Thursday, 20 July 2023

120 करोड़ से अधिक हिन्दू आबादी वाला हिंदूस्तान हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं 🤔🚩

एक व्यक्ति का प्रश्न :- 
120 करोड़ से अधिक हिन्दू आबादी वाला हिंदूस्तान हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं 🤔🚩

मेरी राय :- क्या कमाल हो जाएगा अगर हमारा देश हिंन्दु रा्ष्ट्र बन भी गया तो ! यहां तो हिन्दू हीं हिन्दू का सबसे बड़ा दुश्मन है । हमारे देश का इतिहास रहा है कि हिन्दू राजाओ ने ही दुसरे हिन्दू राजा के राज्य को हड़पने के लिए बाहरी आक्रमणकारियो , मुगलों को , तो अंग्रेजो का साथ दिया और साथ लिया भी । और आज भी देख लो अनेक हिन्दू नेता हिन्दू के हीं खिलाफ हैं ।
 तो भला अगर हमारा देश हिन्दू राष्ट्र बन भी जाएगा मान लीजिए तो क्या हो जाएगा ?

 लोग आपस में हीं मार काट करेंगे और जयचंद बन कर एक दुसरे का नुक़सान करने के लिए घात करेंगे । यहां तक कि जैसा आज हो रहा है कि विदेश में जाकर भारत का अपमान करते हैं और उनसे सहायता मौरल सपोर्ट मांगने का प्रयास करते हैं और कुछ प्रवासी हिन्दू ही बड़े चाव से उनका सुनते हैं और ताली बजाते हैं ।

 आज तो देख हीं रहे हैं न एक नामी खानदानी नेता का वारिस विदेश के धरती पर जाकर देश की बुराई खुलेआम कर रहा है और लोग उसकी पार्टी को बोट देकर स्टेट का बागडोर दे रहे है, ये कौन बोट दे रहा है उनको अधिसंख्यक हिन्दू हीं न ? 

 तो मेरा कहने को मतलव है कि हिन्दू पहले मन से तो हिन्दू बन जाए और हिन्दू विरोधी को बोट देना बंद कर दें । 
 फिर राष्ट्र अपने आप हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा घोषणा कि आवश्यकता नहीं है । अधिसंख्यक हिन्दूओं कि मानसिकता जब तक हिन्दू की नहीं होगी तब तक केबल घोषित करने से कुछ नहीं होगा । कइ क्षेत्र में तो बहुत अच्छी अच्छी बातें घोषित है संविधान में जैसे युनिफर्म सिविल कोड , कानून भी बना हुआ है लेकिन लोगों के सोंच के कारण फिरका परस्त ताकत यहां जमा हुआ है एवं हिन्दूस्तान का खा कर , हिन्दू के टैक्स के पैसे से मौज कर रहा है और उल्टा हिन्दू से बोट लेकर हिन्दू का ही गला काट रहा है । 
इसलिए कहता हूं सबसे पहले मन से हिन्दू बनो , राष्ट्र अपने आप हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा । जातीं में बंटे रहोगे तो आपस में हीं लड़ते रहोगे और दुसरा मौज करेगा वो भी हमारे धन तथा संसाधन पर । इसलिए मानसिक रूप से हिन्दू बिचार धाराओं को आत्मसात् करने का प्रण कर लें । राष्ट्र अपने आप हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा ।

 आप  श्री कृपालु जी महाराज  का विश्व शांति कैसे होगा वाला प्रवचन आप भुल गए लगता है । श्री महाराज जी के इस प्रवचन का सार है कि जबतक जीव यह मन से नहीं मान लें कि भगवान अंदर बैठे हैं और वो सब नोट कर रहे हैं तब तक जीव अशांत रहेगा । 
और जब तक अशांत रहेगा तब तक बुराई समाप्त नहीं हो सकती है , श्री महाराज जी फिर कहते हैं सब के पीछे कानून और पुलिस नहीं खड़ा किया जा सकता है । और पुलिस भी भ्रष्ट न हो इसका गारंटी नहीं है क्योंकि चरित्र यानि अंत:करण को ठीक करना होगा । जब तक चरित्र नहीं ठीक होगा तब तक कानून से कुछ नहीं हो सकता है । 
इसलिए जबतक हिन्दू मन से हिंन्दु फिलोसॉफी को सिद्धांत को आत्मसात नहीं करेगे तब तक सिर्फ हिन्दू राष्ट्र या कुछ भी करने से हिन्दू एकता बेईमानी है । 
आज लोग अपने ही समाज का दुश्मन है । परोसी हिन्दू से बनता नहीं । भाई भाई में बैमनश्य है । अपनी बुढ़ी मां और बाप को बृद्धा आश्रम भेजने वाले तथाकथित हिन्दू से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं ?
अधिसंख्यक हिन्दू न तो अपने चरित्र पर ध्यान दें रहे हैं और न अपने औलाद के चरित्र पर । खुला बिचार ( broad mindness ) के नाम पर आल ओलाद को खुला छूट है , जाकर लिविंग रिलेशन में रहे , भद्दे भद्दे कपड़े पहने । हिन्दू भैल्यूज यानि मूल्य तथा सिद्धांत को ताखा पर रख कर ब्यायफ्रेंड बनावे तो गलत लोग तो फायदा उठाएगा हीं । कानून तो बहुत है पर हो क्या रहा है ? 

भाई भाई से घर में जमीन जायदाद के नाम पर लड़ने वाले , भाई भाई से मन मुटाव तथा मार पीट करने वाले , बाप मतारी को नहीं पुछने वाले , चाचा चाची , ताऊ का सम्मान न करने वाले से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं । क्या घर के अंदर भी आप कानून और पुलिस के द्वारा हिन्दू सिद्धांत और भैल्यूज को मनवाने का सोंचते है क्या ? 
जो लोग आज हिन्दूत्व का वकालत करते हैं उनमें से अधिकतर के घर में क्या हाल है जरा जाकर सर्वे कर लीजिए । 

संजुक्त परिवार में रहना पसंद नहीं , मां वाप , संजुक्त परिवार के प्रति कोई फर्ज नहीं पुरा करने वाले लोग आज हिन्दूत्व कि बातें करते हुए सोसल मिडिया और बाहर भीड़ के सामने बड़ा बड़ा लेक्चर देते पाए जाते हैं । 
इनमें से अधिकतर का परिवार मियां बीबी बच्चा तक भी सीमित नहीं । अच्छे अच्छे पढ़ें लिखे लोग दारू पी कर घर में पत्नी से मार पीट करता पाया जाता है गाली गलौज का तो नाम ही मत लो । बेचारे उनके बच्चे दुबके और डरे रहते हैं । और बेचारे पड़ोसी का तो रात का नींद हराम होता हीं है । और सुबह उठ कर जब नशा टुटता है तो शरीफ का दिखावा करके समाज में हिन्दूत्व पर लेक्चर और सोसल मिडिया पर जय श्री राम बोलने से क्या हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा । 
अरे पहले स्वयं तो हिन्दू फिलौसफी को आत्मसात करो । 

सुपरफिसियल बातें करने से नहीं होगा भाई , पहले सनातन वैदिक धर्म के फिलौसफी को आत्मसात करना होगा ‌! 
मैं आपसे पुछता हूं आप खूद बतलाई की आपके तथा आपके भाई बहन रिस्तेदारो में से कितने के बच्चे इंग्लिश कन्वेंट स्कूल में पढ़ते हैं , जरा ईमानदारी से यह बताएं फिर जाकर हिन्दू राष्ट्र पर भाषण देना , जरा पुरा इमानदारी से कुछ प्रमाण भेजो अपने तथा अपने रिश्तेदारों के बच्चे के स्कूल आइ कार्ड का फोटो डालो । और आप खुद भी किस स्कूल में पढ़े हैं उसका भी फोटो डालिए ।। दारू और शराब पीना तथा मांस खाना हीं गुणाह है सनातन शास्त्रों में , उपर से इंग्लिश दारू पीने वाले हिन्दूत्व कि बातें करते हुए शोभा नहीं देता है । 

भाई जाकर पढो ठीक से अपना इतिहास भारत तो सदा से अखंड हिन्दू राष्ट्र था हीं । वो कौन सा ऐसा बात और कारण है कि बाहर के लोग आकर इसे टुकड़ा टुकड़ा कर दिया और आज यह हाल है तब जाकर आपको समझ में आ जाएगा कि हिन्दूओं का आज ये हाल क्यों है ? 

आज हमारे हिन्दू बाबा जी लोग , धर्मगुरु लोग भिन्न भिन्न पंथ , बिचार धाराओं में बंटे हूए है , आपस में हीं नही‌ बनती एक दुसरे को । कोई लिंगायत है तो कोई वोक्कालिंगा तो कोई फोकालिंगा तो कोई जटालिंगा , तो न जाने क्या क्या , आपस में एक जुटता नहीं, हमारे बहुत से धर्म गुरूओं में आपस में हीं नहीं बनती , भीतर से हम बड़े तो हम बड़े कि भावना है और ऐसे लोगों से हिन्दूस्तान कैसे हिन्दू राष्ट्र बनेगा ? कोई राम और कृष्ण को गाली दे रहा है तो कोई भगवान शंकर को , सुन कर मुझे शर्म आती है और आश्चर्य भी और दुख भी । 

अरे हमारे देश में तो एक हीं गुरू के दो अनुयायीयों का आपस में नही बनती दिखाई देती है , एक दुसरे का सबसे पहले हीं टांग खेचते खुले आम दिखाई देते हैं । और बातें बड़ी बड़ी । जरा सोचिए गहराई से कहा खड़े हैं हमलोग ?? 

पढ़ने और जानने का तो आदत नहीं है न इसलिए ये सुपरफिसियल बातें करते हैं बहुत से लोग । 
वो कहावत है " घर फुटे तो गवांर लुटे "
तो पहले खुद को और अपने घर को ठीक करें , हम सभी हिन्दू अपने को ठीक कर लेंगे तो हमारा देश फिर से अपने आप हिन्दू राष्ट्र के गौरव को पुनर्स्थापित कर लेगा । :- संजीव कुमार।

श्री राधे ।

:- संजीव कुमार

धर्म का पालन किया जाता है रक्षा नहीं । धर्म का पालन करने से धर्म जीव की रक्षा करता है । जीव धर्म कि रक्षा नहीं कर सकता ।

धर्म का पालन किया जाता है रक्षा नहीं । 
धर्म का पालन करने से धर्म जीव की रक्षा करता है । जीव धर्म कि रक्षा नहीं कर सकता । 
इसलिए हम सनातन धर्मावलंबियों को अपने धर्म का पालन करना अनिवार्य है । 
धर्म का मतलव जो धारण करने योग्य हो । 
धर्म क: ? 
धारयेति इति धर्म : ।।
धारणात् धर्म इत्याहुः धर्मों धारयति प्रजाः ।
यः स्यात् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।। 
( महाभारत )
"धर्मः ध्रियते लोकः अनेन इति धर्मः, 
धरति धारयति व लोकम् इति धर्मः,." ( महाभारत)

तो अधर्मी और विधर्मी से सदैव सचेत और सावधान रहना चाहिए। शास्त्रों के अनुकूल चलें, मन से तो बंदर चलता है।
वेद कहता है-“धर्मं चर,” अर्थात् धर्म का पालन करो;
 “धर्मेण सुखमासीत्,” अर्थात् धर्म से लौकिक सुख मिलता तथा प्रारब्ध अच्छा बनता है; 
“धर्मान्न प्रमदितव्यम्”, अर्थात् धर्म में प्रमाद या असावधानी नहीं करनी चाहिये।।

धर्म क्या है ? जिसे धारण किया जा सके वो धर्म है । जैसे आग का धर्म है गर्मी प्रदान करना , जलाना । जैसे बर्फ का धर्म है ठंडक प्रदान करना । 
उसी प्रकार जीव की अवस्था के अनुसार हमारे सनातन वैदिक धर्म में अलग अलग धर्मो का पालन करना अनिवार्य बतलाया गया है । 

गुरू शिष्य परंपरा के शिष्यों का धर्म है अपने गुरू के शरणागत होकर , अनन्य होकर केवल उनके हीं द्वारा बतलाए गए उपासना पद्धतियों ( मार्ग ) को पुरे मनोयोग से पालन करना । अपने गुरू के आज्ञा का पालन करना तथा अपने गुरू एवं ईष्ट की पुरे मनोयोग एवं निष्ठा से सेवा और भक्ति करना । 

कुछ धर्म सभी जीवो के लिए समान रूप से पालन करना आवश्यक है । जैसे मनुष्यों के लिए समान रूप से धर्म जो बतलाया गया है वो है मानवता , दया , त्याग , क्षमा , अन्य निरीह प्राणियों कि रक्षा करना । बच्चों तथा स्त्रियों की रक्षा करना । अपने धर्म स्थलों , बाग बगीचे , वन्य पदार्थों तथा जानवरों एवं पशु-पक्षियों तथा प्रकृति की रक्षा करना । विमार तथा वेवस एवं लाचार का मदद करना । 

माता पिता की आज्ञा मानना एवं उनकी सेवा करना । आचार्यों एवं गुरू जनों एवं अपने से उम्र में बड़े सज्जन पुरुष एवं नारियों को सम्मान देना । अपने से छोटे को स्नेह देना , रक्षा करना , वेदज्ञ एवं ज्ञानियों को सम्मान देना । कर्म कांड कराने वाले पंडितों तथा भगवद् प्रेमियों को सम्मान देना । दान देना । दरवाजे पर आए अयाचक ब्राह्मणों एवं भिक्षुओं को अन्न वस्त्र भोजन कराना एवं दान देना । 

शिक्षक का धर्म है बिद्यार्थियों को सही शिक्षा देना । 
विद्यार्थियों का धर्म है सही ज्ञान हासिल करना , बिद्या अर्जित करना । युवाओं का धर्म है अर्थ उपार्जन करना तथा असहायों की मदद करना , समाज , देश के तरक्की के लिए अपने द्वारा अर्जित धन से कर देना । 

पति का धर्म है पत्नी का भरण पोषण तथा रक्षा करना । पत्नी का धर्म है पति कि सेवा करना । 
मित्र का धर्म है मित्र को सही मार्ग पर चलने कि प्रेरणा देना तथा एक दुसरे कि सहायता करना जरूरत पड़ने पर । 

 बुजुर्गो का धर्म है अपने अनुभव के आधार पर अपने अगले पीढ़ियो को सन्मार्ग दिखाना , उस पर चलने के लिए प्रेरित करना । सही गलत का जानकारी देना तथा उसे गुमराह होने तथा भटकने से रोकना । 

वाणप्रस्थियों का धर्म है संसार को सही मार्ग दिखाना तथा संसार से वैराग्य लेकर मौक्ष के लिए साधना , तपस्या करना । 

संन्यासियों का धर्म है संसार से पुरी तरह विमुख होकर बिना किसी आडबंर के अपने मन को केवल और केवल भगवान को समर्पित करके उनकी ही आराधना करना । एक पल के लिए भी उनका मन संसार के किसी भी प्रपंच में न जाएं । 

पुत्र और पुत्री का धर्म है अपने माता पिता कि आज्ञा मानना एवं उनके द्वारा दिए गए हिन्दू संस्कार और संस्कृति के अनुसार चलना , निभाना । 
माता पिता का धर्म है संतान का पालन पोषण करके परिवार , समाज , देश तथा धर्म के लिए योग्य बनाना । अच्छा संस्कार देना , अपने संस्कृति के मुल्यों तथा सिद्धांतों के अनुसार चलना , पालन करना तथा अपने संतान को भी उस पर चलने की प्रेरणा देना । 

राज्य के कर्मचारियों का धर्म है संविधान द्वारा निर्देशित कानून के अनुसार राज्य के नागरिकों को सुविधा उपलब्ध कराना तथा कर वसूलना जिसका उपयोग राज्य के विकाश में हो ।

 न्यायपालिका का धर्म है बिना पक्षपात एवं भेद भाव के देश के संविधान के अनुसार नागरिकों को त्वरित न्याय देना । 

पत्रकारों का धर्म है समाज तथा देश के समाने केवल सत्य को प्रस्तुत करना बिना लाग लपेट के , देश के प्रशासकों का ध्यान देश तथा समाज तथा नागरिकों के समस्या के तरफ खिंचना ।

नाट्यकारों ,‌ हास्यकारो का धर्म है देश के जनता को स्वस्थ मनोरंजन उपल्ब्ध करना । 

 संगीतज्ञ का धर्म है अपने कला से संगीत में रूचि रखने वाले के मन को शांति तथा सकुन उपल्ब्ध कराना । 
 
सांसदो एवं विधायकों का धर्म है नागरिकों के कल्याण के लिए निष्पक्ष कानून बनाना तथा जनता का निष्काम सेवा । 

व्यापारियों का धर्म है अपने ग्राहकों को उचित मुल्य पर बढ़िया सामान उपलब्ध कराना । ग्राहकों कि सेवा करना । 

किसान का धर्म है स्वास्थ्य अनुकूल अन्न का उत्पादन करना । 
पड़ोसी का धर्म है अपने पड़ोसियों से मित्रता , सद्भाव का एवं जरूरत पड़ने पर एक दुसरे कि सहायता सहयोग तथा सहानुभूति का फर्ज निभाना । 

सैनिकों धर्म है देश कि रक्षा करना । तथा पुलिस का धर्म है देश के अंदर कानुन के पालना को सुनिश्चित करना । 
डौक्टर तथा बैद्य का धर्म है रोगियों कि सेवा करना । 
तो सार यह की यह धारणा गलत है कि धर्म की रक्षा करना है । नहीं। 
 धर्म का ठीक ठीक पालन करने से , अपने संस्कृति के अनुसार जीवन जीने से धर्म जीव समाज परिवार देश की रक्षा करता है । हम धर्म कि रक्षा नहीं कर सकते । 
जो मनुष्य अपने धर्म का पालन नहीं करता है और जो अपने संस्कृति से भटक जाता है उसका समूल विनाश किसी न किसी माध्यम के द्वारा अपने आप एक दिन अवश्य हो जाता है । 
श्री राधे :- संजीव कुमार।

छुआछुत कहा से आया हमारे भारत में ?

प्राचीन समय भारत मे कभी छुआछुत रहा ही नहीं, और ना ही कभी जातियाँ भेदभाव का कारण होती थी।
चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं। 

सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की।

सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?

महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।

विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।

भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।

श्री कृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे, 

उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे।

यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्री कृष्ण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।

राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे।

उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे

तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।

वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।

प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे । 

नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये।

उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई,जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।

फिर गुप्त वंश का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।

केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।

फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम आक्रमणकारियो का समय रहा और कुछ स्थानों पर उनका शासन भी चला।

अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।

अहिल्या बाई होलकर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी। ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये। 

मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।

यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।

मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।

1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया। 

अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब "कास्ट ऑफ़ माइंड" में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।

इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान, ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।

योगी आदित्यनाथ जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत हैं, पिछड़ी जाति की उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं। जन्म आधारित जाति को छुआछुत व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।

इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं।

इसलिए मैं अपने शिष्यों को इंजीनियर , डाक्टर अथवा प्रोफेसर लोगों के रूप में देखना चाहता हुं ।:- श्री महाराज जी ।

श्री महाराज जी की वाणी :- मैं भिक्षावृत्ति पर निर्भर सन्यासियों का निर्माण नहीं करता । मेरे सन्यासी आत्म निर्भर होते हैं । मेरे यहां न दीक्षा का आडम्बर है न अपने साथ अन्य जगद्गुओं जैसा सिंहासन आदि का आडम्बर ।
वह सब मैंने सन 1962 की चीन कि लड़ाई के बहाने war fund में दान कर दिया । जगद्गुरू होते हुए भी सबके लिए हर समय उपलब्ध रहता हुं । 
लोग अपने काम के लिए P.A रखते हैं , मैं लोगों के पत्र स्वयं पढ़ता हुं और उनके उत्तर स्वयं लिखता हुं ।

लोग सन्यासी बनाते हैं । मैं सन्यासियों को भी प्रेमी बनाता हुं । प्रकाशानन्द को देखो न । दण्ड कमंडल ले कर मेरे पास आया था । शंकराचार्य पद् के लिए उसका नाम भी था । उसने स्वीकार नहीं किया । उसने अपने दंड  कमंडल गंगा जी में बहा दिया ।

मैं कोई नया सम्प्रदाय नहीं बनाता । केवल शास्त्रों वेदों का सिद्धांत बोलता हुं । लोगों के पाखण्ड का विरोध करता हुं । अत: लोग मेरा विरोध करते हैं । जिद् मेरे यहां नही चलती । किसी ने मेरे पास आकर कहा , की ऐसा कर दीजिए वर्णा जान दे दुंगा । मैंने कह दिया अगर जान देना तुम्हारे हाथ में है तो देकर देखो ।
कृपालु तुम्हारे इस धमकी में आने वाला नही है । तुमको यह समझे रहना है कि कर्ता केवल मन है । उसके द्वारा किया हुआ कर्म हीं कर्म की संज्ञा में आता है ।

लोगों में भ्रम है कि जो लोग अनपढ़ होते हैं अल्प बुद्धि वाले अथवा अभावों से ग्रस्त और अंधविश्वासी होते हैं वही भक्ति मार्ग में जाते हैं । किंतु उनके विरूद्ध मेरा कहना है कि भक्ति मार्ग अत्यन्त साहसी और समझदार लोगों का पथ है । जो श्रद्धा विश्वास से सम्पन्न लोग होते हैं वही इस रास्ते पर पैर रख पाते हैं । इसलिए मैं अपने शिष्यों को इंजीनियर , डाक्टर  अथवा प्रोफेसर लोगों के रूप में देखना चाहता हुं ।
:- श्री महाराज जी ।

भक्त वहीं है जो भगवान से भगवान की भक्ति के अलावा कुछ न मांगे ।

भक्त वहीं है जो भगवान से भगवान की भक्ति के अलावा कुछ न मांगे । 
गुरू से गुरू कि भक्ति तथा प्रेम के अलावा कभी कुछ नहीं मांगना चाहिए, नहीं तो ठगा जाएंगे । 
हमें अर्जुन कि तरह बुद्धिमान होना चाहिए। अर्जुन ने विकट परिस्थितियों में भी भगवान से भगवान को हीं मांगा था । उसने न धन मांगा , न सेना मांगा, न आयु मांगा , न शक्ति मांगा । अर्जुन ने तो भगवान से भगवान को हीं मांगा था । 
जहां हरि गुरू हैं वहां विजय है , वहीं सुख है तथा परमानंद है । 
संसारिक सुख का अंतत्वोगत्वा प्रतिफल दुख हीं है । संसार में जिस वस्तू में , बिषय में या व्यक्ति से जितना सुख प्राप्त हुआ जान परता है उसमें अंतत्वोगत्वा उससे भी अधिक दुख है जो हरेक को मिलना तय है एक समय के बाद । संसारिक सुख घटते घटते उसी मात्रा के दुख में परिवर्तित हो जाता है अवस्य एक दिन । और हमें तो सास्वत् सुख तथा आनंद ही चाहिए , एक भी जीव संसार में ऐसा नहीं जो कभी भी दुख चाहता हो ।

हरिगुरू स्वयं आनंद है ये दोनों आनंद का ऐसा भंडार जिसे जितना पाओ उतना ही बढ़ता जाता है । ये धन कभी न समाप्त होने वाला है और न घटने वाला है । इसे तो जितना खर्च करो उसका सौ गुणा बढ़ने वाला धन है । 

भगवान और गुरू आनंद स्वरूप है , प्रकाश स्वरूप है , उनसे उनको मांग लेने का मतलव ही है आगे के तमाम जीवन तथा जन्मों का सभी कष्ट दुखों का सदा के लिए समन हो जाना । जब प्रकाश मिल जाएगा तो तमाम अंधियारा अपने आप भाग ही जाएगा , स्वाभाविक है । 

अत: हम यह क्यों कहे हरि गुरू से कि हमारा कष्ट दुर कर दो, दुख दूर कर दो ? हमें तो सिर्फ यह कहना है कि हे प्रभु हमें तो तुम ही चाहिए, तेरे सिवा और कुछ नहीं चाहिए। 

अत: हमें मांगने में अर्जुन के तरह बुद्धिमान होने कि आवश्यकता है । हमारे गुरूदेव ने हमारी आंखें खोली है । इसलिए इस मामले में हमें सदा होशियार रहना है । 
श्री राधे ।

कट्टरपंथियों का त्याग ।

सभी राष्ट्र,सभी समाज के जिम्मेदार संभ्रांत तथा आस्तिक लोगों को चाहिए कि कट्टरपंथियों का वो पुर्ण रूप से समाजिक बहिष्कार करें, पुर्णत: त्याग करें चाहे वो किसी भी धर्म,मजहब,देश या जाति या संप्रदाय का हो । 
 कट्टरपंथी केवल नास्तिक बिचार धारा का होता है, क्योंकि वो ईश्वर के संविधान का खिलाफत करता है , ईश्वर के कानून को अपने हाथ में लेता है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक क्रिमिनल देश के संविधान को न मान कर कानून को अपने हाथ में लेता है। 
जो व्यक्ति , समाज ईश्वर का आदर करता है , उनमें पुर्ण रूप से भरोसा ,‌श्रद्धा और विश्वास रखता है वो किसी भी व्यक्ति के उदंडता का फैसला ईश्वर पर छोड़ देता है । वो उनका कानून अपने हाथ में कभी नहीं लेता है , वो किसी के भी धर्म और ईष्ट तथा संतों के प्रति गलत भाषा का प्रयोग कभी नहीं करता । 
किसी भी धर्म के संतों महापुरुषों, अवतारों के बहुत से व्यवहार अटपटे होते हैं । कोई भी जीव उनके व्यवहारों को ठीक से कभी नहीं समझ सकता , जब तक वो उनको प्राप्त न कर लिया हो । 

अगर कोई भी मनुष्य ये दावा करता है कि वो किसी भी धर्म , मजहब , जाति में जन्म या अवतार लिए संतों , महापुरूषों , ईंष्ट के लीला को , ( उनके अवतार काल में किए संसारिक व्यवहार ) को ठीक ठीक समझ गया है तो भला वो व्यक्ति स्वयं महापुरूष क्यों नहीं बन गया ?

अगर वो बन गया है तो फिर उसके दिल में किसी भी मानव तथा सभी जीव जंतुओं तथा पेड़ पौधे तक के लिए आदर , प्रेम , करूणा तथा दया का भाव जागृत हो जाना चाहिए स्वत: । 
फिर तो उसमें किसी भी धर्म , समाज , जाति , देश के प्रति किसी भी प्रकार का नफरत , धृणा , द्वेष , ईर्ष्या का भाव या बिचार कभी प्रकट नहीं होना चाहिए स्वाभाविक तौर पर । 

किसी के भी प्रति नफरत , द्वेष , घृणा , ईष्या , दुश्मनी का भाव और कट्टरता यह साबित करता है कि वो व्यक्ति , पुर्णत: नास्तिक है वो अपने अपने धर्म के ईष्ट तथा संतों एवं महापुरुषों के प्रति वफादार तथा जिम्मेदार विल्कूल भी नहीं हैं । 

इसलिए सभी को अपने ह्रदय को टटोलना चाहिए कि क्या ईश्वर इजाजत देते हैं किसी को कि वो किसी के उदंडता का खुद ज़बाब दे और उनके आदेशों तथा बनाऐ गए नियम की अवहेलना करें ? 

भगवान राम ने अयोध्यावासियों को कभी यह अधिकार नहीं दिये कि वो उस धोवी को दंडित करे जिन्होंने माता सीता, उनकी धर्म पत्नी पर लांक्षण लगाया, इतना बड़ा अपराध किया ? 

भगवान कृष्ण ने भरी सभा में शिषु्पाल से सौ गाली सुनने तक उसे माफ किया और उसके बाद वो स्वयं उसे सजा दिये , जबकि उनके अनेकों अनन्य भक्त भी उस सभा में उपस्थित थे , पर किसी ने भगवान का कानून अपने हाथ में नहीं लिया । क्योंकि वो सभी आस्तिक थे और सर्वसत्ता पर भरोसा करते थे । 

भगवान बुद्ध को अंगुलिमाल ने बहुत भला बुरा बोला , वो मुस्कुराते रहे , उनके कुछ अनुयाई भी उनके साथ थे , किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी , क्योंकि उनको भगवान बुद्ध पर पुर्ण भरोसा था कि वो न्याय करेंगे , समर्थ है । और भगवान बुद्ध ने प्रेम से उस अंगुलीमाल डाकू को समझाया , अंगुलीमाल ने उनको पेंड़ में बांध कर अपने परिजनो से पुछने गया , कि बुद्ध जो कह रहे हैं वो क्या सही है । फिर वो आकर बुद्ध के चरणों में गिर गया । 

तुकाराम को नदी से स्नान करके बाहर लौटते समय एक जीव ने बार बार पान का पीक उनके अंगवस्त्र पर फेंका । पर वो हर बार स्नान करते रहे , कोई प्रतिक्रिया नहीं दी , अंत में वो दुष्ट उनके इस सहनशीलता से प्रभावित होकर उनके चरणों पर गिर कर खुद को सरेंडर कर दिया ।

पैगंबर मुहम्मद साहब पर एक यवन महिला ने कुड़ा फेंक दिया करती थी छत से जब रास्ते से गुजरते थे तब , पर वो मुस्कुरा कर उसे माफ कर देते थे , एक दिन वो बिमार हो गई तो पैगंबर मुहम्मद साहब उसके घर पर गए उसका हाल पुछने और बड़े अदब और प्रेम से पेश आए , उन्होंने भी लोगों में आपसी प्रेम का शिक्षा दिय थे । 

संत रूपगोस्वामी जी ने अपने सबसे प्यारे शिष्य जीव गोस्वामी जी का त्याग कर दिये थे जबकि जीव गोस्वामीजी जी का अपराध इतना था कि एक विद्वान ने जब उनके गुरू रूपगोस्वामी जी के पद् पर टिका टिप्पणी किए थे तो जीव गोस्वामी जी ने उनका विनम्रता से हीं विरोध किया था और उनसे शास्त्र के उपर थोड़ा सा बहस किया तथा उनको अपने गुरू से शास्त्रार्थ करने के लिए आवाहन किए थे ।‌

ईशा मसीह को सूली पर चढ़ा दिया गया पर वो फिर भी प्रेम का संदेश हीं दिय , शिक्षा दिये लोगों को । 

इस प्रकार हरेक धर्म में , जाति में , समाज में ईश्वर के अवतारों ने , संतों ने , महापुरुषों ने प्रेम कि हीं शिक्षा दिय है । कोई नफरत , ईर्ष्या , द्वेष , घृणा का शिक्षा किसी भी धर्म में नहीं है । 

जो जीव इस बात को नहीं समझते या मानते हैं , अज्ञानी है , शास्त्रों का सही जानकारी नहीं है, अपने ईष्ट को नहीं जानते हैं , भरोसा नहीं है जिनको , वही‌ लोग ईश्वर का कानून अपने हाथ में लेते हैं वो पुर्णत: नास्तिक है , अत: ऐसे भटके हुए लोगों का परित्याग आवश्यक है विश्व शांति के लिए, मानवता के कल्याण के लिए ।:- संजीव कुमार ।

Courtesy ( शिष्टाचार) इस शब्द के पीछे बड़ा धोखा है । बनाबट है , खोखलापन है । शिष्टाचार एक बनावटी व्यवहार को , बनावटी तारीफों के शब्दों को सुचित करता है । बड़े बड़े लोग , महान लोगों के लिए शिष्टाचार के नाते दो शब्द , दो बनावटी बातें उनके तारिफ में बोल देते हैं । लेकिन इसमें प्रेम भाव का सर्वथा आभाव होता है ।

Courtesy ( शिष्टाचार) इस शब्द के पीछे बड़ा धोखा है । बनाबट है , खोखलापन है । शिष्टाचार एक बनावटी व्यवहार को , बनावटी तारीफों के शब्दों को सुचित करता है । बड़े बड़े लोग , महान लोगों के लिए शिष्टाचार के नाते दो शब्द , दो बनावटी बातें उनके तारिफ में बोल देते हैं । लेकिन इसमें प्रेम भाव का सर्वथा आभाव होता है ।

 हालांकि बड़े बड़े नामचीन लोग एक्टिंग तो बढ़िया कर लेते हैं । लेकिन एक वास्तविक प्रेमी को पता चल हीं जाता है कि उनके बातों में प्रेम भाव का आभाव है । समर्पण का आभाव है । इसलिए इसे courtesy sentance भर ही समझना चाहिए। 

बड़े बड़े देश के राष्ट्रपति किसी दुसरे देश के शासनाअध्यक्ष के लिए शिष्टाचार बस सम्मान में दो वाक्य बोल देते हैं पर ह्रदय में वो भाव नहीं होता । 
इसलिए कुछ समय बाद वही व्यक्ति विरोध में बातें करने लगतें है । उनका असली भावना , चेहरा प्रकट हो जाता है । 
संसार के लोग धोखे में आ जाते हैं । 
झूठी तारीफ को सच मान कर खुश हो जाते हैं । 
लेकिन यही तो सबसे बड़ा धोखा है । 
आजकल भगवदिए एरिया में भी ऐसा है । 
अत: मेरा मानना है कि हमें ऐसे लोगों के द्वारा शिष्टाचार के नाते कहे गए बातों को आधार नहीं मानना चाहिए। सीरियसली नहीं लेना चाहिए। 

भगवद् एरिया में हमें केवल गुरू के समर्पित जीवों के भावों को हीं अपना आधार बनाना चाहिए । 
एक समर्पित, श्रद्धालु , शरणागत जीव के जो भाव है अपने गुरू के प्रति उसमें सच्चाई होती है । उसमें प्रेम की विशूद्ध भावना भरी होती है अपने गुरू और ईष्ट के प्रति । वो जो कुछ कहतें है अपने गुरू के सम्मान में वो उसके ह्रदय तल कि आवाज होती है , प्रेम का अनुभव तथा भाव समाहित होता है । 
हमारे लिए यही महत्वपूर्ण आधार है । 
समर्पित साधक केवल मुख से या वचन से अपने ईष्ट और गुरू के गुणों को नहीं गाता , वल्कि उसका तन मन तथा धन भी अपने गुरू और ईष्ट के प्रति समर्पित होता हैं ।

मैंने तो देखा है कि कुछ नामचीन तथा अरबपति लोग जो जनता के सामने किसी महान व्यक्ति के लिए तारीफ का पुल बांध कर स्टेज से जब निचे उतरे और उनको कुछ दान करने के लिए आग्रह किया गया तो वो बोले अभी नहीं बाद में आइएगा । और फिर वो कभी संपर्क में नही आए । और ऐसा लगभग 99% नामचीन लोग हैं । मुख से तारिफ करने में क्या जाता है ! ऐसे लोगों का भाव हीं होता है :- 
"वचनम् किं दरिद्रम "

वो शिष्टाचार निभा रहा है महान लोगों के अनुयायी के तुष्टि के लिए बस इससे अधिक कुछ भी नहीं उसके पास ।
अत: ऐसे लोगों के बातों का विश्वास हमें कभी नहीं करना चाहिए। हमें भी वोल देना चाहिए स्वागत है आपका , आपने बड़ी अच्छी बातें की, शुक्रिया, थैंक्यू । 
बस इतना ही । 

हमारे श्री महाराज जी ने सिखाया है हमें इन लोगों के चक्कर में न पड़ो कभी , इनके बातों पर भरोसा न करो । 
वो वोल रहा है तो तुम भी वोल दो एक्टिंग में थैंक्यू । लेकिन इनको सीरियसली न लो । 
सूई के छेद से कड़ोरो ऊंट का काफिला निकल सकता है पर ऐसे लोग ह्रदय से भगवद् प्रेमी हो जाए , असंभव ।

हां भगवान का , गुरू का वास्तविक भक्त , सच्चा साधु , सच्चा संत , समर्पित जीव आदि जिसमें दीनता , नम्रता , सहिष्णुता, अहंकार शून्यता भरपुर है वो कुछ भाव प्रकट करतें है हमारे गुरूदेव के सम्मान में तो वो हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है । इनके शब्द ह्रदय के गहराईयों से निकलती है । इसमें भगवद् प्रेम का रस घुला होता है जो हमारे ह्रदय और आत्मा को भी तृप्त करती है । इसलिए हमें केवल ऐसे जीवों के प्रेम भाव को ही स्वीकार करना चाहिए। इनका भाव हमारे भगवद् भावना के ज्योति को और अधिक प्रज्वलित कर देती है , बढ़ा देती है । 

श्री राधे ।