतलता प्रदान किया है ।

आपने मुझे तत्त्वज्ञान देकर मेरे घोर अज्ञानता को समाप्त किया । 
आपने मुझे अपने साधकपरिवार में सम्मिलित किया है ।

आपने मुझे पूज्यनियां मां रासेस्वरी देवी जैसी उच्च कोटी का गाईड दिया जो माता सम मुझे स्नेह देतीं हैं ।

आपने मुझे उच्चकोटी का गुरूभाई बहन जैसा परिवार दिया । 
आपने मुझे मनगढ सा दिव्य गुरूधाम दिया ।
आपने अपने प्राण सम तीनों अपने पुत्रियों सा दीदी दिया, जो बहुत स्नेह करती है हमें ।।
मैं आपका अनंत काल तक ऋणीं हूँ ।
आपके इस ऋण से ऊऋण होना असंभव है । और मैं चाहता भी नहीं ऊऋण होना ।
मैं आपका पुत्र हु़ँ , आपका दास हूँ ।
मेरी आत्मा पर अब केवल आपका एकाधिकार है गुरूदेव ।
मुझे आपने लक्ष्य भी दिया , साधना भी दी और साध्य भी आपके रूप में मिल गया । और बल भी आप हीं हैं ।
मुझे कुछ भी फिकर नहीं अब । 
अब सारी ईक्छा समाप्त । 
अब तो जब तक यह मानव शरीर है तबतक आपके हीं यादों के सहारे जी रहा हुँ ।
आपके कर्मयोग की शिक्षा, प्रेरणा और बल से मैं जीवन जी रहां हूं । एक ऐसा जीवन जो अनासक्त हैं संसार से ।
अब मेरी आसक्ति तो केवल आपके चरणों से है गुरूदेव ।
मैं आपके प्रेरणा से यह समझ गया हूंँ और आस्वस्त हूंँ, विस्वस्त हूँ कि मेरी मृत्यू के पश्चात आपके श्री चरणों की सेवा हीं मिलेगी और इस आवागमन से छुट्टी मिलेगी ।

अब तो आप जब आऐंगे धरा धाम पर अपनी परकिया भाव की लीला करने तब मैं भी आऊंगा आपके चरणों का दास बनकर । बस अब आपकी सेवा हीं मेरी अंतिम एक मात्र कामना हैं गुरूदेव ।
हे गुरूदेव चीर सनातन मेरे प्राणाधार आपके श्री चरणों में मेरा साष्टांग प्रणाम हैं । मैं एक मात्र आपकी शरण में हूँ।
 आपका और एक मात्र आपका ही संजीव ।
श्री राधे ।

Saturday, 10 April 2021

हमारा सबसे बड़ा अवगुण एक मात्र अहंकार है। ये अहंकार हीं सबसे बड़ा बाधक है प्रेम मार्ग में , भक्ति मार्ग में । और संसारिक कार्य में भी

हमारा सबसे बड़ा अवगुण एक मात्र अहंकार है। ये अहंकार हीं सबसे बड़ा बाधक है प्रेम मार्ग में , भक्ति मार्ग में । और संसारिक कार्य में भी , यही अहंकार सभी झगड़े का जड़ हैं । हमारा यही अवगुण , conflicts  का कारण है । 
इस एक मात्र अवगुण के कारण , काम, क्रोध , ईष्या , द्वेश आदि अन्य दोष उत्पन्न होता है ।
यह अवगुण जबतक नहीं मिटेगी दीनता नहीं आएगी ।
जबतक दीनता नहीं आएगी भक्ति नहीं होगी ।

ए अहंकार इतना खड़ाब अवगुण है कि हम इसी कारण किसी भी भगवद् विषय को महत्त्व नहीं देते । 

हम तत्त्वज्ञान पाने के बाद भी इस सूक्ष्म लेकिन सबसे बड़े अवगुण को समझ नहीं पाते ।
इसी एक मात्र अवगुण के कारण हम दुसरे को छोटा और तुक्ष समझते हैं । अपने को हर जगह बड़ा मानते हैं ।
यहां तक कि भगवद् क्षेत्र में भी हम अहंकार ले आते हैं । हम समझने लगते हैं कि हम बड़ा भारी हरि भक्त और गुरूभक्त हैं । हम भला दुसरे को क्यों महत्त्व दें ।
हम जो काम करते हैं वहीं अहंकार ले आता है हमारे मन में । इसे दूर करने का प्रैक्टिस करना जरूरी है । नहीं तो यह हमें किसी भी चीज में आगे नहीं बढ़ने देगा ।
चाहे संसार हो या अध्यात्म अहंकार का राज हर जगह हमें नीचे हीं गिराता है ।

अरे जब हम खुद भगवान स्वरूप गुरू को पाकर भी , उनके द्वारा दिए गय तत्व ज्ञान पा कर भी हम  अहंकारी हीं  हैं,  तो हम से अच्छा तो वो संसारी है जिनको ऐसा दिव्य चिन्नमय भगवान स्वरूप गुरू नहीं मिला अबतक और अज्ञानता वश अहंकार करता हैं ।
हमें इस अहंकार को समझना होगा । यह बहुत सूक्ष्मतम से सूक्ष्मतम और बड़ा से बड़ा होता हैं ।

हर समय खुद में झांकते रहना होगा ।
Intorspaction करते रहना होगा कि कहीं हममें अहंकार तो नहीं है ।
श्री महाराज जी ने बड़ा अच्छी शिक्षा दिए हैं अहंकार को  समाप्त करने के लिए :-

एक सन्यासी एक पत्थर के मूर्ती के पास खड़ा होकर उस पत्थर की मूर्ति से भिक्षा मांगता था ।
एक व्यक्ति ने उससे पुछा ,' ऐ तुम इस पत्थर के मूर्ति से भिक्षा क्यूं मांगते रहते हो बार बार '
तो वो वोला कि मैं इस पत्थर की मुर्ती से भिक्षा इस लिए मांगता हूंँ यह जानते हुए कि यह भिक्षा नहीं देगा ।
और इस तरह हमारा अहंकार धीरे धीरे कम होगा और जब किसी व्यक्ति से भिक्षा मांगुंगा और वह नही देगा तो मुझे क्रोध नहीं आएगा ।
अहंकार हीं क्रोध की जननी है ।

मैं भी अपने प्यारे गुरूदेव के तत्त्व ज्ञान से लाभ लेता हूँ ।
मैं संसार में या सोसल मिडिया में सबको अपने ऊंचा मानता हूँ । खुद को वास्तव में सबसे नीचा मानता हूं ।
जब कभी अहंकार सूक्ष्मतर रूप में मेरे मन में आता है तो मन को खबरदार करता करता रहता हूं ।
और अहंकार के विपरीत जाकर सबको अच्छा मानता हूं । सबको अहमियत देता हूं । सबमें अपने ईष्ट के उपस्थिति को देखता हुं । सभी जीव हमसे महान है । बड़ा है ।
 यह वास्तव में मैं करता हूं । बड़ा लाभ हुआ है मुझे ।
सदगुरू देव के दिए गय ज्ञान को याद रखना काफी नहीं है वल्कि हरेक तत्व ज्ञान को अपने जीवन में लागु करने का प्रैक्टिस के साथ साथ रूपध्यानसाधना बड़ा आवश्यक है । बड़ा लाभ है । जय जय श्री राधे 
श्री महाराज जी की जय ।

प्रश्न - धर्म अर्थ काम और मौक्ष को कैतव क्यों कहा गया है ?

प्रश्न - धर्म अर्थ काम और मौक्ष को कैतव क्यों कहा गया है ? 
उत्तर - धर्म, अर्थ, काम ऐ सब बंधन कारक है। यानि यह पुनर्पि जननम पुनर्पि मरनम, यानी आवागमन के चक्र में बांधने वाला कारक है इसलिए इस त्रिकर्म को कैतव कहा गया है । और मौक्ष अपवर्ग है  , यह तो बड़ा खतरनाक है । इसे महाप्रभु ने पिशाचनी की संज्ञा दिए हैं । क्यूंँकि मौक्ष प्राप्त होने के बाद ज्ञानि खुद ब्रह्म स्वरूप हो जाता है । आनंदस्वरूप हो जाता है । फिर मैं और मेरा का संबंध खत्म हो जाता हैं । आनंद पा कर आनंदित होना‌ और आनंद स्वरूप बन जाना दोनों में बड़ा भारी अंतर है ।

अब शुभकर्म किया तो स्वर्ग मिलेगा,  स्वर्ग भी माया के अधिन है। मनुष्य हीं शुभकर्म करके ,‌ यानी जीव ही कर्म धर्म करके देव लोक में इंद्र वरूण कुबेर बनतें हैं। और फिर  जब उनके सारे पुण्य क्षीण हो जाते हैं स्वर्ग के भोग द्वारा तो फिर धरती पर उनको मनुष्य का शरीर भी नहीं मिलता।  देवता एक भोग योनि हैं अन्य जीव की तरह, देवता कर्म नहीं कर सकते क्यूंकि शरीर नहीं है मनुष्य के तरह उनके पास। 
और जब उनके सारे पुण्य समाप्त हो जातें हैं तो धरती पर कीड़ा मकोड़ा का यौनि प्राप्त करते हैं। इसलिए ये त्रिवर्ग धर्म, अर्थ काम  के द्वारा मनुष्य ही स्वर्ग या पृथ्वी के राजा तक बनतें हैं। 
इसलिए इसे कैतव कहा गया है, कैतव यानि दोषपूर्ण। 

अब आपको जानकर आश्चर्य होगा की उसमें भी मौक्ष को महा कैतव कहा गया  है !

वो इसलिए कि एक तो अरबों में कोई एक ज्ञानी, अपनी साधना के वल पर , ध्यान साधना के द्वारा,  अष्ठांग योग द्वारा, षठसंपत्ति रूपी पुरूषार्थ द्वारा,  अपने अंत:करण ( मन, बुद्धि ,चित्त, अहंकार) को जला कर भष्म कर देते हैं। 
ये पंच कोष ( अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष ) को भष्म कर देते हैं। और अंत में उनके शरीर में केवल सत्ता रह जाती है। 
सत्ता का मतलव‌ है आत्मा, 
यानि अरबों में कोई एक ज्ञानी जब मौक्ष की कामना लेकर सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करके  माया से परे हो जाता है तो फिर निराकार ब्रह्म में उनका लय हो जाता है।  और इस प्रकार ज्ञानि आवागमन से मूक्त हो जातें हैं एवं स्वयं आनंदस्वरूप हो जाते है। 
जैसे मीठे जल की नदियां समुद्र में मिल कर अपना स्वरूप खो कर समुद्र रूपी खाड़ा जल हो जाता है। 

ठीक उसी प्रकार ज्ञानी जब स्वयं आनंदरूप हो जातें हैं तो आनंद महसूस उन्हे कैसे हो सकता है भला ? 

एक उदाहरण - एक रसगुल्ला है, यह रस मय है। अब इस रसगुल्ले को हम खाते हैं तो हमें इस रसगुल्ले के रस के आनंद का अहसास होता है। 
लेकिन अगर हम खुद हीं रसगुल्ला में समाहित होकर खुद रसगुल्ला बन जाएं तो फिर क्या हम रसगुल्ले के आनंद को कभी महसुस कर पाएंगें ?
इस प्रकार मौक्ष प्राप्त करने के बाद ज्ञानि का  संसार भी गया, और खुदआनंदस्वरूप हो गए जिससे आनंद का एहसास भी गया हाथ से ।  यानी मानुष तन भी कभी नहीं मिलेगा ज्ञानि को ,  कि फिर से भक्ति करके  सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण के परमानंद को पाने के काबिल हो, उनके प्रेम को पा सके। 
इसप्रकार मोक्ष पाने के बाद ज्ञानि जब खुद ही रसगुल्ला बन गया तो ना कभी संसार मिलेगा फिर से और ना परमानंद की अनुभूति होगी उनको ।

यानि मौक्ष एक ऐसी स्थिति है जैसे कि -
ना खुदा हीं मिला ना विशाले सनम ,
ना इधर के रहें और ना उधर के रहे। 

इसलिए धर्म अर्थ काम और मौक्ष को कैतव कहा गया है ।
श्री राधे ।
( मेरे पास अपना कोई ज्ञान नहीं है । मैं अपने गुरूदेव से प्राप्त ज्ञान के आधार पर  लिखता हुंँ। कहीं लिखने में भुल हो तो क्षमा प्रार्थी )- आपका संजीव

श्री महाराज जी का एक पद् है गुरु बंदना जिसमें एक लाईन है ।" रहत ना रह संसार , जाऊं गुरू चरण कमल वलिहार "

श्री महाराज जी का एक पद् है गुरु बंदना जिसमें एक लाईन है ।
" रहत ना रह संसार , जाऊं गुरू चरण कमल वलिहार " 

इसका अर्थ ही काफी है यह समझने के लिए ।
तो इस लाइन का अर्थ जरा समझना होगा हमें ,  तो जेनरली हमलोग यही समझते हैं कि संसार में रहते हुए भी संसार में आसक्ति ना हो । एक बार कई लोगों से जब पुछा गया आश्रम में कुछ पद के लाईन का अर्थ इसी तरह से तो अस्सी प्रतिशत हमलोग सही सही पूर्ण उत्तर नहीं दे सके । 

और इसका डिटेल्स में जो अर्थ है वहीं काफी है यह समझने के लिए कि महाराज जी अपने शिष्य को डौक्टर , प्रोफेसर आदी बनते देखना चाहते हैं ।

तो मैं जब सबसे  पहले यह पद् समझा था , जो श्री महाराज जी की कृपा से समझा मां से वो यह कि-
 यह कर्मसन्यास को समझने बाला सबसे बढ़िया पद् जिससे मुझे बड़ा प्यार  है और अर्थ ठीक से समझे बिना मैं समझता हुं पद गाना उतना लाभप्रद नहीं होता है ।‌

इसका लाईन का  मतलव , हमारा संसार यानि संसार में कोई डौक्टर बने , इंजीनियर बने या व्यापारी बने , घर बसाया , शादी किया, मां वाप है , दोस्त रिस्तेदार है  । अब एक डौक्टर है उदाहरण के  लिए तो यह उसका संसारिक पद हुआ प्रोफेशन में । और फिर उसका परिवार है , यह भी उसका संसार है ,दोस्त रिस्तेदार यह भी उसका संसार है और उसका पेसेंट है तो यह भी उसके कार्य क्षेत्र का , प्रोफेशन का, सेवा का परिवार है । 
तो इस प्रकार कोई यह सब संसार के होते हुए भी सेवा भाव से परिवार का भरण पोषण , पेसेंट को सेवा भाव से देखें पर मन से अनासक्त ही रहे इस अपने बाहर के संसार से ,  भीतर से यानि मन से इन सभी से अनासक्त रहे बाहर के संसार से हमेशा सब काम ठीक ठीक करते हुए ।
तो इस प्रकार हमें हमारे संसार का होते हुए भी संसार हमारे भीतर नहीं है । हमारे भीतर केवल हमारा गुरू और हमारा श्याम सुंदर हीं है ।
तो यह असली अर्थ है स्पष्ट रूप से "रहत ना रह संसार " का ।‌

 श्री महाराज जी का सिद्धांत मन के सन्यास से है ना की शरीर के सन्यास से  । मन से सन्यास का मतलव माया से मन कि आसक्ति का मिटना । अनासक्त भाव से संसार में डोक्टर आदि बनने से मना कतई नहीं है । जबकि वो चाहते हैं कि उनका शिष्य डौक्टर आदि हो ।
 उन्होंने यह नहीं कहा कि शरीर से डौक्टर इंजिनियर , आइ ए एस ना बनो । वो तो यह सब बनने के लिए कहें हैं कर्मयोग के लिए । भक्तियोग के लिए । वो तो पक्षधर थे कि बढ़िया से बढ़िया आदमी बनों पोस्ट पाओ , पर आसक्ति ना हो पोस्ट में , पैसा में , संसार में । पोस्ट पा कर सेवा करो ज्यादा बढ़िया से । लोगों को जोड़ों । अपने बच्चे को जोड़ों  उसके बच्चे को जोड़ों । आसक्ति विहिन भौतिक विकाश के साथ आसक्ति युक्त आध्यात्मिक विकास ज्यादा से ज्यादा हो यह उदेश्य है हमारा  ।
तो हम लोग सत्संग तो करते है रात दिन पर उनके प्रचारक का ध्यान से नहीं सुनते जब वो पद की व्याख्या करते हैं तो हमारा ध्यान कहीं और चला जाता है और हमें पता भी नहीं चलता की हमारा ध्यान भटक गया था और महत्वपुर्ण  व्याख्या छूट गया । इसिलिए कुछ बच्चे लोग पद आदि टाईप करके पोस्ट तो करते हैं पर उसका उल्टा अर्थ लगा लेते हैं कि श्री महाराज जी संसार हीं छोड़ देने के लिए कहा है । यह बड़ा खतरनाक है ।
और फिर लाईन बाई लाईन अर्थ समझे गवईया के तरह गाना और झुमने से कोई लाभ कभी भी होगा क्या ?
इसलिए तो श्री महाराज जी बराबर गौरांग महाप्रभु का यह बात बोल देते हैं कि 
बहु जन्म यदि करें श्रवन किर्तन ,
तऊ नाई पाए श्री कृष्ण पदे प्रेम धन।।

तो इस प्रकार ना पद गाने से कुछ लाभ होगा और ना मंदिर में भगवान की तरह फुल माला चढ़ा कर आरती उरती करने से , रह सब तो संसार में अनेकों साल से लोग करते ही आए हैं भगवान का पुजा , आरती आदि ।‌
जब गुरू बंदना का सही अर्थ कुछ भोले बालक नहीं समझते तो वांकी पदों का बात हीं छोड़िए । 
तो हमें बहुत सतर्क होकर सुनना चाहिए प्रचारकों का। इसलिए उनके द्वारा पहले कह दिया जाता है कि अब आपलोग समाहित चित् हो जाईए और  होकर सुने । पर हम शरीर से केवल सतर्क होकर बैठ जाते हैं , मन कहीं और रहता है ‌ । जब की कहा जाता है समाहित चित् यानि मन से सावधान । 
श्री राधे ।