Thursday, 20 July 2023

किसी दिव्य प्रसनैलिटी को जानना एक बात है , जानते जानते उनकी कृपा से मान लेना दुसरी बात लेकिन सबसे बड़ी अंतिम बात है उनको रियलाईज कर लेना 100% सत् प्रतिशत कि श्री महाराज जी और कोई नहीं साक्षात पूर्ण ब्रह्म पुरूषोत्तम भगवान थे धरा धाम पर जो गुरूओं का भी गुरू बन कर आए थे । इसलिए श्री कृपालु जी महाराज जी में न केवल पिछले चारों जगद्गुरु समाहित थे वल्कि वो साक्षात सत् चित् आनंद थे ।

किसी दिव्य प्रसनैलिटी को जानना एक बात है , जानते जानते उनकी कृपा से मान लेना दुसरी बात लेकिन सबसे बड़ी अंतिम बात है उनको रियलाईज कर लेना 100% सत् प्रतिशत कि श्री महाराज जी और कोई नहीं साक्षात पूर्ण ब्रह्म पुरूषोत्तम भगवान थे धरा धाम पर जो गुरूओं का भी गुरू बन कर आए थे । इसलिए श्री कृपालु जी महाराज जी में न केवल पिछले चारों जगद्गुरु समाहित थे वल्कि वो साक्षात सत् चित् आनंद थे । 
वो दिव्य ज्ञान स्वरूप थे जो चारों वेदों के उद्गम का एक मात्र स्त्रोत थे और हैं । वे अनंत कोटी ब्रह्मांड का स्वामी हैं जो इस धरा धाम पर प्रकट हुए थे । 
और साथ साथ अपने निराकार रूप में इस जगत के कण कण में भी व्याप्त थे, हैं और हमेशा रहेंगे । 
और साथ साथ वो अपने दिव्य लोक गोलोक में भी सगुन साकार मूल स्वरूप में हैं ।
यह प्रकृति, जड़ , चेतन सब उन्हीं के शक्ति से कायम है और उन्हीं में एक दिन लय हो जाएगा और फिर उन्हीं से प्रकट होगा । 
हम सब उन्हीं के जीव शक्ति का अंश है , यह माया उन्हीं की अपरा शक्ति है। 

मैंने जब उनको देखा था अपने प्रत्यक्ष आंखों से तब केवल यह सुना था लोगों से , उनके प्रचारकों से शास्त्रों के उपमा से , श्लोकों से कि गुरू भगवान के बराबर हैं और भगवान हीं गुरू रूप लेकर जीव कल्याण के लिए आते हैं धरा पर , यह केवल जानकारी तक सीमित थी हमारे लिए बहुत समय तक । 

फिर उनकी कृपा हुई हम पर तब हमने धीरे धीरे मानना शुरू किया । यह दुसरा फेज था हमारे लिए 

लेकिन पिछले चार साल से उनकी कृपा के फलस्वरूप धीरे धीरे अब पूर्ण रूप से हम इस बात को रियलाईज कर लिए हैं उत्तरोत्तर प्रगाढता तथा दृढ़ता से कि श्री कृपालु जी महाराज और कोई नहीं सत प्रतिशत साक्षात पूर्ण ब्रह्म पुरूषोत्तम भगवान श्री कृष्ण का युगल स्वरूप ही थे और है । अब पक्का विश्वास हो गया है उनकी कृपा से , इतना दृढ़ विश्वास की अब अगर वो खुद भी आकर कहे कि ऐसा नहीं है तो यह बात हम नहीं मान सकते और उनको इस बिषय में हार मान कर यह स्वीकार करना हीं होगा वो हमसे तो मजाक कर रहे थे । हमारे विश्वास के दृढ़ता की परीक्षा लेने के लिए ।

जब आंतरिक ज्ञान का चक्षु श्री महाराज जी के कृपा से खुलती हैं तब जीव यह जानने से उपर और फिर मानने से भी ऊपर रियलाईजेशन करने कि स्थिति में प्रवेश कर जाता है । 

आज यह भी रियलाईज हो रहा है कि श्री महाराज जी को इस जन्म में तो हमने कुछ वर्षों पहले ही अपनी आंखों से देखा , उनका संग किया लेकिन वो भगवान होने के नाते हमें अनंत काल से न केवल जानते हैं वल्कि हमें जन्म दर जन्म संभालते हुए हमारे लक्ष्य की ओर धकेलते रहे हैं । 
हमारा पुरा जीवन उनके कृपा का प्रतिफल है । 
हमें यह भी रियलाईज हो रहा है कि हम तो घोर पतित थे लेकिन वे हमारे पापों के तीव्रता को अपनी कृपा से हमारे प्रार्बध के रूप में उतना हीं फल दिए जिसको हम आसानी से झेल सके । 
श्री महाराज जी इतने दयालु और कृपालु है कि एक माता पिता के रूप में वो अनेकों जन्मों में हमारी रक्षा करते रहे , हमें संभालते रहें , हमारे गुणाहों को माफ करते रहे लेकिन हम यह समझ नहीं पाय । वे परम धैर्य के साथ अपलक इंतजार करते रहे कि कब हम उनको अपना एक मात्र सनातन माता पिता रियलाईज कर लें और प्रति क्षण केवल उनका हीं चिंतन करें और अपना कल्याण कर लें । लेकिन हमने बहुत देर कर दी । 

आज एक बात का अत्यंत अफसोस है कि जब हम उनसे मिले तब हम क्यों नहीं तत्क्षण रियलाइजेन कि स्थिति को प्राप्त किया और उनके स्थूल शरीर में रहते उनका शरण ग्रहण कर लिया ? 
यह सोंच सोंच कर बहुत पश्चाताप होता है, आत्म ग्लानि होती है । इतनी आत्म ग्लानि कि लगता है हमने परम दिव्य हीरा को पा कर खो दिया ।
लेकिन इस बात कि निश्चिंतता है कि हमने अपने भगवान को देखा है , उनका संग किया है । यह अत्यंत सुख और हर्ष प्रदान करता है अब । 
और फिर इसी से संतोष करते हैं, और जीते हैं हम और अब परम भरोसा है हमें कि उनके चरणों में ही हमारी दम निकलेगी मृत्यु के समय , इस शरीर को छोड़ते समय और उनको सदा के लिए पा लुंगा , फिर कभी उनका वियोग हमें नहीं झेलना होगा । 
इस संसार में आना नहीं पड़ेगा कभी । इतनी कृपा तो वो अवश्य कर देंगे । ये उनकी अंतिम तथा सबसे बड़ी कृपा होगी हम पर । 
श्री महाराज जी के आगे अनंत ब्रह्म लोक का सुख भी फीका सा प्रतीत होता है । 
अत: वो हमें इन मायिक कामनाओं से रक्षा करके सदा के लिए अपने चरण शरण में ले लेगें ।
जब तक आयु है तब तक उनके वियोग का दुख झेलना हमारा प्रारब्ध है , यह प्रार्बध भी जरूर समाप्त हो जाएगा एक दिन । 
और हमे सदा के लिए उनके दिव्य सेवा में शामिल होने का सुअवसर मिल जाएगा । 

" मोहि तो भरोसो है तिहारी री किशोरी राधे"

हे मेरे प्राणाधिपति, मैं तो यह सोंच कर हमेशा हर्षित रहता हुं कि मेरे मृत्यु का मंजर भी कितना हसीन और परम सुखद होगा जब मेरा तेरे चरणों में हीं दम निकलेगा और हम तुमको सदा के लिए पा लेंगे । इससे बढ़ कर मेरे लिए आनंद का कोई क्षण नहीं होगा । 

श्री राधे :- आपका संजीव कुमार।

मेरा ग़ज़ल बेमुरव्वत है बड़ा बेईमान है ये,जिसने लूटा है , मेरा दिलों जान है ये,बंद आंखों से काजल को चुरा लेता है,

मेरा ग़ज़ल 
बेमुरव्वत है बड़ा बेईमान है ये,
जिसने लूटा है , मेरा दिलों जान है ये,
बंद आंखों से काजल को चुरा लेता है, 
धड़कते सीने से धड़कन को चुरा लेता है,
बड़ा भोला है, और बनता बड़ा अनजान हैं ये
मेरा कान्हा है ए , मेरा जी जान है ये
बेमुरव्वत है बड़ा बेइमान है ये, 
जिसने लूटा है मेरा जी जान है ये
हर समय करता बड़ा परेशान हैं ये ।

क्या कहुं , कितना बड़ा शैतान है ये
हर समय करता बड़ा परेशान हैं ये
मेरा कान्हा है ए , मेरा जी जान है ये
रखता है निगाहें अपनी, हर समय मुझ पर 
और पुछूं तो बनता बड़ा अंजान है ये 
मेरा कान्हा है ए मेरा जी जान है ये 
फुलों से खुशबु बहारों से रंग चुरा लेता है 
चांद से चांदनी,सितारों से रौशनी को चुरा लेता है 
बेमुरव्वत है बड़ा बेइमान है ये, 
जिसने लूटा है मेरा जी जान है ये
मेरा कान्हा है ए , मेरा जी जान है ये
हर समय करता बड़ा परेशान हैं ये ।

भोली सुरत पे न‌ जाना इसके 
आंखों में मस्ती , हंसी में कयामत है इसके 
काली जुल्फों से कयामत की अदा रखता है 
मोहिनी सूरत में जादू का असर रखता है 
इससे पहले कि क़यामत आय 
गोद में अपनी उठा लेता है 
बचा लेता है भवर से भव सागर के 
डूबा देता है गोलोक के गहरे सागर में 
बेमुरव्वत है बड़ा बेइमान है ये, 
जिसने लूटा है मेरा जी जान है ये
मेरा कान्हा है ए , मेरा जी जान है ये
हर समय करता बड़ा परेशान हैं ये ।

:- मेरे लिखे गजल का कुछ हिस्सा, संजीव कुमार

एक महत्वपूर्ण कथा से तत्वज्ञान की सार्थकता सिद्ध श्री महाराज जी द्वारा ( उनके द्वारा दिया गया तत्वज्ञान का सार पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी द्वारा , रांची 2013)

एक महत्वपूर्ण कथा से तत्वज्ञान की सार्थकता सिद्ध श्री महाराज जी द्वारा ( उनके द्वारा दिया गया तत्वज्ञान का सार पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी द्वारा , रांची 2013)
प्रत्येक जीव परमात्मा का ही अंश है , इसलिए सुख कि खोज तथा प्राप्ति कि अभिलाषा जीव का सहज गुण है लेकिन सुख वो संसार के बस्तु और व्यक्तियों में ढूंढ़ रहा है इसलिए ये सुख से बंचित है क्योंकि संसार में सुख जो दिखता है वो सुख नहीं असल में दुख है । आनंद चुकि भगवान है , वो सत् चित् आनंद है इसलिए प्रत्येक जीव परमात्मा को प्राप्त करने के लिए हीं छटपटा रहा है। जब तक जीव अपने अंशी भगवान को प्राप्त नहीं कर लेता वो दुखी रहेगा , अतृप्त रहेगा , अशांत रहेगा । क्षणभंगुर संसार में वह शाश्वत परम आनंद मिल ही नहीं सकता । क्षणभंगुर विषयों के क्षणभंगुर सुख में लिप्त होकर जीव अपना परम लक्ष्य भुला देता है।

इस प्रकार बार-बार ८४ लाख योनियों में जन्म लेने व मरने के चक्र में फंसकर जीव दुःखी होता रहता है। लेकिन सामान्य तौर पर जीव ऐसा सोचता है कि यदि परमानंद न मिले तो सांसारिक आनंद तो मिले । क्योंकि आनंद पाना ही जीव का स्वभाव है इसलिए यह आनंद से बिछड़ा हुआ उस परमानंद को ढूंढता फिरता हैं लेकिन समझ नहीं पाता कि संसार में तो आनंद है हीं नहीं , संसार में जो आनंद है वो एक ऐसा भ्रम है जिसमें भीतर दुख हीं दुख छुपा है ।
जिस जिस बिषय वस्तू में जीव को जितना आनंद रूपी जल दिखाई परता है उसे पाने पर वो मरीचिका का दर्शन करता है उसमें । इसीलिए संसार का सुख , आनंद एक मृग मरीचिका हीं है जो मृग तृष्णा को कभी बुझा नहीं सकता । 
असली आनंद तो भगवान का आनंद है जो वास्तविक गुरू के शरण ग्रहण करके उनसे प्राप्त किया जा सकता है । 
भगवान हीं आनंद हैं । 
वेद कह रहा है :- 
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। :- तैत्रियोपनिषद ३.६ 
आनंद आनंद सब कोई कहे, आनंद गुरु ते जानेयां। :- गुरू नानक 

चाहे जीव कोई भी कर्म संसार में कर रहा है वो केवल एक आनंद कि ही प्राप्ति के लिए क्योंकि आनंद का अंश होने के कारण जीव का स्वाभाविक खोज आनंद की हीं है। इसलिए आनंद कि ही प्राप्ति के लिए पुरी दुनिया भाग रही है। चाहे आनंद पाने के लिए तो आज सारी दुनिया दौड़ रही है। खाने-पीने व मौज-मस्ती में लोग आनंद पाने के लिए ही संलग्न होते हैं। किंतु संसार के सभी सुखों का अंत दुख के रूप में होता है। अंत में मनुष्य को खाली हाथ ही इस दुनिया से कूच करना पड़ता है। वास्तव में शाश्वत आनंद पाने की युक्ति तो सद्गुरु की अनुकंपा से ही हासिल होती है। संसार के आनंद तो एक अवधि के बाद निश्चित रूप से समाप्त हो जाते हैं और जीव दुखी होकर हाथ मलता रह जाता है। 

जीव मन की कल्पनाओं में खोया-खोया संसारिक सुखों को ही शाश्वत समझ उसी में लीन हो जाता है। एक दिन ऐसा आता है कि संसार का सारा ऐश्वर्य छोडक़र उसे सदा के लिए इस संसार से विदा हो जाना पड़ता है। लेकिन उल्टे-सीधे विचारों में खोकर मनुष्य परम सत्य सिद्घांत को भूल जाता है और सांसारिकता की बेड़ी में जकड़ा रहता है। इस बात को इस दृष्टांत से समझा जा सकता है।

एक समय की बात है कि सांसारिकता में पूरी तरह से डूबे एक सेठ को देखकर एक महात्मा को दया आ गयी। वे सेठ के पास परलोक सुधारने का उपदेश देने के लिए पहुंचे। काफी दिनों तक वे सेठ को नाना प्रकार के दृष्टांत देते हुए यह समझाने का प्रयत्न करते रहे कि यह संसार सपने की तरह है। इसका मोह त्याग कर भगवान की भक्ति करने में ही भलाई है। महात्मा के उपदेश को सेठ ढंग से समझ नहीं पाया और सोचा कि ये तो खुद विरक्त संन्यासी हैं और चाहते हैं कि मैं भी घर-बार त्याग दूं।

उसने महात्मा से प्रार्थना की - महाराज! आप की बात पूरी तरह सही है। मैं भी चाहता हूं कि भगवान की भक्ति करना। किंतु अभी बच्चे अबोध हैं, बड़े होने पर जब उनकी शादी कर लूंगा तब परलोक सुधारने का यत्न करूं। तब महात्मा बोले - ये सांसारिक काम तो तेरे न रहने पर भी होते रहेंगे। यह तो तुम्हें अपने घर की चौकीदारी मिली है भगवान द्वारा। लेकिन तुम खुद मालिक बन बैठ गये। ठीक है, तुम अभी अपनी घर-गृहस्थी संभालो। बाद में भगवान की भक्ति कर लेना। लेकिन याद रहे, भवसागर से मुक्ति तो भगवान की भक्ति करने से ही मिलेगी। 

सेठ के सभी बच्चे बड़े हुए और शादी होने के बाद अलग हो गये। फिर वह महात्मा सेठ के पास आए और बोले- सेठ जी! अब ईश्वर की कृपा से सब कार्य सिद्घ हो गए हैं, कुछ समय निकाल कर भगवान का भजन-सुमिरन करो। बेड़ा पार हो जाएगा। सेठ बोला- महाराज! अभी तो पोते भी नहीं हुए। पोतों का मुंह तो देख लेने दीजिए। तब महात्मा बोले- मैं तुझे त्यागी बनने के लिए नहीं कहता। तू मूर्खतावश मेरे भाव को नहीं समझ पा रहा है। मेरे कहने का भाव तो यह है कि संसार के मोह और अज्ञानता के चंगुल से मन को हटाकर प्रभु की भक्ति में लगाओ। 

तब सेठ बोला- यदि मन प्रभु की भक्ति में लग गया तो संसार के धंधे कौन करेगा? वह मन कहां से लाऊंगा? बिना मन लगाये दुनिया के काम-धंधे और सांसारिक कर्तव्य पूरे नहीं हो पाते। महात्मा बोले- मैं तुम्हारे ही उद्घार के लिए कह रहा हूं कि बिना भगवान की भक्ति किए कल्याण नहीं होगा। सेठ बोला- पहले संसार के काम-धंधों से मुक्त तो हो लेने दो। परिवार का कल्याण पहले कर लूं, फिर आपकी सुनूंगा।

समय गुजरता गया और एक दिन सेठ का स्वर्गवास हो गया। प्रारब्धवश वह सेठ छोटा पिल्ला के रूप में पैदा होकर पुन: उसी घर में आ गया। तब उसके पोते ने रसोई में उसे घुसा देखकर जोर से डंडा मारा। डंडा लगते ही वह मर गया और फिर सांप का जन्म लेकर उसी घर में रहने लगा। एक दिन घर वाले सांप देखकर डरे और उसे मार दिया। फिर मोहपाश में बंधकर पुन: उसी घर की गंदी नाली में एक मोटे कीड़े के रूप में पैदा हुआ। 

उस कीड़े को देखकर सब घर वाले बड़े विस्मित थे। उन्हीं दिनों वे महात्मा भी घर में पधारे। सबने महात्मा जी को वह मोटा कीड़ा दिखाया। तब अन्तर्दृष्टि से उस महात्मा ने देखा तो पाया कि यह तो वही सेठ है। उसकी ऐसी दुर्गति देखकर उस महात्मा ने अपने जूते से उस पर प्रहार किया जिससे वह कीड़ा वहीं मर गया और सद्गति पाकर अगले जन्म में मानव शरीर पाया और फिर उसी महात्मा का सेवक बना जो उस समय के सद्गुरु भी थे।

 इस दृष्टांत के माध्यम से लोगों को जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पाने के लिए प्रेरणा दी गई है जिससे मनुष्य क्षणभंगुर संसार के मोहपाश में न फंसे और अविनाशी सत्य से जुडऩे की चेष्टा आज और अभी से प्रारंभ कर दें। अंततः मनुष्य को श्री कृष्ण की भक्ति करके ही अपना जीवन कृतार्थ करना पड़ेगा एक दिन । चाहे जीव को अनेको जन्म लेना परे । इसी वजह से सभी महापुरुषों ने मानव शरीर का सदुपयोग भगवान की भक्ति करने में ही बताया है। गुरुवाणी भी कहती है -

कहु नानक भजु राम नाम नित जाने होत उधार।

अर्थात भगवान के नाम का भजन सुमिरण करने में ही जीवन का अधिकांश समय बिताना चाहिए। ऐसा करने से ही भवसागर से जीव का उद्घार होता है।

वास्तव में संसार के काम धंधे जिनसे पेट भरता है और सांसारिक वैभव व सुख-समृद्घि की अभिवृद्घि होती है किंतु अंत समय में उन्हें यहीं छोडक़र जाना पड़ता है। कोई भी चीज साथ नहीं जाती। अविनाशी प्रभु की भक्ति से जो आनंद मिलता है, वही शरीर छूटने के बाद भी काम आता है। मानव तन के रूप में जीव को एक सुअवसर मिला हुआ है, कभी भी इस मौके से नहीं चूकना चाहिए।
:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन को अपनी स्मृति से टंकित 
संजीव कुमार , रांची ।

संसार आसक्तियुक्त जीव या यूं कहें कि संसार के बिषय भोग में लिप्त व्यक्ति चाहे अपने तमाम जीवन में कितना भी जन धन वैभव नाम शोहरत आदि इकठ्ठा कर लिया हो लेकिन जीवन के उत्तरार्द्ध में साढे छ: फिट बाई छ: फीट के विस्तर पर वो एक भयभीत कर देने वाला, वेचैन कर देने वाला, निराशा से युक्त, खालीपन से भरा अजीव खोखला जीवन अवश्य महसूस करता है जो उसे फिर से माया के अंतहीन दुखदायक पथ के तरफ पल पल धकेलता रहता है ।

संसार आसक्तियुक्त जीव या यूं कहें कि संसार के बिषय भोग में लिप्त व्यक्ति चाहे अपने तमाम जीवन में कितना भी जन धन वैभव नाम शोहरत आदि इकठ्ठा कर लिया हो लेकिन जीवन के उत्तरार्द्ध में साढे छ: फिट बाई छ: फीट के विस्तर पर वो एक भयभीत कर देने वाला, वेचैन कर देने वाला, निराशा से युक्त, खालीपन से भरा अजीव खोखला जीवन अवश्य महसूस करता है जो उसे फिर से माया के अंतहीन दुखदायक पथ के तरफ पल पल धकेलता रहता है । ऐसे जीवों के लिए यह एक ऐसा समय होता है जब न धन काम देता है , न शोहरत , न शरीर , न उनके संबधी और न उनका वैभव, केवल अकेलापन और केवल बस भयानक मौत का पद् चाप सुनाई देता है जो इस बात का आभास उसे करा देता है कि उसने कोई तो ऐसा काम नहीं किया है अपने जीवन में जो उनको तिर्यक योनि में जाने से बचा ले । अत: इनके पास केवल बच जाता है तो एक पश्चाताप तथा अंतहीन सफर और कुछ नहीं । अब इस पश्चाताप का क्या फायदा जब शरीर नहीं बचा भगवद् साधना के लिए, भक्ति के लिए ? 
"अब पछताए क्या होत, जब चिड़ियां चुग गई खेत"

वही भक्ति मार्ग का जीव, साधक भले इस जन्म में अपने लक्ष्य को न पाया हो लेकिन वो अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में अपने गुरू के कृपा बल से भगवद् तुल्य असीम संतोष , असीम आनंद ,, सकुन, अतुल्य सुख और एक दिव्य आशाओं से भरा पुरा परिपूर्ण जीवन जरूर जीता है जो हर समय उसे इस बात का एहसास कराता है कि अगला जीवन उसे मनुष्य का ही मिलेगा , साथ साथ उसे गुरू कृपा के परिणामस्वरूप भक्ति और प्रेम तथा साधना का विल्कूल अनुकूल माहौल भी मिलेगा जिसमें वो अपने वांकि बचे साधना को पुरा करके अपने लक्ष्य को अवश्य हासिल हर लेगा । 
यही अंतर है संसार आसक्त जीव तथा भक्ति एवं भगवद् प्रेम आसक्त जीवों के जीने में ।। ( मैंने इसे कोरा अनुमान के आधार पर नहीं लिखा है, यह अनुभव है कुछ उन अति बुजुर्ग तथा सिरियस साधकों का जो उन्होंने मुझसे शेयर किया है बातचित के दरम्यान ) 
 श्री राधे । :- गुरू प्रेरणा से संजीव कुमार

बिषय भोग का मतलव

बिषय भोग का मतलव :- मनुष्य के पांच स्थूल ज्ञान ईंद्रियां संबंधित बिषयों को भोगने के सुख को बिषय भोग कहते हैं।
जैसे आंख से संसारिक वस्तुओं को देखने का सुख , कान से अपने मन के मुताबिक शब्द को सुनना , उसमें आनंद लेना , जैसे किसी कि बुराई , किसी संसारी की बराई , अपनी बराई , अपना मान सम्मान के शब्द को सुनने का सुख । 
जीभ से तरह तरह के अनावश्यक भोजन का सुख , अनावश्यक व्यंजन को चटकारे लेकर ग्रहण करने का सुख। 
नाक से संसारिक वस्तुओं के सुगंध का सुख , त्वचा से संसारिक वस्तुओं को छुने का सुख , शारीरिक वासनाओं को भोगने का सुख यानि मैथुन । 
इन सब बिषय भोग का नाम है "काम " । 
अत: इन पांचों स्थूल ईंद्रियों के सुख की कामना को काम वासना कहते हैं । 
ये काम वासना जब प्रकृति के नियम और लिमिट के अनुसार होती है तो यह निर्माणकारी है संसार में जीवन चक्र यानि इको सिस्टम के लिए । लेकिन यही जब आवश्यकता से अधिक हो जाए तो बिष बन जाता है , पाप कर्म कहलाते हैं । अपराध को जन्म देता है , जीव के पतन का मुख्य कारण बनता है । 
:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन से ।

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ।न तातो न माता न बन्धुर्न दातान पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैवगतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥१॥

गुरूदेव का सिद्धांत तथा आदेश है कि हरेक भाव और संकल्प तथा कर्म का रूख अपने गुरू के तरफ मोड़ दो । उसे गुरू के निमित्त कर दो । इसी सिद्धांत और आदेश का पालन करते हुं मैं आदि जगद्गुरु शंकराचार्य जी के भवानी अष्टक के भाव का रूख अपने गुरू के तरफ मोड़ते हुए इस अष्टक से गुरूदेव की बंदना करता हुं तथा उनसे ऊनकी शरणागति प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करता हुं । हमारे लिए तो हमारे गुरुदेव कृपालु महाप्रभु ही हमारी मां भवानी स्वरूप भी है । जो उन्होंने अपने लीला में मां भवानी का रूप धारण कर हमें दर्शन दिया था । जिसका विडियो ब्रजगोपिका धाम में के सी डी में भी है । 

गुरू शरणागति भावार्थ सहित : - 
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ।
न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥१॥

भवाब्धावपारे महादुःखभीरु
पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः ।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥२॥

न जानामि दानं न च ध्यानयोगं
न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥३॥

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थ
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं
गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥४॥

कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः
कुलाचारहीनः कदाचारलीनः ।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥५॥

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् ।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥६॥

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे
जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये ।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥७॥

अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो
महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः ।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रनष्टः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥८॥

   ------------------भावार्थ-------------------

भावार्थ श्लोक १ :- हे गुरूवर! पिता, माता, भाई बहन, दाता, पुत्र, पुत्री, सेवक, स्वामी, पत्नी, विद्या और व्यापार – इनमें से कोई भी मेरा नहीं है, हे गुरुदेव एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, मेरे माता पिता बंधु ईष्ट हो मैं केवल आपकी शरण में हूँ।

भावार्थ श्लोक २. :- हे गुरुदेव मैं जन्म-मरण के इस अपार भवसागर में पड़ा हुआ हूँ, भवसागर के महान् दु:खों से भयभीत हूँ। मैं पाप, लोभ और कामनाओ से भरा हुआ हूँ तथा घृणा योग्य संसार के बन्धनों में बँधा हुआ हूँ। हे गुरुदेव, मैं केवल तुम्हारी शरण में हूँ, अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति मति हो ।

भावार्थ श्लोक ३.:- हे गुरुदेव! मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ध्यानयोग मार्ग का ही मुझे पता है। तंत्र, मंत्र और स्तोत्र यज्ञ व्रत उपवास हवन जप तप का भी मुझे ज्ञान नहीं है। पूजा तथा न्यास योग आदि की क्रियाओं को भी मै नहीं जानता हूँ। हे गुरुदेव! अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति मति , बुद्धि तथा विवेक हो, मुझे केवल तुम्हारा हीं आश्रय है।

भावार्थ श्लोक ४. :- हे गुरुदेव! मै न पुण्य जानता हूँ, ना ही तीर्थों को, न मुक्ति का पता है न लय का। हे गुरुदेव! भक्ति और व्रत का भी मुझे ज्ञान नहीं है। हे गुरुदेव! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति मति हो, अब केवल तुम्हीं एक मात्र मेरा सहारा हो। मैं आपकी शरण में हूं , मेरा उद्धार करो ।

भावार्थ श्लोक ५. :- है गुरूदेव ! मैं कुकर्मी, कुसंगी, कुबुद्धि (दुर्बुद्धि), पतित और अधम (सदाचार से हीन कार्य), दुराचारपरायण, कुत्सित दृष्टि (कुदृष्टि) रखने वाला और सदा दुर्वचन बोलने वाला हूँ। हे गुरुदेव! मुझ अधम की एकमात्र तुम्हीं गति मति हो, मुझे केवल तुम्हारा ही आश्रय है। मुझे अपनी शरण में ले लो ।

भावार्थ श्लोक ६ :- हे गुरुदेव! मैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र को नहीं जानता हूँ। सूर्य, चन्द्रमा,तथा अन्य किसी भी देवता को भी नहीं जानता हूँ। हे शरण देनेवाले अकारण करूण गुरूदेव ! तुम्हीं मेरा सहारा हो, मैं केवल तुम्हारी शरण में हूँ, एकमात्र तुम्हीं मेरी गति मति हो।

भावार्थ श्लोक ७:- हे गुरुदेव! तुम विवाद से , विषाद से , प्रमाद तथा प्रवास में, जल में , अनल में (अग्नि में), पर्वतो में, शत्रुओ माया के दुर्गुण रूपी शत्रुओं से ( काम क्रोध मद मोह लोभ आदि से ) और अज्ञान रूपी वन (अरण्य) में सदा ही मेरी रक्षा करो, हे गुरुदेव ! मुझे केवल तुम्हारा ही आश्रय है, एकमात्र तुम्हीं मेरी गति मति हो। मैं आपके शरण में हुं ।

भावार्थ श्लोक ८:- हे गुरुदेव ! मैं सदा से ही अनाथ, दरिद्र, जरा-जीर्ण, रोगी हूँ। मै अत्यन्त दुर्बल, दीन, बाचाल, विपदा ग्रस्त (विपत्तिओं से घिरा रहने वाला जीव ) भयभीत तथा दुर्वल जीव हूँ। अत: हे गुरुदेव ! अब तुम्हीं एकमात्र मेरी गति मति बुद्धि , विवेक तथा बल हो, मैं केवल आपके ही शरण हूँ, तूम्हीं मेरा सहारा हो। कृप्या मेरी शरणागति स्वीकार कर मुझे सदा के लिए अनुग्रहित करें ।

अर्जुन जो कि पहले से भगवान श्री कृष्ण के महाभाव भक्ति वाला रसिक भक्त था , वो भगवान से अपने विराट स्वरूप को दिखाने का आग्रह क्यूं किया ? जबकि वो भगवान श्री कृष्ण के सौम्य रूप का पान करने वाला गोपी भाव भक्त था ?

प्रश्न :- अर्जुन जो कि पहले से भगवान श्री कृष्ण के महाभाव भक्ति वाला रसिक भक्त था , वो भगवान से अपने विराट स्वरूप को दिखाने का आग्रह क्यूं किया ? जबकि वो भगवान श्री कृष्ण के सौम्य रूप का पान करने वाला गोपी भाव भक्त था ? 
उत्तर :- संसार के हम जैसे पापी पतित लोगों को इस बात का ज्ञान देने के लिए कि
:- श्री कृष्ण हवै: परमो देवता: 
ऐ दुनिया के प्रत्येक मनुष्यों जरा देख लो भगवान श्री कृष्ण और कोई नहीं परम पिता परमेश्वर है । समस्त देवी देवताओं का अधिपति हीं नहीं समस्त संसार उनमें समाया हुआ है । उनसे ही समुचे अनंत कोटी ब्रह्मांड का अस्तित्व है । 
उनका विस्तार अनंत हैं, इतना अनंत कि कोई किसी भी साधन से उनके इस विस्तार स्वरूप को न जान सकता है और न देख सकता है । काल भी जिसके विस्तार को देख कर भयभीत हो जाए । भय भी जिसको देख कर थर थर कांपे । वो श्री कृष्ण व्रज में यशोदा के छड़ी से डर रहे हैं । ऊखली में बांध दिय जा रहे हैं , गोपियां जिसको अपने इशारे पर नचाती हैं । ग्वाल बाल जिसे घोड़ा बना कर उसकी सवारी करते हैं । वो श्री कृष्ण और कोई नहीं इस सृष्टि का जन्म दाता , पालक तथा नियामक और संहारक है । 

इनके विराट स्वरूप को देखने के लिए श्री कृष्ण के बराबर ही पावरफुल आंखें ( दिव्य दृष्टि) चाहिए, उनके शरीर से निकल रहे विराट ध्वनि को सुनने के लिए श्री कृष्ण के जैसे ही पावरफुल कान चाहिए ।

आने वाले समय में जीवों को यह ज्ञात हो मेरे माध्यम से कि श्री कृष्ण हीं परम भगवान है , पुर्ण ब्रह्म पुरूषोत्तम भगवान है । 

मुझे इनके विराट स्वरूप को देखने कि कोई आवश्यकता न थी । क्योंकि मैं तो जानता था और मुझे सदा से दृढ़ विश्वास था और है कि श्री कृष्ण ही भगवान है , अनंत शक्तियों के स्वामी हैं , अनंत ज्ञान के स्वामी हैं । अनंत सूर्य का प्रकाशक है । 

हे विश्व के जीवों मैंने तो तुमको जनाने के लिए इनसे सत्तरह अध्याय तक परिप्रश्न किया ताकि तुम सभी जान लो तत्वज्ञान ।
यूं तो तत्वज्ञान ही काफी होना चाहिए श्रद्धावान जीवों के लिए जो हरि गुरू से मिलता है , अपने ईष्ट , अपने स्वामी को जानने के लिए , पहचानने के लिए कि वो कौन है ? और तुम कौन हो ? यह ब्रह्मांड क्या है ? फिर भी हे कलयुग के जीवों , तुम सब इतने पतित होंगे कि केवल तत्वज्ञान से तुममे़ से 99.9% को विश्वास हीं नहीं होगा कि श्री कृष्ण सचमुच में भगवान है ! यह शंका होगी , इसलिए मैंने इनको अपना विराट स्वरूप को देखने के लिए इनसे दिव्य दृष्टि मांगी । 
अन्यथा एक भक्त जिसको गुरू के द्वारा दिए गए तत्वज्ञान, सिद्धांत ज्ञान पर अटुट श्रद्धा तथा दृढ़ विश्वास होगा उसे भला उनके विराट स्वरूप को देखने कि कोई आवश्यकता नहीं होती है । 

भक्त तो गुरू के एक एक वाणी पर भरोसा करता है, गुरू द्वारा दिया ज्ञान हीं दिव्य दृष्टि है उसके लिए । गुरू के बुद्धि से अपनी बुद्धि जोड़ कर शिष्य सब जान लेता है । प्रमाण कि आवश्यकता तो केवल उसको होती है जो गुरू के द्वारा ज्ञान दिए जाने पर भी पूर्ण भरोसा न करें और कहे कि हमको भी अर्जुन कि तरह दिव्य दृष्टि दो ताकि उनके विराट स्वरूप को देखने के बाद ही विश्वास करूंगा कि वो भगवान है । 

भक्त तो भगवान और गुरू के सौम्य रूप को ही अपने ह्रदय में बसा कर , गुरू द्वारा दिया गया दिव्य ज्ञान ( तत्वज्ञान ) पर दृढ़ विश्वास करके सदा के लिए उनका शरणागत हो कर आनंद में रमन रहने वाला जीव बन जाता है । 

इसलिए भगवद् मार्गी जीव के लिए केवल तत्वज्ञान हीं काफी है , सबसे महत्वपूर्ण है और प्रमुख है। हमेशा भगवान को , गुरू को अपने ह्रदय में महसूस करना हीं 99% भगवद् प्राप्ति है ।

असली भक्त , शरणागत भक्त डाउट नहीं करता की नहीं सब तो आप बता दिए और मैंने मान भी लिया " लेकिन " एक बार अपना स्वरूप दिखा हीं दो जैसे अर्जुन को दिखाया था !  

लगा दिया " लेकिन " ।

जब "लेकिन" लगा दिया, इसका मतलव उसे अभी भी डाउट है इसलिए वो अपनी आंखों से दिखाने का प्रमाण मांग रहा है । अत: वो तो संसारी है, घोर नास्तिक, वो शिष्य नहीं है । 
शिष्य को केवल गुरू पर पूर्ण भरोसा , उनके बातों पर दृढ़ विश्वास होता है उसे प्रमाण का दर्शन करने के लिए दिव्य दृष्टि कि कोई आवश्यकता नहीं , कोई डिमांड नहीं । गुरू जो समझे उचित वो करें , न करें , हमें तो एक गुरू सो काम । 
एक श्याम से काम , वो भी उनके ऐसे रूप से जिनके साथ हम खेल सके , जिनका संग कर सकें जिनकी हम सेवा कर सकें ।

उनका वो विराट स्वरूप देखने कि हमें कोई आवश्यकता नहीं है । 
अरे अर्जुन कह रहा है कि मैं डर गया , थर थर कांप रहा था उनके विराट स्वरूप को देख कर , नहीं सहन कर पा रहा था । तो आग्रह किया कि आप अपने मधुर स्वरूप में लौट आइए । हमें तो आपका मधुर स्वरूप हीं अच्छा लगता है । 
जय जय श्री राधे । :- संजीव कुमार ।