Tuesday, 30 April 2024

श्री महाराज जी द्वारा रचित पुस्तकें तथा अन्य शास्त्र।

सबसे पहले तो यह बता दूं कि श्री महाराज जी कि यह तस्वीर हाथों से बनाई गई है । और उनके द्वारा प्रकट किए गए तथा संकलित किए गये दुर्लभ दिव्य तत्वज्ञान से भरे पुस्तकों का नाम जो गागर में सागर के तुल्य है तथा जिसे पढ़ने एवं ग्रहण करने का सौभाग्य अति सौभाग्यशाली जीवों को हीं मिलता है, पुस्तक का नाम आगे दी गई है । शेष जीव दुर्भाग्य बस श्री महाराज जी के दिव्य तत्वज्ञान के प्रति लालसा , जिज्ञासा , उत्कंठा आदि उत्पन्न नहीं कर पाते हैं क्योंकि तत्त्वदर्शन काफी दुर्लभ वस्तु है जो संसारिक बिषय भोग से परे है । 
मानव शरीर पाकर भी 99% में से अनेकों भाग्यशाली जीव किसी के द्वारा समझाने के बाबजूद भी इन पुस्तकों का अवलंब नहीं ले पाते हैं क्योंकि उनकी प्रवृत्ति केवल संसारिक बिषय भोग के तरफ हीं है । 

साथ ही साथ कुछ हमारे सनातन धर्म परंपराओं के पवित्र शास्त्रों का नाम जो भारत को विश्व गुरू का गौरव प्रदान किया जो आजकल कुछ अति कुतर्की, कुबुद्धि, अधर्मी, लोभी , स्वार्थी, भ्रांत ज्ञानी , प्रमादी , कर्णपाटव से ग्रसित तथा भ्रमित चंद लोगो के कारण कलयुग में धुमिल हुआ है जिसे फिर से श्री कृपालु जी महाप्रभु द्वारा आसान बना कर सरल भाषा में समन्वय करके पुनर्जीवित किया गया है । जिस बल से हमारा भारत एक बार फिर से अपने खोय हुए गौरव को पुनर्स्थापित करने की ओर बढ़ रहा है । 

हमारे हिन्दू संस्कृति का स्थान दुनिया में सबसे ऊंचा था , कारण हमारे पुर्वजों ने पुरे दुनिया को उच्च कोटी के आदर्शों के साथ तमीज और तहजीब से रहना और जीना सिखाया , भारत विश्वगुरू था , ज्ञान में अव्वल , विज्ञान में अव्वल , आध्यात्म में अव्वल , संस्कार और संस्करण में अव्वल , चरित्र और नैतिकता में अव्वल , मानवता में अव्वल , भक्ति में अव्वल , क्षमा ,त्याग , दया , करूणा और दानादि दैविक गुणों में अव्वल । पर कालक्रम में आताताईयों ने इन‌सबको खत्म कर अपना झूठा इतिहास सामने रख दिया और इन सबको लुप्त कर दिया । 

लेकिन भारत विश्व का गुरू था , है और रहेगा हमेशा क्योंकि यह सौभाग्य भगवद् कृत है, मानव कृत नहीं जो इसे मिटा सके कोई । 
भारत के बिना विश्व शांति कि परिकल्पना हीं व्यर्थ है । जैसा कि नाम के उद्बोधन से स्पष्ट है ।
 'भा' का मतलव ज्ञान और 'रत' का मतलव रचित , बसित खोजित , प्रकटित तथा कण कण में व्याप्त।  

अत: भारत के कण कण में दिव्य ऋषि मुनि महापुरूषों , संतो के चरण रज के साथ साथ उनका दिया ज्ञान भी व्याप्त है । जिस कारण यह भारत भूमि परम पवित्र और दिव्य है । लेकिन इसका अनुभव , महत्व और आभास केवल उनके लिए है जो मानव है, मनुष्य है । जो मानव के भेष में असुर है , राक्षस है, उनको न तो इसका अनुभव हो सकता है और न कभी वो अपने कल्याण के प्रति जागरूक हो सकते हैं । 
ऐसे जीव कुतर्क , विचित्र तर्क , अति तर्क में ही अपने दुर्लभ मानव यौनि के जीवन को गवां कर फिर से तिर्यक यौनियों के तरफ बढ़ने के तरफ अपने ही हाथों बाध्य है । 

इसलिए मैं सबसे अपील करता हुं कि अगर आप अपना मानव जीवन सफल बनाना चाहते हैं तो श्री कृपालु जी महाराज जी का पुस्तक पढ़िए । उनकी पुस्तकें सभी ग्रंथों का सार है , जो कठिन से कठिन ग्रंथों को आसान भाषा में समझाने में सक्षम है । 

आज सौभाग्य से हमारे पास निम्नलिखित सभी भारतीय शास्त्रों का सार हमारे श्री कृपालु महाप्रभु जी द्वारा रचित इन उच्चतम कोटी के शास्त्र के रूप में उपलब्ध है जैसे :- 

1. प्रेम रस सिद्धांत 
2. मैं कौन मेरा कौन 
3. नारद भक्ति दर्शन
4. दिव्य स्वार्थ 
5. रास पंचाध्यायी
6. कामना और उपासना 
7.जीव का लक्ष्य 
8.गुरूकृपा 
9.रूपद्यान 
10.प्रेम रस मदिरा 
11.भक्ति शतक 
12.गुरू तत्त्व
13.युगल शतक 
14. राधा गोविंद गीत 
15.गुरू भक्ति 
16.गुरू कृपा 
17.प्राणधन जीवन कुंज बिहारी 
18.गुरु गोविंद आदि 

ध्यान रखिए ये श्री महाराज जी के शास्त्र भगवान की आप्त वाणी हीं है ।‌क्योंकि श्री महाराज जी स्वयं राधाकृष्ण के युगल अवतार हैं । इनके पुस्तक निम्नलिखित पुस्तकों का आसान भाषा में सार है । 

1-अष्टाध्यायी पाणिनी
2-रामायण वाल्मीकि
3-महाभारत वेदव्यास
4-अर्थशास्त्र चाणक्य
5-महाभाष्य पतंजलि
6-सत्सहसारिका सूत्र नागार्जुन
7-बुद्धचरित अश्वघोष
8-सौंदरानन्द अश्वघोष
9-महाविभाषाशास्त्र वसुमित्र
10- स्वप्नवासवदत्ता भास
11-कामसूत्र वात्स्यायन
12-कुमारसंभवम् कालिदास
13-अभिज्ञानशकुंतलम् कालिदास  
14-विक्रमोउर्वशियां कालिदास
15-मेघदूत कालिदास
16-रघुवंशम् कालिदास
17-मालविकाग्निमित्रम् कालिदास
18-नाट्यशास्त्र भरतमुनि
19-देवीचंद्रगुप्तम विशाखदत्त
20-मृच्छकटिकम् शूद्रक
21-सूर्य सिद्धान्त आर्यभट्ट
22-वृहतसिंता बरामिहिर
23-पंचतंत्र। विष्णु शर्मा
24-कथासरित्सागर सोमदेव
25-अभिधम्मकोश वसुबन्धु
26-मुद्राराक्षस विशाखदत्त
27-रावणवध। भटिट
28-किरातार्जुनीयम् भारवि
29-दशकुमारचरितम् दंडी
30-हर्षचरित वाणभट्ट
31-कादंबरी वाणभट्ट
32-वासवदत्ता सुबंधु
33-नागानंद हर्षवधन
34-रत्नावली हर्षवर्धन
35-प्रियदर्शिका हर्षवर्धन
36-मालतीमाधव भवभूति
37-पृथ्वीराज विजय जयानक
38-कर्पूरमंजरी राजशेखर
39-काव्यमीमांसा राजशेखर
40-नवसहसांक चरित पदम् गुप्त
41-शब्दानुशासन राजभोज
42-वृहतकथामंजरी क्षेमेन्द्र
43-नैषधचरितम श्रीहर्ष
44-विक्रमांकदेवचरित बिल्हण
45-कुमारपालचरित हेमचन्द्र
46-गीतगोविन्द जयदेव
47-पृथ्वीराजरासो चंदरवरदाई
48-राजतरंगिणी कल्हण
49-रासमाला सोमेश्वर
50-शिशुपाल वध माघ
51-गौडवाहो वाकपति
52-रामचरित सन्धयाकरनंदी
53-द्वयाश्रय काव्य हेमचन्द्र
54- विनय पत्रिका। तुलसीदास
55- रामचरितमानस। तुलसीदास

आज हमको जो इतिहास पढ़ाया जाता है वो फरेव हीं फरेव है । उसमें मुगलों और विदेशियों का और देश के कुछ गद्दारों का महिमा मंडन है जिसको पढ़के आज की पीढ़ी भ्रम विप्रलिप्सा , कर्णपाटव और प्रमाद का शिकार हो गए हैं और हो रहे हैं । मैं आज अपने देश के सभी हिन्दु युवाओं को आवाहन करना चाहता हुं कि स्कूली शिक्षा के अलावा श्री कृपालु जी महाराज जी के पुस्तकों कि सहायता से तत्वज्ञान का अध्ययन करें तो अपने दिव्य विरासत को समझ पायेंगे और चरित्र ऊंचा होगा नहीं तो पतन तो निश्चित है हीं । 
:- संजीव कुमार, रांची ।

Monday, 29 April 2024

सनातन वैदिक शास्त्रों का डिटेल्स ।

वेद-के बारे में महत्वपूर्ण ज्ञान :-

प्र.1-  वेद किसे कहते है ?
उत्तर-  ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है। भगवान की आप्त वाणी को वेद कहते हैं । 

प्र.2-  वेद-ज्ञान किसने दिया ?
उत्तर-  ईश्वर ने दिया।

प्र.3-  ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?
उत्तर-  ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।

प्र.4-  ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?
उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण  के लिए।

प्र.5-  वेद कितने है ?
उत्तर- चार ।                                                  
1-ऋग्वेद 
2-यजुर्वेद  
3-सामवेद
4-अथर्ववेद

प्र.6-  वेदों के ब्राह्मण ।
        वेद              ब्राह्मण
1 - ऋग्वेद      -     ऐतरेय
2 - यजुर्वेद      -     शतपथ
3 - सामवेद     -    तांड्य
4 - अथर्ववेद   -   गोपथ

प्र.7-  वेदों के उपवेद कितने है।
उत्तर -  चार।
      वेद                     उपवेद
    1- ऋग्वेद       -     आयुर्वेद
    2- यजुर्वेद       -    धनुर्वेद
    3 -सामवेद      -     गंधर्ववेद
    4- अथर्ववेद    -     अर्थवेद

प्र 8-  वेदों के अंग हैं ।
उत्तर -  छः ।
1 - शिक्षा
2 - कल्प
3 - निरूक्त
4 - व्याकरण
5 - छंद
6 - ज्योतिष

प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?
उत्तर- चार ऋषियों को।
         वेद                ऋषि
1- ऋग्वेद         -      अग्नि
2 - यजुर्वेद       -       वायु
3 - सामवेद      -      आदित्य
4 - अथर्ववेद    -     अंगिरा

प्र.10-  वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?
उत्तर- समाधि की अवस्था में।

प्र.11-  वेदों में कैसे ज्ञान है ?
उत्तर-  सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान। वेद चराचर जगत का ईश्वर प्रदत एक मात्र संविधान है । इसके आधिन समुचा ब्रह्मांड और तमाम जीव जगत है । सब पर यह लागु है और प्रलय कल तक लागु रहेगा ।

प्र.12-  वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-   चार ।
        ऋषि        विषय
1-  ऋग्वेद    -    ज्ञान
2-  यजुर्वेद    -    कर्म
3-  सामवेद     -    उपासना व भक्ति
4-  अथर्ववेद -    विज्ञान

प्र.13-  वेदों में।

ऋग्वेद में।
1-  मंडल      -  10
2 - अष्टक     -   08
3 - सूक्त        -  1028
4 - अनुवाक  -   85 
5 - ऋचाएं     -  10589

यजुर्वेद में।
1- अध्याय    -  40
2- मंत्र           - 1975

सामवेद में।
1-  आरचिक   -  06
2 - अध्याय     -   06
3-  ऋचाएं       -  1875

अथर्ववेद में।
1- कांड      -    20
2- सूक्त      -   731
3 - मंत्र       -   5977
          
प्र.14-  वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ?                                                                                                                                                              उत्तर-  भगवद् प्राप्त संतों , महापुरूषों  को वेद पढ़ने , पढ़ाने और समझाने का अधिकार है, असंत और साधारण मनुष्य उसको पढ़के गलत अर्थ हीं करेगा जो विनाशकारी है  ।

प्र.15-  क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ?
उत्तर-   नहीं है उनके लिए जो भगवद् प्राप्त कर चुके हैं और उच्च कोटी के ऋषि-मुनि हैं संत हैं जिनको भगवान का दर्शन हटात् और साक्षात होता रहता है , पर सधारण मनुष्यों के लिए वेद में यह स्पष्ट है कि वो सगुण साकार भगवान की मुर्ती का सहारा लेकर  उसमें भगवद् भावना करके अपना कल्याण कर सकता है ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है  , वेद कण कण में भगवान की उपस्थिति को मानता है इसलिए भगवान का उपासक मुर्ति में भी अपने इष्ट की उपस्थिति को मानता है जो सत्य है ,वेद सम्मत है  ।

प्र.16-  क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ?
उत्तर-  नहीं है कारण यह अलौकिक वह सनातन ग्रंथ है , पुराणों में, उपनिषदों में अवतार का प्रमाण है जो वेद का हीं अंग है।

प्र.17-  सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?
उत्तर-  ऋग्वेद।

प्र.18-  वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?
उत्तर-  वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 43 हजार वर्ष पूर्व । 

प्र.19-  वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों का क्या नाम है ?
उत्तर- 
1-  न्याय दर्शन  - गौतम मुनि।
2- वैशेषिक दर्शन  - कणाद मुनि।
3- योगदर्शन  - पतंजलि मुनि।
4- मीमांसा दर्शन  - जैमिनी मुनि।
5- सांख्य दर्शन  - कपिल मुनि।
6- वेदांत दर्शन  - व्यास मुनि।

प्र.20-  शास्त्रों के विषय क्या है ?
उत्तर-  आत्मा,  परमात्मा, प्रकृति,  जगत की उत्पत्ति,  मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक  ज्ञान-विज्ञान आदि।

प्र.21-  प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?
उत्तर-  केवल ग्यारह।

प्र.22-  उपनिषदों के नाम बतावे ?
उत्तर-  
01-ईश ( ईशावास्य )  
02-केन  
03-कठ  
04-प्रश्न  
05-मुंडक  
06-मांडू  
07-ऐतरेय  
08-तैत्तिरीय 
09-छांदोग्य 
10-वृहदारण्यक 
11-श्वेताश्वतर ।

प्र.23-  उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?
उत्तर- वेदों से।
प्र.24- चार वर्ण।
उत्तर- 
1- ब्राह्मण
2- क्षत्रिय
3- वैश्य
4- शूद्र

प्र.25- चार युग।
1- सतयुग - 17,28000  वर्षों का नाम ( सतयुग ) रखा है।
2- त्रेतायुग- 12,96000  वर्षों का नाम ( त्रेतायुग ) रखा है।
3- द्वापरयुग- 8,64000  वर्षों का नाम है।
4- कलयुग- 4,32000  वर्षों का नाम है।
कलयुग के  4,976  वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक।
4,27024 वर्षों का भोग होना है। 

पंच महायज्ञ
       1- ब्रह्मयज्ञ   
       2- देवयज्ञ
       3- पितृयज्ञ
       4- बलिवैश्वदेवयज्ञ
       5- अतिथियज्ञ
   
स्वर्ग  -  जहाँ सुख है, पर यह सुख माईक है । स्वर्ग भी मायाधिन है , । 
नरक  -  जहाँ दुःख हीं दु:ख है।.

प्र.26 पुराणों की संख्या कितनी है ?
ऊ- पुराणों की संख्या 18 है ।

प्र. 27 पुराणों के नाम ? 

उत्तर - ब्रह्म पुराण
पद्म पुराण
विष्णु पुराण -- (उत्तर भाग - विष्णुधर्मोत्तर)
वायु पुराण -- (भिन्न मत से - शिव पुराण)
भागवत पुराण -- (भिन्न मत से - देवीभागवत पुराण)
नारद पुराण
मार्कण्डेय पुराण
अग्नि पुराण
भविष्य पुराण
ब्रह्मवैवर्त पुराण
लिङ्ग पुराण
वाराह पुराण
स्कन्द पुराण
वामन पुराण
कूर्म पुराण
मत्स्य पुराण
गरुड पुराण
ब्रह्माण्ड पुराण

प्र28- उप पुराणो की संख्या कितनी है ? 
ऊ- उप पुराणो की संख्या 24 है ? 

प्र 29- उप-पुराणों के नाम ? 

ऊ- आदि पुराण (सनत्कुमार द्वारा कथित)
नरसिंह पुराण
नन्दिपुराण (कुमार द्वारा कथित)
शिवधर्म पुराण
आश्चर्य पुराण (दुर्वासा द्वारा कथित)
नारदीय पुराण (नारद द्वारा कथित)
कपिल पुराण
मानव पुराण
उशना पुराण (उशनस्)
ब्रह्माण्ड पुराण
वरुण पुराण
कालिका पुराण
माहेश्वर पुराण
साम्ब पुराण
सौर पुराण
पाराशर पुराण (पराशरोक्त)
मारीच पुराण
भार्गव पुराण
विष्णुधर्म पुराण
बृहद्धर्म पुराण
गणेश पुराण
मुद्गल पुराण
एकाम्र पुराण
दत्त पुराण

प्र30- पुराणों में श्लोकों की संख्या ? 
ऊ- 
पुराण श्लोकों की संख्या
ब्रह्मपुराण- चौदह हजार 
पद्मपुराण - पचपन हजार 
विष्णुपुराण -तेइस हजार
शिवपुराण -चौबीस हजार
श्रीमद्भावतपुराण -अठारह हजार
नारदपुराण -पच्चीस हजार
मार्कण्डेयपुराण -नौ हजार
अग्निपुराण- पन्द्रह हजार
भविष्यपुराण- चौदह हजार पाँच सौ
ब्रह्मवैवर्तपुराण -अठारह हजार
लिंगपुराण ग्यारह हजार
वाराहपुराण- चौबीस हजार
स्कन्धपुराण -इक्यासी हजार एक सौ
वामनपुराण -दस हजार
कूर्मपुराण -सत्रह हजार
मत्सयपुराण- चौदह हजार
गरुड़पुराण- उन्नीस हजार
ब्रह्माण्डपुराण- बारह हजार

प्र31-पुराणों के नाम और उनका महत्त्व संपादित करें ?

उत्तर - १८ पुराण के नाम और उनका महत्त्व संपादित करें
(१) ब्रह्मपुराण : इसे “आदिपुराण” भी का जाता है। प्राचीन माने गए सभी पुराणों में इसका उल्लेख है। इसमें श्लोकों की संख्या अलग- २ प्रमाणों से भिन्न-भिन्न है। १०,०००…१२.००० और १३,७८७ ये विभिन्न संख्याएँ मिलती है। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में लोमहर्षण ऋषि ने किया था। इसमें सृष्टि, मनु की उत्पत्ति, उनके वंश का वर्णन, देवों और प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन है। इस पुराण में विभिन्न तीर्थों का विस्तार से वर्णन है। इसमें कुल २४५ अध्याय हैं। इसका एक परिशिष्ट सौर उपपुराण भी है, जिसमें उडिसा के कोणार्क मन्दिर का वर्णन है।

(२) पद्मपुराण : इसमें कुल ६४१ अध्याय और ४८,००० श्लोक हैं। मत्स्यपुराण के अनुसार इसमें ५५,००० और ब्रह्मपुराण के अनुसार इसमें ५९,००० श्लोक थे। इसमें कुल खण़्ड हैं—(क) सृष्टिखण्ड : ५ पर्व, (ख) भूमिखण्ड, (ग) स्वर्गखण्ड, (घ) पातालखण्ड और (ङ) उत्तरखण्ड। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में सूत उग्रश्रवा ने किया था। ये लोमहर्षण के पुत्र थे। इस पुराण में अनेक विषयों के साथ विष्णुभक्ति के अनेक पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। 

(३) विष्णुपुराण : पुराण के पाँचों लक्षण इसमें घटते हैं। इसमें विष्णु को परम देवता के रूप में निरूपित किया गया है। इसमें कुल छः खण्ड हैं, १२६ अध्याय, श्लोक २३,००० या २४,००० या ६,००० हैं। इस पुराण के प्रवक्ता पराशर ऋषि और श्रोता मैत्रेय हैं।

(४) वायुपुराण : इसमें विशेषकर शिव का वर्णन किया गया है, अतः इस कारण इसे “शिवपुराण” भी कहा जाता है। एक शिवपुराण पृथक् भी है। इसमें ११२ अध्याय, ११,००० श्लोक हैं। इस पुराण का प्रचलन मगध-क्षेत्र में बहुत था। इसमें गया-माहात्म्य है। इसमें कुल चार भाग है : (क) प्रक्रियापाद – (अध्याय—१-६), (ख) उपोद्घात : (अध्याय-७ –६४ ), (ग) अनुषङ्गपादः–(अध्याय—६५–९९), (घ) उपसंहारपादः–(अध्याय—१००-११२)। इसमें सृष्टिक्रम, भूगो, खगोल, युगों, ऋषियों तथा तीर्थों का वर्णन एवं राजवंशों, ऋषिवंशों,, वेद की शाखाओं, संगीतशास्त्र और शिवभक्ति का विस्तृत निरूपण है। इसमें भी पुराण के पञ्चलक्षण मिलते हैं।

(५) भागवतपुराण : यह सर्वाधिक प्रचलित पुराण है। इस पुराण का सप्ताह-वाचन-पारायण भी होता है। इसे सभी दर्शनों का सार “निगमकल्पतरोर्गलितम्” और विद्वानों का परीक्षास्थल “विद्यावतां भागवते परीक्षा” माना जाता है। इसमें श्रीकृष्ण की भक्ति के बारे में बताया गया है। इसमें कुल १२ स्कन्ध, ३३५ अध्याय और १८,००० श्लोक हैं। कुछ विद्वान् इसे “देवीभागवतपुराण” भी कहते हैं, क्योंकि इसमें देवी (शक्ति) का विस्तृत वर्णन हैं। 

(६) नारद (बृहन्नारदीय) पुराण : इसे महापुराण भी कहा जाता है। इसमें पुराण के ५ लक्षण घटित नहीं होते हैं। इसमें वैष्णवों के उत्सवों और व्रतों का वर्णन है। इसमें २ खण्ड है : (क) पूर्व खण्ड में १२५ अध्याय और (ख) उत्तर-खण्ड में ८२ अध्याय हैं। इसमें १८,००० श्लोक हैं। इसके विषय मोक्ष, धर्म, नक्षत्र, एवं कल्प का निरूपण, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, गृहविचार, मन्त्रसिद्धि,, वर्णाश्रम-धर्म, श्राद्ध, प्रायश्चित्त आदि का वर्णन है।

(७) मार्कण्डयपुराण : इसे प्राचीनतम पुराण माना जाता है। इसमें इन्द्र, अग्नि, सूर्य आदि वैदिक देवताओं का वर्णन किया गया है। इसके प्रवक्ता मार्कण्डय ऋषि और श्रोता क्रौष्टुकि शिष्य हैं। इसमें १३८ अध्याय और ७,००० श्लोक हैं। इसमें गृहस्थ-धर्म, श्राद्ध, दिनचर्या, नित्यकर्म, व्रत, उत्सव, अनुसूया की पतिव्रता-कथा, योग, दुर्गा-माहात्म्य आदि विषयों का वर्णन है।

(८) अग्निपुराण : इसके प्रवक्ता अग्नि और श्रोता वसिष्ठ हैं। इसी कारण इसे अग्निपुराण कहा जाता है। इसे भारतीय संस्कृति और विद्याओं का महाकोश माना जाता है। इसमें इस समय ३८३ अध्याय, ११,५०० श्लोक हैं। इसमें विष्णु के अवतारों का वर्णन है। इसके अतिरिक्त शिवलिंग, दुर्गा, गणेश, सूर्य, प्राणप्रतिष्ठा आदि के अतिरिक्त भूगोल, गणित, फलित-ज्योतिष, विवाह, मृत्यु, शकुनविद्या, वास्तुविद्या, दिनचर्या, नीतिशास्त्र, युद्धविद्या, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, छन्द, काव्य, व्याकरण, कोशनिर्माण आदि नाना विषयों का वर्णन है।

(९) भविष्यपुराण : इसमें भविष्य की घटनाओं का वर्णन है। इसमें दो खण्ड हैः–(क) पूर्वार्धः–(अध्याय—४१) तथा (ख) उत्तरार्धः–(अध्याय़—१७१) । इसमें कुल १५,००० श्लोक हैं । इसमें कुल ५ पर्व हैः–(क) ब्राह्मपर्व, (ख) विष्णुपर्व, (ग) शिवपर्व, (घ) सूर्यपर्व तथा (ङ) प्रतिसर्गपर्व। इसमें मुख्यतः ब्राह्मण-धर्म, आचार, वर्णाश्रम-धर्म आदि विषयों का वर्णन है। 

(१०) ब्रह्मवैवर्तपुराण : यह वैष्णव पुराण है। इसमें श्रीकृष्ण के चरित्र का वर्णन किया गया है। इसमें कुल १८,००० श्लोक है और चार खण्ड हैं : (क) ब्रह्म, (ख) प्रकृति, (ग) गणेश तथा (घ) श्रीकृष्ण-जन्म।

(११) लिङ्गपुराण : इसमें शिव की उपासना का वर्णन है। इसमें शिव के २८ अवतारों की कथाएँ दी गईं हैं। इसमें ११,००० श्लोक और १६३ अध्याय हैं। इसे पूर्व और उत्तर नाम से दो भागों में विभाजित किया गया है। 

(१२) वराहपुराण : इसमें विष्णु के वराह-अवतार का वर्णन है। पाताललोक से पृथिवी का उद्धार करके वराह ने इस पुराण का प्रवचन किया था। इसमें २४,००० श्लोक सम्प्रति केवल ११,००० और २१७ अध्याय हैं।

(१३) स्कन्दपुराण : यह पुराण शिव के पुत्र स्कन्द (कार्तिकेय, सुब्रह्मण्य) के नाम पर है। यह सबसे बडा पुराण है। इसमें कुल ८१,००० श्लोक हैं। इसमें दो खण्ड हैं। इसमें छः संहिताएँ हैं—सनत्कुमार, सूत, शंकर, वैष्णव, ब्राह्म तथा सौर। सूतसंहिता पर माधवाचार्य ने “तात्पर्य-दीपिका” नामक विस्तृत टीका लिखी है। इस संहिता के अन्त में दो गीताएँ भी हैं—-ब्रह्मगीता (अध्याय—१२) और सूतगीताः–(अध्याय ८)। इस पुराण में सात खण्ड हैं—(क) माहेश्वर, (ख) वैष्णव, (ग) ब्रह्म, (घ) काशी, (ङ) अवन्ती, (रेवा), (च) नागर (ताप्ती) तथा (छ) प्रभास-खण्ड। काशीखण्ड में “गंगासहस्रनाम” स्तोत्र भी है। 

(१४) वामनपुराण : इसमें विष्णु के वामन-अवतार का वर्णन है। इसमें ९५ अध्याय और १०,००० श्लोक हैं। इसमें चार संहिताएँ हैं—(क) माहेश्वरी, (ख) भागवती, (ग) सौरी तथा (घ) गाणेश्वरी । 

(१५) कूर्मपुराण : इसमें विष्णु के कूर्म-अवतार का वर्णन किया गया है। इसमें चार संहिताएँ हैं—(क) ब्राह्मी, (ख) भागवती, (ग) सौरा तथा (घ) वैष्णवी । सम्प्रति केवल ब्राह्मी-संहिता ही मिलती है। इसमें ६,००० श्लोक हैं। इसके दो भाग हैं, जिसमें ५१ और ४४ अध्याय हैं। इसमें पुराण के पाँचों लक्षण मिलते हैं। इस पुराण में ईश्वरगीता और व्यासगीता भी है। 

(१६) मत्स्यपुराण : इसमें पुराण के पाँचों लक्षण घटित होते हैं। इसमें २९१ अध्याय और १४,००० श्लोक हैं। प्राचीन संस्करणों में १९,००० श्लोक मिलते हैं। इसमें जलप्रलय का वर्णन हैं। इसमें कलियुग के राजाओं की सूची दी गई है। 

(१७) गरुडपुराण : यह वैष्णवपुराण है। इसके प्रवक्ता विष्णु और श्रोता गरुड हैं, गरुड ने कश्यप को सुनाया था। इसमें विष्णुपूजा का वर्णन है। इसके दो खण्ड हैं, जिसमें पूर्वखण्ड में २२९ और उत्तरखण्ड में ३५ अध्याय और १८,००० श्लोक हैं। इसका पूर्वखण्ड विश्वकोशात्मक माना जाता है।

(१८) ब्रह्माण्डपुराण : इसमें १०९ अध्याय तथा १२,००० श्लोक है। इसमें चार पाद हैं—(क) प्रक्रिया, (ख) अनुषङ्ग, (ग) उपोद्घात तथा (घ) उपसंहार ।

Saturday, 20 April 2024

एक व्यक्ति का प्रश्न :- क्या मां बाप भगवान है हम तो मां बाप को ही भगवान मानते हैं ?

एक व्यक्ति का प्रश्न :- क्या मां बाप भगवान है हम तो मां बाप को ही भगवान मानते हैं ? 
उत्तर :- शारीरिक मां बाप को केवल शरीर का जन्म दाता मानो वो भी भगवान के कृपा से हमको और तुमको मानव शरीर मिला और उन्हीं के कृपा से हमारे माता पिता को भी मानव शरीर मिला है जिस कारण उनके गर्भ में हमको भगवान द्वारा मानव शरीर देकर भेजा गया , इसमें हमारे मां बाप का कोई कमाल नहीं है । इसिलिए शारीरिक माता पिता भगवान कि कृपा से शरीर को जन्म देने का एक माध्यम भर है वो हमारे आत्मा का पिता माता नहीं हैं । 

शारीरिक माता पिता को भगवान बोल कर हम तुम अपने आत्मा के माता पिता तथा अपने शारीरिक माता पिता के भी आत्मा के माता पिता का अपमान मत करो । 
सभी जीवों के माता पिता परम पिता है , उनका अपमान मत करो । 
अपने शारीरिक माता पिता का सम्मान करो , उनके प्रति अपना फर्ज पुरा जरूर करो। लेकिन उन्हें भगवान मत मानो । 
क्या तुम्हारे माता पिता को मालुम था तुम्हारे जन्म से पहले कि तुम उसका पुत्र या पुत्री बनने बाले हो , क्या जन्म से पहले वो तुमको जानते भी थे ? उनके कोख में भगवान ने तुम्हें बनाया है तुम्हारे मां बाप तो तुमको जन्म के बाद जाना समझा है । 
जब वो जाना तक नहीं तो किसी भी अल्पज्ञ को भगवान बोल कर सर्वज्ञ , सर्वांतर्यामी, भगवान का अपमान मत करो । नहीं तो रो रो नरक भोगना होगा अगले जन्मों में ।

हमारे तुम्हारे अनंत जन्म हो चुके हैं , हर जन्म में अलग अलग प्रकार का शरीर मिला अपने कर्म के अनुसार और न जाने कितने को मां बाप , बेटा बेटी बहन भाई बनाया होगा हमने । 
अत: भगवान श्री कृष्ण को ही अपना माता पिता मानो और उनकी भक्ति करो । 

शारीरिक माता पिता को भगवान मानने , मदिरा पान करने , मांस मछली भक्षण करने , विष्णु भगवान को भगवान न मानने , मौज मस्ती करने, लुट मार करने , अपहरण करने , दुसरों का धन छिनने  तथा अधर्म पर पर चलने आदि की शिक्षा आसुरी शिक्षा है । असुर गुरू शुक्राचार्य ने ही यह आसुरी शिक्षा असुर बच्चों को दिया था ताकि वो देवताओं से , भगवान से युद्ध करें , और देवताओं के लोक पर कब्जा करके  अपने आसुरी सत्ता को कायम रखें । 
हिरण्यकश्यप जैसे असुर ने प्रह्लाद को कहा कि मैं ही तुम्हारा भगवान हूं क्योंकि माता पिता भगवान होते हैं इसलिए तुम हमको भगवान मानो । लेकिन प्रह्लाद ने नहीं माना । हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को सताया तो भगवान नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का बध कर दिए । 
आज कल बहुत से लोग आसुरी शिक्षा का ही प्रसार करते हैं इसलिए लोग ऐसा भ्रामक बात मानते हैं , ऐसे लोगों के दुर रहना चाहिए। 

ध्यान रहे कहीं इसी भ्रम में न रहना तुम भी , तुम भी तो किसी का माता पिता हो इसलिए खुद को भगवान न समझ लेना गलती से । 

ये शरीर के माता पिता को भगवान बोल कर अपने चिर सनातन माता पिता श्री राधा कृष्ण का अपमान मत करो । नहीं तो अगले जन्म से घोर नरक में परे रहोगे । 

न मानव शरीर मिलेगा और न किसी को मां बाप बनाने लायक रहोगे और न बोलने लायक । अगर यह समझ में न आवे तो करो जो मन में आए वो । 
लेकिन कर्म फल का भोग तो सबको भोगना ही होगा ।
गुरू कृपा से प्राप्त ज्ञान के आधार पर :- संजीव कुमार

Saturday, 9 March 2024

सुकरात एक फिलॉसफर हुआ है, उसका शिष्य था डायोज़नीज़, उसके पास सिकन्दर बादशाह गया और उसने कहा महाराज! कुछ हमारे लिए सेवा बताइये। तो डायोजनीज ने कहा, हट! धूप छोड़ दे! सेवा करेगा यह। है क्या तेरे पास फटीचर दरिद्री। तू क्या सेवा करेगा? मेरी सेवा करेगा? मेरी सेवा करना है तो दे स्प्रिचुअल हैपीनेस। है तेरे पास? नहीं वह तो नहीं है। फिर क्या सेवा करेगा तू?

श्री महाराज जी का प्रवचन :- *सुकरात एक फिलॉसफर हुआ है, उसका शिष्य था डायोज़नीज़, उसके पास सिकन्दर बादशाह गया और उसने कहा महाराज! कुछ हमारे लिए सेवा बताइये। तो डायोजनीज ने कहा, हट! धूप छोड़ दे! सेवा करेगा यह। है क्या तेरे पास फटीचर दरिद्री। तू क्या सेवा करेगा? मेरी सेवा करेगा? मेरी सेवा करना है तो दे स्प्रिचुअल हैपीनेस। है तेरे पास? नहीं वह तो नहीं है। फिर क्या सेवा करेगा तू? रसगुल्ला खिलायेगा मुझे? इसके लिये मैं बाबा जी बना हूँ? अरे! भाई कोई गरीब पैसा माँगने जाये तो उसको पैसा चाहिए। कोई बुद्धि माँगने जाय उसको ज्ञान चाहिए। हमको स्प्रिचुअल हैपीनेस चाहिए और तू दान करने का स्वांग रचकर के मेरे पास आया है। क्या देगा तू तो खुद भिखारी है। यह जो छोटी मोटी सम्पत्ति यह हीरा मोती यह मिट्टी के टुकड़े जो तू इण्डिया वगैरह से लेके आया है, यह मुझे देने आया है? (हाँ!)*

*तो प्रेम एक दिव्य वस्तु है। यह नं. दो वाला। लेकिन नं. एक वाला जो प्रेम है, वो हमको करना है। करना पड़ेगा। यहीं पर कनफ्यूजन हो जाता है संसार में बड़े-बड़े काबिलों को कि भाई यह तो ऐसा है महाराज जी कि वह तो कृपा साध्य है प्रेम। हाँ है। तो फिर कृपा कर दीजिये। लेकिन यह तुमको पता है कि वह कृपा साध्य है तो उसके लिये बर्तन तो होना चाहिए। आपको दूध चाहिए हम फ्री में देंगे दूध। लेकिन, बर्तन तो ले आओ। यह लीजिये बर्तन इसमें एक हजार छेद हैं इस बर्तन में दूध नहीं टिकेगा। बर्तन ठीक करो, अंत:करण शुद्ध करो। उसके लिये एक प्रेम करो। तो प्रेम शब्द का वैसे तो बहुत लम्बा चौड़ा अर्थ है। लेकिन एक परिभाषा समझ लीजिये आप लोग सबसे पहले-*

*सर्वथा ध्वंसरहितं सत्यपि ध्वंस कारणे।*
*यद्भावबन्धनं यूनो: सः प्रेमा परिकीर्तितः॥*
(उ.न, भ.र.सि.) 

*ध्वंस का कारण हो, प्रेम के नष्ट होने का कारण हो, फिर भी प्रेम न घटे, उसमें हलचल न होने पावे। नॉर्मेलिटी में चलता जाय आगे को, उसका नाम प्रेम।*

*देखिये, आपके संसार में जो आसक्ति होती है, इसमें क्या होता है? ध्वंस का कारण आया, प्रेम जीरो बटे सौ। अभी-अभी एक लड़का एक लड़की दोनों एक दूसरे में आसक्त थे और साथ ही जियेंगे साथ ही मरेंगे वादा करो खोपड़ा करो और लम्बी चौड़ी बातें हुई और तभी एक लड़की आई और उसने कहा हैलो और लिपट गई, उस लड़के से। तो पहली लड़की ने देखा, हाँ! एक और भी है तुम्हारे। बदमाश हमको ठगते हो? धूर्त हो, मक्कार हो, चार सौ बीस हो। खत्म हो गया प्रेम। यानी ध्वंस का कारण आया, प्रेम समाप्त। अरे! आपकी विवाहिता बीबी हो, सगी माँ हो और जरा भी स्वार्थ की गड़बड़ी हुई चार आने, प्रेम चार आने कम हो गया। आठ आने हुई, आठ आने कम हो गया, बारह आने गड़बड़ी हुई, बारह आने कम हो गया। यानी आपके स्वार्थ के बेपेंदी के लोटे के आधार पर आपका प्यार टिका है। तो ध्वंस का कारण हो और फिर भी प्रेम क्षीण न होने पाये। यह कैसे होगा?*

*गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षणवर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्॥* 
(नारद भक्ति दर्शन सूत्र - ५४)

*अब आये फिर नारदजी। नारदजी कहते हैं, भाई! यह तब होगा जब तुम जिससे प्रेम करते हो उससे कोई स्वार्थ भावना तुम्हारी न हो। यानी कुछ माँगो मत। देना-देना-देना। इतना देना सीखो कि अघाओ न। सब कुछ देकर के भी यह फील करो, हाय ! मैंने कुछ भी नहीं दिया। यह भी ध्यान रखना। सब कुछ समर्पण करके अगर अहंकार आ गया मैंने सब कुछ दे दिया, हो गया बंटाधार। सब कुछ दो और सब कुछ देने का अहंकार भी दे दो। यह सबसे खतरनाक शत्रु है अहंकार। हम लोग जरा सा दान करते हैं किसी संस्था में, किसी गरीब को, मैटीरियल जगत् में, तो चाहते हैं मेरा नाम अखबार में निकले, मेरा नाम यहाँ दीवाल पर लगा दिया जाय और इतना भूल जाते हैं कि दान तो गुप्त जो होता है, उसको दान कहते हैं। और कोई जाने न। क्योंकि कोई जानेगा और प्रशंसा कर देगा तो अहंकार हो जायेगा। सब चौपट हो गया। जैसे महापुरुष और भगवान् चोरी चोरी सेवा करते हैं शरणागत की, बिना बताये और अगर वह पूछेगा तो भी कह देंगे नहीं-नहीं मैंने तो कुछ नहीं किया तुम्हारे लिये। ऐसे ही, हमको करना है। यानी किसी प्रकार की कामना रख कर के ईश्वरीय जगत् में कदम नहीं रखना। देना देना सीखो। जो कुछ है बस। कहीं से उधार नहीं लाना है। मेरा मन तो गन्दा है क्या दूँ भगवान् को? अरे! तो वही तो शुद्ध करेंगे। कोई गन्दा कपड़ा यह कहे, ऐ निर्मल पानी ! मैं तेरे पास नहीं आऊँगा क्योंकि तू निर्मल है गन्दा हो जायेगा। ये ठीक है निर्मल पानी गन्दे कपड़े के सम्पर्क से गन्दा हो जायेगा। यह सही है लेकिन भगवान् और महापुरुष गंदे को शुद्ध कर देंगे और स्वयं भी शुद्ध रहेंगे, इतना अन्तर है। जैसे गंगाजी में कोई गन्दा नाला बह के जाता है वह गंगा जी बन जायेगा। गंगा जी गन्दा नाला नहीं बन जायेंगी। अग्नि के कुण्ड में जूता-चप्पल, गन्दगी कुछ भी डाल दो, वह अग्नि बन जायेगा। अग्नि जूता चप्पल नहीं बन जायेगा। अग्नि अपनी पर्सनेलिटी में रहेगा। इसलिये यह मत सोचो कि हमारे पास तो जो है सब डर्टी है। भगवान को कैसे दें? अरे वह लेने को तैयार हैं-*

*पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।* 
*तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।*
(गीता ९-२६, भाग. १०-८१-४) 

*अरे, मैं पत्ता भी खा लूँगा, जल भी खा लूँगा। प्यार से दो। तुम जो दोगे, मैं ले लूँगा। इतनी कृपाओं के कानून बना रखे हैं भगवान् ने। हम उनको समझते नहीं, उनकी इंपोर्टेंस नहीं रियेलाइज करते। इसलिये लापरवाह हैं। स्वार्थ युक्त जो संसार में कृपा करने का दावा करते हैं, इन पर तो विश्वास है। देखो हमारी बीबी हमारी बीमारी में रात भर बैठी रही, कितना प्यार करती है हमसे। अरे, बेवकूफ! तुझ से प्यार नहीं करती, वह तो इसलिये बैठी रही कि तुम मर जाओगे तो उसका क्या होगा, इस स्वार्थ के लिये। तू भोला है, नहीं समझता। वह अपने मतलब के लिये सब हिसाब बैठा रही है। तो संसार का जितना भी प्यार है उसमें लेना, लेना, लेना। यही सीखा हमने अनादि काल से अब तक। अब हम को नया पाठ पढ़ना है- देना, देना, देना। बिल्कुल उल्टा है। विपरीत दिशा है ईश्वरीय जगत्। यह अन्धकार है, वह प्रकाश है। इतना बड़ा अन्तर है। माँगते, माँगते, माँगते अनन्त जन्म बीत गये। संसारियों से माँगा, देवी-देवताओं से माँगा और भगवान् से माँगा और भिखमंगे बनते गये। छोड़ो माँगना, अब देना सीखो। तब भगवान के कान में जूँ रेंगेगी, अरे! यह तो माँगता ही नहीं कुछ।*

*जाहि न चाहिय कबहुँ कछु तुम सन सहज सनेह।* 

*भगवान को सोचना पड़ता है, अब तो मामला सीरियस है। यह कुछ नहीं लेना चाहता, लेकिन फिर भी यहाँ कह रहा है- श्याम मोहिं देहु प्रेम निष्काम। माँग तो रहा है। हाँ माँग तो रहा है। क्यों माँग रहा है, यह फिर बतायेंगे।*

*बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय।*

*-जगद्गुरूत्तम १००८ स्वामी श्री कृपालु महाप्रभु जी के प्रवचन का अंश।*

Wednesday, 6 March 2024

मेरी गीत मेरी रचना नंबर 122-बेखुदी तुमने मुझको, सताया बहुतबाखुदा इश्क में हम, तड़पने लगे

मेरी गीत मेरी रचना नंबर 122-

बेखुदी तुमने मुझको, सताया बहुत
बाखुदा इश्क में हम, तड़पने लगे 
तुमने कांटों से दामन, भरा था मेरा 
फुल बन के तुम्हीं को, लुभाने लगे 
बेखुदी तुमने मुझको सताया बहुत
बाखुदा इश्क में हम, तड़पने लगे

इश्क में तुमने मुझको, रूलाया मगर
आंसु बनकर तुम्हीं से, इश्क करने लगे 
बेखुदी तुमने मुझको सताया बहुत
बाखुदा इश्क में हम, तड़पने लगे

ये सच है कि मैं, तेरे काबिल नहीं 
काबिलों को भी तुमने, रूलाया बहुत
बेखुदी तुमने मुझको सताया बहुत
बाखुदा इश्क में हम, तड़पने लगे

तुमने लुटे हो मस्ती, कई दिल का 
लुटो मस्ती मेरा भी तो, जाने तुझे 
बेखुदी तुमने मुझको सताया बहुत
बाखुदा इश्क में हम, तड़पने लगे

:- संजीव ।

भगवान ने मनुष्य को संकल्प करने कि शक्ति एवं स्वतंत्रता दी है , फिर संकल्पित कर्म‌ करने कि भी स्वतंत्रता दी है लेकिन फल देने का काम अपने पास रखा है ।

कुछ लोग बराबर बोलते रहते हैं कि आप लोग गलत आचरण वाले को क्यों नहीं रोकते ,भगवान के फोटो से सजे स्टेज पर जूता पहन के डांस करने वाले को क्यों नहीं रोकते ? इसको क्यों नहीं रोकते , उसको क्यों नही टोकते ? उसका जबाब :- 
भगवान ने मनुष्य को संकल्प करने कि शक्ति एवं स्वतंत्रता दी है , फिर संकल्पित कर्म‌ करने कि भी स्वतंत्रता दी है लेकिन फल देने का काम अपने पास रखा है । 

इसलिए मनुष्य भोग प्रधान के साथ साथ कर्म प्रधान योनि भी है । यानि मनुष्य अपने पिछले कर्मों के फलस्वरूप भगवान से प्राप्त फल भोगता भी है और अगला कर्म करके अपना प्रारब्ध या भाग्य बनाता भी है । 
इसलिए मनुष्य का भाग्य या प्रारब्ध उसके अपने ही कर्मों का फल है, अत: उसके अपने ही हाथों में है अपना भाग्य बनाना या बिगाड़ना । 

इसलिए भगवान मनुष्य को संकल्प करने तदनुसार कर्म करने की स्वतंत्रता में कभी कोई दखल नहीं देते और ना ही कोई महापुरुष दखल देते हैं । वो अपने विभिन्न अवतारों में किए गये लीला के द्वारा , तत्वज्ञान द्वारा एवं अपने शास्त्रों के द्वारा सही कर्म धर्म क्या है ? गलत क्या है? वो सब समझा चुके हैं और आगे भी महापुरुष के रूप में अवतार लेकर समझाते रहते हैं और रहेंगे भी । 

अब इन ज्ञान के बाबजूद भी कोई मनुष्य भगवान को भी गाली दे , उनका खिलाफत करें , उनके जनों को कष्ट दे या कोई ग़लत काम करें और फल के रूप में रोग , शोक और कष्ट पावे और भोगे या बढ़िया कर्म करके बढ़िया भाग्य बना ले एवं फल के रूप में संसारिक सुख आदि भोगे यहां तक कि उनके प्रति भक्ति करके, शरणागत होकर भगवद् प्राप्ति करले तो यह उसकी स्वतंत्रता है जो भगवान द्वारा प्रदत है मानव योनि को ।

अगर भगवान किसी मनुष्य को कोई भी संकल्प करने और किसी भी कार्य को करने से पहले ही रोकते तो फिर मनुष्य कर्म प्रधान योनि नहीं रह जाता जो भगवान के खूद के कानून का उन्हीं के द्वारा उलंघन होता और मनुष्य परतंत्र होता कर्म करने में । 
इस प्रकार मनुष्य के कर्म का फल देने का कार्य भगवान के लिए तर्क संगत नहीं होता । 

यही कारण था कि तमाम राक्षसों ने , आसुरी प्रवृत्तियों के जीवों ने भगवान के उपर भी आक्रमण किया , उनको गालियां भी दी , उनके मंदिरों को उजाड़ा, और आज भी कुछ आसुरी लोग कर रहे हैं फिर भी भगवान उसे नहीं रोकते । हां फल जरूर मिलता है सबके अपने अपने कर्म के अनुसार। 

जब बुरा कर्म करने के फलस्वरूप फल के रूप में प्राप्त पाप का घड़ा भरा और जीव जैसे हीं पुण्यक्षिण हुआ भगवान ने उसको सजा दे दी और आसुरी शक्तियां मारा गया , उसका विनाश हुआ , इतिहास में सब दर्ज है । 
शिशुपाल भरी सभा में भगवान को गालियां देता रहा, कुछ धर्म परायण लोग उसे रोकना चाहा वहां भी , उसी सभा में लेकिन भगवान ने हर किसी को उसे रोकने से मना कर दिया । 
और मुस्कुराते हुए शिशुपाल के गालियों को गिनते रहे । सौ गालियां पुरी होते ही शिशुपाल के पुण्य का घड़ा खाली हो गया तथा पाप का घड़ा भर गया । फिर भगवान का चक्र चला और शिशुपाल का सिर धर से अलग । 

तो जब यह बातें ( तत्वज्ञान ) मालुम है आपको तो फिर आप क्यों कहते हैं कि भईया वो ग़लत कर रहा है आप कुछ बोलिए ? इसका मतलव तत्वज्ञान आपके मस्तिष्क से फिसल जाता है ।
 
जो जो ऐसा कर रहा है वो आसुरी वृत्ति का मनुष्य है करने दिजिए उसे । 
हमारे आपके समझाने से या रोकने से वे नहीं रूकने वाले हैं , यह मान लिजिए जितना जल्दी हो सके ।

जब वो नहीं समझने वाला समझाने से भी, तो फिर भगवान के द्वारा दिए हुए स्वतंत्रता में हम दखल अंदाजी क्यों करे ?

अगर हम उसको समझाने गए भी तो उल्टा वो हमको ही अपने व्यवहार से अशांत करेगा , कुसंग बोलेगा ।‌ और कुसंग अच्छी चिज़ नहीं है हमारे लिए । 

तो इतना तो समझदारी होना ही चाहिए ! जो लोग मुझे कहते हैं रोकने के लिए, उनको तत्वज्ञान याद नहीं रहता इसलिए ऐसा गलती करते हैं और मेरे मैसेज बौक्स में भर देते हैं मैसेज दे देकर और प्रमाण के रूप में मेरे मैसेंजर में और व्हाट्सएप्प पर भी विडियो भेज कर कि आप क्यूं नहीं कुछ बोलते ? अरे पुरे दुनिया का आप ही ठेका ले रखा है क्या ? 

मै तो भाई बहुत साधारण जीव हुं , मेरी इतनी सामर्थ नहीं कि मैं आसुरी प्रवृत्तियों वाले मनुष्य को समझा सकूं और रोक सकूं गुरू द्वारा दिए गए तत्वज्ञान के बाबजूद भी । 

जिसको अहंकार है कि वो उस आसुरी प्रवृत्तियों वाले मनुष्य को समझा देगा , रोक देगा तो जाईए आप ही समझा दिजिए उसको !

अरे जब भगवान नहीं रोकते किसी मनुष्य को गलत या सही संकल्प करके गलत और सही कर्म करने से तो मैं क्यों जाऊं अनाधिकार चेष्टा करने ? 

जब भगवान और महापुरूष ऐसे लोगों को नहीं समझा सके अनेकों अवतार के बाबजूद तो हम आप क्या है भाई ? 

रहने दो उसे उसके हाल पर । छोड़ो उसे । 
भगवान उसके भी कर्मों का फल एक दिन जरूर देंगे ही, जब बड़े बड़े रावण , कुंभकर्ण , हिरण्यकश्यप, हिरण्याक्ष , कंस , शिशुपाल , जरासंध जैसा महावली नष्ट हो गया स्वयं के उदंडता के कारण तो भला हम आप और वो क्या है ? करने दो उसे उदंडता । 

आप क्यों परेशान हो रहे ? क्या भगवान आप ही को ठिकेदारी दी है उसे गलत करने से रोकने के लिए ? आप दुसरे को मत देखो कि दुसरा क्या क्या कर रहा है । आप खूद को देखो कि आप क्या कर रहे हो ? साधना न करके यही सब विडियो आदि देखते रहते हो कि कौन कौन क्या क्या ग़लत कर रहा है क्या नहीं ? 

अरे अपना बना लो न । आपको हमको हमारे किए का फल मिलेगा उसको उसके किए कि फल (सजा) मिलेगा भगवान से । आपको चिंता क्यों हो रही है , क्यों अपना समय आप बर्बाद कर रहे हो ? 
जितना समय और श्रम आपने किया मेरे मैसेंजर पर उसका विडियो भेजने में और मुझे लिखने में , उतना समय आप अगर सिरियसली श्री महाराज जी का प्रवचन सुन लेते , उनका विडियो देख लेते , कुछ तत्वज्ञान और भी पक्का कर लेते , कुछ राधा नाम ले लेते , पांच मिनट साधना कर लिए होते तो आप कुछ और आगे बढ़ चुके होते ।
उल्टा अपना भी समय बर्बाद कर रहे हो, मेरा भी समय खड़ाब करना चाहते हो और मनगढ़ में जाके जिजियों से कंप्लेन करके उनके द्वारा रोकवाने के लिए मुझे बोलते हो !
इतना फालतु समझते हो महापुरुषों के समय को क्या ? इतना भी ज्ञान नहीं है आपको ?

और रही बात समाज की, तो समाज मे अगर कोई असंवैधानिक काम कर रहा है और आपको लगता है गलत है, तो कानून कहता है पुलिस में कंप्लेन कर दो आप , कोर्ट में जाकर कंप्लेन कर दो , काननू अपने हाथ में लेने का अधिकार तो देश का कानून भी नहीं देता है किसी को संसार में भी ।

ठीक उसी प्रकार भगवान के बनाए कानून के खिलाफ काम करने वाले को भगवान ही दंड देंगे, हम क्यों अनाधिकार चेष्टा करें । वो सबको देखते रहते हैं हम सभी के कर्मों को नोट कर रहे हैं । हम क्यों उनको बतलाने जाए । वो तो सर्वांतर्यामी है , सभी के कर्मों को नोट करते हैं , और स्वत: संज्ञान लेने में भी समर्थ है, फल देने में भी स्वतंत्र है और हर तरह से समर्थ भी है भगवान ।

Sunday, 3 March 2024

कभी भी किसी भी महापुरुष में , संतों में तुलनात्मक बातें हम जैसे नर्सरी कक्षा के साधकों को कभी नहीं करना चाहिए ।

कभी भी किसी भी महापुरुष में , संतों में तुलनात्मक बातें हम जैसे नर्सरी कक्षा के साधकों को कभी नहीं करना चाहिए । हमारा लेवल साधकों में भी बहुत नीचे है । उत्तम साधक वो है जिनका संसार से पुर्ण रूप से मोह भंग हो चुका है और वो अन्य किसी भी विषयों से अपना ध्यान , लगाव हटा कर कर्मयोग कि साधना भी त्याग कर पुर्ण रूपेण कर्म सन्यास कि साधना में अपना जीवन लगा चुके हैं , कर्म सन्यास की साधना में प्रवेश कर चुके हैं । 

ऐसे उच्च स्तर के साधक को भी श्री महाराज जी ने कभी संतों में तुलनात्मक अंतर करने का अधिकार नहीं दिए हैं । यहां तक कि श्री महाराज जी के प्रचारक भी ऐसी तुलनात्मक बातें वर्तमान में उपस्थित किसी संत का नाम लेकर कभी नहीं करते हैं । 
क्योंकि गुरू का आदेश ऐसा करने का विल्कूल नहीं है । और हमलोग तो ठहरे अभी पुर्ण रूपेण संसारिक । 
अभी संसार के "स" से भी हमारा मोह भंग नहीं हुआ है , फिर अगर हम ऐसी तुलनात्मक बाते करे तो उससे श्री महाराज जी को तकलीफ़ होना स्वाभाविक है । 
अगर हम ऐसा करते हैं तो हम दोनों के प्रति नामापराधी ही है । 
दोनों तरफ से गए हम लोग । 
इसलिए ऐसी बातों से सर्वदा बचना चाहिए। 
श्री महाराज जी ने तो यहां तक हमें हिदायत दिए हैं कि संसार में भी हम किसी साधक को बाहरी तौर पर देख कर यह विल्कूल नहीं जान सकते कि वो अंदर से क्या है ? किसका स्तर कितना ऊंचा है ? 
क्योंकि हम मनुष्य तो अल्पज्ञ है, सर्वांतर्यामी नहीं , इतना अल्पज्ञ है हमलोग  कि हमारी खूद कि स्थिति का सही से हमको जानकारी नहीं कि हम कहां तक पहुंचे हैं , उपर उठे हैं या निचे गिरे हैं । दिन भर में कई बार हमारा स्तर उपर निचे होता रहता है , अभी हम विल्कूल स्टेबल भी नहीं कि जहा तक पहुंचे हैं वहीं पर है या उससे आगे बढ़े हैं ।  हम अपने बुद्धि से तो अपना भी आंकलन ठीक से नहीं कर सकते तो भला दुसरे के आंतरिक व्यक्तित्व को हम कैसे जान सकते हैं ? वो भी किसी वर्तमान संत का ? 

अपनी ‌बुद्धि तो अभी गड़बड़ ही है हमारी ।
तीन गुणों में हमारी बुद्धि अभी , भाव , डिसिजन पल पल बदलता रहता है, हमारा भाव अभी विल्कूल स्थाई नहीं है  । हमें स्वयं के दोष को भी समझने कि शक्ति नहीं है।  इसलिए अपनी बुद्धि को गुरू के बुद्धि से जोड़ने तथा उनके बल से ही हमें हमारी दोष को समझने तथा  दुर करने का नित्य संकल्प करने का गुरू आदेश है ।

फिर श्री महाराज जी ने ही हमें आदेश दिया है कि किसी भी संत में भेद करने का या तुलनात्मक बातें करने का अधिकार किसी को नहीं है नित्य सिद्ध महापुरूषों को छोड़ कर । 
साधन सिद्ध महापुरूषों को भी इसका अधिकार नहीं है । इसलिए साधन सिद्ध महापुरूष भी इनसे बचते हैं । 

उन्होंने फिर आगे कहा है कि सभी संत उनके ही अंग है , यानि हाथ पैर अंगुली, आंख , कान , नाक , गला, बाल  आदि है । तो फिर कोई पैर की तुलना हाथ से करें , और हाथ की तुलना नाक से करें , नाक कि तुलना कान से करें , कान कि तुलना आंख से करें , तो यह तो हास्यास्पद बातें ही होंगी और महान मुर्खता कि बातें होंगी ।‌ क्योंकि अलग अलग अंगों का बिषय विल्कूल अलग अलग है । 
श्री महाराज जी ने ही हमें समझाया है कि महापुरूषों में भी अनके प्रकार के महापुरूष होते हैं , कोई भगवान के अवतार हैं , कुछ नित्य सिद्ध उनके परिकरों के अवतार हैं , कोई साधन सिद्ध महापुरूष है जो फिर आ गय है अवतार लेकर । 
उसके बाद फिर भाव के अनुसार भी कई कक्षा है महापुरुषों का , कोई शांत भाव के महापुरूष है , कोई दास भाव के है , कोई सखा भाव के है कोई वात्सल्य भाव के और  कोई माधुर्य भाव के है , अब माधुर्य भाव में भी कई क्लासेज है , जैसे कोई सधारणी रति के महापुरूष है तो कोई सामंजसा रति के है , कोई समर्था रति के अवतारी संत हैं । 
अब इनमें भी फिर कई क्लासेज है , जैसे राग भक्ति वाले महापुरुष हैं तो कोई अनुराग भक्ति वाले हैं,  कोई प्रणय भक्ति वाले हैं , कोई मान भक्ति वाले हैं, कोई भाव भक्ति वाले हैं , अब रस के अनुसार भी कई महापुरूष है , जैसे की कोई कुंज रस के रसिक संत हैं , कोई निकुंज रस वाले है तो कोई निभृत निकुंज रस वाले रसिक संत हैं , कोई राधा महाभाव के संत है जो राधा रानी के अवतार हैं जैसे हमारे श्री महाराज जी । 
भगवान श्री कृष्ण स्वयं  राधामहाभाव अंगिकार करके श्री गौरांग महाप्रभु बन कर और फिर श्री कृपालु महाप्रभु बनकर अवतार लिए थे अभी  हम जैसे अधमों को प्रेम रस का पान कराने के लिए । 

इस प्रकार अनेकों क्लास वाले अलग अलग आध्यात्मिक भाव भक्ति विषय , मार्ग वाले संत है । सबका बिषय अलग अलग है । 

यहां तक कि सन्यासियों में भी चार कक्षा के सन्यासी हैं , कुटिचक, बहुधक, अवधूत, तुरियातीत आदि फिर उससे भी उपर और आगे हंस है,  उससे और आगे परमहंस आदि है । अत: इन सब में तुलना करना ठीक उसी प्रकार है जैसे संसार में फिजिक्स के प्रोफेसर की तुलना जीव विज्ञान के प्रोफेसर से की जाए , भुगोल के प्रोफेसर की तुलना केमिस्ट्री के प्रोफेसर की जाए । गणित के प्रोफेसर कि तुलना हिन्दी के प्रोफेसर से कि जाए । अत: ऐसी तुलनात्मक बाते करना विल्कूल सही नहीं है । 
उसमें भी हमलोग नर्सरी कक्षा के साधक अगर ऐसी बातें करते है तो यह नामापराध के सीवा और कुछ नहीं है , ऐसी बातें करने से कम से कम हम श्री महाराज जी के अनुयायियों को विल्कूल बचना चाहिए। अगर हम साधारण साधकों में से ऐसी तुलनात्मक बाते कोई करता है तो इसका मतलव उसे श्री महाराज जी द्वारा दिए गए तत्वज्ञान के " त" का भी जानकारी सही से नहीं है । इसलिए इन सबसे आज के युवा साधकों को या किसी भी साधकों को बचना चाहिए। जो आज्ञा हमको गुरू द्वारा दि गई है उसी का पालन ठीक से करने पर फोकस करना  हमारे हित में  है । 

ऐसे भी संसारिक दृष्टि से भी अगर कोई एक व्यक्ति दुसरे के पिता को छोटा  और खुद के पिता को बड़ा बोले तो दुसरा भी पहले वाले के पिता को बोल देगा की नहीं जी मेरा पिता तेरे बाप से बड़ा है , फिर शुरू होती है एक दूसरे के बाप को लेकर गालियां शुरू , तो ये जो हम अपने बाप के बारे दुसरे से गलत बातें सुने , उसको मौका दिये , उसके लिए जिम्मेदार कौन है ? 
तो इस तरह कि बातें पब्लिकली करना भारी मुर्खता कि निशानी है । 
इसलिए पहले स्वयं अपना ध्यान पी एच डी करने पर दें हमलोग तो अच्छा रहेगा । 
नही तो संसार में जे एन यू से पी एच डी किया हुआ छात्र भी बैठा रह जाता है फेल होकर और  अनेकों साधारण युनिवर्सिटी का छात्र आई ए एस कंपीटिशन कंपीट करके कलक्टर बन जाता है , आई एफ एस तक होकर राजदूत बन जाता है दूसरे देश में । इतना तो हम लोगों के पास उदाहरण है हीं है संसार में भी । 
तो युनिवर्सिटी के महानता के अलावा छात्र का अपना पढ़ाई और मेहनत महत्वपूर्ण होता है  । नहीं तो बड़े से बड़े युनिवर्सिटी भी काम नहीं देगा , परीक्षा में सफलता का गारंटी नहीं है । 

और रही बात अपने महान माता पिता रूपी गुरू के महानता के गुणों का चर्चा करने के लिए जो कि एक अच्छी बात है तो बिना दुसरे का नाम लिए , बिना दुसरे का नाम लेकर उसको बिना छोटा बता भी तो हम अपने माता पिता को महान , सर्वोत्तम बता सकते हैं और हम बताते भी है और वो हैं भी सर्वोच्च । 

याद रखना चाहिए हमेशा कि  हम महान संत के अनुयाई हैं तो हमें हर जगह मर्यादा का पालन करना अधिक जरूरी है , नहीं तो संसार के आम लोग कहेंगे कि देखो सर्वोच्च गुरू का शिष्य या अनुयाई होकर भी कितना उदंड है । इस प्रकार लोगों को हम ही मोका देते हैं अपने पिता को कुछ  सुनवाने के लिए । 
हमारे ऐसे व्यवहार से हमारे गुरूदेव को दुख होता है । 
भक्त प्रति अपराध करें कोई सही सके न मेरे श्याम । 
श्री महाराज जी यह  कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि हम किसी संत यानि भक्त के प्रति अपराध करें । 
जो हमारा मूल काम साधना करनी है, गुरू सेवा करनी है  वो तो हम नहीं करेंगे और दो शब्द तत्वज्ञान का कान में परा नहीं कि हम लगते हैं उड़ने और दुसरे को छोटा बताने , यह अच्छी बातें विल्कूल नहीं है । अरे गर्त में हम चले जाएंगे । हमको दंड मिलेगा । 
So Please avoid comparing in between any saint . This is pure Namapradh . It is strictly forbidden by Sri Maharaj jee .

श्री राधे । 
 श्री राधे ।