Friday, 26 January 2024

भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी अभिन्न हैं । दो नहीं है ।


भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी अभिन्न हैं । दो नहीं है । दोनों एक ही है और दोनों में अंतर भी है । 
यह कैसे हो सकता है कि दोनों एक भी है और दोनों में अंतर भी है । तो हो सकता नहीं वल्कि है ।
भगवान श्री कृष्ण के प्रति अथाह अनंत निष्काम प्रेम का स्वरूप हीं श्री राधा रानी है । दुसरे शब्दों में श्री राधा रानी भगवान श्री कृष्ण के प्रेम की सारभूता तत्व का नाम है । 
श्री कृष्ण परम तत्व है तो श्री राधा रानी उनके प्रेम का परम रस स्वरूप हैं । यानि भगवान श्री कृष्ण तत्व है तो श्री राधा रानी उनकी प्रेम रस सार रूपी गुणात्मक परम रस तत्व हैं । 
भगवान श्री कृष्ण के परम प्रेम रस सार तत्व हीं आज से 5128 वर्ष पहले इस धरा धाम पर श्री राधा रूप में अवतरित हुई थी । 

फिर यही परम प्रेम रस सार रूपी श्री राधा तत्व हीं आज से लगभग 600 बर्ष पहले गौरोगों के स्वरूप में साकार होकर अवतरित हुए थे ।

फिर वही श्री राधा तत्व तीसरी बार साकार रूप लेकर हमारे गुरू देव श्री कृपालु के स्वरूप में इस धरा धाम पर अवतरित हुए थे ।

जिन जिन जीवों के ह्रदय में भगवान श्री कृष्ण के प्रति जो भी प्रेम है , जितनी मात्रा का प्रेम है उन सभी में श्री राधा तत्व के प्रेम रस की उतनी मात्रा प्रकट है । 

यह भगवद् प्रेम यानि ब्रजनंदन श्री कृष्ण का प्रेम बड़ा दुर्लभ है । यह श्री राधा रानी के प्रेम रस गुणों के बिना संभव नहीं है । 
अत: यही कारण है कि ऐसा दुर्लभ प्रेम श्री कृष्ण के प्रति किसी जीव के ह्रदय में प्रकट हो यह श्री महाराज जी के कृपा के बिना असंभव है । आप सब हम सब बहुत भाग्यशाली हैं कि श्री महाराज जी के कृपा के कारण वही श्री राधा प्रेम रस सार हमारे आपके ह्रदय में भगवान श्री कृष्ण के प्रति प्रेम के रूप में हिलोरें ले रहा है । इसका प्रमाण यह है कि श्री महाराज जी के कृपा के फलस्वरूप भगवान श्री कृष्ण के प्रति प्रेम हीं आंसु बन कर आपके कपोलों को भींगा रहा है तर कर रहा है । यही श्री राधा रानी की गुणात्मक प्रभाव है । यह शौभाग्यशालियों के ह्रदय में उत्पन्न होता है । 

इस भगवद् प्रेम की प्यास हीं श्री राधा रानी प्रेम रस रूपी तत्व है जो हमारे आपके ह्रदय में श्री महाराज जी का दिया हुआ प्रसाद है । इस भगवद् प्रेम रस रूपी अमर लता को हम जितना अधिक बढावेगे उतना हमारे ह्रदय में परमानंद प्रकट होगा । जो श्री महाराज जी के बतलाई साधना रूपी जल से सिंचित होकर लगातार बढ़ेगी ।
श्री राधे । उनकी कृपा से यह मेरा आंशिक अनुभव है । और आप सब भी उनके प्रेमी जन हैं वल्कि मुझसे कहीं अधिक है आप सब इसलिेए आपका तो है हीं । यह अनुभवगम्य है आपका और हमारा जो मैने आपसे शेयर किया है ‌ । श्री राधे ।

और हां एक बात और , इसी श्री राधा रूपी परम दिव्य प्रेम रस के बढ़ते हुए उत्तरोत्तर प्रवाह को संभालने के लिये हमारे अंत:करण की शुद्धता परमावश्यक है । जैसे गंगा जी को संभालने के लिय भगवान शंकर की जटा ।
 अंत:करण शुद्ध होने पर श्री महाराज जु द्वारा इसे दिव्यता प्रदान करने के बाद ही इस परम दिव्य प्रेम के शक्तिशाली अथाह प्रेम के प्रवाह को हमारा ह्रदय संभाल सकेगा और हम सदा के लिय आनंद प्राप्त कर लेंगे । श्री राधे :- आपका संजीव । 🙏🙏🙏❤️🙏🙏🙏🙏

Wednesday, 24 January 2024

गुरु के हम सदा ऋणी हैं!

गुरु के हम सदा ऋणी हैं! 

गुरु जीव को बहुत नीचे से उठाकर यानि पाप रूपी पंक से निकाल कर सबसे ऊपर या परम पद पर पहुंचा देते हैं , अर्थात साक्षात् भगवान की गोद में बिठा देते हैं | अनंत जन्मों के दूषित अंतःकरण को, अपने सत्संग से स्वच्छ और शुद्ध बना देते हैं, फिर उसमें अपनी कृपा शक्ति द्वारा भगवान का दिव्य प्रेम भी भरते  हैं | इस प्रकार, गुरु ऐसे असंभव को भी संभव बनाते  हैं, भला उनके ऋण से कोई कैसे उरिन हो सकता है ?

 आध्यात्मिक जगत में जीव का आधार केवल गुरु हैं ! गुरु की कृपा के बिना, उनके मार्गदर्शन के बिना, इस पथ पर चलना सर्वथा असंभव है | भगवान कभी किसी जीव पर स्वयं अपनी अंतिम कृपा अर्थात दिव्य प्रेमदान  नहीं करते , गुरु के माध्यम से ही जीव पर भगवान की अंतिम कृपा - भगवद दर्शन , भगवद प्रेम की प्राप्ति होती है ! इसका बहुत सुन्दर उदहारण श्रीमदभागवत में है | उद्धव भगवान के परम सखा थे, सदा कृष्ण के साथ रहते थे, पर भगवान ने अपने  दिव्यप्रेम का स्वाद उद्धव जी को स्वयं नहीं चखाया  ! दिव्य प्रेम की प्राप्ति के लिए उन्होंने उद्धव को ब्रज में गोपियों के पास भेजा और वहां जाकर उद्धव को जो लाभ मिला, उसे सभी भागवद प्रेमी जन जानते हैं ! 

जीव में यदि आध्यात्मिक पिपासा है तो उसे भगवान से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि जीवन में कोई सच्चा महापुरुष मिल जाये और हमारी उन महापुरुष के प्रति सच्ची श्रद्धा हो जाये ! भगवान ऐसी प्रार्थना को जरूर पूरा करते हैं ! ऐसा बनाव अवश्य बनाते हैं और उसी जन्म में उसे गुरु की प्राप्ति हो भी जाती है | 

लेकिन, जिनपर ऐसी कृपा हो चुकी है यानि जिनको गुरु मिल गए हैं, गुरु द्वारा तत्वज्ञान सुनने का सौभाग्य भी मिल गया है और तत्त्वज्ञान समझ में भी आता है उनको तो हरि से बस यही प्रार्थना निरंतर करनी चाहिए कि हे प्रभु ! मैं सदा अपने गुरु का आभार मानूँ | उनकी सेवा में तन , मन, धन, प्राण सब निछावर करूँ और सदा  उनके उपदेशों का स्मरण करता रहूँ | वे मुझसे जिस दीन और मधुर व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं, मैं सदा वैसा ही आचरण करूँ ; बस, मुझे ऐसा बना दीजिये ! :- पूज्यनीयां रासेश्वरी देवी जी।

इस कलयुग के दुष्प्रभाव से बचने का एक मात्र उपाय है ,

इस कलयुग के दुष्प्रभाव से बचने का एक मात्र उपाय है , श्री कृपालु महाप्रभु जी को पुरे मनोयोग से अपना गुरू मान कर उनके सत्संग के द्वारा तत्वज्ञान हासिल करके उनके सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए जीवन जीना तथा अपने मानव जीवन को सफल बनाकर अपने लक्ष्य को हासिल करना । इस कलयुग का दुसरा कोई दवा नहीं है ।

जब परीक्षित सरिखे राजा के मस्तिष्क में छल से कलयुग घुस गया और उनके विवेक को‌ हर लिया और उनके द्वारा ऐसा नामापराध करवा दिया की उनको भी अपने उद्धार के लिये श्री शुकदेव जी से तत्वज्ञान प्राप्त करना परा , तो हम पतित जीवों की हैसियत हीं क्या है भला ? हमें यह बहुत गहराई से सोचना चाहिए ।

हम जीवों पर तो कलयुग इस तरह हावी है कि आज अच्छा क्या है और बुरा क्या है इसकी पहचान तक नही हमें चाहे हम कितना भी बड़ा किताबी पंडित हों ।

आज इस कलिकाल में हरेक मनुष्य चाहे वो किसी भी धर्म संप्रदाय या मजहब से क्यों न हो, स्वयं को महान पंडित समझने वाले ( वास्तविक संतों को छोड़ कर ) अंदर से खूद अशांत है, बैचैन है, दुखी हैं, अतृप्त हैं किंतु दुसरे को जीवन का सार और धर्म कर्म समझा रहे हैं । भला ऐसे लोगों से क्या मिलने वाला है ?

वेचारे इन स्वघोषित पंडितों, तथाकथित गली गली के वैज्ञानिको, बड़े बड़े किताबी ज्ञान के पंडितों आदि के दिमाग पर कलिकाल का ऐसा असर आज देखने को मिल रहा है कि वो क्या बोल रहे हैं और क्या कर रहे हैं , उस पर खुद हीं उनको भरोसा नहीं है और ये लोग भ्रम को ही यथार्थ समझने की भुल करके अपना तो विनाश कर हीं रहे हैं बेचारे अपने चेले चपाटियों के जीवन का भी सर्वनाश करने पर तुले हुए हैं ।

ये कलयुग इतना शक्तिशाली है कि जब वो अपने शुरुआत में ही राजा परिक्षित सरिखे व्यक्ति को गुमराह करके उनसे पाप करा सकता है जो अपनी मां उत्तरा के गर्भ में ही भगवद् दर्शन कर लिया था तो हमलोगों और इन स्वघोषित विद्वानों की विशात ही क्या है भला ? 

इसलिए अब भी समय है आ जाईए इस युग के सबसे बड़े परमाचार्य पंचम मूल जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु जी के शरण में जो शुकदेव सरिखे महान महान परमहंसों द्वारा भी पुजित तथा सेवित है , उनसे तत्वज्ञान प्राप्त करके अपना तथा अपने शिष्यों का कल्याण करके सदा के लिय आनंदमय हो जाईए ।
नहीं तो यह कलयुग तो बैठा ही है हम सबके मस्तिष्क में अपना प्रभाव डालने के लिए और उसका प्रभाव तो दिखाई हीं दे रहा है हमसब पर कि हम आज स्वयं को समझने में हीं जब असमर्थ हैं तो दुसरे के बुद्धि को आप और हम कैसे समझ सकते हैं भला की यह हमें किस ओर ले जा रहा है ? 

नहीं तो गलत सलत पुजा पाठ , कर्म कांड और झूठ बोलना स्वयं को सही समझना और पाप का भागी बनना हीं नियती बना रहेगा इस कलियुग के प्रभाव के कारण । 
श्री राधे :- संजीव ।।🙏❤️🙏

गुरु के हम सदा ऋणी हैं!

गुरु के हम सदा ऋणी हैं! 

गुरु जीव को बहुत नीचे से उठाकर यानि पाप रूपी पंक से निकाल कर सबसे ऊपर या परम पद पर पहुंचा देते हैं , अर्थात साक्षात् भगवान की गोद में बिठा देते हैं | अनंत जन्मों के दूषित अंतःकरण को, अपने सत्संग से स्वच्छ और शुद्ध बना देते हैं, फिर उसमें अपनी कृपा शक्ति द्वारा भगवान का दिव्य प्रेम भी भरते हैं | इस प्रकार, गुरु ऐसे असंभव को भी संभव बनाते हैं, भला उनके ऋण से कोई कैसे उऋन हो सकता है ?

 आध्यात्मिक जगत में जीव का आधार केवल गुरु हैं ! गुरु की कृपा के बिना, उनके मार्गदर्शन के बिना, इस पथ पर चलना सर्वथा असंभव है | भगवान कभी किसी जीव पर स्वयं अपनी अंतिम कृपा अर्थात दिव्य प्रेमदान नहीं करते , गुरु के माध्यम से ही जीव पर भगवान की अंतिम कृपा - भगवद दर्शन , भगवद प्रेम की प्राप्ति होती है ! इसका बहुत सुन्दर उदहारण श्रीमदभागवत में है | उद्धव भगवान के परम सखा थे, सदा कृष्ण के साथ रहते थे, पर भगवान ने अपने दिव्यप्रेम का स्वाद उद्धव जी को स्वयं नहीं चखाया ! दिव्य प्रेम की प्राप्ति के लिए उन्होंने उद्धव को ब्रज में गोपियों के पास भेजा और वहां जाकर उद्धव को जो लाभ मिला, उसे सभी भागवद प्रेमी जन जानते हैं ! 

जीव में यदि आध्यात्मिक पिपासा है तो उसे भगवान से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि जीवन में कोई सच्चा महापुरुष मिल जाये और हमारी उन महापुरुष के प्रति सच्ची श्रद्धा हो जाये ! भगवान ऐसी प्रार्थना को जरूर पूरा करते हैं ! ऐसा बनाव अवश्य बनाते हैं और उसी जन्म में उसे गुरु की प्राप्ति हो भी जाती है | 

लेकिन, जिनपर ऐसी कृपा हो चुकी है यानि जिनको गुरु मिल गए हैं, गुरु द्वारा तत्वज्ञान सुनने का सौभाग्य भी मिल गया है और तत्त्वज्ञान समझ में भी आता है उनको तो हरि से बस यही प्रार्थना निरंतर करनी चाहिए कि हे प्रभु ! मैं सदा अपने गुरु का आभार मानूँ | उनकी सेवा में तन , मन, धन, प्राण सब निछावर करूँ और सदा उनके उपदेशों का स्मरण करता रहूँ | वे मुझसे जिस दीन और मधुर व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं, मैं सदा वैसा ही आचरण करूँ ; बस, मुझे ऐसा बना दीजिये !

Friday, 19 January 2024

झाड़खंड राज्य के नगर उंटारी प्रखंड , गढ़वा जिले में 1885 में 1280 किलो विशुद्ध सोने का वंशीधर भगवान का स्वयं भू प्रकट प्रतिमा

भगवान श्री कृष्ण और राधिका जी का दिव्य विग्रह और उनके एक भक्त कि सत्य एवं दुर्लभ घटना की अमर कहानी :-
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
झाड़खंड राज्य के नगर उंटारी प्रखंड , गढ़वा जिले में 1885 में 1280 किलो विशुद्ध सोने का वंशीधर भगवान का स्वयं भू प्रकट प्रतिमा का प्राण प्रतिष्ठा भी मंदिर बनने से पहले हुआ था। 
और फिर बनारस से सोने से बना श्री राधा रानी की प्रतिमा बाद में स्थापित की गई थी । 
नगर उंटारी की रानी भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्त थीं, राज्य में रानी "शिवमणी कुंवर" ही शासक थी, वो राज्य के पुर्व राजा की अविवाहित पुत्री थी जो अपने पिता कि एक मात्र संतान थीं , और ए भगवान श्री कृष्ण को अपना पति मानती थी । नगर में आज भी वो मीरा का अवतार मानी जाती हैं । 
वो भगवान श्री कृष्ण से मिलने के लिए व्याकूल रहती थी । कई कई दिन तक वो श्री कृष्ण के याद में वेहोश रहती थी । वेहोशी में ही भगवान श्री कृष्ण उनको दर्शन दिए और उनके किला से कुछ दुर पहाड़ी पर स्वयं का होने का प्रमाण दिए । 

अत: मुर्छा से उठने के बाद हीं वो दरबार में अपने दरबारियों को बुला कर कहा कि भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा दरबार से कुछ दूर पहाड़ी के टीले पर पीपल के पेड़ के नीचे अवस्थित है , उन्हें लेने जाना है । कुछ सैनिक और कुछ हाथी लेकर सभी दरबारी वहां गए रानी के साथ , एक जगह जब रानी ने अपने हाथों से कुछ ही मिट्टी हटाई तो अंदर से इसी प्रतिमा का अति दिव्य प्रकाश से प्रकाशमान स्वर्ण मुकुट युक्त भगवान का प्रतिमा जो इस पोस्ट में अटैच्ड है वहां दिखाई दिया । यह प्रतिमा अद्भुत है, अद्वितीय है , अति सुन्दर है । यह 1280 किलो सोने का है तथा स्वयंभू प्रकट है । 
इस प्रतिमा को हांथी बदल बदल कर हाथी पर लाद कर लाया जा रहा था । लेकिन रानी के किला के पीछे हाथी बैठ गया , प्रतिमा को वहां उतार लिया गया दुसरे हांथी पर रखने के लिए , लेकिन ये भगवान श्री कृष्ण का प्रतिमा वहां से टसमस नहीं हुआ । अत: यहीं पर इस प्रतिमा के उपर टेंपररी पंडाल बना कर प्राण प्रतिष्ठा किया गया । बाद में वहां मंदिर बना । इसलिए मंदिर आरा तिरछा बना है । 
और बाद में फिर स्वप्न के आधार पर श्री राधिका जी का सोने का प्रतिमा बनारस राज्य के राजा द्वारा भेजा गया जिनको उनके बगल में स्थापति किया गया है । 

भगवान का यह सोने का विग्रह और राधिका जी का विग्रह इतना खूबसूरत है कि अगर कोई भावुक जीव इन विग्रह को लगातार देख ले कुछ देर तक तो ह्रदय में आनंद उमर जाता है , आंखों से अपने आप अश्रुपात होने लगते हैं और भगवान के प्रेम वो मनुष्य वशीभूत हो जाता है और यहां भावुक भक्त अपना सुध-बुध खो देते हैं , यहां से हटने का जी नहीं करता । 

मैंने स्वयं कई बार इनका दर्शन किया है । 

अत: भगवान के इस प्रतिमा में भी मंदिर बनने से पहले प्राण प्रतिष्ठा किया गया था 
। रांची से यह मंदिर 250 किलोमीटर दुरी पर अवस्थित है । कहते हैं इस मंदिर को आताताईयों ने लूटने का कई बार प्रयास किया , लेकिन वो सफल नहीं हो पाया और आज तक इस मंदिर को कोई नुक्सान नहीं पहुंचा सका है । सभी देव गंधर्व किन्नर और भगवान श्री कृष्ण के सोलह अक्ष्वनी सेना अदृश्य रूप में इस मंदिर का आज भी रक्षा करते रहते हैं । 
जिसने भी इस मंदीर को नुक्सान पहुंचाने का प्रयास किया वो समाप्त हो गया , उसका नामों निशान मिट गया और हो जाता है । श्री राधे । 
और जो अटूट श्रद्धा विश्वास शरणागत तथा निष्काम प्रेम भाव से आकर इनका दर्शन करता है उसके करोड़ों पाप नष्ट हो जाते हैं दर्शन मात्रेण, और लौकिक अलौकिक लाभ पा लेता है वो । 
भगवान का यह सोने का स्वयंभू प्रकट प्रतिमा के आधार का पांच फिट भाग जमीन के अंदर है वो भी सोने का है यह आधार नाग का है और उसके फन पर बने सहस्त्र पंखुरी वाला कमल के उपर भगवान खड़े हैं, भगवान की ऊंचाई साढे चार फीट का है । उनका रूप अति मनोहर है । श्री राधे । :- संजीव कुमार, रांची ।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Thursday, 11 January 2024

तत्वज्ञान पक्का हो जाने का क्या लक्षण है ?

एक बार जिसका तत्वज्ञान पक्का हो गया उसका कोई भी कुसंग कुछ नहीं बिगाड़ कर सकता कभी । तत्वज्ञान एक एंटी रस्ट कोटिंग की तरह है , इसकी परत जिस जीव के अंत:करण पर, गुरू पर आस्था श्रद्धा तथा दृढ़ विश्वास की परत रूप से एक बार चढ़ गया, उसको कुसंग रूपी जंग और माया रूपी संसार अपनी तरफ कभी आकर्षित कर हीं नहीं सकता है । 

वो संसार में रहते हुए भी भीतर से वैरागी तथा हर क्षण हर अवस्था में अपने हरिगुरू का अनन्य तथा शरणागत रहते हुए अंतिम लक्ष्य भगवद् प्राप्ति के लिए मन ही मन हर क्षण साधना करता रहेगा । और इस काल के सफर में भी बड़ा आनंद मिलना शुरू हो जाता है। तत्वज्ञान पक्का हो जाने के बाद से और भगवद् प्राप्ति की लक्ष्य के लिय साधना के सफर के बीच में भी बला का आनंद मिलता है , क्षण क्षण प्रेम की अभुत और अकुत अनुभूति सफर के हर पड़ाव पर बढ़ते जाता है । 

 ऐसा हुआ ही नहीं आजतक की कोई अगर अनन्य तथा शरणागत भाव से भीतर से यह रियलाईजेशन कर लें ,श्रद्धा संपन्न होकर पूर्ण विश्वास कर लें कि हम शरीर नहीं भगवान का अंश जीवात्मा है तथा हमारा सभी नाते रिस्ते केवल भगवान तथा गुरू से उसको संसार से वैराग्य और भगवान तथा अपने गुरू से अटैचमेंट न हुआ हो ! 

श्री महाराज जी ने स्पष्ट कहें है कि साधना काल यानि जबतक तत्वज्ञान पक्का न हो जाए तबतक जीव को अनन्य तथा शरणागति का पालन करना ही होगा । उसके बाद जब साधक का तत्वज्ञान गुरू कृपा से एक बार पक्का हो गया तो वो हमेशा अनन्य और शरणागत हर हाल में अपने आप रहेगा चाहे वो कितना भी गंदा वातावरण में पर जाए या किसी दुसरे का बात उसके कान में परे और सुने । वो भीतर से अनन्य तथा शरणागत अपने गुरू और ईष्ट का ही रहेगा हर हमेशा । 

तत्वज्ञान पक्का हो जाने का क्या लक्षण है ? तो तत्वज्ञान पक्का होने का लक्षण यह है कि साधक के मन में कोई भी संसारिक कामना पैदा न हो स्वाभाविक रूप से । किसी भी संसारिक बस्तू का आभाव या नुकसान हो जाए तो उसका मन स्वाभाविक रूप से रत्ति भर भी विचलित न हो और उल्टा अपने हरि और गुरू के प्रति और भी प्रेम बढ़ जाए कोई नुक्सान होने पर ।

कबीर दास जी के घर में जो थोड़ा बहुत बर्तन था उसे चोर चुरा लिया , वो नाचने लगे अच्छा हुआ , अब बर्तन के चोरी की चिंता भी खत्म । उसके बाद उनके घर को कुछ लोगों ने दुष्टता से जला दिया , वो और भी विभोर हो गए और वोले भगवान ने मेरे उपर बड़ा उपकार किया है। अब सारी धरती हमारी बिस्तर है और आकाश मेरा छत । 
वो फकीर बन कर घुमने लगे ।
अब एक जगह यमुना जी के किनारे अपनी जप की माला अधोवस्त्र और पानी पीने की छोटी मटकी आदि रख कर यमुना जी में स्नान करने गए, तभी एक बंदर ने उनका माला उठा कर भाग गया और उसे तोर कर फेंक दिया और मटकी भी फोर दिया । 

कबीर जी और भी विभोर हो गए और पद बना कर नाच कर गाने लगे :- 

मोरी सर से टली बला 
भला हुआ मेरी मटकी फूटी 
मैं तो पनिया भरन से छूटी 
मोरी सर से टली बला 

भला हुआ मोरी माला टूटी 
मोरी सर से टली बला 
माला कहे है काठ की 
अरे तू क्या फेरे मोय 
मन का मनका फेर दे 
सो तुरत मिला दूँ तोय 

भला हुआ मोरी माला टूटी 
मैं तो राम भजन से छूटी 
मोरे सर से टली बला 

माला फेरों न कर जपों 
और मुख से कहूँ न राम 
राम हमारा हमें जपे रे 
हम पायो बिसराम 
भला हुआ मोरी माला टूटी 
मोरे सर से टली बला 

हद हद कर के सब गए 
और बेहद गया न कोय 
अनहद के मैदान में 
 रहा 'कबीर' सोय 

- हद हद कर सब गए यानि सब लोग संसारिक धन जन के लिए जीवन भर हाय हाय करते मर जाता है लेकिन कोई भी यहां से इसे साथ लेकर आजतक नहीं गया ।
इसलिए तत्वज्ञ हाय हाय नहीं करता वो तो निश्चिंत रहता है हर हाल में , विल्कूल स्थित प्रज्ञ की अवस्था और चाईलेंज करता है भगवान को कि ह्रदय से जब जाओगे मर्द बंदौगे तोय । तुम मेरे हृदय से अब निकल कर तो दिखाओ तब तुमको माने ।। 

माला तो सांसों का भगवान ने दिया हीं है हमें , तो बहिरंग माला लेकर जपना तो एक दिखावा है ।।
"सांसों की माला में सुमिरू मैं तेरा नाम "
ये बहिरंग माला वाला लेकर जप करने से कुछ नहीं होता । मन और ह्रदय जबतक राममय गुरू सेवा और कृपा से न हो जाए तब तक जप तप व्रत पुजा उपवास यज्ञ कर्म धर्म सब दिखावा है व्यर्थ है , कोई लाभ नहीं है इन सबसे । 
तो जिसके उपर तत्वज्ञान रूपी एंटी रस्ट कोटिंग एक बार चढ़ गई उसका तत्वज्ञान पक्का हो जाता है और तत्वज्ञान पक्का जिसका हो गया वो जीव कुछ भी करे बहिरंग उस पर उसका बहिरंग एक्टिंग उसके अंत:करण को फिर कभी गंदा नहीं कर पाता है । 
श्री राधे । जय जय श्री राधे ।
:- मेरे प्राणनाथ श्री महाराज जी से प्राप्त तत्वज्ञान और दृष्टि से ।

तत्वज्ञान क्या है किसे कहते हैं , यह कैसे होगा ?

ऐसे साधक जो अनन्य नहीं है उनके लिए यह पोस्ट बहुत लाभदायक है :- एक जिज्ञासु व्यक्ति ने कल रात सिंगापुर से व्हाट्स एप के द्वारा कौल करके बड़ी विनम्रता से एक जिज्ञासा भरा प्रश्न पुछा कि तत्वज्ञान किस प्रकार साधकों की रक्षा करता है पुरा डिटेल्स में समझाए । तथा यह भी बतलाए की श्री महाराज जी ने जो कहें है तत्वज्ञान हो जाने का मतलव है 50% भगवद् प्राप्ति हो जाना , वो कैसे ? 

उत्तर :- आपका जिज्ञासा विल्कूल सही और उत्तम है , देखिए तत्वज्ञान क्या है सबसे पहले हमें यह समझना होगा । श्री महाराज जी ने हमें तत्वज्ञान करवाया है और आज भी हमें करवा रहे हैं अपने प्रचारकों के द्वारा साथ साथ साधना भी करवा रहे हैं । 
ये तत्वज्ञान बस तीन है । इसी तीन के बारे में अनेकों शास्त्रों में, ग्रंथों में अनेका अनेक श्लोकों के द्वारा लंबी चौड़ी व्याख्या कि गई है। ये तीनों को किसी भगवद् प्राप्त महापुरुष का शरण ग्रहण करके उनके द्वारा ठीक ठीक समझने से तथा उनके बतलाए मार्ग का अनुसरण करने से तत्वज्ञान पक्का हो जाता है जीव को । ये तीन तत्वज्ञान क्या है ?  

तो पहला - हम कौन हैं यानी जीव शक्ति कौन है , क्या है ? भगवान से हमारा क्या संबंध है ?
 दुसरा - ये संसार यानी माया शक्ति क्या है ? 
 तीसरा - भगवान कौन है? तथा हम उनको कैसे प्राप्त कर सकते हैं ? 

बस इन्हीं तीन बातों को वास्तविक महापुरुष वेदों शास्त्रों की ऋचाएं , श्रूतियों, स्मृतियों के श्लोकों का वास्तविक अर्थ समझाते हुए अपने अनुयायियों को तत्वज्ञान करा देते हैं । 
महापुरुषों के द्वारा पूर्ण तत्वज्ञान हो जाने का मतलव यही है कि श्रूतियों स्मृतियों तथा वेद की ऋचाओं के द्वारा उपर्युक्त तीन बिषय में जीव को ज्ञान हो गया यानि ये तत्वज्ञान संबंधित सिद्धियां जीव को प्राप्त हो चुकी । दुसरे शब्दों में कहें तो तत्वज्ञान हो जाने पर ये वेद की ऋचाएं, श्रूतियां , स्मृतियां जो भगवान श्री कृष्ण के अवतार काल में सगुण साकार रूप में गोपियां बन कर आई थी और लीला में भाग ली थी , यही दिव्य शक्तियां तत्वज्ञ को , साधकों के चारों तरफ से सुरक्षा चक्र बना लेती हैं और रक्षा करती है । 

तत्वज्ञान प्राप्त साधक जब भी कभी मायिक एरिया में मन ले जाता है तो तत्वज्ञान खड़ा हो जाता है उसके आगे उसकी बुद्धि में और साधक के विवेक को जगा देता है , ये खबड़दार तुम जो गलत बात अभी सोंच रहे हो वो गुरू द्वारा बतलाए गए मार्ग तथा शास्त्र के यानि मेरे विपरित है अतः सावधान ! इस प्रकार साधक भूल से भी गलत मार्ग में , या गलत बिषय में भटकने से पहले सचेत हो जाता है और उससे एवाऊट टर्न हो कर भगवान और गुरू के अनुकूल मार्ग पर चलने लग जाता है , अब वो व्यक्ति जिसके पास तत्वज्ञान नहीं है वो भटक जाता है उसका पतन हो जाता है और जिसको तत्वज्ञान पक्का हो चुका है वो नहीं भटकता कभी । 

इस प्रकार तत्वज्ञान एक दैविक शक्तियां हैं जिसे ज्ञान शक्ति, या  विवेक शक्ति भी कहते हैं ,ये की ऋचाएं, श्रूतियां, स्मृतियां के रूप में हैं । यह सभी दैविक शक्तियां भगवान श्री राधाकृष्ण के अवतार काल में गोपियों के रूप में सगुन साकार होकर भगवान के परकिया लीला में शामिल हुई थीं । 
और फिर जीव को तत्वज्ञान हो जाने के बाद यही दैविक शक्तियां साधक के चारों ओर अदृश्य रूप में एक अभेध्य सुरक्षा घेरा बना लेती है एवं जब भी साधक का मन कभी माया के एरिया में भटकने का कोशिश करता है तो उसे सावधान कर देती है सचेत करती रहती है, साथ साथ अन्य किसी भी प्रकार के आकस्मिक घटना दुर्घटना या अदृश्य आसुरी बिचारों से, शक्तियों से , आसुरी प्रवृत्तियों से, रजोगुणी तथा तमोगुणी भोग बिषय कि कामनाओं से उसकी रक्षा करती रहती है । ये तत्वज्ञान रूपी दैविक शक्तियां एक वास्तविक श्रोत्रिए ब्रह्मनिष्ट महापुरुष पुरूष की शरणागति तथा उनकी अनन्य भक्ति करने वाले को ही उनसे मिलती है। 

जो अनन्य नहीं है, उनका शरणागत नहीं है, श्रद्धा संपत्ति व विश्वास एवं आस्था से रहित है तथा अन्य के पास भी भटकता रहता है , अपने गुरू के बतलाए मार्ग के अलावा अन्य स्वर्ग के देवी देवताओं का या कर्मकांड का भी सहारा लेकर अन्य देवताओं को पुजता है उनके पास तत्वज्ञान नहीं ठहरता कभी , यानि यह दैविक शक्तियां नहीं ठहरती है उनके पास । 

इसलिए देखते होंगे हम आप कि ऐसा साधक जो अपने गुरू के साथ साथ अन्य मार्ग का भी सहारा लेता है , अपने गुरू के अलावा दुसरे के पास भी जाता है उसके तत्वज्ञान कि विस्मृति हो जाती है एन वक्त पर , समय पर तत्वज्ञान काम नहीं आता उसके , और वो गलत बिषय में फंस जाता है, तत्वज्ञान उसको सचेत नहीं करता है । क्योंकि जैसे ही उसकी अनन्यता भंग हुई कि तत्वज्ञान छीन गया उसका , सुरक्षा चक्र समाप्त हो गया । 
अत : तत्वज्ञान एक ऐसी सिद्धियां है जो गुरू के शरणागत तथा अनन्य जीव के पास हीं ठहरती है अन्य के पास नहीं । 

इसलिए शास्त्रों में वेदों में तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिए यानि इन सिद्धियों कि प्राप्ति के लिए किसी एक ही महापुरूष की शरणागति और केवल उन्हीं की अनन्य भक्ति पर बल दिया जाता है । 
रत्ती भर भी अनन्यता भंग हुई, तत्वज्ञान संबंधित सिद्धियां जितना मिला वो समाप्त हो जाता है, अत: भगवद् प्राप्ति तक साधक के लिए साधना काल में यानि साधन भक्ति काल में एक ही वास्तविक महापुरुष के प्रति अनन्य होकर केवल उनकी हीं शरणागति करना आवश्यक है और केवल उनके द्वारा बतलाये गए मार्ग का हीं अनुसरण करना अनिवार्य है । 
नहीं तो तत्वज्ञान कान से केवल सुन लिए और फिर अन्य जगह जो भी आया उस हरेक का प्रवचन सुन रहे हैं तो इससे कोई लाभ नहीं होने वाला , कोई तत्वज्ञान नहीं होने वाला और न ए दैविक शक्तियां ठहरने वाला हमारे पास कभी। 
बेचारा साधक न तीन में न तेरह में , न इधर का और न उधर का वाली स्थिति में हो जाता है । 
और ऐसा ही साधक कहता फिरता है कि हमको तो कोई अनुभव नहीं होता , हमारे जीवन में शांति नहीं है , मन अशांत रहता है साधना करने के बाबजूद भी ! अरे आपने अनन्यता का पालन किया क्या ? पहले यह देखिए । 
साधना भी कर रहे और अन्य देवी देवता का पुजा कर्मकांड भी कर रहे हैं और शहर में जो आया उसके पास भी जा रहे हैं हर किसी का सत्संग सुनने के लिए ! 
आजकल तो कुछ साधक लोग सोसल मिडिया या टीभी पर श्री महाराज जी का भी सुनते हैं और दुसरे संतों का भी सुनते रहते हैं तो फिर अनन्य तो आप नहीं रहे तो फिर तत्वज्ञान संबंधित दैविक शक्तियां कैसे ठहरेगी आपके पास । और नहीं ठहरी तो फिर आपकी रक्षा कौन करेगा ? फिर दैविक अनुभूति अनुभव कैसे होना शुरू हो जाए भला ? 
 शरणागत और अनन्य हो जाने के बाद एक दिन तो क्या हरेक साधना में अनुभूति होने लगती है , गुरू द्वारा हरेक साधना में कुछ न कुछ नित्य नया दिव्य ज्ञान और अनुभव, आध्यात्मिक धन , मानसिक सुख शांति आनंद आदि डायरेक्ट गुरू कृपा से मिलता रहता है , मानसिक आनंद और सुख की झलक मिलने लगती है । 
यह जरा गहराई से बिचार करना चाहिए। 
श्री राधे , जय जय श्री राधे ।।
:- श्री महाराज जी द्वारा प्राप्त तत्वज्ञान एवं दृष्टी से ।।