Thursday, 11 January 2024

तत्वज्ञान क्या है किसे कहते हैं , यह कैसे होगा ?

ऐसे साधक जो अनन्य नहीं है उनके लिए यह पोस्ट बहुत लाभदायक है :- एक जिज्ञासु व्यक्ति ने कल रात सिंगापुर से व्हाट्स एप के द्वारा कौल करके बड़ी विनम्रता से एक जिज्ञासा भरा प्रश्न पुछा कि तत्वज्ञान किस प्रकार साधकों की रक्षा करता है पुरा डिटेल्स में समझाए । तथा यह भी बतलाए की श्री महाराज जी ने जो कहें है तत्वज्ञान हो जाने का मतलव है 50% भगवद् प्राप्ति हो जाना , वो कैसे ? 

उत्तर :- आपका जिज्ञासा विल्कूल सही और उत्तम है , देखिए तत्वज्ञान क्या है सबसे पहले हमें यह समझना होगा । श्री महाराज जी ने हमें तत्वज्ञान करवाया है और आज भी हमें करवा रहे हैं अपने प्रचारकों के द्वारा साथ साथ साधना भी करवा रहे हैं । 
ये तत्वज्ञान बस तीन है । इसी तीन के बारे में अनेकों शास्त्रों में, ग्रंथों में अनेका अनेक श्लोकों के द्वारा लंबी चौड़ी व्याख्या कि गई है। ये तीनों को किसी भगवद् प्राप्त महापुरुष का शरण ग्रहण करके उनके द्वारा ठीक ठीक समझने से तथा उनके बतलाए मार्ग का अनुसरण करने से तत्वज्ञान पक्का हो जाता है जीव को । ये तीन तत्वज्ञान क्या है ?  

तो पहला - हम कौन हैं यानी जीव शक्ति कौन है , क्या है ? भगवान से हमारा क्या संबंध है ?
 दुसरा - ये संसार यानी माया शक्ति क्या है ? 
 तीसरा - भगवान कौन है? तथा हम उनको कैसे प्राप्त कर सकते हैं ? 

बस इन्हीं तीन बातों को वास्तविक महापुरुष वेदों शास्त्रों की ऋचाएं , श्रूतियों, स्मृतियों के श्लोकों का वास्तविक अर्थ समझाते हुए अपने अनुयायियों को तत्वज्ञान करा देते हैं । 
महापुरुषों के द्वारा पूर्ण तत्वज्ञान हो जाने का मतलव यही है कि श्रूतियों स्मृतियों तथा वेद की ऋचाओं के द्वारा उपर्युक्त तीन बिषय में जीव को ज्ञान हो गया यानि ये तत्वज्ञान संबंधित सिद्धियां जीव को प्राप्त हो चुकी । दुसरे शब्दों में कहें तो तत्वज्ञान हो जाने पर ये वेद की ऋचाएं, श्रूतियां , स्मृतियां जो भगवान श्री कृष्ण के अवतार काल में सगुण साकार रूप में गोपियां बन कर आई थी और लीला में भाग ली थी , यही दिव्य शक्तियां तत्वज्ञ को , साधकों के चारों तरफ से सुरक्षा चक्र बना लेती हैं और रक्षा करती है । 

तत्वज्ञान प्राप्त साधक जब भी कभी मायिक एरिया में मन ले जाता है तो तत्वज्ञान खड़ा हो जाता है उसके आगे उसकी बुद्धि में और साधक के विवेक को जगा देता है , ये खबड़दार तुम जो गलत बात अभी सोंच रहे हो वो गुरू द्वारा बतलाए गए मार्ग तथा शास्त्र के यानि मेरे विपरित है अतः सावधान ! इस प्रकार साधक भूल से भी गलत मार्ग में , या गलत बिषय में भटकने से पहले सचेत हो जाता है और उससे एवाऊट टर्न हो कर भगवान और गुरू के अनुकूल मार्ग पर चलने लग जाता है , अब वो व्यक्ति जिसके पास तत्वज्ञान नहीं है वो भटक जाता है उसका पतन हो जाता है और जिसको तत्वज्ञान पक्का हो चुका है वो नहीं भटकता कभी । 

इस प्रकार तत्वज्ञान एक दैविक शक्तियां हैं जिसे ज्ञान शक्ति, या  विवेक शक्ति भी कहते हैं ,ये की ऋचाएं, श्रूतियां, स्मृतियां के रूप में हैं । यह सभी दैविक शक्तियां भगवान श्री राधाकृष्ण के अवतार काल में गोपियों के रूप में सगुन साकार होकर भगवान के परकिया लीला में शामिल हुई थीं । 
और फिर जीव को तत्वज्ञान हो जाने के बाद यही दैविक शक्तियां साधक के चारों ओर अदृश्य रूप में एक अभेध्य सुरक्षा घेरा बना लेती है एवं जब भी साधक का मन कभी माया के एरिया में भटकने का कोशिश करता है तो उसे सावधान कर देती है सचेत करती रहती है, साथ साथ अन्य किसी भी प्रकार के आकस्मिक घटना दुर्घटना या अदृश्य आसुरी बिचारों से, शक्तियों से , आसुरी प्रवृत्तियों से, रजोगुणी तथा तमोगुणी भोग बिषय कि कामनाओं से उसकी रक्षा करती रहती है । ये तत्वज्ञान रूपी दैविक शक्तियां एक वास्तविक श्रोत्रिए ब्रह्मनिष्ट महापुरुष पुरूष की शरणागति तथा उनकी अनन्य भक्ति करने वाले को ही उनसे मिलती है। 

जो अनन्य नहीं है, उनका शरणागत नहीं है, श्रद्धा संपत्ति व विश्वास एवं आस्था से रहित है तथा अन्य के पास भी भटकता रहता है , अपने गुरू के बतलाए मार्ग के अलावा अन्य स्वर्ग के देवी देवताओं का या कर्मकांड का भी सहारा लेकर अन्य देवताओं को पुजता है उनके पास तत्वज्ञान नहीं ठहरता कभी , यानि यह दैविक शक्तियां नहीं ठहरती है उनके पास । 

इसलिए देखते होंगे हम आप कि ऐसा साधक जो अपने गुरू के साथ साथ अन्य मार्ग का भी सहारा लेता है , अपने गुरू के अलावा दुसरे के पास भी जाता है उसके तत्वज्ञान कि विस्मृति हो जाती है एन वक्त पर , समय पर तत्वज्ञान काम नहीं आता उसके , और वो गलत बिषय में फंस जाता है, तत्वज्ञान उसको सचेत नहीं करता है । क्योंकि जैसे ही उसकी अनन्यता भंग हुई कि तत्वज्ञान छीन गया उसका , सुरक्षा चक्र समाप्त हो गया । 
अत : तत्वज्ञान एक ऐसी सिद्धियां है जो गुरू के शरणागत तथा अनन्य जीव के पास हीं ठहरती है अन्य के पास नहीं । 

इसलिए शास्त्रों में वेदों में तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिए यानि इन सिद्धियों कि प्राप्ति के लिए किसी एक ही महापुरूष की शरणागति और केवल उन्हीं की अनन्य भक्ति पर बल दिया जाता है । 
रत्ती भर भी अनन्यता भंग हुई, तत्वज्ञान संबंधित सिद्धियां जितना मिला वो समाप्त हो जाता है, अत: भगवद् प्राप्ति तक साधक के लिए साधना काल में यानि साधन भक्ति काल में एक ही वास्तविक महापुरुष के प्रति अनन्य होकर केवल उनकी हीं शरणागति करना आवश्यक है और केवल उनके द्वारा बतलाये गए मार्ग का हीं अनुसरण करना अनिवार्य है । 
नहीं तो तत्वज्ञान कान से केवल सुन लिए और फिर अन्य जगह जो भी आया उस हरेक का प्रवचन सुन रहे हैं तो इससे कोई लाभ नहीं होने वाला , कोई तत्वज्ञान नहीं होने वाला और न ए दैविक शक्तियां ठहरने वाला हमारे पास कभी। 
बेचारा साधक न तीन में न तेरह में , न इधर का और न उधर का वाली स्थिति में हो जाता है । 
और ऐसा ही साधक कहता फिरता है कि हमको तो कोई अनुभव नहीं होता , हमारे जीवन में शांति नहीं है , मन अशांत रहता है साधना करने के बाबजूद भी ! अरे आपने अनन्यता का पालन किया क्या ? पहले यह देखिए । 
साधना भी कर रहे और अन्य देवी देवता का पुजा कर्मकांड भी कर रहे हैं और शहर में जो आया उसके पास भी जा रहे हैं हर किसी का सत्संग सुनने के लिए ! 
आजकल तो कुछ साधक लोग सोसल मिडिया या टीभी पर श्री महाराज जी का भी सुनते हैं और दुसरे संतों का भी सुनते रहते हैं तो फिर अनन्य तो आप नहीं रहे तो फिर तत्वज्ञान संबंधित दैविक शक्तियां कैसे ठहरेगी आपके पास । और नहीं ठहरी तो फिर आपकी रक्षा कौन करेगा ? फिर दैविक अनुभूति अनुभव कैसे होना शुरू हो जाए भला ? 
 शरणागत और अनन्य हो जाने के बाद एक दिन तो क्या हरेक साधना में अनुभूति होने लगती है , गुरू द्वारा हरेक साधना में कुछ न कुछ नित्य नया दिव्य ज्ञान और अनुभव, आध्यात्मिक धन , मानसिक सुख शांति आनंद आदि डायरेक्ट गुरू कृपा से मिलता रहता है , मानसिक आनंद और सुख की झलक मिलने लगती है । 
यह जरा गहराई से बिचार करना चाहिए। 
श्री राधे , जय जय श्री राधे ।।
:- श्री महाराज जी द्वारा प्राप्त तत्वज्ञान एवं दृष्टी से ।।

लवकुश पर प्रश्न था कि उन्होने अश्वमेध का घोड़ा क्यों रोका और फिर गुरू के कहने पर हीं छोड़ा ! ऐसा क्यों ?

लवकुश पर प्रश्न था कि उन्होने अश्वमेध का घोड़ा क्यों रोका और फिर गुरू के कहने पर हीं छोड़ा ! ऐसा क्यों ?
उत्तर - सबसे पहले हम इसे जीव-धर्म, ज्ञान, तथा व्यवहार के दृष्टिकोण से समझते हैं और फिर साथ साथ तत्वज्ञान कि दृष्टि भी चलेगी ।

लवकुश का जन्म वाल्मीकि आश्रम में हुआ था । उनकी सभी प्रकार कि शिक्षा चाहे वो संसारिक हो , आध्यात्मिक हो, वाल्मीकि जी से तथा उनके वरिष्ठ शिष्यों के द्वारा हुआ था । 
तत्वज्ञान कि दृष्टि से लवकुश भगवान राम और उनकी ह्रलादिनी शक्ति सीता जी के पुत्र थे । 

लेकिन लव तथा कुश दोनों को यह जानकारी नहीं थी कि वे दोनों राजा राम और सीता जी के पुत्र हैं । वो अपनी मां के बारे में नहीं जानते थे कि उनकी मां हीं सीता है । 

वाल्मीकि जी तत्वदर्शी थे उन्होंने राम लीला से पहले ही रामायण लिख दिय थे और बाद में उसी लिखावट के अनुसार राम जी लीला रचे । यानी वाल्मीकि जी को पता था कि अश्वमेध यज्ञ होगा और लवकुश को घोड़ा पकड़ना है और उसके लिए उनको राजा राम के सेना को परास्त करना है , अपने चाचा लक्षुमण , भरत तथा शत्रुघ्न को भी परास्त करना है । यहां तक कि हनुमान जी को भी बांध देना है और भगवान राम को आने के लिए विवश कर देना है फिर अंत में उनको लवकुश को रोकना है , घोड़ां छोड़ने का आदेश देना है , पहले नहीं । 

अब एक और गुढ़ तत्वज्ञान पर ध्यान देने वाली बात है , तत्वज्ञान कि दृष्टि से देखिए तो भगवान राम हीं पांच बन गए लीला के लिए , क्योंकि भगवान एक हीं हुआ करता है , दो कभी नहीं अनंत ब्रह्मांड में ।  

इसलिए एक तो स्वयं भगवान राम रूप में है ,‌ फिर वही स्वयं लक्षूमण बने हैं ( केवल लीला तथा ज्ञान कि दृष्टि से ए शेषनाग के अवतार हैं ) पर तत्वज्ञान कि दृष्टि से भगवान राम हीं अपने सजातिए भेद शून्य, स्वरूप शक्ति के संबित अनुभाग से खुद भरत और शत्रुघ्न बने है और तो और वहीं स्वयं ह्रलादनी शक्ति स्वरूप से सीता बने हैं इस लीला में । 

तो जरा लीला तो देखिए । लवकुश जब घोड़ा पकड़ा तो स्वभाविक है उनके महामंत्री सुमंत जी उनको नहीं पहचान सके होंगे कि ए भगवान राम के हीं पुत्र लवकुश है । लेकिन लक्षुमण , भरत और शत्रुघ्न जो स्वयं भगवान हीं है को कम से कम पहचान लेना चाहिए था अपने भगवद् दृष्टि से कि लवकुश भगवान राम और सीता का हीं पुत्र हैं , उनका भतिजा है । पर लीला यानि एक्टिंग तो देखिए जो सर्वद्रष्टा है वो न पहचानने का एक्टिंग कर रहें है । 
और तो और तत्वज्ञान कि दृष्टि से देखिए तो हद हो गया , हनुमान जी जो रूद्रावतार है ,‌दास भाव में है वो पहचान गए लवकुश को कि वो कौन है और वहां खुद को शरेंडर कर दिया लवकुश के सामने , बंधवा दिया उनके हाथों । और आश्चर्य कि सीमा पार कर गया , बुद्धि चकरा जाएगी कि खुद राम जब खुद आए अंत में घोड़ा छुड़वाने तो वो भी नहीं पहचान रहे है कि लवकुश उनका पुत्र हैं,क्या बढ़िया लीला है , एक्टिंग है भगवान की, हमारी साधारण बुद्धि से परे है यह सब ।‌
 
देवता लोग , महापुरुष लोग , सब लीला देख रहे हैं उपर आकाश से । शीव जी और ब्रह्मा विष्णु भी इस लीला को देख रहे हैं कि भगवान ने संसार को संसारिक कर्म धर्म कि शिक्षा देने के लिए क्या खुब एक्टिंग कर रहे हैं ।

 वाल्मीकि जी भी सब देख रहे हैं शुरू से नौटंकी , अरे खुद लिख चुके थे रामायण इन लीलाओं से पहले हीं । त्रिकाल दर्शी है । सब जानते हैं , चाहते तो घोड़ा पकड़ने के पहले हीं समझा देते लवकुश को कि मत पकड़ो ।

नहीं समझाए क्योंकि संसारिक अल्पबुद्धी बाले हम मनुष्य को धर्म कर्म का शिक्षा जो देना था । 

तो क्या शिक्षा देना था ? 
तो शिक्षा यह देना था कि भगवान राम ने नहीं अयोध्या के राजा राम ने एक साधारण अनपढ़ गंवार , जाहिल धोवी के कहने में आकर अपने पत्नी को त्याग दिए जो न्याय के विपरित बातें है । राजा को तो न्यायी होना होता है न । पर राम ने एक अवला नारी को त्याग दिए । वो भी गंदे अंत:करण वाले जीव के व्यंग के कारण । यह गलत हो गया था । और उपर से राजा राम ( भगवान राम नहीं ) खुद को चक्रवर्ती सम्राट साबित करने के तथा युद्ध में किए गय ब्रह्म हत्या के प्रायश्चित के लिए अश्वमेध कर रहे हैं तो यह सफल कैसे हो सकता है , निर्दोष पतिव्रता नारी का त्याग और अश्वमेध यज्ञ ??? 
तत्वज्ञान कि दृष्टि से भगवान राम को अश्वमेध यज्ञ करने कि क्या जरूरत , वो तो पाप पुण्य से परे हैं । अश्वमेध यज्ञ तो अयोध्या का राजा राम कर रहे हैं ।‌

वाल्मीकि जी ने लवकुश को यही कहानी सुनाए थे कि राजा राम ने अपने निर्दोष पतिव्रता पत्नी का त्याग कर दिया था , वो भी गर्भवती स्त्री को । 
जो न्यायोचित नहीं था । 

इसलिए लवकुश ने एक क्षत्रिए वीर होने के कारण उनके चुनौती को स्वीकार किया और धर्म कर्म युद्ध के निहितार्थ अश्वमेध यज्ञ के घोड़ा को पकड़ लिया । 

और सुमंत जी , यहां तक कि लक्षूमण जी भरत, शत्रुघ्न तथा हनुमान जी का शक्ति भी काम नहीं किया , वहां । जहां अन्याय होता है वहां भगवान अपनी शक्तियों का दुरूपयोग कभी नहीं करते । 

लक्षूमण जी मुर्क्षित हुए लवकुश के वाण से । भरत शत्रुघ्न यहां तक कि हनुमान जी को हार मानना परा । यह शिक्षा देने के लिए संसार को कि भगवान भी अगर वेद विरुद्ध, वैदिक न्याय प्रस्थान के विरूद्ध कोई काम करें तो एक महान गुरू के शिष्य होने के नाते अधर्म का , अन्याय का विरोध करने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए तबतक जबतक गुरूदेव स्वयं आदेश न दें और उचित अनुचित का निर्णय न कर दें ।

अत: अंत में जब इन लीला का उद्देश्य पुरा हो गया , समर्पित शिष्य को अनिति के खिलाफ धनुष उठाने का व्यवहारिक शिक्षा मिल गया लवकुश के माध्यम से संसार में तो गुरू वाल्मीकि जी ने लवकुश को आदेश दिया कि घोड़ा छोड़ दो , यही राम तुम्हारे पिता है और तुम्हारी माता हीं सीता है । 

और भी एक महत्वपूर्ण बात :- 
आपने कहीं देखा है पढ़ा है ? शास्त्रों में रामायण के रचनाकार महापुरूष , महान तत्वज्ञानी वाल्मीकि जी ने , तुलसीदास जी ने या श्री मद्भागवत के रचनाकार वेद व्यास जी ने या स्वयं भगवान श्री कृष्ण तथा राम ने, कहीं भी संसार को यह कहा है कि तुम मेरे पुत्र लवकुश को तथा प्रदुम्न या अनिरुद्ध कि पुजा करो । उनको अपना आराध्य मानों , उनसे शास्त्र ज्ञान हासिल करो ??????

या ये लोग मेरे इन लीलाओ़ का प्रचार करेंगे । तत्वज्ञान का प्रचार करेंगे ?
 नहीं न ।‌
या आपने कहीं देखा है या सुना है इतिहास में कि हमारे पांचों मूल जगद्गुरुओं में से कोई भी अपने संतान को अपने फिलौसफी के प्रचार के लिए नियुक्त किया हो ? 
नहीं कोई नहीं किया । न भगवान ने और न वास्तविक मूल जगतगुरूओं में से कोई भी नही‌ ।

 सभी जगद्गुरूओं ने तथा भगवान ने भी अपने फिलौसफी के प्रचार के लिए अन्य परिकर को हीं नियुक्त किया है अपने वंश या डिसेंडेंट को कभी नहीं ।‌ इसिलिए हर जगह भगवान राम सीता , श्री कृष्ण , राधा रानी तथा गुरू रूप कि हीं अराधना , पुजा तथा भक्ति के लिए भगवान के सभी अवतार तथा महापुरुषों ने मनुष्य को प्रेरित किया है अपने संतान को नहीं । 
यही कारण है कि आज लवकुश या प्रदुम्न या अनिरुद्ध कि कहीं पुजा और भक्ति नहीं कि जाती । मंदीर नहीं है । 

और भगवान तथा महापुरुषों के संतान ने भी कभी स्वयं आगे आ कर उनके सिद्धांतों का प्रचार प्रसार या अपना चरण पुजा नही करवाया कभी ।‌ क्योंकि इससे उनके पिता के यश पर प्रभाव पड़ता । यश तथा प्रतिष्ठा धुमील होता और जीवों का उद्धार नहीं होता । और साधारण संसारी यह समझता कि राम का , कृष्ण का या महापुरुष का पुत्र है इसलिए यह तो स्वभाविक है अपने पिता का गुण तो गायगा हीं ।‌ लोगों का श्रद्धा डगमगाता है , गलत परिपाटी विकसित होगी इससे । 

फिर संसार को तो यही शिक्षा मिलता की जब आप अपने पिता का गुण गाते हो तो हम क्यों न अपने शारिरिक पिता का हीं गुण गाए । और लोग हरे राम हरे कृष्ण की जगह हरे लव हरे कुश कहे, यह लव कुश कभी नहीं चाहते हैं क्योंकि वो भी असली महापुरूष है , विल्कूल निष्काम और निस्वार्थता का मिसाल । 

तो महापुरूषों के संतान को केवल वही करना चाहिए जो भगवान के पुत्रों ने किया । नहीं तो संसारिक लोग नहीं समझेंगे और गलत मैसैज जाएगा संसार में ।‌ 

सारा संसार भगवान और महापुरुषों के संतती है , कोई मानता है, कोई नहीं मनाता है, पर सभी जीव भगवान का, महापुरुषों का ही संतान है यह तत्वज्ञान है । और सब पर उनकी दृष्टि है , सबके कल्याण कि चिंता उनको रहता है । केवल अपने लीला के दरम्यान पुत्र के लिय नहीं । भगवान और महापुरूष हमेशा निष्पक्ष होते हैं । पुरा ब्रह्मांड और सभी जीव उनके अपने है । 

केवल परकिया भाव के लीला के निमित्त किसी जीव या महापुरुष को भगवान अपने अकारण करूण स्वाभाव से वो अपने पुत्र के रूप में लाते हैं संसार में । अगर वो संतान वास्तव में महापुरुष हैं तो वो भगवान और अपने पिता के इच्छा के विरुद्ध कोई व्यवहार नहीं करेगा कभी । और अगर नहीं है तो फिर .... भगवान को केवल अपना हीं संपत्ति समझेगा और पाप का भागीदार होगा ।

और एक अनन्य शिष्य का पहला धर्म है कि वो केवल अपने इष्ट और गुरू के आदेशों का हीं पालन करें उन्हीं के सिद्धांतों पर चले या जरूरत परे तो शंका समाधान के लिए उनके द्वारा अधिकृत या नियुक्त जीव के पास हीं जाए शंका समाधान के लिए । अन्य का कभी नहीं , चाहे वो भगवान या महापुरुषों के संतान या संबंधी या रिस्तेदार क्यों न हो । 
सम्मान तो हरेक का करना चाहिए पर शिष्य को केवल अपने इष्ट और गुरू के प्रति ही समर्पित तथा उत्तरदाई होना चाहिए, अन्य का परवाह कभी नहीं करना चाहिए । और अन्याय , अनिति , अधर्म के बारे में खुद को तथा संसारी को सचेत करना चाहिए जहां तक संभव हो । 
श्री राधे ।:- संजीव कुमार । रांची ।।

Saturday, 6 January 2024

भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि पहले " सर्वधर्मान् परित्यज " उसके बाद "शरणं व्रज " उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि पहले शरणं व्रज फिर सर्व धर्मान् परितज्य ‌।

श्रीकृष्ण - इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः -- सर्वधर्मान् परित्यज्य सन्यस्य सर्वकर्माणि इत्येतत्। 
माम् एकं सर्वात्मानं समं सर्वभूतस्थितम् ईश्वरम् अच्युतं गर्भजन्मजरामरणवर्जितम् अहमेव इत्येवं शरणं व्रज?
 न मत्तः अन्यत् अस्ति इति अवधारय इत्यर्थः। 
अहंत्वा त्वाम् एवं निश्चितबुद्धिं सर्वपापेभ्यः सर्वधर्माधर्मबन्धनरूपेभ्यः मोक्षयिष्यामि स्वात्मभावप्रकाशीकरणेन। 
उक्तं च नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता (गीता 10।11)
 इति। अतः मा शुचः शोकं मा कार्षीः इत्यर्थः।।

भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि पहले " सर्वधर्मान् परित्यज " उसके बाद "शरणं व्रज " 
उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि पहले शरणं व्रज फिर सर्व धर्मान् परितज्य ‌। 
यानि मेरी शरणागति तब होगी जब तुम अपने सभी कर्म-धर्म , मायाबद्ध रिस्तेदारो , तमाम जन्मो का मायिक ज्ञान-वान को त्याग कर मेरे शरण में आओगे । तब तुम्हारी शरणागति होगी । उसके बाद मैं तुम्हारे सभी पाप और पुण्य दोनों को भष्म करके अपनी शरण में लूंगा और फिर मैं तुम्हारा योग क्षेम वहन करूंगा , तेरा ठेका मैं स्वयं ले लूंगा, फिर तेरी सारी जिम्मेदारी मेरी । उससे पहले नहीं । 

वो केवल मुख से बोलने से नहीं होगी शरणागति और न चरण में सिर पटक देने से । 
ये जो हम भगवान और गुरू के सामने मुख से कहते हैं कि मैं आपसे शरण में हूं । यह चार सौ बीसी है । कोई लाभ नहीं इससे । 

मुझसे प्रेम करना चाहते हो मुझे पाना चाहते हो , मेरी संपत्ति पाना चाहते हो ? जी महाराज तो संसार से आसक्ति तथा प्रेम छोड़ना होगा और केवल मेरे शरण में आना होगा ।‌

वो‌ केवल मुख से बोलने से कि मैं आपसे प्यार करता हुं प्रेम नहीं है । मन में संसार कि भी कामना और मुझसे भी प्रेम का इजहार ? यह छल है । यह असंभव है । जहां मेरी दासी माया रहती है वहां मैं नहीं रहता जी , जितनी मात्रा में संसारिक कामना मिटी है उतना हीं मैं तुमको प्यार करता हुं और तुम मुझे , सीधा सा गणित है । :- श्री महाराज जी के प्रवचन से

Friday, 5 January 2024

धन कि तीन प्रकार की गति होती है।।

धन कि तीन प्रकार की गति होती है
 पहला- गति, 
दूसरा- सद्गति , 
तीसरा - दुर्गति । ( यानी - सात्त्विक गति, राजसिक गति , तामसिक गति ) 
अगर हम आप अपने धन का सदुपयोग नहीं करेंगे तो धन का नाश और दुरूपयोग निश्चित है। धन रहेगा नहीं । लक्ष्मीं चंचला हैं । आए बंद हो जाएगी , दरिद्रता आएगी हीं । यह निश्चित है । 

धन का गति - अपने शरीर को तथा अपने आश्रितों के शरीर के जरूरी तत्त्वों के उपर खर्च करना धन की गति है । अपने शरीर और अपने उपर आश्रित जीवों के आवश्यक आवश्यकता पर खर्च करना धन की गति है । यह आवश्यक हैं । जो कंजुसी करता है , अपने आवस्यक आवस्यकता के उपर , अपने उपर आश्रित जीवों के उपर खर्च नहीं करता तो उसके धन का नाश , रोग और शोक में होता है ।

धन की सद्गति - अपने कमाई से या संचित धन का एक हिस्सा सत्पात्र को दान करना । हरि -गुरू के निमित्त दान करना धन की सद्गति है । इससे इह्लोक और परलोक दोनों का लाभ मिलता है । इससे जीवों के अच्छे प्रारब्ध का निर्माण होता हैं । धन के सदुप्योग से भौतिक सुख-शारीरिक सुख और दान से जीव हरि-गुरून्मुख होकर असीम मानसिक सुख का , अध्यात्मिक सुख का, भगवद्‌प्रेम की लालसा का बढ़ना और भगवद् कृपा का सुख मिलता है । हरि गुरू की विषेश कृपा प्राप्त होती है । हरि गुरू इस दान में प्राप्त धन को भोले भाले दुसरे जीवों के लिए खर्च करतें हैं । वो धन को इसी लोक में जीवों के उपर लुटातें हैं । एक स्वस्थ व्यक्ति को रक्त दान भी करना आवश्यक है । जिसको रक्त की जरूरत हो मिल जाए , वो बेचारा बच जाए । 
हरि गुरू धनवान वेटे से धन लेकर अपने निर्धन पुत्र के निमित्त खर्च करतें हैं और धन की सेवा करने वाले के अच्छे प्रारब्ध का निर्माण करतें हैं चुप चाप , बिन बोले , बिना बतलाए । योगक्षेम बहन करतें हैं , सम्भालतें रहते हैं ।

धन की दुर्गति - अब अगर धन का उपर्युक्त बिधि से गति और सद्गति नहीं होता हैं तो धन का दुर्गति तो होगा हीं , चौथा रास्ता तो है हिं नहीं ।
ऐसे में धन का लुट जाना , डकैती हो जाना , चोरी हो जाना , संचित धन का नाश कुपुत्र के द्वारा । तामसिक पदार्थों के उपर धन का खर्च होकर नाश , जैसे शराब, कबाब , जुआ , ( शेयर मार्केट ) व्यापार में नुकसान व घाटा , रोग , दुर्घटना , केस , मुकदमा आदि के माध्यम से धन का नाश होगा हीं । और इनकम भी बंद हो जाता है । आय बंद । दरिद्रता आ जाती है । 
आवस्यक आवस्यकता से अधिक की बस्तु पर धन खर्च करना , भोग बिलास की बस्तुओं पर खर्च करना धन का दुरूपयोग है , दुर्गति है ।
:- मां के बहुत पुराने प्रवचन के आधार पर ।

विपरित परिस्थित में अनुकूल चिंतन क्या होता है को समझने के लिए सबसे पहले विपरित परिस्थितियां को ठीक से समझना होगा ।

विपरित परिस्थित में अनुकूल चिंतन क्या होता है को समझने के लिए सबसे पहले विपरित परिस्थितियां को ठीक से समझना होगा । 
तब श्री महाराज जी का यह सिद्धांत समझ में आएगा ।

विपरित परिस्थितियां हैं :- माया । संसारिक इंद्रियादिक सुख दुख का फिलिंग को कहते हैं विपरित परिस्थितियां । 
संसार से मोह , धन का लोभ और जो धन है उससे मोह , अपने जन यानि रिस्ते नातेदार यानि पति पत्नी शारिरीक माता पिता पुत्र पुत्री आदि से मोह , अपने संसारिक ज्ञान का अहंकार की मैं बड़ा पढ़ा लिखा हुं डि लीट हुं । तो यह है विपरित परिस्थितियां । 

इनके बिच रह कर और इनसे मन के गहराई से निर्लिप्त होकर , मोह लोभ त्याग कर इन‌ सबको मन से अपना न‌ जान कर और व्यवहारिक रूप से भी अपना न मान कर केवल एक मात्र अपने गुरू तथा ईष्ट को हीं अपना सबकुछ मान कर उनको व्याकूल होकर रो कर पुकारना और केवल उन्हीं के सिद्धांतों पर चिंतन करना है अनुकूल चिंतन । 

और साधना क्या है ? साधना है इन्हीं तमाम संसारिक बिषय वस्तू जीव ज्ञान धन जन से मोह त्यागने का तथा केवल भगवान और गुरू को अपना मानने का उनसे संबंध जोड़ने का व्यवहारिक प्रैक्टिस करना । 

भगवान और गुरु का रूपध्यान करते हुए इन सबसे मोह लोभ अटैचमेंट को गुरू के चरणों में त्याग देना शरणागति है । 
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि पहले " सर्वधर्मान् परित्यज " उसके बाद "शरणं व्रज " 
यानि मेरी शरणागति तब होगी जब तुम सब कर्म-धर्म , मायाबद्ध रिस्तेदारो , तमाम जन्म का संसारिक ज्ञान को त्याग कर मेरे शरण में आओगे । तब तुम्हारी शरणागति होगी । उसके बाद मैं तुम्हारे सभी पाप और पुण्य दोनों को भष्म करके अपनी शरण में लूंगा और योग क्षेम वहन करूंगा । उससे पहले नहीं । 
इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः -- सर्वधर्मान् परित्यज्य संन्यस्य सर्वकर्माणि इत्येतत्। माम् एकं सर्वात्मानं समं सर्वभूतस्थितम् ईश्वरम् अच्युतं गर्भजन्मजरामरणवर्जितम् अहमेव इत्येवं शरणं व्रज? न मत्तः अन्यत् अस्ति इति अवधारय इत्यर्थः। अहं त्वा त्वाम् एवं निश्चितबुद्धिं सर्वपापेभ्यः सर्वधर्माधर्मबन्धनरूपेभ्यः मोक्षयिष्यामि स्वात्मभावप्रकाशीकरणेन। उक्तं च नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता (गीता 10।11) इति। अतः मा शुचः शोकं मा कार्षीः इत्यर्थः।।

वो दो एक घंटे को आंख बंद करके और उनका ध्यान कितना कल्प तक करते रहिए लेकिन अपने संसार और संसारिक सुख सुविधा , सुख दुख तथा मायाबद्ध रिस्तेदारो से अटैचमेंट कि समाप्ति जबतक नहीं होगी तब तक कोई भी साधना सफल नहीं हो सकती , भगवान का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं हो सकता । साधना के दौरान या उनको याद करने भर से आंखों में असली अश्रु नहीं आएंगे । 

आप सोचोगे माया भी रहे मेरे पास और मोहन‌ भी मिल‌ जाए , तो ऐसा होना असंभव है कभी नहीं हो सकता । माया में रत्ति भर भी धंसे मन को मनमोहन मोहित कभी नहीं करते । 
चाईलेंज है मेरा । 
महाभारत के संजय का मन शुद्ध था इसलिए मनमोहन ने उसको मोहीत कर लिया और धृतराष्ट्र का नहीं, गांधारी का नहीं । 
कुन्ती बुआ त्याग कि प्रतिमुर्ती थी । माया में मन नहीं धंसा था उनका । इसलिए मोहन ने उनका मन मोहीत किया गांधारी का नहीं । 

साधना के लिए एकांत चाहिए, कोलाहल नहीं । एकांत में संसार और संसारिक सभी बिषय वस्तुओं से रत्ति भर तक के अटैचमेंट के त्याग के प्रैक्टिकल प्रैक्टिस को और केवल अपने गुरू और इष्ट से हीं एक मात्र अटैचमेंट रखने के मानसिक भाव को बार बार उत्पन्न करने के उद्धम को साधना कहते हैं और जिस दिन ऐसा हो जाए वास्तव में उसको सिद्धी कहते हैं ।

चलिए महाभारत में । अर्जुन दोनो सेना के बिच खड़े हैं भीड़ से दुर अपने गुरू श्री कृष्ण के सामने , गुरू सत्रह अध्याय तक तत्वज्ञान देकर समझा रहे हैं साधना करवा रहे हैं, फिर अठारहवे अध्याय तक आते आते अर्जुन ने मन से यह स्वीकार कर लिया कि अपने गुरू और ईष्ट को छोड़ कर सब माया है इनसे मोह समाप्त हो गया उसका । 
फिर अर्जुन इन तमाम संसारिक सुख दुख कि कामना , तमाम रिस्तेदारो से मोह और तमाम पिछले जन्मों का मायिक ज्ञान को अपने गुरू श्री कृष्ण के चरणों में त्याग कर दिया और हाथ जोड़ कर खुद को उनके हवाले करके खड़ा हो गया और कहा अब जो आप आदेश देंगे वहीं करूंगा । इसी को कहते हैं शरणागति। 
शरणागति का मतलव यह नहीं कि हम संसार से और संसारिक बिषय वस्तुओं से भी मोह लोभ अटैचमेंट रखें, इन सबको भी अपने मन में रखें और केवल शाब्दिक रूप से गुरू को कहें कि हम आपके चरण शरण में खड़े हैं । 
अरे तुम शरण में हो कहां ? तुम तो अपने मन के अंदर अपने तमाम संसार से अटैचमेंट भर रखें हो ।
नहीं स्वीकार होगी ऐसी शरणागति । 

तो असली शरणागति है इन तमाम संसार से मोह को गुरू के चरणों में त्याग कर केवल उनको अपना सबकुछ स्वीकार करना । तभी संसार से वैराग्य और उनसे प्रेम होगा । नहीं तो असंभव । 

दिव्य बस्तुओं को पाने के लिए मायिक बस्तुओं का त्याग आवश्यक है , यह त्याग मन से होना चाहिए, शरीर से हो या न हो । 
अरे संसार में भी कोई भी संसारिक सामान पाने के लिए बहुत कुछ खोना परता है जीव को , जिसने बचपन में घर के सुख सुविधा का मोह त्याग कर पढ़ाई साधना कि वो डौक्टर इंजिनियर बना , जिसने त्याग नहीं कि वो आवारा बना बैठा है । तो दिव्य बस्तु को पाने के लिए हम संसार को खोना‌ नहीं चाहते और पाना जरूर चाहते हैं यह कपट नहीं चलेगा, यह असंभव है । गुरू दिव्य बस्तु नहीं देगे । चाहे उनके शब्द को कितना भी ग्रहण कर लो और दुसरे को बताओ । चिराग के तले अंधेरा हीं रहेगा आपके । आपको कुछ नहीं मिलने वाला इन‌ लोक रंजनों से । 

जब तक मन से वैराग्य नहीं होगा संसार से, मन से संसार छुटेगा नहीं आपके तबतक आपके मन को दिव्य नहीं बना सकते गुरू । यह मस्तिष्क में बैठ जाएं ठीक से तो अच्छा है ।

जब अर्जुन ने तमाम मोह लोभ संसार का त्याग दिया गुरू के चरण में तब गुरू उसके मन बुद्धि और ईंद्रियों को दिव्य बना कर अपने भगवद् स्वरूप का दर्शन करा दिय। 

अब संजय के मन बुद्धि को कौन दिव्य बनाया ?
तो संजय के मन बुद्धि और इंद्रियों को दिव्य शक्ति से दिव्य बनाया उसके गुरू वेदव्यास जी ने । संजय का मन शुद्ध था इसलिए । 

उन्होंने धृतराष्ट्र के मन बुद्धि और ईंद्रियों को क्यों नहीं दिव्य बनाया ?
तो नहीं बनाया इसलिए कि धृतराष्ट्र अपने पुत्र के मोह में डूबा हुआ था । संसारिक सत्ता के लोभ में धंसा हुआ था उसका मन ।
इसलिए संजय के मुख से महाभारत और गीता का उपदेश सुन कर भी कोई असर नहीं हुआ उस पर ।
जिसका मन संसार में धंसा होता है उस पर सिद्धांत ज्ञान का कोई असर नहीं होता और वो धृतराष्ट्र के तरह एक दिन समाप्त हो जाता है ।

आज यही हो रहा है हम सबके साथ तमाम तत्वज्ञान गीता, रामायण, श्री मद्भागवत्, तथा सत्संग के बाबजूद हम उपर नहीं उठ रहे है़ । हमारा मन धृतराष्ट्र कि तरह अपने संसारिक बिषय वस्तु एवं जन में धंसा हुआ है इसलिए संजय से केवल सुन रहे हैं ,‌ सिद्धांत , तत्वज्ञान आदि हम केवल शाब्दिक ज्ञान के रूप में धृतराष्ट्र कि तरह ग्रहण कर रहे हैं लेकिन उसका वास्तविक अर्थ नही ग्रहण समझ रहे हैं इसलिए हमारी गति भगवान और गुरू कि ओर नहीं हो रही हो , हम अधोगति कि ओर है । 

हम अगति यानि संसार में हीं भटक रहे है और स्वयं को साधक समझने का गलतफहमी पाल रखे हैं । 

इसलिए अपने गुरू को ध्यान करके चिंतन करिए। मेरी इन बातों को गहराई से समझने का प्रयास करिए । यह सब अपने गुरू श्री महाराज जी से दृष्टि पाया है मैंने और आपको बता रहा हुं । अहंकार त्याग कर स्वीकार करिए । मेरी चिंता मत करिए । मुझे समझने में अपना समय बर्बाद मत करिए । मेरी चिंता सिर्फ मेरे गुरू श्री महाराज जी को करने दिजिए । श्री राधे ।

भगवान शंकर क्यों नहीं गए रावण की मायानगरी श्री लंका ?

भगवान शंकर क्यों नहीं गए रावण की मायानगरी श्री लंका ? 
उत्तर :- मायिक बिषय बस्तु और मायाबद्ध जीव के साथ राग या द्वेष से दूषित अंत:करण वाले जीव के मन को मनमोहन मोहित नहीं करते कभी, वो केवल सरल तथा निर्मल मन जन से प्रेम करते हैं, उनको अपना बनाना है तो हमें अपने मन को, चित्त को शुद्ध करना हीं होगा,

यह बात गांठ बांधने कि है कि जिस तरह एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती उसी प्रकार जिस ह्रदय में मायिक बिषय बस्तु और मायाबद्ध जीव हो वहां श्रीराधाकृष्ण नहीं ठहर सकते हैं कभी, दोनों विरोधी तत्व है ।
जहां दासी माया होगी वहां श्री कृष्ण नहीं रहते । या तो हम उनके दासी माया से प्यार करें या माया को त्याग कर उनसे प्यार करें । दोनों एक साथ एक ह्रदय मन में नहीं ठीक सकते कभी । असंभव । 
कोई यह भी सोचे कि श्री राधाकृष्ण न रहेंगे तो हम तो दुर्गा , काली ,‌शंकर जी गणेश जी , विष्णु जी , लक्ष्मी जी , हनुमान जी को, ब्रह्मा जी सरस्वती जी को अपने ह्रदय में रख लेंगे , उनकी भक्ति कर लेगें । 

न न न यह भी असंभव है । जिस ह्रदय में भगवान की दासी माया हो वहां कोई भी माया से परे तत्व नहीं टिक सकते कभी । 
सब श्री राधाकृष्ण के नित्य तथा नीज परिकर है , उनके हीं स्वरूप शक्ति है । उनके सजातिय भेद शून्य तत्व है । 
इसलिए ये सभी भगवान श्री कृष्ण के बिजातिय भेदाभेद तत्व माया के साथ साथ नहीं टिक सकते । अरे टिकना तो दुर की बात ,‌ आ हीं नहीं सकते ।

उदाहरण रावण जैसा महान कर्मकांडी , महान जपी तपी पुजा पाठी भगवान शंकर को प्रसन्न कर लिया और वरदान के रूप में मांगा कि आप हमारे महल श्री लंका में रहें ।
भगवान ऐसा बनाव बना दिए कि रावण को लघुशंका लग गया , वरूण देव घुस गया रावण के अंदर । और वो बैद्यनाथ जी में ही ठहर गए । वो नहीं गए माया की नगरी श्री लंका । 
तो जहां श्री राधाकृष्ण नहीं जाएंगे वहां कोई भी भगवान नहीं जा सकते हैं । भ्रम में न रहे । यह अकाट्य सत्य है । श्री राधे । 
 :- श्री महाराज जी के सिद्धांतों से सिद्ध है ।

मिटा कर कामना संसार की जो सजदा करें सरकार की,

मिटा कर कामना संसार की जो सजदा करें सरकार की,
न हो जन्नत की तमन्ना, न ऐश्वर्य सुख सम्राट की ,
न चाहत हो कर्मकांड की, न मुक्ति की,न भुक्ति की,
बिठाके हृदय में सियाराम को जो सेवा करें सरकार की, 
मिल जाती है उसे हर खुशियां गोलोक की, दोनों जहान की ।।

लाखों जन्म कोई यदि तप करें, कोई यज्ञ या तिरथ करे ,
नहीं मिलती उसे भक्ति कभी प्रभु राम की या राधाकृष्ण की, 
न हो ज्ञान की कोई कामना, न योग की, ना मंत्र जाप की
ना लोभ हो संसार की, न हो मोह माया लोक की , 
मिलते उसे भगवान है जो शरणागति करें रसिक सरदार की, 
वहीं पाया उन्हें जो अनन्य निरंतर गाय गुण गोपाल की,
न हो कामना संसार की, न मुक्ति की, ना हीं भुक्ति की,
कामना बस एक हो, सेवा मिले सरकार की,
दर्शन मिले,भक्ति मिले, मिले निवास गोलोक की, 
मिलते उसे भगवान है जो शरणागति करें कृपालु सरकार की ।। 
:- श्री गुरूदेव के प्रेरणा से मेरे द्वारा रचित भक्ति गीत , संजीव कुमार ।।
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