Tuesday, 30 December 2025

"सिर गिरे सजदे में , दिल में दगाबाजी हो, ऐसे सजदों से भला कैसे खुदा राजी हो ? "

"सिर गिरे सजदे में , दिल में दगाबाजी हो, चोरी और बेईमानी हो , 
ऐसे सजदों से भला कैसे कोई वास्तविक संत व खुदा राजी हो ? " 

भारत में लगभग हम 90% लोग चोर है , भ्रष्ट है। 
सौ में से नब्बे बेइमान फिर भी मेरा देश महान। 
गमला चोरी करने वाला गरीब नहीं , अच्छा खासा मध्यम तथा उच्च वर्गीय परिवार के लोग है । चाहे वो जी 20 में मर्सिडीज कार में आकर गमला चोरी करता है या स्कूटी से आकर संभ्रांत परिवार कि महीला । चोर सब है और दोष देता है कि हमारे देश का नेता चोर है भ्रष्ट है , व्यवस्था चोर और भ्रष्ट है । अरे सबसे पहले हम तुम चोर हो , जहां मौका मिलता है चोरी करने से हम नहीं चुकते । और जिसको मौका नहीं मिलता वो कहता है हम इमानदार है । जिस देश का अधिकांश जनता चोर हो भ्रष्ट हो उसका नेता तो चोर तथा भ्रष्ट होगा ही । 
गलती नेता का नहीं गलती हमारी है । एक चोर , एक भ्रष्ट तो स्वाभाविक है चोर तथा भ्रष्ट को ही चुनेगा । 
एक लाख गदहा मिलके मैजूरिट से किसी गदहे को ही तो नेता चुनेगा जो स्वाभाविक है । और वो चुना गया नेता भी गदहा ही रहेगा , चुनने के बाद घोड़ा तो कभी नहीं बन सकता । 

इसलिए पहले स्वयं को ठीक करना होगा । 
इमानदारी, नैतिकता, संस्कार , दिव्य गुण किताबों में नहीं मिलता । शब्दों से नहीं होता । 
यह होता है वास्तविक गुरू के बतलाए मार्ग पर चल कर । 
इसलिए दुसरे को चोर तथा भ्रष्ट कहना बंद कर दो, जब तक हमारे तुम्हारे संस्कार में भ्रष्ट बेईमान तथा चोर मन बैठा है दुसरे को चोर मत कहो । 

स्वयं को ठीक करो । भगवान को समझो , वास्तविक संत को ठीक से समझो और खूद को बदलो, वर्णा नरक का द्वार तो खुला है हमारे तुम्हारे लिए । मानव जीवन समाप्त होने के बाद कुत्ते बिल्ली के यौनियो में हमें भेज दिया जाएगा । 
मंदीर में घंटा डोलाना काम नहीं आएगा । और न घंटा डोलाने से भाग्य अच्छा होगा । वल्कि और रसातल में जाओगे । 
भगवान को , संत को मानने कि जगह उनकी मानो , यानि उनके बातों को , उनकी शिक्षा को , उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारो , यही पुजा है , यही भक्ति है । 

वर्णा पीपल के पेड़ के निचे अगरबत्ती तथा दीपक जलाने से शनी देव प्रसन्न नहीं होंगे , वो बुरे कर्मों के फल के रूप में और कड़ा दंड देते हैं और न मंदीर में दीपक जलाने से कोई देवता प्रसन्न होंगे । भगवान तथा वास्तविक संत घुसखोर नहीं होते । वो बाहरी आडंबर तथा पाखंड से कभी खुश नहीं होते , वो मन तथा अंत:करण के गंदगी को देखते हैं , जब तक वो शूद्ध नहीं होगा , तब तक राम राम श्याम श्याम भजन किर्तन आदि से कोई लाभ नहीं होगा । 
अपने मन के गंदगी , अपने अंत:करण के गंदगी को , अपनी ग़लती , अपने द्वारा किए गए अनंत जन्मों के पापों को स्वीकार करके जब तक हम भगवान तथा अपने गुरू के प्रति अपने आंतरिक मन से निरंतर शरणागत होकर इसे शूद्ध करने के लिए व्याकुलता के साथ एकांत में इमानदारी की आंसुओ के साथ पुकारेंगे नहीं और आगे कोई भी गलती तथा पाप न करने का शपथ नहीं लेंगे तब तक न भगवान खुश होंगे और न वास्तविक संत , चाहे कितना भी भक्ति , पुजा पाठ , जप तप , उपवास, तिरथ विरथ करते रहो ,कोई फायदा नहीं होगा । 

इस पाखंड से भगवान और अधिक कुपित होते हैं , संत अंदर से दुखी होते हैं अपने अनुयायियों से । 
जब वास्तविक संत चले जाते हैं तो सभी संस्था का पतन देखा गया है इस संसार में , भाषण देने वाला , प्रवचन का व्यापार करने वाला स्वयं अंदर से कैसा है क्या है यह महत्वपूर्ण है । क्योंकि संस्था चलाने वाला मायाबद्ध जीव बचता है संत के जाने के बाद और वो धीरे धीरे जीव को आडंबर , भक्ति का दिखावा, नाटक नौटंकी को संस्था का नया सिद्धांत अपने मन से बना कर पेश करता है । ऐसे चालबाजों से बच कर रहना होगा । 
हम अपने गुरू के अनुयाई हैं , ऐसे चालबाजों के नहीं । अगर डूबना है भवसागर में तो ऐसे निति निर्धारक तथा चाल बाजों से दूर रहो । तथा केवल अपने गुरू के सिद्धांतों पर चलो । 
अगर ऐसा चालबाज हमको तुमको गुरू तथा भगवान के नाम पर डर दिखाने का कोशीश करता है , तो खिसक जाओ वहां से । डरो मत । 
हम अपने गुरू तथा ईष्ट के शरणागत है इनके नहीं । 
हमारे गुरूदेव ने स्वयं जिस शिक्षक यानि प्रचारकों को हमारे लिए नियुक्त किया है , हमें सही दिशा दिखाने के लिए हम उसी शिक्षक का बात मानेंगे । दुसरे किसी अन्य का कभी नहीं चाहे वो भगवान का पुत्र ही क्यों न हो । 
अगर कोई शिक्षक श्री महाराज जी के सिद्धांतों से भटकाता है तो हम उनका भी बात नहीं मानेंगे । 

भगवान तथा वास्तविक संत हमारे तुम्हारे मन के अंदर के दूषित सोच , अहंकार तथा भ्रष्ट बुद्धि के स्थिति को हमसे तुससे अधिक अच्छी तरह से जानते हैं कि हम तुम कितना शुद्ध है ।‌

जब तक चरित्र नहीं बदलेगा । जब तक संस्कार बढ़िया नहीं होगा , जब तक सोच तथा दृष्टिकोण नहीं अच्छा होगा तब तक दुख रहेगा , डिप्रेशन रहेगा, हर काम में बाधा आएगा । संसारिक सुख भी नसीब नहीं होगा , भगवदिए आनंद तथा सुख पाना‌ तो असंभव ही रहेगा । 

श्री महाराज जी भी यही बातें कहे है संप्रदाय बना कर नाटक करने तथा व्यापार करने वालो के लिए । हमारे गुरू देव श्री महाराज जी भी यही बात कहे है अलग शब्दों में । 
व्यक्ति विशेष में न जाकर इनकी कहीं हुई कटु सच्चाई के एक एक लाईन को अगर ध्यान से सुनें और फिर श्री महाराज जी के बतलाई सिद्धांतों का पालन करें तो लाभ सुनिश्चित है । :- संजीव ।

https://youtu.be/leUj8BZ1kPM?si=6SV_dN2nYXdEx5VT

इस लिंक को क्लिक करके सत्य सुन लो , कौन बोल रहा है यह मत देखो । क्या बता रहा है यह सुनो और सत्य से रू-ब-रू होओ और खुद को ठीक करो ।

हमें अपने आध्यात्मिक गुरू से प्रेरणा लेकर स्वयं को बदलने पर बल देना चाहिए।

उच्च शिक्षा , पढ़ाई लिखाई , तकनिकी विकास, भौतिक उन्नति, आर्थिक उन्नति, उत्तम से उत्तम भौतिक शिक्षा से, केवल बातें आदि बनाने से भाषण देने से उत्तम चरित्र , आदर्श व्यक्तित्व, शान्ति पसंद मनुष्य, ईमानदार , कर्तव्यनिष्ठ तथा न्यायप्रिय व्यक्तित्व का निर्माण कभी नहीं हो सकता तबतक, जबतक मनुष्य के अंदर सही सही अध्यात्मिक ज्ञान का समावेश न हो । 

आज हम सब देख रहे हैं जो देश उन्नत है जो देश तकनिकी रूप से सबसे अधिक विकसित है, जिस देश में सबसे अधिक पढ़ें लिखे लोग हैं, हर तरह से तकनिकी विकास, आर्थिक विकास आदि से लैश है वहां उतनी ही अधिक अशांति है, व्यभिचार है , लड़ाई झगड़ा है , भ्रष्टाचार है, युद्ध है , क्राईम है । आज विकसित देश के काफी पढ़ें लिखे नेतागण तथा लोग असुरों कि भांति व्यवहार कर रहे हैं, आसुरी बात करते पाए जा रहे हैं , तर्क कुतर्क , अतितर्क एवं अतिश्योक्ति का भरमार है उनके बातों में सोंच में , एक दुसरे देश पर बम बरसा रहे हैं, राकेट दाग रहे हैं । निर्दोष लोगों कि हत्या कि जा रही हैं, दुनिया को नर्क बनाने में अथाह धन खर्च किए जा रहे हैं । 

चारों तरफ युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं, युद्ध पर युद्ध हो रहे हैं बरसों से , लोग उन्मादी तथा पागलपन के हद को पार कर चुके हैं , परमाणु बम, हाईड्रोजन बम , तरह तरह के आयुध सामग्री विकसित किए जा रहे हैं , हथियारों कि होड़ लगी हुई है । एक दिन यह दुनिया अवश्य ही अपने ही भौतिक उन्नति, उच्च भौतिक शिक्षा तथा तकनिकी विकास रूपी काल का ग्रास बनने कि दिशा में अग्रसर है । धरती रहने लायक नहीं बचेगी । हमारी पृथ्वी दुसरा मंगल ग्रह बनने वाला है , यह दिन दुर नहीं है ।

 अत: ऐसे समय में इस घोर कलयुग में जो मनुष्य समझदार हैं वो पंचम मूल जगद्गुरूतमई श्री कृपालुजी महाराज जैसे उच्चतम कोटि के श्रोत्रिए एवं ब्रह्मनिष्ठ वास्तविक संत , भगवद् अवतार महापुरूष को अपना गुरू मान कर , उनके द्वारा दिए गए शिक्षा को आत्मसात करके , उनका शरणागति करते हुए अपने खाली समय का एक एक सेकेंड का भरपुर सदुपयोग करके उनके बतलाए मार्ग का अनुसरण करके अपने परम कल्याण के मार्ग पर अग्रसर है।  

और जो जो ना समझदार है वो अपने समय को लोक रंजन , सोसल मीडिया में , इधर उधर गप करने में अपने समय को बर्बाद करने में लगे हैं । इन सबसे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है , अरे जिसको भगवान के अनेकों अवतार नहीं समझा सके , जिसको बड़े से बड़ा वास्तविक मूल जगद्गुरू नहीं समझा सके इस दुनियां में उसको भला हम आप कैसे समझा लेगें ? 

हमें स्वयं के निर्माण पर फोकस करना चाहिए। हमें अपने समय को स्वयं के आध्यात्मिक उत्थान उपलब्धि तथा आध्यात्मिक कल्याण में खर्च करना चाहिए । हमें अधिक से अधिक एकांत साधना करके अपना बिगड़ी बनाने में अधिक से अधिक समय तथा उर्जा खर्च करना चाहिए। 

हम साधक लोग साधना करने के बजाए अपना किमती समय तथा इनर्जी यूं हीं फजूल के काम में तथा दुसरो को समझाने में लगा रहें हैं । हम स्वयं का निर्माण न करके दुसरे को समझाने में लगे हैं । 
दुसरा तो कभी नहीं समझेगा, लोग लिखित पोस्ट भी नहीं पढ़ते ठीक से, आत्मसात करने कि बात तो काफी दूर कि कौड़ी है । दुसरा हमको काम नहीं देने वाला यह तय है , हमारा अपना भी लूट रहा है दुसरो को समझाने के चक्कर में और दुसरे पर भी कोई असर नहीं । 

अरे जब हम पर ही असर नहीं श्री महाराज जी के तत्वज्ञान का तो दुसरे को हम क्या खाक समझा लेंगे ? यह तो हास्यास्पद बाला बात तथा व्यवहार के सीवा कुछ भी नहीं । यह सब लोक रंजन है ।

 लोक रंजन को हीं हम साधना , सेवा तथा भक्ति समझ बैठे हैं । हम भ्रम में जी रहे हैं । इस तरह हम आत्मघाती है , हमारी बर्बादी सुनिश्चित है । 
दुसरो के जगह खुद के निर्माण पर हमें ध्यान देना चाहिए , अब अधिक समय नहीं है हमारे पास , जीवन ऊर्जा छीन हो रही है , उम्र बिता जा रहा है ,‌ काल घात लगाए बैठा है , यमदूत घसीटने के लिए तैयार बैठा है । इससे पहले कि हम यमदूत द्वारा घसीटे जाए , चौरासी लाख के चक्कर में फिर से भेज दिए जाएं , हमें अपना समय नष्ट न करके आत्मकेंद्रित होकर हमें आत्मनिर्माण कर लेना चाहिए ताकि कम से कम दुसरा जीवन मानव शरीर में हीं मिले और हम आगे कि साधना करके गोलोक में अपना स्थान सुनिश्चित कर लें । इसलिए हमें खुद कि जय करने में समय खर्च करना चाहिए। 
"दुसरो कि जय से पहले खुद कि जय करें " 
:- संजीव कुमार।

Sunday, 14 December 2025

कलयुग जैसे जैसे बीतेगी अपना प्रभाव इस प्रकार दिखलाएगी

सुत जी ने कलयुग में होने वाले घटनाओं का जो जिक्र किया उसका भावार्थ :- 
कलयुग जैसे जैसे बीतेगी अपना प्रभाव इस प्रकार दिखलाएगी :- 

हां एक बात अवश्य होगी सभी वास्तविक तथा सच्चे धर्मनिष्ठ तथा भगवद् भक्त , वास्तविक संतों में आस्था रखने वाले जीवात्मा अपने ईष्ट और गुरू के लोक में निवास करने चले जाएंगे , उनको कलयुग के ताप से मुक्ति पहले ही मिल जाएगी । जो हमारे गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज या कुछ वर्तमान वास्तविक संतों के प्रति पूर्ण रूप से आस्थावान होंगे, श्रद्धावान होंगे , वे सभी मनुष्य इन घोर कलयुग के लक्षण के प्रकट होने से पहले दिव्य लोक , अपने गुरू के लोक चले जाएंगे, लेकिन जो दुष्ट प्रकृति के होंगे, उनको कलयूग का प्रभाव झेलने के लिए कलयुग में कई कई बार जन्म लेना होगा और इन कठीन पीड़ा से बार बार मरना होगा, गुजड़ना होगा यह एक अटूट सत्य है । 

1. कलयुग में मनुष्य का आत्मबल गिरने लगेगा । लोग आलसी , भोगी तथा अति विलाशी होंगे । 

2. मनुष्य झूठ पर भरोसा करेंगे और सच को स्वीकार करने से परहेज़ करेंगे । सच पर ऊंगली उठाएंगे और झूठ को गले लगायेंगे । सही रास्ता दिखाने सत्य बोलने वाला , सन्मार्ग का बात करने वाला कटु प्रतित होगा , दुश्मन कि तरह नजर आएगा और गलत मार्ग पर ले जाने वाले का लोग संगति करेंगे । गलत लोगों को लोग अपना आदर्श मानेगें , नेता मानेंगे । जो जितना चिल्लाएगा , चीख चीख कर बातें करेगा वो उतना पसंद किया जाएगा । 

3. मानव समाज , परिवार में आपसी सहयोग तथा संबंध का आभाव होगा । परिवारिक रिस्तों का कोई अहमियत नहीं होगा , झूठ , बनावट , छल , प्रपंच , इर्ष्या द्वेष से लोगों का मन भरा परा होगा । वाणी में सौम्यता के जगह जहरीले व्यंग होंगे । 

4. मनुष्य का कद काठी बौना होता जाएगा । स्त्री स्त्री से और पुरूष पुरूष से अप्राकृतिक तथा अमर्यादित व्यवहार तथा यौनाचार करेंगे । पुरूष से पुरूषत्व एवं नारी से नारित्व समाप्त हो जाएंगे । वेश्याएं पुजी जाएगीं , उनका मंदिर बनेगा । अंग प्रदर्शन स्टेटस सिंबल बन जाएगा । असली देवी देवताओं का मंदिर खंडित होंगे । जुआ शराब सम्मान का बिषय होगा । मानवीय अंगों का तस्करी तथा व्यापार होगा । 

5. मानवों में आसुरी वृत्ति का लक्षण उत्तरोत्तर दृष्टिगोचर होंगें , जो जितना झूठ बोलेगा , जितना कुकर्म करेगा , अमर्यादित तथा अमानवीय व्यवहार करेगा उसका उतना बड़ा नाम होगा । समाज में पद होगा । 

6. धन के लिए पिता पुत्र का तथा पुत्र पिता का , भाई बहन का तथा बहन भाई का , पति पत्नी का तथा पत्नी पति को धोखा देगा, मर्डर करेगा । एक स्त्री का अनेकों से संबंध होगा उसी प्रकार एक पुरूष का अनेकों से शारीरिक संबंध होगा , यहां तक कि जानवर तक से ।

7. फर्जी साधुओं का लोग चरण चुमेंगे और हाथ कि सफाई बाले बाबाओं के द्वारा दिखलाए गए चमत्कार को नमस्कार करेगे । उनके यहां कड़ोरो कि भीड़ होगी और वास्तविक संतों को शंका के दृष्टि से लोग देखेंगे । वास्तविक संतों का अपमान होगा । शास्त्रों का अपमान होगा और फर्जी तथा बात बनाने बाले साधुओं के यहां , चमत्कार दिखाकर लोगों को ठगने बाले बाबाओं के यहां लोग जाकर खूद को आध्यात्मिक दिखने तथा होने का दावा करेंगे । 

8. हर खाने कि बस्तू दूषित तथा मिलावटी होगा । खान पान जहरीली लेकिन आकर्षक दिखेंगी । नए नए लेकिन जहरीले पकवानों का अविष्कार होगा । अधिकांश लोग मांसाहारी होंगे , मानव का भी मांस पका कर खाएंगे । घरों में रसोई घर तथा स्नान घर नहीं होंगे , भोजन तथा जल के लिए एजेंसी होगी । स्नान के लिए वाशिंग मशीन के तरह वाथ मशीन होगा । 

9. मानव शरीर एक से अधिक रोगो का घर होगा , दवा के नाम पर जहर और बैद् के नाम पर डकैत डाक्टर होगा । 

10. लोगों की याद्दाश्त शक्ति अति अल्प होगी , मनुष्य मनुष्य से दूर तथा जानवरों के साथ एक ही विस्तर पर सोयेगे । 

11. कलयुग में इंसान से इंसानियत गायब होती चली जाएगी , मनुष्य से मानवता समाप्त होती जाएगी लोग वहशी होंगें । साधुओं में साधुता नहीं होगी या दिखावटी होगी । देश धर्म , राष्ट्र धर्म निभाने वालों का आभाव होगा । धर्म , न्याय नीति , नैतिकता पर धन हावी होगा । अधिकतर धार्मिक संस्थानों में धन वाले का सम्मान होगा और निर्धनों का प्रवेश वर्जित होगा । इन्हें भंगी समझा जाएगा । 

12. कलयुग में धर्म कर्म के नाम पर कुकर्म होगा । तीर्थ में व्यभिचार होंगे , यौनाचार होंगे । 

13. निति, नैतिकता न्याय का कोई जगह नहीं होगी । 

14. फुलों से खुशबू , मसालों से उसका स्वाद , औषधी से उसका औषधीय गुण , यानि रोग निरोधक प्रभाव समाप्त होते चला जाएगा । 

15. अनेक नए नए रोग उत्पन्न होगा जो लोगों को काल के मुख में भेजेगा । 

16. खेत से उपजाऊपन , अन्न से अन्नरस , वृक्षों से फल देने कि क्षमता , गाए से दुध, उत्पादन कि क्षमता समाप्त होने लगेगी । 

17. तरह तरह के विध्वंशक विनाशकारी हथियार का निर्माण होगा जो स्वयं के विनाश का कारण होगा । 

18. अति वृष्टि, अनावृष्टि, जलजला , भयानक से भयानक तुफान , भयानक बाढ़ तथा सुनामी जल्द जल्द उत्पन्न होगा । पहाड़ दड़कने लगेगा , वर्फ का पहाड़ तेजी से पिघलने लगेगा । रेगिस्तान का क्षेत्रफल बढ़ने लगेगा । दिन का समय छोटा होगा , रातें बड़ी होंगी । 

19. मशीन में बच्चे पैदा होंगे , गर्भ धारण करना एक इतिहास बन जाएगा । 
विचार विवेक बुद्धि हीन बच्चे पैदा होंगे , उनका दिमाग मशीनी होगा जो भावनात्मक शून्य होंगे , संस्कार , चरित्र आदि शब्द लुप्त हो जाएंगे । बच्चा जो अपने पैर पर खड़े होते ही मां वाप को पशुओं के तरह छोड़ कर अलग हो जाएंगे हमेशा के लिए । 

20. वाइलोजिकल जरूरत जैसे सेक्स , नींद , सांसें तथा भोजन आदि को मशीन से पुरा करेंगे , लोग संवेदनहीन होंगे ।

21. मनोरंजन के विशुद्ध साधन के जगह लोग अमार्यादित नृत्य संगीत , तथा नाटक से अपना रंजन करेंगे । 

22. असली नकली का पहचान लोगों को नहीं होगा । कलयूग का दस हजार सात सौ साल वितने के साथ हीं मानव सभ्यता लुप्त हो जाएगा, पर ग्रही जीवों का आक्रमण होगा , सबकुछ तहस नहस हो जाएगा पृथ्वी पर । पृथ्वी पर केवल भोग योनि के जीव कीट पतंग तथा जानवरों का शासन होगा , सभी अधर्मी मानव जानवर शरीर में जन्म लेंगे कर्म भोग के लिए , ये जानवर कुछ कुछ मनुष्य कि तरह दिखेंगे । पृथ्वी पर जानवरों का शासन चार लाख तिरेपन हजार तीन सौ बर्ष तक रहेगा , उसके बाद पृथ्वी समाप्त । 

23. रिस्तों में वाणी कि मधुरता के जगह कर्कशता का समावेश होगा । दर्पण झूठ बोलेगी । 

24. वेद शास्त्र, असली संत , फल तथा छाया प्रदान करने वाले बृक्ष एवं निर्मल सरिता नदी तालाब लूप्त हो जाएंगे । शास्त्रों को तोड मोड़ कर पेश करेंगे बहुरूपिए पंडित । बड़ी संख्या में ब्राह्मण मांस भक्षि होंगे । चंडाल प्रवचन करेंगे । अधिकतर ब्राह्मण उसका चरण धोकर पिएंगे , उनको अपना आदर्श मानेगें । शास्त्रों के नाम पर चंडाल मिथ्या प्रवचन करेंगे । 

25. लोग या तो जमीन के निचे चुहे कि तरह या गगन चुंबी इमारत में कबुतर के भांति निवास करेंगे और सर्दी एवं गर्मी से उम्र कमतर होगी । शरीर दुर्बल होगी । लोग हवा में उड़ेंगे । 

अंत में ब्रह्मांड कि गति अनियमित तथा अनियंत्रित हो जाएगी एवं एक भयानक विस्फोट होगा ब्रह्मांड में , ग्रह से ग्रह टकराएंगे और सृष्टि का महाप्रलय होगा । 

हां एक बात अवश्य होगी सभी वास्तविक तथा सच्चे धर्मनिष्ठ तथा भगवद् भक्त , वास्तविक संतों में आस्था रखने वाले जीवात्मा अपने ईष्ट और गुरू के लोक में निवास करने चले जाएंगे कल्युग के प्रारंभिक अवस्था में ही , उनको कलयुग के इन तापों से , घटनाओं से मुक्ति पहले ही मिल जाएगी ।
:- सोर्स - पद्म पुराण , गरूड़ पुराण एवं भविष्य पुराण । 
यह सभी बातें सत् प्रतिसत होके रहेगी । कुछ कुछ दिखने भी लगा है आजकल । 
:- संजीव कुमार ।

जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मुरत देखी तिन तैसी

इस संसार में भगवान राम भी मनुष्य के जैसा प्राकृत शरीर के धारण करके आए , कृष्ण भी आए, अनेक अवतार हुआ भगवान का नर रूप में ।  

 मूल जगद्गुरू के रूप में वही भगवान श्री कृष्ण आए प्राकृत शरीर धारण करके जीव कल्याण हेतु , अपने अनुग्रहित श्रद्धावान मनुष्य का उद्धार करने हेतु । अनेकों जीवों का कल्याण हुआ , वो इस संसार के आवागमन से छुट गए । और आज भी श्रद्धालु जीवो का कल्याण लगातार हो रहा है अंदर ही अंदर । आज भी अपने गुरू के कृपा से अनन्य शिष्यों के आंतरिक स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है , अनेकों का अंत:करण शुद्ध हो रहा है तथा लक्ष्य कि प्राप्ति भी गुप्त रूप से निरंतर हो रहा है अंदर ही अंदर , जिसको वो शिष्य हीं समझता है तथा गुरूदेव एवं ईष्ट जानते हैं किसका अंत:करण कितना शुद्ध हुआ है , कितना लाभ हुआ है ? बाहरी मनुष्य भला क्या समझेगा ? वो तो बेचारा स्वयं के हाल के जैसा हीं दुसरे को समझेगा । जैसा उसका चश्मा है, जैसा उसका अंत:करण है वैसा ही उसे दुसरा भी दिखाई देता है । क्या समझेगा बेचारा वो ? ऐसे लोग दया के पात्र हैं । 

इसलिए तुलसीदास ने लिखा है रामचरितमानस में :- " जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मुरत देखी तिन तैसी "

अरे भगवान तथा वास्तविक महापुरूष को कोई जीव उनके कृपा के बिना कैसे समझ सकता है भला , बेचारे कृपा का पात्र ही नहीं है ? 

राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई।।
जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।। 

जब भगवान गुरू बन कर आए तो उस समय भी बहुत श्रद्धालु भावुक जीव उनको भगवान माना , तत्वदर्शी उस परमतत्व को पहचाना , उनके प्राकृत शरीर के अंदर छुपे दिव्य स्वरूप को देखा , पहचाना और खुले दिल से घोषणा कि ए मनुष्यों ये साक्षात भगवान है धरती पर गुरू रूप में आएं हैं , जो जो जीव अपना कल्याण चाहते हो वो इनको अपना गुरू मानकर इनका दर्शन , सेवा तथा भक्ति कर सकते हैं तथा इनके बतलाए मार्ग का अनुसरण करके भगवान के लोक परम धाम प्राप्त करके इस संसार के आवागमन से मुक्त हो सकते हैं, अपना परम कल्याण कर सकते हो । 

लेकिन जो मनुष्य अपने क्षूद्र ज्ञान के पराकाष्ठा पर थे और आज भी है वो सभी उनको साधारण मनुष्य ही समझा । आज भी ऐसे क्षूद्र मनुष्यों कि कमी नहीं है इस संसार में , वल्कि ऐसे नीच लोगों कि संख्या अधिक है आजकल । 

तुलसीदास जी ने ऐसे लोगो के लिए कहा है :- 
"जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ। 
सो कृतघ्न मंदमति आत्माहन गति जाइ॥"

तुलसीदास जी के इस चौपाई का भावार्थ इस प्रकार है :- वे कहते है कि ऐसे क्षूद्र लोगों को उसके हाल पर छोड़ देना हीं उत्तम है , ऐसे श्रद्धाहीन लोगों का मुंह कभी नहीं लगना चाहिए और न ऐसे जीवों के साथ बहस करना चाहिए कभी । ऐसे अधम दुराचारी आत्महंता जीव के किसी भी बात का कोई उत्तर कभी नहीं देना चाहिए। और सबसे विशेष बात कि ऐसे बेचारे लोगों के साथ न कोई दुर्भावना रखना चाहिए और न राग , न द्वेष। ऐसे लोगो से विल्कूल उदासीन रहना चाहिए । 

हमारे ईष्ट भगवान श्री कृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय के चालिसवे श्लोक में स्पष्ट कहा :- 

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।4.40।। गीता ।
 
इस श्लोक का भावार्थ इस प्रकार है :- 
इस संसार में तीन प्रकार का मनुष्य है , एक वो जो अज्ञ है यानि महान मुर्ख है, चपाट है ,‌नास्तिक है जो भगवान उगवान नहीं मानता , वो स्वयं को ही भगवान मानता है । 

दुसरा वो जो किसी तत्वदर्शी के द्वारा बताए जाने पर भी , सब सुनने समझने के बाद भी श्रद्धाहीन है, अविश्वासी है ।उसका मन मानने के लिए तैयार नहीं । 

तीसरा वो जो तत्वज्ञान सुनने समझने के बाबजूद कभी तो मानता है पर कभी नहीं मानता , उपर के दो प्रकार के लोगों के बातों में आकर , प्रभाव में आकर उसका विश्वास डगमगाते रहता है , ऐसे लोगों का ढुलमुल रवैया होता है , विल्कूल शंकालु प्रवृति । 

तो इस तीनों प्रकार के मनुष्य के बारे में भगवान कहते हैं इसी श्लोक के दुसरे पंक्ति में कि ऐसे संशयात्मा को न तो इस लोक यानि इस संसार में कभी सुख और आनंद नसीब हो सकता है और न कभी परलोक में । यानि स्वर्ग के सुख कि तो ऐसा नीच मनुष्य , शंकालु मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता है । तो ऐसे जीवों का क्या हर्ष होता है ? तो ऐसे मनुष्य का पतन हो जाता है करोड़ो कल्पों तक के लिए , और पतन भी ऐसा वैसा नहीं ! ऐसे मनुष्य को अगले अरबों जन्म तक तिर्यक योनियों यानि कुत्ता बिल्ली , नाली का कीड़ा मकोड़ा आदि योनियों में भगवान के द्वारा भेज दिया जाता है । यह भगवान श्री कृष्ण द्वारा गीता में इस श्लोक के माध्यम से खुल्लमखुल्ला उद्घोष है । श्री राधे :- संजीव कुमार।

ईष्ट और गुरू कि कृपा तथा गुरू द्वारा बतलाई साधना करने का परिणाम क्या है , लक्षण क्या हैं फल क्या है ?

ईष्ट और गुरू कि कृपा तथा गुरू द्वारा बतलाई साधना करने का परिणाम क्या है , लक्षण क्या हैं फल क्या है ? 

साधना और गुरू कृपा का परिणाम निम्नलिखित है :- 
1. पहला लक्षण या फल - शास्त्रों का सही सही ज्ञान तथा शास्त्र युक्ति में निपुणता । (यानि तत्वज्ञान पक्का होना तथा तत्वज्ञान का व्यवहारिक उपयोग ) .

2.दुसरा फल - साधक के मन में संसार से Detachment and attachment with GOD and GURU . संसार से वैराग्य तथा हरि गुरू से प्रेम कि उत्तरोत्तर बृद्धि। 
अंत:करण कि शुद्धि जिससे जीवन में संतोष , शांति,भगवद् आनंद का उत्तरोत्तर बृद्धि। 

3. तीसरा - साधक के अंदर सद्गुणों यानि दैविक गुणों का विकास । 

4.चौथा - निम्नलिखित पंचक्लेशों यानि पांचों प्रकार के विपत्तियों का क्रमिक शमन यानि लगातार नाश :- 

A) पहला पंचक्लेश - अविधा माया से मुक्ति यानि साधक के अंदर स्वाभाविक दिव्य ज्ञान कि उत्पत्ति तथा अज्ञानता रूपी अंधकार का नाश एवं विवेक का जागरण । 

B) दुसरा - अस्मिता यानि अहंकार तथा देहाभिमान का स्वाभाविक नाश , तृण से बढ़ कर दीनता तथा वृक्ष से बढ़ कर सहनशिलता यानि सहिष्णुता, नम्रता- विनम्रता आदि गुणों कि उत्पत्ति ।   

C) तीसरा - राग यानि किसी भी मायाबद्ध जीवों से अटैचमेंट यानि आसक्ति का नाश एवं केवल हरि गुरू से राग यानि केवल उनके प्रति ही हृदय में प्रेम कि उत्त्पति। 

D ) चौथा - द्वेष यानि दुसरे किसी भी मायाबद्ध व्यक्ति, विषय तथा वस्तु से घृणा के भाव का आभाव तथा संसार के प्रत्येक जीवों में हमारे ही ईंष्ट विद्यमान है इसका हर क्षण एहसास, अनुभूति। मन में अच्छे विचारों कि स्वाभाविक उत्पत्ति। मन के अंदर सर्वजन हिताय तथा सर्वजन सुखाए भाव कि उत्पत्ति बिना भेद भाव के । 

E) पांचवा- अभिनिवेश यानि मृत्यु के भय से मुक्ति। जीवन में निर्भयता , निश्चिंतता, निडरता का समावेश एवं उदंडता , उद्विग्नता, बेचैनी‌ आदि के भाव कि समाप्ति। संसार का कोई भी सामान मेरा नहीं है , यह नष्ट होने वाला है । समाप्त होने वाला है । यह देह भी अल्प समय के लिए मुझे भगवान के कृपा से मिला है ताकि मैं अपने भगवद् संबंधित लक्ष्य को हासिल कर सकूं । 

तथा इस भाव कि उत्पत्ति एवं अनुभूति कि हरि गुरू हर क्षण हमारे साथ है , मैं एक दिव्य आत्मा हूं , मैं देह नहीं हूं । मैं भी अनादि हूं , शाश्वत हूं , सनातन हूं , अविनाशी हूं , दिव्य हूं , क्योंकि मैं उस दिव्य , अनंत, अनादि , अविनाशी, सर्वसमर्थ, सर्वभूत , सर्वांतर्यामी , सर्वसुहृत, सर्वशक्तिमान, सर्वसुंदर, सर्वगुणों का खान, सत् चित् आनंदकंद भगवान श्री कृष्ण का सनातन अंश हूं । वो मेरे अंशी हैं , वो मेरे सर्वस्व हैं । मेरा सभी रिश्ता नाता केवल उन्हीं से है । हम उनके दास हैं , हम उनके पुत्र हैं , उनके दैविक संपत्ति पर मेरा अधिकार है जिसे देने के लिए वो मुझे अनुग्रहित करने लगे हैं । 

अत: मैं नश्वर , विनाशी , प्रतिक्षण घटने वाला , मिटने वाला , कम होने वाला , समाप्त होने वाले वस्तु , विषय तथा मायाबद्ध जीव से एवं इस संसार से आसक्ति क्यों रखूं ? 
मायाबद्ध विषय वस्तु तथा जीव से आसक्ति रखना ही मेरे दुख का एक मात्र कारण है । 

अत : साधना के फलस्वरूप जब ऐसे भावों का स्वाभाविक जागरण , उदय , उत्त्पति जीव के अंत:करण में होने लगे एवं हरि गुरू के लिए प्रेम का अनुभूति होने लगे तो समझना चाहिए कि हम ठीक ठीक रास्ते पर है, हमारी साधना ठीक चल रही है एवं मेरे उपर मेरे गुरू एवं मेरे एक मात्र ईष्ट श्री राधाकृष्ण कि अपार कृपा बरसने लगी है :- 
संजीव कुमार ।

"जिंदगी भर बस हम एक ही गलती करते रहे , धुल हमारे चेहरे पर थी और हम आइना साफ करते रहे । "

"जिंदगी भर बस हम एक ही गलती करते रहे , 
धुल हमारे चेहरे पर थी और हम आइना साफ करते रहे । " 

हम सभी मायाबद्ध जीव किसी भी दुसरे जीव के अंत:करण का हाल, सच्चाई नहीं जान सकते ठीक तरह से , क्योंकि हम अंतर्यामी नहीं है । 

हम मायाबद्ध जीव केवल अपने दृष्टिकोण से ही दुसरे के बात व्यवहार आदि का आकलन करके अक्सर अपना जजमेंट दे देते हैं जो जरूरी नहीं कि सही हो । जैसा हमारे स्वयं का व्यक्तित्व होता है , अंत:करण होता है , दृष्टिकोण होता है नजरिया होता है वैसा ही हम दुसरे के बारे में आइडिया लगा लेते हैं, जो सबसे बड़ा दोष है हममें । 

हो सकता है दुसरा सही हो सहज रूप से  , इसलिए अगर किसी भी दुसरे व्यक्ति या वस्तु या बिषय में अगर हमें कोई भी पोजिटिव बात नज़र आए तो,  तो हमें पोजीटिव सोच रख कर पौजिटिव आइडिया ही लगाना चाहिए उसके प्रति, न कि prejudice के कारण हम गलत अनुमान लगा कर अपने गलत दृष्टिकोण से गलत निर्णय किसी के बारे में दे दे। हमें जल्दबाजी में किसी दुसरे के लिए जजमेंटल होने से बचना चाहिए। ऐसा बुद्धिमान तथा वास्तविक रूप से पढ़े-लिखे लोगों का पहला लक्षण व निशानी है । 

भगवद् कृपा से , साधना से, अच्छी शिक्षा एवं माता पिता द्वारा दिए गए अच्छे संस्कारों का जब मनुष्य में उदय होता है, तत्पश्चात् जैसे जैसे हमारे खूद का अंत:करण शुद्ध होता है वैसे वैसे हमारा दृष्टिकोण, नजरिया, सोच पौजिटीव होने लगता है, हम किसी दूसरे व्यक्ति तथा वस्तु के बारे में सही सही आईडिया बनाने लगते हैं । बस यही प्रमाण है अंत:करण शुद्धि का , अच्छी शिक्षा तथा अच्छे संस्कारों का । 

हर दुसरे व्यक्ति में जो हमें दोष नजर आता है वो दरअसल हमारे अपने ही चरित्र का चित्रण होता है । भ्रम के कारण  हम अपने अंदर के ही दोष का रिफ्लेक्शन पाते हैं लेकिन हम समझते हैं कि यह दोष दुसरे में है , मेरे में नहीं और हम बहुत साफ सुथरा मनुष्य है । ऐसा हम सभी मायाबद्ध  मनुष्य का वास्तविक हाल है । 

इसलिए एक शेर प्रस्तुत है:- 
जिंदगी भर बस हम एक ही गलती करते रहे , 
धुल हमारे चेहरे पर थी और हम आइना साफ करते रहे । 
श्री राधे :- संजीव कुमार।

दो शब्द हमारे देश के युवाओं से , बच्चों से

दो शब्द हमारे देश के युवाओं से , बच्चों से :- 

पैसे के पीछे हमे नही भागना चाहिए | हमें स्वयं में मानवता के गुणों के विकास पर जोर देना चाहिए | जब गुण विकसित होंगे , तब पैसा हमारे पीछे भागेगी | अगर हम पैसे के पिछे भागेंगें तो पैसा हमसे दुर भागेगी | यह नियम है संसार का । 
 हमे केवल अपने सर्किल औफ इंफुलेंस पर ध्यान देना चाहिए , सर्किल औफ कंसंर्न तो कंसंर्न हीं था और रहेगा | 
पहले पता करो की किस उदेश्य के लिए तुम्हारा जन्म हुआ हैं | क्योंकि विना कारण और उदेश्य का एक पत्ता भी पेड़ से नही गिरता हैं | फिर तुम तो ईश्वर की सर्वश्रेष्ट रचना हो | 
हम क्या अच्छा काम करते हैं यह जरुरी है | हम बदले में क्या पाते हैं यह जरुरी नही | हम क्या समाज को राष्ट्र को देते है यह आवश्यक है | समाज हमे क्या देता है | गाली या सम्मान यह महत्वपूर्ण नही | 
सारे अच्छे काम करो और प्रभु को समर्पित कर दो , क्रेडिट अपने को नही प्रभु को दो , गुरु को दो , कहो हर रात में सोते समय की हे गुरु देव जो भी मैने अच्छा काम किया वो आपकी मेहरवानी से किया | और जो भी बुरा किया मेरी नादानी थी | आप हमें इतनी शक्ति दिजिए की कल कोई बुरा काम हमसे ना हों |
समय की धारा में अपने आपको मत बहाओ , वल्कि समय का भरपुर उपयोग करो , दुरुप्योग नही | 
भगवान ने केवल एक चीज ही सबको समान रुप से दी है वो है समय , भगवान ने 24 घण्टे सब को बराबर दिया है | इसका जो भी जितना सदुप्योग किया है वह सफल हैं | 
उपलब्धि कुछ हांसिल करने में नही हैं | उपलब्धि प्राप्त कर बांटने में हैं | अपने लिय तो हर जीव जी लेता हैं पर दुसरो के लिए जीना हीं सच्ची उपलब्धि हैं | संतोष तब मिलेगा | और जब संतोष मिलेगा तब जीवन सार्थक होगा | 
दुसरे को दिखाने के लिय मत करो | हमको करना है बस इसलिये करों |
 किसी की आलोचना मत करो , आलोचना करने का अधिकार सिर्फ उसी को है जो पूर्णत: निर्दोष और ज्ञानवान हो | आलोचक बनने से पहले योग्य बनों । आलोचित या आलोच्य से ऊपर उठो और उपर पहुंचो ज्ञान में , बुद्धि में, विवेक में , यश में , प्रतिष्ठा में , पद में , और धर्म कर्म में । 
चरित्रवान बनने पर जोर दो | 
अपने जन्म के उदेश्य को जिस क्षण समझ जाओगे आधी सफलता तुम्हे मिल जाऐगी | बाकीं तुम कर्म करके सफल हो जाओगे |
परिक्षा में मार्क्स लाने के लिए मत पढ़ो , मुझे अच्छी तरह रुची से पढना है इसलिए पढों , मार्क्स तो आउट कम है | वो तो अच्छा आएगा ही | :- तुम्हारा संजीव कुमार 

Don't go behind money . Develop your quality, than money will automatically follow you . If you will run behind the money than money will be always far from you. And use your money for humanity . Don't misuse your money . Otherwise one day you will be in trouble. 
Always focus on your circle of influence don't go behind circle of concern .  
Select your careers as per your choice because every youth is made for some deeds . Always trust on yourself than other will trust on you . Be with truth always.
 . You will get sustainable success . No body will brake your record. :- Your sanjeev

Thursday, 30 January 2025

कुंभ मेले तथा कुंभ स्नान इतिहास और उत्पत्ति

कुंभ मेले का इतिहास और उत्पत्ति:- 
सनातन वैदिक धर्म का अल्टीमेट संविधान चार वेदों में "कुंभ मेला या कुंभ स्नान " का जिक्र कही नहीं है । वेदों में कुंभ शब्द का प्रयोग घट यानी घड़ा के लिए आया है ,‌ न कि कुंभ मेले तथा स्नान के लिए । 
ऐसा माना जाता है कि कुंभ स्नान कि शुरुआत आदि जगद्गुरू श्री शंकराचार्य के द्वारा चेतना के उच्चतम स्तर को प्राप्त जीवों के लिए किया गया था। 
चेतना के उच्चतम स्तर को प्राप्त योगभ्रष्ट व्यक्ति, साधन चातुष्ट्य संपन्नता हेतु अपनी अध्यात्मिक साधना के लिए पहाड़ , जंगल , नदी आदि को अपने साधना और सिद्धि के लिए अनुकूल मानते हैं । इसलिए आदि जगद्गुरू शंकाराचार्य ने इस मेले की शुरुआत की थी जो केवल वैरागी साधुओं के लिए थी । वैरागी वो साधु जो चेतना, चरित्र के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुके थे, ऐसे लोग अपने मन को अष्टांग योग तथा साधन चातुष्टय के बल पर शूद्ध कर चुके हो या करने कि प्रक्रिया में हो, तो ऐसे साधन चातुष्ट्य संपन्न योगभ्रष्ट जीव अपने अनुगत शिष्यों को साधना कराने के लिए त्रिवेणी घाट पर लेकर आते थे और वहां अष्टांग योग कि साधना आदि करते थे ।

बाद में ढोंगी आडंबरी , पाखंडियों और अंधविश्वासियों ने इसे अपना लिया , इनका नकल करने लगा और व्यापारियों द्वारा इसका बाजारीकरण हो गया । 
आम आदमी को इस कुंभ मेले से कोई लाभ नहीं होता । उल्टा नुकसान ही होता है । 

मानविए चेतना तथा चरित्र के निम्न स्तर का लोग जो जूआ , मांस , मदिरा , नशा, ड्रग आदि का सेवन करते हैं ठगी , चोरी , धोखाधरी , अत्याचार , दुराचार , पापाचार व्यभिचार आदि में लगे रहते हैं उनके लिए ज्ञान , ध्यान, साधना, पुण्य, भगवान की सेवा , भक्ति और मौक्ष असंभव है हमारे वेदों के अनुसार , ऐसे लोग अनाधिकारी माने जाते हैं शास्त्रों के सिद्धांतों के अनुसार। क्योंकि ये सब महापाप के केटेगरी में रखा गया है शास्त्रों में । इस तरह के पाप को करने वाले जीव का अंत:करण अत्यंत गंदा होता है । ऐसे लोगों का अन्नमयकोष दुषित होता है , अन्नमयकोष दूषित होने के कारण ऐसे लोगों का मनोमय कोष और बिचार दोनों प्रदूषित होते हैं । मन में गंदे गंदे विचार उत्पन्न होते हैं, मन अशांत तथा खिन्न रहता है , क्या अच्छा है क्या बुरा है इनके समझ में नहीं आता है ।  
इसलिए सही शिक्षा देने वाले का ऐसे लोग विरोध करते हैं काटने दौड़ते हैं , अपने चाल चारित्र तथा कुकर्म को सही ठहराने के लिए ऐसे असुर प्रवृत्ति के लोग वास्तविक धर्म को नहीं समझते । असुरों को अत्याचार , दुसरे को गाली देना , मारना सताना , ढोंग , पाखंड आडंबर तथा अंधविश्वास के सहारे अपना जीवन जीने की प्रवृत्ति होती है । 
अमृत के घड़े को असुर लेकर भागे थे लेकिन उसका कल्याण नहीं हुआ । वो और भी उग्र हो गय और देवाताओ से युद्ध किया । 
राक्षसी बिचार धारा , आसुरी बिचारधारा वाले जीव तमोगुणी होते हैं , उनपर अमृत के गुणों का उल्टा असर होता है । उदंड लोग किसी विषय और बस्तू का हमेशा ही दूरूपयोग किया है और करता रहेगा । 
ऐसे राक्षसी सोच वाले जीव को सात्विक बातें, धर्म का असली अर्थ नही समझ में आता कभी । ऐ लोग ढोंग पाखंड , आडंबर तथा अंधविश्वास को ही मुर्खता के कारण धर्म समझते हैं । 

तो ये कुंभ स्नान केवल उन सतोगुणी जीवों के लिए आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने कि थी जो योगभ्रष्ट हो चुके थे तथा चेतना के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुके थे । पहले से जिनका मन शूद्ध हो चुका था ऐसे लोग मौक्ष कि कामना से कर्म कांड और साधना के लिए त्रिवेणी को चुना था जो आगे चलकर परंपरा का रूप ले लिया और ढोंग , पाखंड , आडंबर तथा अंधविश्वासियों का अड्डा बन गया ।
अत: आम लोगो को सिद्ध संत , महापुरुषों का नकल नहीं करना चाहिए कभी । नहीं तो यह दैविक प्रकोप का कारण बनता है और दैविक दुख के सीवा और कुछ प्राप्त नहीं होता इन सब से । 

कल कुंभ मेले में इसी दैविक प्रकोप के कारण सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों लोग अपना का टांग हाथ फसली और गर्दन तुड़वाकर होस्पीटल में हैं , अपाहिज हो चुके हैं , जो दैविक प्रकोप का एक ताजा उदाहरण है आज 29 जनवरी 2025 का  ।

Tuesday, 26 November 2024

लक्ष्मी कौन है क्या है ?

*कितने अजीब लोग हैं!*

जरा अपने संसार को देखो कैसे अजीब लोग हैं हमारे संसार में। ये बड़े-बड़े पैसे वाले वो दुकानदार हो छोटे-छोटे या बड़े-बड़े खरबपति हों। ये लोग इस दिवाली पर हिसाब करते हैं और अपने बहीखाता में लिखते हैं- सदा लक्ष्मी सहाय! सदा कुबेर सहाय! लक्ष्मी सदा हमारे पास रहे। कुबेर सदा हमारे पास रहे। ये पंडित लोग जो पूजा कराते हैं आपके यहां शादी ब्याह में, यज्ञ बगैरा में, तो पूजा के बाद में एक श्लोक बोलते हैं- 

*यान्तु देवगणा: सर्वे पूजामादाय मामकीम्।* 
  
सब देवता अपने-अपने धाम को जाओ, हम पूजा कर चुके। पहले बुलाते हैं ना! गणेश जी और दुर्गा जी और षोडस मातृका, नवग्रह और अंत में कहते हैं- सब लोग जाओ। *लक्ष्मीम कुबेरेण च विहाय* लक्ष्मी और कुबेर तुम दोनों रहो और बाकी लोग जाओ। ये कितने अजीब लोग हैं अजीब! अजीब मायने समझते हैं आप लोग ना? हां! जिनकी खोपड़ी उल्टी हो वो अजीब होते हैं। भगवान सबसे अधिक अजीब हैं क्योंकि वो अन्यथाकर्तुम समर्थ है। वह आंख से सुनते हैं, कान से देखते हैं। अजीब हैं ना? हां!
तो ये हमारे संसार के लोग भी अजीब है और इनको बताने वाले पंडित जी वगैरह भी अजीब हैं! इनको यह नहीं पता है कि लक्ष्मी बिना भगवान के कैसे रहेंगी। वो तो सदा भगवान के बाएं तरफ रहती हैं। जब तुम भगवान को भेज रहे हो कि सब जाओ अपने-अपने लोक में और लक्ष्मी तुम रह जाओ। तो लक्ष्मी कहेंगी- तुम्हारा दिमाग खराब है, मैं अपने पति को छोड़कर तुम्हारे यहां रह जाऊं? यह तो संसारी स्त्री को भी अगर कोई ऐसे कहे कि आज जितनी स्त्रियां आई हैं वो सब रुकें हमारे घर में और जितने पति आए हैं वह जाएं अपने-अपने घर! तो लोग पिटाई कर देंगे। यह पागल हो गया है! तो लक्ष्मी तो तभी रहेंगी जब भगवान को बुलाओ। ना! कोई नहीं लिखता बही खाता में- 'राम सहाय', 'श्री कृष्ण सहाय', 'भगवान सहाय'। लक्ष्मी सहाय, कुबेर सहाय! यह लक्ष्मी कैसे रहेंगी भगवान के बिना? और कुबेर कैसे रहेगा? वह तो सर्वेंट है। तुलसीदास ने लिखा है, बड़ा मजेदार- 

*बिंधि न ईंधन पाइऐ सागर जुरै न नीर।*
*परै उपास कुबेर घर जो बिपच्छ रघुबीर।।*

अगर भगवान को आप नहीं मानते और ये कुबेर और लक्ष्मी की भक्ति करते हैं तो आपका क्या हाल होगा? विंध्याचल पहाड़ में इतने वृक्ष हैं और खाना पकाने को लकड़ी नहीं मिलेगी आपको। हां! इतना पानी भरा है समुद्र में, उंगली डूबोने को भी पानी नहीं मिलेगा। और अनंत धन है कुबेर के पास लेकिन वहां उपवास शुरू हो जाएगा, फाके पड़ेंगे। तो लक्ष्मी और कुबेर की भक्ति कर रहे हो और भगवान को विदा कर रहे हो! ये अजीब लोग हैं ना? हां! यह कृपालु बोल रहा है और कोई नहीं बोला आज तक। हां ! पूजा करवाते हैं और लक्ष्मी को सिर झुकाते हैं। और एक बात और बताएं आपको बड़ी मजेदार कि लक्ष्मी तो भगवान की अंतरंग शक्ति है। दिव्यानंद उनके पास है। और यह माया को लोग लक्ष्मी कहते हैं, माया को! यह जो संसारी संपत्ति है- सोना, चांदी, रुपया, मकान, जमीन इसको कहते हैं- लक्ष्मीवान है यह बड़ा! धनवान है इसलिए लक्ष्मीवान है! लक्ष्मीपति है! यह लक्ष्मी नहीं है यह तो माया है। संसारी वस्तु तो माया कहलाती है। यह पृथ्वी है ना! इसी से तो पैदा हुआ सोना, चांदी, हीरा। जितना भी आप लोग वैभव कहते हैं यह पत्थर सब है ना! यह मिट्टी से तो बने हैं। सोना कहां से निकलता है? इसी पृथ्वी से, चांदी इसी पृथ्वी से, हीरा इसी पृथ्वी से। वो जिसके पास अधिक हो गया वो लक्ष्मीपति हो गया! वो तो मायापति है। लक्ष्मीपति नहीं है कोई। लक्ष्मी तो भगवान की अंतरंग शक्ति है वो तो दिव्यानंद देती हैं मैटेरियल नहीं, स्पिरिचुअल हैप्पीनेस। लेकिन सब अजीब हैं ,अजीब काम करते हैं और चल रहा है परंपरा बस उसी प्रकार। आप लोग समझे रहिए आपको राधा कृष्ण की भक्ति करना है अनंत कोटि दुर्गा, लक्ष्मी, कुबेर सब अपने आप भागे आएंगे। आप सुप्रीम पावर की शरण में रहें और सबको अपने आप बिना बुलाये आने दें, डरे नहीं। लेकिन किसी का अपमान नहीं करें। हां! सबको नमस्कार है लेकिन मन बुद्धि का समर्पण श्यामा श्याम और उनके जन गुरु के प्रति होना है। ये रहस्य आज धनतेरस को आप लोग मस्तिष्क में रख लें।

*-प्रवचनांश भक्तियोगरसावतार अनंतश्रीविभूषित पंचम मूल जगद्गुरुत्तम १००८ स्वामि श्री कृपालु जी महाराज*

Saturday, 16 November 2024

प्रश्न - भगवान को भाव का भुखा क्यों कहा गया है ?

श्री महाराज जी द्वारा दी गई बहुत बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत ज्ञान और यह सावधानी बहुत जरूरी है, नहीं तो भगवान और गुरू के निमित्त कि गई सब सेवा, साधना ,दान , भजन-किर्तन निष्फल हो जाएगा ! सब किया हुआ जीरो गुणा सौ बराबर जीरो हो जाएगा । 
प्रश्न - भगवान को भाव का भुखा क्यों कहा गया है ?
उत्तर :- एक भुख का मतलव है आभाव में भुख और दुसरा आभाव नही है किसी चिज़ की , किसी चिज़ की कमी नहीं है , हर तरह से पूर्ण है फिर भी अपेक्षा करते हैं कि लोग हमें भोजन के लिए पुछे प्रेम भाव से । तो यहां भुख का मतलव है प्रेम भाव की अपेक्षा करना है । 
भगवान को सच में कोई व्यक्ति अगर किसी चिज़ का भुखा माने तो वो अज्ञानी है, भगवान को भावकग्राही कहना शास्त्र सम्मत है लेकिन उनको भाव का भुखा कहना और मानना शास्त्र विरुद्ध बातें हैं । 

भगवान प्रत्येक जीव के हित के लिए , उसके कल्याण हेतु उसके भावना को रीड करते हैं , इसलिए उनको भावक ग्राही कहा है शास्त्रों ने , लेकिन भगवान को भाव का भुखा कहना भारी मूर्खता है ।
भगवान किसी भी विषय वस्तु या भाव-वाव के भुखे नहीं है , उनको किसी चीज की कोई आवश्यकता या आभाव नहीं है । वो पूर्णकाम है निष्काम है , भला वो किसी चीज का भुखे क्यों रहेंगे ? उनको किस बात का आभाव है जो वो किसी भी चिज़ के भुखे रहेंगे ? 

भगवान का गुण है - पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते' -वृहदारण्यक उपनिषद ।
 वो परंब्रह्म भगवान श्री कृष्ण तो सभी प्रकार से सदा से परिपूर्ण है और परिपुर्ण रहेंगे । 
तो फिर भगवान को किसी चीज का भुख हो, यह सर्वदा असंभव है । इसलिए भगवान को भाव का भुखा कहना एक अपराध है । 

हां भगवान भावक ग्राही अवश्य हैं, वो भी अपने भक्तों के हितों के लिए केवल । भक्तों के दिव्य स्वार्थ (भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, विवेक ) को प्रदान करने के लिए अपने अकारण करूण स्वाभाव के कारण वो अपने भक्तों के द्वारा उनके प्रति अर्पित प्रेम भावना को, भक्ति भाव को , मायिक सेवा , मायिक साधना आदि को रीड करते हैं, नोट करते हैं और फल के रूप में उसे अपना प्रेम प्रदान करते हैं, आनंद प्रदान करते हैं , भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, विवेक, प्रदान करते हैं । 

चूकि जीव भगवान को और गुरू को केवल श्रद्धा भाव , प्रेम भाव , पूर्ण समर्पण, शरणागति भाव से , निष्काम सेवा भाव से हीं प्राप्त कर सकता है, इसलिए भगवान जीवों को अपनी भक्ति प्रदान करने के लिए अपने भक्तों से निष्काम प्रेम भाव की अपेक्षा करते हैं इसलिए उनको भावक ग्राही कहा गया है । 

हमारे गुरूदेव श्री महाराज जी भी तो सिर्फ हमारे कल्याण के लिए इस मायालोक में गोलोक से आए , इतना कष्ट उठाए वर्णा उनको किस चिज़ की कमी थी , वो तो पुर्णकाम हैं । भला उनको किस चिज़ की भुख थी या है , वो तो स्वयं भगवान का स्वरूप है , भगवान की सभी शक्तियां, सभी धन गुण के वे स्वामी है उनको इस गंदे संसार से भला क्या लेना देना । 

वो आए इस मृत्यु लोक में सिर्फ और सिर्फ हमारे कल्याण हेतु तथा अपने अकारण स्वभाव वश हमसे अपेक्षा करते हैं कि हम उनके अनुगत होकर , शरणागत होकर उनके बतलाए मार्गों का, सिद्धांतों का ठीक ठीक पालन करके सदा के लिए उनको प्राप्त करके इस मायालोक से मुक्त होकर सदा के लिए आनंदमय हो जाए । इसमें हमारा स्वार्थ है , उनका कोई स्वार्थ नहीं है । वो तो हर तरह से परिपूर्ण है , पुर्णकाम हैं , निष्काम है , उनको भला किस चीज की कमी ? 
अत: यह कभी मत सोचिएगा कि हम उनके निमित्त दानादि या किसी प्रकार से कोई सेवा करके उनका उपकार कर रहे हैं , यह भारी नामापराध हो जाएगा । 

हमेशा ध्यान रहे, हम हरि और गुरू के निमित्त जो भी सेवा , दान तथा साधना करते हैं, उनका रूपध्यान करते हैं , उनका गुन गाते हैं भजन किर्तन करते हैं, उनके सुख के लिए जी भी काम करते हैं वो दरअसल केवल और केवल अपने ही कल्याण हेतु कर रहे हैं, वर्णा भारी नामापराध हो जाएगा, आपका नुकसान हो जाएगा , सावधानी अति आवश्यक है । 

याद रहे यह सिद्धान्त ज्ञान कि एक समर्थ ही असमर्थ की सेवा कर सकता है , असमर्थ समर्थ की सेवा कभी नहीं कर सकता । 
इसलिए भगवान और गुरू सर्वदा समर्थ है और वे असमर्थ जीव की सेवा करते हैं उसको तत्वज्ञान देकर , उसका मायिक दान स्वीकार करके , उसकी मायिक साधना तथा सेवा स्वीकार करके । उसका मार्ग दर्शन करके , अपने साधकों का योगक्षेम वहन करके , उसकी हर तरह से रक्षा करके । 

इसलिए किसी भी जीव के मन में दान , सेवा , और साधना भजन किर्तन का अहंकार रत्ति भर भी न हो कि हम यह यह किए हैं और करते हैं और हम उनका बहुत बड़ा भक्त हैं ,बड़ा सेवक है, बड़ा साधक है , वर्णा सबकुछ समाप्त । अहंकार आया कि दीनता और आंसु गए और फिर सब जीरो बटा सौ बराबर जीरो हो जाएगा । 

जीव जब भगवद् प्राप्त कर लेगा , गुरू कृपा से समर्थ बन जाएगा तब उसको दिव्य सेवा मिलती है भगवान और गुरू की उनके गोलोक में । उस सेवा को प्राप्त करके वो अपना कल्याण सदा के लिए कर लेता है । 

:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन से प्रश्नों का उत्तर ।

Friday, 18 October 2024

संसार में भौतिक सम्पन्नता के बावजूद लोग इतना दुखी क्यों हैं , और हमारा उद्धार कैसे होगा ? मन को कब शांति मिलेगी ? हमारा कल्याण कैसे होगा ?

एक साधक का प्रश्न :- संसार में भौतिक सम्पन्नता के बावजूद लोग इतना दुखी क्यों हैं , और हमारा उद्धार कैसे होगा ? मन को कब शांति मिलेगी ? हमारा कल्याण कैसे होगा ? 
मां का उत्तर :- बड़ा अच्छा प्रश्न है तुम्हारा , श्री महाराज जी ने कई बार इस पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि यही बात एक बार शौनकादिक ऋषियों के द्वारा सुत जी से पुछा गया की कलयुग में लोगों का कल्याण कैसे होगा ? 
सुत जी ने कहा कि कलयुग में लोगों की यादास्त बहुत कमजोर होगी , लोगों को भुलने की बीमारी होगी , प्रारब्ध बहुत कमजोर होगा , लोग शारीरिक रुप से बहुत कमजोर होंगें , मानसिक शक्ति क्षीण होती जाएगी , लोग पाप और पूण्य में , धर्म अधर्म में फर्क नही समझ पाऐंगें , अच्छे बुरे के ज्ञान का आभाव होगा , लोग तर्क , कुतर्क , वितर्क में समय गवाऐंगें , 
झूठ बोलने , पापादी कर्मों तथा चिंतन में लिप्त रहने के कारण जीव के पुण्य बल तथा आयु क्षीण होती जाऐगी | कुसंगादि के कारण अपना नुकसान ही नुकसान करेंगें | काम-क्रोध, अहंकार, विनाश का प्रमुख कारण होगा | लोगों की रूचि भगवान का प्रेम प्राप्त करने में नहीं होगा । कामनाओ के पूर्ति मात्र के लिए लोग तीरथ 
-विरथ मंदीर मस्जिद गुरुद्वारे में जाएंगे । लोग भगवान के भक्ति का प्रदर्शन मात्र करेंगे । भगवान से निष्काम प्रेम के जगह लोग भक्ति, दान, धर्म का प्रदर्शन अधिक करेंगे । धन वैभव का अहंकार जीवों के उपर हावी रहेगा । धर्म के आड़ में लोग व्यभिचार तथा पाखंड में लिप्त रहेंगे । व्यभिचारी पूजित होंगे, तथा वास्तविक संतों के प्रति कम लोग ही आस्थावान होंगे । 
अत: भगवान से सच्चे तथा निस्वार्थ प्रेम के आभाव में लोग भौतिक सपन्नताओं के बाबजूद दुखी रहेंगे । जीवो का मन अशांत रहेगा । जीव रोगादि से ग्रस्त रहेंगे । चरित्र और सुसंकार का आभाव होगा । घोर कामनाओं तथा वासनात्मक भोगेच्छा के वशिभूत जीवो का नैतिक पतन होगा । 
केवल भगवान की निष्काम भक्ति करके उनका प्रेम प्राप्त करने के बाद ही लोग आनंदमय तथा सुखी होंगे । 

श्री महाराज जी ने समझाया है कि "जीव समझ नही पाते है कि वो जो कष्ट भोग रहे है वो उसके ही अनन्त जन्मो पल्स वर्तमान जन्मों के बुरे कर्मो का फल है | "

लोग देवी देवता का चक्कर काटते हैं , मंदिरो में जाकर तमाम मनता मनौती मनाते है , जादु मंतर के चक्कर में पड़ते है | नकली बाबाओं के चक्कर में पड़कर अपना तमाम तरह का नुकसान पँहुचाते हैं | 
समय आने पर दो चार का खड़ाब प्रारब्ध कट जाने पर कष्ट कम हो जाने पर , रोग ठीक हो जाता है तो लोग उसके द्वारा ढोल पिटवाते है कि अमुख बाबा बड़े सिद्ध हैं फिर कुछ लोग और इस चक्कर में पड़कर अपना और नुकसान कर बैठते हैं | 

वो समझते है देवी देवता खुश हो गये और हम ठीक हो गए | अरे क्या खाक ठीक हो गए , जिसको भगवान ने उसके प्रारब्ध का फल दिया उसे कौन ठीक कर सकता है , वो तो भोगने बाद ही ठीक होगा | देवी देवता में ऐसी हिम्मत कहां जो विधाता के दिये हुऐ फल को काट सके | ये देवी देवता के अवलम्ब , आधार तो खुद श्रीकृष्ण है | इनकी ऐसी हिम्मत कहां जो वो अपने अबलंब के खिलाफ जाऐं ?

अरे ये देवी देवता भी तभी खुश होते है जब वे देखते है कि ये हमारे इष्ट को ही भज रहा है उन्हीं की भक्ति कर रहा है | ये उनका हीं हो गया | ध्यान दो - श्री कृष्ण का हीं हो गया है , श्री कृष्ण का भी नहीं | 

अत: देखते हो संसार में तमाम तरह के नए नए रोग बढ़ रहें हैं कीड़े मकोड़े की संख्या बढ़ रही है , लोग काल का ग्रास बन रहें हैं फिर भी नही चेतते , क्योंकि बुद्धि भ्रष्ट हो चूकि हैं | शास्त्रों , पुराणों को अपने अपने तरीके से अर्थ निकाल कर अनर्थ के तरफ बढ रहे हैं | पाप में लिप्त है , धन का दुरुपयोग बढ रहा है | 

अत: इन चीजों को समझों , कुसंग मत करो , हरिगुरु के शरण में जाओ , बार बार सिद्धान्तो को पढ़ो , हरिगुरु का हीं संग करो , गुरुधाम जाओ , हरिगुरु के बुद्धि से अपनी बुद्धि को जोड़ दो , हरिगुरु के बताऐ मार्ग पर चलों , रुपध्यान करो , हरिगुरु निर्दिष्ट साधना करो , साढ़े छ अरब मनुष्यों मे हम सब बड़भागी हैं कि कृपालु जैसा गुरु मिला , जो स्वयं परम तत्व हैं उनका दामन कभी मत छोड़ों । 
मन को वास्तविक शांति सुख और आनंद श्री राधाकृष्ण प्रेम पाने के बाद ही मिलेगी , तर्क , कुतर्क मत करो , अपनी तुक्ष बुद्धि मत लगाओ , ज्यादा से ज्यादा उनके पुस्तकों को पढो , बार बार पढो , उनकी पुस्तके मामुली पुस्तकें मत समझो , यह उनके द्वारा रचित महानतम ग्रन्थ है | 
:- पूज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।

Saturday, 12 October 2024

सन्यासियों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी के लिए संक्षिप्त लेख ।सन्यासियों के प्रकार :- नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार कूल छः प्रकार के सन्यासी होते हैं जो निम्नलिखित हैं ।


 सन्यासियों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी के लिए संक्षिप्त लेख ।
सन्यासियों के प्रकार :- 
नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार कूल छः प्रकार के सन्यासी होते हैं जो निम्नलिखित हैं - 
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साधारण सन्यासी कुटिचक होते हैं जो मंत्रादि की साधना भी करते है लेकिन मन भगवान में ही स्थित यानि ध्यान मग्न होतें है यानि अधिकतर समय साधना में लगाते हैं । ये शिखा और यज्ञोपवीत ( सूत्र) भी धारण करतें है त्रिदण्ड, कमण्डलु , कौपीन ( लंगोटी ) और कन्था ( कथरी ) धारण करतें है । झोली और पात्र भी रखतें है। ये मिट्टी खोदने वाला खनती भी अपने पास रखते हैं। ये पराविज्ञानी नहीं होते अर्थात अपरोक्ष ज्ञाननिष्ठ नहीं होते। ये  श्वेत ऊर्ध्व पुण्ड्र लगाते हैं। 
ये गुरु के अलावा  माता पिता की भी सेवा कर सकते हैं। 
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बहुदक सन्यासी - जनेऊ, चोटी( शिखा ), दण्ड कमण्डलु लंगोटी, और कथरी के अलावा त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं।ये उत्तम  सज्जन लोगों से ही आठ ग्रास भोजन ग्रहण करते हैं । एक ग्रास उतना ही होता है जो शान्ति से मुख में रखकर चबा सकें न कि बड़ा कौर। ये अपने मन को भगवान में ध्यानस्थ कर कठिन साधना करते हैं 
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हंस :- ये जब चाहे मानसिक स्तर पर भगवान के ध्यान में चले जाएं और पूर्ण जागृत अवस्था में भी भगवान में मन को स्थित रख कर संसार में कर्मयोग करते हैं , ये भिक्षु किसी गांव में एक रात , नगर में पाँच रात और तीर्थ क्षेत्र में अधिक से अधिक  सात रात निवास कर सकते हैं वे अपने आपमें ही मगन रहते हैं और स्वागत सत्कार से दूर रहते हैं। ये जटा जूट धारण करते हैं। ये एक जगह अड़के नहीं बैठते इनको भोजन या आश्रम की सुविधाओं से कोई संबंध नहीं होता।   नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार ये मधुकरी ( भिक्षा) से ही शरीर का पोषण करते हैं।
ये तीनों यानि कुटिचक , बहुदक तथा हंस क्रमशः घासफूस के आश्रम वाले होते हैं प्रायः गृहस्थ जीवन काटकर फिर वानप्रस्थ स्वीकार  करते हैं तदोपरान्त ही अपनी अवस्था के अनुसार कुटिचक या बहुदक अथवा हंस हो पाते हैं। 
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परम हंस :- ये हर क्षण मानसिक स्तर पर भगवान के ध्यान में स्थित होते हैं और शारिरिक और से    शिखा और यज्ञोपवीत धारण नहीं करते ये मात्र 5 घरों से अन्न पाकर एक ही बार पाते हैं दूसरे समय नहीं पाते। ये बांस का दण्ड पास में रखते हैं। ये सम्पूर्ण अंगों में भस्म धारण करते हैं यही इनका वस्त्र है पर ये दिगम्बर हो भी सकते हैं नहीं भी तो एक लंगोटी और एक चादर अपने शरीर पर ओढ़ कर भी रख सकते हैं। परम हंस नामक संन्यासी वृक्ष के मूल अथवा श्मशान में रहते हैं। यज्ञशाला, नदीतट, गड्ढा, झोंपड़ी में भी रह सकते हैं। 
इनको लाभ या अलाभ से कोई संबंध नहीं होता। इनको कोई स्वर्ण भी दे तो उसे मिट्टी या नाशवान समझकर स्वीकार नहीं करते । इनको शुद्ध द्वैत या अशुद्ध द्वैत से कोई भी मतलब नहीं होता ये पूर्णतः आत्माराम होते हैं ये ब्रह्म से अभिन्न होते हैं किसी भी नियम या कर्मकांड आदि से इनको कुछ भी संबध नहीं होता ये सदा ब्रह्मानंद से युक्त होते हैं। ये चाहे चाण्डाल के घर प्राण त्याग करें या काशी या मथुरा में ये मुक्त ही होने से परम निर्वाण को ही पाते हैं।
जड़भरत , श्वेतकेतु व शुकदेव लीलावश परमहंस हैं।और ये सभी वर्णों से भिक्षा ले सकते हैं इनको ब्रह्म के सिवाय कुछ नहीं दिखता स्वयं भी सर्वमय भी। मात्र देह के लिए ही ये किसी से भी भिक्षा ले सकते हैं।
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तुरीयातीत सन्यासी - यह कभी किसी से कुछ भी नहीं मांगते। यदि स्वेच्छापूर्वक कोई दे दे तो ग्रहण कर सकतें है अथवा  ये देह के लिए मात्र तीन घरों से अन्नाहार मांग भी सकते हैं पर धन , वस्त्र और वस्तु नहीं मांगते।  यह नग्न होते हैं। और हर क्षण भीतर से , मानसिक स्तर पर साधना में निमग्न रहते हैं । 
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अवधूत सन्यासी - ये अजगर वृत्ति से जीवित रहते हैं ये बंधन को मिथ्या मानते हैं इनके अनुसार तुमको किसी ने बंधन में नहीं डाला तुम तो मुक्त ही हो अपने अज्ञान के कारण ही तुम मुक्ति चाहते हो वास्तव में जो मुक्त है उसे किस प्रकार की मुक्ति चाहिए बस अज्ञान का नाश कर ले यही मुक्ति है। ये मंत्र और उपासना से रहित सोऽहम् भाव में ( इससे भी अतीत) स्थित होते हैं । :- नारद परिव्राजक उपनिषद । ( संजीव कुमार )

Thursday, 10 October 2024

श्री कृपालुजी महारप्रभु के अनुयायी भगवान श्री राधाकृष्ण के अनन्य भक्त ।

पुर्व जन्मों का पुण्य पुंज तथा उस पर भगवद् कृपा से जबतक किसी भी जीव के कुसंस्कारों का नाश नहीं होगा तथा उनके चित्त में सर्वश्रेष्ठ संस्कारों का उदय नहीं होगा तबतक वो जीव श्रीमद्पदव्याक्य, प्रमाणपारावरीण, वेदमार्ग-प्रतिष्ठापन, निखिलदर्शन समन्वयाचार्य, सनातन वैदिक धर्म प्रतिष्ठापन सत्संप्रदाय परमाचार्य, भक्तियोग रसावतार, भगवदनन्त श्री विभूषित पंचम मूल जगद्गुरूतमई १००८ स्वामी श्री कृपालु जी महाराज द्वारा दिए गए वैदिक दर्शन, तत्वज्ञान , विशुद्ध एवं श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्तिरस एवं भक्ति सिद्धांतों में रूचि नहीं रख सकता, चाहे वो आज कलयुग में किसी भी धर्म , किसी भी संप्रदाय , किसी भी मत , किसी भी मार्ग के बड़े से बड़े धर्मपीठ पर बैठे बड़े बड़े धर्माधिकारियों , कर्मकांडी पंडितों तथा दुनियां में महान कहलाने वाला जीव या ज्ञानी ध्यानी विज्ञानी आदि ही क्यों न हो । इन बड़े बड़े पंडितो तथा ज्ञानियो से वो चंडाल श्रेष्ठ तथा बंदनिए है जो श्री राधाकृष्ण की अनन्य तथा निष्काम भक्ति करते हैं , उनमें रूचि रखते हैं, उनसे प्रेम करते हैं । 

परम दिव्य तत्व , अवतारी महापुरूषों में सर्वश्रेष्ठ श्री कृपालु जी महाप्रभु द्वारा श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्ति में रूचि इस युग में केवल उन्हीं सौभाग्यशाली जीवों को है जो अपने पुर्व जन्मों में परम तत्व श्री राधाकृष्ण की भक्ति की है तथा भगवान श्री कृष्ण के परमगुप्त,अद्वितीय,अनुपम , अलौकिक अति दुर्लभ प्रेम रस को प्राप्त करने के लिए लालायित हुए थे और हैं । 

श्री राधाकृष्ण के अनुपम , अपरिमेय , अद्भुत, अतुलनीय, अलौकिक, दुर्लभ भक्तिरस के प्रति आकर्षित जीव ही केवल श्री कृपालु जी महाप्रभु को अपना गुरू मानते हैं और आने वाले समय में मानेंगे भी तथा उनके प्रति अनन्य, दृढ़ श्रद्धावान, आस्थावान तथा संकल्पित है तथा होंगे । 

श्री कृपालु जी महाप्रभु जैसे महानतम अवतारी संत के प्रति जिज्ञासु, पिपासु श्रद्धावान, निष्ठावान, अनन्य तथा समर्पित जीवों के सौभाग्य की सराहना करना स्वर्ग के देवी देवताओं तथा सरस्वती एवं बृहस्पति के लिए भी कठीन है ।

अति धन्य हैं वो जीव जो श्री महाराज जी का अनन्य अनुगामी होकर श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्ति करते हैं । 

 मैं संजीव कुमार एक क्षूद्र सा अधम एवं पतित जीव , हमारे गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज के सभी अनुयायियों एवं निष्काम सेवकों के श्री चरणों में मन ही मन नित्य प्रति अपना मस्तक नवाकर स्वयं को धन्य समझता हूं । जय जय श्री राधे , जय जय श्री कृपालु महाप्रभु की जय जय जय, जय जय श्री महाराज जी के साधक समुदाय की जय ।। :- संजीव कुमार ।

Wednesday, 21 August 2024

आज कल अधिक पुजा पाठ के बाबजूद पापाचार बढ़ रहा है उसका कारण क्या है ?

आजकल हमारे देश में अधिकांश संख्या में लोग जप तप व्रत पूजा पाठ, उपवास तीर्थ-विर्थ हवन यज्ञ रूद्राभिषेक सत्यनारायण की पुजा , दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा , गणेश पूजा , लक्ष्मी पूजा , काली पूजा , सुंदरकांड की पाठ, आदि तमाम तरह के कर्मकांड करने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही है , बड़े बड़े मंदिरों में रात रात भर भजन कीर्तन, जागरण, दान आदि करते पाए जाते हैं । 

आजकल तो इतने प्रवचन करने वाले बाबा लोगों की भरमार हो चुकी है हमारे देश में जितना की आम लोगों की जनसंख्या भी नहीं थी सतयूग तथा त्रेता आदि में हमारे देश भारत में । आजकल इतना अधिक लोग ये सब कर्मकांड करते पाये जाते हैं जितना की सतयुग, त्रेता तथा द्वापर आदि का लोग भी नहीं किया होगा कभी । और करेंगे कैसे द्वापर में आज के तुलना में जनसंख्या ही कितनी थी ? आज भारत में हीं केवल एक सौ चालीस करोड़ लोग रहते हैं । 

लेकिन आज एक भी आदमी यह दावा नहीं कर सकता कि ए सब करने से उनके मन की एक प्रतिशत भी शुद्धि हुई है, मनों रोग - काम क्रोध , मद , मोह, लोभ , मातषर्य , ईर्ष्या घृणा , राग द्वेष चिंता आदि लेश मात्र भी कम हुआ है, सुख शान्ति तो बहुत दूर कि बात है ।

अरे आम लोगों कि कौन कहे स्वयं को बड़े बड़े पंडित , पुजारी , आचार्य , प्रवचन करने वाले लोग , कर्म कांड कराने वाले पंडितो के भी ये रोग कम नहीं हुए हैं । 

जरा सा कुछ प्रतिकूल बातें कोई इनके खिलाफ बोल दे , तुरंत गुस्सा , और लोभ लालच , राग द्वेष, अहंकार आदि इतना अधिक इनके मन में पाय जाते हैं कि उसी मंदिर के दुसरे पंडितो के प्रति राग द्वेष भरा परा है । जब इन पंडितो पुजारियों , आचार्यों का यह हाल है तो आम लोगों कि कौन कहे , अपने ही मंदिर के दुसरे पुजारी , आचार्य का बुराई करते मिल जाते हैं आज । आपस में एक दुसरे कि बुराई तो छोड़िये ये कर्मकांडी पंडित आचार्य लोग तो बड़े बड़े जगद्गुरुओं को भी नहीं छोड़ते , उनके बारे में गलत-सलत बातें बोलते रहते हैं , बड़े बड़े जगद्गुरुओं के प्रति भी दुर्भावना तथा द्वेष रखते हैं अपने मन में । 99% पंडितो में आचार्यों में दीनता , नम्रता, सहिष्णुता नहीं मिलेगा आज आपको , तो फिर पुजा पाठ हवन यज्ञ आदि कराने वाले गृहस्थों की तो बात ही छोड़िए । 

जब पंडितो पंडों, आचार्यों आदि का यह हाल है जो मंदिर में दिन रात भगवान के विग्रह कि सेवा करते हैं पुजा पाठ करते और कराते हैं तो भला साधारण लोग , इनसे कर्म कांड कराने तथा करने वाले गृहस्थों के मन बुद्धि चित्त अहंकार कि शूद्धि कि बात कौन सोचें ? 
तो इन सबका क्या कारण है ? तो पहला और सबसे प्रमुख कारण है आजकल केवल शरीर से भक्ति कि जा रही है । मन इंभौल्व हो या न हो कोई मतलव नहीं । दुसरा कारण कलयुग में कर्मकांड के सभी नियम तथा निषेधों का ठीक ठीक पालन असंभव है ।

अगर कोई पंडित यह कहता है कि भगवान कि फिजिकल सेवा , शरीर से पूजा पाठ , व्रत उपवास हवन यज्ञ करने से अभीष्ट यानि भौतिक बस्तूओं तथा संसारिक सुख सुविधा के साधनों कि प्राप्ति होती है तो जरा उनको देखा जाए जो लोग यह सब नहीं करते और न कभी किया आज तक फिर भी उनके पास आज रूप्या पैसा धन जन आदि पुजा पाठ जप तप हवन यज्ञ व्रत तीर्थ-विर्थ उपवास करने वालों कि अपेक्षा कई गुणा अधिक क्यों हैं ? 

नंबर दो अगर वो यह कहते हैं कि इन सब कर्मकांड से पाप समाप्त होता है कष्ट मिटते हैं तो आज ये सब करने बाले वेचैन क्यों है , इतना चिंता निराशा आदि से ये लोग घिरे क्यों रहते हैं ? आगे पाप करने के प्रवृत्ति का नाश क्यों नहीं हूआ ? 

नंबर तीन अगर यह दावा करते हैं पंडित लोग कि इससे लोगों के संस्कार का निर्माण होता है मन कि शूद्धि होती है तो जरा यह देखिए आज कि कितने लोगों यहां तक पंडितो तथा पंडों के खुद राग द्वेष काम क्रोध ईर्ष्या आदि समाप्त हुए हैं या कम हूए है ? 

तो यह सब वेकार कि बातें हैं । शास्त्र कहता है कलयुग में मंत्र तंत्र पुजा पाठ , जप तप हवन यज्ञ व्रत उपवास तीर्थ विर्थ संसारिक गानों के साथ भजन कीर्तन, नृत्य , उछल कूद सब निर्थक है इन सबका कोई लाभ नहीं है और न भगवान इन सब कर्मों से एक रत्ती भी खुश होते हैं , और न कृपा करते हैं । 

यहां तक कि इस कलयुग में इनसे न कोई आध्यात्मिक लाभ है और न कोई भौतिक लाभ है । 

भौतिक बस्तुएं तो जीव के केवल पुर्व जन्मों के संचित कर्मों जिसे प्रारब्ध कहते हैं प्लस इस जन्म के क्रियामान कर्मो से ही मिलता है । 
और अपवाद रूप में कोई सतयुग तथा त्रेता एवं द्वापर आदि के जैसे नियम तथा पुरे विधान से जो कि आज असंभव है, अगर कर भी ले ठीक ठीक तो उसके कुछ पिछले संचित पाप आदि धुल सकते हैं लेकिन जीव का उद्धार नहीं हो सकता , क्योंकि जीव के अनंत जन्मों के पाप की गठरी उसके माथे पर है । इन सबका क्षय इन सबसे नहीं हो सकता जब तक जीव के पंचकोष , पंचक्लेश , त्रिविध ताप आदि पुरी तरह भस्म न हो जाए ।
और जहां तक आध्यात्मिक लाभ एवं मन बुद्धि चित्त अहंकार, साधन चातुष्ट्य आदि कि शूद्धि आदि कि बात है तो यह केवल मन से भगवान तथा योग्य गुरू कि निरंतर तथा अनन्य भक्ति , पुर्ण शरणागति एवं साधना से हीं संभव है वरना कलयुग में कोई अन्य साधन फलदायी नहीं है । 
:- गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज द्वारा प्राप्त सिद्धांत ज्ञान से । श्री राधे ।

Tuesday, 20 August 2024

गुरू द्वारा प्राप्त वैदिक सिद्धांतो तथा तत्वज्ञान से अपने मन पर कंट्रोल तथा विजय हासिल करने का अभ्यास हमें हर रोज करना होगा, और यह अभ्यास एकांत में हरि गुरू के रूपध्यान साधना से हीं संभव है अन्यथा मानवीय चंचल मन कि उच्छृंखलता कभी दूर नहीं हो सकती ।

पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी :- अपने गुरू द्वारा प्राप्त वैदिक सिद्धांतो तथा तत्वज्ञान से अपने मन पर कंट्रोल तथा विजय हासिल करने का अभ्यास हमें हर रोज करना होगा, और यह अभ्यास एकांत में हरि गुरू के रूपध्यान साधना से हीं संभव है अन्यथा मानवीय चंचल मन कि उच्छृंखलता कभी दूर नहीं हो सकती । 

 उच्छृंखल मन हमेशा उदंडता करता रहेगा तथा यह तर्क , कुतर्क , वितर्क एवं अति तर्क में हीं उलझा रहेगा हमेशा और यही उदंड मन जीवन के हर क्षेत्र में असफलता का सबसे बड़ा कारण है । एक उच्छृंखल मन मनुष्य का पतन करा देता है । उच्छृंखल मन मनुष्य को अपने लक्ष्य पर कभी पहुंचने नहीं दे सकता है ।
अनेक बिचारों का प्रवाह यह मानवीय मन जीव के आत्मशक्ति को छिन्न-भिन्न करके रखता हैं जिस कारण यह मन किसी भी शुभ कर्म में केंद्रित नहीं हो सकता । 

इसलिए मन को ध्यान ( Meditation ) द्वारा "साधना" होगा । एकांत रूपध्यान साधना के द्वारा मन को दिव्य शक्ति यथा ज्ञान शक्ति के मूल स्रोत हरिगुरू में जमाना होगा, केंद्रित करना होगा । रूपध्यान साधना द्वारा इसको नियोजित करने की कला सिखनी होगी । मन को अनावश्यक बिषयों के चिंतन , चिंता तथा नकारात्मक बिचारो के प्रवाह से हटाने कि क्रिया को मन का निग्रह कहते हैं, दुसरे शब्दों में चित्त का मार्जन करना भी इसी क्रिया को कहते हैं तथा इसे हरिगुरू द्वारा दिया ज्ञान एवं सकारात्मक चिंतन में लगा कर दिव्य गुणों को ग्रहण के क्रिया को परिग्रहण कहते हैं । 

मन को अनेको अनुपयोगी बिषयों के चिंतन से हटाकर किसी एक परम उपयोगी तथा कल्याणकारी बिषय में लगाने की कला को मन को नियोजन करना कहते हैं । इंग्लिश में इसे Mind Management कहते हैं । 

अनियोजित मन अज्ञानता के कारण अनादि काल से अनित्य को हीं नित्य मान बैठा है , यह अपने शरीर तथा इस संसार को ही नित्य मान बैठा है , अत: यह सदा से अविद्या माया का शिकार है । इसी अविद्या माया के कारण जीव का मन भ्रम , प्रमाद , विप्रलिप्सा तथा कर्णपाटव जैसे मानसिक रोगों से ग्रसित है । 

यही अविद्या माया अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश का भी मुख्य कारण है । और यही पांचों अवगुण जीव के मन को चिंता तथा भय से ग्रसित कर रखा है । 
जब तक मनुष्य का मन इनसे मुक्त नहीं होगा तब तक जीव अपने लक्ष्य को कभी हासिल नहीं कर सकता । 
जब तक मनुष्य का मन स्थिर नहीं होगा, जीव हमेशा अशांत रहेगा , दुखी रहेगा , हताशा तथा निराशा का शिकार रहेगा चाहे वो कितना भी अनित्य संसाधनो को अपने लिए जमा करके रख ले ।
जब तक जीव अपने मन के अनंत शक्तियों को नियंत्रित करने का कला नहीं सिखेगा तब तक मनुष्य का पंचकोष भष्म नहीं हो सकता , और जब तक पंचकोष भष्म नहीं होगा, जीव पर त्रिताप तथा पंचक्लेश हमेशा हावी रहेगा और जीव दुखी हीं रहेगा , चाहे वो कितना भी धन , जन वैभव तथा अन्य अनित्य भौतिक बस्तूओं को इकट्ठा कर लें । 

आज कलयुग में भगवान तथा गुरू कि भक्ति तथा उनकी बतलाई साधना ही एक मात्र ऐसा साधन है जिससे जीव अपने मन को अपने वश में कर सकता है दुसरा कोई अन्य साधन नहीं है, क्योंकि अनादि काल से संसार में हीं आवागमन के कारण चतुर्युगी युग चक्र के अंतिम युग कलयुग में जीव का मन इतना उच्छृंखल हो चुका है कि वो अंधविश्वास तथा रूढ़िवादिता को ही कर्म तथा धर्म एवं ज्ञान समझ बैठा है । 
अत: कलयुग में जीव कर्म धर्म एवं ज्ञान के मूल स्वरूप को समझने में असमर्थ है । 
यही वजह है कि जीव आज कर्म धर्म के रूप में जो भी कर रहा है वो निष्फल होता जा रहा है चाहे वो पुजा पाठ हो , जप, तप, व्रत, उपवास तीर्थ, विर्थ, हवन या कोई भी अन्य कर्म कांड क्यों न हो । 

अत: कलयुग में केवल भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ तथा कल्याणकारी है, लेकिन अफसोस कि आज कलयुग में अधिकतर लोग भक्ति के मूल स्वरूप तथा वास्तविक अर्थ को भी नहीं जानते। 

इस कलयुग के परमाचार्य पंचम मौलिक जगद्गुरूत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु ने भक्ति कि जो परिभाषा कि है तथा भक्ति के जिस मार्ग को प्रशस्त किया है जीव केवल उसी को अपना कर अपने जीवन को सफल बना सकता है अन्यथा इस कलयुग में अन्य कोई मार्ग सक्षम नहीं है । अन्य सभी मार्ग भ्रम में डालने वाले हैं तथा मानसिक रोग को और भी बढ़ाने वाले मार्ग है । श्री राधे ।

Sunday, 23 June 2024

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।1. परमात्म केंद्रित ( GOD Centric ) Suprime soul.2. आत्म केन्द्रित ( Soul Centric )3. मन केंद्रित ( Self Centric )4. परिवार केंद्रित ( Family Centric)5. समाज केंद्रित ( Society Centric )6. संप्रदाय केंद्रित ( community centric )7. विश्व केंद्रित। ( Universe centric )

मेरा यह पोस्ट आध्यात्मिक्ता से तटस्थ लेख है जिसमें भौतिक , अभौतिक दोनों का समावेश है  । है तो यह श्री महाराज जी द्वारा दिया दृष्टि के प्रभाव का हीं फल । पर उनके अनुयायियों से एक प्रार्थना है कि इस लेख को केवल एक लेख और बिचार के समझ से पढ़े और देखें। 
और अपना स्वतंत्र बिचार बिना किसी पुर्वाग्रह के रख सकतें बिना भेद भाव‌ राग और द्वेष के  , इसमें किसी से राग और द्वेष की भावना नहीं है । बस एक चिंतन है ।

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।
1. परमात्म केंद्रित ( GOD Centric ) Suprime soul.
2. आत्म  केन्द्रित ( Soul Centric )
3. मन केंद्रित       ( Self Centric )
4. परिवार केंद्रित ( Family Centric)
5. समाज केंद्रित ( Society Centric )
6. संप्रदाय केंद्रित ( community centric )
7. विश्व केंद्रित।    ( Universe centric ) 

१. God centric - इसमें वो महान जीव है जो भगवान को पुर्ण निष्काम भाव से प्रेम करतें हैं । ऐसे जीव पराकाष्ठा का भगवद् प्रेमी होतें हैं । यहां तक की वो भगवान या अपने गुरु से इतना प्यार करतें हैं कि भगवान या गुरू की इच्छा हीं उनकी इच्छा हैं । वो दर्शन दें नहीं दें , बदले में प्यार करें या न करें , कोई अपनी कामना नहीं इनको । आध्यात्मिक कामना भी नहीं , भौतिक की तो बात हीं नहीं । ए पुर्ण निष्काम मनुष्य अति दुर्लभ भगवद् अवस्था का प्रतिरूप होतें हैं । परमात्म प्रेम भाव में लीन भीतर से । दुनियां से या किसी से कोई लेना देना नहीं , विल्कूल स्थित प्रज्ञ । भौतिक शरीर , भौतिक संसार में होते हुए भी निर्विकल्प , ना शरीर का भान न ‌संसार का ना अपने आत्मा का । पुर्णपरमहंसावस्था। अद्वैत अवस्था में हरि स्वरूप होते हैं । और जन हित हेतु द्वैत भाव से अपने भगवद् स्वरूप में स्थित होते हुए विश्व के सभी जीवों के आत्मिक कल्याण हेतु शरीर धारण करतें हैं । 

२. Soul centric - ऐसे मनुष्य आत्म केन्द्रित वाले सकाम भक्त होतें हैं । इनको अपने आत्मा का प्रैक्टिकल अनुभूति , आत्म साक्षात्कार  या आत्मा का ज्ञान हो  गया होता है । आत्माराम होतें हैं पर ए पूर्ण निष्काम नहीं होतें हैं । हां भौतिक बस्तुओं की कामना इनको नहीं होती , ये भौतिक शरीर और संसार को एक साधन समझ कर इसका ख्याल रखतें हैं । अपने संसार का सदुपयोग भर बस ।  ए भगवद्‌प्रेम चाहतें हैं यही लक्ष्य होता है । आत्मा से परमात्मा के प्रेम को महसुस करना , उनको देखने , सुनने , बातें करने , आलिंगन करने , रस रूप का स्वाद और सुगंध की कामना होती है । ये भक्त होतें हैं । अपने ईष्ट व गुरू से अटूट और अनन्य प्रेम करतें हैं । 

३. Mind centric ( self centric ) ऐसे जीव भगवान और गुरू से अपने आध्यात्मिक प्यास के साथ साथ भौतिक प्यास के पूर्ति की भी  कामना रखतें हैं । यानि केवल मैं और मेरा तु । लेकिन पहले मैं तब तु। इनका ध्येय वाक्य है - पहले आत्मा यानि मन तब परमात्मा, ऐसा सोचते हैं   । ए मन को हीं आत्मा समझते हैं ।
भौतिक कामना की पूर्ति में व्यवधान आया तो प्यार खत्म , जिस मात्रा में भौतिक कामना की पूर्ति हुई उतना प्यार छलक गया । प्यार का उतार चढ़ाव अपने संसारिक इच्छा के पूर्ति के हिसाब से । तो ऐसे लोग आध्यात्म से और भौतिक संसार दोनों से तटस्थ होतें हैं लेकिन खुद के लिए केवल । खुद को खुद से प्यार है और भगवान से भी प्यार है पर स्व हित के लिए । पुर्ण स्वार्थी , ए भगवान, महापुरूष ,संसार , संसारिक रिस्तों  का यानि परिवार , दोस्त , मां बाप , भाई बहन  ,‌बेटा वेटी यानि सभी resources का इस्तेमाल खुद के संतुष्टी के लिए करतें हैं । यह खुद का भक्त होतें हैं । 
भगवान का कभी नहीं । हां भ्रम है इनको की हम भगवान का भक्ति करतें हैं , भक्त हैं पर यह सिर्फ भ्रम है ।
इनके लिए मन हीं देवता , मन हीं ईश्वर , इससे बड़ा ना‌ कोई । इनको बहुत अहंकार होता है। जरा सा बात बर्दास्त नहीं अपने मन के खिलाप । 

४. Family centric - परिवार केंद्रित , ऐसे जीवों के लिए खुद के priority के साथ परिवार का भी priority है । तो ऐसे लोग खुद और अपने परिवार तक सिमित होतें हैं । और इसी हित के लिए भगवान को पुजते है ( इनको भी भक्त नहीं कह सकते हैं ) ए पुर्णत: स:स्वार्थी होतें हैं । समाज रहे या नहीं, मैं और मेरा परिवार, जिसमें बहुत अगर है तो मां वाप को भी शामिल कर लिया नहीं तो‌ केवल मैं मेरा पति हैं मेरी पत्नी और मेरा बच्चा है  बस इससे आगे कुछ नहीं । वांकी सब नाते , रिस्तेदार साधन है इनके लिए । जरूरत परे मां बाप को भगवान , भाई को भगवान , बहन को देवी स्वार्थ बस और गद्हा को भी बाप बना लेतें हैं ।  कोई कोई अपवाद स्वरूप मां वाप भाई से , बहन से प्रेम पर १००% निष्काम नहीं और अपने अहंकार का चरम और उसकी तूष्टि से मतलव है । आप सही वोले तो विरोध गलत बोले तो विरोध । इनका आरती उतारिए , ऐ खुश । कल भुल गए आपका विरोध । ऐसे को समझना और संतुष्ट करना असंभव है । कब किस बात पर नाराज़ हो जाए आपको बताऐंगें भी नहीं । बस खफा । 

५. Society centric - ऐ समाज सेवी होतें हैं । मानव‌मात्र , जीव मात्र के लिय दयालु  ,‌ लेकिन  अपने समाज तक केंद्रित होतें हैं । समाज सेवा के बदले यश , सम्मान आदर चाहिए होता है । नाम भी चाहिए होता है । ऐसे लोगों से समाज चलता है । देश सेवी भी इसी में है। 

६. Community centric ( संप्रदाय विशेष केंद्रित ) ऐ लोग कट्टर होतें हैं , अपने संप्रदाय विशेष को मानने वाले और उसके लिए ही काम करने और लड़ने बोलने बाले। ए लोग सभी चीजों का इस्तेमाल अपने संप्रदाय के अहंकार को तुष्ट करने के लिए करतें हैं । चाहे धर्म ग्रंथ हो या भगवान , जय श्री राम हो या जय शंकर या जय हनुमान या अल्लाह हो या अकबर‌ खुदा हो या कुरान  , ईश्वर जीसस हो या खुदा , भौतिक रिसोर्स हो या आध्यात्मिक । पर सब अपने संप्रदाईक अहंकार की पूर्ति के लिए । एक दूसरे को निचा दिखाना और खुद को ऊंचा साबित करने का प्रयास करना ,  यह विशेषता होती है इन लोंगों की । इनको लगता है कि दुनिया में 12 आना अक्ल सिर्फ मेरे पास है और 4 आने में पुरी दुनियां है । 

७. Universe centric ( विश्व केंद्रित ) ऐसे लोग संसार में महान होतें हैं यह जाति पांति , धर्म , संप्रदाय , चर अचर से उपर उठकर सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय कि चिंता और प्रयास करने वाले होतें हैं । "बसुधैव कुटूंबकं"
ऐसे जीव महात्मा भी होतें हैं और समग्र जीवों के भौतिक कल्याण की भावना वाले होतें हैं , इनका मुख्य ध्यये होता है अपने भौतिक आवश्यकता को कम करो और प्रकृति से तटस्थ होकर जियो । जो आजकल बहुत कम है इस भोगवादी युग में । भगवान ऐसे लोगों को अपना माध्यम बना कर जग कल्याण का काम करतें हैं । ए संत की भांति संसार के जीवों के प्रति निष्काम भाव से समर्पित होते हैं , इनको नाम और बदनामी की कोई चिंता नहीं । बस इनमें सेवा का लक्ष्य सर्वोपरि होता है । 

तो पहला तो अति उत्तम पर्सनैलिटी है । दुसरा उत्तमतर है और सातवां उत्तम पर्सनैलिटी है, पांचवां  ठीक हीं है । 
अत: हमको इन चार प्रकार से हीं मतलव रखना चाहिए ।‌ 

( मेरा यह लेख एक भुमिका है आगे के संसारिक लेख के लिए , उस लेख में इनका इस्तेमाल  होगा आगे  ) 
श्री राधे ।

Sunday, 2 June 2024

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय"-कबीर ।आज कल कबीरदास जी के इस दोहे का दुरूप्योग अक्सर तकिया कलाम के जैसे करते हुए बहुत से तथाकथित विद्वान और भोले भाले लोगों को सुन रहें हैं आप सब । जरूरी है इन बातों को समझना पहले श्री महाराज जी द्वारा ।

श्री महाराज जी द्वारा इस दोहे की व्यवहारिक व्याख्या -
"निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय"-कबीर ।

आज कल कबीरदास जी के इस दोहे का दुरूप्योग अक्सर तकिया कलाम के जैसे करते हुए बहुत से तथाकथित विद्वान और भोले भाले लोगों को सुन रहें हैं आप सब । 
जरूरी है इन बातों को समझना पहले श्री महाराज जी द्वारा ।
मैंने श्री महाराज जी से एक पिकनिक के कार्यक्रम के दौरान एक व्यक्ति के इस दोहे के उपयोग संबधी मार्ग दर्शन सुना है । वो आपसे शेयर करता हुं । बहुत जरूरी है ।
श्री महाराज ने समझाएं हैं ( मैं अपने शब्दों में उनका दिशा निर्देश लिख रहा हुं ) कि कौन से निंदक को अपने आंगन में कुटी छवा कर रखने की सिफारिश कबीर दास करतें हैं तो यह उस दोहे में उन्होंने स्वयं लिखा है - कि जो आपको बिना‌ पानी और साबुन का निर्मल बना दे । आपके बिचारों को शुद्ध कर दे । आपको आपकी गलती बतलाकर आपको सही रास्ता दिखाएं और आपके हित का सोंचें , बिना राग द्वेष के आपका भला चाहे ।

अब ए जो आपका निंदक है जिसके लिए आपको उसका कुटी बनबाना है वो कैसा है ? यह समझना जरूरी है पहले आपके लिए ।
हां तो वो निंदक स्वयं शुद्ध होना चाहिए सबसे पहले , यानि जो स्वयं शुद्ध है , निर्मल है । जिसका मन बुद्धि निर्मल है , वहीं तो आपको भी शुद्ध करेगा ।

 जो खुद गंदा है , जिसका अंत:करण मलिन हैं , बुद्धि क्षूद्र है । मन गंदा है वो आपको तो और गंदा हीं करेगा । और ऐसा निंदक निंदक क्या होगा भला , एक क्षूद्र बुद्धि है तमाम बुराई है उसमें । वो क्या किसी को शुद्ध करेगा ? उससे तो दुर हीं रहना श्रेयकर है ।

निर्मल जल में हीं चेहरा साफ नजर आता है । कोई गंदा पानी में जाकर देखें तो चेहरा और गंदा नजर आएगा और आएगा भी नहीं ।
अतः ऐसा जीव जो निर्मल हो चुका हो या निर्मल है मिलेगा नहीं संत को महापुरुष को छोड़कर इस संसार में कलयुग है , सब गंदा है संत और महापुरूषों को छोड़ कर। 
तो कबीरदास ने ऐसे संत और महापुरूषों को जो स्वयं निर्मल है और आपको आपके गलती को सुधारने के लिए आपके सामने रखता है , तो ऐसे निंदक को अपने घर में कुटी छवा कर यानी उसका संग करने के लिए कबीरदास ने कहा है । वो किसी गंदे जीव को मत रख लिजिएगा आंगन में कुटी बनवाकर, वो तो कुसंग का माध्यम बनेगा , खुद गंदा है तो भला आपको तो और गंदा हीं करेगा । 

आजकल लोग बोल देतें ए दोहे दुसरे की निंदा करतें हैं और अपने बचाव के लिए ऐसा ज्ञान दे देतें हैं । इन लोगों से बच करके रहें । श्री राधे ।

Friday, 24 May 2024

प्रश्न :- मन और चेतना क्या अलग अलग वस्तु है या एक हीं है अन्तर क्या है? सुख और दुख कि कारक चेतना है या मन? कृपा करके मेरे संसयकाे दुर करेगें ?

प्रश्न :-   मन और चेतना क्या अलग अलग वस्तु है या एक हीं है अन्तर क्या है? सुख और दुख कि कारक चेतना है या मन? कृपा करके मेरे संसयकाे दुर करेगें ?

मेरा उत्तर :- अंत:करण चातुष्ट मन बुद्धि, चित तथा अहंकार को कहते हैं । संक्षिप्त में :- बिचारो का प्रवाह है मन  और चेतना प्राण वायु या प्राण उर्जा का प्रवाह है । 
संक्षिप्त में बताऊं आपको कि अंतःकरण चातुष्ट्य मन बुद्धि चित्त  और अहंकार को कहते हैं । 
यह हमारे सुक्ष्म शरीर का अंग है ।
मानव शरीर में आत्मा अपने कारण शरीर ( अपनी अतृप्त इच्छा, वासना  और प्रारब्ध ) एवं सुक्ष्म शरीर के साथ प्रवेश करती है । हमारा यही कारण शरीर भगवान द्वारा फल के रूप में निहित प्रारब्ध के कारण तय योनि में स्थूल शरीर के प्रकार को प्राप्त करता है । अगर मानव शरीर मिला तो फिर कुल , गोत्र,  धर्म,  जाति , देश , गांव,  अमीर , गरीब परिवार , गुण प्रकार परिवार (जैसे सात्विक ,राजसिक या तामसिक ) में जन्म होता है । 
जैसे हीं शरीर में आत्मा का प्रवेश होता है वैसे ही शरीर का यह सौफ्ट वेयर जिसको अंत:करण चातुष्ट्य कहते हैं  एक्टीभ हो जाता है । यानि शरीर में दस प्रकार के प्राण 72000 नाड़ियो द्वारा पुरे शरीर को चेतन मान कर देती है।
जिसमें पांच प्रमुख प्रान , यानि 1 प्राण ,2 अपान ,‌3 व्यान , 4 समान, और 5 उदान  , एवं तीन मुख्य नाड़ियां इड़ा , पिंगला , सुषुम्ना नाड़ी है । 
और अंतिम दसवां प्राण धनंजय कहलाता है जो मरने के बाद जब तक देह का फुनरल यानी जलाने के बाद हीं शरीर से निकलता है अग्नी मार्ग द्वारा ।

तो अब विज्ञान से भी साबित है ( सिगमंड फ्रायड का नाम सुना होगा मशहुर साईक्लोजीस्ट  ) 
जिसने भी सिद्ध किया की 
जीव तीन अवस्था में ही जीता है जब तक जीता है तबतक , ये तीन अवस्था है - 
१. जागृत ( जिसको conscious  mind कहते हैं )
 २. अर्ध जागृत ( जिसको subconscious mind ,) 
३. पूर्ण सुसुप्ति ( जिसको unconscious mind ) कहते हैं ।
और 99.9% मानव इड़ा और पिंगला में हीं तमाम उम्र गुजार देते़ है । 

पर संत महापुरुष , असली भक्त , योगी आदि सुषुम्ना में अपने प्राणों के संचार को तीव्र और स्थिर कर लेतें हैं । जिससे वो जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर अपनी इच्छा से इस मृत्यु लोक में आते जाते हैं । उनपर काल का बस नहीं चलता । वे स्वेच्छाचारी होते हैं , सुसुप्ति अवस्था में भी हमेशा जागृत रहते हैं । या यूं कहिए की वे हमेशा हर अवस्था में जागृत रहतें हैं । जिसको जागृत महावस्था कहते हैं सर्वांतर्यामी अवस्था, सर्व दैविय शक्ति और ईश्वरीय गुणों से सम्पन्न । (always awakening ) जैसे हमारे प्रभु श्री कृपालु महाप्रभु जी ।

और हम लोग इड़ा या पिंगला नाड़ी में ही जीते हैं तो जिसका जो नाड़ी अधिक एक्टींभ होगा वो उसी प्रकार के दो प्रकार के गुणों यानि रजोगुण या तमो गुणी स्वाभाव का होगा । उसका प्रसनैलटी , सोच बुद्धि आदि उसी गुणों के सापेक्ष में होती है । जिसका अनुभव सबको है । कि वो किस प्रकार के सोंच व व्यक्तित्व  का जीव है । 

पर जो जीव ( साधक ) महान महापुरूषों के संग में आ जाता है तो धीरे धीरे उनका सुषुम्ना नाड़ी में दिव्य प्राण उर्जा का  प्रवाह अपने आप शुरू होने लगता है  पर यह साधना के स्तर पर निर्भर करता है । चाहे वो भक्ति मार्गी हो या जप तप , योग मार्गी । पर कलयुग में केवल भक्ति मार्ग जल्दी और तुरंत फलदाई है । 

वांकी आज के तथाकथित योग केवल दो नाड़ी यानि इड़ा और पिंगला को ही मैनेज करती है रामदेव बाबा वाला योग  , जिससे कफ पीत वात को ठिक करके जीव रोग  मुक्त हो सकता है । पर भक्ति से सुषुम्ना नाड़ी एक्टिभ हो जाता है , जिसका प्रारंभिक  प्रमाण है तत्वज्ञान , यादास्त आदी काफी मजबुत हो जाना ।  मैं यह आपको अपनी यादाश्त से लिख के ज़बाब दे रहा हुं । और अगर आप फिजाकली सामने होते तो और भी डिटेल्स में आपको बता पता ।

सुषुम्ना नाड़ी में प्राणों की ज्यादा प्रवाह जीव को पहले सतोगुणी बनाता है । फिर भगवद् प्राप्ति के साथ हीं निर्गुण हो जाता है । और जैसे हीं निर्गुण होता है उसी क्षण गुरू द्वारा शरीर दिव्य हो जाता है और फिर कमाल होता है। उस जीव कि चेतना दिव्य होकर उसका प्रवाह भगवान के तरफ होने लगती है , और भगवान को इन्हीं आंखों से देखने लगता है । तो मन तभी एक्टीभ होता है जब शरीर चेतन मान हो , अतः चेतना प्राण उर्जा का प्रवाह है और मन बिचारों के प्रवाह है । दोनों अलग है । पर यह तभी काम करेगा जब शरीर चेतन मान हो , जैसे कार तभी चलेगी जब उसमें पेट्रौल हो ,फिर उस पेट्रोल से अग्नी रूपी प्राण उत्पन्न होकर कार को चलाएमान करता है और मन ड्राईवर है जो उस कार का संचालन और दिशा देता है  । 

और सुख दूख का कारण मन है , यही सुख दुख का अनुभव अपने तीन गुणों के प्रभाव वश करता रहता है । जिस समय जिस गुण में स्थिर या लय रहता है जीव को उसी प्रकार का अनुभव होता है । एक ही परिस्थितियों को अपने इन्हीं गुणों के प्रभाव के वश अलग अलग सुख दुख के मात्रा और प्रकार को फिल करता है जीव ।
  श्री राधे । : -  संजीव कुमार ।

Thursday, 23 May 2024

एक और अवतार इसी बैवस्वत मन्वंतर में होगा , श्री कृपालु महाप्रभु फिर आएगें । जानने के लिए पढ़िय :-

एक और अवतार इसी बैवस्वत मन्वंतर में होगा , श्री कृपालु महाप्रभु फिर आएगें । जानने के लिए पढ़िय :- 
यह सभी जानतें हैं कि श्री कृपालु महाप्रभु जी श्री राधाकृष्ण के अवतार हैं राधाकृष्ण का कृपावतार , सर्वोतकृष्ट अवतार । ऐसा अवतार एक कल्प में सिर्फ एक बार होता है । 
गौरांग महाप्रभु, भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी का हीं युगल अवतार थे । इस‌ श्रीगौरांग अवतार काल में भगवान श्री कृष्ण अपने हीं आत्मा श्री राधा रानी के ह्रदय को धारण करके अपने हीं रस रूप गुण और लीला का पान किय थे । 
जो वो ब्रज में आज से 5,178 बर्ष परकीया भाव के लीलावतार मे खुद न पा सके । 
ब्रज के वृन्दावन में वो लगभग एगारह वर्ष हीं रहे और पुर्व निर्धारित अनुग्रहित जीवों ( गोपियां जो की ऋषि मुनि थी रामावतार काल के जनकपुर , अयोध्या , दणडकारण्य आदि की ) पर प्रेम रस लुटाया , किन्तु खुद अपने प्रेम रस से वंचित रह गए । 

उसी प्रेम रस का ( यानि अपनी आत्मा श्री राधा रानी के अपने प्रति प्रेमरस का आस्वादन हेतु ), पान करने के लिय गौरांग अवतार लेकर आए । 
फिर वो कृपालु कृपावतार में उसी विलक्षण प्रेम रस को अपने पुर्व निर्धारित जनों में वितरित करने हेतु एक और अवतार लिए । इसलिए यह पुर्वनिर्धारित हम सब जीव बहुत गुढ़ रहस्य हैं । जो करोड़ो जीव पांच हजार दो सौ साल पहले उनके ब्रज में भी उनके प्रेम रस से वंचित रह गए थे और कामना की थी प्रार्थना की थी , भक्ति की थी उनके ब्रज से जाने के बाद उनके प्रेम रस को पाने के लिए । उन उन जीवों को वहीं युगल सरकार कृपालु अवतार में अपने उसी प्रेम रस को वितरित किय उन जीवों को जो उस समय तीव्र भक्ति किया था । उन जीवों को अपने भक्ति भावों की तीव्रता और गहराई के अनुसार मिला । इस अवतार में उनके द्वारा गुढ़ दिव्य तत्त्व ज्ञान हमें मिला , मार्ग दर्शन मिल गया और मिल रहा है लगातार । उनके द्वारा अपने इस‌लीला के कुछ प्रेम का झलक भी मिला और मिल रहा है हमें ताकी हम और प्रयास बढ़ा‌ दें अपना , आगे जुड़ने वाले को भी मिलेगा । यह जन्म तैयारी के लिय है हमें अधिकारित्व प्राप्त करने हेतु ।

 अतः भगवान श्रीराधाकृष्ण की श्री गौरांग लीलावतार अपने राधाभावमयी प्रेम रस का स्वपान हेतु हुआ था और वो अपनी मां, "शची माता" को कह कर गय थे कि मेरा दो अवतार और होगा । और दोनों अगले अवतार में तुम हीं मेरी मां बनोगी । 
उन्होने एक अवतार पांच सौ साल बाद लेने का संकेत दिया था । उनका यही अवतार श्री राधाकृष्ण का कृपावतार श्री कृपालु महाप्रभु अवतार है ।
जो अनुग्रहित पुनर्निर्धारित जीवों के कल्याण के लिए सर्वोत्कृष्ट अवतार है । इस अवतार में श्री महाप्रभु ने अपने जिस रस का पान किया था गौरांग अवतार काल में , वही वो अपने पुर्वनिर्धारित जीवों के मध्य वितरित किए और कर रहें हैं आज लीला संवरण के बाद भी अपने प्रचारक जनों के द्वारा ।
अब आगे एक और अवतार होगा इसी बैवस्वत् मन्वंतर में । ( याद रखिए भगवान श्री राधाकृष्ण का प्रत्यक्ष अवतार , गौरांग अवतार और श्री कृपालु महाप्रभु अवतार इसी बैवस्वत मन्वंतर में हुआ था ) 
हां श्रीराधाकृष्ण फिर आऐगें एक बार , अंतिम बार इस बैवस्वत मन्वंतर में फिर कृपालु कृपावतार होगा । 
इसका उदेश्य अपने कृपालु अवतार में जो लोग श्रीकृपालु महाप्रभु को हीं अपना गुरू मान कर उनका भजन कर रहें हैं उसकी तृप्ति के लिए , अपने परम दिव्य रस का पान कराने के लिए आऐगें । इसलिए सिरियस हो जाईए, अवसर चुके ना । यह चुके तो फिर ऐसा अवसर कबहु नहीं मिलेगो । कितनी भी परीक्षा हो इस जीवन में , लगे रहिए । 
उनका अगला अवतार होगा हम प्रेम रस से वंचित रह गए जीवों को प्रेम रस देने के लिए , हमें एक बार फिर मानव देह मिलेगा उनकी कृपा से और माहौल भी मिलेगा और हमारा यह जन्म भी उनकी कृपा से याद हो जाएगा प्रेम रस मिलने के बाद की हम कितना भक्ति कर रहे हैं अभी ।
जो जो लोग उनका भजन कर रहें जिस भाव से उसको उसी प्रकार अधिकारी बना कर वो प्रेम रस देने के लिए एक अंतिम अवतार, इसी कल्प के इसी बैवस्त मंवतर में लेंगें । यह चैतन्य महाप्रभु जी द्वारा उनका आप्त वचन है अपनी शची मां को ।
और श्रीकृपालु महाप्रभु जी ने भी अपने कुछ प्रवचन में हमें स्पष्ट संकेत देते हुए कहें हैं कि " मुझे एक बार फिर नाक के बल आना होगा " , उन्होंने यह भी कहें हैं कि "हमारे अनुयायियों को फिर से मानव देह मिलेगा क्योंकि ए लोग राधे राधे रटते हैं" । श्री राधे । :- मां रासेश्वरी देवी जी और स्वामी श्री युगल शरण जी के प्रवचन के आधार पर ।

" जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः। केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोस्मि तथा करोमि॥' :- दुर्योधन

प्रश्न - कुछ लोग धर्म कर्म तथा तत्वज्ञान जानते हुए भी भगवान कि ओर नहीं चलते और कुछ लोग किसी महापुरुष से थोड़ा सा जानते हीं तुरंत संसार से एवाऊट टर्न लेकर गुरू के शरणागत होकर भगवान के हो जाते हैं , क्या कारण है ? 
उत्तर :- इस बात को समझने के लिए दो सबसे बढ़िया उदाहरण है - एक अर्जुन का और दुसरा दुर्योधन । दोनो महत्त्वपूर्ण है इस बिषय को जानने ,‌ समझने के लिए ।

याद होगा सबको कि भगवान पांडवों के तरफ से शांतिदूत बन कर गए थे हस्तिनापुर में । धृतराष्ट्र के दरवार में दरवारियों कि सभा बैठी हुई थी । 
भगवान श्री कृष्ण दुर्योधन को समझा रहें हैं कि पांच गांव हीं दे दो पांडवों को सिर्फ। भगवान ने बहुत लौजिक दिया कर्म धर्म का भरी सभा में ।
पर दुर्योधन कहता है भगवान् को कि - 

" जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः। 
केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोस्मि तथा करोमि॥' 
यानि मैं जानता हूँ कर्म-धर्म अच्छी तरह से लेकिन मेरी प्रवृत्ति इनमें नहीं है , मेरी रूचि इन बिषयों में नहीं है । और मैं अधर्म भी जानता हूँ अच्छी तरह से , लेकिन मेरी निवृत्ति न हुई इससे , यानि संसार से आसक्ति समाप्त नहीं हुआ । भोग विलास तथा सत्ता से मुझे वैराग्य नहीं हुआ है इसलिए मैं कर्म धर्म को जानते हुए भी इससे विमुख हुं । 

मतलव वो कह रहा है कि " हे कृष्ण मुझे प्रवचन मत दिजिए धर्म क्या है अधर्म किसे कहते हैं यह मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं, पर मैं क्या करूं ? मेरा न धर्म में प्रवृत्ति हो पा रही और ना अधर्म से निवृत्ति हो पा रही है ।‌ क्योंकि मेरी मनोवृत्ति हीं ऐसी है । मतलव मेरी ( व्यक्तित्व )पर्सनैलिटी हीं ऐसी है ।
हे कृष्ण एक हीं गुरू द्रोण और कृपाचार्य कुल गुरू के हम सब शिष्य हैं (यानि कौरव सौ भाई और पांडव पांचों भाई ) । दस हजार हाथियों का बल भीम में हैं तो मुझमें भी दस हजार हाथियों का बल है पर हम दोनों की मनोवृत्ति अलग अलग है । इसलिए प्रवृत्ति भी अलग अलग है। "

अब आप सब यह भी जानते हैं कि अर्जुन क्या पुछा भगवान से, जब गीता का ज्ञान दे रहे थे भगवान कुरूक्षेत्र में । 
अर्जुन पुछ रहा है :- 
चंचलं हि मन:कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।। ( गीता.६.३४)
वो कहतें हैं भगवान से की यह मन हीं तो बश में नहीं है , मन का ही गुलाम हुं मैं , आप कहें तो मैं हवा का रूख को मोड़ दु़ , नदी के धारा को बदल दुं , पर मन को बश में करना बहुत कठीन है । इसलिए हे श्री कृष्ण यह बतलाइए मैं अपने मन को बश में कैसे करूं ? हे जगद्गुरु श्री कृष्ण मैं अपने मन बुद्धि को आपमें कैसे निवेश कर दूं । यानि आपकी शरणागति कैसे करूं ? 
तब भगवान बोलते हैं कि - 
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।(गीता 6.35।।)
(आप सब भावार्थ जानते हैं इसका । लिखने की जरूरत नहीं है ।)
 अर्जुन को तत्वज्ञान में रूचि है , वो तत्वज्ञान अपने सखा श्री कृष्ण से नहीं वल्कि उनको गुरू मान कर समझने में रूचि दिखाई और इस प्रकार गीता का प्रकटीकरण हुआ जगद्गुरु श्री कृष्ण के मुख से । 

अर्जुन जानता था यह बात कि ज्ञान तो भगवद स्वरूप गुरू से हीं मिल सकता है भगवान से डायरेक्ट नहीं , इसलिए बड़े बुद्धिमत्ता से उसने श्री कृष्ण को गुरू मान कर , तथा बोल कर संबोधित किया । 
अब गुरू को अपने शिष्य के अज्ञान को मिटाना हीं होगा । इसलिए भगवान सत्तरह अध्याय तक अर्जुन के प्रश्नों तथा परिप्रश्नों का जबाब देते रहे । यह संबाद हीं गीता है । 
अंत में अर्जून शरेंडर कर देता है खुद को ( हालाकी अर्जुन पहले से हीं महापुरुष हैं, हम जीवों के शिक्षा के लिए वो यह सब कर रहा हैं , पांडव शरेंडर तो पहले से हीं है भगवान के प्रति । इसलिए तो अर्जुन भगवान‌ से सेना ना मांगकर भगवान को ही मांग लिया था । )

तो दोनों में अंतर है । अर्जुन को प्रपत्ति यानि शरणागत है ।
प्रपत्ति मूला भक्त हैं अर्जुन यानि शरणागत भक्त है वो , इसलिए उसका मनोवृत्ति बदल गया है , मनोवृत्ति बदल गया तो उसकी प्रवृत्ति यानि आचरण धर्मानुकूल हो गया है। इसलिए उसका व्यक्तित्व बदल गया है , इसलिए आज भी अर्जुन के प्रति लोगों का आकर्षण है, आदर है , अर्जुन का व्यक्तित्व आकर्षित करता है सज्जन को । 
पर दुर्योधन का वृत्ति नहीं बदला ,, वो प्रपत्त नहीं है। किसी का भी नहीं , भगवान‌ को तो छोड़िए यहां तक कि ना भीष्म का , न तत्वज्ञानि ताऊ श्री विदुर जी का और न अपने गुरू का ।

 क्योंकि वो माया के दुर्गुण रूपी शकुनी से प्रभावित हैं इसलिए उसकी निवृत्ति अधर्म से नहीं हुआ अंत तक । जैसी संगती वैसी मनोवृत्ति, जैसी मनोवृत्ति वैसी प्रवृत्ति , जैसी प्रवृत्ति वैसी वृत्ति , जैसी वृत्ति वैसा संकल्प , जैसा संकल्प वैसा दृष्यमाण कर्म - यह सिद्धांत है वेद का ।
अत: उसकी मनोवृत्ति अशुद्ध है इसलिए वो उपहास का पात्र है आज भी । और यही कारण था कि अग्नी पुत्री यानि यज्ञशैनी द्रोपदी उस पर व्यंग करते हुए कहा की अंधे का पुत्र अंधा , क्योकि एक स्वाभाविक विकर्षण था उसके प्रसनैल्टी में । मजाक का पात्र बना लिया था खुद को दुर्योधन । अत: गलत लोगो से दुर रहना श्रेयकर है । 

यही कारण है कि तत्वज्ञान केवल जानने से , या समझने से या सुनने से कुछ नहीं होगा । हम संगति किसका कर रहे हैं ? यह महत्वपूर्ण है । जिसकी जैसी संगति उसकी वैसी प्रवृत्ति अपने आप हो जाती है । जिसकी जैसी प्रवृत्ति वैसा आचरण हो जाता है । 
इसलिए हमारे गुरूवर ने कहा है , आदेश दिया है हमें कि सत्संग भले न मिले , या कम मिले लेकिन कुसंगी से दुर रहो । संगति अच्छे लोगों का करो, अच्छे साधकों का करो । 
तब व्यक्तित्व बदलेगा , व्यक्तित्व बदलेगा तो संकल्प भक्ति अनुकूल होगा । संकल्प भक्ति अनुकूल होगा तो वृत्ति शुद्ध होगी । अंत:करण शुद्ध होगा । अंत:करण शुद्ध होगा तो गुरू उसमें दिव्य शक्ति देगा । जब दिव्य शक्ति मिलेगा तो लक्ष्य मिल जाएगा । 

तो यही कारण है कि कलयुग में अधिकतर लोगों कि रूचि हीं नहीं है तत्वज्ञान में । गलत संगति के कारण प्रसनैल्टी डिजऔर्डर का शिकार है अधिकतर लोग आज और कष्ट पाने के बाद भी समझ नहीं । अच्छी बातें न पढ़ना चाहते हैं और न सुनना । केवल मादक बिषयों को सुनने में और उसमें लिप्त रहने में ही रूचि है अधिकतर की । 

 अब बात करते हैं कि यह व्यक्तित्व बनता बिगड़ता कैसे हैं । तो यह अंत:करण चातुष्ट्य के विज्ञान का कमाल है ।
आप सब जानते हैं कि यह अंत:करण चातुष्ट्य क्या हैं ?
मन , बुद्धि , चित् और अहंकार को अंत:करण चातुष्ट कहते हैं । तो ऐ मन क्या है बुद्धि क्या है ,‌ चित् किसे कहतें हैं , अहंकार क्या हैं ? यह कहां रहता है शरीर में कैसे काम करता है यह ? कैसे यह संस्कार को शुद्ध करता है !
फिर यह मशीन‌ कैसे हमारा उद्धार करता है और बर्बाद भी ? 
कैसे यह शुद्ध होता है कैसे और कैसे अशुद्ध हो जाता है ?
तो यह एक विज्ञान है इस पर चर्चा अगले पोस्ट में होगी । 
:- पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन का जीस्ट ( सार )