Wednesday, 28 April 2021

वेद-के बारे में महत्वपूर्ण ज्ञान :-

वेद-के बारे में महत्वपूर्ण ज्ञान :-

प्र.1- वेद किसे कहते है ?
उत्तर- ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है। भगवान की आप्त वाणी को वेद कहते हैं । 

प्र.2- वेद-ज्ञान किसने दिया ?
उत्तर- ईश्वर ने दिया।

प्र.3- ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?
उत्तर- ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।

प्र.4- ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?
उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिए।

प्र.5- वेद कितने है ?
उत्तर- चार ।                                                  
1-ऋग्वेद 
2-यजुर्वेद  
3-सामवेद
4-अथर्ववेद

प्र.6- वेदों के ब्राह्मण ।
        वेद ब्राह्मण
1 - ऋग्वेद - ऐतरेय
2 - यजुर्वेद - शतपथ
3 - सामवेद - तांड्य
4 - अथर्ववेद - गोपथ

प्र.7- वेदों के उपवेद कितने है।
उत्तर - चार।
      वेद उपवेद
    1- ऋग्वेद - आयुर्वेद
    2- यजुर्वेद - धनुर्वेद
    3 -सामवेद - गंधर्ववेद
    4- अथर्ववेद - अर्थवेद

प्र 8- वेदों के अंग हैं ।
उत्तर - छः ।
1 - शिक्षा
2 - कल्प
3 - निरूक्त
4 - व्याकरण
5 - छंद
6 - ज्योतिष

प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?
उत्तर- चार ऋषियों को।
         वेद ऋषि
1- ऋग्वेद - अग्नि
2 - यजुर्वेद - वायु
3 - सामवेद - आदित्य
4 - अथर्ववेद - अंगिरा

प्र.10- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?
उत्तर- समाधि की अवस्था में।

प्र.11- वेदों में कैसे ज्ञान है ?
उत्तर- सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान। वेद चराचर जगत का ईश्वर प्रदत एक मात्र संविधान है । इसके आधिन समुचा ब्रह्मांड और तमाम जीव जगत है । सब पर यह लागु है और प्रलय कल तक लागु रहेगा ।

प्र.12- वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?
उत्तर- चार ।
        ऋषि विषय
1- ऋग्वेद - ज्ञान
2- यजुर्वेद - कर्म
3- सामवेद - उपासना व भक्ति
4- अथर्ववेद - विज्ञान

प्र.13- वेदों में।

ऋग्वेद में।
1- मंडल - 10
2 - अष्टक - 08
3 - सूक्त - 1028
4 - अनुवाक - 85 
5 - ऋचाएं - 10589

यजुर्वेद में।
1- अध्याय - 40
2- मंत्र - 1975

सामवेद में।
1- आरचिक - 06
2 - अध्याय - 06
3- ऋचाएं - 1875

अथर्ववेद में।
1- कांड - 20
2- सूक्त - 731
3 - मंत्र - 5977
          
प्र.14- वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ? उत्तर- भगवद् प्राप्त संतों , महापुरूषों को वेद पढ़ने , पढ़ाने और समझाने का अधिकार है, असंत और साधारण मनुष्य उसको पढ़के गलत अर्थ हीं करेगा जो विनाशकारी है ।

प्र.15- क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ?
उत्तर- नहीं है उनके लिए जो भगवद् प्राप्त कर चुके हैं और उच्च कोटी के ऋषि-मुनि हैं संत हैं जिनको भगवान का दर्शन हटात् और साक्षात होता रहता है , पर सधारण मनुष्यों के लिए वेद में यह स्पष्ट है कि वो सगुण साकार भगवान की मुर्ती का सहारा लेकर उसमें भगवद् भावना करके अपना कल्याण कर सकता है ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है , वेद कण कण में भगवान की उपस्थिति को मानता है इसलिए भगवान का उपासक मुर्ति में भी अपने इष्ट की उपस्थिति को मानता है जो सत्य है ,वेद सम्मत है ।

प्र.16- क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ?
उत्तर- नहीं है कारण यह अलौकिक ग्रंथ है , पुराणों में, उपनिषदों में अवतार का प्रमाण है जो वेद का हीं अंग है।

प्र.17- सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?
उत्तर- ऋग्वेद।

प्र.18- वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?
उत्तर- वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 43 हजार वर्ष पूर्व । 

प्र.19- वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों का क्या नाम है ?
उत्तर- 
1- न्याय दर्शन - गौतम मुनि।
2- वैशेषिक दर्शन - कणाद मुनि।
3- योगदर्शन - पतंजलि मुनि।
4- मीमांसा दर्शन - जैमिनी मुनि।
5- सांख्य दर्शन - कपिल मुनि।
6- वेदांत दर्शन - व्यास मुनि।

प्र.20- शास्त्रों के विषय क्या है ?
उत्तर- आत्मा, परमात्मा, प्रकृति, जगत की उत्पत्ति, मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान आदि।

प्र.21- प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?
उत्तर- केवल ग्यारह।

प्र.22- उपनिषदों के नाम बतावे ?
उत्तर-  
01-ईश ( ईशावास्य )  
02-केन  
03-कठ  
04-प्रश्न  
05-मुंडक  
06-मांडू  
07-ऐतरेय  
08-तैत्तिरीय 
09-छांदोग्य 
10-वृहदारण्यक 
11-श्वेताश्वतर ।

प्र.23- उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?
उत्तर- वेदों से।
प्र.24- चार वर्ण।
उत्तर- 
1- ब्राह्मण
2- क्षत्रिय
3- वैश्य
4- शूद्र

प्र.25- चार युग।
1- सतयुग - 17,28000 वर्षों का नाम ( सतयुग ) रखा है।
2- त्रेतायुग- 12,96000 वर्षों का नाम ( त्रेतायुग ) रखा है।
3- द्वापरयुग- 8,64000 वर्षों का नाम है।
4- कलयुग- 4,32000 वर्षों का नाम है।
कलयुग के 4,976 वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक।
4,27024 वर्षों का भोग होना है। 

पंच महायज्ञ
       1- ब्रह्मयज्ञ   
       2- देवयज्ञ
       3- पितृयज्ञ
       4- बलिवैश्वदेवयज्ञ
       5- अतिथियज्ञ
   
स्वर्ग - जहाँ सुख है, पर यह सुख माईक है । स्वर्ग भी मायाधिन है , । 
नरक - जहाँ दुःख हीं दु:ख है।.

प्र.26 पुराणों की संख्या कितनी है ?
ऊ- पुराणों की संख्या 18 है ।

प्र. 27 पुराणों के नाम ? 

उत्तर - ब्रह्म पुराण
पद्म पुराण
विष्णु पुराण -- (उत्तर भाग - विष्णुधर्मोत्तर)
वायु पुराण -- (भिन्न मत से - शिव पुराण)
भागवत पुराण -- (भिन्न मत से - देवीभागवत पुराण)
नारद पुराण
मार्कण्डेय पुराण
अग्नि पुराण
भविष्य पुराण
ब्रह्मवैवर्त पुराण
लिङ्ग पुराण
वाराह पुराण
स्कन्द पुराण
वामन पुराण
कूर्म पुराण
मत्स्य पुराण
गरुड पुराण
ब्रह्माण्ड पुराण

प्र28- उप पुराणो की संख्या कितनी है ? 
ऊ- उप पुराणो की संख्या 24 है ? 

प्र 29- उप-पुराणों के नाम ? 

ऊ- आदि पुराण (सनत्कुमार द्वारा कथित)
नरसिंह पुराण
नन्दिपुराण (कुमार द्वारा कथित)
शिवधर्म पुराण
आश्चर्य पुराण (दुर्वासा द्वारा कथित)
नारदीय पुराण (नारद द्वारा कथित)
कपिल पुराण
मानव पुराण
उशना पुराण (उशनस्)
ब्रह्माण्ड पुराण
वरुण पुराण
कालिका पुराण
माहेश्वर पुराण
साम्ब पुराण
सौर पुराण
पाराशर पुराण (पराशरोक्त)
मारीच पुराण
भार्गव पुराण
विष्णुधर्म पुराण
बृहद्धर्म पुराण
गणेश पुराण
मुद्गल पुराण
एकाम्र पुराण
दत्त पुराण

प्र30- पुराणों में श्लोकों की संख्या ? 
ऊ- 
पुराण श्लोकों की संख्या
ब्रह्मपुराण- १४०००
पद्मपुराण -५५०००
विष्णुपुराण -तेइस हजार
शिवपुराण -चौबीस हजार
श्रीमद्भावतपुराण -अठारह हजार
नारदपुराण -पच्चीस हजार
मार्कण्डेयपुराण -नौ हजार
अग्निपुराण- पन्द्रह हजार
भविष्यपुराण- चौदह हजार पाँच सौ
ब्रह्मवैवर्तपुराण -अठारह हजार
लिंगपुराण ग्यारह हजार
वाराहपुराण- चौबीस हजार
स्कन्धपुराण -इक्यासी हजार एक सौ
वामनपुराण -दस हजार
कूर्मपुराण -सत्रह हजार
मत्सयपुराण- चौदह हजार
गरुड़पुराण- उन्नीस हजार
ब्रह्माण्डपुराण- बारह हजार

प्र31-पुराणों के नाम और उनका महत्त्व संपादित करें ?

उत्तर - १८ पुराण के नाम और उनका महत्त्व संपादित करें
(१) ब्रह्मपुराण : इसे “आदिपुराण” भी का जाता है। प्राचीन माने गए सभी पुराणों में इसका उल्लेख है। इसमें श्लोकों की संख्या अलग- २ प्रमाणों से भिन्न-भिन्न है। १०,०००…१२.००० और १३,७८७ ये विभिन्न संख्याएँ मिलती है। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में लोमहर्षण ऋषि ने किया था। इसमें सृष्टि, मनु की उत्पत्ति, उनके वंश का वर्णन, देवों और प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन है। इस पुराण में विभिन्न तीर्थों का विस्तार से वर्णन है। इसमें कुल २४५ अध्याय हैं। इसका एक परिशिष्ट सौर उपपुराण भी है, जिसमें उडिसा के कोणार्क मन्दिर का वर्णन है।

(२) पद्मपुराण : इसमें कुल ६४१ अध्याय और ४८,००० श्लोक हैं। मत्स्यपुराण के अनुसार इसमें ५५,००० और ब्रह्मपुराण के अनुसार इसमें ५९,००० श्लोक थे। इसमें कुल खण़्ड हैं—(क) सृष्टिखण्ड : ५ पर्व, (ख) भूमिखण्ड, (ग) स्वर्गखण्ड, (घ) पातालखण्ड और (ङ) उत्तरखण्ड। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में सूत उग्रश्रवा ने किया था। ये लोमहर्षण के पुत्र थे। इस पुराण में अनेक विषयों के साथ विष्णुभक्ति के अनेक पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। 

(३) विष्णुपुराण : पुराण के पाँचों लक्षण इसमें घटते हैं। इसमें विष्णु को परम देवता के रूप में निरूपित किया गया है। इसमें कुल छः खण्ड हैं, १२६ अध्याय, श्लोक २३,००० या २४,००० या ६,००० हैं। इस पुराण के प्रवक्ता पराशर ऋषि और श्रोता मैत्रेय हैं।

(४) वायुपुराण : इसमें विशेषकर शिव का वर्णन किया गया है, अतः इस कारण इसे “शिवपुराण” भी कहा जाता है। एक शिवपुराण पृथक् भी है। इसमें ११२ अध्याय, ११,००० श्लोक हैं। इस पुराण का प्रचलन मगध-क्षेत्र में बहुत था। इसमें गया-माहात्म्य है। इसमें कुल चार भाग है : (क) प्रक्रियापाद – (अध्याय—१-६), (ख) उपोद्घात : (अध्याय-७ –६४ ), (ग) अनुषङ्गपादः–(अध्याय—६५–९९), (घ) उपसंहारपादः–(अध्याय—१००-११२)। इसमें सृष्टिक्रम, भूगो, खगोल, युगों, ऋषियों तथा तीर्थों का वर्णन एवं राजवंशों, ऋषिवंशों,, वेद की शाखाओं, संगीतशास्त्र और शिवभक्ति का विस्तृत निरूपण है। इसमें भी पुराण के पञ्चलक्षण मिलते हैं।

(५) भागवतपुराण : यह सर्वाधिक प्रचलित पुराण है। इस पुराण का सप्ताह-वाचन-पारायण भी होता है। इसे सभी दर्शनों का सार “निगमकल्पतरोर्गलितम्” और विद्वानों का परीक्षास्थल “विद्यावतां भागवते परीक्षा” माना जाता है। इसमें श्रीकृष्ण की भक्ति के बारे में बताया गया है। इसमें कुल १२ स्कन्ध, ३३५ अध्याय और १८,००० श्लोक हैं। कुछ विद्वान् इसे “देवीभागवतपुराण” भी कहते हैं, क्योंकि इसमें देवी (शक्ति) का विस्तृत वर्णन हैं। 

(६) नारद (बृहन्नारदीय) पुराण : इसे महापुराण भी कहा जाता है। इसमें पुराण के ५ लक्षण घटित नहीं होते हैं। इसमें वैष्णवों के उत्सवों और व्रतों का वर्णन है। इसमें २ खण्ड है : (क) पूर्व खण्ड में १२५ अध्याय और (ख) उत्तर-खण्ड में ८२ अध्याय हैं। इसमें १८,००० श्लोक हैं। इसके विषय मोक्ष, धर्म, नक्षत्र, एवं कल्प का निरूपण, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, गृहविचार, मन्त्रसिद्धि,, वर्णाश्रम-धर्म, श्राद्ध, प्रायश्चित्त आदि का वर्णन है।

(७) मार्कण्डयपुराण : इसे प्राचीनतम पुराण माना जाता है। इसमें इन्द्र, अग्नि, सूर्य आदि वैदिक देवताओं का वर्णन किया गया है। इसके प्रवक्ता मार्कण्डय ऋषि और श्रोता क्रौष्टुकि शिष्य हैं। इसमें १३८ अध्याय और ७,००० श्लोक हैं। इसमें गृहस्थ-धर्म, श्राद्ध, दिनचर्या, नित्यकर्म, व्रत, उत्सव, अनुसूया की पतिव्रता-कथा, योग, दुर्गा-माहात्म्य आदि विषयों का वर्णन है।

(८) अग्निपुराण : इसके प्रवक्ता अग्नि और श्रोता वसिष्ठ हैं। इसी कारण इसे अग्निपुराण कहा जाता है। इसे भारतीय संस्कृति और विद्याओं का महाकोश माना जाता है। इसमें इस समय ३८३ अध्याय, ११,५०० श्लोक हैं। इसमें विष्णु के अवतारों का वर्णन है। इसके अतिरिक्त शिवलिंग, दुर्गा, गणेश, सूर्य, प्राणप्रतिष्ठा आदि के अतिरिक्त भूगोल, गणित, फलित-ज्योतिष, विवाह, मृत्यु, शकुनविद्या, वास्तुविद्या, दिनचर्या, नीतिशास्त्र, युद्धविद्या, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, छन्द, काव्य, व्याकरण, कोशनिर्माण आदि नाना विषयों का वर्णन है।

(९) भविष्यपुराण : इसमें भविष्य की घटनाओं का वर्णन है। इसमें दो खण्ड हैः–(क) पूर्वार्धः–(अध्याय—४१) तथा (ख) उत्तरार्धः–(अध्याय़—१७१) । इसमें कुल १५,००० श्लोक हैं । इसमें कुल ५ पर्व हैः–(क) ब्राह्मपर्व, (ख) विष्णुपर्व, (ग) शिवपर्व, (घ) सूर्यपर्व तथा (ङ) प्रतिसर्गपर्व। इसमें मुख्यतः ब्राह्मण-धर्म, आचार, वर्णाश्रम-धर्म आदि विषयों का वर्णन है। 

(१०) ब्रह्मवैवर्तपुराण : यह वैष्णव पुराण है। इसमें श्रीकृष्ण के चरित्र का वर्णन किया गया है। इसमें कुल १८,००० श्लोक है और चार खण्ड हैं : (क) ब्रह्म, (ख) प्रकृति, (ग) गणेश तथा (घ) श्रीकृष्ण-जन्म।

(११) लिङ्गपुराण : इसमें शिव की उपासना का वर्णन है। इसमें शिव के २८ अवतारों की कथाएँ दी गईं हैं। इसमें ११,००० श्लोक और १६३ अध्याय हैं। इसे पूर्व और उत्तर नाम से दो भागों में विभाजित किया गया है। 

(१२) वराहपुराण : इसमें विष्णु के वराह-अवतार का वर्णन है। पाताललोक से पृथिवी का उद्धार करके वराह ने इस पुराण का प्रवचन किया था। इसमें २४,००० श्लोक सम्प्रति केवल ११,००० और २१७ अध्याय हैं।

(१३) स्कन्दपुराण : यह पुराण शिव के पुत्र स्कन्द (कार्तिकेय, सुब्रह्मण्य) के नाम पर है। यह सबसे बडा पुराण है। इसमें कुल ८१,००० श्लोक हैं। इसमें दो खण्ड हैं। इसमें छः संहिताएँ हैं—सनत्कुमार, सूत, शंकर, वैष्णव, ब्राह्म तथा सौर। सूतसंहिता पर माधवाचार्य ने “तात्पर्य-दीपिका” नामक विस्तृत टीका लिखी है। इस संहिता के अन्त में दो गीताएँ भी हैं—-ब्रह्मगीता (अध्याय—१२) और सूतगीताः–(अध्याय ८)। इस पुराण में सात खण्ड हैं—(क) माहेश्वर, (ख) वैष्णव, (ग) ब्रह्म, (घ) काशी, (ङ) अवन्ती, (रेवा), (च) नागर (ताप्ती) तथा (छ) प्रभास-खण्ड। काशीखण्ड में “गंगासहस्रनाम” स्तोत्र भी है। 

(१४) वामनपुराण : इसमें विष्णु के वामन-अवतार का वर्णन है। इसमें ९५ अध्याय और १०,००० श्लोक हैं। इसमें चार संहिताएँ हैं—(क) माहेश्वरी, (ख) भागवती, (ग) सौरी तथा (घ) गाणेश्वरी । 

(१५) कूर्मपुराण : इसमें विष्णु के कूर्म-अवतार का वर्णन किया गया है। इसमें चार संहिताएँ हैं—(क) ब्राह्मी, (ख) भागवती, (ग) सौरा तथा (घ) वैष्णवी । सम्प्रति केवल ब्राह्मी-संहिता ही मिलती है। इसमें ६,००० श्लोक हैं। इसके दो भाग हैं, जिसमें ५१ और ४४ अध्याय हैं। इसमें पुराण के पाँचों लक्षण मिलते हैं। इस पुराण में ईश्वरगीता और व्यासगीता भी है। 

(१६) मत्स्यपुराण : इसमें पुराण के पाँचों लक्षण घटित होते हैं। इसमें २९१ अध्याय और १४,००० श्लोक हैं। प्राचीन संस्करणों में १९,००० श्लोक मिलते हैं। इसमें जलप्रलय का वर्णन हैं। इसमें कलियुग के राजाओं की सूची दी गई है। 

(१७) गरुडपुराण : यह वैष्णवपुराण है। इसके प्रवक्ता विष्णु और श्रोता गरुड हैं, गरुड ने कश्यप को सुनाया था। इसमें विष्णुपूजा का वर्णन है। इसके दो खण्ड हैं, जिसमें पूर्वखण्ड में २२९ और उत्तरखण्ड में ३५ अध्याय और १८,००० श्लोक हैं। इसका पूर्वखण्ड विश्वकोशात्मक माना जाता है।

(१८) ब्रह्माण्डपुराण : इसमें १०९ अध्याय तथा १२,००० श्लोक है। इसमें चार पाद हैं—(क) प्रक्रिया, (ख) अनुषङ्ग, (ग) उपोद्घात तथा (घ) उपसंहार । 

Tuesday, 27 April 2021

Spare 2 minutes to read it please..

Spare 2 minutes to read it please..

One day, a very wealthy man was walking on the road. Along the way, he saw a beggar on the sidewalk. The rich man looks kindly on the beggar and asked, "How did you become a beggar? The beggar said, "Sir, I've been applying for a job for a year now but haven't found any. You look like a rich man. Sir, if you'll give me a job, I'll stop begging." The rich man smiled and said, "I want to help you. But I won't give you a job. I'll do something better. I want you to be my business partner. Let's start a business together. The beggar blinked hard. He didn't understand what the older man was saying. "What do you mean, Sir? "I own a rice plantation. You could sell my rice in the market. I'll provide you the sacks of rice. I'll pay the rent for the market stall.. All you'll have to do is sell my rice. And at the end of the month, as Business Partners, we'll share in the profits. Tears of joy rolled down his cheeks. "Oh Sir," he said, "you're a gift from Heaven. You're the answer to my prayers. Thank you, thank you, thank you!" He then paused and said, Sir, how will we divide the profits? Do I keep 10% and you get the 90%? Do I keep 5% and you get the 95%? I'll be happy with any arrangement. The rich man shook his head and chuckled. "No, I want you to give me the 10%. And you keep the 90%. For a moment, the beggar couldn't speak. When he tried to speak, it was gibberish. Uh, gee, uh, wow, I mean, huh? He couldn't believe his ears. The deal was too preposterous. The rich man laughed more loudly. He explained, I don't need the money, my friend. I'm already wealthy beyond what you can ever imagine. I want you to give me 10% of your profits so you grow in gratitude The beggar knelt down before his benefactor and said, Yes Sir, I will do as you say. Even now, I'm so grateful for what you've done for me! 

And so that was what happened. He forgets where the blessings came from. Each day, the beggar now dressed a little bit better operated a store selling rice in the market. He worked very hard. He woke up early in the morning and slept late at night. And sales were brisk, also because the rice was of good quality. And after 30 days, the profits were astounding. 

At the end of the month, as the ex-beggar was counting the money, and liking very much the feeling of money in his hands, an idea grew in his mind. He told himself, Gee, why should I give 10% to my Business Partner? I didn't see him the whole month! I was the one who was working day and night for this business. I did all this work! I deserve the 100% profits! 

A few minutes later, the rich man was knocking on the door to collect his 10% of the profits. The ex-beggar opened the door and said, "You don't deserve the 10%. I worked hard for this. I deserve all of it!" And he slammed the door.

If you were his Business Partner, how would you feel? 

Hi, this is exactly what happens to us, God is Our Business Partner. God gave us life-every single moment, every single breath, every single second. God gave us talents-ability to talk, to create, to earn money. God gave us a body-eyes, ears, mouth, hands, feet, heart. God gave us mind- imagination, emotions, reasoning, language. 

Sharing 10% with him is an expression of gratitude and love. So never forget to do your bit and do it with immense gratitude, joy & love.

🌹भक्तियोगरसावतार कृपालु महाप्रभु जी का अवतार रहस्य🌹

🌹भक्तियोगरसावतार कृपालु महाप्रभु जी का अवतार रहस्य🌹

                          ●●●●
काले घुंघराले केश प्रेम परिलुप्त सजल नेत्र चित्ताकर्षक मृदु मुसकान  के साथ जब 34 वर्षीय आचार्य श्री ने काशी विद्वतसभा के मध्य प्रवेश किया, सभी विद्वान् मन्त्र-मुग्ध से देखते रह गये । समस्त शास्त्रों, वेदों, पुराणों तथा अन्यान्य धर्मग्रंथों के असाधारण अलौकिक ज्ञान से युक्त कठिन संस्कृत में दिये गये वक्तव्य से तो सब नतमस्तक हो ही गये उनकी दिव्यातिदिव्य देह क्रान्ति से निर्झरित भक्तिपीयूष धारा ने सभी विद्वानों को यह स्वीकार करने के लिये बाध्य कर दिया कि ये भक्तियोगरसावतार हैं। उपस्थित विद्वत जनों ने यह अनुभव किया कि इनके रोम-रोम से भक्ति महादेवी का प्राकट्य हो रहा है। वे स्वयं ही-

रसो वै सः रसँ्ह्येवायं लब्ध्वाअनन्दी भवति ।

इस वेद वाणी का क्रियात्मक रूप हैं । ये रस और रसिक दोनों प्रतीत होते हैं । इनकी उपस्थिति ही अनुपम रस धारा प्रवाहित कर रही है, सबके ह्रदय में अपार उल्लास का संचार हो रहा है मानो राधाकृष्ण-भक्ति मूर्तिमान हो गयीं हैं। भक्ति की अन्तिम परिणिति का नाम महाभाव का मूर्तिमान विग्रह हैं श्री राधा । श्रीकृष्ण रसिक शिरोमणि हैं, सम्पूर्ण अलौकिक रसों की निधि हैं । भक्ति और रस दोनों का अपूर्व सम्मिश्रण हैं ये कृपालु । अतः राधाकृष्ण दोनों के ही सौन्दर्य रुपी अमृत के भण्डार रसिकों के शिरोमणि, प्रेम के साक्षात् स्वरुप जगद्गुरु कृपालु जी वेदज्ञ ,शास्त्रज्ञ-तो हैं ही ये भक्तियोगरसावतार भी हैं । श्री राधाकृष्ण भक्ति का मूर्तिमान स्वरुप हैं ।

यह ऐतिहासिक घटना 14 जनवरी सन 1957 को हुई। उस समय श्री कृपालु जी माहराज की आयु मात्र 34 वर्ष की थी । जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज विश्व के पाँचवें मूल जगद्गुरु हैं । उनके पूर्व केवल चार महापुरुषों को ही जगद्गुरु की मूल उपाधि प्रदान की गयी थी - जगद्गुरु श्री शंकराचार्य, जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य एवं जगद्गुरु श्री माध्वाचार्य ।

पूर्ववर्ती आचार्यों के दार्शनिक सिद्दांत्तों को सत्य सिद्ध करते हुये अपना समन्वयवादी दार्शनिक सिद्धांत प्रस्तुत करने वाले जगद्गुरु श्री कृपालु जी  महाराज को काशी विद्वत्परिषत्  ने ' निखिलदर्शन समन्वयाचार्य ' की उपाधि से भी से भी विभूषित किया, तथा उन्हें ' भक्तियोगरसावतार 'की उपाधि दी ।

    ●श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणपारावारीण,  
          वेदमार्गप्रतिष्ठापनाचार्य,
         निखिलदर्शनसमन्वयाचार्य, सनातनवैदिकधर्मप्रतिष्ठापनसत्संप्रदायपरमाचार्य, 
                भक्तियोगरसावतार, भगवदनन्तश्रीविभूषित 

जगद्गुरु १००८ स्वामि श्री कृपालु जी महाराज●

काशी विद्वन्मण्डल द्वारा उद्घोषित  भक्तियोगरसावतार वाला स्वरुप उनके जीवन में पग-पग पर परिलक्षित होता है । विस्तार से तो कुछ लिखना सम्भव ही नहीं है क्योंकि दिव्य भावों के विषय में दिव्य लेखनी ही वर्णन कर सकती है । प्राकृत शब्दों की गति दिव्य भाव राज्य में कहाँ है। तथापि अनुभवात्मक प्रमाण और शब्द प्रमाण के आधार पर कुछ लिखना अनुचित नहीं होगा ।

●अनुभवात्मक प्रमाण:-

प्राक्तन में महारासिकों ने जिस ब्रजरस की वर्षा की है उसी ब्रजरस को पात्र अपात्र का विचार किये बिना जगद्गुरु सब को पिला रहे हैं ।

इनके दर्शन मात्र से चित्तवृति परिवर्तित हो जाती है। भगवद प्रेम का अंकुर प्रस्फुटित हो जाता है । दुष्ट प्रवृत्ति का ही संहार हो जाता है अतः कितने असुर प्रवृत्ति वाले श्रीकृष्ण प्रेमी बन गये । 

प्रेमावतार जगद्गुरु कृपालु जी बिना जाति पांति, साधु, असाधु, पात्र-अपात्र का विचार किये श्रीकृष्ण प्रेम प्रदान कर करुणा की पराकाष्ठा प्रकाशित करके अपने कृपालु नाम को चरितार्थ कर दिया । 

कलियुगी जीवों के पाप कलुषित चित्त में भी युगल प्रेम का संचार, उनके भक्तियोगरसावतार स्वरुप को प्रमाणित करता है । 

सभी मूर्धन्य विद्वानों एवं भक्तसाधकों का प्रत्यक्ष अनुभव ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि जगद्गुरु कृपालु जी महाराज स्वयं गौरांग महाप्रभु का ही स्वरुप हैं । 

इस सम्बन्ध में नदिया ग्राम वासियों के मनोमस्तिष्क में किंवदन्ती के रूप में जीवित, अद्वैताचार्य के श्राप की घटना याद आती है । जब चैतन्य महाप्रभु संन्यास की आज्ञा लेने के लिये श्री अद्वैताचार्य के पास गये तो सब स्तब्ध रह गये । उन्होंने समझाया निमाई तुझमें व सन्यासी में क्या अन्तर है ? तू तो स्वयं ही भक्ति का साक्षात स्वरुप है और हम सबके ह्रदय में भी भक्ति का सतत संचार कर रहा है फिर तुझे अपनी ममतामयी माँ , वह सुन्दर पतिव्रता पत्नी को छोड़कर जाने का विचार ही क्यों आया ? तेरे सुन्दर केश क्या इस तेजस्वी मुख मण्डल से च्युत होने के लिये बने हैं ? यह हम सबको सुख देने वाला गौरांग क्या भभूति लगाने के योग्य है ? तेरी कोमल काया क्या परिव्राजक धर्म के कष्ट सहने के लिये है ? परन्तु जब महाप्रभु को संन्यास के पथ पर चलने हेतु अडिग देखा तो अद्वैताचार्य फूट-फूट कर रोने लगे । बिलखते हुये प्रेमावेश में उन्होंने निमाई को एक अनूठा श्राप दे डाला ।

जिसके अन्तर्गत उन्होंने कहा - कि मैं तुम्हे श्राप देता हूँ कि अगले पाँच सौ वर्षों के अन्दर ही तुम्हें गोलोक छोड़कर पुनः इस धराधाम में में अवतरित होना होगा अपनी जन्म भूमि को ही तुम अपनी लीलास्थली बनाओगे तथा सन्यासियों के सिरमौर होकर भी तुम गृहस्थ धर्म का पालन करोगे । अपनी पत्नी एवं परिजनों का परित्याग न करते हुये उनको भी अपनी लीला का अंग बनाओगे ।

चैतन्य साहित्य में भी इस बात का उल्लेख है कि महाप्रभु ने पुनः दो बार अवतरित होने का आश्वासन भी दिया था।

एइ  मत आछे  आर  दुइ अवतार ।
कीर्तन  आनन्द  रूपहइब  आमार।।
ताहतेओं  तुमि  सब  एइ  मत रंगे ।
कीर्तन करिवा महासुखे आमा संगे।।

अतः सभी भावुक भक्तों के प्राण स्वरुप गुरुदेव गौरांग महाप्रभु ही हैं ऐसा विश्वास अपने आप हो ही जाता है।

वही गौरवर्ण, आजानुलम्बित भुजायें, प्रेम परिलुप्त सजल नेत्र, प्रेमदान को आतुर चित्ताकर्षक स्नेहमय व्यक्तित्व सभी कुछ तो गौरांग महाप्रभु जैसा ही है। दोनों की लीलाओं में अद्भुत समानतायें हैं । एक दो नहीं हजारों लीलाएं हैं जो उस समय भी हुई और आज भी हो रही हैं । निकटतम उदाहरण के रूप में भक्ति-मन्दिर के उद्घाटन के अवसर पर सद्गुरु सरकार द्वारा श्रंग्वेरपुर धाम से स्वयं भक्तगणों के साथ गंगा-जल लाकर निज कर कमलों से मार्जन करता देख चैतन्य महाप्रभु के गुणिटचा मार्जन की स्मृति अनायास ही आ जाती है । विभिन्न अवतारों की भगवल्लीलाओं द्वारा चैतन्य महाप्रभु ने अपने विभिन्न भगवद्स्वरूपों के दर्शन कराये जिससे उनका भगवद् चिन्तन प्रगाढ़ हो जाय और वह लीलामृत के माधुर्य का रसास्वादन कर सकें ।

पिछले तीन वर्षों के पहिले के पांच वर्षों में श्री महाराज जी  भी अनेक प्रकार की भगवल्लीलाओं का आयोजन करके भक्तों को लीला माधुर्य रससिन्धु में अवगाहन करा रहे थे । घोर संसारासक्त और परम विरागी सभी साधक अपनी रूचि के अनुसार लीलामृत का पान करके भाव विभोर हो रहे थे । श्री महाराज जी स्वयं पात्रों का चयन करते और भक्तों के प्रेमाग्रह पर वे स्वयं भी किसी प्रमुख पात्र का स्वरुपधारण करके सभी को आनन्दित करते । कभी जनकन न्दिनी प्राकट्य महोत्सव तो कभी सीता स्वयंवर तथा राम विवाह होता तो कभी भरत मिलाप जैसे मार्मिक हृदय स्पर्शी लीलाओं का प्रदर्शन जिससे आनन्द का समुद्र तो उमड़ता ही साथ ही अश्रु प्रवाह भी । कभी राम विवाह, तो कभी शंकर विवाह, कभी मुनि वशिष्ठ,  तो कभी ऋषि दुर्वासा,  कभी श्रीकृष्ण , तो कभी श्री राम, कभी सीता,  तो कभी श्री राधा,  कभी शंकर , तो कभी अर्धनारीश्वर अनेक भगवत्स्वरूपों के दर्शन करके सभी भक्त असीम आनन्द का अनुभव करते हुये प्रेम रस का पान करते ।

गौरांग सरकार की भाँति ही शास्त्रों वेदों के गूढ़ रहस्यों को बहुत ही सरल और सरस रूप में हम लोगों के समक्ष प्रकट कर दिया है जो अगणित जन्म माथा पच्ची करने के बाद भी असम्भव है । चैतन्य अष्टपदी में निहित भगवन्नाम विज्ञान को तथा भक्ति सम्बन्धी शास्त्रीय ज्ञान को जन जन तक पहुँचाने  के लिये भागीरथ प्रयास करते रहे। अपने सुख का परित्याग करके ' भूर्ज तरु सम सन्त कृपाला। परहित सह नित विपति विसाला।।' रामचरित मानस की इस चौपाई को चरितार्थ करते हुये अपना सर्वस्व भक्तों के लिये लुटाते रहे । अकथनीय है इनकी कृपा । जो 500 वर्ष पूर्व श्री चैतन्य महाप्रभु ने सिद्धान्त, सूत्र रूप में प्रकट किये थे वही अब पूर्ण रूप में प्रकट किये गये हैं। संकीर्तन के साथ-साथ साधन साध्य तत्व का भी प्रचार और प्रसार किया गया जो उस समय नहीं हो पाया था। साथ ही संकीर्तन के परम  प्रमुख अंग रूपध्यान को कृपालु महाप्रभु ने परम आवश्यक बताया ।

प्रेमरस सिद्धान्त, प्रेम रस मदिरा, राधा गोविन्द गीत, भक्ति शतक, सेवक सेव्य सिद्धान्त आदि जैसे अनुपम अद्वितीय शास्त्रीय सिद्धान्तों को प्रकट करने वाले ग्रंथों एवं प्रवचनों के अतिरिक्त कृपालु महाप्रभु द्वारा रचित काव्य में ब्रजरस का तो सागर उमड़ता ही है, साथ ही तत्वज्ञान भी साधक के मस्तिष्क में बिना किसी प्रयास के सुदृढ़ होता रहता है । प्रमाणार्थ यहाँ एक दो उदाहरण देना सूर्य के किरण सम ही है । अतः पाठक उनके मूल साहित्य द्वारा इस बात की परिपुष्टि कर सकते हैं । प्रेमा भक्ति के इन दोनों आचार्यों ने श्री राधा नाम सुधा रस जैसे अमूल्य खजाने को बिना किसी मूल्य के जन जन तक पहुँचाया है ।

अतः श्री कृपालु जी महाराज के द्वारा आचरित , प्रचारित एवं प्रसारित भक्ति एवं प्रेमरस सिद्धान्त को देखकर सभी भक्त गुरुदेव को युगलावतार गौरांग महाप्रभु के रूप में ही देखते हैं । जिन जिन सिद्धान्तों पर चैतन्य महाप्रभु ने उस अवतार काल में बल दिया और उनकी श्रेष्ठता सिद्ध की उन्ही को कालान्तर में श्री कृपालु जी महाराज ने विस्तारित एवं स्थापित किया है ।

●शब्द प्रमाण :-

काशी विद्वत्परिषत् के पश्चात शब्द प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जाती क्योंकि यहाँ सभी विद्वान् वेदों, शास्त्रों का ही चल रूप है । प्रत्यक्ष रूप में भी आचार्य श्री की दिव्यविरहोन्माद अवस्था में आठों सात्विक भावों का उद्रेक हो जाता है । आठों सात्विक भावों का उद्रेक देखकर भावुक भक्त भी और तत्वज्ञानी भी बरबस यही मानते हैं कि गौर श्याम मिलित वपुधारी गौरांग ही कलिमल ग्रसित जीवों को भगवत्स्मृतिविहीन अतिशय दीन दशा निवृत्ति के लिये पुनः आये हैं।

संकीर्तन के समय सभी को ब्रजरस से सराबोर कर देना उनके अन्दर छिपे ब्रजरस सागर का परिचायक है।

प्रेमोन्मत्त अवस्था में भागवत में वर्णित -

एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चै: ।
हसत्यथो रोदितिरौतिगायत्त्युन्मादवन्नृत्यति लोक बाह्य: ।।

                      ( भाग. ११-२-४०)

वाग्गद् गदा द्रवते यस्य चित्तं,
 रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च ।
विलज्ज उद् गायति नृत्यते च,  मद् भक्तियुक्तो  भुवनं पुनाति ।।

                    ( भाग. ११-१४-२४ )

के अनुसार ही आचार्य श्री की अवस्थायें हो जाती।

श्रीकृष्ण नाम, रूप, लीला, गुण, धाम संकीर्तन के समय कभी हँसते, कभी रोते, कभी चीखते, कभी गाते तथा कभी उन्माद रोगी की भांति लोकातीत होकर नाचने लगते। भक्ति रसामृत सिन्धु में वर्णित -

स्तंभ: स्वेदोअथ रोमांच: स्वरभेदोअथ वेपुथ:।
वैवणर्यमश्रुप्रलय इत्यष्टौ सात्विका: स्मृता: ।।

                               ( भ. र. सि. )

अर्थात प्रेमास्पद की याद में वृक्ष के समान स्थिर समाधिस्थ हो जाना, पसीना निकलना, रोंगटे खड़े हो जाना, आवाज बदल जाना, शरीर काँपना, चेहरे का रंग बदल जाना, आँसू निकलना , मूर्छित हो जाना । उपर्युक्त अष्ट सात्विक भावों का एक साथ उद्रेक अगाध दिव्य प्रेम का परिचायक है । आचार्य श्री के अन्दर ये सभी सात्विक भावों का जब उद्रेक होता । सम्पूर्ण वातावरण भक्ति-रस से ओतप्रोत हो जाता । एक-एक अंग से शोभा श्री की ऐसी सुधा धारा  प्रवाहित होती है जो सभी के अंग प्रत्यंग में अमृत का संचार कर देती । भक्तवृन्द आल्हाद सुधा सरिता में बह जाते । सभी का हृदय अपार आनन्द से भर जाता । परमानिर्वचनीय रसमत्तता में सभी डूब जाते ।
राधे राधे

जरूर ध्यान से पढ़ें :- बहुत-बहुत महत्वपूर्ण तत्वज्ञान रामायण के जटायु और महाभारत के भिष्म पितामह दोनों से

जरूर ध्यान से पढ़ें :- बहुत-बहुत महत्वपूर्ण तत्वज्ञान रामायण के जटायु और महाभारत के भिष्म पितामह दोनों से :- 
अंतिम सांस गिन रहे जटायु ने कहा कि "मुझे पता था कि मैं रावण से नही जीत सकता लेकिन फिर भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली पीढियां मुझे कायर कहतीं"

जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले... तो मृत्यु आई और जैसे ही मृत्यु आयी... तो गिद्धराज जटायु ने मृत्यु को ललकार कहा...

"खबरदार ! ऐ मृत्यु ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना... । मैं तुझ को स्वीकार तो करूँगा... लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकती... जब तक मैं माता सीता जी की "सुधि" प्रभु "श्रीराम" को नहीं सुना देता...! 
यह कर्मयोग है जटायु का , मन में भगवान राम और सिता और कर्म अपने इष्ट के निमित्त तथा साथ साथ न्याय का पक्षधर की भुमिका भी । 

 मौत उन्हें छू नहीं पा रही है... काँप रही है खड़ी हो कर...मौत तब तक खड़ी रही, काँपती रही... यही इच्छा मृत्यु का वरदान जटायु को मिला ।
किन्तु महाभारत के  भीष्म पितामह छह महीने तक बाणों की शय्या पर लेट करके मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहे... आँखों में आँसू हैं ...वे पश्चाताप से रो रहे हैं... भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं...! भिष्म भी भगवान के भक्त हैं पर हट अपने प्रतिज्ञा के प्रति , फर्ज भुल गए । 

कितना अलौकिक है यह दृश्य... रामायण मे जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं... 
प्रभु "श्रीराम" रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं... 
वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान "श्रीकृष्ण" हँस रहे हैं... भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं... ?

अंत समय में जटायु को प्रभु "श्रीराम" की गोद की शय्या मिली... लेकिन भीष्म पितामह को मरते समय बाण की शय्या मिली....!
 जटायु अपने कर्मयोग के बल पर अंत समय में भगवान की गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहे हैं.... प्रभु "श्रीराम" की शरण में...।

और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं.... और भगवान श्री कृष्ण हंस रहें हैं ।

ऐसा अंतर क्यों?...     

ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म पितामह ने द्रौपदी की इज्जत को लुटते हुए देखा था... विरोध नहीं कर पाये और मौन रह गए थे ...! 
 दुःशासन को ललकार देते... दुर्योधन को ललकार देते...
तो उनका साहस न होता, लेकिन द्रौपदी रोती रही... बिलखती रही... चीखती रही... चिल्लाती रही... लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे... नारी की रक्षा नहीं कर पाये...!

उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और .... 
 जटायु ने नारी का सम्मान किया... 
अपने प्राणों की आहुति दे दी... तो मरते समय भगवान 
"श्रीराम" की गोद की शय्या मिली...!
आध्यात्मिक शिक्षा :- जो हमेशा भगवान को अपने हृदय में मान कर उनके निमित्त कर्म करता है वो कर्मयोग है और इससे लोक परलोक दोनों सफल होता है 
जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं ... उनकी गति भीष्म जैसी होती है ... 
जो अपना परिणाम जानते हुए भी...औरों के लिए संघर्ष करते है, उसका माहात्म्य जटायु जैसा कीर्तिवान होता है ।

अतः सदैव गलत का विरोध जरूर करना चाहिए । 
"सत्य" परेशान जरूर होता है, पर पराजित नहीं ।।
:- संजीव

Friday, 23 April 2021

हमारे श्री कृपालु जी महाराज ।

हमारे प्राण प्रिय गुरूदेव श्री कृपालु महाप्रभु जी ने वेदों शास्त्रों का प्रमाण देकर , जीवन पर्यंत अथक परिश्रम करके शास्त्रों के क्लिष्ट श्लोकों के वास्तविक अर्थ को सरल और शुद्ध भाषा में हमें समझाकर  भगवान की भक्ति,प्रेम के मार्ग में फैले अंधविश्वासों का खंडन करके भक्ति के वास्तविक सिद्धांतों को इस कलिकाल में  पुनर्स्थापित किया हैं, उन्होंने पोंगा पंडितों, अयोग्य ज्योतिषों, स्वघोषित तथाकथित विद्वानों के फैलाए पाखंड, ढोंग, गलत फहमी  पर से पर्दा ऊठाकर भक्ति को सीधा सरल बना कर हमें भगवान के विशुद्ध भक्ति के तरफ प्रेरित किए है , । 
उन्होंने  सनातन धर्म के तमाम शास्त्रों में छुपे तमाम श्लोकों के वास्तविक अर्थ का सरल भाषा में प्रचार प्रसार करके हमें उन शास्त्रों के श्लोकों का मूल रस को पिलाया है । उन्होंने आध्यात्म और भौतिक दोनों को भगवान की भक्ति की और शरीर के आवश्यकता के सार्थकता को सिद्ध किया है । 
उन्होंने मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य से हमें परिचित कराया हैं । उन्होने अति उत्कृष्टता से  वैज्ञानिक पहलुओं  और आध्यात्मिक पहलुओं व शास्त्रों में छुपे गुढ़ व दिव्य तत्त्वज्ञान  द्वारा  उदाहरण देकर सनातन धर्म में विधर्मियों द्वारा  फैलाए गए अंध विश्वास , कुरितियां , बुराईयों  को दुर करने का अथक प्रयास किए हैं । 
उन्होंने आजकल कलयुग में किए जा रहे भक्ति के तरिके हीं नहीं वल्कि कलयुग में  ज्ञान मार्ग , कर्मकांड , तीर्थ , आदि की कलिकाल में निष्फलता  के मूल स्वरूप को समझाते  हुए यह सिद्ध किए हैं कि जब तक मन का अटैचमेंट भगवान में ना हो तबतक ना तो ज्ञान मार्ग , ना कर्मकांड और ना हीं जप तप , योग और तपस्यचर्या , गंगा स्नान  का कोई फल है  । 
उन्होंने  अनेकों शास्त्रों का प्रमाण देकर यह  साबित किए की  बिना मन के अटैचमेंट का सारा कर्म एक शारीरिक वहीरंगा उछल कुद ( फिजिकल ड्रील) मात्र है जिसका कोई लाभ नहीं वल्कि नुकसान है , भ्रम है , विप्रलिप्सा , कर्णपाटव और प्रमाद रूपी भ्रांत ज्ञान फैला  है ।
श्री महाराज जी ने सनातन धर्म में फैले तमाम अंधविश्वासों , कुरितियो , बुराईयो पर से पर्दा हटा कर हम मानव जाति का कल्याण हीं नही बल्कि सनातन धर्म को भी‌ उनके मूल स्वरूप में पुनर्स्थापित किया है । 

आज जो भी भाग्यशाली लोग श्री महाराज जी के शरण में है , उनको अपना प्राणाधार मानते हैं , उनपर अटुट श्रद्धा और दृढ़ विस्वास करतें हैं उनके इसी जीवन में उनके कल्याण से दुनिया की कोई शक्ति (स्वयं भगवान की  माया शक्ति भी )  नहीं रोक शक्ति है यह उनके द्वारा घोषित चैलेंज है ।
जो लोग अभी भी संशय और भ्रम में हैं उनसे एक बार पुनर्आग्रह है कि वो उनको अपना मान लें और उनके निर्देशित साधना और दिव्य बातों को तहे दिल यानि मन के गहराइयों  से मान कर अपने जीवन के मूल उद्देश्य के प्राप्ति के राह में अग्रसर हो ।
अन्यथा आने बाले अनेक युगों तक भी जब लोग विकृत ज्ञान  कुविज्ञान , विधर्मियों द्वारा फैलाए गए भ्रांत ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी ले जा कर अंतत्वोगत्वा  थक जाएगें  तो अंत में केवल श्री महाराज जी का आज के बतलाए एक मात्र मार्ग ही सहारा बनेगा उनका  । 
अतः भटकना क्यूं ? आज ही , अभी ही क्यूं न उनको अपना मान कर उनके बतलाए मार्ग का अनुसरण करें और अपने भावी पीढ़ी से भी अनुसरण करवाएं । क्यों हम खुद और हमारे भावी पीढी को अन्यत्र भटकने के लिए छोड़े । 
क्योंकि भटकने के बाद तमाम दुसरे की मनगढ़ंत  फिलौसफी को अपनाने और उस पर चलने के बाद आना तो उनके शरण में ही पड़ेगा , क्योंकि विशुद्ध भक्ति का कोई दुसरा मार्ग है हीं नहीं जगत में  । 
जब विश्व का सर्वोत्तम बैद् , हकीम, डौक्टर श्री कृपालु  महाराज जी के रूप में स्वयं यूगलसरकार हमारे लिए इस कलिकाल में  शूलभ हुए , खुद के परम कल्याण के लिए उनके बतलाए औषधि हमारे लिए उपलब्ध है तो अनेक डौक्टरों के यहां भटकना क्यूं ? 
सोचना चाहिए हमसबको । 
मैंने श्री कृपालु महाप्रभु उर्फ यूगलसरकार के द्वारा मेरे अंत:करण में डालें गए प्रेरणा के परिणामस्वरूप सबके कल्याण के लिय उपर्युक्त बातें लिखी हैं । श्री राधे । :- 
आपका संजीव कुमार , 23 अप्रैल 2021.

Thursday, 22 April 2021

प्रश्न - शास्त्र कितने प्रकार के होतें हैं‌?'वेद' , पुराण , 'श्री रामायण' , 'श्री माहाभारत ' और ' श्रीमद्भागवत, गीता' आदि किन प्रकार के शास्त्र है ?

प्रश्न - शास्त्र कितने प्रकार के होतें हैं‌?
'वेद' , पुराण , 'श्री रामायण' , 'श्री माहाभारत ' और ' श्रीमद्भागवत, गीता' आदि किन प्रकार के शास्त्र है ?
उत्तर :-
नंबर 1 कृत ग्रन्थ: यह मयाबद्द जीवो द्वारा लिखें जाते है। इसमें लिखने वाले न तो भगवद् प्राप्त हैं , न हीं प्रत्यज्ञ भगवद् अनुभवी , ये अपनी अक्ल से प्रसेप्शन से , अपनी समझदारी से ग्रंथ लिखें है , इसलिए ऐसे ग्रंथों में बहुत सारी त्रुटियां है । जो हमारे लिए भक्ति मार्ग में बाधक है , तथा इनको पढ़ना कुसंग कहा गया है । जब कोई भगवद् अनुभव हीन मनुष्य बिना समर्थ गुरू के , केवल अपनी संकल्पना के आधार पर गीता , रामायण और वेद पढ़ कर अपने अनुसार उसका अर्थ करके कोई किताब लिखता है तो उसको कृत ग्रंथ कहते हैं । यह ग्रंथ सर्वदा दोष सहित है क्योंकि वो जीव माया बद्ध है जिसने यह लिखा है । और मया बद्ध जीव अपने माईक मन बुद्धि से जो भी लिखेगा वो दोषयुक्त हीं होगा । 

 नंबर 2 स्मृत ग्रन्थ : यह भगवद् प्राप्त महापुरूषों द्वारा प्रकट किय जाते है लिखे जाते है। यानि भगबद् प्राप्त ,महापुरूषों द्वारा ,‌अवतार धारण करके पृथ्वी पर प्रकट भगवान द्वारा , जैसे गीता, भागवत, रामायण आदि ग्रंथ आते है। इसलिए यह ग्रंथ दोष रहित है ।इसमें कोइ दोष नहीं हैं । क्योंकि लिखने वाले महापुरूष माया से परे थे। वो भगवान की शक्ति से अपना कोई भी काम करतें हैं , भगवद् प्राप्ति के बाद भगवान की पर्सनल पावर योगमाया शक्ति उन महापुरुषों को मिल जाती है । वो 
मायिक दोषों से विल्कूल मुक्त हैं । प्रैक्टिकल महापुरूष होतें है , भगवान को प्रत्यक्ष देखा और सुना और गले लगाया है इन्होने , कोई सपने वपने में नहीं । तमाम उदाहरण है ऐसे महापुरुषों के आप सब जानते हैं , शंकराचार्य , रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य , वल्लभाचार्य, निंबारकाचार्य सुरदास , तुलसीदास , और हमारे श्री महाराज जी श्री कृपालु महाप्रभु जी आदि ।

 नंबर 3 विनिर्गत ग्रन्थ: यह भगवान की वाणी है । उनकी आप्त वाणी है , यानि उनसे हीं‌ प्रकट हुआ है ,ऐसे ग्रंथ सृष्टि के समय प्रकट हो जाते है और प्रलय में भगवान मे लीन हो जाते है। वेद पुराण आदि विनिर्गत ग्रंथ है ।और यह पूर्णत: निर्दोष निष्कलंक ग्रंथ है । परंतु ऐसे ग्रंथ को स्वयं पढ़ कर या किसी ऐसे गुरू और शिक्षक से समझा नहीं जा सकता जो केवल थ्योरिटिकल मैन हो , भगवद् प्राप्त ना किया हो । 
थ्योरिटिकल मैन इसको समझने में और समझाने में अपनी बुद्धि लगा देगा जिससे वो वास्तविक अर्थ को ना तो खुद समझ सकता है और ना दुसरे को ठीक ठीक समझा सकता है । थ्योरिटिकल मैंन अपनी बुद्धि से अपनी बात डाल देगा इन ग्रंथों को समझाने में । अतः कोई भी थ्योरिटिकल कथा बाचक , बाबा जी, पंडीत आदि और बहुत सारे स्वघोषित विद्वान लोग हमारे देश में हुए हैं और है जो अपने अपने हिसाब से गीता , रामायण , भागवद् , वेद , पुराण का गलत अर्थ करके अनर्थ कर रहें हैं किताब लिख रहे हैं इन पर । इनसे सुनकर अधिकांश लोग गलतफहमी के शिकार हो रहें है ऐसे लोग ऐसे ही जीव से ज्ञान सुन कर , इनपर , धर्म पर अपने अपने हिसाब से अपनी माईक बुद्धि से बहस करते मिलते हैं । इनसे साधकों को बचना चाहिए , नहीं तो यह कुसंग है । 
हां कोई श्रोत्रिए , ब्रह्मनिष्ठ भगवद् प्राप्त संत महापुरुष मिल जाए तो उनसे समझना चाहिए , ध्यान दिजिए श्रोत्रिए और ब्रह्मनिष्ट का मतलब थ्योरिटिकल मैन के साथ साथ प्रैक्टिकल मैन भी हो , मतलब जिसने सगुन साकार भगवान को अपनी आंखों से देखा हो , छुआ हो ,बातें किया हो , सपने में नहीं , आभासीए नहीं । साक्षात सामने खुली आंखों से उनको देखा हो छुआ हो , गले लगाया हो , वैसे महापुरुष किसी को मिल जाए और उनको अपना गुरू बना लें , मान लें उनको गुरू फिर उनके मुख से सुनें , जाने तो सही सही ठीक ठीक तत्वज्ञान मिलेगा । 
नहीं तो पांच अंधे वाली बात होगी , एक ने हांथी का पैर छुआ और अनुमान लगाया यह खंभा है और सबकों डिक्लियर कर दिया यह खंभा है , एक ने सुंड को छुआ और कह दिया सबसे यह पाइप है । दोनों गलत ज्ञान का शिकार , बोलने वाला अनुभव हीन बाबा भी और उनसे सुनने बाला भी ग़लत फहमी का शिकार ।
अतः ध्यान दिजिए , स्मृत ग्रंथ और विनिर्गत ग्रंथ को ठीक ठीक समझाने के लिए केवल भगवद् प्राप्त संत महापुरुष ही सक्षम है और उन्हीं के शरण में जाना होगा , अन्य दुसरा मार्ग नहीं है , नहीं तो तमाम हानि हो जाएगी । 
:- स्वामीं श्री युगलशरण जी महाराज । 
श्री राधे।

इस ध्येयवाक्य का अर्थ महाभारत के श्लोक 'यतः कृष्णस्ततो धर्मो , यतो धर्मस्ततो जयः से आता है.

इस ध्येयवाक्य का अर्थ महाभारत के श्लोक 'यतः कृष्णस्ततो धर्मो , यतो धर्मस्ततो जयः से आता है. कुरुक्षेत्र के दौरान,  अर्जुन अपने बड़े भाई युधिष्ठिर की अकर्मण्यता को दूर कर उन्हें प्रेरित करने की कोशिश कर रहे थे. वो युधिष्ठिर से कहते हैं, "विजय सदा धर्म के पक्ष में रहती है, और जहां भगवान श्रीकृष्ण हैं, वहां धर्म है।

हमें गर्व है कि यतो धर्मः ततो जयः (या, यतो धर्मस्ततो जयः) जो कि एक संस्कृत श्लोक है और यह भारत के सर्वोच्च न्यायालय का ध्येय वाक्य है। यह महाभारत में कुल ग्यारह बार आता है और इसका मतलब है "जहाँ धर्म है वहाँ जय (जीत) है। पर आज हमारे न्यायालयों के कुछ न्यायाधिपति इस मूल ध्येय वाक्य को भुल जातें हैं । जिससे न्याय में बहुत देरी होती है । और न्याय में देरी या न्यायालय में व्याप्त भ्रष्टाचार एक बहुत बड़ा अन्याय है एवं एक बहुत बड़ा अभिशाप है , महापाप है । पैसे के बल पर न्याय को खरीदनेवाले और बिकने वाले जजों एवं वकीलों को अपने ईमान को नहीं बेचना चाहिए । 

अधिवक्ता का धर्म है सच्चाई को सामने लाना न कि अपने प्रोफेशन का हवाला देकर , अर्थ को बदल करके या अनर्थ करके किसी भी मुजरिम का साथ देना । चाहे वो असली मुजरिम का वकील क्यों ना हों । जब अधिवक्ता को पता चल जाए कि हम जिसका केस हाथ में लिए है , वो सचमुच दोषी है तो अहंकार त्याग कर मुजरिम के खिलाफ हो जाना चाहिए । यही एक सच्चे अधिवक्ता का कर्तव्य और धर्म है । 

सत्यमेव जयते (संस्कृत विस्तृत रूप: सत्यं एव जयते) भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है।
इसका अर्थ है : सत्य ही जीतता है / सत्य की ही जीत होती है। यह श्लोक तीन मुख बाला सिंह, हमारे भारत देश के राष्ट्रीय प्रतीक के नीचे देवनागरी लिपि में अंकित है। यह प्रतीक उत्तर भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में वाराणसी के निकट सारनाथ में 250 ई.पू. में सम्राट अशोक द्वारा बनवाये गए सिंह स्तम्भ के शिखर से लिया गया है,  और 'सत्यमेव जयते' जो हमारे भारत देश के प्रतीक चिन्ह के नीचे लिखा गया संस्कृत श्लोक है यह मुण्डकोपनिषद से लिया गया है  :-
 'सत्यमेव जयते' मूलतः मुण्डक-उपनिषद का सर्वज्ञात मंत्र 3.1.6 है से लिया गया है ।
पूर्ण मंत्र इस प्रकार है:-

सत्यमेव जयते नानृतम सत्येन पंथा विततो देवयानः।
येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत् सत्यस्य परमम् निधानम्॥
अर्थात अंततः सत्य की ही जय होती है न कि असत्य की। यही वह मार्ग है जिससे होकर आप्तकाम (जिनकी कामनाएं पूर्ण हो चुकी हों) मानव जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।:- संजीव कुमार ।