Wednesday, 26 July 2023

मौन क्या है ? मौन किसे कहते हैं

जब हमने श्री महाराज जी से मौन का वास्तविक स्वरूप तथा महत्व समझा । उनके कृपा से प्राप्त तत्वज्ञान "मौन" के बारे में प्रस्तुत है :- 
मौन - कर्म इंद्रियां यथा मुख को बंद रखना , कुछ न बोलना मौन नहीं है । मौन आंतरिक क्रिया है बाहरी नहीं ।

 मनुष्य का स्वरूप हीं ऐसा है कि मनुष्य एक पल के लिए अकर्मा नहीं रह सकता जीवन पर्यंत । यहां तक कि अर्ध सुसुप्ति की अवस्था में बुद्धि हो जाती है लेकिन मन सक्रिय रहता है तभी वो स्वप्न देखता है। पुर्ण सुसुप्ति कि हीं अवस्था ऐसी होती है जिसमें मन तथा बुद्धि भी पुर्ण रूप से सो जाती है । ऐसी अवस्था में मन बुद्धि न तो कोई संकल्प करता है और न विकल्प ना कोई चिंतन करता है ना कोई मनन , ना हीं बुद्धि कोई तर्क या वितर्क करती है । फिर भी इस पूर्ण सुसुप्ति की अवस्था में भी मनुष्य को अकर्मा नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इसको भी मनुष्य के द्वारा सोने के क्रिया तथा मनुष्य के कर्म को हीं इंगित करती है । सोने का कर्म । 

तो फिर मौन क्या है ? किसको कहते हैं मौन ? 
तो श्री महाराज जी के कृपा से मैंने जो समझा है वो है कि मौन एक ऐसी अवस्था का नाम है जब हमारा मन तथा बुद्धि किसी भी मायिक बिषय , बस्तु , या जीव यानि संसारिक बिषय बस्तु तथा जीव को छोड़ कर जब केवल पुर्ण रूप से भगवान का या गुरू का रूपध्यान करने के साथ साथ उनके गुणों का , उनके रूप माधुर्य का उनके लीलाओं का, उनके धामों का या उनके द्वारा दिया गया दिव्य वाणी का , प्रवचन का , सिद्धांतों का चिंतन करने में इंगेज्ड हो और मुख से कुछ भी ना बोले, तो ऐसी अवस्था का नाम है मौन । 

वरना केवल मुख बंद हो , मुख पर जीव ताला लगा कर रखें और मन बुद्धि संसार तथा किसी भी संसारिक , मायिक बिषय बस्तु या मायाधिन व्यक्ति का चिंतन कर रहा हो , तर्क कुतर्क वितर्क की क्रिया मन के अंदर चल रहा हो तो ऐसी अवस्था मौन नहीं है । 

और ऐसी अवस्था भी मायाधिन जीव के लिए असंभव है कि वो जगा हो और उसके मन के अंदर कोई बिचार जन्म न लें , मन के अंदर बिचारों का प्रवाह न उठ रहा हो । 

इसलिए जीव के मन के अंदर जब भगवान या भगवद् प्राप्त संत , हरि गुरू के रूप , उनके गुण , उनकी लीला उनके धाम का चिंतन चल रहा हो, बिचारों का प्रवाह भगवद् बिषय संबंधित हो और बाहर से जुवां खामोश हो तो इसी अवस्था का नाम है मौन । 
वरना जुवान से कुछ न बोलना और मन के अंदर संसारिक बिषय संबंधित बिचारों के प्रवाह को संचालित रखना मौन विल्कूल नही , एक नाटक है , एक ढोंग है । इसको "खामोशी" कहते हैं , "मौन" नहीं । 
श्री राधे । 

आज एक मौनी बाबा को देखा , वो व्रत के समय मौन रखने पर लेक्चर दे रहे थे कुछ आदमी को , उपदेश दे रहे थे कि अपने मुख के उपर एक सफेद कपड़ा बांध कर मौन का अभ्यास करो । वो यह नहीं बताया किसी को कि व्रत के दिन जुबां बंद रख कर मन से भगवान का चिंतन करो ! 
अरे कोरोना काल में दुनिया में तो अरबों लोग बड़ा बडा़ मास्क पहन कर घंटों मौनी बाबा बना रहा । क्या लाभ हो गया उस मौन से , कुछ मिला क्या किसी को ? कुछ अनुभव हुआ क्या ? क्या कोई शांति मिली क्या किसी को ? उल्टा बहुत से लोग इस काल में गलत चिंतन से , निगेटिव चिंतन से डिप्रेशन का शिकार हो गय ।
:- संजीव कुमार

रफ्ता रफ्ता जमाने का सितम होता है

रफ्ता—रफ्ता यह जमाने का सितम होता है,
एक दिन रोज मेरी उम्र से कम होता है ।
बाग रोता है असीराने—कफस को शायद
दामने—सज्जा—ओ—गुल सुबह को नम होता है।
हजार तरह तखथ्युल ने करवटें बदलीं
कफस—कफस ही रहा, फिर भी आशिया न हुआ
रंगे—निशात देख मगर मुत्मइन न हो,
शायद कि यह भी हो कोई सूरत मलाल की,
गुलशन बहार पर है, हंसो ऐं गुलो हंसों,
जब तक खबर न हो तुम्हे अपने मआल की,
अहसास अब नही है मगर इतना याद है,
शक्लें जुदा—जुदा थीं उरूजो—जवाल की
हुआ अहसास पैदा मेरे दिल में तकें—दुनिया का,
मगर कब, जब कि दुनिया को जरूरत ही न थी मेरी ।।

अर्थ -रफ्ता—रफ्ता यह जमाने का सितम होता है
एक दिन रोज मेरी उम्र से कम होता है

मनुष्य सोचता है कि वो जीवन जी रहा है, लेकिन सच्चाई कुछ और है दोस्तों ; जन्म के साथ ही हम रोज मर रहे हैं। यह प्रक्रिया, जिसे हम जीवन कहते हैं, मृत्यु की प्रक्रिया है। जिस दिन हम जन्मे उसी दिन से हमारा उम्र आहिस्ता आहिस्ता घटना शुरु हो जाता है। रोज एक—एक दिन चुकता जाता, प्रतिपल जीवन क्षीण होता जा रहा है । घट खाली हो रहा है, भर नहीं रहा है। और बूंद—बूंद खाली हो तो सागर भी खाली हो जाता है। और हम तो केवल गागर हैं।

बाग रोता है असीराने—कफस को शायद
दामने—सज्जा—ओ—गुल सुबह को नम होता है।

असीराने- कफस मतलव -पिंजड़ों में बंद कैदी , यह दुनिया भगवान का बनाया हुआ जेल खाना है । पिंजड़ों में बंद पक्षी तो हमारे आंखों से दिखाई देता है — पर आदमी भी कैद है एक अदृश्य पिंजड़े में , हम आंखों से  पिंजड़ों में बंद दिखाई नहीं पड़ते; क्योंकि हमारे  पिंजड़े सूक्ष्म हैं, अदृश्य हैं। अत: हम भी बंद है। हम भी कैदी है। 

और इसलिए शायद बगीचा भी हमारे लिए रोता है, इसिलिए रोज सुबह बाग में फूलों के, पत्तियों के कोर—किनारे गीले होते हैं। लेकिन हमें होश नहीं, हम दौड़े चले जाते हैं अपनी बेहोशी में। हम वही किए चले जाते हैं जो हमने कल किया था, परसों किया था, जो हमने पिछले जन्मों में अनंत बार किया है। बस खाना पीना मौज मस्ती करना हर मानव जन्म , इसे ही जिंदगी समझ लिया है । 

हजार तरह तखथ्युल ने करवटें बदलीं
कफस—कफस ही रहा, फिर भी आशिया न हुआ

कैद तो कैद ही रहेगी, घर नहीं बन सकती। मनुष्य की कल्पनाएं कितनी ही करवटें बदलें— और यही हमने किया है जन्मों—जन्मों में। शरीरे बदली , चौरासी लाख प्रकार के शरीर में घुम रहे हैं हम । कभी यह थे तो वह होना चाहा, कभी वह थे तो यह होना चाहा— ऐसे हमने चौरासी लाख योनियों में यात्रा की है। कल्पनाओं की करवटें हैं, और कुछ भी नहीं।
गरीब अमीर होना चाहता है और अमीर सोचता है, और अमीर बनें तब सुख मिलेगा !  शथ्या है सुंदर तो क्या होगा और भी महंगा विस्तर चाहिए, तब नींद आएगी , भवन है सुंदर तो क्या हो गया इसमें सुख नही , भवन और बढ़िया चाहिए — इसी चक्कर में नींद तो खो गई है! भोजन है स्वादिष्ट तो क्या करूं, भूख तो खो गई है!  जो जहां है वहीं अतृप्त है। जिनके पास धन है उनकी चिंता का अंत नहीं। और जिनके पास धन नहीं है उनकी एक ही चिंता है कि धन कैसे हो। जिनके पास है वे डरे हैं कि कहीं खो न जाए, जिनके पास नहीं है वे पीड़ित हैं कि कब होगा,?  जिनके पास है वे चाहते हैं कि और हो। तृप्ति कहीं भी नहीं है। आपा— धापी है, असंतोष है, अतृप्ति है।
ये सब हमारे पिंजड़े हैं जिनमें हम बंद हैं। ये अदृश्य हैं पिंजड़े। इसलिए हम चलते हैं, उठते हैं, बैठते हैं; फिर भी हम पिंजड़ों में बंद हैं। ठीक से समझो तो शरीर भी पिंजड़ा है, मन भी पिंजड़ा है। शरीर है हड्डी—मांस—मज्जा से बना पिंजड़ा । बेचारी आत्मा तो कैद है ।।

रंगे—निशात देख मगर मुत्मइन न हो,
शायद कि यह भी हो कोई सूरत मलाल की ।।

यानि - जब जीवन में चारों तरफ उल्लास, उत्सव, तमाशे—शहनाइयां बज रही हो , बांसुरिया बज रही हों, खुशी के गीत गाए जा रहे हों नाच हो रहे हों । तो देखो सब, मगर आश्वस्त मत हो जाना, मुत्मइन मत हो जाना मनुष्यों , यह मान मत लेना कि यह सब सच है! 

गुलशन बहार पर है, हंसो ऐं गुलो हंसों,
जब तक खबर न हो तुम्हे अपने मआल की,

यानि जब तक तुम्हें अपने भविष्य का कुछ पता नहीं है, हंस लो। देर नहीं है पतझड़ के आने में। सुबह खिला फूल सांझ गिर जाएगा। जो पत्ता अभी हरा है, जल्दी ही पीला पड़ जाएगा। जो अभी ऐसा गरूर से भरा था, जो अभी ऐसा मगरूर था, हवाओं से जूझता था, कि सूरज की किरणों से टक्कर लेने की सामर्थ्य समझता था, कि पक्षियों के गीत के साथ नाच रहा था— उसे पता भी नहीं कि सूरज ढल भी न पाएगा और जिंदगी ढल जाएगी! सुबह जो खिला था वह सांझ मुरझा जाएगा।

हकीकत तो यह है कि  हरेक संसारिक सुख में बहुत बड़ा भयानक दुख छुपा होता है , इसलिए अपने जीवन में आस्वस्त न हो जाना । 
इसलिए  यह भी हो कोई सूरत मआल की यानि दुख कि । 

अहसास अब नही है मगर इतना याद है,
शक्लें जुदा—जुदा थीं उरूजो—जवाल की ।।

यानि हमेंशा खयाल रहे कि विधाता का यह भी एक तरीका है , ढंग है इंसान को परखने का । इसलिए जब सुख आए तो उछलो मत ।( ऊरूजओ-जवाल) यानि संसारिक सुख - दुख कि शक्ले अलग अलग होती है अतः संसारिक सुख भी एक दुख ही है उसी का रूप है । इसमें धोखा मत खाओ । 
 
राजा दशरथ ने राम को पुत्र रूप में प्राप्त करके बहुत उत्सव मनाया , पुत्र सुख को पाकर आश्वस्त हो गए लेकिन यह सुख गंभीर दूख का कारण बनने में देर न लगाया । विचारे पुत्र शोक में ही अपार दुख में दम तौर दिया । 
संसार के हरेक सुख में आने वाले दुख का संकेत होता है पर हम नहीं समझे और सुख आने पर उछलने लगते हैं , दिखावा करते हैं । जो स्थित प्रज्ञ है वहीं सुखी है । 

हुआ अहसास पैदा मेरे दिल में तकें—दुनिया का,
मगर कब, जब कि दुनिया को जरूरत ही न थी मेरी ।।

ए मनुष्य अगर हमारी उपर वाली सभी बात तेरे समझ में फिर भी नहीं आई तो फिर वक्त तो जरूर तुमको समझा देगा , इस बात का एहसास करा देगा जब बुढ़ापा आएगा उस समय अफसोस करोगे , लोगों के व्यवहार को देखोगे , अपने ही परिवार के लोगों का व्यवहार देखोगे अपने प्रति , नजारा बदला बदला रहेगा । लोग तेरे पास बैठने से भी कतराएंगे । उस समय तुम सोचोगे और अफसोस करोगे की जिस जिंदगी के लिए धन कमाने में हमने पुरा उम्र खपा दिया , रिस्तों को जोड़ने में हमने पुरा उम्र गवां दिया , हीरा जन्म जैसा अनमोल समुचा मानव जीवन गवां दिया अब उसकी जरूरत इस दुनियां को नहीं रही । 
और जब इस बात का अहसास होगा तब तक चड़िया खेत चुग चुकी होगी । तुम गोविंद को भजने लायक भी नहीं रहोगे । मन शरीर और मानसिक संताप में डूब चुकी होगी । 

इसलिए अभी से समय रहते भज गोविंदम भजगोविंदम , भज गोविंदम मुढ़मते ।।
श्री राधे :- संजीव कुमार

Friday, 21 July 2023

पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी द्वारा रूपध्यान करते समय भाव संबंधित अति महत्वपूर्ण गाइड लाईन ।

पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी द्वारा रूपध्यान करते समय भाव संबंधित अति महत्वपूर्ण गाइडलाइंस:- मनुष्य में किसी-न-किसी से प्रेम करने की सामान्य प्रवृत्ति होती है। इसी प्रवृत्ति को अनन्य भाव से अपने अंशी श्रीकृष्ण में स्थापित करना ही परम प्रेम है, यही आनंद प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है। किंतु हमारे मन की प्रवृत्ति अनादि काल से सांसारिक व्यक्तियों और वस्तुओं में आनंद ढूँढने की रही है क्योंकि मन माया का बना है, अतः माया के संसार के प्रति इसका स्वाभाविक आकर्षण है। मन की इसी प्रवृत्ति को लक्ष्य कर भक्तियोगरसावतार श्री कृपालु जी महाराज ने अपने 'भक्ति शतक' में कहा है-

बंधन और मोक्ष का, कारण मनहि बखान |
 याते कौनिउ भक्ति करु, करु मन ते हरिध्यान ||

यहाँ 'हरिध्यान' से श्री महाराज जी का तात्पर्य स्मरण भक्ति से है जिसके लिए उन्होंने मन द्वारा रूपध्यान साधना किए जाने पर बल दिया है ताकि ध्यान करते समय मन भगवान के रूप, गुण, लीला, धाम के चिंतन में लगा रहे । चिंतन में निरंतर परम शुद्ध भगवान का सान्निध्य मिलने पर अनादि काल से मन पर जमा कलुष साफ होने लगता है और हम भगवान के निकट पहुँचने लगते हैं।

श्री महाराज जी ने कभी भिलाई नगर के सत्संगियों के मध्य रूपध्यान साधना की पद्धति बतलाई थी।

 देखिए, साधना में सर्वप्रथम कुछ बातें आवश्यक हैं। पहले तो आपको यह मानकर चलना है कि मैं युगल उपासक हूँ। मैं केवल कृष्ण उपासक नहीं हूँ। युगल उपासक होने के कारण मैं दोनों की साधना करता हूँ। वे मेरे माता-पिता हैं। वे मेरे स्वामी स्वामिनी जू हैं, इस भाव को लेकर चलना है। 

आप तिलक लगाते हैं! पहले लम्बा तिलक लगाते हैं, फिर गोल बिंदी लगाते हैं। जो लम्बा तिलक लगाते हैं, वे केवल कृष्ण उपासक हैं। जो लम्बा और गोल लगाते हैं, वे युगल उपासक हैं। ऊपर का तिलक कृष्ण का, नीचे की बिंदी राधारानी की! आपके तिलक से ही लोग समझ जाएँगे कि आप युगल उपासक हैं। पर यह नहीं जान पाएँगे कि आप राधाकृष्ण के उपासक हैं या सीताराम के। लेकिन, यह समझ जाएँगे कि युगल उपासक हैं। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आपको युगल उपासना करनी है।

दूसरी बात, साधना में ऐसा कोई जरूरी नहीं है कि दोनों को सदा साथ रखना है। मान लीजिए कि आप श्रीकृष्ण माधुरी का पद गा रहे है; आपको इस समय श्रीकृष्ण का ध्यान करने की इच्छा है, आप अपने सामने श्रीकृष्ण को खड़ा कीजिए। किसी समय आपको स्वामिनी जू का ध्यान करने की इच्छा है, तो राधारानी को खड़ा कीजिए। कभी आपको युगल उपासना करने की इच्छा है, तो दोनों को खड़ा कीजिए । परन्तु हमेशा हमें यह याद रखना है कि यदि उन्हें हम सर्वस्व मानेंगे तो जब चाहें जिस भाव में आ पाएँगे। लेकिन यदि आप दास्य भाव में भक्ति करेंगे तो फिर सखा नहीं मान सकेंगे। इसलिए टॉप की साधना कीजिए। कभी इच्छा हो रही है श्रीकृष्ण को प्रियतम मानने की, तो उसी भाव से उपासना करें। और पुरुष भी साधना करते समय यह न सोचें कि वे श्रीकृष्ण को कैसे प्रियतम मानेंगे! आपका शरीर पुरुष का है, पर हर कोई कई बार पुरुष या स्त्री दोनों हो चुका है। यह तो शरीर का सिर्फ नाम है।

उपासना मन से होती है। आपका जो भाव देह बनता है, वह मुख्य है। भगवान आपके शरीर को नहीं देखते। आपके मन से जो भावना बनायी जाती है, उसी का भावदेह बनता है। भावदेह से आपने भगवान का जैसा रूपध्यान किया है, आपको उनके वैसे ही साक्षात् दर्शन होंगे। इसलिए यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं है कि मैं पुरुष हूँ। महत्वपूर्ण यह है कि मैं आत्मा हूँ और आत्मा स्त्रीलिंग होती है।

परमात्मा आत्मा को ग्रहण करता है और आत्मा स्त्रीलिंग होती है। इसलिए मीरा ने जीव गोस्वामी से कहा था, अब तक मैंने जाना था कि पूरे ब्रह्माण्ड में एक ही पुरुष है और बाकी सब नारियाँ हैं। वह एक ही प्रियतम है। तुम एक दूसरे पुरुष कहाँ से आ गये ? - तो अब स्पष्ट है कि हम सब आत्माएँ हैं । आत्माओं के प्रियतम परम पुरुष श्रीकृष्ण हैं। दंडकारण्य के ऋषि-मुनि आत्माएँ हैं। तभी तो वे ऋषि-मुनि होकर भी राम को देखकर प्रियतम भाव से आकृष्ट हो रहे हैं। ये ऋषि-मुनि जोगी हैं, वैरागी हैं। काम उनको छू नहीं सकता, किंतु राम को देखकर कामुक हो गए! - आश्चर्य नहीं लगता? इसलिए उनको प्रियतम भाव से प्रेम करना है । पुरुष-स्त्री सभी आत्माएँ हैं और श्रीकृष्ण सबके प्रियतम हैं। :- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।।

एक वास्तविक शिष्य कि सबसे बड़ी खुशी ।

एक वास्तविक शिष्य को सबसे बड़ी खुशी और सुख उस समय महसूस होता है जब कोई जीव उसके गुरू और ईंष्ट से प्रेम करना शुरू कर देता है , उसके गुरू और ईष्ट का तारीफ करता है , गुण गाता है ह्रदय से । वास्तविक भक्त तो वहीं है जो खुद तो अपने ईष्ट और गुरू से अनन्य प्रेम करता ही है और दुसरे को भी उनसे प्रेम करने के लिए प्रेरित करता हो , उसे अपने गुरू से मिलवाने के लिए भागिरथ प्रयास करता रहे , स्वयं निराश कभी न हो और दुसरे को भी हमेशा प्रेरणा दे , उस मार्ग पर चलने के लिए दुसरे का हमेशा सहयोग करे । दुसरे को उस दिशा में आगे बढ़ता देख खुश हो , हमेशा दुसरे को मान दे , हौसला बढ़ावे , अपने गुरू और ईष्ट का बात बतावे, किसी का अपमान न करें , कोई दुर्भावना न करें कभी किसी से , हरि और गुरू अपने ऐसे शिष्यों से बहुत खुश होते हैं तथा और अधिक कृपा करते रहते हैं उस पर :- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ( भक्ति पियुष से ) । ।

प्रश्न :- क्या जीव का प्रार्बध केवल कर्म फल को प्रभावित करता है या केवल कर्म को या कर्म तथा फल दोनों को? उदाहरण के साथ उत्तर दें

प्रश्न :- क्या जीव का प्रार्बध केवल कर्म फल को प्रभावित करता है या केवल कर्म को या कर्म तथा फल दोनों को? उदाहरण के साथ उत्तर दें।

उत्तर :- अच्छा प्रार्बध जीव के कर्म में सहयोग करता है , इसी को समय बलवान कहा गया है । खड़ाब प्रारब्ध आने पर जीव का मन विचलित होता है । 
इसी को शास्त्रों ने , संतो ने कहा है विनाश काले विपरीत बुद्धि, 
इसी कारण फिर कहा है जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है । 
खड़ाब प्रारब्ध आदमी के मति को खड़ाब कर देता है , जीव भगवान और संत में भी शंका उत्पन्न करता है और कल्याण पथ से विचलित हो जाता है । श्री महाराज जी ने भी कहा है कि खड़ाब प्रारब्ध पहाड़ पर चढ़ने जैसा है , इस समय जीव को विवेक यानि तत्वज्ञान को मजबूती से पकड़ कर मन को समझाना चाहिए और प्रायस जारी रखना चाहिए। अच्छा प्रार्बध आने पर यानि बलवान समय आने पर जीव सही मार्ग पर बड़ी तेजी से बढ़ता है ।
अत: खड़ाब समय आने पर क्रियामाण कर्म प्रभावित होता है और जब कर्म प्रभावित होगा तो फल तो प्रभावित होगा हीं । अत: साबित हुआ कि प्रारब्ध जीव के कर्म के साथ साथ उसके फल को यानि दोनों को प्रभावित करता है । अत: बुरे वक्त में तत्वज्ञान को कस कर पकड़ कर रखना चाहिए। यही तत्वज्ञान विवेक का काम करता है ।
इसलिए संसार में नियति किसी जीव को बुरा फल प्रदान करने के लिए एक खड़ाब प्रारब्ध वाले जीव को निमित्त बनाता है और किसी को अच्छा फल देने के लिए एक अच्छे प्रार्बध वाले जीव को निमित्त बनाता है ।
उदाहरण :- एक जीव का मृत्यू का समय आ गया , नियती ने तय किया उसकी हत्या होगी और हत्या के कारण मृत्यु होनी है । 
यानि मृत्यु फल है उस जीव के लिए ।‌
अब नियती एक खड़ाब प्रारब्ध वाले जीव को निमित्त बना कर उसकी इह् लीला समाप्त करा कर एक को फल दिया दुसरे को हत्या जैसी जघन्य पाप करवा कर फांसी कि सजा या उम्र कैद कर फल दे दिया ।
दुसरा उदाहरण :- एक जीव का प्रार्बध खड़ाब आया , यानि समय खड़ाब आया , नियती ने तय किया कि उसके पुर्व के गलत कर्म के कारण उसके धन कि हानी होगी फलाने समय में । 
अब नियती ने एक और खड़ाब प्रारब्ध वाले जीव को चुना पहले वाले जीव को फल देने के लिए माध्यम बना लिया । 
दुसरे जीव का बुद्धि भ्रष्ट कर दिया नियती ने और उसने पहले वाले जीव के हीरे का हार चुरा लिया । 
अत: खड़ाब प्रारब्ध ने दुसरे जीव से गलत कर्म करा लिया क्योंकि दुसरे जीव को उसके पुर्व गलत कर्म से उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर‌‌ दिया और उस जीव ने पहले वाले जीव को नूकसान कर दिया । जो नियती ने हीं फल के रूप में उसके भाग्य में पहले से लिख रखा था । 
आगे दुसरे जीव को भी चोरी के कर्म कि सजा फल के रूप आगे किसी और से दिलवा देगी नियती वक्त आने पर ।
अत: खड़ाब प्रारब्ध आए तो जबरदस्ती जीव को भगवान में और अधिक मन लगाना चाहिए।
विधाता के इस रहस्य को जो समझ जाता है वो पाप करने से बच जाता है और जो नहीं समझता वो फंस जाता है ।
अत: जो जीव साक्षात ब्रह्म स्वरूप श्री कृपालु महाप्रभु जी के कृपा के फलस्वरूप उनको अपना गुरू मान कर परम ब्रह्म श्री कृष्ण और राधा रानी को ईष्ट मान कर उनकी साधना करता है उसका कल्याण सुनिश्चित है । यह एक अति भाग्यशाली दिव्य योग तथा कृपा है , बहुत बढ़िया प्रारब्ध का परिणाम है । जीव को ऐसे दिव्य योग को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। 
श्री राधे । 

जीव को शास्त्रों और तत्वज्ञान को पढ़ने और रटने कि जगह अपने गुरू पर श्रद्धा और विश्वास करके तत्वज्ञान को समझ कर मस्तिष्क में बैठाने और उसका उपयोग अपने जीवन में जरूर करना चाहिए, तभी लाभ निश्चित है , नहीं तो जीव तत्वज्ञान के बाबजूद भटक सकता है । तवज्ञान जानने और समझ लेने में बहुत अंतर होता है । तत्वज्ञान सुनना कृपा है और समझ कर उपयोग करना गुरू का विशेष कृपा का परिणाम ।
अत: विशेष कृपा के लिए "हमें गुरू कि सेवा और साधना भक्ति करनी पड़ेगी , चाहे इसी जन्म में करें या दस जन्म लगे , करना तो पड़ेगा - श्री महाराज जी कि हीं वाणी है यह ।
 तभी जीव अहंकार से मुक्त होकर दिव्य कृपा का अधिकारी बन सकता है और फिर नियती के कर्म और फलबंधन चक्र से सदा के लिए मुक्त हो सकता है, उनको पा सकता है , अन्यथा नहीं ।

ये क्या कर रहे हो ? भगवान कि भक्ति कर रहे हैं । भक्ति करके क्या करोगे ? भगवान कि भक्ति प्राप्त करेंगे । भक्ति प्राप्त करके क्या करेंगो ? भगवान कि भक्ति करेंगे ।

श्री महाराज जी :- ये क्या कर रहे हो ? भगवान कि भक्ति कर रहे हैं । भक्ति करके क्या करोगे ? भगवान कि भक्ति प्राप्त करेंगे । भक्ति प्राप्त करके क्या करेंगो ? भगवान कि भक्ति करेंगे । 

तो अभी क्या जो कर रहे हैं वो क्या है ? यह अपने अंत:करण को शुद्ध करने के लिय साधना है । साधना के फलस्वरूप जब अंत:करण शुद्ध हो जाएगा तो गुरू इसे दिव्य बना देगा , दिव्य बना कर फिर भक्ति प्रदान करेगा । इसके बाद हम भगवान को देख सकेंगे , सुन सकेंगे , उनका आलिंगन कर सकेंगे , उनकी सेवा कर सकेंगे , उनकी भक्ति कर सकेंगे , उससे पहले नहीं ।
अभी तो हमारा मन माया का, तन माया का , धन मायिक , और भगवान ठहरे दिव्य , भगवान को ए मायिक बस्तुएँ ग्राह्य नहीं है । फिर हम इन मायिक बस्तूओं से उनकी सेवा कैसे करेगें ? अत: हम भगवान कि जो भक्ति अभी कर रहे हैं वो अपने अंतःकरण को शुद्ध करने के लिए साधन भक्ति कर रहे हैं , इसे शुद्ध करके गुरू से भगवान कि भक्ति प्राप्त करेंगे । जब गुरू से भगवान कि भक्ति मिल जाएगी तब हम भक्त बन जाएंगे , उससे पहले नहीं । :- श्री महाराज जी ।

Thursday, 20 July 2023

गीता के श्लोक द्वारा सिद्ध सिद्धांत।

भगवान श्री कृष्ण :- संसार में कहीं भी भटक लो , संसार का कुछ भी प्राप्त कर लो , संसार में चाहे बड़ा से बड़ा धनकूबेर बन जाओ , कोई उधम कर लो , कोई भी उत्सव मना लो , कहीं सुख नहीं है । मैंने इन सब में से किसी में भी शास्वत सुख डाला ही नही है जो तुम प्राप्त कर लोगे , इसीलिए तो सुख ढूंढ़ते हो और अंत में दुख मिलता है संसार में, क्योंकि आनंद तो मैं हुं , मेरे लोक में हीं शास्वत सुख है । इसलिए तो संसार में कुछ भी करते हो अंत में दु:ख हीं मिलता है । मृत्यू लोक में सुख कैसे हो सकता है ? यहां तो जन्म से लेकर मृत्यू तक सब में दुख छुपा हुआ है । यह मेरी दासी माया है , यह लोक तो मेरा जेल मात्र है, इतना भी ज्ञान नहीं तुमको ? जब तक तुम मुझे नहीं प्राप्त कर लोग तुम इस जेल में भिन्न भिन्न शरीर में दुख झेलने आते रहोगे अनंत काल तक । लेकिन इसी जगत के माध्यम से मानव शरीर द्वारा मेरी भक्ति करके एक बार मुझे पा लोगे तो हमेशा के लिए मेरे साथ मेरे लोक में असली सुख और आनंद के साथ रहोगे । 
मुझे पाने के लिए हीं मैंने यह संसार बनाया है और मानव योनि बनाया है । गुरू बन कर तुमको समझाया अनेकों बार लेकिन तुम तो इस संसार को हीं सत्य समझ कर यहीं सुख और आनंद ढूंढने में लगे हुए हो , अनेकों मानव जीवन गवां बैठे । 
यह कभी संभव नहीं है कि इस संसार में सुख हासिल कर लो । इसलिए अब भी मान लो और मेरे शरण में आ जाओ एक बार मैं तुमको आवागमन के चक्र से मुक्त करके हमेशा के लिए अपनाकर अपने लोक गोलोक का सुख और आनंद प्रदान कर दुंगा । तुम मेरे पुत्र हो , तुम मेरे दिव्य संपत्ति ( ज्ञान, वैराग्य, प्रेमाभक्ति, यश , श्री तथा आनंद ) का उत्तराधिकारी हो , लेकिन अज्ञानता के कारण मेरी दासी माया कि दास्ता कर रहे हो , तुम माया को छोड़ कर केवल मेरे शरण में आ जाओ , मैं तुम्हें अपना अनश्वर षठ संपत्ति दे दूंगा , फिर तुम सदा के लिए आनंदमय हो जाओगे ।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। 15.7।।

सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।18.64।।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ।।18:65।।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।18:66।। 

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताप कदाचन ।
न चाशुश्रुषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ।।18:67।।

य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति |
भक्तिं मयि परां कृत्वा मावैष्यत्यसंशय: ||18: 68||

न च तस्मान्नुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम: ।
भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि ।।18:69।।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।8.7।।
 
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।8.14।।

 :- श्री कृष्ण ( गीता ) ।।