Tuesday, 29 June 2021

मेरा संस्मरण ,

मेरा संस्मरण :- 
किस प्रकार सदगुरू जीव को उसके जन्म से पहले और फिर उसके बाद अपने शिष्य को संभालते हैं प्रेरणा देते हैं और दिलवाते भी हैं संसार के महान जीवों के द्वारा भी !
किस प्रकार गुरू अपने लीला संवरण के बाद सर्वव्यापक होकर सबका कल्याण करतें हैं !

युवाओं को और हमारे भाई बहनों को मैं वहीं कहना चाहता हुं जो मुझे 1988 में बाबा आमटे ने विवेकानन्द पुरम कन्याकुमारी में कहा था ।

 उस दिन से मेरी उच्श्रृखंलता, चंचलता समाप्त हो गई और मैं अपने कोर्स के अलावा अच्छी अच्छी पुस्तकों को पढ़ने का आदत शामिल कर लिया अपने जीवन में । और करीब लगभग दो हजार से उपर पतली व मोटी पुस्तके/पत्रिकाएं पढ़ी है आज तक , इसमें मेरे गुरूदेव की चालिस से अधिक पुस्तकें और लगभग साठ से उपर पत्रिकाएं भी शामिल है ।
यह कैसे हुआ तो बाबा आमटे और डॉ सुब्बाराव साहब ( भाई जी कहतें है सभी इनको ) के प्रेरणा से । और इनकी प्रेरणा ने संसार में मेरे जीवन की दिशा बदल दी थी । मैं जीवन को एक गंभीर अध्ययन बना लिया , दुसरे को सिखाने के लिए नहीं वल्कि खुद को पहले संवारने के लिए । वर्णा मेरा भी जीवन आम हो जाता , मजाक हो जाता , फुहर हो जाता ।
दुसरा सबसे बड़ा आत्मिक और मानसिक , बैचारिक या आध्यात्मिक परिवर्तन श्री कृपालु जी महाप्रभु एवं पूज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी से मिलने के बाद हुआ । 
ऐसा लगता है कि मेरा जीवन भी जन्म से पहले ही विल्कूल प्रोग्राम्ड था श्री कृपालु जी महराज जी द्वारा ।

श्री कृपालु महाप्रभु श्री गुरूदेव हीं मेरे जीवन का पुरा रोड मैप पहले से तैयार कर रखा था और अपने मिलाने से पहले मुझे अध्ययन के मामले में एकाकी बनाया , हर तरह के अच्छी से अच्छी शिक्षा , पुस्तकों द्वारा हीं नहीं वल्की संसार में भी महान लोगों के सानिध्य के द्वारा और फिर बाद अपने तत्वज्ञान से ओतप्रोत कर दिया ।
इसलिए यह महसूस करता हुं कि गुरू का संबंध एक जन्म का नहीं होता , यह रिस्ता जन्म जन्मांतर का होता है । 
 मैं विवेकानन्द पुरम में कुछ दिन प्रत्येक शाम समुद्र के किनारे बाबा आम्टे के साथ टहलता था ।
एक शाम टहलते हुए उन्होंने मुझसे कहा था उस समय मै छात्र था कौलेज में , एन एस एस में था । " अच्छी अच्छी पुस्तकें पढ़ने की आदत डालो , इससे सोंच अच्छी और उदार होगी , चरित्र और संस्कार का निर्माण होगा, जीवन को सही दिशा मिलेगा, सही दृष्टिकोण बनेगा , वृत्ति शुद्ध होगी जिससे प्रवृत्ति उदार और संयमित होगा । भोगवादी संस्कृति से उपर उठोगे और अपने जीवन को शांती मय बना पाओगे "
" इससे आचरण बदलेगी, और खुद बदल जाओगे ,आचरण बदलेगा तो तुम्हारे कथनी और करनी में फर्क नहीं दिखेगा । इससे परिवार अच्छा होगा , परिवार अच्छा होगा तो समाज भी अच्छा होगा और समाज अच्छा होगा तो राष्ट्र बदलेगा, और फिर दुसरे युवा को भी प्रेरित करो " 

उन्होंने कहा था कि जीवन के अंतिम समय तक स्वध्याय करते रहना चाहिए अच्छी अच्छी पुस्तकों का । लोग सोचते हैं क्या होगा उम्र गुजर गई । अब तो मरना है !

नहीं ऐसा नहीं सोचना चाहिए । जीवन के अंतिम समय में अच्छी अच्छी पुस्तकों का अध्ययन , ध्यान और साधना और बढ़ा देना चाहिए । जिससे अंत गति अच्छी होती है और एक नया बढ़िया शरीर मिलता है एक अच्छे संस्कारों के साथ नया जीवन मिलता है । आत्मा दुसरा शरीर धारण कर लेता है और यह एक युग पुरूष के निर्माण की प्रक्रिया है इसमें कई जन्म लेने परतें हैं अध्ययन शील साधक को । 

अब तो श्री कृपालु महाप्रभु के पुस्तकों के अध्ययन बार बार और साधना में हीं मन लगता है संसार के काम के बाद और संसार के काम के दौड़ाने भी गुरूदेव हीं हमेशा साथ रहतें हैं । लेकिन इसके लिए जीवन की चंचलता उच्श्रृखंलता को समाप्त करना होता है । नहीं तो ध्यान साधना में ऐसे लोगों को मन नहीं लगता चाहे कितना भी प्रयास कर लें । अंदर से शांत होना होता है गंभीर होना होता है तब सहज ज्ञान उतारा जाता है गुरूदेव के द्वारा अंत:करण में , फिर रूपध्यान सहज बनता है ।

 व्यक्ति केवल हाड़ मांस का पुतला नहीं है वल्कि विचारो का भंडार है । अच्छे विचारों का भंडार होने के लिए, बहुत अच्छे अच्छे विचारकों और महापुरूषों के पुस्तकों का अध्ययन लगातार करना होता है , साधना एवं उनका संग करना परता है । फिजिकल संग ना हो कोई बात नहीं । 
महापुरुषों का पुस्तक हीं उनका विचार होता है उनका निज स्वरूप होता है । उनकी पुस्तकें हीं उनका साकार रूप होता है उनके जाने के बाद ।
 इसलिए उनके पुस्तकों का संग हीं , अध्ययन हीं और उनके बतलाए सिद्धांतों का अनुसरण हीं उनका वास्तविक संग है । वर्णा तो लोग उनके भौतिक स्वरूप के संग होते हुए भी संग नहीं होते वास्तव में , लाभ नहीं ले पाते हैं । 
इसलिए महापुरुष अपने लीला संवरण के बाद और भी व्यापक हो जातें हैं कडोरों को वास्तविक संग देने के लिए अपना विस्तार कर लेतें हैं । जिससे बहुतों का कल्याण होता है । 
आज हमारा सौभाग्य है कि श्री महाराज जी की दो सौ से अधिक पुस्तकें साधकों के लिए उपलब्ध है । और फिर वार्षिक पत्रिकाएं भी है । हम साधकों के लिए बहुत है । और बांकी लोगों के लिए , बहुत से महापुरुषों के पुस्तके हैं ।‌ पढना चाहिए ।
यह मेरा निजी अनुभव है जो चल रहा है लगातार ।
श्री राधे 
 मैंने अपना अनुभव शेयर किया । धन्यवाद ।🙏❤️🙏

मेरी कविता

तुम चले गए इस धराधाम से
पर तुम जा नहीं सकते मेरे अन्तर्मन से 
अटुट प्रेम का सागर उड़ेल कर 
मेरे तन मन में अपना खुशबु उड़ेल कर 
वोलो प्रिय फिर कब आओगे ?
कब फिर मेरे प्राण लौटाओगे ?

सार जगत का मुझको समझाकर ,
अपने निज शीतल स्वरूप दिखला कर 
अलक्षित हो गए तुम जहान से ‌,
पर कैसे जाओगे मेरे अंतर्मन से 

नस नस में विरह की अग्नी बुझाने 
वोलो प्रिय फिर कब आओगे ?
या तो अपने पास बुला लो 
या प्रिय तुम खुद हीं आ जाओ ,

श्री राधे जय जय श्री राधे , बोलो प्रिय तुम कब आओगे ?
( मेरी रचना )

Sunday, 27 June 2021

विश्वास और श्रद्धा को दृढ़ करने का आधार है तत्वज्ञान,

विश्वास और श्रद्धा को दृढ़ करने का आधार है तत्वज्ञान, 
हम लोग इट और कंक्रीट का घर बनाते हैं । तो हम सभी लोग क्या करते हैं छत ढालते समय ? तो सबसे पहले निचे से बांस बल्ला आदि लगा कर सेंट्रीग तैयार करते हैं छत ढालने से पहले , मजबुत सेंट्रींग होना चाहिए जो छत ढालने में कंक्रीट व छड़ के भार को ठीक तरह से संभाल कर उसको नीचे धंसने नहीं दे ।
अब "इक्कीस दिन" बाद जब सिमेंट और क्रंक्रीट का छत मजबुत हो जाता है तब क्या करते हैं । चेक करते हैं कि अब छत इतना मजबुत हो गया है कि वो दुसरे महले का भार भी उठा लेगा या नहीं । तब जाकर उस ढले छत के नीचे बाला बल्ला जो अपने आप ढीला हो जाता है उसको हटा देते है और सेंट्रींग भी निकाल देते हैं । 
क्योंकि अब छत को सहारे का जरूरत नहीं ।

ठीक उसी प्रकार भगवान और गुरू पर दृढ़ विस्वास रूपी छत को पक्का करने के लिए , मजबुत करने के लिए तत्वज्ञान रूपी बांस बल्ले और सेंट्रींग की बहुत आवश्यकता है । 
जब गुरू और भगवान पर श्रद्धा और विश्वास रूपी छत जम जाए , मजबुत हो जाती है तब ज्ञान रूपी बांस बल्ले और सेंट्रींग की जरूरत नहीं होती ।
तक वो कंक्रीट रूपी दृढ़ विश्वास, ‌‌श्रद्धा रूपी सिमेंट के साथ इतना मजबूत हो जाता है कि उसको अब ज्ञान रूपी बांस और सेंट्रींग रूपी पुस्तकों का जरूरत नहीं परती । 
तब मजबुत छत पर प्रेम रस अनुभव होने लगता है थोड़ा थोड़ा , फिर प्रेम रूपी अनेक महला खड़ा होने में देर नहीं लगता । श्री राधे । 🙏❤️🙏 आपका संजीव कुमार रांची ।( मेरे ब्लौग से )

Wednesday, 23 June 2021

”मुजरिम कौन ?"एक बार सत्संग के दौरान एक आदमी ने खड़े होकर एक संत से विनती करते हुए अपनी किसी भूल की क्षमा माँगी ।

”मुजरिम कौन ?"
एक बार सत्संग के दौरान एक आदमी ने खड़े होकर एक संत से विनती करते हुए अपनी किसी भूल की क्षमा माँगी । अपनी दीनता को दर्शाते हुए उसने अपने गले में जूतों की माला डाल रखा था । संत ने उससे पूछा कि शरीर को सज़ा देने का क्या फ़ायदा अगर असली मुजरिम मन, आज़ाद घूमता फिरे ? 
अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए संत ने यह कहानी सुनाई ।

एक स्त्री ने एक बकरा और एक बन्दर पाल रखा था और उन दोनों को उसने घर के पास बाँधा हुआ था । एक दिन उसने बड़े प्रेम के साथ खाना बनाया और दही लेने के लिए बाज़ार चली गई । बन्दर ने अपने हाथों से अपनी रस्सी खोलकर, रोटियाँ खाकर बकरे की रस्सी खोल दी और अपने गले में उसी तरह अपनी रस्सी डाल ली । जब वह स्त्री वापस आयी तो देखा कि खाना नहीं है और बकरा खुला फिर रहा है । लगी बकरे को मारने । कोई सज्जन यह सब देख रहा था । उसने कहा कि यह बकरा बे-क़सूर है, सारा क़सूर उस बन्दर का है ।

सो अपनी कामना पूरी करने के लिए यह मन-रूपी बन्दर सबकुछ कर लेता है ।
असली क़सूर तो मन का होता है लेकिन सज़ा बेचारे शरीर को भुगतनी पड़ती है ।

मन लज्जत का आशिक़ है । जब इसे पहले से कोई अच्छी चीज़ मिल जाये तो यह 
पहली को छोड़ देगा, और दूसरी के पीछे दौड़ेगा....
इसे चाहे दुनिया की करोड़ों लज्ज़ते दे दें
पर मन फिर भी वश में नहीं आता ।
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तो अगर जीवन में शांती और शकुन चाहिए तो...संतोषम् परम सुखम का मार्ग अपनाना होगा मन को शांत करके । 
भगवान से भी किसी भी कामना का पूर्ण त्याग करना होगा । 

और केवल अपने गुरू से प्रेम करना होगा "निष्काम प्रेम "। तभी आध्यात्म भी सही होगा और संसार भी । 
ये सब पीछला जन्म और अगला जन्म की चिंता से मुक्त होना होगा । जितना बन परे परोपकार के लिए दान कर दिजिए अगर है तो, नहीं है तो दान ले लिजिए। छिनिए नहीं किसी से , घुस नहीं , डकैती नहीं , किसी का शोषण नहीं , किसी के हक को मारना गंभीर पाप है । 
ऐसे भी संसार में जितना भी धनार्जन वाले हैं वो सब दान से प्राप्त धन से हीं अपना निर्वाह करतें हैं , यहां तक तो ठीक है, यह धनोपार्जन जीवन के लिए जरूरी है , पर जो व्यापारी अपने व्यापार द्वारा या नौकरी में जो गृहस्थ अनैतिक रूप से धन अर्जित करते हैं इनकी अंत गति अच्छी नहीं होती ।
अब नौकड़ी या व्यापार करने वाला कहेंगें की नहीं भाई हम तो मेहनत करते हैं , हमारी अपनी काबिलियत है , योग्यता है , हम अपने कर्म से कमाते हैं । हां आप कह सकतें हैं पर यह सच नहीं हैं । आप कर्म और कुकर्म में अपने जमीर के तौर पर समीक्षा करेंगे तब समझ जाएगें। 

अब अगर आप यह कहतें हैं कि आप अपनी योग्यता से कमातें हैं तो फिर आप यह कैसे सोंच सकतें हैं कि हम संत के निमित्त भगवान के निमित्त दान करतें हैं ।  
फिर तो मेहनत तो सबसे ज्यादा संत करतें हैं वो भी अपने लिए नहीं परोपकार के लिए और यह उनकी योग्यता है आपसे अनंत गुणा अधिक । वो अपने उपर कुछ भी खर्च नही करतें वल्कि अपना भी लुटा देतें हैं । वो अपनी योग्यता से आपको मोटिभेट करतें हैं, परोपकारी बनाते हैं । दयालु बनातें हैं मानव बनाते हैं । तो यह तो उनका कमाल है आपका नहीं ।
असली कर्मी और महादानी परोपकारी संत होतें हैं पराकाष्ठा का , जैसे श्री कृपालु महाराज जी , भगवान का साकार स्वरूप । A real philanthropist . जिन्होंने अपना सबकुछ दान कर दिया जीव हित के लिए । एक बैंक एकाउंट तो क्या एक लकड़ी का डब्बा भी उनके नाम से नहीं हैं । यहां तक की अपने निज जन यहां तक की तीनों पुत्रियों को भी जीव कल्याण में लगा दिया । इससे बढ़कर और मिशाल क्या हो सकता है भला ??
  🙏🏽☝🏽🙏🏽 पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी ।।

कर्मयोग करें और फल ईश्वर पर छोड़ दें वो भी पूर्ण निष्काम भाव से फिर आप हर समस्या और परिस्थितियों में खुशहाल रह पाएँगे......

कर्मयोग करें और फल ईश्वर पर छोड़ दें वो भी पूर्ण निष्काम भाव से फिर आप हर समस्या और परिस्थितियों में खुशहाल रह पाएँगे......

यह शरीर चाहे कितना भी सुन्दर हो, पत्नी चाहे कितनी भी मनमोहिनी हो, धन चाहे कितना भी सुमेरु पर्वत के सामान असीम हो, चाहे संसार में नाम कितना भी प्रसिद्द हो चूका हो , लेकिन जब तक जीवन प्रदान करने वाले भगवान् श्री हरि के चरणकमलो में मन नहीं लगा... तब तक क्या प्राप्त किया? क्या पाया ? अर्थात भगवान् श्री हरि से विमुख होकर, समस्त संसार की धन-सम्पदा, सुन्दरता, सभी भौतिक सुख प्राप्त हो जाए, फिर भी व्यर्थ ही है|

एक राजा बहुत दिनों से विचार कर रहा था कि वह राजपाट छोड़कर अध्यात्म (ईश्वर की खोज) में समय लगाए । राजा ने इस बारे में बहुत सोचा और फिर अपने गुरु को अपनी समस्याएँ बताते हुए कहा कि उसे राज्य का कोई योग्य वारिस नहीं मिल पाया है । राजा का बच्चा छोटा है, इसलिए वह राजा बनने के योग्य नहीं है । जब भी उसे कोई पात्र इंसान मिलेगा, जिसमें राज्य सँभालने के सारे गुण हों, तो वह राजपाट छोड़कर शेष जीवन अध्यात्म के लिए समर्पित कर देगा ।
गुरु ने कहा, "राज्य की बागड़ोर मेरे हाथों में क्यों नहीं दे देते ? क्या तुम्हें मुझसे ज्यादा पात्र, ज्यादा सक्षम कोई इंसान मिल सकता है ?"
राजा ने कहा, "मेरे राज्य को आप से अच्छी तरह भला कौन संभल सकता है ? लीजिए, मैं इसी समय राज्य की बागड़ोर आपके हाथों में सौंप देता हूँ ।"
गुरु ने पूछा, "अब तुम क्या करोगे ?"
राजा बोला, "मैं राज्य के खजाने से थोड़े पैसे ले लूँगा, जिससे मेरा बाकी जीवन चल जाए ।"
गुरु ने कहा, "मगर अब खजाना तो मेरा है, मैं तुम्हें एक पैसा भी लेने नहीं दूँगा ।"
राजा बोला, "फिर ठीक है, "मैं कहीं कोई छोटी-मोटी नौकरी कर लूँगा, उससे जो भी मिलेगा गुजारा कर लूँगा ।"
गुरु ने कहा, "अगर तुम्हें काम ही करना है तो मेरे यहाँ एक नौकरी खाली है । क्या तुम मेरे यहाँ नौकरी करना चाहोगे ?"
राजा बोला, "कोई भी नौकरी हो, मैं करने को तैयार हूँ ।"
गुरु ने कहा, "मेरे यहाँ राजा की नौकरी खाली है । मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे लिए यह नौकरी करो और हर महीने राज्य के खजाने से अपनी तनख्वाह लेते रहना ।"
एक वर्ष बाद गुरु ने वापस लौटकर देखा कि राजा बहुत खुश था । अब तो दोनों ही काम हो रहे थे । जिस अध्यात्म के लिए राजपाट छोड़ना चाहता था, वह भी चल रहा था और राज्य सँभालने का काम भी अच्छी तरह चल रहा था । अब उसे कोई चिंता नहीं थी ।
इस कहानी से समझ में आएगा की वास्तव में क्या परिवर्तन हुआ ? कुछ भी तो नहीं! राज्य वही, राजा वही, काम वही; दृष्टीकोण बदल गया ।
इसी तरह हम भी जीवन में अपना दृष्टीकोण बदलें । मालिक बनकर नहीं, बल्कि यह सोचकर सारे कार्य करें की, "मैं ईश्वर कि नौकरी कर रहा हूँ" अब ईश्वर ही जाने । और सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दें । तब ही हम हर समस्या और परिस्थिति में खुशहाल रह पाएँगे । आपने देखा भी होगा की नौकरों को कोई चिंता नहीं होती मालिक का चाहे फायदा हो या नुकसान वो मस्त रहते हैं । सब छोड़ दो वही जानें!!!!
श्री राधे ।

Wednesday, 16 June 2021

दुसरा प्रश्न था आप सभी से कि :- त्रेता में भगवान राम अन्य राक्षसों को लक्षमण जी द्वारा , हनुमान जी , जामबंत जी , सुग्रीव जी द्वारा और अपने नर बानर सेना आदि से मरवाए पर रावण और कुंभकरण को स्वयं मृत्यु दे करके अपना लोक प्रदान कर दिए, इसके पीछे क्या कारण हैं ? ( वो दोनों जय विजय उनका द्वारपाल थे इसके अलावे उत्तर चाहिए ) श्री महाराज जी के तत्वज्ञान के आधार पर उत्तर दिजिए ।

अब दुसरे प्रश्न का उत्तर :-
दुसरा प्रश्न था आप सभी से कि :- त्रेता में भगवान राम अन्य राक्षसों को लक्षमण जी द्वारा , हनुमान जी , जामबंत जी , सुग्रीव जी द्वारा और अपने नर बानर सेना आदि से मरवाए पर रावण और कुंभकरण को स्वयं मृत्यु दे करके अपना लोक प्रदान कर दिए, इसके पीछे क्या कारण हैं ? 
( वो दोनों जय विजय उनका द्वारपाल थे इसके अलावे उत्तर चाहिए ) 
श्री महाराज जी के तत्वज्ञान के आधार पर उत्तर दिजिए । 

उत्तर :- दो चार भाई और बहन ने तत्वज्ञान के दृष्टिकोण से उत्तर दिय थे सही था , बस उसको और थोड़ा गहराई से मैं उत्तर लिख देता हुं । श्री महाराज जी के कृपा से । जो निम्नलिखित हैं :- 
तत्वज्ञान के दृष्टि से पहले समझते हैं :- भगवान जब भी धरा धाम पर अवतरित होते हैं अपने परकीया लीला ( व्यवहारिक लीला) में तो उसका बहुत बड़ा उद्देश्य और हर लीला का अलग अलग प्रकार होता है । और उनके आने से पहले उनका खास परिकर आ जाते हैं उनके लोक से , कोई निगेटिव रोल के लिए तो कोई पौजिटीव रोल के लिए । नहीं तो लीला होगी हीं नहीं । और यह लीला संसार के लोगों को राजयोग , ज्ञानयोग और भक्तियोग का व्यवहारिक सिद्धांत सिखाने के उद्देश्य से होता हैं ‌ , जिससे अलग अलग प्रकार के भाव वाले को उनके अपने अपने मार्ग के हिसाब से ज्ञान मिल जाए । रास्ता मिल जाए ।

तो भगवान श्री राम के रूप में अवतार लिए । उनको मर्यादा भी स्थापित करना था संसार में । मर्यादा पुरुषोत्तम बन कर आए । उच्च आदर्श जैसे आदर्श पति , बेटा , भाई , राजा आदि की स्थापना ।

तो अब उनके परम प्रिय भक्त आदि, जो उनके साथ उनके लोक को प्राप्त कर चुका भक्त , जो उनके सेवा में वहां रहते हैं उनको ही नीचे भी अलग अलग रोल निभाने का सेवा मिलता है । उनके सभी ऐसे भक्तों में तत्वज्ञान भरा रहता है चाहे वो किसी भी रोल में आए और जाए पृथ्वी पर उनके लीला में सहायता करने ।

अब रामावतार में भगवान स्वयं ही सीता बन गए । और स्वयं हीं तीनों भाई बन कर आ गए ।

"एकं सत् विप्रा बहुधा बदंती " एक भगवान अनके बन कर आ गए ।

१.स्वयं भरत रूप में निस्वार्थ भक्ति की पराकाष्ठा रूपी भक्ति करने का तरिका सिखाए भक्ति मार्गी जीव को कि निष्काम भक्त कैसा होता है कैसे करना चाहिए ।
२. खुद लक्ष्मण रूप में छोटे भाई बन कर दास भाव भक्ति अंगिकार किया और सिखाए दास भाव भक्ति मार्गी को कि कैसे किया जाता है ।
३. स्वयं सीता बन गए और समर्था रति का भक्ति सिखाया संसार को ।
४. स्वयं शत्रूघ्न बन कर आए , सबसे छोटे भाई के रूप में और सिखाया की कैसे आदेश का पालन करके भरत जैसे भक्त का भी दास यानि दास का भी दास कैसा होना चाहिए ?

अब आइए उनका सेबक , द्वारपाल जय विजय को मिला निगेटिव रोल निभाने का आदेश ।
पौजीटिव रोल निभाना तो फिर भी आसान है लेकिन निगेटिव रोल निभाना, वो भी उनके अनन्य दास के लिए कितना पीड़ा दायक होगा इसकी कल्पना हम आज भी नहीं कर सकते ।
हम लोग जीरो वाला भक्त हैं तो जरा सा कोई दो बात बोल देता है आज , अपमान कर देता है तो तिलमिला जाते हैं । कोई तत्वज्ञान पर बात भी करता है सही सही , तो उससे जलन होता है । नोचने दौड़ते हैं उसको । पर सोचिए जय विजय को यह रोल निभाने में कितनी पीड़ा हुई होगी ? 
पर असली भक्त तो भगवान के आदेशों के पालन के लिए नरक का भी वरण करने को तैयार रहता है ।
जय विजय जानता था कि पुरा विश्व अनंत काल तक उसको गाली देता रहेगा । पर फिर भी वो दोनों भगवान के सुख के लिए रावन और कुंभकरण के रूप में अवतार लिया त्रेता में । हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप में सतयुग के अंत में , और शिशुपाल एवं कंस के रूप में द्वापर में धरा धाम पर आया ।

अब आप पुछेंगे कि भगवान अपने जन को राक्षस का लीडर बनने का आदेश क्यों दिए । तो उत्तर है कि राक्षसों का , दुष्टों के विनाश के लिए । संपुर्ण राक्षसों के विनाश के लिए ।
आप ध्यान से समझिए , रावन तत्वज्ञानी था । एक बार जिसको भगवद् प्राप्त हो जाता है तो उसपर माया कभी फिर अधिकार नहीं कर सकती है और वो दोनों तो सदा से माया से परे उनका द्वारपाल सेवक था । इसलिए दोनों भाई सब जानता था । उस दोनों को भगवान से अनंत प्रेम था ।
 नफरत नहीं था और ना द्वेष था उस रूप में भी । 
सदा से भगवान के लोक में उनका दास बन कर रहने वाले तो हमेशा से माया से परे होते हैं तो उनको भला फिर माया कैसे लग सकती है ? 
और जब वो माया से परे हैं तो उनको माइक दुर्गुणें कैसे लग सकती है । और जब नहीं तो वो काम क्रोध , मद मोह लोभ ईर्ष्या द्वेष कैसे कर सकता है भला । बोलिए आप ही ! 

कुछ लोगों ने अपने उत्तर में लिखा द्वेष था उसको । नहीं नहीं , ऐसा नहीं था दोनों के ह्रदय मे, दोनों के ह्रदय में भगवान राम से केवल और केवल अनन्य प्रेम था, निष्काम प्रेम था । कोई द्वेष नहीं था ।
रावण सब जानता था अंदर से कि सीता जी कौन है और वो एक्टिंग में जिस सीता को हर लाया है वो अग्नी पुत्री हैं ।

आप लोग श्री महाराज जी के बहुत से किताब और सभी प्रवचन को नहीं सुना और सुना भी है तो भुल जाते हैं । और विडियो डालने पर उसको ध्यान से नहीं सुनते , उनके सभी किताब खरिदते नहीं । और लंबा पोस्ट पढ़ते नहीं । केवल लाईक और शेयर ,बस यही हमारा काम है यहां । खुद समझे नहीं पर दुसरे को जनाने की जल्दी है । दुख होता है यह देख कर । और कोई समझाता है तो उसको व्यंग करने लग जाते हैं उल्टे , हम लोग खुद को बड़ा ज्ञानि साबित करने में लगे रहते हैं । यह अहंकार है कि मैं तुमसे बहुत पहले से जुड़ा हुआ पुराना साधक हुं , वो सब समझ गया , सब जानता हुं । अहंकार भरा जा रहा है उल्टे हमलोगो में । कोई एक प्रश्न पुछ दे तो टांय टांय फीस । 
और जब कोई सही उत्तर दे देता है तो कहते हैं कि हम तो पहले से जानते थे । जब जानते थे तो उत्तर पहले क्यों नही । और फिर बाद में क्यु जनाते है हम कि हम तो जानते थे जी । 
कितना गलत आदत है हमारा ? मैं उनलोगो को साधुवाद देता हुं जिन्होंने कुछ प्रतिशत सहित हीं सही उत्तर दो दिया । इस प्रश्नोत्तरी से कुछ एक दो असली जिज्ञासुओं को लाभ तो होगा कम से कम । 

गलती से जो संसार समझता है वहीं समझ लिया आप भी कि रावण आदि को द्वेष था राम से , इसलिए राग द्वेष बाला फार्मुला बता दिया आप , यह फार्मुला हम घोर मायाधिन संसारी के लिए लागु है । महापुरूषों के लिए नहीं । महापुरुष लोग केवल प्यार करते हैं उनसे । राग द्वेष का फार्मुला उनके लिए भी लगा देना पुरा गलत है । दो जोर दो ही पांच हो गया है आप से तो आगे सब उत्तर गलत ही होगा । स्वाभाविक है ।

वो तो द्वेष का नाटक किया था रावण कुंभकर्ण दोनों ने , हमको आपको दिखाने के लिए , और सबसे बड़ी बात लंका के सभी राक्षसों के विनाश करवाने में भगवान के अवतार के उद्देश्य को पुरा करने के लिए वो नाटक किया , जो रोल दिया भगवान ने वो निभाया उन दोनों ने ।
अगर वो नाटक करने के दौरान शरेंडर कर देता या खुद पहले आ जाता मरने तो तमाम राक्षसों का विनाश कैसे होता । इसलिए वो सभी को मरवा दिया पहले ।
और देखिए जानबुझ कर विभिषण को लात मार कर राज्य से मुक्त कर के भगवान के पास भेज दिया क्योंकि वो धर्मराज का अवतार भगवान का भक्त विभिषण था । 
अगर वो लात नहीं मारता भरी सभा में और बोल देता कि हे मेरे‌ प्यारे भाई मैं और तुम तो जानते हैं कि तुम भगवान का भक्त हो , यहां से निकल जाओ , उनके शरण में चले जाओ तो फिर उसका पुत्र आदि मेघनाथ असुर आदि सचेत हो जाता और भाग जाता । 
पर रावण को तो तमाम असुरों के विनाश के बाद श्री लंका में विभिषण के रूप में धर्म राज के शासन के स्थापना के उद्देश्य में भगवान का मदद करना था ।

इसलिए महापुरुष था रावण और कुंभकरण व विभिषण, मंदोदरी आदि । 
इसलिए यह सब नौटंकी करना परा उन सभी को ।

अब आइए मेघनाथ जो भक्त नहीं था , महापुरूष नहीं था , कर्मकांडी में महान था वो सब का विनाश लक्ष्मण जी आदि से हुआ । 
पर एक परम भक्त को कोई दुसरा परम भक्त कैसे मार सकता है भला । यह नियम नहीं है भगवन के यहां ।
इसलिए रावण कुंभकर्ण को भगवान स्वयं मारे । 
क्योंकि सभी भक्त महापुरुष भगवान से अनन्य निष्काम प्रेम करता है ‌जो उनके लोक से आता है । माया से परे होता है अंदर से और वो भी भगवान की शक्ति योगमाया से हीं काम करता है अवतार काल में ।

अब आइए व्यवहारिक पहलु पर भी ध्यान देते हैं ।
तो चुंकि भगवान का रामवतार संसार के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम अवतार था ।
इसलिए उनको युद्ध के मैदान में मर्यादा धर्म का भी पालन करते हुए श्री लंका के राजा को , संसार के सामने मृत्यु दंड देने का विधान रूपी फर्ज भी स्वय निभाना था ।

राम के चरण पादुका अयोध्या के गद्दी पर आसीन था । इसलिए वो वनवासी होने के बाबजूद भी राजा भी थे ।
एक राजा को वो भला अपने दास भाव के भक्त लक्ष्मण जी के हाथों कैसे मृत्यु देते और अपना लोक भेजते । यह मर्यादा के खिलाफ था ।
इसलिए उनको दोनों दृष्टियों से लीला करना था ।
यही कारण था ।

मैने भी विना किसी कि सहायता लिए यह उत्तर दिया है पहले से दिमाग में भर दिए हैं श्री महाराज जी । जो श्री महराज जी कि कृपा से प्राप्त तत्वज्ञान है उसके आधार पर मैंने लिखा । श्री महराज जी साक्षी है । इसका उत्तर देने में मैंने किसी से कोई सहायता नहीं लिया है । श्री महाराज जी का चिंतन से प्राप्त कृपा बल से मैं लिखा । किसी प्रकार के त्रुटि के लिए क्षमा करेंगें । आप सभी के चरणो में नमन । 
श्री राधे । 
आपका संजीव कुमार ।


Tuesday, 15 June 2021

अगरबत्ती जलाना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी खतरनाक और सनातन धर्म शास्त्रों में पुरी तरह बर्जित है सनातन धर्म पुरी तरह वैज्ञानिक हैं । तो फिर इसका उपयोग क्यों ?

अगरबत्ती जलाना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी खतरनाक और सनातन धर्म शास्त्रों में पुरी तरह बर्जित है सनातन धर्म पुरी तरह वैज्ञानिक हैं । तो फिर इसका उपयोग क्यों ? 
तो बड़े बड़े पंडित ज्योतिषों , मंदीर प्रशासनों का यह धर्म नहीं कि इसको जलाने से रोके लोगों को जागरूक करें । 
सभी मंदीरो में बड़ा बड़ा बोर्ड लगा दें कि हमारा शास्त्रों में अगरबत्ती निषिद्ध है । 

बांस को जलाने से हो सकता है यह बड़ा नुकसान, जान लीजिए धार्मिक और वैज्ञानिक कारण :- 
आप सब सभी तरह के लकडियों को जलते हुए देखा होगा, लेकिन क्या कभी बांस को जलते हुआ देखा है? हां, तो सिर्फ दुघर्टनाओं में। वह इसीलिए, क्योंकि भारत में बांस को जलाया नहीं जाता है। धार्मिक कारण के चलते वैसे तो बांस को नहीं जलाते है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा वैज्ञानिक कारण भी है। हम अक्सर शुभ और अशुभ कामों के लिए विभिन्न प्रकार के लकडियों को जलाने में प्रयोग करते है लेकिन क्या आपने कभी किसी काम के दौरान बांस की लकड़ी को जलता हुआ देखा है। जिसके कारण क्या हैं, आप जानेंगे।

भारतीय संस्कृति, परंपरा और धार्मिक महत्व के अनुसार, हमारे शास्त्रों में बांस की लकड़ी को जलाना वर्जित माना गया है। यहां तक की हम अर्थी के लिए बांस की लकड़ी का उपयोग तो करते है लेकिन उसे चिता में जलाते नहीं।

 हिन्दू धर्मानुसार बांस जलाने से पितृ दोष लगता है वहीं जन्म के समय जो नाल माता और शिशु को जोड़ के रखती है, उसे भी बांस के वृक्षो के बीच मे गाड़ते है ताकि वंश सदैव बढ़ता रहे।

बांस को क्यों नहीं जलाते, ये है वैज्ञानिक कारण:-
धार्मिक मान्यता के अलावा बांस को न जलाने की एक बड़ी वैज्ञानिक मान्यता भी है। वैज्ञानिकों के रिसर्च के अनुसार बांस में लेड व हेवी मेटल प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। लेड जलने पर लेड ऑक्साइड बनाता है जो कि एक खतरनाक नीरो टॉक्सिक है। हेवी मेटल भी जलने पर ऑक्साइड्स बनाते हैं। लेकिन जिस बांस की लकड़ी को जलाना शास्त्रों में वर्जित है यहां तक कि चिता मे भी नहीं जला सकते। हम हमेशा अंधानुकरण ही करते है और अपने धर्म को कम आंकते है। जब कि हमारे धर्म की हर एक बातें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार मानवमात्र के कल्याण के लिए ही बनी है। अत: कृपया सामर्थ्य अनुसार स्वच्छ धूप का ही उपयोग करें।

बांस से बनी अगरबत्ती जलाने में भी नुकसान
हम उस बांस की लकड़ी को हमलोग रोज़ अगरबत्ती में जलाते हैं। अगरबत्ती के जलने से उतपन्न हुई सुगन्ध के प्रसार के लिए फेथलेट नाम के विशिष्ट केमिकल का प्रयोग किया जाता है। यह एक फेथलिक एसिड का ईस्टर होता है जो कि श्वांस के साथ शरीर में प्रवेश करता है, इस प्रकार अगरबत्ती की तथाकथित सुगन्ध न्यूरोटॉक्सिक एवम हेप्टोटोक्सिक को भी स्वांस के साथ शरीर मे पहुंचाती है। इसकी लेश मात्र उपस्थिति केन्सर अथवा मष्तिष्क आघात का कारण बन सकती है। हेप्टो टॉक्सिक की थोड़ी सी मात्रा लीवर को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। शास्त्रो में पूजन विधान में कही भी अगरबत्ती का उल्लेख नही मिलता । सब जगह धूप ही लिखा है हर स्थान पर धूप, दीप, नैवेद्य का ही वर्णन है। 

अगरबत्ती का प्रयोग भारतवर्ष में इस्लाम के आगमन के साथ ही शुरू हुआ है। इस्लाम मे ईश्वर की आराधना जीवंत स्वरूप में नही होती, परंतु हमारे यहा होती है। मुस्लिम लोग अगरबत्ती मज़ारों में जलाते है, उनके यंहा ईश्वर का मूर्त रूप नही पूजा जाता।
इसलिए हमारे सनातन धर्म के हरेक मंदीरों में अगरबत्ती जलाना पुरी तरह बंद होना चाहिए । 
सब को जागरूक करना हरेक सनातनी का काम है ।