Sunday, 23 May 2021

आज के परिदृष्य में , दुष्ट व्यक्ति ( जिसके अंत:करण में विष हीं विष भरा है ) , दुष्ट समाज , दुष्ट राष्ट्राध्यक्ष को उत्तम ज्ञान देकर समझाना बहुत बहुत मुश्किल हैं ।

आज के परिदृष्य में , दुष्ट व्यक्ति ( जिसके अंत:करण में विष हीं विष भरा है ) , दुष्ट समाज , दुष्ट राष्ट्राध्यक्ष को उत्तम ज्ञान देकर समझाना बहुत बहुत मुश्किल हैं । कारण है मोराल क्राइसिस , नैतिक पतन । आज के प्रदुषित परिवेश में अपने बुद्धि पर बल देने वाले बहुत कम लोग हैं । अतिशय स्वार्थ सिद्धि के लिय छल प्रपंच का सहारा लोग लेतें है। कुछ शैतान मौलवी , मुल्ला, साधु और पादरी के भेष में घुमतें हैं । अयोग्य व्यक्ति महत्त्वपूर्ण पदों पर कई जगह बैठे हैं । देश, कलुषित मानसिकता वादी स्वार्थी तत्वों से परेशान है। कुछ लोग अपने ही परिवार का घातक है( दारू पीकर दंगा करते हैं घर में) , कुछ लोग अपने हीं जाति ( मानव जाति) , धर्म , समाज और देश का दुश्मन हैं वो भला निरीह बेजूवान और निर्बल को कैसे जीने देगा ? सत्ता कैसे भी किसी तरह भी हांथ में आ जाए इस उद्देश्य की राजनीति होती है । 

आज का हालात त्रेता युग के उस काल से जिसमें भगवान को रावण बद्ध करना पड़ा और द्वापर के अंतिम काल से भी काफी नीचे गिर गया है , दूषित हो गया है जिसमें रावन जैसा पंडित , ज्ञानी भी भगवान राम के उपदेशों को नहीं समझ सका , और दुर्योधन और उनके पिता धृतराष्ट्र को भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं समझाया ,‌शांति प्रस्ताव लेकर गए स्वयं भगवान । 
जरा सोचिए की स्वयं भगवान शांती संदेश लेकर गए , और दुर्योधन के धृष्टता पर अपना चक्र दिखा कर , तमाम सभा में अपने मुल स्वरूप का एक झलक भी दिखाया , ताकी शांती संदेश का प्रस्ताव स्वीकार हो डर के मारे भी और युद्ध टल जाए पर कोई प्रभाव नहीं हुआ । और अंत में एक युद्ध का विकल्प हीं बचा दोनों काल में । 
आज उससे भी बदतर स्थिति है । 
सनातन धर्म में वेद में इसलिए साम , दाम , दंड, भेद का भी विधान है । 
सनातन पहले तो शांति पसंद करता है । नहीं मानने पर दाम से शांती कायम करना चाहता है । फिर भी नहीं तो भेद , विभेद द्वारा विरोधी को खंडित करके शांती स्थापित करता है और फिर भी नहीं समझा तो फिर धर्मयुद्ध द्वारा दुष्टों को दंड देने का विधान है । 
अतः अब आजकल जो दुष्ट लोग , देश , समाज शांती का पाठ नहीं समझता और उस पर साम ,दाम एवं भेद का भी कोई असर नहीं होता है , उसको धर्मयुद्ध द्वारा दंड देने का अंतिम विकल्प हीं शेष बचता है । 
 :- जय जय जय श्री राम ।

Wednesday, 19 May 2021

मेरी कविता :- " रोता हूँ जब तेरी यादो में तुम ही आंसु बन जाते हो |

मेरी कविता :- 
" रोता हूँ जब     तेरी यादो में 
   तुम ही आंसु   बन जाते हो |

  लिखता हुँ जब कोई गीत तुझे 
  तुम छन्द बन      छा जाते हो |

  बन कर  बसंत तुम पतझर  में 
  हर गुलशन को   महकाते   हो |
 
  बन कर कभी राधा की करुणा 
  भक्तो  पर      प्रेम  लुटाते   हो ||

  घनघोर   निशा   की बेला   में 
  तुम ही   चन्द्रमा बन जाते  हो |
 
 बन कर  गोपी का   गीत   प्रभु 
 कृष्ण को  तुम ही रीझाते    हो |

बन धुन वंशी कभी  कान्हा   की
भक्ति का     गीत    सुनाते   हो |

  बन कर कभी राधा की करुणा 
  भक्तो  पर      प्रेम  लुटाते   हो ||

   मेरे   इस     निरस   जीवन  में
  तुम   बहार     बन  जाते    हो |

  बन कर   घटा घन   घोर  प्रभु 
  बन मोर  नाचते     मधुवन में   |
  
  छा जाते बन हरियाली ब्रज में
  तब तुम ही कृष्ण  बन जाते हो |

  बन कर कभी राधा की करुणा 
  भक्तो  पर      प्रेम  लुटाते   हो ||

  कभी घनन घनन कभी छनन छनन 
  तुम वंशी मधुर बजाते हो 
  तुम वंशी मधुर बजाते हो ||"
  
  ( मैं ए गीत गुरुदेव  आपके  प्रेरणा ही से लिखा है और आपको समर्पित-संजीव आपका चरणानुरागी )

Tuesday, 18 May 2021

अत्यंत महत्वपूर्ण शब्जेक्ट :- गोपनियम गोपनियम गोपनियम , यह तीन शब्द संतों , शास्त्रों ने , महापुरूषों ने जो कहा है उसका समझ मुझे पुज्यनिया मां से पता चला था ।

अत्यंत महत्वपूर्ण शब्जेक्ट :- 
गोपनियम गोपनियम गोपनियम , यह  शब्द तीन बार  संतों , शास्त्रों ने , महापुरूषों ने जो कहा है उसका समझ मुझे पुज्यनिया मां से पता चला था ।

तो यह गोपनियम गोपनियम गोपनियम शब्द के अर्थ का लोग अनर्थ करके दूसरे को ज्ञान देते लोग मिल जाएंगे की भगवान से संत से अपने प्रेम को छुपाओ ।
हां विल्कूल सही है और विल्कूल छुपाना चाहिए ।
कौन से प्रेम को छुपाना चाहिए लोग यह नहीं समझते । इसलिए यह पोस्ट लिखना परा आज ।

तो अब इसको संसारी उदाहरण देकर समझते हैं । सभी संत संसारिक उदाहरण द्वारा ही समझाते हैं ‌। कारण हम लोग दिव्य शब्दों को तो ना सुन पाएंगें और समझना तो दुर की बात है । 
जैसे नीम के किड़े को गुड़ के स्वाद समझाना मुश्किल है क्योंकि वो गुड़ का स्वाद कभी चखा हीं नहीं तो उसको कैसे समझाया जाए,  तो उस किड़े को उसी के खुद के संसार की बातों का उदाहरण देकर समझाते हैं संत आदि की,  हे नीम के किड़े तुमको जो निंब की निबौरी में जो रस मिलता है उसका हजार गुना ज्यादा रस में उस गुड़ में है,  तो फिर वो कुछ कुछ समझ जाता है ।
इसी प्रकार हम लोगों का हाल है बिना संसारिक उदाहरण के हमको दिव्य ज्ञान , आदेश आदि समझ में नहीं आता है और हम उसका कोई और अर्थ लगा लेतें हैं , और यही कारण है कि इतने सालों साल सुनते रहे संतों का , मुंडी भी हिला दी पर उनके एटोमिक वाक्य का कोई और अर्थ लगा लिए ओर गलतफहमी का खुद शिकार रहे और उसी गलत समझ से दुसरे को भी समझाने का अपराध कर बैठते हैं ।
ना शास्त्र की समझ हुई और ना शास्त्र युक्ति में निपुणता ,यानि उसका व्यावहारिक उपयोग भी नहीं जानते , और फिर गलत जगह सही बात और सही जगह गलत बात इस्तेमाल करते पाए जाते है । जैसे  दुध में नमक और दही में सकक्कड़ मिलाना समझ  लिए । और दही में सकक्कड़ तो स्वाभाविक है स्वास्थ्य के लिए सही नहीं और दुध में नमक का उपयोग  तो पागलपन है हीं ।
तो हम संसारिक उदाहरण से ही समझ सकते हैं क्योंकि हम उसी  नीम के किड़े की तरह है  ।

तो उदाहरण - संसार में पति पत्नी को लेते हैं और उसके बीच प्रेम और और गहरा रूप रति क्रिया को लेतें हैं ।
जिस प्रकार पति पत्नी अपनी रति जो पत्नी पति से और पति पत्नी से जो वार्तालाप करती है रति क्रिया करती है उसको संसार में वो गोपनीय रखती है । उसका प्रदर्शन खुले आम नहीं करती और ना करना चाहिए । 

पर वो अपने पति के प्रति बाहर संसार में  अपशब्द का या ऐसा नहीं है कि वो बाहर बोले कि मैं तो आपको जानती नहीं ।
अरे शब्दों में तो वो अपने पति को सम्मानजनक शब्दों के संबोधन का इस्तेमाल अपने बच्चों के सामने या अपने सास ससुर मित्र के सामने करती ही है । और करना भी चाहिए । नहीं तो परिवार के लोग गलत अर्थ लगा लेगें की इसको अपने पति से पटता नहीं । और फिर सभी परिवार के लोग दुखी रहेगें ।
ठीक उसी प्रकार एकांत साधना में हरि गुरू के प्रति असली प्रेम भाव को छुपाने के लिए गोपनियम का आदेश है शास्त्रों में । 
ना की उनके प्रति सम्मान का भावो शब्दों में प्रकट करने को या छुपाने के लिए कहा गया है ।

हम साधकों को अपने साधना में अनुभव अपने अंतरंग अनुभव को छुपाने के लिए कहा गया है ।
ना की उनके प्रति सम्मान प्रेम , को शब्दों में व्यक्त करने , गाने , उसका प्रचार करने से मना किया गया है ।

सामुहिक किर्तन में भी भाव प्रकट करने का दंभ करना पाप कहा गया है । जैसे दुसरो को दिखाने के लिए जबदस्ती आंसु बहाने का एक्टींग करना , जोड़ जोड़ से अठ्ठास करने का झूठा एक्टिंग , दुसरे को दिखाने के लिए झूठ मुठ के दम साध कर बेहोशी का मूर्क्षा का एक्टिंग करना पाप है ।
अष्ट सात्विक भाव भगवान के श्री चरणों में रति की अतिशयता के परिणामस्वरूप स्वरूप शरीर में हुए दिव्य दिव्य परिवर्तन भावावेश का प्रारूप है । जैसे कंप , प्रकंम , जड़ता , अठ्ठाहस , रोमांच , बेचैनी , आंखों में अनवरत बहता आंसु  अतः इन अष्ट सात्विक भाव को छुपाने का " यदा संभव" कोशिश करने के लिए कहा गया है । पर यह भी जब वास्तविक रूप से कंट्रोल से बाहर हो जाए और व्यक्त हो जाए तो पाप नहीं हैं । 
अब कोई भावावेश में सचमुच मूर्क्षित हो जाए तो यह तो किसी के बस में नहीं है कि वो वेहोश क्यों हो गया  । मुर्छा तो उसके बस की बात नहीं कब हो जाए साधना में , रूम में एकांत साधना में या सामुहिक किर्तन में ?
जिस प्रकार एक पति पत्नी  रति क्रिया छुपाती है उसी प्रकार एक साधक को भगवान से दिव्य रति क्रिया ( शारीरिक नहीं , मानसिक ) में उठे शारीरिक भावावेश एवं अनुभव को छुपाने के लिए गोपनियता का फरमुला बतलाया गया हैं ।
देखिए इसलिए बार बार और हजार बार मैंने लिखा है ।
जबतक वास्तविक रूप में हरि गुरू में श्रद्धा और प्रेम नहीं होगा हमारा । उनके दिय तत्वज्ञान को हमलोग रट लेगे पर समझेगें कभी नहीं है ये मेरा भी चैलेंज है और संतों का तो हैं हि है । 
शास्त्रों के शब्दों को रट लेंना और उसका नकल करके यानि कौपी पेस्ट करके लिख देना , याद करके बोल देना किसी दुसरे को बड़ा आसान है पर उसको समझना पहले फिर व्यवहार में सही सही उतारना फिर अनुभव करना  , यह विरले हीं कर पाते हैं ‌ हम जैसे खुद को समझदार समझने के भ्रम में रहने वाले मुर्ख नहीं । :- संजीव कुमार , रांची ।

Monday, 17 May 2021

चार बाते करो और कुछ ना करो :- श्री कृपालुजी महाराज ।।

श्री महाराज जी : प्रवचन ,
आप लोग बस केवल चार बाते याद रखे और अमल करे , माने और लागु करे अपने जीवन में , केवल चार बाते , आपको लक्ष्य की प्राप्ति हो जाएगी , बाकी सब ज्ञान की बातें है , सबको दिमाग मे नही रख सकते , क्योंकि भुलने की बीमारी है . 

हां तो वे चार बाते है  :- पहला -  हरि और गुरु की भक्ति , दुसरा - नित्य  , तीसरा - अनन्य , चौथा - निष्काम भक्ति ,

अब भक्ति किसकी करनी है तो हरि और गुरु की , भक्ति का मतलब तो आपलोग समझ ही गय होंगे , 
मन का अटैचमेंट हरिगुरु मे ही हो , मन का अटैचमेंट क्युँ ? क्युँकी भक्ति मन को ही करनी है , अन्य इन्द्रियों की भक्ति का कोई फल नही है , क्युँकि भगवान मन मे उठे संकल्पो को ही नोट करते है . वे अन्य इन्द्रियादी कर्मो को नोट नही करते , क्युँ क्युँकि सबसे पहले आप मन मे ही संकल्प करते है उसके बाद ही मन के अनुसार इन्द्रियादी अपना कर्म करती है क्युँकि सभी इन्द्रियादी मन के हीं दास होते है अत: भगवान मन के संकल्पो को ही नोट करते है , वो इन्द्रियादी कर्मो के तरफ देखते भी नही , आपका प्राइभेसी यहां नही काम करेगा , आप बुरा सोचे किसी के लिय , भगवान नोट कर लिय , कोइ चालाकी या प्राइभेसी नही चलेगा , क्युँकि भगवान सर्वान्तर्यामी है और वो हमारे ह्रदय मे वैठ कर सब आइडियाज को , हर पल हर क्षण के आइडियाज को नोट करते रहते है और तदनानुसार फल देते हैं 
अत: मन का अटैचमेंट हमेशा हरि और और गुरु मे हीं हो ,
और ध्यान दो ...... और हर क्षण हो कि श्याम सुन्दर हमारे अन्दर बैठे है , 

और नित्य हो , मतलब ये नही की हर दिन केबल आधा घन्टा का भक्ति कर लिय हो गया , नही नही 
ऐसा नही चलेगा हर समय अपना काम करते हुए याद करें कि हमारे मन का अटैचमेंट हरिगुरु मे ही है .
नही तो एक घन्टा के लिय साधना किया और २३ घन्टा संसार मे लगाए रखे , इस तरह तो कपड़े को एक बार साफ पानी मे साफ कर दिया और बाकी सारे समय गंदे पानी मे डुबाते रहे , इस तरह कपड़ा कभी साफ होगा ही नही , गंदा का गंदा ही रहेगा ,
इस तरह समझो की कमाए केवल १०० रु और प्रतिदिन खर्च कर दिया २३०० रु फिर क्या होगा आपलोग जानते हैं |
इसलिय कही भी काम करते हुए या तो आफिस मे या दुकान मे संसार मे काम करते हुए हरेक आधे घन्टे मे कम से कम ए सोचो की भगवान श्री कृष्ण हमारे अन्दर बैठे है आपका काम बन जाएगा |

तीसरा - भक्ति अनन्य हो हरि और गुरु का ही हो , ऐसा नही की कुछ देर हरिगुरु मे मन का अटैचमेंट कर लिया और वांकी समय , माया बद्ध संसार को मन मे ले आए , माया बद्ध मां के लिय , वाप के लिय , भाइ के लिय , मित्र के लिय या अन्य संसारी लोगो के लिय , राग , द्वेश , घृणा , क्रोध ,  राजसीक या तामसीक भक्ति करते रहे  या सोचते रहे !
या अन्य माया बद्ध देवी , देवता की सात्विक भक्ति करते रहे , ये स्वर्ग लौक ,  देवी देवता ईंद्रादि  भी माया बद्ध ही है इनकी माया समाप्त नही हुई है | 
अत: एक तरफ इनकी भक्ति कर लिय इनको भी मन मे रखे हुए है और हरि और गुरु की भी भक्ति कर रहे है ,यह अनन्य भक्ति नही हुआ , क्युकि मायाधिन की भक्ति करोगे तो माया नही जाएगी और जब तक माया नही जाएगी तो भक्ति का फल नही मिलेगा , काम नही बनेगा , लक्ष्य की प्राप्ति नही होगी , 
देखो जिसकी बात सोचते रहोगे उसका कार्मिक दोष भी तुम्हारे अंदर आ जाएगा , आप कहोगे अरे हम तो कुछ नही किय , अरे नही किए लेकिन सोंचे तो , यही तो गरवड़ कर दिए , भगवान तो मन मे उठे विचारो को ही नोट कर लिय ,
अरे ए मन ही तो है जो आपसे पाप कर्म करवाते है ,
कइ जन्मो से करवा रहा है 
इसलिय कभी भी मन मे मायाबद्ध जीवों या देवी देवता के प्रति राग और द्वेश भाव उठे तो हरिगुरु का भजने करने  लगो मन हीं मन .  और सोंचो की ए मन बहुत गंदा है जबतक भगवत् प्राप्ति नही हो जाएगी यह हमे इसी तरह परेशान करता रहेगा , 
मन मे जैसे ही किसी के प्रति दोष भाव आए तुरत लाइन काट दो , मन का अटैचमेंट हरिगुरु मे कर दो,

देखो कपड़े मे आग पकड़ा तो आग पकड़ते ही आप बुझा देते हो न,
देखो खाते समय मुहं मे कंकड़ आ गया कैसा मुह बनाते हो , तुरत बाहर निकाल देते हो , उसी प्रकार जैसे ही मन का अटैचमेंट संसार मे होने लगे और राग , द्वेष , क्रोध आदि दोष उत्पन्न हो डिसकनेक्ट करके मन को हरिगुरु मे लगा दो , हरिनाम , गुण , लीला , धाम , उनके सन्त के तरफ कर दो मन को  .
काम बन जाएगा , भगवान फिर बुरे भावों को नोट नही करेंगे ,

अत: भगवान के रुप , गुण लीला , धाम और उनके सन्त मे ही मन का लगाव हो , ध्यान दो मन मे हीं, का मतलव सिर्फ भगवान के रुप , गुण लीला , धाम और उनके सन्त मे ही मन का लगाव हो अन्यत्र कही नही ,
इसी को अनन्यता कहते है .

अब आइए भक्ति निष्काम हो , यानी हम उनसे उनके सुख की ही कामना करें , 
संसार नही मांगोगे तो भी मिलेगा  क्युँकि संसार तो अपने अपने प्रारब्द्ध के अनुसार अपने अपने असंख्य जन्मों के कर्म के अनुसार मिल ही रहा है और मिलेगा ही , नही चाहोगे तो भी मिलेगा , तबतक मिलता रहेगा जबतक माया नही जाएगी , और माया तबतक नही जाएगी जबतक भगवत् प्राप्ति नही होगी .
क्युँकि जबतक भगवान अपनी माया को नही कहेगे की ऐ इसे छोड़ दो जी , ए हमारा हो गया अब , तबतक माया नही जाएगी .

और कही संसार मांगे और मान लो मिल भी गया तो लक्ष्य से भटक जाओगे . तुम संसार मे रम जाओगे और परमानंद से हमेशा के लिय बंचित होकर फिर चौरासी लाख के चक्की मे पिसने के लिय तैयार रहना ।
इसलिय केवल हरि और हरि गुरु का हीं भक्ति हो नं एक 
, नं दो भक्ति नित्य हो , नं तीन भक्ति अनन्य हो ( हरि और गुरु के नाम रुप , लीला , गुण , उनके नाम और उनके संत मे ही सदा मन का अटैचमेंट हो )
और नं चार निष्काम भक्ति हो ,
केवल ए चार काम करो आपका काम बन जाएगा ।

:- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Saturday, 15 May 2021

"भक्ति की शक्ति "

"भक्ति की शक्ति " 
मैं तो बल हीन हुंँ , धन हीन हुंँ , निर्बल हुंँ , ज्ञान हीन हुंँ पतित हुंँ , फकीर हुंँ पर फिर भी मैं राजा हुंँ , आनंद है मेरे पास । कैसे भाई  सब तरह से दीन हुंँ फिर भी राजा ? 
हांँ राजा हुंँ क्योंकि मैं अपने ईष्ट और गुरू का दास हुंं । 
एक भक्त कहता है अपने गुरू से कि :- 

उसके दर की गुलामी बादशाहत मेरी 
हुकुमे़ खुदा पर टिकी हुकूमत मेरी 
उसके नखड़े उठाऊं ये इबादत मेरी 
उसकी इताअत बन गई अब आदत मेरी 
बस सलामत रहे ये इरादत मेरी 
ये गुलामी मेरी और बादशाहत तेरी ।।

मैं हर तरह से लकीर का फकीर हुंँ पर मेरे पास तेरा बल है । तेरे कृपा का बल है , ए मेरे खुदा मेरे गुरू , ए मेरे हमनवां , ऐ मेरे दिल के बादशाह मैं तो बस एक तेरी ही दासता करता हुं । मेरे ह्रदय में मैं भी नहीं हुँ सिर्फ तू ही तू है । फिर मैं राजा कैसे नहीं ? 
तेरा ज्ञान रूप में मेरे पास ज्ञान का सागर है , तू प्राण रूप में मेरी उर्जा है , तुम षठसंपत्ति रूप में मेरी संपत्ति हो , तुम मेरी आत्म रूप में मेरा आत्म बल और आत्म विश्वास है । मैं तेरा सेबक हुंँ, तेरे भक्ति की तिजोड़ी जो तूने मुझ पर भरोसा करके दिया है तू मेरा है , मैं सिर्फ तेरा हुं और तेरा हीं रहुंगा हमेशा तो मैं बादशाह कैसे नहीं ! 
रहमत तेरी है सजदा मेरा , ये जो सजदा भी मैं तेरा करता हुं वो भी तेरे बल से हीं , तेरे बल से हीं पांचों पांडव बलवान हो कर कौरवों को मिटाया , अधर्म पर धर्म की विजय हुई , वो कौरव जिसको तूने अपनी सत्रह अक्छ्वनी सेना भी दे दी थी  , और जिसके पाले में भीष्म पितामह जैसे महारथी , द्रोण जैसे शास्त्रज्ञ शस्त्रज्ञ और पांडवों के भी गुरू थे व जिनके पास ब्रह्मास्त्र जैसा पृथ्वी नाशक शस्त्र था , कूल गुरू कृपाचार्य जैसे नितिज्ञ , कर्ण जैसा सूर वीर धनुर्धर , अस्वथामा जैसा रथी , तमाम शक्तियों के बाद भी समाप्त हो गए । 
यह है तेरी भक्ति की शक्ति ।

तुम ही कहते हो कि मैं उस समय भी था जब महाभारत हुआ , मैंने देखा था और तेरी कृपा से समझा की तुमने युद्ध से पहले ही हार मान कर धनुष-बाण छोड़ कर निराश बैठे , मोह ममता रूपी दल दल में फंसे अर्जूण को सतरह अध्याय तक तत्व ज्ञान दिया फिर भक्ति सिखाई यह कह कर सिखाई कि :- 
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।66।।
फिर कहा कि :- 

तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर यथाशास्त्रम्।
 युध्य च युद्धं च स्वधर्मं कुरु। 
मयि वासुदेवे अर्पिते मनोबुद्धी यस्य तव स त्वं मयि अर्पितमनोबुद्धिः 
सन् मामेव यथास्मृतम् एष्यसि आगमिष्यसि असंशयः न संशयः अत्र विद्यते।।किञ्चत

तो अंत में तुमने कहा कि हे अर्जूण  सभी कर्म धर्म ज्ञान विज्ञान पाप पुण्य के भय  को त्याग कर एक मात्र मेरी शरण में आ जाओ , और केवल मुझमें अपना मन बुद्धि चित्त लगाओ और फिर मेरी आज्ञा से , यानि आप भगवान की आज्ञा से प्राप्त बल से युद्ध करो । 
तो मैं आपकी कृपा से समझा प्रभु की  मैं अपने  शस्त्र , और शास्त्र और शारीरिक बल से , मोह माया से भरे निर्बल मन से कभी युद्ध कर ही नहीं सकता  और विजय तो दुर की कौड़ी था  ।
इसलिए आपने  शास्त्र का ज्ञान द्वारा तत्वज्ञान दिया , तत्व ज्ञान से अपनी भक्ति की तरफ प्रेरित किया पहले , और फिर मेरी माया चली गई , फिर मेरे ह्रदय में मेरा सारथी यानि गुरू बन कर ( गुरू सारथी ही होता है जो शिष्य को सर्वोच्य भक्ति की मार्ग पर ला दे , अंधकार से प्रकाश में ला दे , अंधेरा दुर कर दे मन का और फिर चित्त शुद्धि कराके विशुद्ध भक्ति प्रदान करें   ) मुझे भक्ति सिखाया । फिर आपके बल से इतनी बड़ी कौरव सेना को और बड़े बड़े महारथी को धुल चटा दिया प्रभु ।

आपने हीं मुझसे कहा था प्रभु की हे अर्जुन मैं तो इन सभी को पहले ही मार चुका हुं , जब ए सभी मेरे सनातन धर्म के विरुद्ध कर्म करना शुरू किए थे तभी इनका तेज समाप्त चुका था , इनकी आत्म बल बुद्धि , सब मैं क्षीण कर इनको निष्प्राण बना चुका था , तुमको तो मैं तत्वज्ञान देकर भक्ति की शक्ति प्रदान करके युद्ध के मैदान में खड़े इन शवों को लेटाने कि प्रेरणा दी है ।

युद्ध जीतने के बाद प्रभो मुझे अहंकार हो गया था , कि यह युद्ध मैंने जीता है । तो आपने भक्त बरवरीक के द्वारा मुझे फिर सचेत किया , बरवरिक का कटा सिर ने हंसते हुए  मुझसे कहा की युद्ध तो आप कर रहे थे । मुझे तो आपने निमित्त बनाया था केवल । 
तो इस प्रकार मैं जान गया हुं प्रभो कि कोई जीव अपने बल और कर्मो से  कभी किसी  दुष्टों को , राक्षसों को कभी नहीं समाप्त कर पाया है और ना कर पाएगा , एक मरेगा हजार पैदा होगा  । इतिहास गवाह है । शास्त्र गवाह है । 
दंडकारण्य के तमाम ऋषि मुनियो के पास उनके जप तप  योग का बल था और अनेकों दिव्यास्त्र था फिर भी वो रावण और उसके साम्राज्य को नहीं मिटा पाय खुद । आपको ही राम रूप में आना परा , उसी प्रकार पराक्रमी कंस को मात्र  एक मुक्का से समाप्त कर अपना लोक दे दिया आपने ।
आपने हिरण्यकशिपु। हिरण्याक्ष का बद्ध किया , रावण और कंस को आपने ही समाप्त किया और उनके शरीर से अपने जय विजय पहरेदार को मुक्त करके अपना लोक फिर से दे दिया । आपके सुरक्षा प्रहरी को भला कौन मार सकता था आपके सीवा प्रभु ? 

हां कौरव आदि को समाप्त करने के लिए मुझे निमित्त बनाया । क्योंकि वो सनातन का विद्रोही जीव था , धर्म से विमुख गुरू द्रोण , कृपाचार्य , भीष्म पितामह, अस्वथामा , दुर्योधन को मारने के लिए मुझे निमित्त बनाया क्योंकि उनको अपना लोक नहीं देना था आपको  , और तुक्ष लोक स्वर्ग भेज दिया आपने भीष्म पितामह , आदि को  ‌, और बांकी द्रोहियों को कौरवों को रौरव नरक दे दिया । 
अगर आप डाइरेक्ट मारते तो उनको भी आपको अपना लोक गोलोक देना परता , इसलिए यह काम अपनी भक्ति के द्वारा प्रदान शक्ति से आपने मुझसे करवाया ।

हे प्रभु आज भी वही आसुरी शक्ति आतंक बाद के रूप में उग्रवाद के रूप में फिर से विश्व में पनप रहा है ।‌
हे प्रभु मैं जानता हुं यह विधर्मी बिचार धारा रूपी आसुरी शक्ति है । इसका दमन कुछ देश , मिलिट्री , आदि थोड़ी देर के लिए कर सकता है पर ये समाप्त नहीं होने वाले ।
कारण आज बहुत से हम सनातनी खुद नहीं जानते , कि हमारा धर्म क्या है । हम सनातन धर्म रूपी भैल्यूज को खो चुके हैं , हिन्दु संस्कृति रूपी सिद्धांतों को भुल चुके हैं । हम मांस भक्षी हो गय। हम अपना संस्कार को भुल चुके । 
हम लगभग वस्त्र हीन हो चुके हैं हम सनातनी कबाबी ,‌जुआरी व्यभिचारी हो रहें हैं । हमारी माता बहने बेटा ,बेटी लगभग वस्त्र हीन सभ्यता अपना चुंके है । सिगरेट और शराब और दारू खाना हमारा मंदिर बन चुका है । संतो में , महापुरूषों में शास्त्रों में हमारी श्रद्धा ना रही , 
हम घटिया तामसिक किताब और विडियो और फिल्म देखने लगे हैं । फिल्म की कुछ विचित्र वस्त्र पहने लगभग वस्त्र हीन अभिनेता , अभिनेत्री हमारा रोल मोंडल बन गया है और हम उसके प्रवचनों को सुनने और विश्वास करने लगे हैं । हम ढोंगी साधु चमत्कार दिखाने बाले के शरण में जाने लगे हैं । हम असंगठित हैं । हम अपने ही धर्म से च्यूत हो रहे हैं । इन दुर्गुणों के कारण मैं तेज़ हीन हो गया हुं । मेरा अंत:करण बहुत गंदा हो चुका है ।
और फिर भी हम अहंकार करने लगे हैं कि हम अपने क्षूद्र बिद्या बल बुद्धि के बस में आकर जोश में उछल‌ कर बाते बना कर   हम उस बिचार‌धारा को समाप्त कर देगें ।‌

नहीं प्रभु , नहीं  मैं जानता हुं यह सम्भव नहीं है । 
हम आपके शरण में हैं प्रभु आप अपनी सनातन की चिंता करो फिर से , आप अपने जन कि चिंता करो फिर से । हे प्रभु मैं तो केवल आपके सेवक हुं , भक्ति के सिवा‌ आपने हमें कुछ भी करने को नहीं कहा है । मैं तो भक्ति हीं करूंगा । और कुछ भी नहीं प्रभु । 
आपने हीं कहा है गुरू देव - 
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
" हर समय मन ही मन हरि गुरू को स्मरण करते हुए युद्ध , युद्ध कुसंग से , कुविचारों से बचना और आपको भजना मन ही मन  " हरिगुरू रक्षा कर रहें हैं । करेंगें , यह दृढ़ विश्वास "
:-आपका नित्य दास संजीव कुमार , रांची। आज तारिख 16 मई ।

हमें अगर अपने भगवान श्री कृष्ण पर भरोसा है तो फिर हम सनातनी इतना बैचैन क्यूं हैं कि कोई सनातन धर्म को समाप्त कर देगा ? ऐसा सोचने बाला अगर कोई सनातनी भी है तो गलत है। फुल मैड है ।

हमें अगर अपने भगवान श्री कृष्ण पर भरोसा है तो फिर हम सनातनी इतना बैचैन क्यूं हैं कि कोई सनातन धर्म  को समाप्त कर देगा ? ऐसा सोचने बाला अगर कोई सनातनी भी है तो गलत है। फुल मैड है ।

सनातन धर्म का उद्भव और अंत ।। ( एक सत्य चिंतन )

जीस प्रकार भगवान अनादि है उसी प्रकार हमारी आत्मा अनादि है और ठीक उसी प्रकार सनातन धर्म ( हिन्दु संस्कृति ) आनादि है । 
हम कब से ? जब से भगवान , भगवान कब से ? जब से हम । भगवान और हम कब से जब से सनातन धर्म । 
तो हम तीनो का तीनों सनातन है । सनातन मतलब सदा से है ‌। तीनों की उत्पत्ति नहीं होती । न जन्म होता है । 
सिर्फ प्रकटी करण होता है । यानि भगवान श्री कृष्ण के संकल्प मात्र से सृष्टि होती है और उसी के साथ साथ सनातन धर्म ब्रह्मा जी के साथ साथ प्रकट हो जाते हैं ।
और इन तीनों को अंत भी नहीं है । यानि भगवान , हमारी आत्मा और सनातन तीनों अजन्मा हैं ।
और इन तीनों को कोई भी समाप्त भी नहीं कर सकता । स्वयं भगवान भी नहीं । 

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।।२३।। गीता ।

तो इसका भावार्थ तो सब लोग  जानते हैं कि आत्मा हो या परमात्मा इसको किसी भी बिधि कोई समाप्त नहीं कर सकता है स्वयं भगवान भी नहीं  । 

तो यह स्वत: सिद्ध है कि तीनों का जन्म नहीं होता , तीनों का अंत किसी भी विधि नहीं हो सकता । 
तो तीनों को समाप्त करने का कोई सोचें अगर तो वो फुल मैड है । थोड़ा या हाफ नहीं फुल मैड । 

तो फिर हम सनातनी इतना बैचैन क्यूं हैं कि कोई सनातन धर्म  को समाप्त कर देगा ? ऐसा सोचने बाला अगर कोई सनातनी भी है तो गलत है , जो आजकल कहते रहते हैं कि फलां फलां धर्म बाले , अपना जनसख्यां विस्फोट करके पुरे धरती पर फ़ैल जाएंगे और सनातन एक दिन खत्म हो जाएगा , मैं कहता हुं वो भोले हिन्दु है जो ऐसा सोचता है  । उनको खुद पे अपने सनातन धर्म पे और अपने ईष्ट पर भरोसा विल्कूल नहीं है । यह उनके खुद की  बात और चिंता साबित करती है । 

सनातन धर्म अजन्मा है और अमर है । जैसा परमात्मा और हमारी आत्मा अमर है । 
हां हां आत्मा भी अजन्मा है और अमर है क्यों क्योंकि आत्मा का अंशी भगवान है । अतः यह भी अपने अंशी के जैसे अविनाशी है :-

"सुनहु तात यह अकथ कहानी। 
समुझत बनइ न जाइ बखानी॥ 
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। 
चेतन अमल सहज सुख रासी॥1॥" - उत्तरकांड 7.117

और उसी प्रकार सनातन धर्म भी अजन्मा है और अविनाशी है । स्वयं भगवान भी स्वयं को , किसी  भी आत्मा को और ना सनातन धर्म का विनाश कर सकते हैं । तो फिर कुछ भोले सनातनी इतना हाय तोबा , चित्कार क्यूं कर रहें हैं मुझे समझ में नहीं आता ?

भगवान सर्व समर्थ  है । वो अपनी सत्ता की रक्षा स्वयं करते हैं । वो किसी भी  जीव और महापुरुष को भी यह अधिकार नहीं देते । 
वाकी सब शक्ति अपने संत अपने जन और महापुरूषों को दे देते हैं , पर दो कार्य सदा अपने पास रखते हैं ‌ ।
पहला -अपने सत्ता की रक्षा करना और दुसरा अनंत ब्रह्माण्ड के अनंत जीवों के मन में उठे संकल्पों को नोट करना । याद करिए श्री कृपालु महाप्रभु जी का दिया तत्वज्ञान ।
और अप्लाई किजिए मेरे इस चिंतन में ।
तो जब भगवान अपनी सत्ता , मतलब सनातन धर्म यानि नियम , यानि उनका संविधान यानि वेद् पुराण उपनिषद आदि सब की रक्षा वो स्वयं करते हैं । और अपने जन खुद पर भरोसा करने वाले , आस्था रखने वाले सज्जनों की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं । और जिस बसुंधरा पर अवतरित होते हैं उस भारत देश की रक्षा भी वही करते हैं तो चिंता कैसी ?
उन्होंने स्वयं कहें है :- 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ :- गीता ।

उनका उद्घोष है - वो सनातन धर्म , ( हिन्दु संस्कृति ) और इनमें और भगवान में दृढ़ आस्था रखने वाले साधु जन , सज्जन की रक्षा वो स्वयं करते हैं ।

 दुष्ट कुधर्मी , व्यभिचारी , राक्षसों , असुरों का उत्पात जब जब लिमिट से बढ़ जाता है तो वो खुद इन सबका एक साथ काम तमाम कर देतें हैं । 
और किए भी है । हम सभी जानते हैं । हिरण्यकशिपु का का और उसके साम्राज्य का , हिरण्याक्ष का और उसके साम्राज्य  से लेकर  त्रेता में रावण और उसके साम्राज्य लंका से लेकर द्वापर में कंश आदि सब का बजूद मिटा दिए ।
तो फिर हम सनातनी इतना भयभीत क्यों ?
भय का मतलब की हमें अपने भगवान पर , अपने इष्ट पर अपने सनातन हिन्दु धर्म पर भरोसा नहीं । 

सभी जानते हैं कि एक सनातन धर्म ही अजन्मा है और इसका अंत कभी नहीं हो सकता । 
और वांकी सभी बिचार धारा है जिसका जन्म हुआ है अलग अलग समय में  किसी के बिचार के कारण पीछले हजार दो हजार तो ढाई हजार साल में । और जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यू भी निश्चित है ।

और फिर सभी बिचार धारा उसी सनातन धर्म रूपी मूल( जड़ ) से जिसका मूल तना हिन्दु है और वांकी‌ सब  शाखा हीं तो  है ।
अब कोई बिचार धारा यह सोचे , कोई शाखा यह सोंचे की अपने हीं मूख्य तना और जड़ को समाप्त कर देंगे तो वो फुल मैड है । फुल मैड । वो खुद ही समाप्त हो जाएगा ।

और फिर भी नहीं माना तो भगवान तो कहें है की
 यदा यदा हीं धर्मस्य ..... 

तो होना ही है कल्कि अवतार और फिर एक बार असुर और उनका साम्राज्य समाप्त होगा । 
और वो भी नहीं बचेंगे जो हिन्दु में जन्म लेकर अपने ही जड़ में जहर घोलने का प्रयास कर रहें हैं , जैसे कौरव समाप्त हो गए जो सनातन धर्म के विधान के विरूद्ध काम किया । भगवान कृष्ण के विरूद्ध खड़ा हो गया था दुर्योधन , वो भी समाप्त हो गया । 

तो मेरी आप सभी हमारे सनातन धर्मावलंबी भाइयों से प्रार्थना है कि चिंता ना करें , विधर्मियों से उलझे नहीं । अपने भगवान की भक्ति करें , अपने महापुरुषों और संतों का , देश भक्तों का सम्मान करें । और दृढ़ आस्था रखें । दूसरे की बुराई ना करें । अपने सनातन का प्रचार करें , अपने असली संतों के बारे में और भगवान ईष्ट की चर्चा करें । सत्संग करें । 
और अपने शरीर के लिए जिविका के लिए सनातन धर्म के पथ पर चल कर कर्म करें । 
आपका भाई संजीव कुमार आज का तारिख 15 मई 2021 ( यह मेरे भगवद् चिंतन और गुरू देव से प्रदत्त तत्वज्ञान है श्री राधे )

Wednesday, 12 May 2021

जीव का कल्याण तभी संभव है जब संत महापुरुष के शरण में जाकर तत्वज्ञान प्राप्त करें ।

यह महत्वपूर्ण बात उनकी सहायता के लिए जो असली संतों के वारे में शंका करते हैं , उनको जानने से समझने से पहले अपनी क्षुद्र बुद्धि से बहुत तरह का सवाल खड़ा करते हैं :- 

सही संत और वास्तविक महापुरूषों के पास लौकिक परलौकिक दोनों प्रकार का ज्ञान होता है, वो ईश्वर के तरह अन्तर्यामी होते हैं। भगवान की योगमाया शक्ति उनके पास उतना ही है जितना सच्चिदानंद श्री कृष्ण के पास । 
संत व महापुरूष अपने इन शक्ति से कोई चमत्कार नहीं दिखाते कभी , वो तो भगवान से प्राप्त शक्ति का सदुपयोग जीव कल्याण के लिए करते हैं , जीव को तत्वज्ञान देकर जीव के अनंता अनंत जन्म के मैल से दूषित मन को निर्मल बनाते हैं । पर इसके लिए जीव के  मन में संत के प्रति श्रद्वा और विश्वास हो , और इस श्रद्धा और विश्वास की उत्पत्ति उनके संग से सत्संग से होता है । वास्तविक संतो के ह्रदय में पतितो के उद्धार की अधिक चिंता होती है । कारण दयालु स्वभाव के होने के कारण उनसे जीव का दुख नहीं देखा जाता है । 
संसार में भी एक सात्विक मां बाप अपने बिगरैल बच्चे के सुधरने की कामना करती रहती है ।  भगवान से प्रार्थना करती रहती है , ठीक उसी प्रकार हमारे गुरू को माता सम कहा गया है , वो पतितो के मल को धोकर भगवान के भक्ति के काबिल बनाते हैं ।
पर जो जीव संत के पास जाएं ही नहीं , उनका सत्संग करें ही नहीं । 
उनको और उनके सिद्धांत को ठीक से समझने के बदले अपने अनंत जन्म के दूषित ज्ञान से तरह तरह का सवाल करे पहले , अपनी दुषित बुद्धि से शक करें , अपनी बिगड़े दिमाग से किसी संसारी के लिखे किताब से प्राप्त ज्ञान से संत से बहस करें उनके अनुयायियों से बहस करें तो उसका भला कैसे हो ।
इसलिए नियम है कि संत के पास जाने से पहले अपनी खोपड़ी से पिछला सभी ज्ञान को शून्य मानना होगा । चाहे हम कितने बड़े संसारिक विद्वान हो , शास्त्रों को भले रट लिया है , गलत अर्थ खोपड़ी में डाल लिया है , अहंकार त्याग कर दीन बन कर , पिछला अर्जित सभी ज्ञान शून्य होकर किसी वास्तविक संत के शरण में जाकर पुरे ध्यान से उनको सुनना होगा । 
जब तक हम उनके मुख से उनकी बाणी सुनेंगे नही, उनके प्रवचन के संकलन रूपी पुस्तकों को पुर्ण ध्यान लगा कर , समाहित चित्त से पढ़ेंगे नहीं और जहां नहीं समझ में आए तो उनसे या वो उपलब्ध ना हो तो  उनके मूल प्रचारक से समझेंगे नहीं , परिप्रश्न नहीं करेंगें और अपनी खोपड़ियां लगाएंगे तो कल्याण कैसे होगा ? 

इसलिए प्रत्येक जीव जो अपना कल्याण चाहता है उनको पहले के सभी ज्ञान वान को , अहंकार को त्याग कर , अपने दिमाग को पिछला सभी ज्ञान से रिक्त करके उनके द्वारा दिया गया तत्वज्ञान सुनना और उनसे ही समझना होगा , तब श्रद्धा और विश्वास दृढ़ होगा उनपर और जब एक बार श्रद्धा और विश्वास ह्रदय में आ गया फिर क्ल्याण पथ पर जीव अग्रसर हो जाता है , फिर आगे का रास्ता स्पष्ट होने लगता है और असली तत्व ज्ञान बड़ी तेजी से संत के कृपा बल से जीव के निर्मल चित्त में ठीक ठीक उतरने लगता है वेतार की तरह , माध्यम की कोई आवश्यक्ता नहीं रहती , जीव का तार अदृश्य रूप से अपने गुरू से जुड़ जाता है सदा के लिए । 
यह तार ऐसा नहीं की आंधी में टूट जाए और फिर जोड़ने का उद्धम करना परे , न न ऐसा नहीं होता , यह तार दिव्य तार होता है, और हां हरिगुरू अपनी कृपा से जीव को तत्वज्ञान समझने कि शक्ति भी दे देते हैं , जीव को बिना संस्कृत पढ़ें संस्कृत के श्लोक समझ में आने लगता है , फिर भाषा का अवरोध नहीं होता है । 
वास्तविक गुरू अपना हाथ किसी के माथे पर नहीं रखते अन्य के जैसे । उनका आशिर्वाद उनके ह्रदय का दिव्य तरंग है जो अपने शिष्य को हमेशा आलोकित करता रहता है , उनके ह्रदय से निकले एक दिव्य उर्जा , एक दिव्य शक्ति हमेशा शिष्य को चारों तरफ से सुरक्षा प्रदान करती रहती है , फिर वो शिष्य कभी भटक नहीं सकता और उस पर कुसंग हावी नहीं हो सकता कभी । 
चाहे वो कितना भी गहरा कुसंग के वातावरण में पर जाएं । गुरू का सुरक्षा चक्र उसकी रक्षा करता रहता है ।
मेरा निज अनुभव है यह ।
मैं बहुत नहीं खोलुंगा । 
शिष्य को ह्रदय में गुरू के ह्रदय से प्राप्त हो रहे दिव्य तरंग अतुलित आनंद का एहसास कराना शुरू कर देता है । पर इसके लिए भीतर से गुरू के प्रति सच्चा अनुराग होना जरूरी है और इसके लिए शुरू शुरू में एकांत साधना की आवश्यकता है । फिर यह साधना हमेशा होती रहती है , चाहे अपना संसारिक कर्म करते रहिए या कहीं भी रहीए । गुरू सतत ह्रदय में विराजमान होतें हैं । यह है राज की बात , अनुभव की बात ।

 सुरदास , कबीर , मीरा , रै दास , तुलसी , रामकृष्णपरमहंस , रबीदास , तुकाराम ,  बिद्यापति आदी उदाहरण हैं , वास्तविक गुरू  के पैर परके , इनके चरण शरण से  ही तो अनेकों जीव तर गए , और हम  जैसे संसारी अधम पतित जीवों का कल्याण तो श्री कृपालु महाप्रभु द्वारा हीं सुनिश्चित हुआ जो स्वयं युगल सरकार है  यह कहने कि बात अब नहीं रही , यह अनुभव की बात अब हो गई है ।
. . मैकोले की शिक्षा में दम कहां जो एक मानव को मात्र इंसान बना दे | यह शिक्षा ही तो भारतियों के चरित्र के पतन का कारण है हम लोग तो सच्चे दरवार में जाने के काबिल भी थे ? चाहे वो आज का हाईयर क्वालिफाईड व्यक्ति हीं क्युं नही ! 
वो तो वास्तविक संत की कृपा है की वो हमलोगों के अनंत जन्मों के अनंत पाप को देखकर भी करुणावश सारे पापों को नज़र अंदाज करके अपनातें हैं भाई ।
उनके कौलेज में हाई मार्क्स की जरूरत नहीं ।
उनके कौलेज में युनिवर्सिटी में तो फेल का ,‌शून्य नंबर बाले अति विचित्र पतित का पहले एडमिशन हो जाता है ।
पर इसके लिए एक ही योग्यता है एडमिशन के लिए , सर्व अहंकार ज्ञान शून्य , तृण से बढ़ कर दीन और बृक्षों लताओं से बढ़ कर सहिष्णुता ।
फिर वो एडमिशन ले लेते हैं ।

 संसारिक बिषय भोगों के ज्ञान की जरुरत ढ़ोगी साधु संन्यासियों को परती है |
और इंसान अज्ञानताबश उसके द्वारा ठगे जाता है | जिस कारण सही संतों के पास भी जाने से हिचकते हैं ।
इसलिए हमें यह सब समझना होगा ।और वास्तविक संत को अपना गुरू स्वीकार करके उनका संग करना होगा । 

अब कोई चकाचौध से प्रभावित होकर किडनी निकाल कर बेचने वाले डाक्टर के अस्पताल में जाकर अपना सबकुछ गवां ले तो सारे सच्चे और चरित्रवान डौक्टर का क्या दोष , सब डौक्टर तो गलत नही है |
ठीक उसी प्रकार सारे संत तो गलत नही होते है न भाई | इसलिए आई क्यू का इस्तेमाल करके सारा पिछला कुड़ा कबाड़ा दूषित ज्ञान जो इधर से उधर से , पढ़ कर दिमाग में इक्ट्ठा किया है उसको त्याग कर असली संत के शरण में जाना होगा । अन्यथा अनंत काल तक दुख भोग ही मिलेगा । चाहे कितना पूजा पाठ , जप तप , हवन , कर्म कांड , तिरथ विरथ , मुख से बजारू भजन लेखक और  गायक के साथ किर्तन करते रहें हम । 
जय जय श्री राधे :- आपका  संजीव ।