Tuesday, 15 June 2021

पीपल का परिक्रमा करने और उसके नीचे दीपक जलाने व पीपल के पेड़ आदि की पुजा करने का आध्यात्मिक विज्ञान क्या है , और आज का वैज्ञानिक साक्ष्य क्या है समझिए ।

बहुत जरुरी बात , अंत तक पढ़े और खुद को बचावें :- 
सनातन वैदिक धर्म में ज्योतिषी शास्त्र में पीपल का परिक्रमा करने और उसके नीचे दीपक जलाने व पीपल के पेड़ आदि की पुजा करने का आध्यात्मिक विज्ञान क्या है , और आज का वैज्ञानिक साक्ष्य क्या है समझिए । 

आजकल  के समय में  पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना बड़ी संख्या में खतरनाक है क्यों ? अब दीपक जलाने से कोई लाभ नहीं ।
वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों पहलुओं से समझते है और अंध विश्वासों को दुर करते हैं ।

सबसे पहले वैज्ञानिक पहलुओं का चर्चा करते हैं :- 
पीपल का पेड़ , अर्जुन का पेड़ चौबिसों घंटे कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करती है और उसको आक्सीजन में तब्दील करके  बाहर छोड़ती है । यह वैज्ञानिक शोधौ द्वारा साबित है , सब जानते हैं इस जेनरल नौलेज को ।

तो पुराने जमाने में दो हजार से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक भारत का हीं नहीं विश्व का पौपुलेशन पचास लाख भी नहीं था वन्य प्राणी और मनुष्य से उतना कार्बन-डाई-ऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होता था , और इस कारण कार्बन उत्सर्जन हजारों गुणा कम था । कोई मोटर गाड़ी , कल कारखाना आज के जैसा नहीं था जो भयानक कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न करता हो ।

अब अधिक जंगलों के कारण और कम कार्बन उत्सर्जन के कारण पेड़ पौधों को जीवित रहने के लिए बहुत मात्रा में कार्बन-डाई-ऑक्साइड की आवश्यकता होती थी स्वाभाविक है ।

पीपल , बड़गद,  नीम , अर्जुन , तुलसी के पेड़ में अनेकों औषधिय गुण है सबकी चर्चा करना संभव नहीं इस पोस्ट में । आप में से बहुत लोग जानते हैं ।
जब वातावरण में कार्बन-डाई-ऑक्साइड की मात्रा कम थी पुराने जमाने में , या वैलेंस थी तो,  पीपल आदी को अधिक कार्बन-डाई-ऑक्साइड मिले जिससे उसमें वृद्धि हो, पौधा स्वस्थ रहें  तो हमारे वैज्ञानिक ऋषि मुनि किसानो को, गृहस्थों को  इन पेड़ों के नीचे कर्मकांड बना कर इसकी पुजा और दीपक जलाने का विधान बना दिया । जिससे वो पेड़ कार्बन-डाई-ऑक्साइड ले और औक्सिजन बना कर आस पास के वातावरण को शुद्ध करे ।
उन्होंने लोगों को उस पेड़ की परिक्रमा का विधान भी बना दिया , उस समय पीपल बरगद आदी के पेड़ के मोटाई की व्यास कईयक मीटर की होती थी तो जब लोग उसका सात परिक्रमा , एक सौ आठ परिक्रमा करता था तो पेड़ के नीचे शुद्ध औक्सिजन और वातावरण के कारण मानव के फेफड़ों व स्वास्थ पर उसका अच्छा प्रभाव पड़ता था । मन मस्तिष्क स्वस्थ होकर अच्छा विचार उत्पन्न करता था , जिससे आचरण और कर्म बढीया हो जाता था और अच्छे भाग्य का निर्माण होता था महिलाओं और पुरुषों दोनों को ।

आध्यात्मिक पहलुओं पर ध्यान देंगे तो जहां का वातावरण शुद्ध होता है वहां भगवान , देवता का निवास होता है ,  हमारे वेद के अनुसार महाचेतन भगवान जड़ यानि माया , अपरा में और चेतन यानि पराशक्ति दोनों में विद्यमान है तो जाहिर है कि औषधिय गुणों वाले पेड़ पौधो में ज्यादा अनूभुत हैं ।
इसलिए इन पेड़ों में भगवान का बास कहा गया है हमारे  सनातन धर्म में ।
आज से ढाई हजार  वर्ष  पहले भगवान बुद्ध को गया जी में पीपल ( जिसे बौधिक वृक्ष कहा जाता है ,) के पेड़ के नीचे के अति शुद्ध वातावरण में दैविक ज्ञान प्राप्त हुआ था । पीपल , बडगद आदि का पेड़ चुंकि बड़ा विशाल होता है इसलिए यह ध्वनी प्रदुषण को भी शोख कर शुन्य कर देता है , उस पर शुद्ध औक्सिजन के कारण बने शुद्ध बातवरण के कारण शरीर से उर्जा का क्षय बहुत कम होगा तो स्वाभाविक है बहुत दिनों तक अन्न की जरूरत भी नहीं पड़ेगी और ध्यान अच्छा लगेगा ।

पर आज उसी कर्मकांड के नाम पर ज्योतिष लोग पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाकर भाग्य बदलने का नाम देते हैं मुर्खतापूर्ण बुद्धि के कारण ।

अब आजकल के प्रदुषित काल में यह दीपक जलाने का कोई लाभ नहीं । कारण कि आज वातावरण में जरूरत से कहीं ज्यादा  कार्बन-डाई-ऑक्साइड पहले से मौजूद हैं उपर से हजारो की  संख्या में लोग एक हीं पेड़ के नीचे हजारों की संख्या में दीपक जलाकर परिक्रमा करते पाए जाते हैं । जिससे उसी दीपक के गैस को और ईन्हेल खुद कर लेतें हैं जिससे भाग्य बदलना तो दुर ओक्सीजन के कमी से डिप्रेशन , एंजाइटी बढ़ जाता हो और फिर किस्मत और खड़ाब हो जाता है । 
तो हम लोग पढ़ें लिखे हैं समझना चाहिए और बचना चाहिए इससे ।

और हद तो तब है हंसी लगता है मुझे अब शहरीकरण के कारण सोसाइटी में गमले में लगे पीपल बरगद  आदि के छोटे से पेड़ के नीचे अनेकों लोग अनेको दीपक जलाकर दो कदम भर में सट कर परिक्रमा करके सोचते हैं कि धार्मिक कर्मकांड के फर्ज को पुरा करके देवता को खुश करके अपना भाग्य बना लेंगे ।
अरे और ज्यादा कार्बन-डाई-ऑक्साइड पी कर अपना फेफड़ा भी खड़ाब कर लोगे । और एंजाइटी आदी का शिकार होकर किस्मत और खड़ाब कर लोगे । :- 
यह मेरा अपना लेख है ‌वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रमाण पर आधारित है । और यथार्थ है आपके लाभ के लिए डाला है आज , किसी का , कहीं का कौपी पेस्ट नहीं है । :- संजीव कुमार ।
आगे तील के तेल और अंगुठी में पत्थर के मिथक पर बात करूंगा फिर कभी ।

शनी देव के ग्रेनाईट के काले पत्थर के प्रतीक के ऊपर तील के तेल चढ़ाने का चलन के पीछे इतिहास :-

शनी देव के ग्रेनाईट के काले पत्थर के प्रतीक के ऊपर तील के तेल चढ़ाने का चलन के पीछे इतिहास :- 

सबसे पहले यह जानना जरूरी है तब समझ पाएंगे तिल के तेल का चढाने के पीछे का कहानी‌:- 
राजा भोज स्वयं बहुत बड़े विद्वान थे और कहा जाता है कि उन्होंने धर्म, खगोल विद्या, कला, कोशरचना, भवननिर्माण, काव्य, औषधशास्त्र आदि विभिन्न विषयों पर पुस्तकें लिखी हैं जो अब भी विद्यमान हैं। इनके समय में कवियों को राज्य से आश्रय मिला था। उन्होने सन् 1000 ई. से 1055 ई. तक राज्य किया। इनकी विद्वता के कारण जनमानस में एक कहावत प्रचलित हुई- कहाँ राजा भोज, कहाँ गांगेय, तैलंग। धार में भोज शोध संस्थान में भोज के ग्रन्थों का संकलन है। भोज रचित 84 ग्रन्थों में दुनिया में केवल 21 ग्रन्थ ही शेष है। भोज बहुत बड़े वीर, प्रतापी, और गुणग्राही थे। इन्होंने अनेक देशों पर विजय प्राप्त की थी और कई विषयों के अनेक ग्रन्थों का निर्माण किया था। ये बहुत अच्छे कवि, दार्शनिक और ज्योतिषी थे।
भारत में अकाल का बहुत पुराना इतिहास रहा है। 1022-1033 के बीच कई बार अकाल पड़ा। सम्पूर्ण भारत में बड़ी संख्या में लोग मरे थे।

हमारे उपनिषदों से पता चलता है कि शनी‌ देव और हनुमान जी‌ में युद्ध हुआ । इस पर टीवी धारावाहिक भी‌ बना है ,‌जो देखेंगे होंगे वो जानते होंगे । इसलिए अति संक्षेप कर रहा हुं । 
अब इस युद्ध में शनी देव को चोट लगा । हनुमान जी ने उनको बंदी बना लिया । भगवान राम के निकट ले गए 
‌शनी देव को जीवन दान मिला भगवान से और वो भगवान के दया और करुणा को देख भाव भक्ति में खो गय । उनको भगवद् प्रेम मिल गया । इसका आभार उन्होंने हनुमान जी को‌ व्यक्त किया और बोला जो भी आपको भजेगा । उसको मैं कष्ट से मुक्ति दे दुंगा खराब प्रारब्ध को मिटा दूंगा । और जो प्रभु श्री राम को अपने ह्रदय में धारण करेगा उसका तो अनंत जन्म ठीक हो जाएगा हीं । 
हनुमान जी ने भी उनके चोट पर तील के तेल का लेप किया और कहा जो आपको यह तील के तेल का लेप भाव भक्ति से चढ़ाएगा उसको मैं उसका सब कष्ट हर लुंगा ।
अब यह बात शुरू हुआ । श्रद्धालु उनको थोड़ा सा , बस थोड़ा सा तील का लेप चढ़ाने लगे और यह ज्योतिष शास्त्र के उपाय के नाम पर एक विकराल रूप ले लिया ।

अब राजा भोज के समय आकाल परा । उनके राज्य में तेलहन मुख्य लाभकारी नगदी फसल था । जिससे राज्य को बहुत सा टैक्स मिलता था । तेलहन की काफी कमी हो गई । पर जब अकाल मिटा तो फिर इतना तेलहन हुआ की उसके उत्पाद को कोई खरिदने वाला नहीं था । मुफ्त में देने पर भी कोई लेवाल नहीं था ।

उनके राज्य के किसान अपने मुख्य फसल का लागत तक नहीं वसूल पा रहे थे , भूखे मरने लगे अकाल समाप्त होने के बाद भी । राजा भोज विद्वान तो थे ही । अर्थशास्त्री भी थे । 
उन्होंने पंडितों , ज्ञानियों , ज्योतिषों के रूप में अपने नवरत्नों के साथ फैसला लिया और ज्योतिषों के और पंडितों के द्वारा पुरे भारत में शनी‌ देव को भर भर क्विंटल तेल चढाने का ज्ञान बांट दिया । फिर क्या था अचानक तील के तेल का डिमांड पुरे भारत के अनेक राज्यों से आने लगी और किसानो को और राज्य को बहुत सा धन मिला ।
तो उस समय फिसकल डेफिसिट को पुरा करने का यही तरिका था । जो उन्होंने सही किया । 
वही प्रथा शास्त्रो में जगह लेकर आज तक कायम है । पर आज बिना भक्ति भाव के नकली तेल हजारों टन चढ़ रहा है । उपाय के नाम पर अधर्म व्याप्त है । 
तेल के छोटा सा लेप के जगह पर टनों नकली तेल !
 
आपके घाव पर आपके सगे आकर सब मिलकर आपको नकली तील के तेल में डुबा दे कैसा लगेगा आपको ?
माना की तील के तेल में फंगस रोधी गुण है इसका मतलव यह थोड़े है कि आपको नकली तेल में डूबा दिया जाए ‌। 

देखिय मैने हकीकत लिखा है । जिसको पसंद है माने जिनको गलत तरिका रूपी अंधविश्वास पसंद है वो उसी को माने । वर्णा हमारे लिए हमारा सनातन धर्म बहुत वैज्ञानिक हैं कोई अंध विश्वास नहीं । हमारे सनातन में पाखंडियो द्वारा जबरदस्ती घुसरे गए इन्हीं तरह के गलत ज्ञान रूपी अंधविश्वासों के कुछ कारणों से विरोधियों को मौका मिल जाता है सवाल खड़ा करने का ।
जबकि उनके वहां भी अंधविश्वासों का कमी नहीं ।
पर हमें तो खुद को खुद के धर्म के अंधविश्वासों को समाप्त करने का प्रयास करना है, गलत तरिका रूपी व्याप्त कर्मकांड के बारे में लोगों को जागरूक करना है । दूसरे को तो हम कभी बदल नहीं सकते । 🙏❤️🙏

Monday, 14 June 2021

प्रश्न था : -महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने अपने हाथ‌ में एक भी अस्त्र , शस्त्र न उठाने का प्रण लिया । युद्ध में खुद सारथी बने, धर्म युद्ध करने के लिए जीवों को ही प्रेरित किए । यहां तक की शिखंडी को भी युद्ध में शामिल करवाया आदि । भगवान श्री कृष्ण अगर चाहते तो एक मिनट में खुद अपने हाथों से तमाम कोरवो का विनाश कर देते । पर उन्होंने ऐसा नहीं किया । क्यों ? इसका उत्तर के सार को आपको गीता के कुछ श्लोक के द्वारा सिद्ध करना होगा । यहां तक की अपनी सोलह अक्छ्वनी सेना भी कौरवों को दे दी , खुद अस्त्र शस्त्र नहीं उठा कर क्या संदेश दे रहें हैं हम लोगों को ?

प्रश्न था :  -महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने अपने हाथ‌ में एक भी अस्त्र , शस्त्र न  उठाने का प्रण लिया । युद्ध में खुद सारथी बने, धर्म युद्ध करने के लिए जीवों को ही प्रेरित किए । यहां तक की शिखंडी को भी युद्ध में शामिल करवाया आदि । भगवान श्री कृष्ण अगर चाहते तो एक मिनट में खुद अपने हाथों से तमाम कोरवो का विनाश कर देते । पर उन्होंने ऐसा नहीं किया । क्यों ? इसका उत्तर के सार को आपको गीता के कुछ श्लोक के द्वारा सिद्ध करना होगा ।  यहां तक की अपनी सोलह अक्छ्वनी सेना भी कौरवों को दे दी , खुद अस्त्र शस्त्र नहीं उठा कर क्या संदेश दे रहें हैं हम लोगों को  ? 

मेरा उत्तर -   तत्वज्ञान और व्यवहारिक सिख के आधार पर मेरा उत्तर यह है :- 
तत्वज्ञान के आधार पर :- आप सभी जानते हैं कि भगवान केवल अपने से राग (प्रेम के कारण ह्रदय मे़ रखना ) या द्वेष ( अति दुश्मनी के कारण हर क्षण स्मरण ) वाले जीव को अपना लोक देते हैं स्वयं मार कर । भक्त के पराधिन होते हैं । और अपने अवतरण काल में अपने खिलाफ निगेटीभ ( विलेन का रोल )  भुमिका वाले को स्वयं  मार कर अपना लोक दे देते हैं । उन्होंने पुतना , अघासुर वकासुर कंस , शिशुपाल आदि को स्वयं मृत्यु देकर अपना लोक दे दिए । पर कौरवों में और उसको साथ देने वाले सगे संबंधियों में एक भीष्म पितामह को छोड़ कर कोई उनका प्रेमी , भक्त नहीं था । 
कौरवो में धृतराष्ट्र , गंधारी , द्रोणाचार्य का अटैचमेंट मोह अपने पुत्रों में था तो 99 भाइयों का मोह दुर्योधन में था । दुर्योधन की कामना  राज्य पाने का था । और पांडवों से नफ़रत था उसे , नहीं तो पांच गांव देकर राज्य पा लेता ।
इसलिए भगवान इन किसी को भी अपने विधान के अनुसार अपना लोक नहीं देना था स्वयं के हाथो मार कर । 

दुसरा यह ज्ञान देना था तमाम आगे विश्व के हम तमाम जीवों को की अपना कर्म खुद करो बिना फल की कामना किए  , भगवान के भरोसे मत बैठे रहो की तुम्हारा काम भगवान कर देंगे आकर । 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन........ गीता ।

भगवान को अपने ह्रदय में रखो , धारण करो , उनपर पुर्ण विस्वास करो , और कर्मयोग की शिक्षा दी । नहीं तो हम लोग अकर्मण्य हो जाते । इसलिए प्रण किया उन्होंने अपने व्यवहारिक युद्ध लीला में की वो शस्त्र नहीं उठाएंगे । 

अब व्यवहारिक युद्ध  लीला में भुल जाईए थोड़ी देर के लिए की वो भगवान थे । तब समझेंगे । 
तो उन्होंने हमें यह शिक्षा दी की गुरू हमारा मार्गदर्शन करेगा केवल , साधना खुद करनी होगी और कर्मयोग के द्वारा गलत का विरोध एवं अपने संसार का काम स्वयं करना होगा , । संसार में भी आज अनुभवी लीडर स्वयं काम नहीं करते, वो तो थ्योरिटिकल और प्रैक्टिकल सब करके लीडर बना है । गाईड बना है। वो तो काम,  कर्म करना सिखाता है अपने अनुगत शिष्यों को ।
 श्रीकृष्ण भी युद्ध में भी इसी गाईड , लीडर , गुरू की भुमिका में है । अगर लीडर स्वयं काम करने लग जाए तो फिर सब निकम्मा होकर , अकर्मण्य होकर बर्बाद हो जाएगा । और डिपेंडेंट हो जाएगा लीडर पर हीं । इसलिए खुद हथियार नहीं उठाए ।
दुसरा :- उन्होंने अपनी सोलह अक्छ्वनी सेना दूर्योधन को दे दी । मतलव सही मार्ग, धर्म मार्ग , न्याय मार्ग , भक्ति मार्ग  पर चलने के लिए अधिक साधन की आवश्यकता नहीं । 
 दुश्मन से नफ़रत भी नहीं करना चाहिए , पुरी शक्ति से उसका विरोध करना है दुष्टो के कुकर्म का बिना उससे राग या द्वेष किए , नहीं तो स्वयं का नुकसान होगा , वो ह्रदय में आ जाएगा  और विधान के अनुसार अगले जन्म में हम उसी दुष्ट के यहां जन्म लेने को बाध्य होंगे , इसलिए दुष्ट से नफ़रत नहीं वल्कि उसके दुष्कर्मो का विरोध करना चाहिए  ।

 वो दुष्ट  तो ऐसे हीं मर चुका  है अधर्म पथ  पर पैर देने के कारण ,जमीर मर चुका है केवल शरीर चल रहा है उसका , सब उसी समय मर गया जब पाप अधर्म के कारण आत्म शक्ति चली गई उन सबकी  । जो झूठ बोलता है , दुष्कर्म करता है, क्रिमिनल है । दुसरे का हक मारता है । अन्याय करता है समाज में । वो केवल हथियार और बौडी गार्ड के बल पर शेर बनता फिरता है,  जबकी इन गलत कर्मो के करण उसका साथ भगवान छोड़ देते हैं स्वयं कब का  । उनका साथ छोड़ते ही उसकी आत्म शक्ति समाप्त हो जाती है । वो जिंदा लाश बन जाता है और अपने सैनिक , बौडी गार्ड और हथियार के बल पर रोव झाड़ता है रहता है समाज में । और एक दिन टें बोल जाता है किसी के द्वारा । मौत बड़ा दुर्दाई होता है उसका , उसका साथ देने बाले उसके संबंधी और साथी भी दर्दनाक विनाश का भागी बनता है समय आने पर । उसका वंश समाप्त हो जाता है एक दिन , कोई नहीं बचता उसके वंश में उसके अन्याय से अर्जित धन और राज्य को भोगने वाला ।

रहा न कुल कोई रोवन हारा ..... 
आंसु बहाने वाला भी नहीं बचता उसके मौत पर , अग्नी देने वाला तो बहुत दुर की बात है ।

और भगवान ने यह भी अनुभव कराए कि समाज में 99%  लोग अधर्मी का ही साथ देते हैं । महाभारत में यही हुआ पांडव के पक्ष में भगवान थे और एक दो राजा थे , बस । पर इस विश्वयुद्ध में पांडवो का अपना संबंधी भी उसी अधर्मी दुर्योधन के पक्ष में लड़े और मारे गए।

इसलिए याद रखिय धर्मयुद्ध में आपका साथ कोई नहीं देगा आपका साथ भगवान देंगे केवल और आपका गुरू देगें , एक उनका साथ हीं सब पर भारी पड़ेगा , चिंता नहीं करना है । आपकी जीत होगी एक दिन ।

तीसरा :- लिमिटेड रिसोर्सेज ( साधन )ही होगा आपके पास कर्मयोग के लिए ,  उसी लिमिटेड रिसोर्सेज से लक्ष्य हासिल करना होगा ।‌

चौथा :- धर्म युद्ध में धर्म में साथ चाहे वो शिखंडी ही क्यूं ना हो आपका साथ दे रहा है तो उसका सम्मान करना चाहिए । एक कमजोर गलिहरी भी आपका साथ दे रहा है तो उसका भी सम्मान करना चाहिए ।  कोरोना से युद्ध के समय केन्या जैसा देश भी आपका साथ दे तो उसको ठुकराना नहीं चाहिए वल्कि उसके उपहार को सम्मान के साथ स्वीकार्य करना चाहिए । नहीं तो अधर्म होगा । और आपका साथ भगवान वहीं छोड़ देंगे ।

पांचवां :- अधर्म का साथी अगर आपका सबसे प्यारा भीष्म जैसा ताऊ भी दुर्योधन जैसा जीव के पक्ष में खड़ा हो जाए तो उनसे मोह ममता त्याग देना चाहिए और पीछे नहीं हटना चाहिए । वल्कि अधर्म को साथ देने वाला , समाज में चीर हरण के समय खामोश होकर देखने वाला भीष्म , द्रोण जैसा शिक्षक , अधर्म के साथ देने वाले का बद्ध सबसे पहले करना चाहिए उसके बाद अंत में मुख्य दुराचारी को । कि देख तुम्हार साथ देने वाला कोई नहीं बचा । तुम्हारा सब समाप्त हो गया तुमसे पहले।अब भी शरेंडर कर दो। पर दुराचारी शरेंडर भी नहीं करता अंत में चुल्लू भर पानी में मुंह छूपाना परता है उसको ।
दुर्योधन भी यही किया । एक छोटा तालाब में जाकर छिप गया । उसके नफ़रत का आग उसी को जलाने लगा था । 

इसलिए भगवान ने स्वयं हथियार नहीं उठाकर पांडवों को ज्ञान देकर उसके मोह ममत्व को समाप्त कर यह कहा अंत में कि
सर्वधर्मान्परित्यज्य माम् एकं शरणं ...... 
सर्वेषु कालेषु माम् मनुष्मर युद्ध च ......
कर्मयोग की शिक्षा देते हुए अंत में भक्त बर्बरीक के द्वारा यह भी सिखा दिया कि अपने कर्मयोग का भी श्रेय अपने गुरू को दो,  खुद को नही। गलत फहमी में मत रहो , अहंकार मत करो की यह शुभ काम तुमने अपने स्वयं के बाहुबल से किया है । हर अच्छे काम का श्रेय भगवान और गुरू को दो ‌। नहीं तो अहंकार ह्रदय में आकर बैठ जाएगा और तुम भी दुर्योधन की तरह हो जाओगे एक दिन । 
मैं तो अपने श्री गुरूदेव श्री कृपालु महाप्रभु जी के कृपा से जो तत्वज्ञान और व्यवहारिक शिक्षा पाई है साधना से उनके बल से वही लिखा है । कोई त्रुटी हो तो क्षमा करेंगें ।:- संजीव कुमार , रांची । 🙏❤️🙏

Saturday, 5 June 2021

माया के तीन गुणों के अधीन जीव, चाहे वो संसार में आज बड़ा नाम बाला क्यूं ना हो , वो क्या भगवान का वास्तविक संत का महापुरुषों का गुण गान करेगा भला !

माया के तीन गुणों के अधीन जीव, चाहे वो संसार में आज बड़ा नाम बाला क्यूं ना हो , वो क्या भगवान का वास्तविक संत का महापुरुषों का गुण गान करेगा भला ! अरे लोक व्यवहार के नाते दो सुंदर संसारिक शब्द बोल देगा वो भी बिना भाव के , और उसके ह्रदय में क्या है आप हम कैसे जानेगे ? अंतर्यामी तो है नहीं हम आप ?? वो बोलने बाला अभी मायाधिन है हमारे आपके तरह, न उसका पंचकोस भष्म हुआ ना त्रिगुण से मुक्त हुआ , ना उसका पंचक्लेश गया और ना उसको भगवान मिले । 

त्रिताप में जलता हुआ उस आदमी पर सतोगुण हावी है तो भगवान के बारे में हमारे व आपके गुरू के बारे में अच्छा बोल देगा , वो भी लोकव्यवहार , लोकलाज और अपने न्यस्त स्वार्थ के लिए , स्वलाभ हेतु कि लोग मुझे भी अच्छा समझे ।

 वही जीव जब रजोगुण से युक्त होगा जिस समय तो वो राजा का बड़ाई करेगा , प्रधानमंत्री , संतरी का गुण गाएगा । समाज में उसको रहना है , सत्ता से हित साधना है । दुनिया दारी है बुद्धिमानी है , उसके हित में हैं ।

और जब वही तमोगुण के प्रभाव में आया तो भगवान को असली संतों को भी नहीं छोड़ेगा , उल्टा पुल्टा उसी अपने स्टेज से बोलने लगेगा । कल हमारे आपके गुरू को अच्छा बोला , उसका दो चार हजार फोलोवर जैसे हीं वहां से खिसका , ऐसा लगा उसको , वो वास्तविक संतों के खिलाफ , भगवान के खिलाप बोलने लगेगा।
खुब होता है दुनियां में आजकल ।
और बहुत से बहुत अनुकूल भी बोलेगा तो क्या बोलेगा । हां हां वो बड़े ज्ञानि है , बड़े बुद्धिमान हैं बड़ा भक्त हैं रसिक सिरोमणी हैं , उनके जैसा मेमोरी किसी का नहीं आदि आदि । यही दो चार गढ़ा हुआ शब्द बोल देगा और क्या बोल सकता है वो ।

भगवान का उनके जन का कोई संसारी जीव भला संसारिक शब्दो में हीं तो गुणगान करेगा । वो भी अंदर क्या है उसके यह तो भगवान और असली संत हीं जान सकता है । हम आप भोले लोग तो नहीं जान सकते ।
अब जो असली शिष्य है उसकी श्रद्धा , विश्वास किसी के कहने और सुनने के आधार पर नहीं है अपने गुरू के प्रति । असली शिष्यों को इन सब बातों से कोई मतलव नहीं कि कौन क्या कहता है उसके गुरू के बारे मे ।
उसकी अपनी निष्ठा , श्रद्धा ,विश्वास इतना प्रबल होता है कि कोई कुछ भी बोले (अच्छा बोले या बुरा बोले ) कोई फर्क नहीं पड़ता है ।
वो संसार बालों के लिए है , कमजोर शिष्य के लिए है कि वो फलाना बाबा हमारे गुरू के लिए ऐसा इतना बढ़िया बातें की अब वो उसके इस बात को सबसे कहता फिरता है कि फलाना बाबा बड़ा अच्छा है वो मेरे गुरूदेव के लिए बहुत अच्छा बोला है अच्छा कहा है , वो बाबा बड़ा अच्छा बाबा है ।

ये ल् लो । हम आप उस बाबा का गुण गाने लगे , उस बाबा का स्टेटमेंट घुमाने लगे चारों तरफ सब शरणागति , छोड़ वोड़ कर , कई दिन तक वो हमारे आपके ह्रदय में आ गया । उसका भी चिंतन होने लगा । उसके लिए हमारे आपके दिल में सम्मान‌ चुपचाप पैदा हो गया । 
हमारी आपकी सहानुभूति उसके साथ भी हो गई । 
तो यह सब कमजोर शिष्य का निशानी है । वो शिष्य है भी नहीं दरअसल जिसका विश्वास अपने गुरू के प्रति दूसरे के कहने के आधार पर टिका है । 
वो आज अनुकूल बोल दिया तो हमने, आपने मन हीं मन में वास्तविक संत के साथ साथ उसको भी अच्छा मान लिए । 

और कल वो दो विरोधी बातें बोल देगा तो हमारा आपका विश्वास धड़ाम । अरे आजकल बड़े लोगों को छोड़ दो वो तो कोई साधारण संसारी जीव भी आपके गुरू के खिलाफ हो जाए , खिलाफ बातें कर दे , लिख दे , विडियो बना कर डाल दें तो बहुतों का विश्वास क्षण भर में डबांडोल हो जाता है । 
ऐसा है हमारा आपका विश्वास । इतना कमजोर हैं आपका विश्वास और श्रद्धा आदि ।

लेकिन जो सही शिष्य है वो हर हाल में दृढ़ है , उसका विश्वास दृढ़ है । वो कभी किसी भी हाल में नहीं टुटता और ना उसका विश्वास कम होता वल्कि उसका विश्वास और मजबूत होता है कारण कि भगवान और गुरू आपकी परीक्षा के लिए ऐसा विपरित और अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण खुद करतें हैं । 
यह आपको जनाने के लिए कि आप कहां खड़े हैं आपको ज्ञान हो जाए ।
नहीं तो हम आप कहां खड़े हैं? अपना गुरू अच्छी तरह जानतें है । लेकिन हमारे आपके आंतरिक भाव गुरू के द्वारा जानने से हमारा आपका काम नहीं बनेगा । इसलिए दुसरों को माध्यम बना कर हमारी आपकी परीक्षा ली जाती है जिससे हम आप अपनी कमी जानकर खुद को ठीक करें ।

हम आप असली शिष्य हैं तो आप किसी के कहने में नहीं जाएगें । ना अच्छा कहा उससे मतलव और ना बुरा से मतलव है । 
अब वो संसारी बड़ा आदमी , बाबा आ गया आपके आश्रम में , आपके गुरू के सामने हांथ जोड़ा , आपका गुरू भी लोक व्यवहार के नाते हाथ जोड़कर उसका अभिवादन स्वीकार किया । वो एक्टिंग कर लिया , गुरू भी एक्टिंग कर दिया । वो जाने लगा तो आपका गुरू आपके चार पांच साधक भाई बहनों को इशारा किया उनको दरबाजे तक छोड़ आओ , लोक व्यवहार है , कटसी है । लेकिन आप में से बहुत लोग उठ कर उसके साथ साथ उसको छोड़ने चल दिए अापका गुरू प्रवचन दे रहा है किर्तन करा रहा है आप चल दिए उसके साथ । यह करते हैं आप सब । 
श्री राधे ।

Friday, 4 June 2021

जब रजनिश उर्फ ओशो ने भी उसी रसो वै स: ब्रह्म श्री कृष्ण के शरणागत हुए अपने उतर्रार्ध समय में सब कुछ छोर कर ।

बहुत बढ़िया बात, एक ज्ञान मार्गी कैसे भक्ति मार्गी हो कर अपना कल्याण कर लिया जीवन के उतर्रार्ध में , अंत तक एक बार पढ़ना ही होगा :- 
जब रजनिश उर्फ ओशो ने भी उसी  रसो वै स: ब्रह्म श्री कृष्ण के शरणागत हुए अपने उतर्रार्ध समय में  सब कुछ छोर कर । 
ओशो भी अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में यह दृष्टि पाया तो एहसास किया और सत्य को स्वीकारा की वहीं निराकार ब्रह्म अपने पुर्णता में श्री कृष्ण हीं है ।

 ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते, 
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते। 

ओशो को भी यह वेद मंत्र स्वीकार्य हो गया तब  :- 

"रसों वै सः।
रसं ह्येवायं लव्दानन्दी भवति। को ह्येवान्यात् व्य प्राण्यात्।
यदव आकाश आनन्दो न स्यात्। एव ह्येवानन्दयाति।" 

और यह वेद मंत्र भी :- 

"आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।। आनन्देन जातानि जीवन्ति।। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति" 

और जब उनको यह आत्म दर्शन हुआ की जब एक हमारी आत्मा भी जब हमारे शरीर में प्रवेश करके सगुण साकार हो सकता है । 
तो फिर वो निर्गुण निराकार भगवान श्री कृष्ण रूप में , राम रूप में , विष्णु रूप में , बुद्ध रूप में क्यों नहीं रूप धारण कर सकता है ।
अपने इस भुल को सुधारने के  बाद रजनीश जी  रो रो कर भगवान श्री कृष्ण से प्रेम की भिक्षा मांगा । 
और अंत में  जब अमेरिका में उनको जहर दिया गया किसी दुष्ट द्वारा  तो उन्हीं भगवान श्री कृष्ण को याद करते करते देह त्याग किया , कहते हैं कि  भगवान श्री कृष्ण उनको दर्शन भी दिए मृत्यू के ठीक पहले  और उनसे  पुछा की अभी तुम रहना चाहते हो  इस मृत्यू लोक में तो मांगों । मैं तुम को बिष के प्रभाव से मुक्त कर दुंगा ।
पर रजनीश जी ने मौक्ष मांग लिया । 
ओशो जी ने कहा है " सबसे पहले अपने अंत:करण को शुद्ध करो । खुद को ठीक करो , दुसरो में दोष ढुढ़ने में जीवन बीत जाएगा । 
अपना दृष्टिकोण को ठीक करो , वो कहते हैं जब तक अपने दोष को मिटाने में सफल नहीं हो जाते तबतक दृष्टि अशुद्ध रहेगी , और तुम्हारा खुद का दोष ही दुसरे में दृष्टिपात होती रहेगी ।
वो आगे कहते हैं कि जैसा पिलिया ( जौंडिस के रोगी ) के रोगी को हर वस्तु पीला नजर आता है ठीक उसी प्रकार तुम्हारा खुद के दोष के कारण संसार में हर बिषय वस्तु दोषपूर्ण नजर आएगा ।
वो कहते हैं अपने दृष्टिकोण को शुद्ध करने के लिए साधना करो । तब हर तरफ दोष नहीं , प्रेम हीं प्रेम नजर आएगा ।
प्रेम स्वयं तुममें उतरने लगेगा , पहले खुद पर फोकस करो  , खुद के चेतना को शुद्ध करो , नहीं तो तमाम जीवन भटकते रहोगे , थक जाओगे, निराशा आयगी , जीवन बोझ बन जाएगा । दुसरे में दोष देखना सबसे बड़ा दुख का कारण है,अशांति का मुख्य कारण है । 
याद रखना प्रेम कांटों के बाड़े से घीरे ह्रदय में कभी नहीं
उतरता , 
ईर्ष्या द्वेश , नफ़रत से भरे ह्रदय में परमात्मा का प्रेम नहीं ठहरता कभी , प्रेम दिव्य है , नफ़रत ईर्ष्या द्वेष , घृणा जहां होगी वहां प्रेम कभी नहीं उतरेगा , दोनों विरोधी‌ स्वभाव के हैं , विजातिय है  । 
जहां त्याग , दया , करूणा ,  निष्काम सेवा का भाव होता है प्रेम वहीं उतरता है क्योंकि ये सभी  सजातिय है । 
परमात्मा का दिव्य प्रेम फुलों से भरे  बगीचे में ही उतरती है । इसलिए अपने ह्रदय को फुल का बगीचा बनाओ ।

तुमको भी तो फुलों का बगीचा हीं पसंद है । कांटों का बाड़ा नहीं । क्योंकि तुम भी उसी का अंश हो । स्वाभाविक गुण में स्थिर हो जाओ, प्रेम उतरने लगेगा  । 
इसलिए किसी दुसरे में दोष मत देखो । 
 :- ओशो वाणी । 🙏🙏

Thursday, 3 June 2021

इन्हीं संतों के कृपा से हमारा देश और हमारा संस्कार‌ और संस्कृति जीवित है अमीट है ।

( मेरे अपने पोस्ट से- 28जनवरी 2019)
इन्हीं संतों के कृपा से हमारा देश और हमारा संस्कार‌ और  संस्कृति जीवित है अमीट है  । 
और ऐसें हीं संतों के कृपावल से ,  हमारे देश का अस्तित्व अमीट है । हम इन सबका ह्रदय से सम्मान करतें हैं । और अपने भावी पीढ़ी को शिक्षा देतें हैं कि हमेशा संतों का सम्मान करना , चाहे दुनिया कुछ भी कहे । किसी में दुर्भावना मत करना । 
इनके चरण रज को अपने मस्तक पर लगाना । 
जो एक वार भी ह्रदय से राधा नाम लेता है । हम उनके सेवक हैं । हमें अपने संतों पर नाज हैं । हम अपने सदगुरू देव कृपालु महाप्रभु का भक्त हैं‌। और उनकी हर आज्ञा हमारे लिए सिरोधार्य है । हम  संतों का अति सम्मान करतें हैं , उनके भक्तो का सेबक हैं । उनके जनों का दास हैं । यह हमारी भारतीए संस्कृति हैं । वैदिक संस्कृति और वैदिक आज्ञा का पालन करना हमारा आत्मीक कर्तव्य है । 
सियाराम मय सब जग जानी 
करहु़ं प्रणाम जोरी जुग पाणी ।।

अगर हम किसी संसारी के अपने प्रति या किसी भी दुसरे जीव के प्रति रूखे व्यवहार का विरोध करें , तो वो भी शालीनता से , संयमित और मर्यादित भाषा का प्रयोग से , सहजता , दीनता , सहिष्णुता पहले हमें खुद अपनाने के लिए हमारे गुरूदेव ने कहा हैं । लेकिन कोई अगर गलत भाषा का, आपत्तिजनक वाक्य का इस्तेमाल किया है तो उसके साथ कठोर वाक्य का इस्तेमाल से भी नहीं हिचकना चाहिए एक बात के ध्यान के साथ कि अंदर दुर्भावना ना हो । 

राष्ट्र के नागरिक होने का फर्ज कैसे पुरा किया जाता है । यह भी हमारे गुरू देव ने मिशाल पेश किए हैं और अब दीदी लोग और मां कर रहीं हैं तिरंगा लहराकर और उसी सेवा को और आगे बढ़ा कर । केदार नाथ , कोशी बाढ़ पीड़ितों कि सहायता करना , तीन तीन होस्पिटल गरीबों के लिए, नी:शूल्क स्कूल , कौलेज आदि का निर्माण और संचालन उनके जन सेवा का परिचायक है , गौशाला आदि  मिशाल तो  है हिं परन्तु सबसे बड़ी सेवा है उनकी हम सभी को भगवद् संबंधी ज्ञान का दान करके हमारा परम कल्याण करना । 

देश का सम्मान , देश के शहिदों का सम्मान , और देश के प्रति हमारे  फर्ज निर्वहन , निरीह जीवों के लिए , साधु संतों के लिए , गरीवों की सेवा के लिए हमारे कृपालु महाप्रभु का योगदान समुचे भारत के बुद्धिजीवियों के लिए मिशाल हैं ।
प्रेम मंदीर ,  प्रेम भवन , कीर्ति मंदीर , भक्ति मंदीर , भक्ति भवन आदि उनका देन है हमें प्रेरणा देने के लिए कि हरि गुरू की सेवा और उन्हीं से प्रेम करना हमारा अंतिम और सर्वोपरि लक्ष्य है।

श्री महाराज जी ने यह सब करके विश्व सेवक होने का एहसास हमें कराया है ठीक श्री कृष्ण की तरह । 
यह श्री कृष्ण के सीवा और कोई नहीं कर सकता , ममता की अपार समुद्र श्री महाराज जी में ऐसे हैं जैसे साक्षात राधारानी की करूणा बरसती है । वहीं गुण उन्होंने तीनों दिदियों और पुज्यनियां हमारी मां रासेस्वरी देवी जी को दिए हैं ।
हमने ऐसा गुरू पाया है । कि जो जीव उनको अपने ह्रदय में सच्ची निष्ठा से जैसे हीं धारण करना शुरू करता हैं , ह्रदय भगवद् प्रेम से भर कर अंखियां हरि दर्शन के लिए तरप उठती है । यही उनकी कृपा है , कृपा हो गयी , अब पाना क्या शेष है !
श्री राधे ।

तन से और धन से केवल भक्ति होती तो धनवान और बलशाली के लिए भक्ति की प्राप्ति एक क्षण की बात होती । धनवान और बलशाली का एकाधिकार भगवद् प्राप्ति पर भी हो जाता ।

तन से और धन से केवल भक्ति होती  तो  धनवान और बलशाली के लिए भक्ति की प्राप्ति  एक क्षण की बात होती । धनवान और बलशाली का एकाधिकार भगवद् प्राप्ति पर भी हो जाता ।  
वो चालिस पचास साल से लगें हैं महाराज जी के साथ , खुब नौटंकी किया , दिखाबा किया , दान किया , तन भी दिया पर मन नहीं दिया , वो सब समझते हैं । बाहर से बड़े शालिन है । बाहरी तौर पर ढोंग करना सीख लिया , अध्यात्म में चापलुसी सीख लिया संसार की तरह वहां भी , वो संसार बाले चापलुसी पसंद करेंगें , भगवान और संत नहीं । अंदर क्या है झूठ और फरेब , सब वो जानतें हैं ।
 मैं तो कडुबा हुं अपने गुरू की तरह खड़ा बोलता हुं किसी को धोखा नहीं देता और चापलूसी नहीं करता । सत्य को सत्य कहुंगा जो लगातार सेवा कर रहा है मैं उन लोगों का तारिफ दिल से ह्रदय तल से करता हुं और करता रहुंगा  ।

 किसी को अच्छा लगे ना लगे , जा सकता है। मुझे छोड़ कर ।  प्रार्थना है कोई अपने उपर ना ले मेरे इस पोस्ट को ।  मुझे कोई लोभ नहीं मुझे दोस्तों के लिस्ट की । दोस्त दो-चार हीं रहे  श्री महाराज जी के सिद्धांत के अनूकूल रहे जिससे मुझे और ज्ञान भगवद् चर्चा सही सही हो । शांती रहेगा । अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में आसान होगा । 

भक्ति अंदर की चीज है , ह्रदय और अंत:करण का वर्क है । अंत:करण की शुद्ध जरूरी है। वो शरीर की शुद्धि बाहरी शुद्धि , दिखावा , फिजिकल ड्रिल बाहरी तौर पर व्यवहार क्रिया से कोई मतलब नहीं । 

एक जल्लाद का दृष्टांत है एक क्या अनेक सत्य घटना है ।
एक जल्लाद जीव हत्या कर मांस का व्यापार करने बाला था । वो शालिग्राम के शिला से मांस तौल कर बेचता था और अंदर से भगवान की भक्ति करता था , हर पल नाम लेता था , एक क्षण भी नहीं भुलता था ।  एक पंडित मना किया उसको और वो उसका शालिग्राम ले लिया ।

 भगवान ने उस पंडित को फटकार लगाई और कहा " ए शालिग्राम शिला उसको वापस कर दें । और एक दिन उसी जल्लाद ने भगवद् प्राप्त किया । 
लोग पता नही ऐसा कहानी पढ़ कर क्या सिखतें हैं ? शिक्षा ग्रहण करतें है भी या नहीं ? आत्मसात किया या ऊपरे ऊपरे स्वाहा ?? या रंजन के दृष्टि से कथा पढ़ लिए सत्यनारायण कथा जैसे सिर्फ । ना चिंतन है ना मनन है ना प्रभाव है , पढ़ो और भुलो बस । क्या फायदा ??? 
वो पढ़ा और तराक कौपी पेस्ट , क्या तो दुसरे को दिखाना है और लाईक पाना है । मतलव नहीं आत्मसात करने से । वो दुसरा धराक से फिर कौपी पेस्ट , सब लगा है कौपी पेस्ट और पोस्टर की फैक्ट्री बनाने में । कोई मतलव नहीं खुद के मन को समझाने और अपनाने से । छी छी छी । 

इतिहास पुराण श्री महाभारत दृष्टांत है ,  हमारे इष्ट श्रीकृष्ण ने अपने परम भक्त अर्जुन को गीता का ज्ञान, हमारे दृष्टांत के लिए देकर  राष्ट्रहित में युद्ध का आदेश दिया था । वर्णा श्री अर्जुन तो पहले से हीं उनका बहुत बड़ा भक्त और सारे लौकिक एवं पारलौकिक ज्ञानों का स्वामी था । 

मन्मना भव मद्धक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ (गीता १८-६५)

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।66।। ( अध्याय 18 )

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।8.7।। (गीता )

आओ अर्जुण मेरे शरण में आ जाओ अपनी मन व बुद्धि दोनों मुझे दे दो और गलत का विरोध करो , मारो इन सबको जो अधर्म के साथ है ।
व्यवहारिक ज्ञान दिया और प्रैक्टिकल भी कराया , 
लेकिन लोग गीता का यह सब श्लोक रटतें है मुंह से केवल और कहते हैं गलत का विरोध ना करो समाज में चाहे कोई समाज को प्रदुषित कर दे , आपका जमीन जोत ले , आपकी बहु बेटी पर गलत नज़र रखे , पर उस निंदनिय का विरोध मत करो , बाहरी तौर पर चुप रहो । ख़ामोश रहो । यही भक्ति सिखा है क्या लोग ?? 
क्या श्री महाराज जी कहतें है कि कुछ मत करो ? चुप रहो ????
उन्होंने तो कहा है सब जरूरी काम करो और मन भगवान को दे दो तो तुम्हारा कर्म नोट नहीं करूंगा । तुमने कुछ नहीं किया , ए मैं लिख लुंगा । 
संसार में कौन यह कह सकता है कि उसका कर्म शुद्ध है आज कलयुग में , चाहे नौकड़ी हो या व्यापार , बिना घपड़-सपड़ के अर्थ कमा लेगा लोग ? तो फेसबुक पर नैतिकता और चिकना-चुपड़ा और दिखावा, बढ़ीया बनने का और गलत का विरोध नहीं करने का दिखावा से भगवद् प्राप्ति हो जाएगा तो मुबारक हो उनको । 

क्या भक्ति का दिखावा भक्ति है ? क्या फिजिकल ड्रील भक्ति है ? 
अगर यही भक्ति आपके लिए है तो करिए ऐसा भक्ति , मेरे लिए यह सब बाहरी नाटक है , मैं तो अंदर शुद्धि बाहर कितना भी गडबर हो का , बात  समझ लिया, जान लिया और मान भी लिया ,कोई चिंता नहीं यह जान लिया और मान भी लिया । 
 
जिसको बाहर से चिकना बनना है , भक्त कहलबाना है केवल,  बनना नहीं है । शौ औफ करना है , बाहर से अच्छा बनना है वो चिकना बने , मुबारक है उनको । मैं गलत हीं सही ,  मेरा भला बुरा मैं अपना समझता हुं ।

वो कहावत है " मन मलिन तन सुन्दर कैसे "??
       
" भगवान का भक्त कभी कायर नहीं होता और डरपोक कभी भक्त हो हीं नहीं सकता है । क्योंकि भक्त के पास अपने गुरू और भगवान का विशेष बल होता है। और भगवान और गुरू का आशिर्वाद होता है उसके माथे पर हमेशा । "