Saturday, 30 December 2023

भगवान के कृपा के बिना कोई उनको जान नहीं सकता ।

राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी॥
तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥2॥

राम सरूप तुम्हार, वचन अगोचर बुद्धि पर। 
अविगत अकथ अपार, नेति-नेति नित निगम कह॥126।।

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥2॥

भगवान शंकर कह रहे हैं :- हे राम आपको कोई भी अपनी मन, बुद्धि, ज्ञान बल से नही जान सकता , बड़े बड़े ऋषि मुनि आपको नहीं जान पाए , स्वयं मैं , ब्रह्मा और विष्णु भी अपने बल से आपको नहीं जान पाए ! केवल अनुमान लगाते हैं आपके स्वरूप के बारे में और अपने ही अनुमान के आधार पर बड़े बड़े ऋषि महर्षि यहां तक कि वेद पुराण आपका बखान करते हैं । 

हे राम ! आपका स्वरूप मन बुद्धि वाणी से परे है। इसलिए आपके स्वरूप को न कोई जान पाया है, न बखान कर सकता है, न उसका पार ही पा सकता है। इसलिए वेद सदा 'नेति-नेति' कहकर आपका वर्णन करते हैं। हे राम आपको कोई भी जीव किसी भी साधन से नहीं जान सकता है ।
हे राम लेकिन वो भाग्यशाली जीव आपको जान सकता है, जिसे आप स्वयं अपने अहेतु कि कृपा से जना देते हैं , फिर वो आपको जानते ही आपका ही बन जाता है सदा के लिए, आपके स्वरूप शक्ति से परिपूर्ण हो जाता है । हे रघुनंदन! हे भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले चंदन! आपकी ही कृपा से जीव आपको जान पाते हैं॥ :- श्री महाराज जी ।।

Friday, 29 December 2023

प्रश्न :- भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त का संसार क्यों छीन लेते हैं ? संसार छीन जाना भगवान का कृपा तथा संसार का मिलना भगवान का कोप क्यों कहा गया है ? अधिकतर लोग श्री कृष्ण की भक्ति नहीं करके अन्यान्य देवी देवता की भक्ति क्यों करते हैं ?

प्रश्न :- भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त का संसार क्यों छीन लेते हैं ? संसार छीन जाना भगवान का कृपा तथा संसार का मिलना भगवान का कोप क्यों कहा गया है ? अधिकतर लोग श्री कृष्ण की भक्ति नहीं करके अन्यान्य देवी देवता की भक्ति क्यों करते हैं ? 

उत्तर - उत्तर श्री कृष्ण के द्वारा ही दिया गया है भगवद् पुराण में , प्रस्तुत है उनकी वाणी :- 
श्री कृष्ण उवाच:- 
यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः । 
ततोऽधनं त्यजन्त्यस्य स्वजना दुःखदुःखितम् ॥ 
तं भ्रंशयामि सम्पद्भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम्।।
स यदा वितथोद्योगो निर्विण्णः स्याद्धनेहया । 
मत्परैः कृतमैत्रस्य करिष्ये मदनुग्रहम् ॥ 
तद्ब्रह्म परमं सूक्ष्मं चिन्मात्रं सदनन्तकम् ।
विज्ञायात्मतया धीरः संसारात्परिमुच्यते ॥ 
अतो मां सुदुराराध्यं हित्वान्यान् भजते जनः ।

 (श्रीमद्भागवतपुराण)

भावार्थ:- भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं जिस पर मैं कृपा करता हूँ, उसका संसारिक ऐश्वर्य, धन आदि धीरे-धीरे छीन लेता हूँ , सभी भौतिक संपत्तियों से बंचित कर देता हूं ,जब मैं मेरी भक्ति साधना करने वाले जीव के माया के ग्रंथि को काटता हुं तो शुरू शुरू में वो बेचैन होने लगता है, घबड़ाने लगता है  और संसार कि प्राप्ति के लिए फिर से प्रयास करने लगता है लेकिन मैं उसके हरेक प्रयास को विफल कर देता हुं , इस प्रकार अंत में वो निराश हो जाता है संसार से और फिर संसार से वो सदा के लिए विरक्त हो जाता है । जीव जब संसारिक ऐश्वर्य से तथा संसारिक भोग विलास में लिप्त अपने परिजन से आसक्ति रहित हो जाता है , तब संसार के लोग यहां तक कि उसके सगे-सम्बन्धी उसका पीछा छोड़ देते हैं ।
 इस प्रकार वो जीव मेरी भक्ति में और अधिक रस लेने लगता है , वो संसारिक धन तथा ऐश्वर्य की कामना को त्याग देता है मेरी प्रेरणा से । वो समझ जाता है कि संसार के प्रत्येक बिषय बस्तुओं तथा व्यक्ति से लगाव , आसक्ति , अटैचमेंट हीं समस्त दुखों का मूल कारण है , फिर उसे दुःख समझ कर वो उधर से अपना मुँह मोड़ लेता है और फिर मेरे प्रेमी भक्तों का, यानि भगवद् प्राप्त संतों का आश्रय लेकर उनका संग बढ़ा देता है , मेरे जनों का संग करना उसे अच्छा लगने लगता है , तब मैं उस पर अपनी अहेतु की कृपा करता हूं ।

 फिर मेरे कृपा से मेरे जन यानि मेरे संत उसको मेरा प्रेम दान कर देते हैं , प्रेम दान मिलते ही वो मुझे प्राप्त कर लेता है , मुझे प्राप्त करके सदा के लिए मेरे बनाए जेलखाना के चौरासी लाख योनियों के बंधन से मुक्त होकर मेरे लोक में सदा के लिए मेरे साथ निवास करता है और मेरे स्वरूप शक्ति से युक्त होकर मेरे हीं समान दिव्य शक्तियों का स्वामी बन जाता है एवं सदा के लिए आनंदमय हो जाता है । 

लेकिन जो जीव इस संसारिक धन से अटैचमेंट रखता है, संसारिक बिषय बस्तुओं की कामना लेकर मेरी भक्ति करता है वो मेरा भक्त नहीं है , वो मेरे दिव्य प्रेम का अधिकारी नहीं हो सकता । 

मेरे दिव्य प्रेम , दिव्य संपत्ति, दिव्य एश्वर्य, दिव्य ज्ञान कि प्राप्ति के लिए जीव का लगाव , अटैचमेंट संसार से समाप्त होना आवश्यक है । इसलिए मैं उसका संसार छीन लेता हुं , उसे योग भ्रष्ट कर देता हूं , उसे एश्वर्य रहित कर देता हूं , यह मेरी सबसे बड़ी कृपा है और संसार का मिलना मेरा सबसे बड़ा कोप है । 

 इस प्रकार मेरी प्रसन्नता, मेरी आराधना, मेरी भक्ति बहुत कठिन है, साहसी लोग, निडर लोग , बुद्धिमान लोग मेरी भक्ति करते हैं । साधारण लोग, भयभीत लोग , कायर लोग , संसार में हीं आसक्त होते हैं और संसारिक भोग बिलास की हीं कामना रखते हैं । संसारिक भोग बिलास में लिप्त लोग मुझे प्राप्त नहीं कर सकते, मेरी भक्ति नहीं कर सकते । वो संसार कि प्राप्ति के लिए लालायित रहते हैं और मायाजनित दुख भोगते रहते हैं ।

 अत: ऐसे भोगी बिलासी कामी लोग मुझे छोड़कर अन्यान्य मायाधिनस्वर्ग के मायाधिन देवी देवताओं की आराधना करते रहते हैं , और संसार पाकर दुख के दलदल में और भी फंसे रहते हैं तथा त्रिगुण , त्रिताप ( आध्यात्मिक ताप , भौतिक ताप तथा दैविक ताप) , त्रिकर्म , त्रिदोष , पंचक्लेश आदि से पीड़ित होकर मेरे ही बनाए चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाते रहते हैं मेरी दासी माया का झापड़ खाते रहते हैं । :- श्री कृष्ण का कथन श्री मद्भागवत महा पुराण के दशम स्कंध के श्लोक का भावार्थ । 
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जब संसार में भी प्रधान मंत्री बनने से पहले उसको चीफ मिनिस्टर के पद का त्याग करना पड़ता है , राष्ट्रपति बनने के लिए प्रधानमंत्री के पद का या अन्य पद एश्वर्य आदि को त्यागना पड़ता है । 
तो भगवान के लोक में दिव्य प्रेम , दिव्य पद् दिव्य एश्वर्य की प्राप्ति के लिए संसारिक पद् प्रतिष्ठा, मान सम्मान धन जन से छुटकारा तो आवश्यक है । 
कहां दिव्य लोक में दिव्य प्रेम और आनंद और कहां संसार का दुख युक्त इन्द्रियादिक सुख ? दोनों विरोधी बस्तुए है दोनों विरोधी बस्तुए एक साथ नहीं मिल सकती है । अत: भगवान के दिव्य प्रेम की प्राप्ति के लिय भगवान कि दासी माया की संपत्ति से त्याग पत्र तो देना ही होगा । जो लोग संसार नहीं छोड़ना चाहते हैं भगवान उसे और भी संसार देकर दु:ख में उलझा देते हैं ताकि वो दुख पाकर संसार अनासक्त होने लिए तैयार हो जाए । 
इसलिए भगवान जिस पर अपनी अहैतु कि कृपा करते हैं उसका संसार पहले छीन लेते हैं ताकि वो दुख से सदा के लिए मुक्त होकर आनंद मय हो जाए । 
अत: संसार का मिलना भगवान का कृपा नहीं कोप कहा गया है और भक्ति के दौरान जब संसार छीनने लगे , संसार से आसक्ति मिटने लगे, तो इसे हरि गुरू की कृपा समझना चाहिए। यह इंडिकेशन है कृपा का । श्री राधे । :- संजीव कुमार।

Thursday, 28 December 2023

मन माया का पुत्र है और जीवात्मा भगवान का नित्य दास, नित्य अंश है । लेकिन अनादि काल से जीवात्मा अपने अंशी भगवान का शरणागति नहीं करके भगवान की दासी माया के पुत्र मन का गुलाम है इसलिए अनादि काल से माया की हीं शरणागति कर रहा तथा संसारिक बस्तुओं कि प्राप्ति के लिए ही संघर्षरत है ।

मन माया का पुत्र है और जीवात्मा भगवान का नित्य दास, नित्य अंश है । लेकिन अनादि काल से जीवात्मा अपने अंशी भगवान का शरणागति नहीं करके भगवान की दासी माया के पुत्र मन का गुलाम है इसलिए अनादि काल से माया की हीं शरणागति कर रहा तथा संसारिक बस्तुओं कि प्राप्ति के लिए ही संघर्षरत है । 
अत: मन के गुलाम जीवात्मा को यानि मन की शरणागति करने वाले को , दुसरे शब्दों में भगवान कि दासता के जगह पर माया के पुत्र मन का गुलामी करने वाले को भगवान नहीं मिलते । 

हरि गुरू के शरणागत जीव को भगवान मिलते हैं । सजातीय होने के कारण माया के पुत्र मन को माया कि हीं गुलामी भाती है । इसलिए मन बार-बार संसार में हीं भागता है । मन का गुलाम जीवात्मा हरि और गुरू का शरणागत नहीं हो सकता । 

शास्त्रीय सिद्धांत कहता है कि हम जिसकी शरणागति करेंगे , स्वाभाविक है हमें उसी कि संपत्ति तथा गुण मिलेंगे । अत: माया के गुलाम जीवात्मा को , माया के भक्त जीव को माया कि हीं संपत्ति तथा गुण मिलता है । माया का गुण है संसार के बिषय बस्तुओं से राग-द्वेष, काम क्रोध घृणा आदि और परिणाम में अल्पकालिक क्षणभंगुर इन्द्रियादिक सुख तथा अंततः दुख एवं चौड़ासी लाख योनियों में भटकने का पीड़ा । 

भगवान कि संपत्ति है दैविक गुण और परिणाम में चौड़ासी लाख के चक्कर से सदा के लिए छुटकारा तथा अनंत काल एवं अनंत मात्रा का सुख और आनंद । 
भगवान की संपत्ति पाने के लिए , भगवान को पाना होगा ।
और भगवान को पाने के लिए हमे मन की गुलामी छोड़ कर मन से हरि और गुरू की पूर्ण शरणागती करनी होगी । दुसरा कोई उपाय नहीं है । :- श्री महाराज जी द्वारा दिया गया तत्वज्ञान पूज्यनीयां रासेश्वरी देवी जी के शब्दों में ।

Wednesday, 27 December 2023

मन का मालिक या मन का गुलाम है हम ?

संसार में लोग बड़े शान से कहते हैं - मैं अपने मन का मालिक हूं ! सुनो सबकी करो अपने मन की , मैं अपने मर्जी का मालिक हूं , मेरा मन जो कहता है वहीं मैं करता हूं आदि आदि । 
अरे आपको तो कहना चाहिए मैं अपने मन का बड़ा भारी गुलाम हूं , मर्जी का गुलाम हूं , संसारिक बिषय भोग और कामनाओं का गुलाम हूं, मेरा मन जैसे जैसे नचाता है वैसे वैसे मैं नाचता हूं । 

 यदि अपने मन का मालिक होते, तो हम महापुरूष होते! मन को अपने इशारों पर नचाते , नाचते नहीं मन के इशारों पर । 

यही मन तो अनंतानंत जन्म बर्बाद कर दिया और अभी भी हम अपने इसी मन का गुलामी कर रहे है ? 

शास्त्र कहता है :- 
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः|
बन्धाय विषयासंगो मुक्त्यै निर्विषयं मनः || :- ब्रह्मबिंदूउपनिषद ।

“मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है | इन्द्रियादिक विषयों में रत्त मन चौरासी लाख योनियों में आवागमन का कारण है और विषयों से विरक्त मन मोक्ष का भी कारण है |” मन ही हमें महान बना सकता है , महापुरूष बना सकता है और यही मन हमें राक्षस भी बना देता है । 
:- पूज्यनीयां रासेश्वरी देवी जी ।

मानव देह का महत्व :- संसार का प्रत्येक जीव कर्मशील दिखाई देता है |

मानव देह का महत्व :- संसार का प्रत्येक जीव कर्मशील दिखाई देता है | पशु - पक्षी , कीट- पतंग सभी तो कर्म करते हैं | यहाँ तक कि स्वर्ग के देवता भी कर्म करते हैं | किंतु इनमें से किसी का भी कर्म स्वतंत्र नहीं है | या यूँ कह लीजिए की उनका कर्म परतंत्र है | वो पुरुषार्थ द्वारा ऐसा कर्म नही कर सकते , जिससे वे अपने अनंत जन्मों के संचित कर्म को भस्म कर दें और भविष्य के अनंत काल को बना लें | 
चूँकि यह कमाई नाम की चीज़ , पुरुषार्थ नाम का तत्व उनके साथ नहीं रह सकता , इसलिए ये सब भोग योनि के अंतर्गत आते हैं | 

आइए , अब हम मानव योनि पर विचार करें | मानव योनि ही एक ऐसी योनि है , जिसमें आकर हम वास्तव में कर्म कर सकते है | 
मानव देह बड़ा कमाल का है | एकमात्र मानव देहधारी जीव ही यह शक्ति रखता है कि वह जिस जीव से चाहे अपने अनुरुप कर्म करवा ले , उनको गुलाम बना ले | उनके द्वारा अपनी सेवा ले | 

पशु-पक्षी , कीट-पतंग , अथवा देवता सभी आनंद चाहते हैं , लेकिन चौरासी लाख योनियों मे यह शक्ति सिर्फ मानव को ही प्राप्त है कि वह अपने सुख के लिए अन्य चेतन जीवों को गुलाम बना ले , अपना दास बना ले | इन चेतन जीवों के नीचे आते हैं स्थावर , चर , अचर | 
अब बृक्ष को ही लीजिए, इनको भोग्य बनाते हैं ये चेतन जीव ! गाय-भैंस को हमने देखा है घास चरते या पेंड़ के पत्तों को खाते हुए | 
इधर मानव ने इन चेतन एवं स्थावर दोनों को ही अपना भोग्य बनाया है | 

इस प्रकार जड़-चेतन दोनों को मनुष्य ने दास बनाया है | अब आप सोच रहे होंगें कि देवता तो मनुष्य के दास नही हैं ! हाँ , देवता भी मनुष्य के दास बनते हैं | आप सिद्धि कर लें , तो देवता भी आपकी गुलामी करेंगें | आपने इतिहास - पुराण में पढ़ा होगा कि अनेकानेक लोगों ने देवताओं की सिद्धि की थी | रावणादिकों के यहाँ यमराज आदि देवतागण नौकर - चाकर थे |
यह सब सुनकर आप विस्मित हो रहे होंगें , किंतु विस्मय की कोई बात नहीं है क्योंकि इस मानव योनि का ऐसा कमाल ही है कि स्वयं भगवान इसके दास बन जाते हैं , फिर इन देवताओं की क्या गिनती ! 

अहं भक्तपराधीनो ह्मस्वतन्त्र इव द्विज | 

भगवान कहते हैं - मैं तो परतंत्र हूँ , भक्तो का दास हूँ | भक्तों ने मेरा ह्रदय खा लिया है | मुझको क्रीतदास बना लिया है , खरीदा हुआ गुलाम बना लिया है | 

हाँ यह बात अलग है कि यह कमाल तभी हो सकता है , जब हमारा पुरुषार्थ पूर्ण शरणागति का हो | हमारी शरणगति , हमारे प्रेम से बँधकर ऐसे सर्वतंत्र स्वतंत्र परात्पर सर्वशक्तिमान भगवान परतंत्र बन जाते हैं | सिर्फ परतंत्र ही नहीं नित्य परतंत्र बन जाते है |
अब तो भक्त ही ईश्वर से कहता है - 
ह्रदय ते जब जाओगे मर्द बदौंगो तोय | 

आपके मस्तिष्क में यह बात अवश्य आ रही होगी कि हमें तो यह सौभाग्य प्राप्त नही हुआ |
अब यह भी कोई बात है ! बिना उधम के भला कुछ प्राप्त होता है !! बिना प्रयास के कभी किसी को कुछ मिला है ? जब आपने भगवत्प्राप्ति के लिए उधम ही नही किया है , तो आपकी बात कैसे बन सकती है ? 
यह तो आपकी कमी है | अगर कोई कमर कस ले कि हम भगवत्प्राप्ति करके रहेंगें तो उसे भला उसे कौन रोक सकता है | भगवान तो भुजाएँ पसारे सदा ही तैयार है हमें अपनाने को | वो तो तैयार वैठे है अपने भक्तों के प्रेमाधीन हो जाने को , उनके हाथ बिक जाने को , उनकी दासता करने को | कर्म करने में स्वतंत्र मानव को कर्म करने की यह स्वतंत्रता उसे विशेषाधिकार के रुप में प्राप्त हुई है | 
:- श्री महाराज जी ( प्रवचन , वृन्दावन )

Monday, 25 December 2023

॥ वैराग्य शतकम् भर्तृहरिविरचितम् ॥बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमंगे सुभाषितम्।। २ ।।

यह भीतर से वैरागी भक्त राजा भर्तृतिहरि जी का यह कथन मुझे बडा़ पसंद है :- 
वैराग्य शतकम् 
॥ वैराग्य शतकम् भर्तृहरिविरचितम् ॥

बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। 
अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमंगे सुभाषितम्।। २ ।।
अर्थ:
जो विद्वान् हैं, वे इर्षा से भरे हुए हैं; जो धनवान हैं, उनको उनके धन का गर्व है; इनके सिवा जो और लोग हैं, वे अज्ञानी हैं, वो अज्ञानता को ही ज्ञान समझ बैठे हैं और दुखी हैं । इसलिए विद्वत्तापूर्ण विचार, सुन्दर सुन्दर सारगर्भित निबन्ध या उत्तम काव्य शरीर में ही नाश हो जाते हैं ।

जो विद्वान् हैं, पण्डित हैं, जिन्हें अच्छे बुरे का ज्ञान या तमीज है, वे तो अपनी विद्वता के अभिमान से मतवाले हो रहे हैं, वे दूसरों के उत्तम से उत्तम कामों में छिद्रान्वेषण करने या नुक्ताचीनी करने में ही अपना पांडित्य समझते हैं; अतः ऐसो को कुछ कहने में लाभ की जरा भी सम्भावना नहीं ।
दुसरे प्रकार के लोग जो धनी हैं, वे अपने धन के गर्व से भूले हुए हैं भगवान को । उन्हें धन-मद के कारण कुछ सूझता ही नहीं, उन्हें किसी से बातें करना या किसी की सुनना ही पसन्द नहीं; अतः उनसे भी कुछ लाभ नहीं ।
अब रहे तीसरे प्रकार के लोग; वे नितान्त मूर्ख या अज्ञानी हैं; उन गँवारों में अच्छे बुरे की तमीज नहीं, अतः उनसे कुछ कहने या अपनी कृति दिखाने सुनाने को दिल नहीं चाहता; इसलिए हमारे मुंह से निकल सकने वाले उत्तमोत्तम विचार, निबन्ध, काव्य या सुभाषित, संसार के सामने न आकर, हमारे शरीर में ही नष्ट हुए जाते हैं । हमारा परिश्रम व्यर्थ जाता है और संसार हमारे कामों के देखने और लाभान्वित होने से वञ्चित रहता है ।

जो तुम्हारी तरफ मुखातिब हों, तुम्हारी बातों पर कान दे, तुम्हारी बातों को ध्यान से सुने, उन्ही को अपनी बातें सुनाओ । जो तुम्हारी बातें सुनना न चाहें, उनके गले मत पड़ो । ऐसा करने से आपकी आत्म-प्रतिष्ठा में बट्टा लगेगा – आपका अपमान होगा , अशांति होगी ।

पण्डित मत्सरता भरे, भूप भरे अभिमान ।
और जीव या जगत के, मूरख महाअजान ।।
मूरख महाअजान, देख के संकट सहिये ।
छन्द प्रबन्ध कवित्त, काव्यरस कासों कहिये ।।
वृद्धा भई मनमांहि, मधुर बाणी मुखमण्डित ।
अपने मन को मार, मौन घर बैठत पण्डित ।।

न संसारोत्पन्नं चरितमनुपश्यामि कुशलं विपाकः पुण्यानां जनयति भयं मे विमृशतः । 
महद्भिः पुण्यौघैश्चिरपरिगृहीताश्च विषया महान्तो जायन्ते व्यसनमिव दातुं विषयिणाम् ।। ३ ।।
अर्थ:
मुझे संसारी कामों में जरा सुख नहीं दीखता । मेरी राय में तो पुण्यफल भी भयदायक ही हैं । इसके सिवा, बहुत से अच्छे अच्छे पुण्यकर्म करने से जो विषय-सुख के सामान प्राप्त किये और चिरकाल तक भोगे गए हैं, वे भी विषय सुख चाहनेवालो का, अन्त समय में दुखों के ही कारण होते हैं ।

इस जीवन में सुख का लेश भी नहीं है । जिनके पास अक्षय लक्ष्मी, धन-दौलत, गाडी-घोड़े, मोटर, नौकर-चाकर, रथ-पालकी प्रभृति सभी सुख के सामान मौजूद हैं, राजा भी जिनकी बात को टाल नहीं सकता, जिनके इशारों से ही लोगों का भला बुरा हो सकता है, ऐसे सर्वसुख संपन्न लोग भी, चाहे ऊपर से सुखी दीखते हों, पर वास्तव में सुखी नहीं हैं; भीतर ही भीतर उन्हें घुन खाये जाता है; किसी न किसी दुःख से वे जरजरित हुए जाते हैं । 

अगर मनुष्य दुखों से दूर रहना चाहे, सदा सुख भोगना चाहे, तो उसे अनित्य और नाशमान पदार्थों से अलग रहना चाहिए । उनमें मोह न रखना चाहिए । बुद्धिमान को लोक-परलोक की असारता और संयोग-वियोग का विचार करके अनित्य पदार्थो से प्रेम न करना चाहिए उसे सदा नित्य अविनाशी परमात्मा से प्रेम करना चाहिए ।

उत्खातं निधिशंकया क्षितितलं ध्माता गिरेर्धातवो 
निस्तीर्णः सरितां पतिर्नृपतयो यत्नेन संतोषिताः ।
मन्त्राराधनतत्परेण मनसा नीताः श्मशाने निशाः 
प्राप्तः काणवराटको‌ऽपि न मया तृष्णेऽधुना मुञ्चमाम् ।। ४ ।।

अर्थ:
धन मिलने की उम्मीद से मैंने जमीन के पैंदे तक खोद डाले; अनेक प्रकार की पर्वतीय धातुएं फूंक डाली; मोतियों के लिए समुद्र की भी थाह ले आया; राजाओं को भी राजी रखने में कोई बात उठा न राखी; मन्त्रसिद्धि के लिए रात रात भर श्मसान एकाग्रचित्त से बैठा हुआ जप करता रहा; पर अफ़सोस की बात है, कि इतनी आफ़ते उठाने पर भी एक कानि कौड़ी न मिली । इसलिए हे तृष्णे ! अब तो तू मेरा पीछा छोड़ ।

इसका यही मतलब है कि, भाग्य के विरुद्ध चेष्टा करना व्यर्थ है । जितना धन भाग्य में लिखा है, उतना तो बिना कोशिश किये, बिना किसी कि खुशामद किये, बिना देश-विदेश डोले, घर बैठे ही मिल जाएगा, सुअवसर स्वयं दरवाजा खटखटा के आपको व्यापार देगा , नौकरी देगा या किसी बहाने धन देगा हीं , पुर्व जन्मों के भगवान के निमित्त आपका दान किया हुआ कई गुणा आपको मिलेगा , । नहीं तो भाग्य के लिखे से अधिक हजारों चेष्टाएं करने पर भी न मिलेगा , अगर गलत करके कुछ कमा भी लिया तो वो छिन जाएगा , लुट जाएगा , रोग शोक में समाप्त हो जाएगा , घाटा लगेगा नुकसान हो जाएगा । 

सिकंदर अमृत के लिए अँधेरी दुनिया में गया; पर अमूर्त के कुण्ड के पास पहुँच जाने पर भी, वह अमृत को चख न सका; क्योंकि उसके भाग्य में अमृत न था । मूर्ख मनुष्य भाग्य पर सन्तोष नहीं करता; धन के लिए मारा मारा फिरता है । जब कुछ भी हाथ नहीं लगता, तब रोता और कलपता है । 

भ्रान्तं देशमनेकदुर्गविषम् प्राप्तं न किञ्चित्फलम् 
त्यक्त्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला ।
भुक्तं मानविवर्जितम परगृहेष्वाशङ्कया काकव- 
त्तृष्णे दुर्मतिपापकर्मनिरते नाद्यापि संतुष्यसि ।। ५ ।।

अर्थ:
मैं अनेक कठिन और दुर्गम स्थानों में डोलता फिरा, पर कुछ भी नतीजा न निकला । मैंने अपनी जाति और कुल का अभिमान त्यागकर, पराई चाकरी भी की; पर उससे भी कुछ न मिला । शेष में, मैं कव्वे की तरह डरता हुआ और अपमान सहता हुआ पराये घरों के टुकड़े भी खाता फिरा । हे पाप-कर्म करने वाली और कुमतिदायिनी तृष्णे ! क्या तुझे इतने पर भी सन्तोष नहीं हुआ ?

खलोल्लापाः सोढाः कथमपि तदाराधनपरै:
निगृह्यान्तर्वास्यं हसितमपिशून्येन मनसा ।
कृतश्चित्तस्तम्भः प्रहसितधियामञ्जलिरपि
त्वमाशे मोघाशे किमपरमतो नर्त्तयसि माम् ।। ६ ।।

अर्थ:
मैंने दुष्टों की सेवा करते हुए उनकी तानेजानि और ठट्ठेबाज़ी सही, भीतर से, दुःख से आये हुए आंसू रोके और उद्विग्न चित्त से उनके सामने हँसता रहा । उन हंसने वालों के सामने, चित्त को स्थिर करके, हाथ भी जोड़े । हे झूठी आशा ! क्या अभी और भी नाच नचाएगी ?

आदित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते जीवितम् 
व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते । 
दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते 
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ।। ७ ।।

अर्थ:
सूर्य के उदय और अस्त के साथ मनुष्यों की ज़िन्दगी रोज़ घटती जाती है । समय भागा जाता है, पर कारोबार में मशगूल रहने के कारण वह भागता हुआ नहीं दीखता । लोगों को पैदा होते, बूढ़े होते, विपत्ति ग्रसित होते और मरते देखकर भी उनमें भय नहीं होता । इससे मालूम होता है कि मोहमाया, प्रमादरूपी मदिरा के नशे में संसार मतवाला हो रहा है ।

किसी ने खूब कहा है :
सुबह होती है शाम होती है ।
योंही उम्र तमाम होती है ।।

विचारकर देखने से बड़ा विस्मय होता है कि दिन और रात कैसे तेजी से चले जाते हैं । जिनको कोई काम नहीं है अथवा दुखिया है, उन्हें तो ये बड़े भारी मालूम होते हैं, काटे नहीं कटते, एक एक क्षण, एक एक वर्ष की तरह बीतता है; पर जो कारोबार या नौकरी में लगे हुए हैं, उनका समय हवा से भी अधिक तेजी से उड़ा चला जा रहा है, यानी कारोबार या धंधे में लगे रहने के कारण उन्हें मालूम नहीं होता । वे अपने कामों में भूले रहते हैं और मृत्युकाल तेजी से नजदीक आता जाता है ।

इसलिए भज् गोविंदम ,भज् गोविंदम ,भज् गोविंदम मूढ़मते ।

अभी से भजन करले भक्ति करले बन्दे । नहीं तो तब पछताए क्या होत है जब चिड़ियां चुग गई खेत् 

🙏❤️🙏

श्री राधे । 🙏❤️🙏

अभी से भजन करले भक्ति करले बन्दे । नहीं तो तब पछताए क्या होत है जब चिड़ियां चुग गई खेत्

अरे भक्ति तो बुढ़ापे का चीज है, अभी क्या है अभी तो हमारी उम्र हीं क्या है, न न ऐसे भ्रम में मत परो , मौत कब आ जाए किसको पता, दुसरा बुढ़ापे में परिवार और भी बड़ा होगा, आज तुम्हारा संसार छोटा है सिर्फ अपने बेटा, बेटी, पति, पत्नी, मां-बाप तक हीं मोह सिमित है, कल और नाती पोते होंगे उनके साथ अटैचमेंट बढ़ेगा फिर तुम उनमें आसक्त हो जाओगे, तुम्हारा पतन हो जाएगा । :- श्री महाराज जी ।🙏❤️🙏

वैराग्य शतकम से -
एक दुखित बूढ़ा सेठ
————————–
एक वैश्य ने उम्र भर मर-पचकर खूब धन जमा किया । बुढ़ापे में पुत्रों ने सारे धन पर अधिकार कर बूढ़े को पौली में एक टूटी सी खाट और फटी सी गुदड़ी पर डाल दिया और कुत्ता मारने के लिए हाथ में लकड़ी दे दी । सुबह शाम घर का कोई आदमी बचा-खुचा, बासी-कूसी उसे खाने को दे जाता । सेठ बड़े दुःख से अपना जीवन जीता था । पुत्र-वधुएं दिन भर कहा करती थी – “यह मर नहीं जाते, सबको मौत आती है पर इनको नहीं आती। दिन भर पौली में थूक-थूक कर मैला करते हैं ।” एक दिन एक पोता उन्हें पीट रहा था । इतने में नारद जी आ निकले उन्होंने सारा हाल देखकर कहा – “सेठजी ! आप बड़े दुखी हैं । स्वर्ग में कुछ आदमियों की आवश्यकता है । अगर तुम चलो तो हम ले चलें ।” सुनते ही सेठ ने कहा – “जा रे वैरागीड़ा ! मेरे बेटे पोते मुझे मारते हैं चाहे गाली देते हैं, तुझे क्या ? तू क्या हमारा पञ्च है ? मैं इन्हीं में सुखी हूँ । मुझे स्वर्ग की आवश्यकता नहीं ।” सेठ की बातें सुनकर नारद जी को बड़ा आश्चर्य हुआ । कहने लगे – “ओह ! संसार सचमुच ही मोह-पाश में फंसा है । मोह की मदिरा के मारे इसे होश नहीं । मनुष्य ने कब्र में पैर लटका रखे हैं; फिर भी विषयों में ही उसका मन लगा है ।

गतं तत्तारुण्यं तरुणिहृदयानन्दजनकं 
विशीर्णा दन्तालिर्निजगतिरहो यैष्टिशरणां । 
जड़ी भूता दृष्टिः श्रवणरहितं कर्णयुगलं 
मनोमे निर्लज्जं तदपि विषयेभ्यः स्पृहयति ।।

तरुणियों के ह्रदय में आनन्द पैदा करने वाली जवानी चली गयी है, दन्तपंक्ति गिर गयी है, लकड़ी का सहारा लेकर चलता हूँ, नेत्र ज्योति मारी गयी है, दोनों कानों से सुनाई नहीं देता, तो भी मेरा निर्लज्ज मन विषयों को चाहता है ।

जिस सर का है यह बाल, उसी सर में जोड़ दे।।
पर ज़ौक़ न छोड़ेगा इस पीरा जाल को।
यह पीरा जाल, गर तुझे चाहे तो छोड़ दे।।

मतलब या कि लोग दुनिया को नहीं छोड़ते, दुनिया ही उन्हें निकम्मा करके छोड़ देती है ।

वैराग्य शतकं – तृष्णादूषणं – 14 

वलीभिर्मुखमाक्रान्तं पलितैरङ्कितं शिरः।
गात्राणि शिथिलायन्ते तृष्णैका तरुणायते।। १४ ।।

अर्थ:
चेहरे पर झुर्रियां पड़ गयी, सर के बाल पककर सफ़ेद हो गए, सारे अंग ढीले हो गए – पर तृष्णा तो तरुण होती जाती है ।

नैननकी पलही में पल के, क्षण आधि घरी घरी घटिका जो गई है ।
जाम गयो जुग जाम गयो, पुनि सांझ गयी तब रात भई है ।
आज गयी अरु काल गई, परसों तरसों कुछ और ठई है ।
सुन्दर ऐसे ही आयु गई, तृष्णा दिन ही दिन होत नई है ।

आज सारा संसार तृष्णा के फेरे में पड़ा हुआ है । अमीर और गरीब, सभी इसके बन्धन में बन्धे हैं । गरीब की अपेक्षा धनियों को तृष्णा बहुत है । धनी हमेशा निन्यानवे के फेरे में लगे रहते हैं । ९९ होने पर १०० करने की फ़िक्र लगी रहती है । १००० होने पर १०,००० की, १० हज़ार होने पर लाख की, लाख होने पर करोड़ की और करोड़ होने पर अरब-ख़रब की तृष्णा लगी रहती है । इसी फेर में मनुष्य रोगी और बूढा हो जाता है पर तृष्णा न रोगिणी होती है और न बूढी ।

अङ्गम् गलितं पलितं मुण्डम दशनविहीनं जातं तुण्डं ।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम ।।

अंग शिथिल हो रहे हैं, सर गंजा हो गया है, मुँह से दांत गिर चुके हैं, चलने के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ता है, फिर भी कामना पीछा नहीं छोड़ रहीं ।

अवश्यं यातारश्चिरतरमुषित्वाऽपि विषया
वियोगे को भेदस्त्यजति न जनो यत्स्वयममून् ।
व्रजन्तः स्वातन्त्र्यादतुलपरितापाय मनसः
स्वयं त्यक्त्वा ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति ।। १६ ।।

अर्थ:
विषयों को हम चाहें कितने दिन तक क्यों न भोगें, एक दिन वे निश्चय ही हम से अलग हो जायेंगे; तब मनुष्य उन्हें स्वयं अपनी इच्छा से ही क्यों न छोड़ दे? इस जुदाई में क्या फर्क है ? अगर वह न छोड़ेगा तो, वे छोड़ देंगे । जब वे स्वयं मनुष्य को छोड़ेंगे, तब उसे बड़ा दुःख और मनःक्लेश होगा । अगर मनुष्य उन्हें स्वयं छोड़ देगा, तो उसे अनन्त सुख और शान्ति प्राप्त होगी ।

जो लोग विषयों को पहले ही त्याग देते हैं, उन्हें उनके न होने पर दुःख नहीं होता; किन्तु जो उन्हें नहीं छोड़ते, उन्हें उनके न होने पर महाकष्ट होता है । जो बुद्धिमान पहले से ही धन दौलत स्त्री-पुरुष आदि से मोह हटा लेते हैं, उन्हें मरते समय कष्ट नहीं होता । जो उनमें अपना मन लगाए रहते हैं, वे मरते समय रोते हैं, पर ज़बान बंद हो जाने से अपने मन की बात बता नहीं सकते । इसलिए जो सुख से मरना चाहें, उन्हें पहले से ही विषयों से मुख मोड़ लेना चाहिए । इसी तरह, जो आज नाना प्रकार के सुख भोग रहा है, यदि कल उसे वे सुख न मिलें, तो वह बड़ा दुखी होता है; किन्तु जो विषयों को भोगते तो हैं, किन्तु उनमें आसक्ति नहीं रखते, उन्हें विषय सुखों के न मिलने या उनसे बिछुड़ने पर ज़रा भी कष्ट नहीं होता ।

सांसारिक सुख-भोग असार, अनित्य और नाशवान हैं । ये सदा स्थिर रहनेवाले नहीं; आज जो लक्ष्मी का लाल है, वह कल दर दर का भिखारी देखा जाता है; जो आज जवान पट्ठा है, मिर्जा अकड़बेग की तरह अकड़ता हुआ चलता है, वही कल बुढ़ापे के मारे लकड़ी टेक टेक कर चलता है । जिसे पहले सब लोग खूबसूरत कहते थे और मुहब्बत से पास बिठाते थे, अब उसके पास खड़ा होना भी नहीं चाहते । मतलब यह कि यौवन, जीवन, मन-धन, शरीर-छाया और प्रभुता, यह सब अनित्य और चञ्चल हैं; अतः दुःख के कारण हैं । काय में मरण, लाभ में हानि , जीत में हार, सुन्दरता में असुन्दरता, भोग में रोग, संयोग में वियोग और सुख में दुःख – ये सब दुःख के कारण हैं । अगर बिना मृत्यु का जीवन, बिना रंज कि ख़ुशी, बिना बुढ़ापे कि जवानी, बिना दुःख का सुख, बिना वियोग का संयोग और सदा-सर्वदा रहने वाला धन होता, तो मनुष्य को इस जीवन में अवश्य सुख होता ।
विषय भोगों में सुख नहीं है । ये असार हैं; केले के पत्ते या प्याज के छिलको की तरह सारहीन हैं । फिर भी, मोहवश मनुष्य विषयों में फंसा रहता है । पर एक न एक दिन मनुष्य को इन विषय-भोगों से अलग होना ही पड़ता है । अलग होने के समय विषय भोगी को बड़ा दुःख होता है इससे विषय परिणाम में दुःखदायी ही हैं ।

इसलिए भज् गोविंदम ,भज् गोविंदम ,भज् गोविंदम मूढ़मते ।

अभी से भजन करले भक्ति करले बन्दे । नहीं तो तब पछताए क्या होत है जब चिड़ियां चुग गई खेत् 
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