Tuesday, 26 November 2024

लक्ष्मी कौन है क्या है ?

*कितने अजीब लोग हैं!*

जरा अपने संसार को देखो कैसे अजीब लोग हैं हमारे संसार में। ये बड़े-बड़े पैसे वाले वो दुकानदार हो छोटे-छोटे या बड़े-बड़े खरबपति हों। ये लोग इस दिवाली पर हिसाब करते हैं और अपने बहीखाता में लिखते हैं- सदा लक्ष्मी सहाय! सदा कुबेर सहाय! लक्ष्मी सदा हमारे पास रहे। कुबेर सदा हमारे पास रहे। ये पंडित लोग जो पूजा कराते हैं आपके यहां शादी ब्याह में, यज्ञ बगैरा में, तो पूजा के बाद में एक श्लोक बोलते हैं- 

*यान्तु देवगणा: सर्वे पूजामादाय मामकीम्।* 
  
सब देवता अपने-अपने धाम को जाओ, हम पूजा कर चुके। पहले बुलाते हैं ना! गणेश जी और दुर्गा जी और षोडस मातृका, नवग्रह और अंत में कहते हैं- सब लोग जाओ। *लक्ष्मीम कुबेरेण च विहाय* लक्ष्मी और कुबेर तुम दोनों रहो और बाकी लोग जाओ। ये कितने अजीब लोग हैं अजीब! अजीब मायने समझते हैं आप लोग ना? हां! जिनकी खोपड़ी उल्टी हो वो अजीब होते हैं। भगवान सबसे अधिक अजीब हैं क्योंकि वो अन्यथाकर्तुम समर्थ है। वह आंख से सुनते हैं, कान से देखते हैं। अजीब हैं ना? हां!
तो ये हमारे संसार के लोग भी अजीब है और इनको बताने वाले पंडित जी वगैरह भी अजीब हैं! इनको यह नहीं पता है कि लक्ष्मी बिना भगवान के कैसे रहेंगी। वो तो सदा भगवान के बाएं तरफ रहती हैं। जब तुम भगवान को भेज रहे हो कि सब जाओ अपने-अपने लोक में और लक्ष्मी तुम रह जाओ। तो लक्ष्मी कहेंगी- तुम्हारा दिमाग खराब है, मैं अपने पति को छोड़कर तुम्हारे यहां रह जाऊं? यह तो संसारी स्त्री को भी अगर कोई ऐसे कहे कि आज जितनी स्त्रियां आई हैं वो सब रुकें हमारे घर में और जितने पति आए हैं वह जाएं अपने-अपने घर! तो लोग पिटाई कर देंगे। यह पागल हो गया है! तो लक्ष्मी तो तभी रहेंगी जब भगवान को बुलाओ। ना! कोई नहीं लिखता बही खाता में- 'राम सहाय', 'श्री कृष्ण सहाय', 'भगवान सहाय'। लक्ष्मी सहाय, कुबेर सहाय! यह लक्ष्मी कैसे रहेंगी भगवान के बिना? और कुबेर कैसे रहेगा? वह तो सर्वेंट है। तुलसीदास ने लिखा है, बड़ा मजेदार- 

*बिंधि न ईंधन पाइऐ सागर जुरै न नीर।*
*परै उपास कुबेर घर जो बिपच्छ रघुबीर।।*

अगर भगवान को आप नहीं मानते और ये कुबेर और लक्ष्मी की भक्ति करते हैं तो आपका क्या हाल होगा? विंध्याचल पहाड़ में इतने वृक्ष हैं और खाना पकाने को लकड़ी नहीं मिलेगी आपको। हां! इतना पानी भरा है समुद्र में, उंगली डूबोने को भी पानी नहीं मिलेगा। और अनंत धन है कुबेर के पास लेकिन वहां उपवास शुरू हो जाएगा, फाके पड़ेंगे। तो लक्ष्मी और कुबेर की भक्ति कर रहे हो और भगवान को विदा कर रहे हो! ये अजीब लोग हैं ना? हां! यह कृपालु बोल रहा है और कोई नहीं बोला आज तक। हां ! पूजा करवाते हैं और लक्ष्मी को सिर झुकाते हैं। और एक बात और बताएं आपको बड़ी मजेदार कि लक्ष्मी तो भगवान की अंतरंग शक्ति है। दिव्यानंद उनके पास है। और यह माया को लोग लक्ष्मी कहते हैं, माया को! यह जो संसारी संपत्ति है- सोना, चांदी, रुपया, मकान, जमीन इसको कहते हैं- लक्ष्मीवान है यह बड़ा! धनवान है इसलिए लक्ष्मीवान है! लक्ष्मीपति है! यह लक्ष्मी नहीं है यह तो माया है। संसारी वस्तु तो माया कहलाती है। यह पृथ्वी है ना! इसी से तो पैदा हुआ सोना, चांदी, हीरा। जितना भी आप लोग वैभव कहते हैं यह पत्थर सब है ना! यह मिट्टी से तो बने हैं। सोना कहां से निकलता है? इसी पृथ्वी से, चांदी इसी पृथ्वी से, हीरा इसी पृथ्वी से। वो जिसके पास अधिक हो गया वो लक्ष्मीपति हो गया! वो तो मायापति है। लक्ष्मीपति नहीं है कोई। लक्ष्मी तो भगवान की अंतरंग शक्ति है वो तो दिव्यानंद देती हैं मैटेरियल नहीं, स्पिरिचुअल हैप्पीनेस। लेकिन सब अजीब हैं ,अजीब काम करते हैं और चल रहा है परंपरा बस उसी प्रकार। आप लोग समझे रहिए आपको राधा कृष्ण की भक्ति करना है अनंत कोटि दुर्गा, लक्ष्मी, कुबेर सब अपने आप भागे आएंगे। आप सुप्रीम पावर की शरण में रहें और सबको अपने आप बिना बुलाये आने दें, डरे नहीं। लेकिन किसी का अपमान नहीं करें। हां! सबको नमस्कार है लेकिन मन बुद्धि का समर्पण श्यामा श्याम और उनके जन गुरु के प्रति होना है। ये रहस्य आज धनतेरस को आप लोग मस्तिष्क में रख लें।

*-प्रवचनांश भक्तियोगरसावतार अनंतश्रीविभूषित पंचम मूल जगद्गुरुत्तम १००८ स्वामि श्री कृपालु जी महाराज*

Saturday, 16 November 2024

प्रश्न - भगवान को भाव का भुखा क्यों कहा गया है ?

श्री महाराज जी द्वारा दी गई बहुत बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत ज्ञान और यह सावधानी बहुत जरूरी है, नहीं तो भगवान और गुरू के निमित्त कि गई सब सेवा, साधना ,दान , भजन-किर्तन निष्फल हो जाएगा ! सब किया हुआ जीरो गुणा सौ बराबर जीरो हो जाएगा । 
प्रश्न - भगवान को भाव का भुखा क्यों कहा गया है ?
उत्तर :- एक भुख का मतलव है आभाव में भुख और दुसरा आभाव नही है किसी चिज़ की , किसी चिज़ की कमी नहीं है , हर तरह से पूर्ण है फिर भी अपेक्षा करते हैं कि लोग हमें भोजन के लिए पुछे प्रेम भाव से । तो यहां भुख का मतलव है प्रेम भाव की अपेक्षा करना है । 
भगवान को सच में कोई व्यक्ति अगर किसी चिज़ का भुखा माने तो वो अज्ञानी है, भगवान को भावकग्राही कहना शास्त्र सम्मत है लेकिन उनको भाव का भुखा कहना और मानना शास्त्र विरुद्ध बातें हैं । 

भगवान प्रत्येक जीव के हित के लिए , उसके कल्याण हेतु उसके भावना को रीड करते हैं , इसलिए उनको भावक ग्राही कहा है शास्त्रों ने , लेकिन भगवान को भाव का भुखा कहना भारी मूर्खता है ।
भगवान किसी भी विषय वस्तु या भाव-वाव के भुखे नहीं है , उनको किसी चीज की कोई आवश्यकता या आभाव नहीं है । वो पूर्णकाम है निष्काम है , भला वो किसी चीज का भुखे क्यों रहेंगे ? उनको किस बात का आभाव है जो वो किसी भी चिज़ के भुखे रहेंगे ? 

भगवान का गुण है - पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते' -वृहदारण्यक उपनिषद ।
 वो परंब्रह्म भगवान श्री कृष्ण तो सभी प्रकार से सदा से परिपूर्ण है और परिपुर्ण रहेंगे । 
तो फिर भगवान को किसी चीज का भुख हो, यह सर्वदा असंभव है । इसलिए भगवान को भाव का भुखा कहना एक अपराध है । 

हां भगवान भावक ग्राही अवश्य हैं, वो भी अपने भक्तों के हितों के लिए केवल । भक्तों के दिव्य स्वार्थ (भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, विवेक ) को प्रदान करने के लिए अपने अकारण करूण स्वाभाव के कारण वो अपने भक्तों के द्वारा उनके प्रति अर्पित प्रेम भावना को, भक्ति भाव को , मायिक सेवा , मायिक साधना आदि को रीड करते हैं, नोट करते हैं और फल के रूप में उसे अपना प्रेम प्रदान करते हैं, आनंद प्रदान करते हैं , भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, विवेक, प्रदान करते हैं । 

चूकि जीव भगवान को और गुरू को केवल श्रद्धा भाव , प्रेम भाव , पूर्ण समर्पण, शरणागति भाव से , निष्काम सेवा भाव से हीं प्राप्त कर सकता है, इसलिए भगवान जीवों को अपनी भक्ति प्रदान करने के लिए अपने भक्तों से निष्काम प्रेम भाव की अपेक्षा करते हैं इसलिए उनको भावक ग्राही कहा गया है । 

हमारे गुरूदेव श्री महाराज जी भी तो सिर्फ हमारे कल्याण के लिए इस मायालोक में गोलोक से आए , इतना कष्ट उठाए वर्णा उनको किस चिज़ की कमी थी , वो तो पुर्णकाम हैं । भला उनको किस चिज़ की भुख थी या है , वो तो स्वयं भगवान का स्वरूप है , भगवान की सभी शक्तियां, सभी धन गुण के वे स्वामी है उनको इस गंदे संसार से भला क्या लेना देना । 

वो आए इस मृत्यु लोक में सिर्फ और सिर्फ हमारे कल्याण हेतु तथा अपने अकारण स्वभाव वश हमसे अपेक्षा करते हैं कि हम उनके अनुगत होकर , शरणागत होकर उनके बतलाए मार्गों का, सिद्धांतों का ठीक ठीक पालन करके सदा के लिए उनको प्राप्त करके इस मायालोक से मुक्त होकर सदा के लिए आनंदमय हो जाए । इसमें हमारा स्वार्थ है , उनका कोई स्वार्थ नहीं है । वो तो हर तरह से परिपूर्ण है , पुर्णकाम हैं , निष्काम है , उनको भला किस चीज की कमी ? 
अत: यह कभी मत सोचिएगा कि हम उनके निमित्त दानादि या किसी प्रकार से कोई सेवा करके उनका उपकार कर रहे हैं , यह भारी नामापराध हो जाएगा । 

हमेशा ध्यान रहे, हम हरि और गुरू के निमित्त जो भी सेवा , दान तथा साधना करते हैं, उनका रूपध्यान करते हैं , उनका गुन गाते हैं भजन किर्तन करते हैं, उनके सुख के लिए जी भी काम करते हैं वो दरअसल केवल और केवल अपने ही कल्याण हेतु कर रहे हैं, वर्णा भारी नामापराध हो जाएगा, आपका नुकसान हो जाएगा , सावधानी अति आवश्यक है । 

याद रहे यह सिद्धान्त ज्ञान कि एक समर्थ ही असमर्थ की सेवा कर सकता है , असमर्थ समर्थ की सेवा कभी नहीं कर सकता । 
इसलिए भगवान और गुरू सर्वदा समर्थ है और वे असमर्थ जीव की सेवा करते हैं उसको तत्वज्ञान देकर , उसका मायिक दान स्वीकार करके , उसकी मायिक साधना तथा सेवा स्वीकार करके । उसका मार्ग दर्शन करके , अपने साधकों का योगक्षेम वहन करके , उसकी हर तरह से रक्षा करके । 

इसलिए किसी भी जीव के मन में दान , सेवा , और साधना भजन किर्तन का अहंकार रत्ति भर भी न हो कि हम यह यह किए हैं और करते हैं और हम उनका बहुत बड़ा भक्त हैं ,बड़ा सेवक है, बड़ा साधक है , वर्णा सबकुछ समाप्त । अहंकार आया कि दीनता और आंसु गए और फिर सब जीरो बटा सौ बराबर जीरो हो जाएगा । 

जीव जब भगवद् प्राप्त कर लेगा , गुरू कृपा से समर्थ बन जाएगा तब उसको दिव्य सेवा मिलती है भगवान और गुरू की उनके गोलोक में । उस सेवा को प्राप्त करके वो अपना कल्याण सदा के लिए कर लेता है । 

:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन से प्रश्नों का उत्तर ।

Friday, 18 October 2024

संसार में भौतिक सम्पन्नता के बावजूद लोग इतना दुखी क्यों हैं , और हमारा उद्धार कैसे होगा ? मन को कब शांति मिलेगी ? हमारा कल्याण कैसे होगा ?

एक साधक का प्रश्न :- संसार में भौतिक सम्पन्नता के बावजूद लोग इतना दुखी क्यों हैं , और हमारा उद्धार कैसे होगा ? मन को कब शांति मिलेगी ? हमारा कल्याण कैसे होगा ? 
मां का उत्तर :- बड़ा अच्छा प्रश्न है तुम्हारा , श्री महाराज जी ने कई बार इस पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि यही बात एक बार शौनकादिक ऋषियों के द्वारा सुत जी से पुछा गया की कलयुग में लोगों का कल्याण कैसे होगा ? 
सुत जी ने कहा कि कलयुग में लोगों की यादास्त बहुत कमजोर होगी , लोगों को भुलने की बीमारी होगी , प्रारब्ध बहुत कमजोर होगा , लोग शारीरिक रुप से बहुत कमजोर होंगें , मानसिक शक्ति क्षीण होती जाएगी , लोग पाप और पूण्य में , धर्म अधर्म में फर्क नही समझ पाऐंगें , अच्छे बुरे के ज्ञान का आभाव होगा , लोग तर्क , कुतर्क , वितर्क में समय गवाऐंगें , 
झूठ बोलने , पापादी कर्मों तथा चिंतन में लिप्त रहने के कारण जीव के पुण्य बल तथा आयु क्षीण होती जाऐगी | कुसंगादि के कारण अपना नुकसान ही नुकसान करेंगें | काम-क्रोध, अहंकार, विनाश का प्रमुख कारण होगा | लोगों की रूचि भगवान का प्रेम प्राप्त करने में नहीं होगा । कामनाओ के पूर्ति मात्र के लिए लोग तीरथ 
-विरथ मंदीर मस्जिद गुरुद्वारे में जाएंगे । लोग भगवान के भक्ति का प्रदर्शन मात्र करेंगे । भगवान से निष्काम प्रेम के जगह लोग भक्ति, दान, धर्म का प्रदर्शन अधिक करेंगे । धन वैभव का अहंकार जीवों के उपर हावी रहेगा । धर्म के आड़ में लोग व्यभिचार तथा पाखंड में लिप्त रहेंगे । व्यभिचारी पूजित होंगे, तथा वास्तविक संतों के प्रति कम लोग ही आस्थावान होंगे । 
अत: भगवान से सच्चे तथा निस्वार्थ प्रेम के आभाव में लोग भौतिक सपन्नताओं के बाबजूद दुखी रहेंगे । जीवो का मन अशांत रहेगा । जीव रोगादि से ग्रस्त रहेंगे । चरित्र और सुसंकार का आभाव होगा । घोर कामनाओं तथा वासनात्मक भोगेच्छा के वशिभूत जीवो का नैतिक पतन होगा । 
केवल भगवान की निष्काम भक्ति करके उनका प्रेम प्राप्त करने के बाद ही लोग आनंदमय तथा सुखी होंगे । 

श्री महाराज जी ने समझाया है कि "जीव समझ नही पाते है कि वो जो कष्ट भोग रहे है वो उसके ही अनन्त जन्मो पल्स वर्तमान जन्मों के बुरे कर्मो का फल है | "

लोग देवी देवता का चक्कर काटते हैं , मंदिरो में जाकर तमाम मनता मनौती मनाते है , जादु मंतर के चक्कर में पड़ते है | नकली बाबाओं के चक्कर में पड़कर अपना तमाम तरह का नुकसान पँहुचाते हैं | 
समय आने पर दो चार का खड़ाब प्रारब्ध कट जाने पर कष्ट कम हो जाने पर , रोग ठीक हो जाता है तो लोग उसके द्वारा ढोल पिटवाते है कि अमुख बाबा बड़े सिद्ध हैं फिर कुछ लोग और इस चक्कर में पड़कर अपना और नुकसान कर बैठते हैं | 

वो समझते है देवी देवता खुश हो गये और हम ठीक हो गए | अरे क्या खाक ठीक हो गए , जिसको भगवान ने उसके प्रारब्ध का फल दिया उसे कौन ठीक कर सकता है , वो तो भोगने बाद ही ठीक होगा | देवी देवता में ऐसी हिम्मत कहां जो विधाता के दिये हुऐ फल को काट सके | ये देवी देवता के अवलम्ब , आधार तो खुद श्रीकृष्ण है | इनकी ऐसी हिम्मत कहां जो वो अपने अबलंब के खिलाफ जाऐं ?

अरे ये देवी देवता भी तभी खुश होते है जब वे देखते है कि ये हमारे इष्ट को ही भज रहा है उन्हीं की भक्ति कर रहा है | ये उनका हीं हो गया | ध्यान दो - श्री कृष्ण का हीं हो गया है , श्री कृष्ण का भी नहीं | 

अत: देखते हो संसार में तमाम तरह के नए नए रोग बढ़ रहें हैं कीड़े मकोड़े की संख्या बढ़ रही है , लोग काल का ग्रास बन रहें हैं फिर भी नही चेतते , क्योंकि बुद्धि भ्रष्ट हो चूकि हैं | शास्त्रों , पुराणों को अपने अपने तरीके से अर्थ निकाल कर अनर्थ के तरफ बढ रहे हैं | पाप में लिप्त है , धन का दुरुपयोग बढ रहा है | 

अत: इन चीजों को समझों , कुसंग मत करो , हरिगुरु के शरण में जाओ , बार बार सिद्धान्तो को पढ़ो , हरिगुरु का हीं संग करो , गुरुधाम जाओ , हरिगुरु के बुद्धि से अपनी बुद्धि को जोड़ दो , हरिगुरु के बताऐ मार्ग पर चलों , रुपध्यान करो , हरिगुरु निर्दिष्ट साधना करो , साढ़े छ अरब मनुष्यों मे हम सब बड़भागी हैं कि कृपालु जैसा गुरु मिला , जो स्वयं परम तत्व हैं उनका दामन कभी मत छोड़ों । 
मन को वास्तविक शांति सुख और आनंद श्री राधाकृष्ण प्रेम पाने के बाद ही मिलेगी , तर्क , कुतर्क मत करो , अपनी तुक्ष बुद्धि मत लगाओ , ज्यादा से ज्यादा उनके पुस्तकों को पढो , बार बार पढो , उनकी पुस्तके मामुली पुस्तकें मत समझो , यह उनके द्वारा रचित महानतम ग्रन्थ है | 
:- पूज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।

Saturday, 12 October 2024

सन्यासियों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी के लिए संक्षिप्त लेख ।सन्यासियों के प्रकार :- नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार कूल छः प्रकार के सन्यासी होते हैं जो निम्नलिखित हैं ।


 सन्यासियों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी के लिए संक्षिप्त लेख ।
सन्यासियों के प्रकार :- 
नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार कूल छः प्रकार के सन्यासी होते हैं जो निम्नलिखित हैं - 
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साधारण सन्यासी कुटिचक होते हैं जो मंत्रादि की साधना भी करते है लेकिन मन भगवान में ही स्थित यानि ध्यान मग्न होतें है यानि अधिकतर समय साधना में लगाते हैं । ये शिखा और यज्ञोपवीत ( सूत्र) भी धारण करतें है त्रिदण्ड, कमण्डलु , कौपीन ( लंगोटी ) और कन्था ( कथरी ) धारण करतें है । झोली और पात्र भी रखतें है। ये मिट्टी खोदने वाला खनती भी अपने पास रखते हैं। ये पराविज्ञानी नहीं होते अर्थात अपरोक्ष ज्ञाननिष्ठ नहीं होते। ये  श्वेत ऊर्ध्व पुण्ड्र लगाते हैं। 
ये गुरु के अलावा  माता पिता की भी सेवा कर सकते हैं। 
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बहुदक सन्यासी - जनेऊ, चोटी( शिखा ), दण्ड कमण्डलु लंगोटी, और कथरी के अलावा त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं।ये उत्तम  सज्जन लोगों से ही आठ ग्रास भोजन ग्रहण करते हैं । एक ग्रास उतना ही होता है जो शान्ति से मुख में रखकर चबा सकें न कि बड़ा कौर। ये अपने मन को भगवान में ध्यानस्थ कर कठिन साधना करते हैं 
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हंस :- ये जब चाहे मानसिक स्तर पर भगवान के ध्यान में चले जाएं और पूर्ण जागृत अवस्था में भी भगवान में मन को स्थित रख कर संसार में कर्मयोग करते हैं , ये भिक्षु किसी गांव में एक रात , नगर में पाँच रात और तीर्थ क्षेत्र में अधिक से अधिक  सात रात निवास कर सकते हैं वे अपने आपमें ही मगन रहते हैं और स्वागत सत्कार से दूर रहते हैं। ये जटा जूट धारण करते हैं। ये एक जगह अड़के नहीं बैठते इनको भोजन या आश्रम की सुविधाओं से कोई संबंध नहीं होता।   नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार ये मधुकरी ( भिक्षा) से ही शरीर का पोषण करते हैं।
ये तीनों यानि कुटिचक , बहुदक तथा हंस क्रमशः घासफूस के आश्रम वाले होते हैं प्रायः गृहस्थ जीवन काटकर फिर वानप्रस्थ स्वीकार  करते हैं तदोपरान्त ही अपनी अवस्था के अनुसार कुटिचक या बहुदक अथवा हंस हो पाते हैं। 
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परम हंस :- ये हर क्षण मानसिक स्तर पर भगवान के ध्यान में स्थित होते हैं और शारिरिक और से    शिखा और यज्ञोपवीत धारण नहीं करते ये मात्र 5 घरों से अन्न पाकर एक ही बार पाते हैं दूसरे समय नहीं पाते। ये बांस का दण्ड पास में रखते हैं। ये सम्पूर्ण अंगों में भस्म धारण करते हैं यही इनका वस्त्र है पर ये दिगम्बर हो भी सकते हैं नहीं भी तो एक लंगोटी और एक चादर अपने शरीर पर ओढ़ कर भी रख सकते हैं। परम हंस नामक संन्यासी वृक्ष के मूल अथवा श्मशान में रहते हैं। यज्ञशाला, नदीतट, गड्ढा, झोंपड़ी में भी रह सकते हैं। 
इनको लाभ या अलाभ से कोई संबंध नहीं होता। इनको कोई स्वर्ण भी दे तो उसे मिट्टी या नाशवान समझकर स्वीकार नहीं करते । इनको शुद्ध द्वैत या अशुद्ध द्वैत से कोई भी मतलब नहीं होता ये पूर्णतः आत्माराम होते हैं ये ब्रह्म से अभिन्न होते हैं किसी भी नियम या कर्मकांड आदि से इनको कुछ भी संबध नहीं होता ये सदा ब्रह्मानंद से युक्त होते हैं। ये चाहे चाण्डाल के घर प्राण त्याग करें या काशी या मथुरा में ये मुक्त ही होने से परम निर्वाण को ही पाते हैं।
जड़भरत , श्वेतकेतु व शुकदेव लीलावश परमहंस हैं।और ये सभी वर्णों से भिक्षा ले सकते हैं इनको ब्रह्म के सिवाय कुछ नहीं दिखता स्वयं भी सर्वमय भी। मात्र देह के लिए ही ये किसी से भी भिक्षा ले सकते हैं।
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तुरीयातीत सन्यासी - यह कभी किसी से कुछ भी नहीं मांगते। यदि स्वेच्छापूर्वक कोई दे दे तो ग्रहण कर सकतें है अथवा  ये देह के लिए मात्र तीन घरों से अन्नाहार मांग भी सकते हैं पर धन , वस्त्र और वस्तु नहीं मांगते।  यह नग्न होते हैं। और हर क्षण भीतर से , मानसिक स्तर पर साधना में निमग्न रहते हैं । 
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अवधूत सन्यासी - ये अजगर वृत्ति से जीवित रहते हैं ये बंधन को मिथ्या मानते हैं इनके अनुसार तुमको किसी ने बंधन में नहीं डाला तुम तो मुक्त ही हो अपने अज्ञान के कारण ही तुम मुक्ति चाहते हो वास्तव में जो मुक्त है उसे किस प्रकार की मुक्ति चाहिए बस अज्ञान का नाश कर ले यही मुक्ति है। ये मंत्र और उपासना से रहित सोऽहम् भाव में ( इससे भी अतीत) स्थित होते हैं । :- नारद परिव्राजक उपनिषद । ( संजीव कुमार )

Thursday, 10 October 2024

श्री कृपालुजी महारप्रभु के अनुयायी भगवान श्री राधाकृष्ण के अनन्य भक्त ।

पुर्व जन्मों का पुण्य पुंज तथा उस पर भगवद् कृपा से जबतक किसी भी जीव के कुसंस्कारों का नाश नहीं होगा तथा उनके चित्त में सर्वश्रेष्ठ संस्कारों का उदय नहीं होगा तबतक वो जीव श्रीमद्पदव्याक्य, प्रमाणपारावरीण, वेदमार्ग-प्रतिष्ठापन, निखिलदर्शन समन्वयाचार्य, सनातन वैदिक धर्म प्रतिष्ठापन सत्संप्रदाय परमाचार्य, भक्तियोग रसावतार, भगवदनन्त श्री विभूषित पंचम मूल जगद्गुरूतमई १००८ स्वामी श्री कृपालु जी महाराज द्वारा दिए गए वैदिक दर्शन, तत्वज्ञान , विशुद्ध एवं श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्तिरस एवं भक्ति सिद्धांतों में रूचि नहीं रख सकता, चाहे वो आज कलयुग में किसी भी धर्म , किसी भी संप्रदाय , किसी भी मत , किसी भी मार्ग के बड़े से बड़े धर्मपीठ पर बैठे बड़े बड़े धर्माधिकारियों , कर्मकांडी पंडितों तथा दुनियां में महान कहलाने वाला जीव या ज्ञानी ध्यानी विज्ञानी आदि ही क्यों न हो । इन बड़े बड़े पंडितो तथा ज्ञानियो से वो चंडाल श्रेष्ठ तथा बंदनिए है जो श्री राधाकृष्ण की अनन्य तथा निष्काम भक्ति करते हैं , उनमें रूचि रखते हैं, उनसे प्रेम करते हैं । 

परम दिव्य तत्व , अवतारी महापुरूषों में सर्वश्रेष्ठ श्री कृपालु जी महाप्रभु द्वारा श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्ति में रूचि इस युग में केवल उन्हीं सौभाग्यशाली जीवों को है जो अपने पुर्व जन्मों में परम तत्व श्री राधाकृष्ण की भक्ति की है तथा भगवान श्री कृष्ण के परमगुप्त,अद्वितीय,अनुपम , अलौकिक अति दुर्लभ प्रेम रस को प्राप्त करने के लिए लालायित हुए थे और हैं । 

श्री राधाकृष्ण के अनुपम , अपरिमेय , अद्भुत, अतुलनीय, अलौकिक, दुर्लभ भक्तिरस के प्रति आकर्षित जीव ही केवल श्री कृपालु जी महाप्रभु को अपना गुरू मानते हैं और आने वाले समय में मानेंगे भी तथा उनके प्रति अनन्य, दृढ़ श्रद्धावान, आस्थावान तथा संकल्पित है तथा होंगे । 

श्री कृपालु जी महाप्रभु जैसे महानतम अवतारी संत के प्रति जिज्ञासु, पिपासु श्रद्धावान, निष्ठावान, अनन्य तथा समर्पित जीवों के सौभाग्य की सराहना करना स्वर्ग के देवी देवताओं तथा सरस्वती एवं बृहस्पति के लिए भी कठीन है ।

अति धन्य हैं वो जीव जो श्री महाराज जी का अनन्य अनुगामी होकर श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्ति करते हैं । 

 मैं संजीव कुमार एक क्षूद्र सा अधम एवं पतित जीव , हमारे गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज के सभी अनुयायियों एवं निष्काम सेवकों के श्री चरणों में मन ही मन नित्य प्रति अपना मस्तक नवाकर स्वयं को धन्य समझता हूं । जय जय श्री राधे , जय जय श्री कृपालु महाप्रभु की जय जय जय, जय जय श्री महाराज जी के साधक समुदाय की जय ।। :- संजीव कुमार ।

Wednesday, 21 August 2024

आज कल अधिक पुजा पाठ के बाबजूद पापाचार बढ़ रहा है उसका कारण क्या है ?

आजकल हमारे देश में अधिकांश संख्या में लोग जप तप व्रत पूजा पाठ, उपवास तीर्थ-विर्थ हवन यज्ञ रूद्राभिषेक सत्यनारायण की पुजा , दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा , गणेश पूजा , लक्ष्मी पूजा , काली पूजा , सुंदरकांड की पाठ, आदि तमाम तरह के कर्मकांड करने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही है , बड़े बड़े मंदिरों में रात रात भर भजन कीर्तन, जागरण, दान आदि करते पाए जाते हैं । 

आजकल तो इतने प्रवचन करने वाले बाबा लोगों की भरमार हो चुकी है हमारे देश में जितना की आम लोगों की जनसंख्या भी नहीं थी सतयूग तथा त्रेता आदि में हमारे देश भारत में । आजकल इतना अधिक लोग ये सब कर्मकांड करते पाये जाते हैं जितना की सतयुग, त्रेता तथा द्वापर आदि का लोग भी नहीं किया होगा कभी । और करेंगे कैसे द्वापर में आज के तुलना में जनसंख्या ही कितनी थी ? आज भारत में हीं केवल एक सौ चालीस करोड़ लोग रहते हैं । 

लेकिन आज एक भी आदमी यह दावा नहीं कर सकता कि ए सब करने से उनके मन की एक प्रतिशत भी शुद्धि हुई है, मनों रोग - काम क्रोध , मद , मोह, लोभ , मातषर्य , ईर्ष्या घृणा , राग द्वेष चिंता आदि लेश मात्र भी कम हुआ है, सुख शान्ति तो बहुत दूर कि बात है ।

अरे आम लोगों कि कौन कहे स्वयं को बड़े बड़े पंडित , पुजारी , आचार्य , प्रवचन करने वाले लोग , कर्म कांड कराने वाले पंडितो के भी ये रोग कम नहीं हुए हैं । 

जरा सा कुछ प्रतिकूल बातें कोई इनके खिलाफ बोल दे , तुरंत गुस्सा , और लोभ लालच , राग द्वेष, अहंकार आदि इतना अधिक इनके मन में पाय जाते हैं कि उसी मंदिर के दुसरे पंडितो के प्रति राग द्वेष भरा परा है । जब इन पंडितो पुजारियों , आचार्यों का यह हाल है तो आम लोगों कि कौन कहे , अपने ही मंदिर के दुसरे पुजारी , आचार्य का बुराई करते मिल जाते हैं आज । आपस में एक दुसरे कि बुराई तो छोड़िये ये कर्मकांडी पंडित आचार्य लोग तो बड़े बड़े जगद्गुरुओं को भी नहीं छोड़ते , उनके बारे में गलत-सलत बातें बोलते रहते हैं , बड़े बड़े जगद्गुरुओं के प्रति भी दुर्भावना तथा द्वेष रखते हैं अपने मन में । 99% पंडितो में आचार्यों में दीनता , नम्रता, सहिष्णुता नहीं मिलेगा आज आपको , तो फिर पुजा पाठ हवन यज्ञ आदि कराने वाले गृहस्थों की तो बात ही छोड़िए । 

जब पंडितो पंडों, आचार्यों आदि का यह हाल है जो मंदिर में दिन रात भगवान के विग्रह कि सेवा करते हैं पुजा पाठ करते और कराते हैं तो भला साधारण लोग , इनसे कर्म कांड कराने तथा करने वाले गृहस्थों के मन बुद्धि चित्त अहंकार कि शूद्धि कि बात कौन सोचें ? 
तो इन सबका क्या कारण है ? तो पहला और सबसे प्रमुख कारण है आजकल केवल शरीर से भक्ति कि जा रही है । मन इंभौल्व हो या न हो कोई मतलव नहीं । दुसरा कारण कलयुग में कर्मकांड के सभी नियम तथा निषेधों का ठीक ठीक पालन असंभव है ।

अगर कोई पंडित यह कहता है कि भगवान कि फिजिकल सेवा , शरीर से पूजा पाठ , व्रत उपवास हवन यज्ञ करने से अभीष्ट यानि भौतिक बस्तूओं तथा संसारिक सुख सुविधा के साधनों कि प्राप्ति होती है तो जरा उनको देखा जाए जो लोग यह सब नहीं करते और न कभी किया आज तक फिर भी उनके पास आज रूप्या पैसा धन जन आदि पुजा पाठ जप तप हवन यज्ञ व्रत तीर्थ-विर्थ उपवास करने वालों कि अपेक्षा कई गुणा अधिक क्यों हैं ? 

नंबर दो अगर वो यह कहते हैं कि इन सब कर्मकांड से पाप समाप्त होता है कष्ट मिटते हैं तो आज ये सब करने बाले वेचैन क्यों है , इतना चिंता निराशा आदि से ये लोग घिरे क्यों रहते हैं ? आगे पाप करने के प्रवृत्ति का नाश क्यों नहीं हूआ ? 

नंबर तीन अगर यह दावा करते हैं पंडित लोग कि इससे लोगों के संस्कार का निर्माण होता है मन कि शूद्धि होती है तो जरा यह देखिए आज कि कितने लोगों यहां तक पंडितो तथा पंडों के खुद राग द्वेष काम क्रोध ईर्ष्या आदि समाप्त हुए हैं या कम हूए है ? 

तो यह सब वेकार कि बातें हैं । शास्त्र कहता है कलयुग में मंत्र तंत्र पुजा पाठ , जप तप हवन यज्ञ व्रत उपवास तीर्थ विर्थ संसारिक गानों के साथ भजन कीर्तन, नृत्य , उछल कूद सब निर्थक है इन सबका कोई लाभ नहीं है और न भगवान इन सब कर्मों से एक रत्ती भी खुश होते हैं , और न कृपा करते हैं । 

यहां तक कि इस कलयुग में इनसे न कोई आध्यात्मिक लाभ है और न कोई भौतिक लाभ है । 

भौतिक बस्तुएं तो जीव के केवल पुर्व जन्मों के संचित कर्मों जिसे प्रारब्ध कहते हैं प्लस इस जन्म के क्रियामान कर्मो से ही मिलता है । 
और अपवाद रूप में कोई सतयुग तथा त्रेता एवं द्वापर आदि के जैसे नियम तथा पुरे विधान से जो कि आज असंभव है, अगर कर भी ले ठीक ठीक तो उसके कुछ पिछले संचित पाप आदि धुल सकते हैं लेकिन जीव का उद्धार नहीं हो सकता , क्योंकि जीव के अनंत जन्मों के पाप की गठरी उसके माथे पर है । इन सबका क्षय इन सबसे नहीं हो सकता जब तक जीव के पंचकोष , पंचक्लेश , त्रिविध ताप आदि पुरी तरह भस्म न हो जाए ।
और जहां तक आध्यात्मिक लाभ एवं मन बुद्धि चित्त अहंकार, साधन चातुष्ट्य आदि कि शूद्धि आदि कि बात है तो यह केवल मन से भगवान तथा योग्य गुरू कि निरंतर तथा अनन्य भक्ति , पुर्ण शरणागति एवं साधना से हीं संभव है वरना कलयुग में कोई अन्य साधन फलदायी नहीं है । 
:- गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज द्वारा प्राप्त सिद्धांत ज्ञान से । श्री राधे ।

Tuesday, 20 August 2024

गुरू द्वारा प्राप्त वैदिक सिद्धांतो तथा तत्वज्ञान से अपने मन पर कंट्रोल तथा विजय हासिल करने का अभ्यास हमें हर रोज करना होगा, और यह अभ्यास एकांत में हरि गुरू के रूपध्यान साधना से हीं संभव है अन्यथा मानवीय चंचल मन कि उच्छृंखलता कभी दूर नहीं हो सकती ।

पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी :- अपने गुरू द्वारा प्राप्त वैदिक सिद्धांतो तथा तत्वज्ञान से अपने मन पर कंट्रोल तथा विजय हासिल करने का अभ्यास हमें हर रोज करना होगा, और यह अभ्यास एकांत में हरि गुरू के रूपध्यान साधना से हीं संभव है अन्यथा मानवीय चंचल मन कि उच्छृंखलता कभी दूर नहीं हो सकती । 

 उच्छृंखल मन हमेशा उदंडता करता रहेगा तथा यह तर्क , कुतर्क , वितर्क एवं अति तर्क में हीं उलझा रहेगा हमेशा और यही उदंड मन जीवन के हर क्षेत्र में असफलता का सबसे बड़ा कारण है । एक उच्छृंखल मन मनुष्य का पतन करा देता है । उच्छृंखल मन मनुष्य को अपने लक्ष्य पर कभी पहुंचने नहीं दे सकता है ।
अनेक बिचारों का प्रवाह यह मानवीय मन जीव के आत्मशक्ति को छिन्न-भिन्न करके रखता हैं जिस कारण यह मन किसी भी शुभ कर्म में केंद्रित नहीं हो सकता । 

इसलिए मन को ध्यान ( Meditation ) द्वारा "साधना" होगा । एकांत रूपध्यान साधना के द्वारा मन को दिव्य शक्ति यथा ज्ञान शक्ति के मूल स्रोत हरिगुरू में जमाना होगा, केंद्रित करना होगा । रूपध्यान साधना द्वारा इसको नियोजित करने की कला सिखनी होगी । मन को अनावश्यक बिषयों के चिंतन , चिंता तथा नकारात्मक बिचारो के प्रवाह से हटाने कि क्रिया को मन का निग्रह कहते हैं, दुसरे शब्दों में चित्त का मार्जन करना भी इसी क्रिया को कहते हैं तथा इसे हरिगुरू द्वारा दिया ज्ञान एवं सकारात्मक चिंतन में लगा कर दिव्य गुणों को ग्रहण के क्रिया को परिग्रहण कहते हैं । 

मन को अनेको अनुपयोगी बिषयों के चिंतन से हटाकर किसी एक परम उपयोगी तथा कल्याणकारी बिषय में लगाने की कला को मन को नियोजन करना कहते हैं । इंग्लिश में इसे Mind Management कहते हैं । 

अनियोजित मन अज्ञानता के कारण अनादि काल से अनित्य को हीं नित्य मान बैठा है , यह अपने शरीर तथा इस संसार को ही नित्य मान बैठा है , अत: यह सदा से अविद्या माया का शिकार है । इसी अविद्या माया के कारण जीव का मन भ्रम , प्रमाद , विप्रलिप्सा तथा कर्णपाटव जैसे मानसिक रोगों से ग्रसित है । 

यही अविद्या माया अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश का भी मुख्य कारण है । और यही पांचों अवगुण जीव के मन को चिंता तथा भय से ग्रसित कर रखा है । 
जब तक मनुष्य का मन इनसे मुक्त नहीं होगा तब तक जीव अपने लक्ष्य को कभी हासिल नहीं कर सकता । 
जब तक मनुष्य का मन स्थिर नहीं होगा, जीव हमेशा अशांत रहेगा , दुखी रहेगा , हताशा तथा निराशा का शिकार रहेगा चाहे वो कितना भी अनित्य संसाधनो को अपने लिए जमा करके रख ले ।
जब तक जीव अपने मन के अनंत शक्तियों को नियंत्रित करने का कला नहीं सिखेगा तब तक मनुष्य का पंचकोष भष्म नहीं हो सकता , और जब तक पंचकोष भष्म नहीं होगा, जीव पर त्रिताप तथा पंचक्लेश हमेशा हावी रहेगा और जीव दुखी हीं रहेगा , चाहे वो कितना भी धन , जन वैभव तथा अन्य अनित्य भौतिक बस्तूओं को इकट्ठा कर लें । 

आज कलयुग में भगवान तथा गुरू कि भक्ति तथा उनकी बतलाई साधना ही एक मात्र ऐसा साधन है जिससे जीव अपने मन को अपने वश में कर सकता है दुसरा कोई अन्य साधन नहीं है, क्योंकि अनादि काल से संसार में हीं आवागमन के कारण चतुर्युगी युग चक्र के अंतिम युग कलयुग में जीव का मन इतना उच्छृंखल हो चुका है कि वो अंधविश्वास तथा रूढ़िवादिता को ही कर्म तथा धर्म एवं ज्ञान समझ बैठा है । 
अत: कलयुग में जीव कर्म धर्म एवं ज्ञान के मूल स्वरूप को समझने में असमर्थ है । 
यही वजह है कि जीव आज कर्म धर्म के रूप में जो भी कर रहा है वो निष्फल होता जा रहा है चाहे वो पुजा पाठ हो , जप, तप, व्रत, उपवास तीर्थ, विर्थ, हवन या कोई भी अन्य कर्म कांड क्यों न हो । 

अत: कलयुग में केवल भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ तथा कल्याणकारी है, लेकिन अफसोस कि आज कलयुग में अधिकतर लोग भक्ति के मूल स्वरूप तथा वास्तविक अर्थ को भी नहीं जानते। 

इस कलयुग के परमाचार्य पंचम मौलिक जगद्गुरूत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु ने भक्ति कि जो परिभाषा कि है तथा भक्ति के जिस मार्ग को प्रशस्त किया है जीव केवल उसी को अपना कर अपने जीवन को सफल बना सकता है अन्यथा इस कलयुग में अन्य कोई मार्ग सक्षम नहीं है । अन्य सभी मार्ग भ्रम में डालने वाले हैं तथा मानसिक रोग को और भी बढ़ाने वाले मार्ग है । श्री राधे ।