Thursday, 20 July 2023

इस बात पर आज बहस है कि हनुमान जी को ,‌ शनि देव के विग्रहों को स्त्रियां छू सकती है या नहीं ??

श्री महाराज जी के द्वारा समन्वय तथा समाधान पर आधारित लेख :- 
इस बात पर आज बहस है कि हनुमान जी को ,‌ शनि देव के विग्रहों को स्त्रियां छू सकती है या नहीं ??
श्री महाराज जी ने एक साधक के ऐसे हीं प्रश्नों का उत्तर देते हुए समाधान दिए थे तथा समन्वय किये थे ।
देखिए एक है भक्ति मार्ग जहां कोई नियम और निषेध नहीं है वहीं कर्मकांड यानि पुजा पाठ यज्ञ हवन आदि में बहुत से कड़े कड़े नियम और बड़े बड़े निषेध है जिसका पालन आवश्यक है । नियम का उलंघन हुआ , दंड मिलेगा । 
नंबर दो - भक्ति मार्ग में जीव स्वयं को आत्मा मानता है देह नहीं , अब तत्वज्ञान कि दृष्टि से आत्मा न पुरूष है , न स्त्री और न नपुंसक । 
अत: भक्ति मार्ग से जाने वाले किसी भी जीव पर कर्मकांड मार्ग के किसी भी नियमों और निषेधों को मानने तथा पालन करने की कोई आवश्यकता नहीं है । 
भक्ति मार्ग के जीव को केवल भक्ति मार्ग के एक हीं नियम का पालन करना होता है कि वो आत्मा है, देह नहीं और हमेशा अपने ईष्ट में हीं मन को समर्पित करना है यानि अपने गुरू और ईष्ट की हीं शरणागति करनी है , सेवा करनी है तथा निषेध यह है कि अपने ईष्ट और गुरू को एक पल के लिए भी नहीं भुलना है एवं अनन्यता का पालन करना है और कुछ नहीं । 

तो सिद्ध होता है कि भक्ति मार्ग के जीव चाहे वो स्त्री हो या पुरूष या नपुंसक सभी को अपने ईष्ट के विग्रह को छुने से , उनकी सेवा करने से कोई मनाहीं नहीं है वेदांत में । 

लेकिन अगर कोई पुजा , पाठी , जपी तपी , यज्ञ हवन, आदि कर्म कांड मार्ग को अपनाता है तो उसको कर्मकांड संबंधित बड़े बड़े तथा कड़े कड़े नियमों का पालन आवश्य करना होगा । 
इस प्रकार कर्मकांड मार्ग के जीव को अगर कर्मकांड मार्ग के सभी नियमों और निषेधों को मानना परम आवश्यक है । अत: कर्मकांड मार्ग में शरीर अगर स्त्री है तो उसको श्री हनुमान जी के विग्रह को छुना बिधि निषेध के अंतर्गत आता है । 

कर्म कांड मार्ग में कोई स्त्री अगर हनुमान जी , शनि देवता आदि के मंदिर में जाकर उनके विग्रह को छूती है तो उसे इस अपराध का दंड मिलेगा , कर्मकांड के कर्म बिधिनिषेध के कानून के अनुसार । 

वेदों में एक लाख श्लोक है इसमें से अस्सी हजार कर्म कांड , ज्ञान योग , कर्म धर्म आदि के बारे में है , इसके नियम और निषेध आदि है पुराणों में जिसे किसी भी कर्मकांडी को मानना आवश्यक है । 

और केवल बीस हजार श्लोक वेद वेदांतों में भक्ति मार्ग का है जिसमें तत्वज्ञान है । इसमें कोई नियम निषेध है । 
हालांकि प्रत्येक जीव भक्ति मार्ग का अधिकारी है चाहे वो स्त्री हो या पुरुष या नंपुसक। इस मार्ग के जीव पर कर्मकांड मार्ग का कोई भी नियम और निषेध लागु नहीं होता है । भक्ति मार्ग का अनुसरण करने वाला चाहे वो स्त्री हो , पुरूष हो या नपुंसक वो अपने ईष्ट के विग्रह को छू सकता है , उनकी सेवा कर सकता है सकती है ।
झगड़ा खत्म । 
श्री राधे ।:- संजीव कुमार 

महिलाओं को हनुमान चालिसा पढ़ना वर्जित है या पढ़ सकती है ?

महिलाओं  को हनुमान चालिसा पढ़ना वर्जित है या पढ़ सकती है ?
देखिए किसी भी बात को समझने के लिए तत्वज्ञान पक्का होना चाहिए तथा उस बिषय पर गहराई से चिंतन करिए । आपको ज़बाब स्वत: मिल जाएगा अगर आप सिरियस साधक हैं तो । 
अब आप मेरा उत्तर जानने से पहले आप मुझे बतलाए कि हनुमान चालीसा के लेखक कौन है ? 
आपने उत्तर दिया तुलसीदास जी , बहुत बढ़िया । यानि आप जानते हैं कि हनुमान चालीसा का लेखक तुलसीदास जी है ।

अब आप स्वयं से चिंतन में यह पुछिए कि
 तुलसीदास जी कौन से मार्ग के उपासक हैं ? 
आपको उत्तर मिला भक्ति मार्ग के यानि दास भाव भक्ति के उपासक है तुलसीदास जी । बहुत बढ़िया । यानि इसका भी उत्तर आप सही सही जानते हैं । 

अब आप यह बतलाए कि तुलसीदास जी ने अपना गुरू किनको माना था ? 
आपने उत्तर दिया :- हनुमान जी को , भेरी गुड । यानि यह भी आपको पता है । 

अब आप खुद से यह प्रश्न करिए कि हनुमान चलीसा में क्या है ? 

तो आपने उत्तर दिया - हनुमान जी के रूप गुण लीला , कृति , यश का वर्णन है , बहुत बढ़िया । यानि अब आप यहां तक जान गई चिंतन के द्वारा कि जब भक्ति मार्ग का उपासक जब भगवान के या अपने गुरू के रूप गुण , लीला यश कृति का गुण गाता है तो वो कौन से मार्ग का अनुसरण करता है ?

आपने उत्तर दिया :- भक्ति मार्ग का , क्योंकि अपने गुरू या ईष्ट या दोनो के रूप गुण लीला यश , कृति का गुण गान करना भजन करना सब भक्ति है । कर्मकांड नहीं ।‌
अब आप श्री महाराज जी द्वारा दिया गया तत्वज्ञान अप्लाई करें यहां कि भक्ति मार्ग में कोई नियम निषेध , कायदा कानून , देश 
काल , धर्म योग्यता , अधिकारित्व की कोई बंदिश और आवश्यकता नहीं है । 

अब आपको स्पष्ट हो गया कि भक्ति मार्ग के उपासक के लिखे पद् भजन कीर्तन चालिसा आदि कर्मकांड नहीं है इसलिए इसे पुरूष , स्त्री , नपुंसक या कोई भी उनका रूपध्यान करके गा सकता है पुकार सकता है । 

एक और उदाहरण :- आदि जगद्गुरु शकंराचार्य जी संन्यास मार्ग का अनुसरण किये थे और दुनिया के लिए एक पक्षीय अद्वैत सिद्धांत का प्रति पादन किए थे । जिसमें बहुत से नियम निषेध कायदा कानून है जो उस मार्ग की साधना करने वाले पर लागु होते हैं ।

पर स्वयं तथा उनकी मां सगुण साकार ब्रह्म श्री कृष्ण का भक्ति किए और वो कुछ भक्ति पद रचे जो हमलोग अपने साधना में गाते हैं भगवान का रूपध्यान करने के लिए और यह हमारे श्री महाराज जी के सभी आश्रमों में भी गाया जाता है दैनिक प्रार्थना में । 

" यमुनानिकटतटस्थितवृन्दावनकानने महारम्ये |
कल्पद्रुमतलभूमौ चरणं चरणोपरिस्थाप्य ||
तिष्ठतं घननीलं स्वतेजसा भासयन्तमिह विश्वम् |
पीताम्बरपरिधानं चन्दनकर्पूरलिप्तसर्वांगम् ||
आकर्णपूर्णनेत्रं कुण्डलयुगमंडितश्रवणम् |
मंदस्मितमुखकमलं सकौस्तुभोदारमणिहारम् ||
वलयांगुलीयकाधानुज्ज्वलयन्तं स्वलंकारान् |
गलविलुलितवनमालं स्वतेजसापास्तकलिकालम् ||
गुंजारवालिकलितमं गुंजापुंजान्विते शिरसि |
भुंजानं सह गोपै: कुंजांतर्वर्तिनं नमत ||
मन्दारपुष्पवासित मंदानिलसेवित परानन्दम् |
मन्दाकिनीयुतपदं नमत महानन्ददं महापुरुषम् ||
सुरभीकृतदिग्वलयं सुरभिशतैरावृत: परित: |
सुरभीतिक्षपणमहासुरभीमं यादवं नमत ||

अत: कहने का तात्पर्य यह कि हम केवल भक्ति मार्ग के अनुकूल पद को हीं अपनाते हैं लेकिन अन्य मार्ग का नहीं ।
तो सिद्ध हुआ की तुलसीदास, सुरदास , रै दास , रविदास , मीरा आदि भक्ति मार्ग के भजन कीर्तन को कोई भी जीव गाने का अधिकारी है । 
लेकिन अगर आप किसी कर्मकांड मार्ग के महापुरुषों के मार्ग को अपनाते हैं तो वहां का कर्मकांड संबंधित नियम निषेधों , कायदा , कानून अधिकारित्व का पालन करना होगा । 

देखिये अगर आप श्री महाराज के अनुयाई हैं तो अंत में यही प्रार्थना करना चाहुंगा की हमे हर रोज कम से कम दो घंटा रूपध्यान करते हुए एकांत में उनके लिखे प्रेम रस मदिरा में सिद्धांत माधुरी , रूप माधुरी , लीला माधुरी , दैन्य भाव वाला कीर्तन भजन के साथ करने पर विशेष बल तथा खाली समय में केवल उनके लिखे सिद्धांतों पर चिंतन मनन गहराई से प्रतिदिन करना चाहिए।
अगर ऐसा करते हैं तो हमारे आपके हरेक प्रश्नों का समाधान श्री महाराज जी चिंतन के माध्यम से हमारे मस्तिष्क में उत्तर के रूप में स्वयं प्रकाशित कर देतें हैं , बिषय कोई भी हो वो डाईरेक्ट आज भी अपने साधकों के प्रश्नों का उत्तर स्वयं दे देते हैं और भूले हुए सिद्धांतों को हमारे मस्तिष्क में उभार भी देते हैं । 
कमी हमारे में हैं जो ऐसा नहीं करते वो भटक जाते हैं भूल जाते हैं । जितना अधिक रूपध्यान साधना आप करेंगें , जितना अधिक तत्वज्ञान पर , सिद्धांत ज्ञान पर चिंतन करेंगे उतना अधिक गुरू का मार्गदर्शन , उनका कृपा , उनके प्रेम की अनुभूति आपको होगी । 
कोई नया जिज्ञासु जिज्ञासा भाव से कोई प्रश्न पुछेगा तो आप श्री महाराज जी के हीं कृपा बल से ठीक ठीक उत्तर दे सकेंगे और उन्हें भी श्री महाराज जी से जोर सकेंगे । 
मानिए मेरी बात एक बार और अगर नहीं तो हमेशा कन्फ्यूजन होगा , हरेक बिषय में । 
श्री राधे ।

प्रश्न :- महाराज जी किसी साधक को भगवद्‌ प्राप्ति हो चुका है यह हम कैसे जान सकते हैं ?

प्रश्न :- महाराज जी किसी साधक को भगवद्‌ प्राप्ति हो चुका है यह हम कैसे जान सकते हैं ? 

श्री महाराज जी :- तुमलोग नहीं जान सकते इस बात को , नहीं पकड़ सकते । क्योंकि भगवद् प्राप्ति के बाद वो इस बात को छुपाता है संसार से और अपने सारे संसारिक कार्य शरीर संबंधी पूर्ववत करता रहता है जब तक उसकी आयु शेष है ।
लेकिन उसका गुरू जानता है । संसार में जिस जीव को भगवद् प्राप्ति हो जाती है वो इस बात को प्रकट नहीं करता किसी से । गोपनीयता का पालन करता है । 
वो शांत हो जाता है , आनंद में डूब जाता है। उसकी सभी संसारिक कामनाए समाप्त हो जाती है अंदर हीं अंदर । 

एक घड़ा है , खाली है जब उसको तालाब में पानी में डूबाते हैं तो वो आवाज करता है भक भक भक भक भक , और फिर शांत , पानी भर गया उसमें , इसीलिए पानी में डूब जाता है वो , अब आवाज नहीं करेगा कभी क्योंकि उसके अंदर की सारी हवा बाहर निकल गई और उसमें पानी भर चुका । पानी भरने के बाद वो तालाब में डूब गया ।
जबतक खाली था , उसमें हवा भरा था तब तक वो आवाज कर रहा था , लेकिन अब आवाज नहीं करेगा वो । विल्कूल शांत । 

उसी प्रकार जिसको भगवद् प्राप्ति हो चुकी इसका मतलव उसके अंतःकरण की सारी गंदगी निकल गई , अंत:करण शूद्ध हो गया, तथा उसको दिव्यानंद मिल गया अपने गुरू से । 
उसकी संसार संबंधी सभी भौतिक कामनाएं समाप्त हो चुकि और भगवान संबंधित दिव्य बस्तूएं मिल चुका । अब वो नहीं बोलेगा उस भरे हुए घरे के समान । अब उसका बोलना बंद , अब वो शांत हो चुका , तृप्त हो चुका । संतुष्ट हो चुका । 

अब वो खूद को छुपाएगा संसार से । तथा जितनी आयु शेष है, उसमें वो केवल अपना शरीर संबधित आवश्यक कर्म करेगा , लेकिन भीतर से दिव्यानंद में डूबा रहेगा हमेशा । 
इसलिए आप लोग उसको नहीं पकड़ सकते । कोई महापुरुष हीं जान सकता है उसको , और गुरू तो जानता हीं है क्योंकि गुरू के द्वारा हीं उसको दिव्यानंद मिला है । लेकिन गुरू भी नहीं बताएगा संसार को कि इसको भगवद् प्राप्ति करा चुका है । महापुरूष और गुरू भी उसके गोपनीयता की रक्षा करता है । 
:- श्री महाराज जी ।

सीनियर जुनियर का फिलिंग भक्ति मार्ग में बहुत बड़ा अवरोधक है । श्री महाराज जी ने हमें यह आदेश दिया है कि हरेक को सम्मान दो , चाहे कोई उम्र में भी छोटा बड़ा क्यों न हो ।

तीनों दीदी जी से ने भी स्पष्ट रूप से कहिन है कि यह सीनियर जुनियर का फिलिंग भक्ति मार्ग में बहुत बड़ा अवरोधक है । 
श्री महाराज जी ने हमें यह आदेश दिया है कि हरेक को सम्मान दो , चाहे कोई उम्र में भी छोटा बड़ा क्यों न हो । 

इसलिए श्री महाराज जी का सिद्धांत है सबकों , भईया तथा दीदी हीं बोलना है वो भी दीनता के साथ , चाहे वो उम्र में हमसे छोटा हीं क्यों न हो । और हम लोग आप लोग‌ सभी लोग इस आदेश को निभाते हैं । 
प्रह्लाद, ध्रूव तो उम्र में छोटा था , इतना छोटा कि उस उम्र का बच्चा इस कलयुग में पहले कक्षा का भी विद्यार्थी नहीं होगा । लेकिन उन्होंने भगवद् प्राप्ति छोटी सी उम्र में ही कर ली । 
तो यह साबित होता है कि भक्ति मार्ग में सीनियर जुनियर का कोई मतलव नहीं । 
एक छोटा बच्चा भी शरणागत होकर गुरू कृपा से एक दिन में वहां पहुंच सकता है या बहुत पहुंचा है , इतिहास गवाह है , जैसे मधुप , जैसे नचिकेता आदि जहां पहुंचना बड़े बड़े के लिए असंभव हो जाता है । तथा भवगद् प्राप्ति तक कर लेता है जीव छोटी सी उम्र में । 

अगर किसी को यह अभिमान हो जाए कि हम तो बहुत दिन श्री महाराज जी के साथ बिताए बचपन से हीं , हमारा उम्र बीत गया उनके साथ रहते और सेवा करते , तो उससे बड़ा नामापराधी कोई नहीं , यह श्री महाराज जी का कहा हुआ है । इसी अहंकार के कारण वो कुछ भी हासिल नहीं कर पाता है । जहां था वहीं रहता है । 

भक्ति में तो कोई आज भी अभी श्री महाराज जी के चरणों में मन लगा दें , सेंट प्रसेंट शरणागत हो जाए उनका तो वो वहां पहुंच सकता है जहां पहुंचना हमारे लिए मुश्किल है ।‌

दूसरी बात किसी साधक के बाहरी आचरण से हम उसके अंदर कि स्थिति कभी नहीं जान सकते कि वो क्या है, कहां पहुंचा है , क्या पाया है ? इसलिए भी हमें हमेशा सतर्क रहने के लिए श्री महराज जी का आदेश है । 
श्री महाराज जी ने स्वयं कहा है कि महापुरुषों के व्यवहार को देख कर मत यह अनुमान लगाओ कि वो उसकी तरफ देखते हैं , उसके गाल में बहुत प्यार करते हैं , उसके यहां अधिक आते जाते हैं या थे और हमारे यहां नहीं आएं । या हमारी तरफ कभी नहीं देखे तो इसका मतलब वो उस पर अधिक कृपा किए हैं । और हमारे उपर नहीं ।

 महापुरुषों का व्यवहार हमेशा उल्टा होता है। वो देखते हैं किसी और को, और कृपा कर देते हैं दुर गांव और शहर में वैठे ऐसे जीव पर जो वहीं से उनको व्याकूल होकर पुकारता है । वो शरीर से यहां है पर सूक्ष्म रूप में अपने शरणागत के पास तुरंत पहुंच जाते हैं उसके ह्रदय में । 

वो कभी कभी अपने से दुर बैठे शिष्य के तरफ देखते तक नहीं , उसके परीक्षा के लिए कि देखें तो सही इसको इग्नोर करके कि फिर भी इसका प्रेम मेरे प्रति बढ़ता है या मुरझा जाता है ‌। 

वो कहते हैं कि महापुरूष तो देखते हैं इसको और कृपा करते हैं उस पर जिसके तरफ देखते तक नहीं । इसलिए शरणागत को कभी यह नहीं सोंचना चाहिए कि उसके तरफ अधिक देखते हैं और हमारे तरफ नहीं तो वो हमसे प्यार नहीं करते ? 

जिस व्यक्ति को यह फिलिंग या अहंकार हो गया कि मैं श्री महाराज जी का सबसे बड़ा तथा पुराना सेवक तथा नजदीकी रहा हुं , बहुत सेवा किया है , तो वो तो गया उसी क्षण । 
आज से कुछ महीने पहले एक पचपन साल की दीदी थी कोई कानपुर कि वो मुझे भला बुरा इसलिए बोली कि वो श्री महाराज जी के एक ग्रुप में गीता पर लिखा अपना फिलोसॉफी डालना चाहती थी , मैंने मना कर दिया था । वो बहुत फायर हो गई मुझ पर , मुझे बहुत खड़ी खोटी सुनाई , यह बोल के श्री महाराज जी के साथ बचपन से खेली है और श्री महाराज उनके यहां हीं अधिक रहते थे । श्री महाराज जी उनके साथ हीं खेलते थे और उनके माता पिता श्री महाराज जी के लिए सबसे अधिक किए हैं , उनका फेमिली बहुत स्कौलर तथा ऊंचे ऊंचे पदों पर हैं । इसलिए वो मुझे लिखी कि "मैं उनके सामने जीरो हुं । मेरा तो कोई हैसियत नहीं है उस दीदी के परिवार के सामने । जिसे मैं तो स्वीकार दिल से कर लिया कि सचमुच मेरी कोई हैसियत वास्तव में नहीं है । माफी मांग कर अलग हो गया मैं उनसे । 
तब से मैं हैसियत वालों से दुर ही रहना पसंद करता हुं , ऐसे लोगों को हमारे कारण कोई दुख न हो , इसका ध्यान रहता है मुझे हमेशा । बड़े लोगो के सामने हम जैसे लोगों का कोई मोल नहीं है और होना भी नहीं चाहिए।। क्योंकि यह तो स्वाभाविक है कि हम सम्मान के लायक नहीं है उनके सामने तो भला कोई हमें क्यों सम्मान देगा , देना भी नहीं चाहिए , यह मैं ह्रदय में रियलाईजेशन हमेशा करके रखता हुं । सत्य को स्वीकार करने में देर नहीं करना चाहिए। 
न मेरे पास गला है , न रूप है न ज्ञान , न कोई दैविक गुण है और न कोई संसारिक धन और न दिव्य वस्तू हीं , तो मैं भला अपने निम्न हैसियत को क्यों न स्वीकार कर लूं इमानदारी से ?

खैर हमें स्वयं के भावना को देखना है दुसरा कुछ भी करे , भगवान और श्री महाराज जी सब पर अपना कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं । सब उनके हीं बच्चे हैं । और मां बाप को तो हमारे जैसा गड़बड़ बच्चे की अधिक चिंता रहती है । जो बन गया उनकी कृपा से उस पर उनको अधिक ध्यान देने कि कोई आवश्यकता नहीं परती है । हम लोग तो हर तरीके से गड़बड़ है अंदर से , उनको हमारे उपर अधिक मेहनत करना परता है । काश कि हम उनके लायक जल्दी बन जाते। श्री महाराज जी और राधा रानी का कृपा सदा सबहीं पर । श्री राधे ।।

आध्यात्मिक शक्ति , अष्ट सिद्धियां और नव‌निधि कौन कौन से होते हैं ?

 आध्यात्मिक शक्ति , अष्ट सिद्धियां और नव‌निधि कौन कौन से होते हैं ? जो नित्य सिद्ध , साधन सिद्ध आदि महापुरुषों के सामने हाथ जोड़े , उनकी सेवा करने के लिए हमेशा ऊपस्थित रहतें हैं ।लेकिन वास्तविक संत , महापुरुष, अपने इस शक्ति का प्रदर्शन नहीं करतें हैं संसार में कभी ।
हनुमान जी को यह सारी सिद्धियां मिली हुई थी जिसका उपयोग वो भगवान राम के सेवा के लिए हीं किए हमेशा । और हरि जनों के रक्षा के लिए करतें हैं ।
हनुमान जी अपने इन सिद्धियों का दुरूपयोग संसार में किसी भी अनाधिकारी जीव को बिना अच्छे कर्म किए खडाब प्रार्बध को , भाग्य को बदलने के लिए नहीं किए । लेकिन आज कल कुछ लोग उनके नाम पर लाखों लोगों के भाग्य को झूठा आशीर्वाद देकर बदलने के लिए कर रहे हैं जो घृणित है । 

आठों सिद्धियां और नौ निधियां ए हैं ।
 
1.) अणिमा- जिससे साधक किसी को दिखाई नहीं पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ में प्रवेश कर जाता है जैसे तल , अतल , वितल, सुतल, तलातल और पाताल आदि तक । और किसी भी जीव के शरीर में भी प्रवेश कर जाता है । कठोर से कठोर बन जाता है । 
2.) महिमा- जिसमें योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है। जितना बड़ा बनाना चाहें उतना ।
3.) गरिमा- जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है। कैसी भी भारी बस्तु को उठा सकता है । पेड़ पहाड़ आदि भी उखाड़ सकता है । हाथी को अंतरिक्ष तक फेंक सकता है ।
4.) लघिमा- जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है। अनेकों रूप धारण कर सकता है । 
5.) प्राप्ति- जिससे इच्छित माईक पदार्थ की प्राप्ति कर लेता है ।
6.) प्राकाम्य- जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी में समा सकता है, आकाश में उड़ सकता है। पानी पर चल सकता है । अंतरिक्ष में उड़ सकता है । किसी भी ग्रह पर जा सकता है ।
7.) ईशित्व- जिससे सब पर शासन का सामर्थ्य हो जाता है।
8.) वशित्व- जिससे दूसरों को वश में किया जाता है। दूसरे के मन की बात जान लेना आदि ।

ये हैं नवनिधियां -
1. पद्म निधि, 2. महापद्म निधि, 3. नील निधि, 4. मुकुंद निधि, 5. नंद निधि, 6. मकर निधि, 7. कच्छप निधि, 8. शंख निधि और 9. खर्व या मिश्र निधि। माना जाता है कि नव निधियों में केवल खर्व निधि को छोड़कर शेष 8 निधियां पद्मिनी नामक विद्या के सिद्ध होने पर प्राप्त हो जाती हैं, लेकिन इन्हें प्राप्त करना इतना भी सरल नहीं है।
श्री राधे । पद्मिनी नामक विद्या, चौंसठ योगिनी में से एक योगिनी विद्या , पद्मिनी योगिनी साधना से मिलती है । यह साधना भारत में स्थित तीन शक्ति पीठ , १. कामरूपकामख्या मंदीर के क्षेत्र , मालेगांव , गोहाटी , असम २. मां तारापीठ , प. वंगाल तथा , ३. मां रजरप्पा शक्ति पीठ , झारखंड में की जाती है ।

प्रेम दिले मगरूर को भी दिवाना बना देता है ,

प्रेम दिले मगरूर को भी दिवाना बना देता है ,
मुझ जैसे पत्थरों को भी शायराना बना देता है ,
महफिलों में रंग भरने के लिए 
मयखाने के बुत को भी आशिकाना बना देता है,
प्रेम वो शय है जो साकी को भी पैमाना बना देता है ,
टूट जाते हैं कसमें जहान की सारी , उनकी दिव्य आंखें इतना मस्ताना बना देता है ।‌।
:- अभी का रचना । संजीव

भगवान को भक्त के लिए पृथ्वी पर अवतार लेने कि आवश्यकता क्यों हैं ?

प्रश्न :- भगवान को भक्त के लिए पृथ्वी पर अवतार लेने कि आवश्यकता क्यों हैं ?
 आपके प्रश्न का उत्तर :- भगवान को भी अपने भोले भाले ऐश्वर्य रहित, ज्ञान रहित भक्तों के निष्काम प्रेम रस को पीने कि इच्छा बनी रहती है सदा । 
भाव भक्ति के इसी रस के पान के लिए वो मानव शरीर धर कर पृथ्वी पर अपने निष्काम भोले भाले भक्तों के बीच आते रहते हैं । 

उदाहरण :- जैसे संसार में प्रत्येक मां बाप को भी अपने भोले भाले शिशु के शैशव काल के भोले भाले स्वाभाविक प्रेम को प्राप्त करने तथा अपने शिशु को अपने मातृत्व का सुख देने कि अभिलाषा होती है हमेशा । जब वही बच्चा बड़ा हो जाता है तो वो पढलिख कर भौतिक ज्ञान ऐश्वर्य से युक्त हो जाता है , वो शिशु के समान भोला नहीं रहता । 
अत: मां बाप से उसे वैसा भोलापन युक्त प्रेम नहीं रहता जैसे उसके शैशव काल में था । तोतली बोली , कोमलता , मृदु स्वभाव , भोलापन आदि नहीं रहता । 

उसी प्रकार भगवान में भी अपने अंश रूपी मानव भक्तो के निष्काम प्रेम को प्राप्त करने कि प्यास वलवती हो जाती है जिसे परकिया भाव का प्रेम कहते हैं , यह प्रेम उन्हें उनके दिव्य लोक में नहीं मिल सकता है । 
क्योंकि वहां जो जीव पहुंच जाता है वो दिव्य ज्ञान , दिव्य ऐश्वर्य तथा दिव्य भाव से भर जाता है प्रेम का स्वरूप दिव्य हो जाता है । 
लेकिन जो जीव माया लोक में गुरू कृपा द्वारा भगवान से प्रेम करने के लिए प्रेरित होता है तो वो भगवान को अच्छा लगता है क्योंकि यह दीनता , नम्रता , अहंकार शून्यता , ऐश्वर्य रहित, ज्ञान रहित तथा भक्तों के भोला पन युक्त प्रेम भाव से भरा होता है ।
अत: ऐसे ही भाव भक्ति पूर्ण भोला भाले भक्तों के प्रेम भाव युक्त रस को पाने के लिए तथा अपना प्रेम देने के लिए भगवान नर देह धारण करके आते हैं धरा धाम पर । 

 पृथ्वी पर आकर भगवान योग माया द्वारा अपने भगवत्ता को भुला देते हैं और भक्त भी उनको भगवान न मान कर अपना पुत्र तो सखा या अनेकों संबंध से जानता है‌, ( अगर यशोदा मईया जान जाती कि यह भगवान हैं तो वो‌ वात्सल्य सुख पाने‌ तथा उन्हें मातृत्व सुख प्रदान करने से वंचित हो जाती ) इस प्रकार वो किसी भक्त का पुत्र तो किसी का सखा किसी का प्रेमास्पद् तो किसी का दास बन उनको वात्सल्य सुख , मित्र सुख आनंद , किसी को अपना गुरू बना कर उसे शिष्य सुख प्रदान करते हैं और उनसे वैसा ही मातृत्व सुख हासिल करते हैं । जैसे यशोदा और नंद बाबा से मां बाप का मातृत्व सुख , गोपियों से निष्काम प्रेमिका वाला सुख , गुरू से उनका अनुयायी वाले भाव का सुख , मनसुख सुदामा आदि से मित्रता वाला सुख आदि प्राप्ति करते हैं ।‌ ऐसा सुख उनको गोलक में नहीं मिल सकता , इसलिए वो नर देह में आते हैं अपने अंशो के बीच धरा धाम पर । श्री राधे ।
भगवान का अवतार राक्षसों के विनाश के लिए नहीं होता, वल्कि उनका अवतार अपने भक्तों के उद्धार के लिए होता है । प्रेमी जनों के प्रेम को स्वीकार करने तथा उन्हे अपना प्रेम देने के लिए भगवान का नर देह में अवतार होता है इस धरा धाम पर , और इसी क्रम में राक्षसों का विनाश भी हो जाता है लगे हाथों उनके द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनके रहते , क्योंकि भगवान सभी प्रकार के निर्दोष जीवों का, निराबलम्बी जीवों का भी अवलंब होते हैं । अत: उनके कष्टों का निवारण भी वो करते हैं अपने प्रेमी जनों के साथ साथ ।

लेकिन जब उनका आना नहीं होता है इस धरा धाम पर तो उस समय भी वो दुष्टों का , अत्याचारियों का तथा छल बल वाले एवं राक्षस प्रवृत्ति वाले जीवों के अतिशय अत्याचार को समाप्त करने के लिए एवं पृथ्वी पर संतुलन बनाए रखने के लिए वे किसी भी जीव चाहे वो राक्षस हो या मनुष्य या तो पशु हो या बृक्ष हो , असाध्य रोग या प्राकृतिक आपदा , या अकस्मात दुर्घटना आदि के माध्यम का उपयोग करते रहते हैं समय समय पर ।

यानि जब जब धर्म कि हानि होती है तब तब वो अनेकों अप्रत्यक्ष या परोक्ष तरीकों का इस्तेमाल करते रहते हैं दुष्टों के संहार के लिए पृथ्वी पर , जरूरी नहीं कि वो स्वयं आ हीं जाए । वो तो सत्य संकल्प हैं किसी न किसी माध्यम से या किसी को भी माध्यम बना कर वो दुष्टों का संहार कर हीं देते हैं । जिसे समझना हम साधारण लोगों के वश कि बात नहीं है। 

उनको मनुष्यों के द्वारा बनाए गए किसी भी देशों के संविधान से कोई मतलव नहीं है । 
मनुष्यों के द्वारा बनाया गया संविधान दोष रहित नहीं होता , न ही पुंदोष और ना ही निष्कलंक होता है और न निष्पक्ष । 
मनुष्यों के द्वारा बनाए गए संविधान में तो अनेकों त्रूटियां , पक्षपातपूर्ण कानून तथा कुछ लोगो के द्वारा बहुमत से अपने सुविधा के अनुसार बदल लेने वाला एक अक्षम अस्थाई अपूर्ण व्यवस्था है । 

लेकिन भगवान का विधान ( वेद- शास्त्र उपनिषद आदि) तो सनातन है , पुंदोष है तथा निष्कलंक एवं निष्पक्ष है सदा से । 

अत: मनुष्य को पाप करते समय , निर्दोषों को सताने वाले, अन्याय करने वाले जीव को एवं अन्य किसी भी संसारिक सत्ता तथा बल के नशे में अंधे हो चुके दुराचारी मनुष्य को ही नहीं वल्कि इनका सहभागी जीव को एवं इनका पक्ष लेने वाले को भी कभी यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्यों के द्वारा बनाए गए किसी भी देश के संविधान के त्रूटियों का सहारा लेकर , नजायज फायदा उठा कर वो थोड़ी देर के लिए बच सकतें है लेकिन भगवान के बनाए संविधान से वो नहीं बच सकते है कभी , अंतत्वोगत्वा फैसला उपर से हो हीं जाता है । 

क्योंकि आखिरी और सबसे बड़ा अंतिम फैसला तो भगवान के संविधान से हीं होता है जीवों का । इस बात का रियलाईजेशन जिस मनुष्य को हो गया वो फिर कभी कोई पाप नहीं करेगा धरा धाम पर । 
अन्यथा केवल पुजा पाठ यज्ञ जप तप उपवास गंगा स्नान आदि से पाप नहीं मिटते कभी , भगवान खुश नहीं होते कभी। 

जीव का आचरण कैसा है यह बहुत महत्वपूर्ण है । जीव का आचरण , व्यवहार, चरित्र, सोंच , संकल्प तथा मन की शूद्धता परमावश्यक है । 
अन्यथा जप तप व्रत उपवास पुजा यज्ञ तीर्थ विरथ गंगा स्नान जप दान आदि से कभी कोई लाभ नहीं होता कलयुग में । 
अंत करण की शूद्धि परमावश्यक है । 
जो मनुष्य इन बातों को या तो जानते नहीं या जानने के बाद भी स्वीकार करके अपने संकल्प और आचरण को नहीं बदलते , भगवान के विधान के अनुकूल नहीं होते वो अपने ही मन के दुष्टता , दुर्वलता , ईर्ष्या, द्वेष घृणा के अग्नि में जल कर नष्ट हो जाते हैं यह भगवान का विधान है । 
श्री राधे ।  
श्री राधे । श्री राधे।
:- गुरू प्रदत तत्वज्ञान से ।- संजीव कुमार