Sunday, 14 December 2025

दो शब्द हमारे देश के युवाओं से , बच्चों से

दो शब्द हमारे देश के युवाओं से , बच्चों से :- 

पैसे के पीछे हमे नही भागना चाहिए | हमें स्वयं में मानवता के गुणों के विकास पर जोर देना चाहिए | जब गुण विकसित होंगे , तब पैसा हमारे पीछे भागेगी | अगर हम पैसे के पिछे भागेंगें तो पैसा हमसे दुर भागेगी | यह नियम है संसार का । 
 हमे केवल अपने सर्किल औफ इंफुलेंस पर ध्यान देना चाहिए , सर्किल औफ कंसंर्न तो कंसंर्न हीं था और रहेगा | 
पहले पता करो की किस उदेश्य के लिए तुम्हारा जन्म हुआ हैं | क्योंकि विना कारण और उदेश्य का एक पत्ता भी पेड़ से नही गिरता हैं | फिर तुम तो ईश्वर की सर्वश्रेष्ट रचना हो | 
हम क्या अच्छा काम करते हैं यह जरुरी है | हम बदले में क्या पाते हैं यह जरुरी नही | हम क्या समाज को राष्ट्र को देते है यह आवश्यक है | समाज हमे क्या देता है | गाली या सम्मान यह महत्वपूर्ण नही | 
सारे अच्छे काम करो और प्रभु को समर्पित कर दो , क्रेडिट अपने को नही प्रभु को दो , गुरु को दो , कहो हर रात में सोते समय की हे गुरु देव जो भी मैने अच्छा काम किया वो आपकी मेहरवानी से किया | और जो भी बुरा किया मेरी नादानी थी | आप हमें इतनी शक्ति दिजिए की कल कोई बुरा काम हमसे ना हों |
समय की धारा में अपने आपको मत बहाओ , वल्कि समय का भरपुर उपयोग करो , दुरुप्योग नही | 
भगवान ने केवल एक चीज ही सबको समान रुप से दी है वो है समय , भगवान ने 24 घण्टे सब को बराबर दिया है | इसका जो भी जितना सदुप्योग किया है वह सफल हैं | 
उपलब्धि कुछ हांसिल करने में नही हैं | उपलब्धि प्राप्त कर बांटने में हैं | अपने लिय तो हर जीव जी लेता हैं पर दुसरो के लिए जीना हीं सच्ची उपलब्धि हैं | संतोष तब मिलेगा | और जब संतोष मिलेगा तब जीवन सार्थक होगा | 
दुसरे को दिखाने के लिय मत करो | हमको करना है बस इसलिये करों |
 किसी की आलोचना मत करो , आलोचना करने का अधिकार सिर्फ उसी को है जो पूर्णत: निर्दोष और ज्ञानवान हो | आलोचक बनने से पहले योग्य बनों । आलोचित या आलोच्य से ऊपर उठो और उपर पहुंचो ज्ञान में , बुद्धि में, विवेक में , यश में , प्रतिष्ठा में , पद में , और धर्म कर्म में । 
चरित्रवान बनने पर जोर दो | 
अपने जन्म के उदेश्य को जिस क्षण समझ जाओगे आधी सफलता तुम्हे मिल जाऐगी | बाकीं तुम कर्म करके सफल हो जाओगे |
परिक्षा में मार्क्स लाने के लिए मत पढ़ो , मुझे अच्छी तरह रुची से पढना है इसलिए पढों , मार्क्स तो आउट कम है | वो तो अच्छा आएगा ही | :- तुम्हारा संजीव कुमार 

Don't go behind money . Develop your quality, than money will automatically follow you . If you will run behind the money than money will be always far from you. And use your money for humanity . Don't misuse your money . Otherwise one day you will be in trouble. 
Always focus on your circle of influence don't go behind circle of concern .  
Select your careers as per your choice because every youth is made for some deeds . Always trust on yourself than other will trust on you . Be with truth always.
 . You will get sustainable success . No body will brake your record. :- Your sanjeev

Thursday, 30 January 2025

कुंभ मेले तथा कुंभ स्नान इतिहास और उत्पत्ति

कुंभ मेले का इतिहास और उत्पत्ति:- 
सनातन वैदिक धर्म का अल्टीमेट संविधान चार वेदों में "कुंभ मेला या कुंभ स्नान " का जिक्र कही नहीं है । वेदों में कुंभ शब्द का प्रयोग घट यानी घड़ा के लिए आया है ,‌ न कि कुंभ मेले तथा स्नान के लिए । 
ऐसा माना जाता है कि कुंभ स्नान कि शुरुआत आदि जगद्गुरू श्री शंकराचार्य के द्वारा चेतना के उच्चतम स्तर को प्राप्त जीवों के लिए किया गया था। 
चेतना के उच्चतम स्तर को प्राप्त योगभ्रष्ट व्यक्ति, साधन चातुष्ट्य संपन्नता हेतु अपनी अध्यात्मिक साधना के लिए पहाड़ , जंगल , नदी आदि को अपने साधना और सिद्धि के लिए अनुकूल मानते हैं । इसलिए आदि जगद्गुरू शंकाराचार्य ने इस मेले की शुरुआत की थी जो केवल वैरागी साधुओं के लिए थी । वैरागी वो साधु जो चेतना, चरित्र के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुके थे, ऐसे लोग अपने मन को अष्टांग योग तथा साधन चातुष्टय के बल पर शूद्ध कर चुके हो या करने कि प्रक्रिया में हो, तो ऐसे साधन चातुष्ट्य संपन्न योगभ्रष्ट जीव अपने अनुगत शिष्यों को साधना कराने के लिए त्रिवेणी घाट पर लेकर आते थे और वहां अष्टांग योग कि साधना आदि करते थे ।

बाद में ढोंगी आडंबरी , पाखंडियों और अंधविश्वासियों ने इसे अपना लिया , इनका नकल करने लगा और व्यापारियों द्वारा इसका बाजारीकरण हो गया । 
आम आदमी को इस कुंभ मेले से कोई लाभ नहीं होता । उल्टा नुकसान ही होता है । 

मानविए चेतना तथा चरित्र के निम्न स्तर का लोग जो जूआ , मांस , मदिरा , नशा, ड्रग आदि का सेवन करते हैं ठगी , चोरी , धोखाधरी , अत्याचार , दुराचार , पापाचार व्यभिचार आदि में लगे रहते हैं उनके लिए ज्ञान , ध्यान, साधना, पुण्य, भगवान की सेवा , भक्ति और मौक्ष असंभव है हमारे वेदों के अनुसार , ऐसे लोग अनाधिकारी माने जाते हैं शास्त्रों के सिद्धांतों के अनुसार। क्योंकि ये सब महापाप के केटेगरी में रखा गया है शास्त्रों में । इस तरह के पाप को करने वाले जीव का अंत:करण अत्यंत गंदा होता है । ऐसे लोगों का अन्नमयकोष दुषित होता है , अन्नमयकोष दूषित होने के कारण ऐसे लोगों का मनोमय कोष और बिचार दोनों प्रदूषित होते हैं । मन में गंदे गंदे विचार उत्पन्न होते हैं, मन अशांत तथा खिन्न रहता है , क्या अच्छा है क्या बुरा है इनके समझ में नहीं आता है ।  
इसलिए सही शिक्षा देने वाले का ऐसे लोग विरोध करते हैं काटने दौड़ते हैं , अपने चाल चारित्र तथा कुकर्म को सही ठहराने के लिए ऐसे असुर प्रवृत्ति के लोग वास्तविक धर्म को नहीं समझते । असुरों को अत्याचार , दुसरे को गाली देना , मारना सताना , ढोंग , पाखंड आडंबर तथा अंधविश्वास के सहारे अपना जीवन जीने की प्रवृत्ति होती है । 
अमृत के घड़े को असुर लेकर भागे थे लेकिन उसका कल्याण नहीं हुआ । वो और भी उग्र हो गय और देवाताओ से युद्ध किया । 
राक्षसी बिचार धारा , आसुरी बिचारधारा वाले जीव तमोगुणी होते हैं , उनपर अमृत के गुणों का उल्टा असर होता है । उदंड लोग किसी विषय और बस्तू का हमेशा ही दूरूपयोग किया है और करता रहेगा । 
ऐसे राक्षसी सोच वाले जीव को सात्विक बातें, धर्म का असली अर्थ नही समझ में आता कभी । ऐ लोग ढोंग पाखंड , आडंबर तथा अंधविश्वास को ही मुर्खता के कारण धर्म समझते हैं । 

तो ये कुंभ स्नान केवल उन सतोगुणी जीवों के लिए आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने कि थी जो योगभ्रष्ट हो चुके थे तथा चेतना के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुके थे । पहले से जिनका मन शूद्ध हो चुका था ऐसे लोग मौक्ष कि कामना से कर्म कांड और साधना के लिए त्रिवेणी को चुना था जो आगे चलकर परंपरा का रूप ले लिया और ढोंग , पाखंड , आडंबर तथा अंधविश्वासियों का अड्डा बन गया ।
अत: आम लोगो को सिद्ध संत , महापुरुषों का नकल नहीं करना चाहिए कभी । नहीं तो यह दैविक प्रकोप का कारण बनता है और दैविक दुख के सीवा और कुछ प्राप्त नहीं होता इन सब से । 

कल कुंभ मेले में इसी दैविक प्रकोप के कारण सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों लोग अपना का टांग हाथ फसली और गर्दन तुड़वाकर होस्पीटल में हैं , अपाहिज हो चुके हैं , जो दैविक प्रकोप का एक ताजा उदाहरण है आज 29 जनवरी 2025 का  ।

Tuesday, 26 November 2024

लक्ष्मी कौन है क्या है ?

*कितने अजीब लोग हैं!*

जरा अपने संसार को देखो कैसे अजीब लोग हैं हमारे संसार में। ये बड़े-बड़े पैसे वाले वो दुकानदार हो छोटे-छोटे या बड़े-बड़े खरबपति हों। ये लोग इस दिवाली पर हिसाब करते हैं और अपने बहीखाता में लिखते हैं- सदा लक्ष्मी सहाय! सदा कुबेर सहाय! लक्ष्मी सदा हमारे पास रहे। कुबेर सदा हमारे पास रहे। ये पंडित लोग जो पूजा कराते हैं आपके यहां शादी ब्याह में, यज्ञ बगैरा में, तो पूजा के बाद में एक श्लोक बोलते हैं- 

*यान्तु देवगणा: सर्वे पूजामादाय मामकीम्।* 
  
सब देवता अपने-अपने धाम को जाओ, हम पूजा कर चुके। पहले बुलाते हैं ना! गणेश जी और दुर्गा जी और षोडस मातृका, नवग्रह और अंत में कहते हैं- सब लोग जाओ। *लक्ष्मीम कुबेरेण च विहाय* लक्ष्मी और कुबेर तुम दोनों रहो और बाकी लोग जाओ। ये कितने अजीब लोग हैं अजीब! अजीब मायने समझते हैं आप लोग ना? हां! जिनकी खोपड़ी उल्टी हो वो अजीब होते हैं। भगवान सबसे अधिक अजीब हैं क्योंकि वो अन्यथाकर्तुम समर्थ है। वह आंख से सुनते हैं, कान से देखते हैं। अजीब हैं ना? हां!
तो ये हमारे संसार के लोग भी अजीब है और इनको बताने वाले पंडित जी वगैरह भी अजीब हैं! इनको यह नहीं पता है कि लक्ष्मी बिना भगवान के कैसे रहेंगी। वो तो सदा भगवान के बाएं तरफ रहती हैं। जब तुम भगवान को भेज रहे हो कि सब जाओ अपने-अपने लोक में और लक्ष्मी तुम रह जाओ। तो लक्ष्मी कहेंगी- तुम्हारा दिमाग खराब है, मैं अपने पति को छोड़कर तुम्हारे यहां रह जाऊं? यह तो संसारी स्त्री को भी अगर कोई ऐसे कहे कि आज जितनी स्त्रियां आई हैं वो सब रुकें हमारे घर में और जितने पति आए हैं वह जाएं अपने-अपने घर! तो लोग पिटाई कर देंगे। यह पागल हो गया है! तो लक्ष्मी तो तभी रहेंगी जब भगवान को बुलाओ। ना! कोई नहीं लिखता बही खाता में- 'राम सहाय', 'श्री कृष्ण सहाय', 'भगवान सहाय'। लक्ष्मी सहाय, कुबेर सहाय! यह लक्ष्मी कैसे रहेंगी भगवान के बिना? और कुबेर कैसे रहेगा? वह तो सर्वेंट है। तुलसीदास ने लिखा है, बड़ा मजेदार- 

*बिंधि न ईंधन पाइऐ सागर जुरै न नीर।*
*परै उपास कुबेर घर जो बिपच्छ रघुबीर।।*

अगर भगवान को आप नहीं मानते और ये कुबेर और लक्ष्मी की भक्ति करते हैं तो आपका क्या हाल होगा? विंध्याचल पहाड़ में इतने वृक्ष हैं और खाना पकाने को लकड़ी नहीं मिलेगी आपको। हां! इतना पानी भरा है समुद्र में, उंगली डूबोने को भी पानी नहीं मिलेगा। और अनंत धन है कुबेर के पास लेकिन वहां उपवास शुरू हो जाएगा, फाके पड़ेंगे। तो लक्ष्मी और कुबेर की भक्ति कर रहे हो और भगवान को विदा कर रहे हो! ये अजीब लोग हैं ना? हां! यह कृपालु बोल रहा है और कोई नहीं बोला आज तक। हां ! पूजा करवाते हैं और लक्ष्मी को सिर झुकाते हैं। और एक बात और बताएं आपको बड़ी मजेदार कि लक्ष्मी तो भगवान की अंतरंग शक्ति है। दिव्यानंद उनके पास है। और यह माया को लोग लक्ष्मी कहते हैं, माया को! यह जो संसारी संपत्ति है- सोना, चांदी, रुपया, मकान, जमीन इसको कहते हैं- लक्ष्मीवान है यह बड़ा! धनवान है इसलिए लक्ष्मीवान है! लक्ष्मीपति है! यह लक्ष्मी नहीं है यह तो माया है। संसारी वस्तु तो माया कहलाती है। यह पृथ्वी है ना! इसी से तो पैदा हुआ सोना, चांदी, हीरा। जितना भी आप लोग वैभव कहते हैं यह पत्थर सब है ना! यह मिट्टी से तो बने हैं। सोना कहां से निकलता है? इसी पृथ्वी से, चांदी इसी पृथ्वी से, हीरा इसी पृथ्वी से। वो जिसके पास अधिक हो गया वो लक्ष्मीपति हो गया! वो तो मायापति है। लक्ष्मीपति नहीं है कोई। लक्ष्मी तो भगवान की अंतरंग शक्ति है वो तो दिव्यानंद देती हैं मैटेरियल नहीं, स्पिरिचुअल हैप्पीनेस। लेकिन सब अजीब हैं ,अजीब काम करते हैं और चल रहा है परंपरा बस उसी प्रकार। आप लोग समझे रहिए आपको राधा कृष्ण की भक्ति करना है अनंत कोटि दुर्गा, लक्ष्मी, कुबेर सब अपने आप भागे आएंगे। आप सुप्रीम पावर की शरण में रहें और सबको अपने आप बिना बुलाये आने दें, डरे नहीं। लेकिन किसी का अपमान नहीं करें। हां! सबको नमस्कार है लेकिन मन बुद्धि का समर्पण श्यामा श्याम और उनके जन गुरु के प्रति होना है। ये रहस्य आज धनतेरस को आप लोग मस्तिष्क में रख लें।

*-प्रवचनांश भक्तियोगरसावतार अनंतश्रीविभूषित पंचम मूल जगद्गुरुत्तम १००८ स्वामि श्री कृपालु जी महाराज*

Saturday, 16 November 2024

प्रश्न - भगवान को भाव का भुखा क्यों कहा गया है ?

श्री महाराज जी द्वारा दी गई बहुत बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत ज्ञान और यह सावधानी बहुत जरूरी है, नहीं तो भगवान और गुरू के निमित्त कि गई सब सेवा, साधना ,दान , भजन-किर्तन निष्फल हो जाएगा ! सब किया हुआ जीरो गुणा सौ बराबर जीरो हो जाएगा । 
प्रश्न - भगवान को भाव का भुखा क्यों कहा गया है ?
उत्तर :- एक भुख का मतलव है आभाव में भुख और दुसरा आभाव नही है किसी चिज़ की , किसी चिज़ की कमी नहीं है , हर तरह से पूर्ण है फिर भी अपेक्षा करते हैं कि लोग हमें भोजन के लिए पुछे प्रेम भाव से । तो यहां भुख का मतलव है प्रेम भाव की अपेक्षा करना है । 
भगवान को सच में कोई व्यक्ति अगर किसी चिज़ का भुखा माने तो वो अज्ञानी है, भगवान को भावकग्राही कहना शास्त्र सम्मत है लेकिन उनको भाव का भुखा कहना और मानना शास्त्र विरुद्ध बातें हैं । 

भगवान प्रत्येक जीव के हित के लिए , उसके कल्याण हेतु उसके भावना को रीड करते हैं , इसलिए उनको भावक ग्राही कहा है शास्त्रों ने , लेकिन भगवान को भाव का भुखा कहना भारी मूर्खता है ।
भगवान किसी भी विषय वस्तु या भाव-वाव के भुखे नहीं है , उनको किसी चीज की कोई आवश्यकता या आभाव नहीं है । वो पूर्णकाम है निष्काम है , भला वो किसी चीज का भुखे क्यों रहेंगे ? उनको किस बात का आभाव है जो वो किसी भी चिज़ के भुखे रहेंगे ? 

भगवान का गुण है - पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते' -वृहदारण्यक उपनिषद ।
 वो परंब्रह्म भगवान श्री कृष्ण तो सभी प्रकार से सदा से परिपूर्ण है और परिपुर्ण रहेंगे । 
तो फिर भगवान को किसी चीज का भुख हो, यह सर्वदा असंभव है । इसलिए भगवान को भाव का भुखा कहना एक अपराध है । 

हां भगवान भावक ग्राही अवश्य हैं, वो भी अपने भक्तों के हितों के लिए केवल । भक्तों के दिव्य स्वार्थ (भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, विवेक ) को प्रदान करने के लिए अपने अकारण करूण स्वाभाव के कारण वो अपने भक्तों के द्वारा उनके प्रति अर्पित प्रेम भावना को, भक्ति भाव को , मायिक सेवा , मायिक साधना आदि को रीड करते हैं, नोट करते हैं और फल के रूप में उसे अपना प्रेम प्रदान करते हैं, आनंद प्रदान करते हैं , भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, विवेक, प्रदान करते हैं । 

चूकि जीव भगवान को और गुरू को केवल श्रद्धा भाव , प्रेम भाव , पूर्ण समर्पण, शरणागति भाव से , निष्काम सेवा भाव से हीं प्राप्त कर सकता है, इसलिए भगवान जीवों को अपनी भक्ति प्रदान करने के लिए अपने भक्तों से निष्काम प्रेम भाव की अपेक्षा करते हैं इसलिए उनको भावक ग्राही कहा गया है । 

हमारे गुरूदेव श्री महाराज जी भी तो सिर्फ हमारे कल्याण के लिए इस मायालोक में गोलोक से आए , इतना कष्ट उठाए वर्णा उनको किस चिज़ की कमी थी , वो तो पुर्णकाम हैं । भला उनको किस चिज़ की भुख थी या है , वो तो स्वयं भगवान का स्वरूप है , भगवान की सभी शक्तियां, सभी धन गुण के वे स्वामी है उनको इस गंदे संसार से भला क्या लेना देना । 

वो आए इस मृत्यु लोक में सिर्फ और सिर्फ हमारे कल्याण हेतु तथा अपने अकारण स्वभाव वश हमसे अपेक्षा करते हैं कि हम उनके अनुगत होकर , शरणागत होकर उनके बतलाए मार्गों का, सिद्धांतों का ठीक ठीक पालन करके सदा के लिए उनको प्राप्त करके इस मायालोक से मुक्त होकर सदा के लिए आनंदमय हो जाए । इसमें हमारा स्वार्थ है , उनका कोई स्वार्थ नहीं है । वो तो हर तरह से परिपूर्ण है , पुर्णकाम हैं , निष्काम है , उनको भला किस चीज की कमी ? 
अत: यह कभी मत सोचिएगा कि हम उनके निमित्त दानादि या किसी प्रकार से कोई सेवा करके उनका उपकार कर रहे हैं , यह भारी नामापराध हो जाएगा । 

हमेशा ध्यान रहे, हम हरि और गुरू के निमित्त जो भी सेवा , दान तथा साधना करते हैं, उनका रूपध्यान करते हैं , उनका गुन गाते हैं भजन किर्तन करते हैं, उनके सुख के लिए जी भी काम करते हैं वो दरअसल केवल और केवल अपने ही कल्याण हेतु कर रहे हैं, वर्णा भारी नामापराध हो जाएगा, आपका नुकसान हो जाएगा , सावधानी अति आवश्यक है । 

याद रहे यह सिद्धान्त ज्ञान कि एक समर्थ ही असमर्थ की सेवा कर सकता है , असमर्थ समर्थ की सेवा कभी नहीं कर सकता । 
इसलिए भगवान और गुरू सर्वदा समर्थ है और वे असमर्थ जीव की सेवा करते हैं उसको तत्वज्ञान देकर , उसका मायिक दान स्वीकार करके , उसकी मायिक साधना तथा सेवा स्वीकार करके । उसका मार्ग दर्शन करके , अपने साधकों का योगक्षेम वहन करके , उसकी हर तरह से रक्षा करके । 

इसलिए किसी भी जीव के मन में दान , सेवा , और साधना भजन किर्तन का अहंकार रत्ति भर भी न हो कि हम यह यह किए हैं और करते हैं और हम उनका बहुत बड़ा भक्त हैं ,बड़ा सेवक है, बड़ा साधक है , वर्णा सबकुछ समाप्त । अहंकार आया कि दीनता और आंसु गए और फिर सब जीरो बटा सौ बराबर जीरो हो जाएगा । 

जीव जब भगवद् प्राप्त कर लेगा , गुरू कृपा से समर्थ बन जाएगा तब उसको दिव्य सेवा मिलती है भगवान और गुरू की उनके गोलोक में । उस सेवा को प्राप्त करके वो अपना कल्याण सदा के लिए कर लेता है । 

:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन से प्रश्नों का उत्तर ।

Friday, 18 October 2024

संसार में भौतिक सम्पन्नता के बावजूद लोग इतना दुखी क्यों हैं , और हमारा उद्धार कैसे होगा ? मन को कब शांति मिलेगी ? हमारा कल्याण कैसे होगा ?

एक साधक का प्रश्न :- संसार में भौतिक सम्पन्नता के बावजूद लोग इतना दुखी क्यों हैं , और हमारा उद्धार कैसे होगा ? मन को कब शांति मिलेगी ? हमारा कल्याण कैसे होगा ? 
मां का उत्तर :- बड़ा अच्छा प्रश्न है तुम्हारा , श्री महाराज जी ने कई बार इस पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि यही बात एक बार शौनकादिक ऋषियों के द्वारा सुत जी से पुछा गया की कलयुग में लोगों का कल्याण कैसे होगा ? 
सुत जी ने कहा कि कलयुग में लोगों की यादास्त बहुत कमजोर होगी , लोगों को भुलने की बीमारी होगी , प्रारब्ध बहुत कमजोर होगा , लोग शारीरिक रुप से बहुत कमजोर होंगें , मानसिक शक्ति क्षीण होती जाएगी , लोग पाप और पूण्य में , धर्म अधर्म में फर्क नही समझ पाऐंगें , अच्छे बुरे के ज्ञान का आभाव होगा , लोग तर्क , कुतर्क , वितर्क में समय गवाऐंगें , 
झूठ बोलने , पापादी कर्मों तथा चिंतन में लिप्त रहने के कारण जीव के पुण्य बल तथा आयु क्षीण होती जाऐगी | कुसंगादि के कारण अपना नुकसान ही नुकसान करेंगें | काम-क्रोध, अहंकार, विनाश का प्रमुख कारण होगा | लोगों की रूचि भगवान का प्रेम प्राप्त करने में नहीं होगा । कामनाओ के पूर्ति मात्र के लिए लोग तीरथ 
-विरथ मंदीर मस्जिद गुरुद्वारे में जाएंगे । लोग भगवान के भक्ति का प्रदर्शन मात्र करेंगे । भगवान से निष्काम प्रेम के जगह लोग भक्ति, दान, धर्म का प्रदर्शन अधिक करेंगे । धन वैभव का अहंकार जीवों के उपर हावी रहेगा । धर्म के आड़ में लोग व्यभिचार तथा पाखंड में लिप्त रहेंगे । व्यभिचारी पूजित होंगे, तथा वास्तविक संतों के प्रति कम लोग ही आस्थावान होंगे । 
अत: भगवान से सच्चे तथा निस्वार्थ प्रेम के आभाव में लोग भौतिक सपन्नताओं के बाबजूद दुखी रहेंगे । जीवो का मन अशांत रहेगा । जीव रोगादि से ग्रस्त रहेंगे । चरित्र और सुसंकार का आभाव होगा । घोर कामनाओं तथा वासनात्मक भोगेच्छा के वशिभूत जीवो का नैतिक पतन होगा । 
केवल भगवान की निष्काम भक्ति करके उनका प्रेम प्राप्त करने के बाद ही लोग आनंदमय तथा सुखी होंगे । 

श्री महाराज जी ने समझाया है कि "जीव समझ नही पाते है कि वो जो कष्ट भोग रहे है वो उसके ही अनन्त जन्मो पल्स वर्तमान जन्मों के बुरे कर्मो का फल है | "

लोग देवी देवता का चक्कर काटते हैं , मंदिरो में जाकर तमाम मनता मनौती मनाते है , जादु मंतर के चक्कर में पड़ते है | नकली बाबाओं के चक्कर में पड़कर अपना तमाम तरह का नुकसान पँहुचाते हैं | 
समय आने पर दो चार का खड़ाब प्रारब्ध कट जाने पर कष्ट कम हो जाने पर , रोग ठीक हो जाता है तो लोग उसके द्वारा ढोल पिटवाते है कि अमुख बाबा बड़े सिद्ध हैं फिर कुछ लोग और इस चक्कर में पड़कर अपना और नुकसान कर बैठते हैं | 

वो समझते है देवी देवता खुश हो गये और हम ठीक हो गए | अरे क्या खाक ठीक हो गए , जिसको भगवान ने उसके प्रारब्ध का फल दिया उसे कौन ठीक कर सकता है , वो तो भोगने बाद ही ठीक होगा | देवी देवता में ऐसी हिम्मत कहां जो विधाता के दिये हुऐ फल को काट सके | ये देवी देवता के अवलम्ब , आधार तो खुद श्रीकृष्ण है | इनकी ऐसी हिम्मत कहां जो वो अपने अबलंब के खिलाफ जाऐं ?

अरे ये देवी देवता भी तभी खुश होते है जब वे देखते है कि ये हमारे इष्ट को ही भज रहा है उन्हीं की भक्ति कर रहा है | ये उनका हीं हो गया | ध्यान दो - श्री कृष्ण का हीं हो गया है , श्री कृष्ण का भी नहीं | 

अत: देखते हो संसार में तमाम तरह के नए नए रोग बढ़ रहें हैं कीड़े मकोड़े की संख्या बढ़ रही है , लोग काल का ग्रास बन रहें हैं फिर भी नही चेतते , क्योंकि बुद्धि भ्रष्ट हो चूकि हैं | शास्त्रों , पुराणों को अपने अपने तरीके से अर्थ निकाल कर अनर्थ के तरफ बढ रहे हैं | पाप में लिप्त है , धन का दुरुपयोग बढ रहा है | 

अत: इन चीजों को समझों , कुसंग मत करो , हरिगुरु के शरण में जाओ , बार बार सिद्धान्तो को पढ़ो , हरिगुरु का हीं संग करो , गुरुधाम जाओ , हरिगुरु के बुद्धि से अपनी बुद्धि को जोड़ दो , हरिगुरु के बताऐ मार्ग पर चलों , रुपध्यान करो , हरिगुरु निर्दिष्ट साधना करो , साढ़े छ अरब मनुष्यों मे हम सब बड़भागी हैं कि कृपालु जैसा गुरु मिला , जो स्वयं परम तत्व हैं उनका दामन कभी मत छोड़ों । 
मन को वास्तविक शांति सुख और आनंद श्री राधाकृष्ण प्रेम पाने के बाद ही मिलेगी , तर्क , कुतर्क मत करो , अपनी तुक्ष बुद्धि मत लगाओ , ज्यादा से ज्यादा उनके पुस्तकों को पढो , बार बार पढो , उनकी पुस्तके मामुली पुस्तकें मत समझो , यह उनके द्वारा रचित महानतम ग्रन्थ है | 
:- पूज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।

Saturday, 12 October 2024

सन्यासियों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी के लिए संक्षिप्त लेख ।सन्यासियों के प्रकार :- नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार कूल छः प्रकार के सन्यासी होते हैं जो निम्नलिखित हैं ।


 सन्यासियों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी के लिए संक्षिप्त लेख ।
सन्यासियों के प्रकार :- 
नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार कूल छः प्रकार के सन्यासी होते हैं जो निम्नलिखित हैं - 
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साधारण सन्यासी कुटिचक होते हैं जो मंत्रादि की साधना भी करते है लेकिन मन भगवान में ही स्थित यानि ध्यान मग्न होतें है यानि अधिकतर समय साधना में लगाते हैं । ये शिखा और यज्ञोपवीत ( सूत्र) भी धारण करतें है त्रिदण्ड, कमण्डलु , कौपीन ( लंगोटी ) और कन्था ( कथरी ) धारण करतें है । झोली और पात्र भी रखतें है। ये मिट्टी खोदने वाला खनती भी अपने पास रखते हैं। ये पराविज्ञानी नहीं होते अर्थात अपरोक्ष ज्ञाननिष्ठ नहीं होते। ये  श्वेत ऊर्ध्व पुण्ड्र लगाते हैं। 
ये गुरु के अलावा  माता पिता की भी सेवा कर सकते हैं। 
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बहुदक सन्यासी - जनेऊ, चोटी( शिखा ), दण्ड कमण्डलु लंगोटी, और कथरी के अलावा त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं।ये उत्तम  सज्जन लोगों से ही आठ ग्रास भोजन ग्रहण करते हैं । एक ग्रास उतना ही होता है जो शान्ति से मुख में रखकर चबा सकें न कि बड़ा कौर। ये अपने मन को भगवान में ध्यानस्थ कर कठिन साधना करते हैं 
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हंस :- ये जब चाहे मानसिक स्तर पर भगवान के ध्यान में चले जाएं और पूर्ण जागृत अवस्था में भी भगवान में मन को स्थित रख कर संसार में कर्मयोग करते हैं , ये भिक्षु किसी गांव में एक रात , नगर में पाँच रात और तीर्थ क्षेत्र में अधिक से अधिक  सात रात निवास कर सकते हैं वे अपने आपमें ही मगन रहते हैं और स्वागत सत्कार से दूर रहते हैं। ये जटा जूट धारण करते हैं। ये एक जगह अड़के नहीं बैठते इनको भोजन या आश्रम की सुविधाओं से कोई संबंध नहीं होता।   नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार ये मधुकरी ( भिक्षा) से ही शरीर का पोषण करते हैं।
ये तीनों यानि कुटिचक , बहुदक तथा हंस क्रमशः घासफूस के आश्रम वाले होते हैं प्रायः गृहस्थ जीवन काटकर फिर वानप्रस्थ स्वीकार  करते हैं तदोपरान्त ही अपनी अवस्था के अनुसार कुटिचक या बहुदक अथवा हंस हो पाते हैं। 
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परम हंस :- ये हर क्षण मानसिक स्तर पर भगवान के ध्यान में स्थित होते हैं और शारिरिक और से    शिखा और यज्ञोपवीत धारण नहीं करते ये मात्र 5 घरों से अन्न पाकर एक ही बार पाते हैं दूसरे समय नहीं पाते। ये बांस का दण्ड पास में रखते हैं। ये सम्पूर्ण अंगों में भस्म धारण करते हैं यही इनका वस्त्र है पर ये दिगम्बर हो भी सकते हैं नहीं भी तो एक लंगोटी और एक चादर अपने शरीर पर ओढ़ कर भी रख सकते हैं। परम हंस नामक संन्यासी वृक्ष के मूल अथवा श्मशान में रहते हैं। यज्ञशाला, नदीतट, गड्ढा, झोंपड़ी में भी रह सकते हैं। 
इनको लाभ या अलाभ से कोई संबंध नहीं होता। इनको कोई स्वर्ण भी दे तो उसे मिट्टी या नाशवान समझकर स्वीकार नहीं करते । इनको शुद्ध द्वैत या अशुद्ध द्वैत से कोई भी मतलब नहीं होता ये पूर्णतः आत्माराम होते हैं ये ब्रह्म से अभिन्न होते हैं किसी भी नियम या कर्मकांड आदि से इनको कुछ भी संबध नहीं होता ये सदा ब्रह्मानंद से युक्त होते हैं। ये चाहे चाण्डाल के घर प्राण त्याग करें या काशी या मथुरा में ये मुक्त ही होने से परम निर्वाण को ही पाते हैं।
जड़भरत , श्वेतकेतु व शुकदेव लीलावश परमहंस हैं।और ये सभी वर्णों से भिक्षा ले सकते हैं इनको ब्रह्म के सिवाय कुछ नहीं दिखता स्वयं भी सर्वमय भी। मात्र देह के लिए ही ये किसी से भी भिक्षा ले सकते हैं।
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तुरीयातीत सन्यासी - यह कभी किसी से कुछ भी नहीं मांगते। यदि स्वेच्छापूर्वक कोई दे दे तो ग्रहण कर सकतें है अथवा  ये देह के लिए मात्र तीन घरों से अन्नाहार मांग भी सकते हैं पर धन , वस्त्र और वस्तु नहीं मांगते।  यह नग्न होते हैं। और हर क्षण भीतर से , मानसिक स्तर पर साधना में निमग्न रहते हैं । 
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अवधूत सन्यासी - ये अजगर वृत्ति से जीवित रहते हैं ये बंधन को मिथ्या मानते हैं इनके अनुसार तुमको किसी ने बंधन में नहीं डाला तुम तो मुक्त ही हो अपने अज्ञान के कारण ही तुम मुक्ति चाहते हो वास्तव में जो मुक्त है उसे किस प्रकार की मुक्ति चाहिए बस अज्ञान का नाश कर ले यही मुक्ति है। ये मंत्र और उपासना से रहित सोऽहम् भाव में ( इससे भी अतीत) स्थित होते हैं । :- नारद परिव्राजक उपनिषद । ( संजीव कुमार )

Thursday, 10 October 2024

श्री कृपालुजी महारप्रभु के अनुयायी भगवान श्री राधाकृष्ण के अनन्य भक्त ।

पुर्व जन्मों का पुण्य पुंज तथा उस पर भगवद् कृपा से जबतक किसी भी जीव के कुसंस्कारों का नाश नहीं होगा तथा उनके चित्त में सर्वश्रेष्ठ संस्कारों का उदय नहीं होगा तबतक वो जीव श्रीमद्पदव्याक्य, प्रमाणपारावरीण, वेदमार्ग-प्रतिष्ठापन, निखिलदर्शन समन्वयाचार्य, सनातन वैदिक धर्म प्रतिष्ठापन सत्संप्रदाय परमाचार्य, भक्तियोग रसावतार, भगवदनन्त श्री विभूषित पंचम मूल जगद्गुरूतमई १००८ स्वामी श्री कृपालु जी महाराज द्वारा दिए गए वैदिक दर्शन, तत्वज्ञान , विशुद्ध एवं श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्तिरस एवं भक्ति सिद्धांतों में रूचि नहीं रख सकता, चाहे वो आज कलयुग में किसी भी धर्म , किसी भी संप्रदाय , किसी भी मत , किसी भी मार्ग के बड़े से बड़े धर्मपीठ पर बैठे बड़े बड़े धर्माधिकारियों , कर्मकांडी पंडितों तथा दुनियां में महान कहलाने वाला जीव या ज्ञानी ध्यानी विज्ञानी आदि ही क्यों न हो । इन बड़े बड़े पंडितो तथा ज्ञानियो से वो चंडाल श्रेष्ठ तथा बंदनिए है जो श्री राधाकृष्ण की अनन्य तथा निष्काम भक्ति करते हैं , उनमें रूचि रखते हैं, उनसे प्रेम करते हैं । 

परम दिव्य तत्व , अवतारी महापुरूषों में सर्वश्रेष्ठ श्री कृपालु जी महाप्रभु द्वारा श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्ति में रूचि इस युग में केवल उन्हीं सौभाग्यशाली जीवों को है जो अपने पुर्व जन्मों में परम तत्व श्री राधाकृष्ण की भक्ति की है तथा भगवान श्री कृष्ण के परमगुप्त,अद्वितीय,अनुपम , अलौकिक अति दुर्लभ प्रेम रस को प्राप्त करने के लिए लालायित हुए थे और हैं । 

श्री राधाकृष्ण के अनुपम , अपरिमेय , अद्भुत, अतुलनीय, अलौकिक, दुर्लभ भक्तिरस के प्रति आकर्षित जीव ही केवल श्री कृपालु जी महाप्रभु को अपना गुरू मानते हैं और आने वाले समय में मानेंगे भी तथा उनके प्रति अनन्य, दृढ़ श्रद्धावान, आस्थावान तथा संकल्पित है तथा होंगे । 

श्री कृपालु जी महाप्रभु जैसे महानतम अवतारी संत के प्रति जिज्ञासु, पिपासु श्रद्धावान, निष्ठावान, अनन्य तथा समर्पित जीवों के सौभाग्य की सराहना करना स्वर्ग के देवी देवताओं तथा सरस्वती एवं बृहस्पति के लिए भी कठीन है ।

अति धन्य हैं वो जीव जो श्री महाराज जी का अनन्य अनुगामी होकर श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्ति करते हैं । 

 मैं संजीव कुमार एक क्षूद्र सा अधम एवं पतित जीव , हमारे गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज के सभी अनुयायियों एवं निष्काम सेवकों के श्री चरणों में मन ही मन नित्य प्रति अपना मस्तक नवाकर स्वयं को धन्य समझता हूं । जय जय श्री राधे , जय जय श्री कृपालु महाप्रभु की जय जय जय, जय जय श्री महाराज जी के साधक समुदाय की जय ।। :- संजीव कुमार ।