Thursday, 20 July 2023

अच्छे बुरे में फर्क को कैसे जानना चाहिए ताकि वो बुरे व्यक्ति, बुरे बिषय तथा बुरे वस्तू से बच सके , मन में उठ रहे निगेटिविटी से कैसे बचें ?

प्रश्न :- शिष्य को संसार में अच्छे बुरे में फर्क को कैसे जानना चाहिए ताकि वो बुरे व्यक्ति, बुरे बिषय तथा बुरे वस्तू से बच सके , मन में उठ रहे निगेटिविटी से कैसे बचें ? 

पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी द्वारा उत्तर :- 
एक शिष्य को , साधक को संसार में अच्छे और बुरे बिषय, बस्तू तथा व्यक्ति में अंतर अपने गुरू के सिद्धांतों के कसौटी पर कस कर करना चाहिए। 
जो भी बिषय , व्यक्ति या वस्तू गुरू के सिद्धांतों के प्रतिकूल है उन सभी से दुर रहना श्रेयकर है । जो व्यक्ति हमारे गुरू के सिद्धांतों के विरोधी बातों को मानता हो तथा करता हो , उनसे हमें दुर रहना है । 
हमें हर बिषय बस्तुओं तथा व्यक्ति की पहचान अपने बुद्धि को गुरू के बुद्धि से जोड़कर करना चाहिए। 
गुरू के बुद्धि से अपनी बुद्धि को जोड़ने का मतलव है उनके सिद्धांतों के कसौटी पर किसी बिषय, वस्तु तथा व्यक्ति को कस कर उसे पहचानना तथा विरोधी तत्वों से स्वयं को दुर रखना । गुरू का दिया तत्वज्ञान, सिद्धांत ज्ञान हमारी आंखें तथा बुद्धि है, पैमाना है ।

 बस हमें यह ध्यान रखना है कि किसी कि बुराई नहीं करनी है, उसमें रस नहीं लेना है , इंटरेस्ट नहीं रखना है , लेकिन अच्छे और बुरे में अंतर , अनुकुल और प्रतिकुल व्यक्ति में अंतर तो हमें समझना ही होगा । नहीं तो हम कुसंग और कुसंगी से बचेंगे कैसे ? फर्क पहचानेंगे तभी तो बचेंगे कुसंग और कुसंगी से । 
यहां तक कि हमें स्वयं के मन के भावों को , मन में उठ रहे बिचारो को , संकल्पों को अपने गुरू के सिद्धांतों के कसौटी पर हर बार , बार-बार परखते रहना चाहिए, जो भाव, बिचार तथा संकल्प अनुकुल नहीं है उसे तुरंत त्याग देना चाहिए, राधे राधे करना शुरू कर देना चाहिए । मन में गलत भाव आवे , गलत बिचार उत्पन्न हो , निगेटिव ख्याल आवे तो हरि गुरू को याद करने लगना चाहिए , तत्वज्ञान से गलत बिचार तथा निगेटिव भाव दुर हो जाते हैं । 
:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ( युवा शिविर ब्रजगोपिका धाम )।

किसी के द्वारा ईर्ष्या द्वेष जलन आदि करने पर क्या करें ?

प्रश्न :- मां कुछ लोग हमारे संसारिक उपलब्धि यहां तक कि अध्यात्मिक उपलब्धि से भी जलते हैं, व्यंग करते हैं कि आजकल बहुत राधे राधे करती रहती है , सत्संग में जाती है आदि आदि ऐसे में क्या करें ? 

उत्तर :- तुमको क्या करना है ? जलन उसको हो रहा है , वो अपने जलन के आग में खुद को जला रहा है बेचारा तो जलने दो उसे । नुकसान तो वो अपना कर रहा है । तुम्हारा क्या नुकसान हो रहा है ? तुम तो gain कर रही हो और वो अपना पिछला बचा खुचा पुण्य को जला रहा है , उसके पुण्यों का क्षय हो रहा है । वो अपनी आत्म शक्ति को नष्ट कर रहा है। अगर कोई ईर्ष्या द्वेष के आग में जल रहा है तो जलने दो उसे । उसके संस्कार अच्छे नहीं हैं, इसलिए वो अपने कुसंस्कारों का प्रदर्शन कर रहा है बेचारा । 

अगर कोई व्यंग करता है तो दया के भाव से उसे देख कर नजरंदाज कर दो ।‌
समझ में आ जाएगा अगर उसका सुसंस्कार जागृत हो जाए कहीं तो, नहीं तो जल कर वो अपना हीं भारी नुक्सान कर लेगा । 
तुमको कुछ नहीं करना है और न कोई प्रतिक्रिया देनी है । तुम्हें अपना ध्यान अपने काम में लगाना चाहिए । तुमको Distract होने की कोई आवश्यकता नहीं है :- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ( युवा शिविर- ब्रजगोपिका धाम )।

परदोष दर्शन , दुसरे कि बुराई करने से क्या हानी होती है ?


परदोष दर्शन या दुसरे की बुराई करने या सुनने से चार प्रकार के कौन कौन से महानुकसान होते है , पढ़ें इस प्रश्नोत्तर को अंत तक । 👇👇👇
पुज्यनियां मां से बच्चों का प्रश्न :- मां परदोष दर्शन का क्या मतलव है ? शास्त्र के अनुसार दुसरे का अपमान करने से, बुराई करने या सुनने से स्वयं को क्या क्या हानियां होती है ? 

उत्तर :- दुसरे में दोष यानि अवगुणों को देख कर उसका चिंतन करना , उसकी बुराई करना , उसके अवगुणों का किसी से चर्चा करना परदोष दर्शन कहलाता हैं। 
इस माया लोक यानि संसार में एक भी मायाबद्ध जीव ऐसा नहीं है जिसमें कोई न कोई अवगुण नहीं हो । संसार का हरेक वस्तू , हरेक जीव तथा हरेक संसारिक बिषय दोष पुर्ण है , एक भी शूद्ध नहीं है । 
"Everything in this world is a composition of good and evil . " 
हम दुसरे में अवगुण और स्वयं में गुण को देखते हैं यह हमारे स्वार्थी तथा दुषित नजरिया एवं अंहकार का परिणाम हैं । स्वार्थ यह कि हम अपना बड़प्पन और दुसरे को अपने से निम्न सिद्ध करना चाहते हैं । 

शास्त्र कहता है जबतक हमारे में एक भी दोष है हमें दुसरे में अवगुण देखने का हक नहीं है। किसी का अपमान करने का हक नहीं है । 

चूंकि हमारा नजरिया शूद्ध नहीं है और हम अपने उसी अशूद्ध नजरिए से दुसरे को बुरा और स्वयं को बढ़िया समझते हैं तो यह पाप है । किसी के अवगुणों कि चर्चा करने से , किसी कि बुराई करने से , अपमान करने से उसको पीड़ा होती हैं । अगर कोई तुम्हारा अपमान करता है तो तुमको दुख होता है या नहीं ? 

तुलसीदास जी ने उत्तर कांड में स्पष्ट कहा है :- 
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥1॥

हमारा वेद पुरान और भागवद् आदि सभी वैदिक शास्त्रों नें यह कहा है कि दुसरे के अपमान करने जैसा पाप कोई नहीं और दुसरे को सम्मान देने जैसा धर्म नहीं कोई । 
दुसरे के अपमान से उसको पीड़ा होती है , कष्ट होता है और यह पाप है इसलिए हम इस पाप के भागीदार बनते हैं । 

इसिलिय दुसरे का अपमान तथा बुराई करने या सुनने के कारण हुए पाप से सबसे अधिक नुकसान स्वयं को होता हैं जो निम्नलिखित चार प्रकार का हैं 👇👇👇 - 
१. आत्म शक्ति क्षीण होती है । यानि आत्मबल ( shelf confidence ) कमजोर होता है जो स्वयं के सफलता में बाधक है । 
२. खुद का प्रारब्ध कमजोर होता है । भाग्य क्षीण हो जाता है । भाग्य कमजोर होने से हमे हर तरफ असफलता मिलती है ।
३. दुसरे का अपमान करने से , बुराईयों की चर्चा करने से उसके पाप का क्षय होता है और हमारे पुण्य का क्षय होता है , किया गया साधना क्षीण होती रहती है । फिर भला ऐसा काम कौन करना चाहेगा ? 
४.परदोष दर्शन से हमारा मन बुद्धि चित्त और अधिक गंदा होता है और अंत:करण के गंदा होने से हम अपने ईष्ट और गुरू के कृपा से वंचित होते हैं । हम भगवान से दुर होते जाते हैं । भगवद् कृपा मिलना बंद होने लगता है । यह सबसे बड़ा नुक्सान है ।
:- पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी द्वारा दिया गया उत्तर युवा शिविर में ब्रजगोपिका धाम में । श्री राधे ।

मनुष्य को अच्छे गुणों के लिए आध्यात्मिक होना आवश्यक है ।

हमें भगवदिए कृपा कि बात के बारे में इतना तो समझ हीं लेना चाहिए कि मानव शरीर जीव के पिछले पुण्य पुंजों का संग्रह तथा उस पर भगवान के कृपा से मिलती है । साथ साथ भगवान मनुष्य के जन्म के साथ ही उसके संचित कर्मों का कुछ हिस्सा जैसे एक दो प्रतिसत प्रारब्ध के रूप में भोगने तथा अगले क्रिया मान कर्म को करने के लिए शक्ति के रूप में दे देते हैं ।

 इस प्रार्बध विज्ञान के बारे में हमारे वैदिक शास्त्रों ने तथा वास्तविक संतो ने कहा है कि मनुष्य को भगवान से मिले प्रार्बध के रूप में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के भाग्यों का भोग्य कर्म फल का समावेश होता है। यानि पिछले‌ तमाम मानव जन्मों में किए अच्छे और बुरे उन कर्मो के फल के रूप में हमे भाग्य मिलता है जिसे हम पिछले जन्मों में भोग नहीं पाय है ‌। और जिसे इस जन्म में हमारे द्वारा किया जाने वाला क्रियामान कर्म के अनुसार उसकी तीव्रता , अति तीव्रता तथा अगर क्रिया मान कर्म अच्छा है तो न्यूनता को भोगना परता है । अच्छा कर्म करने से तीव्र दुख भोग फल भी न्यूनतम बन भोग फल बना जाता है । 

 अत: जिस मनुष्य का क्रियामान कर्म अच्छा है तो उसका अच्छा प्रारब्ध भाग्य फल के रूप में एक्टिभ हो जाता है जिससे उसको भगवान और गुरू कि अधिक कृपा प्राप्त होने लगती है जिससे जीव हर जगह सफलता प्राप्त करते चला जाता है जिसके परिणाम स्वरूप उसे संसारिक सुख के साथ अध्यात्मिक सुख तथा गुढ़ ज्ञान भी तत्वज्ञान के रूप में भगवद् अवतार गुरू से सहज रूप से प्राप्त होने लगता है और समझ में भी आने लगता है एवं व्यवहार में भी उतरने लगता है । 

लेकिन जो जीव मुर्खता बस मानव जीवन के मुल्यों के प्रतिकूल कर्म को जैसे ही करना शुरू करता है तो उसके प्रारब्ध के दुर्भाग्य वाला भाग एक्टिभ हो जाता है और‌ वो हर जगह फिर असफलता , निराशा , दुख पाना शुरू करता है । गलत काम करने से वो प्रार्बध के शौभाग्य वाले भाग को इनएक्टिभ कर लेता है , और इस प्रकार वो भगवान तथा गुरू दोनों के कृपा से विलग हो जाता है ,‌वंचित हो जाता है , परिणाम स्वरूप दुख से उसका जीवन भर जाता है । 
ऐसा मनुष्य गलत कर्म में संलग्न होकर भगवान से प्राप्त रिसोर्सेज ( जैसे धन जन परिवार देश समाज आदि ) का दुरूपयोग करता देखा जाता है , जीवन को फुहड़ बना लेता है, गलत बिषयों में लिप्त हो जाता है । तथा भाग्य रूपी सिक्के के डार्क भाग के अनुसार हर जगह असफलता , परेशानी ,‌निराशा, डिप्रेशन तथा दुख से घिर जाता है । और दोष भगवान तथा गुरू को देता है कि हमारा लाभ नहीं हो रहा है , इस प्रकार वो भगवान तथा गुरू पर और अधिक अविस्वास और अधिक दुरी एवं फिर और अधिक दुख परिणाम में पाता चला जाता है । 

तो सबकुछ हम मनुष्यों के अपने हाथ में है । 
बड़ा आश्चर्य होता है आज देख कर अधिकतर मनुष्य मानव जीवन को स्वयं नरक बना लेता है । घटिया फिल्म , घटिया हरकत , गलत संगति , गलत खान पान, अश्लील पहनावा ओढ़ावा, गलत बिषयों में रूचि , अश्लील बातें करना , घटिया मजाक , छिछोरी हरकतें, दारू मांस मदिरा का अधिक से अधिक सेवन, गाली गलौज , गलत भाषा , फैशन के नाम पर गलत भेष भूषा, घटिया पहनावा ओढ़ावा, सस्ती लोकप्रियता के नाम पर ,मौडर्निटी के बहाने गलत विडियो बनाना ,‌ कला के नाम पर, क्रियटिभीटी के नाम पर फुहड़ नृत्य , फुहड़ फिल्म , फुहड़ विडियो , गलत तथा तथ्यहीन संभाषण करना , अश्लील भाषा का उपयोग , दुसरे पर घटिया कटाक्ष करना , झूठ बोलना , चोरी करना , हत्या करना , डाका डालना , स्वतंत्रता के नाम पर अभद्र व्यवहार, अभिव्यक्ति के आजादी के नाम पर घटिया संभाषण करना , ज्योतिष विद्या तथा धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाना । राजनीति के नाम पर घटिया आरोप प्रत्यारोप करना । प्रोफेशन के नाम पर दुसरे के हित से खिलवाड़ करना , ठगना , धोखा देना । ताकत के नाम पर कमजोर को सताना । दुसरे का हक मारना । पद तथा ज्ञान के नाम पर अहंकार का पोषण करना । 
दुसरे से जलन ईर्ष्या द्वेष करना , व्यास पीठ से मिथ्या संभाषण करना , अंधविश्वासों को फैलाना ।
यह अधिकांश मनुष्यों का आदत बन चुका है आज कलयुग में और दुर्भाग्य को खूद निमंत्रण देते हैं ।

और यह सब कौन करता है ? जिसको मानव जीवन के मूल्य तथा मानविय गुणों के प्रति कोई इंटरेस्ट नहीं है । जिसको भगवान तथा गुरू पर विश्वास नहीं है , जिसको शास्त्रों तथा वैदिक संविधान पर विश्वास नहीं है । जो स्वयं को देह मानता है जीवात्मा नहीं । 

अरे भोगना तो हमको हीं होगा । कोई नहीं बच सकता । कर्म गलत करेगे हम और भोली सुरत बना कर भगवान के मंदिर में जाकर खड़े हो जाएगे , गुरू के सामने खड़े हो जाऐगे ,पुजा पाठ भक्ति का नाटक करेगें , तो हम आप क्या समझते हैं कि आप हम भगवान तथा गुरू को ठग लेगें क्या ? 

" मन गांठ कपट के खोल , हरि बोल हरि बोल हरि बोल " :- श्री महाराज जी ।

भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे बाले हम जीवों को क्या भगवान पहचान नहीं पाते क्या ? 
हम भगवान से, गुरू से छल करेंगे तो हमारे लिए वो भी सबसे बड़ा छलिया बन जाते हैं । हम जितना शूद्ध प्रेम उनसे करेंगे तथा उनके अनुकूल आचरण करेंगे तो वो हमसे उतना ही प्रेम करते हैं , कृपा करते हैं । यह सिद्धांत श्री महाराज जी का हमें याद रखना है ।
इसलिए मानव जीवन को फुहड़ता में मत गंवाए । मानव जीवन को हल्के में हम न गंवाएं । 
श्री राधे ।

Saturday, 15 April 2023

प्रेम क्या है

प्रश्न :- प्रेम क्या है ?? 
उत्तर :- 
 प्रेम पुजा है , बंदगी है , समर्पण है ,
प्रेम शरणागति है, उपासना है प्रेम,
प्रेम भक्ति है , तप तथा योग है 
प्रेम साधना है साध्य भी है प्रेम ,
प्रेम दिव्य ज्ञान तथा धर्म है,
प्रेम दिव्य संगीत है, रिद्धी तथा सिद्धी है प्रेम 
प्रेम निष्काम सेवा है , 
प्रेम दिव्य अमृत है ,
प्रेम दिव्य औषधि है ,
प्रेम अलौकिक शक्ति है ,
प्रेम योगक्षेम वहाम्यं है ,
प्रेम भरोसा और विश्वास है ,
प्रेम तृप्ति है , संतुष्टि है , दिव्य एहसास है ,
प्रेम श्रद्धा है , शांति, सकून और आनंद हैं ,
प्रेम करूणा है त्याग है तपस्या है क्षमा है,
 प्रेम दया है दान है प्रेम , प्रेम चेतना है,
प्रेम दिव्य प्रकाश है , समृद्धि है प्रेम ,
प्रेम सत चित्त आनंद का दिव्य नाम है 
इसलिए प्रेम दिव्यानंद है ,
प्रेम जिंदगी है तथा मृत्यु से परे जीवन भी है ,
प्रेम भगवान श्री कृष्ण के ह्रलादिनी शक्ति के सार तत्व का दुजा नाम यानि श्री राधा है प्रेम,
प्रेम गुरू का दिव्य एवं पवित्र उपहार है 
प्रेम भगवान का स्थाई वरदान है,
प्रेम गुरू का सुरक्षा चक्र है, 
यथा ब्रजगोपिका नाम और धाम है प्रेम,
प्रेम का परिभाषा असिमित है ।।
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जो प्रेमी हैं जिसे प्रेम मिल गया वहीं प्रेम को जानता है ।। :- संजीव ।।

Saturday, 4 September 2021

ये मोहब्बत का शहर है जनाब

ये मोहब्बत का शहर है जनाब ,

यहां सवेरा, सुरज से नहीं किसी के दिदार से होती है,

यहां फुल भंवरों से नहीं किसी के मुस्कुराहटों से खिलती है 

यहां खुशबु फुलों से नहीं किसी के शरीर से निकलती है 

फिजाओं में रंग गुलों से नहीं,किसी के शरीर से निखरती है

यहां नशा शराब से नहीं किसी के दिव्य आंखों से चढ़ती है ।

यहां मौज चमन से नहीं गोलोक वाले से मिलती  है ,

यहां प्रेम में दिलों जां किसी संसारी पे नहीं बंशीवारे पे लुटती है 

यहां हर शय में, हर लय में, हर धुनों में पांव, संसारी गीतों पे नहीं, हमारे " कृपालु" महाप्रभु के लिखे और गाए पदो के बोल पे थिरकती है ।

🙏❤️🙏

:- आपके दास संजीव की भावना, रचना नंबर 56।

🙏

 

Friday, 6 August 2021

EQ development

✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️आज लोग आइ ए एस , आईपीएस आदि बन जाते हैं पर प्रोफेशनल या समाजिक जीव में  सफल केवल वही होते हैं जिनका EQ   का सही सही विकास हुआ है । 
नहीं तो आपने बहुत से उदाहरण जानते हैं । कुछ दिन पहले बक्सर का DM क्यों आत्म हत्या कर लिया ? पोस्ट , पोजीशन प्राप्त करना सफलता नहीं है जब तक उससे संबंधित जिम्मेदारी और परिवारिक समाजिक जीवन सफल नहीं हो । 

हमारे बच्चे अपने जीवन में कैसे सफल हो सकते हैं ?
पढीय :- 

IQ = विवेक ,EQ= मानविय भावना , संवेदना ,K = ज्ञान 
PK = व्यवहारिक ज्ञान ,TK = टेक्निकल ज्ञान 
इंटेलीजंस क्वोशन्ट ( IQ) और इमोशनल क्वोशन्ट( EQ)
 दोनो में अंतर को समझने से पहले हमें समझना होगा कि दोनों आखिर हैं क्या? 
इंटेलीजंस क्वोशेन्ट यानी विवेक :- हमारे जानने-समझने-बुझने और जानकारी को सही जगह अप्लाई करने की समझ होती है। ये व्यक्ति की दिमागी क्षमता को दर्शाता है। 

जबकी इमोशनल क्वोशन्ट ( EQ) व्यक्ति की खुद की और दूसरों की भावनाओं को मापने की एक क्रिया है। वे कितने भावुक हैं और दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करते हैं। समाज में , ग्रुप में , परिवार में , प्रोफेशन में व्यक्ति का व्यवहार कैसा है । व्यक्ति अपने व्यवहार को कैसे मैनेज करता है । 

EQ और IQ एक व्यक्ति की मानसिक योग्यता को जानने का तरीका है। 
जबसे हम पैदा होते हैं तभी से हम एक रेस का हिस्सा बन जाते हैं। फिर जब बड़े होते हैं तो वह चीज़ हमारे लिए कॉम्पिटिशन बन जाती है , जिसका सामना हमें हर क्षेत्र में करना पड़ता है। फिर चाहे प्रोफेशनल लाइफ हो, सोशल लाइफ हो या पर्सनल लाइफ। 

पुराने ज़माने से बुद्धिमत्ता  यानी इंटेलीजेंस को ही सफलता की कसौटी माना है। ऐसा माना जाता है की व्यक्ति का इंटेलीजेंस क्वोशन्ट और उसकी सफलता का आपस में कुछ संबंध है, यानी अगर इंटेलीजेंस क्वोशन्ट अधिक हैं तो आदमी के सफल होने के चांस ज्यादा हैं। 

इंटेलीजेंस क्वोशन्ट और इमोशनल क्वोशन्ट का अंतर यहीं से शुरू होता है। इंटेलीजेंस क्वोशन्ट आपको सिर्फ परीक्षा में अच्छे अंक दिलाता है लेकिन इमोशनल क्वोशन्ट आपको जीवन की परीक्षा में सफलता दिलाता है। जिनका इमोशनल क्वोशन्ट ज्यादा होता है वे बदलते पर्यावरण के साथ जल्दी एडजस्ट हो जाते हैं और इसलिए उनके जीने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। चार्ल्स डार्विन ने भी सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट का सिद्धांत इसी के आधार पर दिया था। 

इमोशनली इंटेलीजेंट लोग सिर्फ फैक्ट्स नहीं देखते बल्कि उसके साथ इमोशंस से भी काम लेते हैं। उन्हें यह पता होता है कि हर कोई अलग है इसलिए उस अंतर को ध्यान में रखते हुए वे सबसे एक सा व्यवहार नहीं करते। वे अपने इमोशंस के साथ-साथ दूसरों की भावनाओं की भी कद्र करते हैं। ऐसे लोग कम्युनिकेशन में अच्छे होते हैं और अच्छे मैनेजर होते हैं। 

इंटेलीजेंस क्वोशन्ट और इमोशनल क्वोशन्ट के बारे में सबसे पहले गोलमेन ने बताया था। उनका कहना था कि जीवन में 20 प्रतिशत सफलता इंटेलीजेंस क्वोशन्ट से मिलती है जबकि 80 प्रतिशत सफलता और इमोशनल क्वोशन्ट के कारण मिलती है। जिन व्यक्तियों का इमोशनल क्वोशन्ट कम होता है उनका जीवन अपनी परेशानियों को गिनने में ही कट जाता है। जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण ही आपको सफल बनाता। 

जिन बच्चों की इमोशनल स्किल्स विकसित नहीं हो पाती हैं वे जल्द ही बुरी संगत और बुरी गतिविधियों में पड़ जाते हैं। इमोशनल क्वोशन्ट की कमी एकाग्रता भंग करती है और फिर फ्रस्ट्रेशन होता है जिससे उनका मन ना पढ़ाई में लगता है ना कहीं और। एक बच्चे में शुरू से ही इमोशनल स्किल्स विकसित की जा सकती है। इसके लिए पूरे परिवार को एफर्ट लगाने होंगे। 

बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं जिनको आपने स्कूल-कॉलेज में हमेशा बहुत अच्छे अंक प्राप्त करते देखा होगा लेकिन अगर उनके दोस्तों की गिनती कर के देखें तो संख्या बहुत ही कम मिलेगी। वे जीवन में एकेले ही रह जाते हैं और किसी भी रिलेशन को निभा नहीं पाते हैं क्योंकि वे इतना अकेला रह चुके होते हैं कि या तो उन्हे किसी के आने-जाने से फर्क नही पड़ता या फिर किसी के आ जाने से वे बहुत असहज हो जाते हैं। 

आज की पीढ़ी के लिए ज़रूरी है कि सभी शैक्षिक संस्थानों में आई.क्यु और इ.क्यु के कुछ बेसिक लेसंस होना चाहिए और इस मॉड्यूल को सिलेबस में शामिल करना चाहिए क्योंकि स्कूल-कॉलेजों का ज़िम्मा केवल किताबी ज्ञान देना नहीं है, उन्हे समझदार बनाना भी उन्ही का कर्तव्य है। इस मॉड्यूल में ये बातें शामिल करनी होगी- 

कॉंफिडेंस डेवलपमेंट- बच्चों को आत्मविश्वास और अहंकार के बीच का अंतर समझाना जरूरी है। उनके मन से डर और संकोच दूर करना उनके व्यक्तिगत विकास में बहुत मदद करेगा। 

क्रिएटिविटी बच्चों के विचारों को आज़ादी से व्यक्त करने की अनुमति हो। इससे एक व्यक्ति के रूप में उनका नेतृत्व करने का गुण डेवलप होगा। उन्हें सिखाने की ऐसी टेक्निक हो जिसे सीखने के साथ मज़ा भी आए। 

टीम बिल्डिंग- बच्चों को बचपन से टीम में काम करना सिखाएं। इससे उनमें रिश्तों को लेकर सकारात्मकता आएगी। वे जब प्रोफेश्नली काम करेंगे तो टीम स्पिरिट के साथ करेंगे। इसी के साथ उन्हे सामाजिक मुद्दों के बारे में बताएं और जागरूक बनने के लिए प्रोत्साहित करें। मधुर संबंध एक सुखी जीवन का सार है इसलिए अपने भीतर इंटेलीजेंस क्वोशन्ट की अपेक्षा इमोशनल क्वोशन्ट ज्यादा डेवलप करें।

इसी प्रकार अगर हम EQ में दक्ष हैं तो अपने प्रोफेशन में टीम को भी और्गनाइज्ड करतें हैं , मैनेज करतें हैं , एक अच्छे और्गरनाईजेशन में जहां ओपेन प्लेटफार्म हों , हमारे स्किल की प्रोपर यूटिलाइजेशन की छुट हो , मैनेजमेंट ओपेन हो , रूढ़िवादी ना हो , कन्टीन्यूअस ईम्प्रूभमेंट के लिए तैयार हो तो हम E Q का इस्तेमाल करके  वेहतर प्लानिंग , और्गनाईजिंग , स्टाफिंग, कंट्रोलिंग ,सबौर्डिनेटिंग , डाईरेक्टिंग , मोटीभेटींग,  ट्रेनिंग एण्ड डेवेलपमेन्ट ,  एलोकेटिंग औफ जौब, मैपिंग औफ परफौरमेंश , रिएलोकेशन औफ टास्क के द्वारा अच्छा कर सकतें हैं ।।

EQ यानी Emotional quotient हमारी  feelings से जुड़ा है। इसकी मदद से हम  खुद अपने emotions और दूसरों के emotions को समझते हैं और उन्हें manage करते हैं। EQ आपस में अच्छे रिश्ते बनाने और  सही वक्तपर सही तरीके से react करने जैसे कामों में हमारी मदद करता है। अगर हम  अपने दोस्त या भाई-बहन की बहुत care  करते हैं, उनके साथ चीजें share करते हैं, खाने पीने की चीजें उनके लिए बचाकर रखते हैं, किसी अनजान को भी चोट लगे तो उसे देखकर हमें तकलीफ होती है तो इसका मतलब है  हमारा EQ काफी अच्छा है। जो इंसान  बहुत बड़ी कामयाबी हासिल करता  हैं, उसमें EQ काफी बड़ा role play करता है । हमारा कोई भी  फैसला IQ के लेवल पर सही साबित हो सकता है , लेकिन यह जरूरी नहीं है की वही फैसला EQ के level पर भी सहीं हो । IQ हमें सिर्फ academics  में अच्छे marks दिलवा सकता  है पर EQ हमें  अपने ज़िंदगी की परीक्षा  में अच्छे marks दिलवाता है. Emotional intelligence का concept सबसे पहले 1995 मे goleman ने दियाँ। उनके अनुसार ज़िंदगी में 20% success IQ के कारण मिलती है जबकि 80% success  Emotional Intelligence के कारण मिलती है। जहां IQ हमारे जानने समझने और जानकारी को सही जगह apply करने की एक सही समझ होती है वहीं Emotional Quotient इंसान की खुद की और दूसरों की भावनाओ(feelings and emotions) को समझने और manage करने की एक कला है। जिनका Emotional Quotient ज्यादा होता है वह लोग बदलते Environment के साथ easily adjust हो जाते है।

EMOTIONAL QUOTIENT (EQ) की TESTING – जानिए अपना EQ
EQ बढ़ाने के तरीके

अपनी feelings and emotions में झाँकिए। देखिये कि आपकी feelings और behavior कैसे एक दूसरे से connect हैं। जब आपकी emotions ज़ोर मारती हैं, तब आपका reaction क्या होता है।

Emotional Quotient का मतलब सिर्फ दूसरों की तकलीफ़ों को समझना नहीं है। बल्कि उनके  दर्द और तकलीफ़ों को महसूस करना भी है। Negative Emotions को कम करना, stress नहीं लेना, मुश्किल फैसले लेना, बुरे वक्त से लड़कर बाहर निकलना और  Reactive के बजाय pro-active बनकर Emotional intelligence को बेहतर किया जा सकता है।
दोस्तो आपने IQ word तो सुना ही होगा। साथ यह भी सुना होगा की दुनिया मे सबसे ज्यादा IQ  अल्बर्ट आइंस्टाइन और स्टीफन हॉकिंग का है। इन दोनों वैज्ञानिको का IQ 160 है। लेकिन 160 IQ का क्या मतलब है? आपका iq कितना है? इसके क्या फायदे नुकसान है? हम अपना iq कैसे बड़ा सकते है? इस article को पड़ने के बाद आपको इन सभी सवालो का जवाब मिल जाएगा।  

क्या है IQ

“IQ” word जर्मन शब्द Intelligenz-Quotient से निकला है जिसका पहली बार use जर्मन psychologist  विलियम स्टर्न ने 1912 मे किया। IQ यानी intelligent quotient आपके सोचने-समझने और knowledge हासिल करने से जुड़ा है। हम दिमागी तौर पर किसी काम को कितने बेहतर तरीके से कर सकते हैं, यह हमारा  EQ तय करता है। कोई इंसान किसी सवाल या problem को  चुटकियों में solve कर  लेता है तो कोई इंसान लंबे समय के बाद भी असफल रह जाता है। अगर आप किसी सवाल को solve करने, नए idea देने या कुछ भी नया सीखने में अपने दोस्तों से आगे रहते हैं, उनसे कम पढ़ाई करके भी  ज्यादा marks लाते हैं तो possible है कि आपका iq उनसे ज्यादा  हो। आमतौर पर यह पैदाइशी होता है । आपकी job performance, leadership capability, फैसले लेने की क्षमता जैसी चीजों पर भी इसका असर होता है। वैसे,इसमे तो कोई शक नहीं है की  life में अकेले iq के दम पर कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती। कड़ी मेहनत और प्रयास की बिना कुछ भी पाना संभव नहीं है। , 

( ब्लौग नंबर 58, date :- 28 / July 2011 ,  संजीव कुमार ) 

IQ की गणना

इसकी गणना किसी व्यक्ति की मानसिक उम्र (mental age) में real age(chronological or biological age) से भाग देकर उसे 100 से multiply कर के निकाला जाता है।

intelligent quotient = mental age ÷ Physical age × 100

For example; अगर आपकी age (physical age) 20 साल की है और आपकी mental age 25 साल है तो आपका iq होगा

intelligent quotient = 25 ÷ 20 × 100 = 125

Mental age निकालने के लिए कई तरह के psychologist test का इस्तेमाल किया जाता है।

IQ SCORES के मतलब

iq Range – iq Classification

145–160 – Very gifted or highly advanced

130–144 – Gifted or very advanced

120–129 – Superior

110–119 – High average

90–109 – Average

80–89 – Low average

70–79 – Borderlines impaired

:- संजीव कुमार