Tuesday, 24 October 2023

संसार में अधिकतर जीव स्वयं को अच्छा और दुसरे को गलत समझता है, यहां तक कि वो महापुरुष और भगवान पर भी सवाल खड़ा करता है , ऐसा क्यों ?

पूज्यनीयां रासेश्वरी देवी जी से एक साधक का प्रश्न:- संसार में अधिकतर जीव स्वयं को अच्छा और दुसरे को गलत समझता है, यहां तक कि वो महापुरुष और भगवान पर भी सवाल खड़ा करता है , ऐसा क्यों ?
उत्तर :- क्योंकि वो स्वयं बुरा होता है ।
" यावत् पापैस्तू मलिनम , ह्रदय्ं तावदेव हि,
न शास्त्रे सत्यता बुद्धि: सद्बुद्धि सद्गुरौ तथा।।"
:-  ( ब्रह्मवैर्वत पुराण ) " 

जिसका मन बुद्धि चित्त जितना गंदा होता है , वो उतना ही बुरा सोंचता है , बोलता है , और करता है और सुनना पसंद करता है । 
 मनुष्य अपने ही गंदे चित्त के कारण , गंदे मन के कारण , गंदे चिंतन के कारण दुसरे के बारे में गलत आईडिया लगा लेता है । दरअसल दुसरे में उसकी खूद कि परछाई दिखती है , खूद के अंदर कि गंदगी दिखाई पड़ती है लेकिन वो बेचारा समझता है कि यह बुराई दुसरे में है , मुझमें नहीं । बेचारे का चश्मा गंदा है , धूल पड़ी है उस पर , अब वो दुसरे को देखता है तो उसको दुसरे के चेहरे पर वही धूल नजर आता है , जबकि हकीकत यह है कि उसके चश्मे के शीशे पर हीं धूल है । 

जाकि रही भावना जैसी,‌
प्रभु मुरत देखी तीन तैसी ।। तुलसीदास जी। 

 जिस जीव का मन बुद्धि चित्त जितना दूषित है , उसका नजरिया उतना ही गंदा होता है, और उसी गंदे नजरिए से वो महापुरुष और भगवान के अवतार को भी देखता है तो उसे हर जगह , अपनी ही गंदगी प्रतिबिम्ब होती है । यही वास्तविक कारण है हर किसी में निगेटिव फिलिंग का । 
:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।

Saturday, 21 October 2023

श्री कृपालुजी महाप्रभु कार्तिक मास को भक्त के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों कहा है? उन्होंने साधना के लिए कार्तिक मास को विशेष क्यों माना है ? कार्तिक मास में मनगढ़ धाम में विषेश कर, पुरे मास वो साधना क्यों करवाते थे ?

श्री कृपालुजी महाप्रभु कार्तिक मास को भक्त के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों कहा है? उन्होंने साधना के लिए कार्तिक मास को विशेष क्यों माना है ?
 कार्तिक मास में मनगढ़ धाम में विषेश कर, पुरे मास वो साधना क्यों करवाते थे ? 

आइए जानते हैं भक्तों के लिए , साधकों के लिए कार्तिक मास का महत्व:- 

समस्त युगों में सर्वश्रेष्ठ युग सतयुग कहलाता है, शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ वेद कहलाता है, तो बारह मासों में सर्वश्रेष्ठ मास कार्तिक मास कहलाता है। कार्तिक मास वह मास है, जिसे विजय मास कहते हैं। अर्थात् कार्तिक मास जीवों को विजय प्रदान करता है। कार्तिक मास की बड़ी महिमा है! यह भक्तों को अनंत फल प्रदान करता है। यह भक्तों का मास है। इसे दामोदर मास भी कहते हैं ।

इस मास को विजय मास कहा जाता है। 
क्योंकि इसी मास में कार्तिकेय जी ने नरकासुर का बध किया था। इसी मास में श्री राधाकृष्ण आराधना के फलस्वरूप , सत्यभामा जी तथा लक्ष्मी के अवतार रूक्मिणी जी को भगवान कि पटरानी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था । इसलिए यह विषेश मास , यानी कार्तिक ऑफर मास है ! जैसे बाजार में दिवाली में ऑफर मिलता है न ! सामान्य दिन में हम उसी सामान को बहुत रेट में लेते हैं, लेकिन ऑफर में एक के बदले दो ले लो, चार ले लो! ऐसे ही आप इसको कह सकते हैं ऑफर मास! क्योंकि कार्तिक मास में ही सारे त्योहार हैं, सारी लीलाएँ हैं, जैसे- श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला, दामोदर लीला, ऊखल बंधन लीला, तुलसी विवाह। बहुत-से त्योहार इसी मास में हैं! तो, श्रीराधारानी इस मास की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए यदि इस मास में श्रीराधारानी की उपासना की जाएगी तो अनंत फल प्राप्त होगा, बशर्ते कि मन से की जाए । क्यों? -क्योंकि स्कन्ध पुराण में ऐसा बताया गया है-

दृष्ट्वा भागवतं दैवात् सन्मुखे यो न याति हि। -हरिभक्ति विलास।

अर्थात् यदि आपके सामने कोई भगवत पुरुष या भगवद् शक्ति प्राप्त संत या देव पुरुष हों और उनकी पूजा, आराधना और सेवा न करें, तो उसके विषय में स्कन्द पुराण क्या कह रहा है-

न गृह्णाति हरिस्तस्य पूजां द्वादश वार्षिकीम्।:- हरिभक्ति विलास।

कोई भगवद् तत्व की पूजा-उपासना-सेवा नहीं करता तो ऐसे मनुष्य की पूजा श्रीहरि १२ साल तक ग्रहण नहीं करते। उनके निजजन की सेवा इतनी महत्वपूर्ण है! क्यों? क्योंकि-

आराधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परम्। 
तस्मात् परतरं देवि तदीयानां समर्चनम्।।
- पद्मपुराण

भगवान शंकर पार्वती जी से कह रहे हैं- वैसे तो सबसे श्रेष्ठ आराधना श्री कृष्ण की है( यहां विष्णु शब्द भगवान श्री कृष्ण वा श्री राम के लिय उन्होने कहा है ), लेकिन- 'तस्मात् परतरं देवि।' हे पार्वती! सुनो, जो श्री राधा की आराधना करता है, मैं अपनी आराधना से भी श्रेष्ठ उस आराधना को मानता हूँ।

इस प्रकार इस मास में यदि कोई श्रीराधारानी की उपासना करता है, तो श्रीकृष्ण को विशेष आनंद मिलता है। ऐसे तो हर क्षण उनकी उपासना करनी है, लेकिन कार्तिक मास विशेष की अधिष्ठात्री देवी श्रीराधा हैं और यदि श्रीराधा का ही दिन-रात चिंतन होगा, तो श्रीकृष्ण विभोर होकर हमारी योग्यता-अयोग्यता पर विचार न कर अनंत-अनंत फल प्रदान करते हैं ।

आपको पहले ही बताया जा चुका है कि इस मास को दामोदर मास भी कहा जाता है अर्थात् इस मास में आने वाली दीपावली के दिन ही ऊखल बंधन लीला हुई थी। यशोदा मैया ने भगवान श्रीकृष्ण को माखन चुराते हुए पकड़ा था- 'चौराग्र गण्यं पुरुषं नमामि।' ऐसे हैं परमपुरुष! जिन्होंने माँ यशोदा की अधीनता स्वीकार की और मैया ने उन्हें घसीटते हुए ले जाकर ऊखल से बाँध दिया । दाम माने रस्सी और उदर माने पेट। तो मैया ने ऊखल से लगाकर उनके पेट को रस्सी से बाँध दिया था।

भविष्य पुराण में एक और प्रसंग द्वापर युग के कार्तिक मास का आता है। एक दिन एक कुंज में श्रीराधारानी श्रीकृष्ण की प्रतीक्षा करती हार गईं और उन्हें मान हो आया। जब बहुत विलम्ब के बाद श्रीकृष्ण पधारे तो मानिनी ने कृष्ण के करकमल को पकड़कर कुंज की माधवी लताओं से बाँध दिया। यही कारण है कि वैष्णवजन कार्तिक मास को राधा दामोदर मास भी कहते हैं। सेवाकुंज में जीव गोस्वामी के विग्रह राधा दामोदर उसी के प्रतीक हैं। यह प्रसंग जीव गोस्वामी जी ने बतलाया है, जिसकी चर्चा भविष्य पुराण में है।

युगल उपासक नामग्रहणकारी साधकों की उपासना में श्रीराधा उपासना की प्रधानता है। श्री महाराज जी ने अपने अनुयायियों को विशेष रूप से कहा कि माधुर्यभाव में श्रीराधाकृष्ण की उपासना स्वयं को दास मानकर करनी है। और! उपासना में भी श्रीराधा प्रधान हों। श्रीकृष्ण भी स्वयं ह्लादिनी शक्ति की आधीनता स्वीकार करते हैं। तो, हम लोगों के लिए यह कार्तिक मास बड़ा महत्त्वपूर्ण है।

यही कारण है कि हमारे गुरुवर जगद्गुरु स्वामी श्री कृपालु जी महाराज ने शरद पूर्णिमा से कार्तिक मास तक एक माह का साधना शिविर श्री मनगढ़ धाम (श्री भक्ति धाम) में परम्परागत रूप से रखा है। उन्होंने यह साधना विशेष रूप से स्वयं की उपस्थति में पूर्णतः मौन का पालन करवाते हुए करवायी ताकि मन-वाणी से केवल हरिनाम स्मरण-मनन हो । यह जब से प्रारंभ किया, आज तक चल रहा है और आगे भी चलता रहेगा। उसके पीछे कारण एक ही है कि यह मास विजयी होने का मास है। साधक के लिए प्रेम प्राप्ति हेतु साधना में लगने का मास है। इस समय अनंत फल प्राप्त होते हैं क्योंकि इसकी अधिष्ठात्री देवी श्रीराधा हैं। श्रीराधा तो हैं कृपामयी! दयामयी !! करुणामयी !! वे अपने जनों पर करुणा करने हेतु सदा आतुर रहती हैं, इसलिए वे हमारे क्षुद्र प्रयास पर अपार करुणा करती हैं।

कार्तिक मास संकल्प का मास है। इस समय कार्तिक व्रत होता है। लोग शरद पूर्णिमा से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक कार्तिक व्रत रखते हैं। व्रत से मेरा तात्पर्य भोजन छोड़ना नहीं है। व्रत का अर्थ होता है- संकल्प ! दृढ़ निश्चय !! उस निश्चय के पीछे कुछ शर्तें हैं; जैसे, अल्प खाओ आदि ताकि आलस्य न आए। पर यह सब गौण है। प्रमुख संकल्प है भक्ति! भक्ति के विविध व्रतों में सर्वश्रेष्ठ व्रत दो ही हैं- भगवान की रसमय लीला-कथा का श्रवण-चिन्तन व श्री राधाकृष्ण के नामों का भावयुक्त गुणगान।

'लीलाकथारसनीषेवणमन्तरेण।'
- श्रीमद्भागवत

भागवत लीला रस कथा का पान करने से क्या होगा ?

पुंसो भवेद् विविधदुःखदवार्दितस्य।
- श्रीमद्भागवत

त्रिताप, पंचक्लेश आदि से मुक्ति मिलेगी। हृदय में प्रेम का सिंचन होगा। इसलिए भगवान के लीलामृत, कथामृत, गुणानुवाद का मन से श्रवण और चिंतन करना है। बस ये दो व्रत ही पूरे मास करने हैं। तो गोपियाँ कहती हैं-

तब कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
 श्रवणमंगलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः।
- श्रीमद्भागवत

उनकी कथाओं का श्रवण करो, जो कल्मष का नाश करती हैं। प्रभु विरह का दर्द हृदय को शीतलता प्रदान करता है। तो पहला व्रत है कि हम केवल श्रीकृष्ण की लीला व कथारस का श्रवण-चिंतन-मनन करेंगे। दूसरा व्रत, हम श्री राधाकृष्ण के नामों का भावयुक्त गुणगान करेंगे। मन से भाव बनाएँगे और वाणी से गुणगान करेंगे। गुरुदेव स्वामी श्री कृपालु जी महाराज ने साधना के रूप में यही दो कार्य पूरे मास करवाया ।

तो, कार्तिक मास में आपको क्या करना है? - संसारी चिंतन को हटाकर मन में आध्यात्मिक चिंतन भरना है। वह आध्यात्मिक चिंतन भी क्या करना है? -हरि गुरु संबधित लीला, कथा, नामावली का गुणगान । इस व्रत को धारण करने से अनंत भक्ति का फल प्राप्त होगा। और यदि इस आराधना में श्रीराधा जी की उपासना विशिष्ट रूप में हो, तो बात ही क्या है!

-पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ( पुस्तक - भक्ति रत्नाकर शिक्षाष्टकम्)

Monday, 16 October 2023

प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवया अर्थात् सेवा. ये तीनों क्या हैं?

हमें तीन चीजें करनी होगी - प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवया अर्थात् सेवा. ये तीनों क्या हैं?

- प्रणिपात - अर्थात् शरण होना. तीन 'पात' होते हैं - पात, निपात और प्रणिपात. 'पात' याने खाली अपना चमड़े का सर गुरु के चरणों में पटक देना. 'निपात' याने श्रद्धायुक्त होकर गुरु चरणों में शरणागति करना और 'प्रणिपात' याने मन-बुद्धि युक्त सर्व कामनाओं का त्याग करके गुरु चरणों में शरणागति करना. हमें यही 'प्रणिपात' करना है.

- परिप्रश्न - अर्थात् उनसे श्रद्धायुक्त होकर परम जिज्ञासु भाव से भगवद् विषय पूछना है. इसका अर्थ यह नहीं है कि हम गुरु की परीक्षा लेने के लिए कुछ भी मनमाना प्रश्न करें. गुरु के प्रति आदर भाव रखकर उनसे तत्वज्ञान प्राप्त करना है. बिना तत्वज्ञान के भगवद् राह में आगे नहीं बढ़ा जा सकता है. बिना तत्वज्ञान के भक्ति टिकाऊ नहीं होती, इसलिए गौरांग महाप्रभु जी ने भी कहा कि 'सिद्धांत बलिया चित्ते न कर आलस' अर्थात् तत्वज्ञान प्राप्ति में आलस नहीं करना चाहिए. इस तत्वज्ञान का बार-बार चिंतन करना चाहिए.

- सेवया - अर्थात् हमें गुरु की सेवा करनी है. सार तो यही समझना चाहिए कि 'सेवा' ही सर्वप्रमुख है. यह सेवा भी अपने मन के अनुसार नहीं करनी है. जैसी गुरु आज्ञा दें, वे जैसा कहें, वैसा ही सहर्ष करें. 'आज्ञा सम न सुसाहिब सेवा'. गुरु आज्ञा में बिना किन्तु, परंतु, तर्क, वितर्क, शंका, कुशंका आदि किये सेवा करना है. इसी सेवा से अंतःकरण शुद्ध होगा, और दिव्य प्रेम ग्रहण करने के लिए पात्र तैयार होगा.
हम लोगों को साधकों को सदा यही समझना चाहिये कि हमसे जो अच्छा काम हो रहा है वह गुरु एवं भगवान् की कृपा से ही हो रहा है क्योंकि हम तो अनादिकाल से मायाबद्ध , घोर संसारी , घोर निकृष्ट , गंदे आइडियाज़ ( ideas ) वाले बिल्कुल गन्दगी से भरे हैं। हमसे कोई अच्छा काम हो जाये , भगवान् के लिये एक आँसू निकल जाय , महापुरुष के लिये , एक नाम निकल जाय मुख से , अच्छी भावना पैदा हो जाये उसके प्रति हमारी , यह सब गुरु कृपा से हुआ , यही मानना चाहिये। अगर वे सिद्धांत न बताते , हमको अपना प्यार न देते तो हमारी प्रवृत्ति ही क्यों होती। कभी यह न सोचें कि यह मेरा कमाल है। अन्यथा अहंकार पैदा होगा। अहंकार आया दीनता गई। दीनता गई तो भक्ति का महल ढह गया। सारे दोष भर जायेंगे एक सेकण्ड में इसलिये कोई भी भगवत्सम्बन्धी कार्य हो जाय तो उसको यही समझना चाहिये कि गुरु कृपा है , उसी से हो रहा है ताकि अहंकार न होने पाये। अगर गुरु हमको न मिला होता , उसने हमको न समझाया होता , उसने अपना प्यार - दुलार न दिया होता , आत्मीयता न दी होती तो हम ईश्वर की ओर प्रवृत ही नहीं होते। अतः अन्हीं की कृपा से सब अच्छे कार्य हो रहे हैं, ऐसा मानकर चलो।
- श्री महाराज जी ।

पुरे विश्व में बस एक कानून है , वो है वेद ।

कोई भी धर्मावलम्बी हो , कोई भी मतावलम्बी हो , कोई भी मार्गी हो , कोई भी संप्रदाय हो , कोई भी पंथ हो , किसी भी जाति धर्म वर्ण गोत्रादि में पैदा हुआ हो , किसी भी देश में जन्म हुआ हो , सभी जीव वेद के कानून के अन्तर्गत आतें हैं और सभी का गति, हिसाब किताब आदि , भगवान के एक ही संविधान जो वेद है , जो अनादि है , जो सनातन है, के अनुसार हीं होता है। बस एक कानून है पुरे ब्रह्यांड में , वेद ।।

और यह अनंत काल से है और अनंत काल तक होता रहेगा, कोई बदल नहीं सकता , न मिटा सकता है इसे । 
वेद भगवान से प्रकट दिव्य शास्त्र है । यह सृष्टी के समय भगवान से प्रकट हुआ है , इसको भगवान ने बनाया नहीं , यह उन्हीं से प्रकट हुआ है , इसलिए विनिर्गत ग्रंथ कहलाता है । इसको कोई जीव या महापुरुषों ने नहीं प्रकट किया है या लिखा नहीं है ।

वांकी सभी धर्मों का मूल शास्त्र उस धर्म के प्रवर्तकों के द्वारा लिखा गया है समय समय पर , इसलिए यह कृत ग्रंथ कहलाता है , कृत मतलव बनाबटी , अपने अपने मन बुद्धि के अनुसार अपनी अपनी समझ से लिखा हुआ किताब । 
सभी जीवों का नियमन वेद हीं है और नियामक एक मात्र भगवान श्रीकृष्ण हैं । दूसरी सत्ता पुरे ब्रह्मांड में नहीं है । अगर दुसरी सत्ता होती तो दोनों आपस में टकरा कर समाप्त हो गई होती सृष्टि के पूर्व हीं ।
इसलिए एक मात्र भगवान श्री कृष्ण है और उन्हीं के सब भक्त कह लो , दूत कह लो , एंजल कह लो समय समय पर अनेकों रूपों में आकर काल, क्रम , युग , परिस्थिति , देश ,प्रकृति , वातावरण के अनुसार अपने अपने अनुयायियों को जीने का , मानवता का , धर्म का , कर्म का , योग का , ध्यान का, एवं प्रेम और भक्ति का ज्ञान कराया है ।
किंतु मूढ़ लोग अपना अपना बुद्धि लगा करके अपने समझ के अनूसार अर्थ का अनर्थ करके भोले भाले लोगों को गुमराह किया । इसलिए अनेक धर्म बन गए विश्व में ।
याथार्थ में एक हीं धर्म है पुरे विश्व में - सनातन धर्म , वांकी सभी पंथ है ।और सभी का अंतिम मूल लक्ष्य भगवान की प्राप्ति और सेवा हीं वतलाया गया है । 
वांकी सब अज्ञानता है पंडितों के, मूल्ला के , मोलवियों के , पोप के , अपने अपने निजी बिचार हैं जो कृत ग्रथं है, कृत ग्रंथ दोष युक्त है , क्योंकि लोगों के अपनी अपनी खोपड़ी के भंजन का परिणाम है ।
दस अंधे के सामने एक हाथी खड़ा कर दिया गया और पुछा गया कि बताओ यह क्या है । तो एक ने हांथी के पैर को पकड़ा और कहा ये तो पेंड़ हैं , दूसरा पूंछ को पकड़ा और कहा की नहीं नहीं ये तो रस्सी टंगा है । एक ने सूंढ को पकड़ा , कहा कि नहीं भाई ये तो पानी का पाइप है । एक ने कान को पकड़ा कहा की नहीं ये तो पंखा है । एक ने पेट को पकड़ा और कहा की नहीं ये तो पहाड़ है ।
तो इसी प्रकार अनेक धर्म , संप्रदाय , मतावलम्बी अनेक देशों में पैदा हो गए अलग अलग ।
लेकिन किसी के मानने या न मानने , जानने या ना जानने , स्वीकार करने या न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता है । सभी के उपर वेद का कानून हीं लागु है अनंत काल से, और लागु रहेगा अनंत काल तक , चाहे वो हिंदु हो , मुसलमान हो , सिख हो , इसाई हो , पारसी हो या ताओ हो , कन्फूसियस हो , बौद्ध हो , जैन हो देवी देवता हो गंधर्व हो या किन्नर हो , यक्ष हो , राक्षस हो ,असुर हो या कोई भी हो । 
भगवान और भगवान का कानून एक हीं है हरेक देश , जाति ,धर्म और सम्प्रदाय के लिए । वो ऐसा नहीं है कि भारत के लिए वेद है और अमेरिका के लिए कुछ और , इंग्लैंड के लिए कुछ और हिंदुओं के लिए कुछ और , दुसरे धर्मों के लिए अलग अलग कुछ और । 
ऐसा समझना कि सबके लिए अलग अलग कानून हैं , अलग अलग भगवान है , यह घोर अज्ञानता है । :- श्री कृपालु महाप्रभु जी ।

Thursday, 5 October 2023

सभी साधक जन को सम्मान दो , सभी के साथ सम्मानजनक शब्द का इस्तेमाल करो , किसी को छोटा मत समझो, किसी को दु:ख मत दो , अहंकार मत करो , मिथ्या भाषण मत करो , सबमें तुम्हारे इष्ट है |

श्री महाराज जी का निर्देश :- सभी साधक जन को सम्मान दो , सभी के साथ सम्मानजनक शब्द का इस्तेमाल करो , किसी को छोटा मत समझो, किसी को दु:ख मत दो , अहंकार मत करो , मिथ्या भाषण मत करो , सबमें तुम्हारे इष्ट है | संसार में भी घोर संसारी के साथ भी दुर्भावना ना करो , केवल एकातं साधना के समय ही नही अपितु हमेशा हर पल हरि गुरू के सिद्धान्तों को याद रखें , क्योकि प्रभु का कानुन है 
" सर्वेषु कालेषु मांमनुस्मर युध्द च " 
हरेक समय हरेक में अपने इष्ट को महसुस करो , इसको कहते है कर्मयोग की साधना , 
जैसे हम औफिस जा रहे है | हां ! एक को देख कर मुड खड़ाव हो गया ! 
ये कौन है ? एक सुपरिटेण्डीगं इंजीनियर है , नाम क्या है ? रमेश श्रीवास्तव , धाम क्या है ? वांका वाले है , गुण ? ये बड़ा बदमाश है , परेशान करता है , इसके कारण बहुत मेरा बील अटका परा है , पैसा अटका परा है ! 
तो नाम रमेश श्रीवास्तव, ठीक , धाम - वांका वाले , ठीक , गुण - बड़ा बदमाश है , ठीक | 
परन्तु अरे ये कौन है , ये तो जीव शक्ति है , ये जीव शक्ति के संधिनी अनुभाव के परिणाम है ,
ये जीव शक्ति कौन है ? ये परा शक्ति का वैभव है ! 
ये परा शक्ति कौन है ? ये हमारे इष्ट श्री कृष्ण की शक्ति है | तो इसके पिछे कौन खड़ा है | अरे इसके पिछे तो हमारे प्रियतम खड़े है | 
अरे ये तो हमारे इष्ट सब करा रहे है भाई, हमारी परीक्षा ले रहें हैं , और हम गाली किसको दे रहे है ? 
अरे ये तो गलत हो रहा है | इसमें तो हमारे इष्ट है और हम बुरी भावना किए जा रहे है | 
इस प्रकार हम बुरे भाव से बच जाऐगें और साथ साथ हर पल हमारी साधना भी हमेशा होती जा रही है , इसी को कहते है कर्मयोग की साधना |
 केवल दो घण्टे की साधना करें और वांकी समय पाप करें यह नही चलेगा | हरेक में हर समय हमारे प्रियतम है ! ऐसा हमेशा ही महसुस करें | 
किसी का , किसी का भी , ध्यान दिजिए , किसी का भी अपमान मत करिए , 
कठोर मत बनिए | 
नही तो आपकी दो घण्टे की साधना से कुछ लाभ नही होने बाला | :- श्री महाराज जी 

पुस्तक :- एकांत साधना भाग -३

Tuesday, 3 October 2023

"सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ।लाभ हानि, जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।।"

*विधि का विधान* प्रारब्ध सबको भोगना परता है , भगवान या संत अपने अवतार काल में अपने व्यवहारिक लीला द्वारा अपने लिए ऐसा प्रारब्ध स्वयं बनाकर भोग कर दिखाते हैं कि हमें अपने प्रारब्ध को कैसे भोगना चाहिए ।

भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर किया गया था । फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ ,न ही राज्याभिषेक।

और जब मुनि वशिष्ठ से इसका जवाब मांगा गया ,तो उन्होंने साफ कह दिया।

"सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ।
लाभ हानि, जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।।"

अर्थात जो विधि ने निर्धारित किया है ,वही होकर रहेगा।

न भगवान श्री राम के जीवन को बदला जा सका, न भगवान श्री कृष्ण के।

न ही शिव सती की मृत्यु को टाल सके, जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आवाहन करता है ।

श्री रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने कैंसर को न टाल सके।

न रावण अपने जीवन को बदल पाया ,न ही कंस जबकि दोनों के पास समस्त शक्तियाँ थी ।

मानव अपने जन्म के साथ ही जीवन मरण, यश अपयश, लाभ हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह रंग, परिवार ,समाज, देश-स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।

प्रत्येक जीव अपने साथ ही साथ अपने विशेष गुण धर्म, स्वभाव और संस्कार सब पूर्व जन्म से लेकर आता है । जिसे सिर्फ साधना और सत्कर्मों से ही बदला जा सकता है।

इसलिए सरल रहें । सहज,मन कर्म वचन से युक्त रहना जरूरी है , मुहूर्त न जन्म लेने का है, न मरने का फिर शेष अर्थहीन है। 
     :- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।

गुरू का प्रसाद

उत्तम और उदार चरित्र, परोपकारिता , न्याय , त्यागशीलता ,  दयाशीलता , क्षमाशीलता ,  धर्मनिष्टता , दानशीलता , करूणाकारित्व , कल्याणकारिता , ईमानदारी , कर्तव्यनिष्टता , सुसंस्कार , नीतिवान,  नैतिकता , अहंकारशून्यता, दीनता और कर्मयोग आदि , ये जो सभी दैविक गुण हैं,  ये सभी सुशिक्षा (तत्त्वज्ञान) यानि सत्संग , साधना का फल और तत्पश्चात् , हरि गुरू के कृपा का प्रसाद है । यह गुरू सेवा का परिणाम है ।  अंत:करण की शुद्धि होतें  हीं जीवों में ये सभी गुण पहले आ जातें हैं । 
इन दैविक गुणों का बीज सच्चे साधकों के ह्रदय रूपी मिट्टी ( अंत:करण) में हीं अंकुरित होतें हैं । 
साधक जब अतिव्याकुल होकर , गुरू के चरणों का शरणागत होकर ,  पूर्णश्रद्धा और विश्वास के खाद और अपने अश्रुपूरित नेत्रों के जल से अपने गुरू भक्ति रूपी फसल को सिंचता है एवं आर्त पुकार करता है,  तो सद्गुरूदेव से जीव को श्री राधाकृष्ण रूपी प्रेम धन तत्क्षण मिल जाता है।
 भगवान यूगलसरकार  का प्रत्यक्ष दर्शण हो जाता है । हमेशा के लिए दु:ख निवृत्ति हो जाती है , सदा के लिए परमानंद मिल जाता है , जीव मलोमाल हो जाता है । - पुज्यनियां मां रासेस्वरी देवी जी ।