Saturday, 10 April 2021

साधारणतः मनुष्यों में चार दोष होते हैं आजकल ।

साधारणतः  मनुष्य चार दोषों से ग्रसित है । 

साधारणतः मनुष्य में चार दोष होतें हीं है किसी में कम तो किसी में ज्यादा । ये हैं 

१. भ्रम
२.प्रमाद
३. विप्रलिप्सा
४. कर्णापाटव

भ्रम किसे कहते हैं?

भ्रम कहते हैं किसी वस्तु को न पहचान करके उसे दूसरा रूप समझना। जैसे मैं आत्मा हूँ परन्तु अज्ञान (भ्रम) के कारण अपने को देह मानता हूँ। एक पीतल की चैन (chain) है, उसको एक व्यक्ति सोने की चैन समझता है। एक वस्तु को सही रूप में न पहचान कर गलत रूप में निर्णय करना यह भ्रम है। भागवत में कहा गया है, विपर्यय, मति विपर्यय इसको भ्रम कहते हैं। अर्थात बुद्धि नहीं समझ सके, किसी व्यक्ति-वस्तु का सही रूप और उसका उल्टा समझे यह भ्रम है।

प्रमाद किसे कहतें हैं?

मन की असावधानी, लापरवाही को प्रमाद कहते हैं। आप लोग समझदार व्यक्ति है। आपको गलती नहीं करना चाहिए। लेकिन कुछ मस्ती में कुछ लापरवाही में गलत बोल गए। फिर कहते हैं कि 'वो बात मुँह से निकल गया, माफ़ कीजिये।' ऐसा बोलते हैं हम लोग। निकल गया? अरे कोई बात स्वाभाविक(नेचुरल) निकलता है बिना सोचे-विचारे। हाँ! लापरवाही से ऐसा होता है। बड़े-बड़े बुद्धिमानों से होता है। तो मन की असावधानी, ये प्रमाद है।

 
विप्रलिप्सा किसे कहतें हैं?

विप्रलिप्सा कहते हैं अपने दोष को छुपाना। हर चीज में दखल देने का अहंकार। कोई चीज़ छेड़ दो कहीं पर, उसका ज्ञान हो चाहे न हो बोल पड़ते है सभी लोग। जिस विषय में बड़ी-बड़ी उपाधि (डिग्री) लिए रहतें हैं, उसमें भी वो सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) नहीं है। कौन डॉक्टर गलती नहीं करता। मरीज को पचास प्रकार से जाँच किया, समझा, दवा किया, नहीं फायदा हुआ। तब वो कहता है दवा बदल दो। अरे तेरी खोपड़ी बदल पहले। तूने समझा नहीं की क्या बीमारी है और इलाज शुरू कर दिया। तो डॉक्टर कहता है कि 'भई मैं कोई अन्तर्यामी हूँ, यह लक्षण इस बीमारी में भी होतें हैं, इस बीमारी में भी होतें हैं। तो मैंने समझा यह बीमारी है।' हम लोग अपने दोष को छुपाते हैं, संसार के सब लोग छुपाते हैं। यह सबमें बीमारी है। तो यह विप्रलिप्सा जो है। वो हम सब लोगों को घेरे हुयें हैं।

कर्णापाटव

कर्णापाटव कहते है, अनुभवहीन होने पर भी अपने को अनुभवी सिद्ध करना। हमको एक विषय का भी अनुभव नहीं है। और अगर मान भी ले की एक विषय में कोई सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) भी है, तो सैंकड़ों विषय है और उन विषयो में वह व्यक्ति सर्वज्ञ नहीं है। वो इंजिनियर नहीं है। इंजिनियर है तो डॉक्टर नहीं है। डॉक्टर है तो वकील नहीं है। अब ऐसा कौन आदमी है जो सब में परिपूर्ण हो ये सौ वर्ष की उम्र में। तो अनुभवहीन होने पर भी अपने को अनुभवी सिद्ध करना यह कर्णापाटव है।
तो यह चारों दोष मायाधीन मनुष्य में होते ही हैं। किसी में कम किसी में ज्यादा होता है। लेकिन यह चारों दोष होते हैं।

- पुज्यनियां मां राजेश्वरी देवी  जी


Sunday, 4 April 2021

भगवान पर विश्वास करने वाले तो बहुत है पर भरोसा करने वाले बहुत कम ।

एक नट एक रस्सी पर खेल दिखा रहा था । रस्सी 20 फीट के ऊंचाई पर बंधा था और निचे आग जल रहा था । नट अपने बच्चे को गोद में लेकर रस्सी पर चल कर दुसरे छोर पर पहुंच गया । फिर दर्शक खुब ताली बजा रहा था उसको सफलता से मौत के कुंए को पार करने पर ।

फिर वो नट पब्लिक से पुछा कि :- मैंने अभी अभी आग के जलते शोलों के उपर बंधी रस्सी के पहले छोर से इस छोर आ गया , आपलोगों ने देखा अभी अभी । अब फिर क्या आपलोगों को मुझ पर पुर्ण भरोसा है कि मैं फिर इस छोर से उस छोर लौट जाऊंगा ? 
पब्लिक जोर से उसका हौसला बढ़ाते हुए बोला की तुम यह अवस्य कर सकते हो । जरूर कर सकते हो , मुझे पुरा विश्वास है तुम पर ।

तो फिर वो नट ने पब्लिक से बोला की मेरे जैसे आपलोगो में से भी कुछ लोगों के  गोद में  बच्चा है आपका , आपको मुझ पर पुरा विश्वास भी है , आपने अभी अभी देखा कि मैं अपने बच्चे को अपने पीठ पर बांध कर पहले छोर से इस छोर सफलता से पार किया इस रस्सी पर । तो इस बार आपलोगो में से कोई  अपना बच्चा मुझे दे मैं उसको अपने पीठ पर बांध कर उस पर अवस्य पहुचुंगा । आप का मुझ पर विस्वास (believe ) है इसलिए भरोसा ( trust ) भी जरूर होगा मुझ पर ।
पर सभी अपना पैर पीछे खिंच लिया । किसी ने अपना बच्चा नहीं दिया उसको । 
यानि कहने का मतलव सिर्फ विस्वास करने वाले तो बहुत है भगवान और गुरू पर भरोसा करने वाले बहुत कम ।

अब आप हीं देखिए बहुत से लोग जो विश्वास की बड़ी बड़ी बात करते हैं भगवान और गुरू पर,  उनको दो पैसा दान के लिए बोलिए तो पैर पीछे खिंच लेंगे । 
बहुत कम लोग हीं दान करने के लिए तैयार होते हैं ।
बहुत विरले हीं होंगें जो अपनी कमाई का एक हिस्सा से ज्यादा उनके ( हरि गुरू के )निमित्त दान दें दें ।

हमारी मानसिकता जीवन के हरेक क्षेत्र मेनिम्नस्तरकी होती जा रही है ऐसा हम महसूस करते रहते हैं ? ऐसा क्युं है ? संत महात्माओं की भरमार होने के बावजूद हम अपने हरेक व्यवहार में क्युंअप्रमाणिक बनते जा रहे हैं ?

हमारी मानसिकता जीवन के हरेक क्षेत्र मे
निम्नस्तरकी होती जा रही है ऐसा हम महसूस करते रहते हैं ? ऐसा क्युं है ? संत महात्माओं की भरमार होने के बावजूद हम अपने हरेक व्यवहार में क्युं
अप्रमाणिक बनते जा रहे हैं ? 
****************************************** क्यूंकि हम लोग संत महात्माओं , भगवान , महापुरुषों "को" मानतें हैं सुनतें हैं पढ़ते हैं लेकिन उनकी मानते नहीं । गांधी जी पर माला चढ़ातें हैं उनको मानतें हैं , पर "उनकी" मानतें नहीं । कारण यही है । विवेकानंद जयंति मनाते हैं पर उनके आदर्शों से दुर हैं । गौरांग ज्यंति मनाते हैं पर भक्ति से कोसों दुर हैं ।

मानवत कहता है - मांस मदिरा का सेबन मत करो , 
चोरी मत करो , दुसरे में दोष मत देखो , खुद में दोष देखो ,दुसरे में दुर्भावना मत करो ।
झूठ मत बोलो कि किसी का नुक़सान हो जाए , दूसरे को दु:ख मत दो , हर समय खुद में भगवान को महसूस करों , एक क्षण को भी उनको ना भूलो , राग द्वेष , काम क्रोध , मद् मोह लोभ अहंकार आवे तो दमन करो इन दुर्गुणों का , जैसे सारी के एक छोड़ में आग लग जाती है खाना बनाते समय महिलाओं को तो वो तुरंत दवा देती है । ठीक उसी तरह क्रोध आवे तो दवा दो , शांत हो जाओ ।
अपने शरीर का ध्यान रखो , समय पर सोओ , समय पर उठो , काम करते समय हर आधे घंटे पर भगवान हमारे साथ है एक पल सोंचों , वो हमारे सब काम देख रहें हैं , नोट कर रहे हैं यह गांठ पार लो ।"
पर कितने प्रतिशत लोग , अपनी जिंदगी में अपनाऐं हैं ?
हद की झूठ बोलना हम सिख गए हैं , हर पल हर ओर हर समय पाप बढ़ रहा है , हर ओर निर्दोष जीव के भ्रूण तक को खा रहे हैं । 

आज भाई भाई से झूठ बोलते है , मां से झूठ बोलते है लोग पिता से झूठ बोलते है , बुजुर्गो का सम्मान नहीं , आज हम अपने बच्चों कों सही संस्कार नहीं देतें , सही शिक्षा नहीं देते ताकि उनको संस्कार मिले । 
भारतीय संस्कृति पर पश्चात्य संस्कृति हावी है ,खास कर आज के 70% युवाओं और बच्चों में और परिवार में, आज के महानगर में उपनगर में रहने वाले भारतीय दम्पत्ति अपनी संस्कृति को भुल रहे हैं । कहतें हैं हम मोडर्न हैं । तुमने हमारे कपड़े पर सवाल उठाया , तुम्हारी हीं‌ नियत खड़ाब है आदि आदि । 

लड़के फटा जींस पहनतें हैं जो पश्चिम के गाय , याक् आदि के चरवाहे पहनते हैं , क्योंकि उनका जींस फट जाता है घीस कर कठीन परिश्रम से , वह यहां फैशन बन गया है ।‌ जींस का मैं विरोधी‌ नहीं लेकिन जींस फटा खड़ीद कर पहनना गलत है , बोलीवूड का असर हैं , बोलीवुड के अच्छा चीज से मतलव नहीं लेकिन एक्टिंग का नकल अच्छा लगता हैं ।
वो तो एक्टिंग में ऐसा पहनतें हैं करतें हैं फिल्म में , लेकिन हम लोग तो अपने सार्वजनिक जीवन में उनका एक्टिंग अपनातें हैं जिसकी वो लोग सार्वजनिक जगह पर सारी पहन कर आतें हैं , हीरो मर्यादित कपड़े पहन कर आतें हैं लोगों के बीच । और हम ????

हम भौतिकबाद में जितना आगे बढ़ रहें हैं‌ संस्कार उतना ही पीछे छुटते जा रहा है हमारा , नैतिकता समाप्त होती जा रही है , हम आगे बढ़ने की जगह पीछे जा रहें हैं ।
हम अर्थ का अनर्थ करते हैं , शराब कबाब आदी में पैसे खर्च करते हैं , घुमने फिरने मौज मस्ती , शादि विवाह में अनावश्यक खर्च करतें हैं । पर सही जगह पर कंजूसी करते हैं ।

हाय डेड हाय मम कहतें हैं । हमारी बोलीवुड के हिरो हिरोइनी के फिल्मों की नकल करतें हैं , मोटर साईकिल पर युवा स्टंट करतें हैं गर्लस कौलेज के सामने ।
दुसरे के बहु वेटी , पत्नी , धन पर गलत निगाह है ।

तो जैसा मैं अपने कुछ महीने पहले पीछले पोस्ट में लिखा था और अब भी कहता हुं भगवान अपनी माया शक्ति प्रकृति के द्वारा कलयुग में समय समय पर कभी कभी आकाल , आपदा रूपी तांडव करवा कर हमारा विनाश करवातें हैं अपनी योग माया से । 

इसलिए हम सब अगर अपने गुरू और इष्ट को मानतें हैं तो उनकी बातों को भी माने , उनके सिद्धांत को अपनावे , तो हमारे पीछले पापों का शमन होगा और आगे ना करें इसकी जिम्मेंदारी ले । तो प्रकृति के प्रकोप से बच जाऐंगें । हंसना खेलना कुदना व्यायाम करना छोड़ चुकें हैं । यह सब भी अपनाने का प्रयास करें । जो ज्ञान हम दुसरे को देंतें हैं पहले खुद अपनावें । 

हम लोग राम जैसा वेटा भाई पति चाहते है , सीता जैसी पत्नी चाहतें हैं लेकिन खुद दसरथ जैसा बाप , शत्रुध्न , भरत जैसा भाई बनने की जरा भी कोशिश नहीं करतें हैं 
 राम के आदर्शों का एक अंश अपना कर भी उनके जैसा पति बेटा , भाई नहीं बनतें ।
इसलिए हमारे देश में इतने अवतार भगवान कें संत के और महापुरुषों के होने के बाबजूद ज्यादातर लोगों पर पर कोई असर नहीं हुआ । कुछ बीस तीस % पर हुआ होगा , अंदाज से बोल रहा हुं क्योंकि अभी भी भारत हीं रहने लायक हैं , लेकिन अब इसका भी लोग स्वरूप बदलने पर उतारू हैं ।

Brain Boosting Foods

Brain Boosting Foods

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Alzheimer's Disease is the most common form of dementia which is a progressive & irreversible disorder that affects the brain cells. Symptoms worsen over time, and genetics is a causative factor for this disease outcome. However, there is no identifiable cause and no effective treatments to curb this degenerative & crippling disease yet.  It is known that brain's of Alzheimer patients have plaque build up around the brain cells, similar to a clogged gutter or rusted metallic pipes, that causes blockage of communication between nerve cells & eventually cell death.

There are two factors that appear to play a role in the degeneration of nerve cells - oxidative damage by free radicals and inflammation. Age and lifestyle play an important role in this. In addition, having a sedentary lifestyle and insulin resistance play a role in this. Thus, memory and cognition affect to a great extent.  Therefore, it is important to focus on food habits and brain-boosting foods for brain health. Here are some foods that are found in your pantry and around your home, that you can add to your plate.

1. Blueberries are loaded with antioxidants.

2. Turmeric can reduce plaque accumulation.

3. Nuts contain omega 3, E & antioxidants.

4. Beans contain phytochemicals & b vitamins that are a fuel source for the brain.

5. Dark green leafy veggies are storehouses for phytochemicals and folate - both slow down dementia.

6. Red grapes and grape juice are packed with Resveratrol  - improves memory and prevents Alzheimer's.

7. Green tea can block plaque (amyloid) formation.

8. Small amounts of coffee, 2 to 3 cups/day lower the risk of neurological disease and diabetes.

9. Dark chocolate is rich in flavonoids - can improve cognitive function.

10. Fermented foods like yogurt contain vit. K - can slow disease progression. 

11. Extra Virgin Olive Oil 

12. Whole grains like millets, brown rice, barley -  are rich in B vitamins which protect the brain.

13. Coconut oil is rich in MCT oil - increases alertness & focus.

#alzheimers, #brainhealth, #mediterranean, #coconutoil, #turmeric

Friday, 2 April 2021

तुम बिनु जिया नाही लागे ,साँवरे .....

तुम बिनु जिया नाही लागे ,साँवरे .....
अब तो तरस खाओ ,साँवरे 
तुम बिनु जिया नाही लागे ,साँवरे ......

जनम जनम मैं बिरथा गामायों 
कबहुँ न पायो चैन रे 
अब तो दरस दे दो , साँवरे .....
तुम बिनु जिया नाही लागे ,साँवरे .......

कित मैं जाँऊ , का से गांऊ ........
सुर ना सजे अब ,साँवरे .........
तुम बिनु जिया नाही लागे ,साँवरे ....

दिन रैन बित्यो युग युग बित्यो 
पलहुँ न पायो चैन रे 
तुम बिनु जिया नही लागे ,साँवरे .....

धन्य ' कृपालु ' पायो गुरु रुप सो 
लै के बतायो तेरो नाम रे 
तुम बिनु जिया नाही लागे , साँवरे ...

कलि-काल का कौन भरोषो 
किस दिन निकसत प्राण रे 
अब तो तरस खाओ साँवरे 
तुम बिनु जिया नाही लागे , साँवरे ......
तुम बिनु जिया नाही लागे , साँवरे .......

( संजीव )

प्रश्न :- भक्ति मार्ग में भी दु:ख सु:ख की परिस्थितियों के पैदा होने का कारण क्या है ?

प्रश्न :- भक्ति मार्ग में भी दु:ख सु:ख की परिस्थितियों के पैदा होने का कारण क्या है ? 

उत्तर :- जीव जब वास्तविक भक्ति मार्ग में कदम रखता है तो उसके अपने पीछले कर्मों का फल प्रारब्ध के रूप साथ साथ रहता है । यही प्रारब्ध उसके संसारिक सुख और दुख का कारण है । 
प्रारब्ध हर किसी को भोगना ही पड़ता है । 
अतः वास्तविक साधक इन माईक सुख दुख की परवाह नहीं करता कभी । वो अपने भगवद् प्राप्ति के लक्ष्य पर गंभीर होता है और अटल होता है । 
उसके पास अपने गुरू के द्वारा दिय गय तत्त्वज्ञान का और उनके कृपा का बल होता है । अपने गुरू के ऊपर दृढ़ विश्वास, अटूट श्रद्धा और निष्काम प्रेम का बल उसकी रक्षा करता रहता है ।
और शरणागत जीव सदा अपने लक्ष्य पर अग्रसर होता है । हालाकी भक्ति से खड़ाब प्रारब्ध की तीव्रता कटती है , आंशिक हो जाती है । और इस प्रकार साधक का परीक्षा भी हो जाता है भगवान की दासी माया के द्वारा । 

जीव और माया का शासक भगवान हैं , लेकिन अनादि काल से जीव भगवान से विमुख है , नेचुरली जीव भगवान को छोड़ कर माया की दासता अनादि काल से कर रहा है ।
अनादि काल से आनंद प्राप्ति के एक मात्र उद्देश्य से हीं माया के पीछे जीव भाग रहा है । लेकिन असली आनंद की प्राप्ति नहीं हुई आज तक । कारण संसार में असली आनंद है हीं नहीं । 
जीव कि दशा माया के पीछे भागने के कारण बहुत दयनिए हैं । इसलिए संसारिक सुख को हीं अपना सुख और संसारिक दु:ख को हीं जीव अपना दु:ख समझता है । और इन्हीं मृग मरीचिका रूपी सुख के पीछे भागते भागते अंतत्वोगत्वा मानव देह छिन जाता है और जीव फिर से चौरासी लाख का चक्कर लगाने के लिए बाध्य हो जाता है ।
इस प्रकार जीव की दशा उस कुत्ते के समान है जिसको घाव ( खुजली ) हो गया है । और वेचारा उसी माया रूपी घाव को चाटकर जीव क्षणिक दैहिक सुख का अनुभव करता है और अंत में फिर उसी से दैहिक दु:ख पाता है ।

यह दैहिक क्षणिक सुख उसे घाव को पल पल चाटने के लिए प्रेरित करता है और चाटते चाटते गहरी घाव एक दिन उसके जीवन लीला को समाप्त कर देता हैं । 

ठीक उसी प्रकार जीव भगवान की दासी माया यानि संसारिक सुख के पीछे भागते भागते अपना तमाम उम्र ( मानव जीवन ) को गवां कर अपना जीवन लीला समाप्त कर लेता है ।

वहीं एक बड़भागी जीव गुरू कृपा से जब यह बात समझ जाता है तब वो माया के पीछे भागना बंद करके ईश्वर के तरफ भागना शुरू करता है ।
जैसे हीं जीव ईश्वर के तरफ भागता है , भगवान की दासी माया जीव को कुछ देर तक पीछा करती है , परेशान करती है ।
माया का गुण है अहंकार , माया अहंकार बस जीव के पीछे भागता है । पर अब हरि गुरू उन्मुख जीव ( संसार का ) माइक डायन का परवाह कहां करने वाला ।
जीव तो माया रूपी डायन से, गुरू के दिय तत्त्व ज्ञान के वल और कृपावल पर तेज भागते भागते माया के मालिक श्री भगवान के शरण में पहुंच जाता है । 
अब जब वो माया देखती है कि अरे ये तो हमारे मालिक का हो गया , इसका हम कुछ न बिगाड़ सके , लाखों बार परीक्षा लिया , कभी संसारिक सुख का लालच तो कभी विपत्ति के झंझावातों का अनुभव कराया , फिर भी यह विचलित नहीं हुआ , और अंततः यह मेरे मालिक को पा लिया , तब वही माया उस जीव के पास आकर सर झुका कर उस हरिगुरू शरणागत जीव का अभिवादन करती है । और सदा के लिए उसका पीछा छोड़ देती है , फिर माया कभी भी ऐसे शरणागत जीव का कुछ नहीं विगाड़ सकती है । इस प्रकार वो जीव आनंद कंद सच्चिदानंद भगवान को प्राप्त कर सदा के लिय आनंदमय हो जाता है । 
श्री राधे । 


Sunday, 28 March 2021

जब तक हम खुद के व इस संसार के वास्तविक स्वरूप को नहीं जान पाएंगें तब तक , हमारा कौन? यानि भगवान को पाने की प्यास , तरप पैदा हो हीं नहीं सकती ।

जब तक हम खुद के व इस संसार के वास्तविक स्वरूप को नहीं जान पाएंगें तब तक , हमारा कौन? यानि भगवान को पाने की प्यास , तरप पैदा हो हीं नहीं सकती ।
और "मैं और मेरा कौन " को जानने के लिए एक मात्र श्री कृपालु महाप्रभु के हीं शरण में जाना होगा , और दुसरा रास्ता हैं हीं नहीं हैं । 
अपनी‌ दो अंगुली की खोपड़ी के बल पर हम खुद को कभी नहीं जान सकते तो संसार और भगवान को जान पाना तो सर्वदा असंभव है । अनेकों ग्रंथों के पढ़ने और साधना के पश्चात भी संभव नहीं है । 

क्योंकि बिना समर्थ गुरू के विनिर्गत व स्मृत ग्रंथ ( वेद पुराण , भागवद् , रामायण, गीता आदि) की तो छोड़िए, एक साधारण मनुष्यों द्वारा भी लिखा साधारण भाषा ( सरल हिंदी ) में लिखा पुस्तक ( कृत ग्रंथ ) को पढ़कर हम गलत धारणा बना लेते हैं । क्योंकि हम वहीं समझते हैं जो हमारी खुद की अवधारणा है ।

एक डौक्टर बनने के लिए मेडिकल कौलेज में जिस प्रकार दाखिला आवश्यक है ,‌कोई खुद से तमाम मेडिकल की पुस्तकों को पढ़ कर भी डौक्टर नहीं बन सकता , ठीक उसी प्रकार जबतक हम वास्तविक संत महापुरुषों के शरण में जाकर उनको अपना गुरू मानकर उनसे नहीं समझेंगे तब तक अज्ञानता हमारे ऊपर हावी हीं रहेगी और गलत समझ लेगें । 
और जब तक अज्ञानता हावी रहेगी तबतक हम विप्रलिप्सा , भ्रम , प्रमाद और कर्णपाटव का शिकार रहेंगे । 
और यही अवगुण हमें वास्तविक तत्वज्ञान से दुर रखेगा । 
अतः खुद का सदा के लिए कल्याण चाहते हैं तो सब पिछला तमाम संग्रहित ज्ञान को त्याग कर भोले बालक बन कर एक मात्र हरि गुरू के शरण में जाना होगा ।

 ( फिजिकल कहीं जाने की जरूरत नहीं , मन हीं मन किसी भी वास्तविक संत को अपना मान कर उनकी बतलाई साधना करनी होगी व उनके पुस्तकों को श्रद्धा और विश्वास के साथ बार बार ध्यान से पढ़ना होगा , तब जाकर उनकी कृपा से काम बन जाएगा ) 

वास्तविक संत स्थूल जगत से स्थूल शरीर को त्यागने के बाद और भी व्यापक रूप से अपने शरणागत साधक शिष्य के साथ प्रत्येक क्षण रहते हैं । यह प्रत्यक्ष अनुभव में तभी आएगा जब हम उन पर अटूट अनन्य श्रद्धा और विश्वास के साथ उनको अपना मान लेंगे और उनके तमाम आदेशों का पालन करते हुए उनके बतलाए एकमेव रास्ते का अनुगमन करेंगें ।

हरि गुरू जैसा अपना कोई नहीं । एक बिल्ली या ब्याघ्र जिस प्रकार अपने बच्चे को अपने खुंखाड़ दांतों से उठा कर सुरक्षित रखती है ठीक उसी प्रकार हमारा गुरू और हमारे इष्ट हर क्षण अपने शरणागत को संभालते रहते हैं ।

पर जो ज्ञानी , ध्यानि , योगी , जपी , तपी, कर्मी , कर्मकांडी अपने बल पर उनके पुस्तकों को और उनको समझना चाहता है उसको वो कभी नहीं मिलते हैं । 
ऐसे ज्ञानी , ध्यानि , योगी , जपी , तपी, कर्मी को भगवान बंदर के बच्चे के तरह रखते हैं । बंदर का बच्चा अपने मां से खुद के बल पर चिपका रहता है । इस प्रकार कई दुर्घटना में मां से छुट कर गिर कर समाप्त भी हो जातें हैं ।
पर बिल्ली का बच्चा अपने मां के जबड़े में बिना हिले डुले लटका रहता है , वो कभी नहीं गिरता । 

ठीक उसी प्रकार भक्त का पतन कभी नहीं होता क्योंकि भक्त को भगवान बिल्ली के बच्चे के तरह संभालते रहतें हैं ।
पर वहीं ज्ञानी , ध्यानि , योगी , जपी , तपी, कर्मी का पतन अवश्य हो जाता है । 
क्योंकि इनको अपने बल का अहंकार होता है ।
श्री राधे , जय जय श्री राधे ।
:- गुरू देव के कृपा से प्राप्त ज्ञान का आधार ।