Wednesday, 28 February 2024

नकलची बंदर या रटंत तोता न बने हम !

नकलची बंदर या रटंत तोता न बने हम ! 
श्री महाराजजी के प्रमुख प्रचारक पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी, श्री युगल शरण जी , श्री मुकुंदानंद जी श्री महाराज जी के सिद्धांतों का समझ तथा उनके व्यवहारिक उपयोगिता यानि अप्लिकेशन पर सबसे अधिक जोर देते हैं । 
ये लोग हु बहु श्री महाराज जी का फिलासफी न बोल कर, उनका हु बहु नकल न करके उसको अपने शब्दों में समझाते हैं, तथा वर्तमान काल के घटनाओं का अधिक से अधिक वर्तमान उदाहरणों के साथ प्रस्तुत करते हुए तथा समझाते हुए श्री महाराज जी के सिद्धांतों का व्यवहारिक समझ पर जोर देते हैं । इसलिए मुझे इन तीनों के समझाने की शैली बहुत पसंद है । और मुझे हीं नहीं आज लाखों लाख युवा लोग , बच्चे , आदि इनका कायल हो चुके है क्योंकि इन लोगों ने स्वयं न कभी श्री महाराज जी के बोली का नकल किया और न उनके सिद्धांतों का , और न उन्हीं के हु बहु बोले गय शब्दों में शैली में जिक्र किया यहां तक कि ये लोग न उनके किताबों का हुबहु नकल किया और न उनके भाषा में प्रवचन दिया कभी । ये लोग श्री महाराज जी से ग्रहित किए शास्त्रों के परसेप्शन को स्वयं ग्रहण करके हमें समझाते हैं अपनी भाषा शैली में जो बहुत लाभकारी है । 

 महापुरुषों के किताबों का नकल करके या रट्टा मार कर हु बहु बोलना , लिखना, कभी भी लाभप्रद नहीं है । इसलिए इन तीनों का हमेशा प्रयास रहता है कि महापुरुषों के वाणी को , उनके सिद्धांतों के सार ( gist) को बोले अपने स्टाईल में , अपने उन शब्दों में , जिसके लिए श्री महाराज जी ने प्रेरित किए हैं, ताकि लोग समझ जाए तथा उसका व्यवहारिक उपयोग भी ठीक से कर सकें अपने जीवन में । तभी कोई भी शिक्षा , ज्ञान सार्थक होती है । 
अन्यथा महापुरुषों का हु बहु नकल करके तो तोता भी मनुष्य से बेहतर बोल देता है ।

"शिकारी आएगा , जाल बिछाएगा , दाना डालेगा , लोभ से उसमें फंसना नहीं "
ये सिद्धांत तोता बोलना सीख लिया और लगा बोलने।
लेकिन जब शिकारी आया वास्तव में और जाल बिछाया , दाना डाला तो यह सिद्धांत बोलते बोलते उस जाल में फंस जाता है , और फिर शिकारी उसको पकड़ लेता है लेकिन फिर भी पिंजरे में भी वो बोलते रहता है यही रट्टा मारा हुआ सिद्धांत । 

तो भला ऐसे छात्र, या लोग का भला या क्या कल्याण होगा जो हुबहु नकल करके लिखते हैं और बोलते हैं और ऐसा ही करने की प्रेरणा दुसरे को भी देते हैं । 
यह एक गंभीर धोखा है । 

मैं तो स्वयं, महापुरूषों के सिद्धांतों को अच्छी तरह समझ कर अपनी भाषा में लिखने का प्रयास करता हूं ताकि उनके सिद्धांतों का समझ ठीक से मस्तिष्क में बैठ जाए जो हमारे व्यवहारिक उपयोग में आ सके । हमारा लाभ हो सके । 
रटा हुआ बात , या किताबों का हु बहु नकल किया हुआ बात दिमाग में अधिक दिनों तक नहीं ठहरता कभी , यह एक युनिवर्सल ट्रूथ है । 
मैंने अनुभव किया है प्रत्यक्ष रूप से सामने से संसार में , न की केवल सोसल मिडिया पर बहुत लोग श्री महाराज जी के फिलासफी को हु बहु बोल देते हैं लिख देते हैं लेकिन उनके खूद के जीवन में वो सिद्धांत का अप्लिकेशन दुर दुर तक नहीं है । आजकल ऐसे रट्टामल नकलची बंदर रूपी विद्वान अधिक मिल जाते हैं फिजिकल वर्ल्ड में तथा इस वर्चुअल सोसल मिडिया पर भी सभी क्षेत्रों में चाहे वो आध्यात्मिक बिषय हो यह अन्य बिषय । 
बस केवल लिख दिया महापुरुषों के किताबों का हु बहु नकल करके । इससे कोई लाभ नहीं । 

आज सीबीएसई बोर्ड ने जो फैसला किया है "ओपन बुक एक्जाम" उसका मैं स्वागत करता हूं । 
अभी तक जो भी परीक्षाएं हो रही है वो परीक्षा रटंत विद्या पर आधारित है । जो विद्यार्थी परीक्षा में रट्टा मार कर प्रश्नों का हु बहु उत्तर दे दे, हुं बहु जो किताबों में लिखा है तो उसको बढ़िया मार्क्स मिल जाता है । 
यही कारण है कि जो छात्र परीक्षा में चोरी करके किताब का नकल करके हु बहु लिख दे उसको भी बढ़िया मार्क्स मिल जाता है । लेकिन जिंदगी के इंतिहान मे वो अधिकतर लोग हर जगह असफल रहते हैं ।

 ऐसे व्यवस्था में पीछे रह जाता है बेचारा वो छात्र जो पढ़ कर, किताबों में लिखे सिद्धांतों को अच्छी तरह समझ कर अपने शब्दों में प्रश्नों का उत्तर देता है । लेकिन यहां ऐसे छात्र जो अपने व्यवहारिक जीवन में उस ज्ञान का उपयोग करता है वहीं हल जगह सफल होता है । 

अब हमारे देश में भी नया परीक्षा पद्धति Open book examination का फर्मुला लागु होने जा रहा है जो बड़ा ही उत्तम है ।
मैं इसका बहुत बहुत स्वागत करता हूं । 
इसमें छात्र किताब खोल कर प्रश्नों का उत्तर दे सकता है लेकिन प्रश्नों का उत्तर किताब से हु बहु नकल करके लिख देने से "0" 
नंबर आएगा । 

किताबों को खोलकर प्रश्नों का उत्तर अपने शब्दों में देने से हीं अच्छे मार्क हासिल होंगे । 
क्योंकि अपने शब्दों में उत्तर देने से पता चलेगा कि छात्रों ने सिद्धांतों को ठीक ठीक समझ लिया है और उसका उपयोग करने में वो सक्षम है , इस तरह से ज्ञान तथा शिक्षा की व्यवहारिक उपयोगिता बढ़ेगी । 

रट्टा मारने पर आज याद है कल वो भूल जाएगा , दुसरा उस शिक्षा का , ज्ञान का उपयोग वो अपने जीवन में नहीं कर पाता है । केवल रटा हुआ सिद्धांत ज्ञान , शाब्दिक ज्ञान कोई ज्ञान नहीं है । ज्ञान प्राप्त कर उसका उपयोग जीवन में आवश्यक है । 
नहीं तो पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ पंडित भया न कोई बाली बात ही अभी तक हो रही है अधिकांश लोगों के साथ ।

अब ओपन बुक एक्जाम में प्रश्न कुछ इस तरह का होगा कि- पानी के वैपोराईजेशन कि प्रक्रिया को , सिद्धांतों के द्वारा यह समझावे कि कीचड़ से वाष्पीकरण किस प्रकार होता है ? 

अब जो स्टूडेंट ओपन बुक से वाष्पीकरण का सिद्धांत लिख देगा हुं बहु उसको जीरो मार्क्स और जो उस सिद्धांतों के आधार पर अपनी भाषा में , समझे हुए प्रैक्टिकल ज्ञान से उत्तर देगा वो बढ़िया मार्क्स से उत्तीर्ण होगा । 

तो मैं तो स्कूल जीवन में अपने शिक्षकों से तथा आज भी अपने गुरू श्री महाराज जी से एवं उनके प्रमुख प्रचारक पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी से यह प्रेरणा हासिल किया है कि कोई भी ज्ञान चाहे वो संसारिक हो या आध्यात्मिक बातें या सिद्धांत वो महापुरुषों का या उनके किताबों का हु बहु नकल करके मत लिखो । 
तुमने क्या समझा वो लिखो अपनी भाषा में ताकि वो मस्तिष्क में ठीक ठीक बैठ जाएं और व्यवहार में आ सके । यही तरीका है जिसने मुझे काफी लाभ पहुचाया है । 
श्री राधे ।

Sunday, 18 February 2024

श्री महाराज जी द्वारा बतलाया गया भक्ति का निम्नलिखित मूल सिद्धांत हमेशा याद रहना चाहिए हमें, तभी भक्ति किया जा सकता है नहीं तो भटकने का पुरा चांस रहता है ।

श्री महाराज जी द्वारा बतलाया गया भक्ति का निम्नलिखित मूल सिद्धांत हमेशा याद रहना चाहिए हमें, तभी भक्ति किया जा सकता है नहीं तो भटकने का पुरा चांस रहता है ।

1. सबसे पहले भक्ति क्या है ? 
तो भक्ति भगवान और गुरू से प्रेम करने के भावक क्रिया का नाम है । भगवान और गुरू से मन के अटैचमेंट करने के साधना को साधन भक्ति करना कहते हैं । और मन जब पुरी तरह अटैच्ड हो जाए तो उसे सिद्ध भक्ति कहते हैं । 

2.भक्ति किसकी करनी है ? 
तो भक्ति गुरू और भगवान की करनी है ।

3.भक्ति किसको करनी है ? 
तो भक्ति मानव तन धारी जीवात्मा को मन से करनी है ।

4.भक्ति किससे करनी है ? तथा भक्ति में किन किन साधनों की जरूरत होती है ?
तो भक्ति "मन" से करनी है, देह तथा ईंद्रियों से भक्ति हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता । हां ईंद्रिया भी अगर सहायक हो तो साधना का स्पीड थोड़ा बढ़ जाता है । 
भक्ति में किसी भी बाह्य साधन या आधार की जरूरत नहीं , भगवान और गुरू के प्रति निष्काम प्रेम तथा उनकी सेवा की चाहत के आंसू ही प्रयाप्त है भगवान और गुरू को द्रवित करने के लिए । जिसके आंख में भगवद् प्रेम का निष्काम आंसू हैं , भगवान उनसे रीझ जाते हैं । 
"भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी " 

5.भक्ति का अधिकारी कौन कौन है ? 
तो भक्ति का अधिकारी प्रत्येक मानव तन धारी जीवात्मा है , चाहे वो कोई भी मनुष्य हो वो भक्ति करने का अधिकारी है । चाहे वो अमीर हो या गरीब हो , वो किसी भी देश , जाति , धर्म या संप्रदाय का हो,पढ़ा लिखा हो या अनपढ़ गंवार हो, विद्वान हो या कोई हो । 
 सभी भक्ति का अधिकारी जीव है । भक्ति देहाभिमान से परे होकर भगवद् प्रेम भाव से करनी चाहिए। 

6.भक्ति किस उम्र का मनुष्य कर सकता है? 
तो भक्ति किसी भी उम्र का व्यक्ति कर सकता है और कैसा भी देह धारी मनुष्य कर सकता है , चाहे वो बालक हो , युवा हो , बृद्ध हो , अपंग हो, लंगड़ा हो, लूला हो , गूंगा हो , बहरा हो , अंधा हो, काना हो, नर हो , नारी हो , चाहे नपुंसक हो , यानि  कोई भी मनुष्य हो ।
हां भक्ति अगर बचपन से प्रारंभ की जाए तो बहुत जल्दी उन्नति हो सकती है भक्ति मार्ग में , क्योंकि कुसंग से बचना आसान हो जाता है शुरू से हीं ।

7.भक्ति कौन से समय या काल में करनी है ? 
भक्ति हर क्षण, हर समय , हर काल में किया जाना चाहिए , चाहे वो दिन हो या रात हो , सुबह हो , या दोपहर या शाम हो । कोई मुहुर्त नहीं , कोई काल अनिवार्य नहीं । भक्ति में समय,  काल और मुहुर्त की कोई जरूरत नहीं, ऐसा नहीं कि ब्रह्म मुहूर्त हीं भक्ति के लिए श्रेष्ठ तथा फलदायी है। ब्रह्म मुहूर्त का महत्व सिर्फ इतना है कि अति सवेरे सो कर उठने पर मन काफी तरो ताजा तथा शांत रहता है एवं इस समय पुरा वातावरण भी शांत तथा अनुकुल होता है ध्यान तथा चिंतन के लिए । अन्यथा ऐसा नहीं है ब्रह्म मुहूर्त में कोई दिव्य शक्ति साथ देती है और अन्य समय में नहीं । 
यह सब सोंच केवल एक भ्रम है । गुरू और ईष्ट हर क्षण हमारे साथ रहते हैं , वो किसी भी क्षण साथ नहीं छोड़ते हमारा । 

8.भक्ति कहां की जा सकती है ? 
तो भक्ति इस धरती पर कहीं भी की जा सकती है । हां एकांत साधना के लिए , यानि कर्म संन्यास कि साधना के लिए एकांत और विल्कूल शांत जगह आवश्यक है । हां सामुहिक साधना के लिए गुरू धाम , भगवद् धाम, शिविर आदि विशेष अनुकुल तथा विशेष सहायक है । 

9. केवल मानव देह धारी जीवात्मा ही भक्ति कर सकता है , ऐसा क्यों ? 
क्योंकि मनुष्य शरीर ही कर्म प्रधान , ज्ञान प्रधान, चिंतन प्रधान है और भक्ति मन को हीं करनी है , इसमें हरि गुरू का नाम,  रूप , लीला, धाम तथा गुणों  का चिंतन प्रमुख हैं जो मन से हीं कि जा सकती है । इसलिए मानव देह धारी जीव ही भक्ति कर सकता है , अन्य देह धारी जीव चिंतन नहीं कर सकता , इसलिए अन्य देह धारी जीव भक्ति नहीं कर सकता । 

10. भक्ति किस भाषा के लोग तथा कौन से भाषा में संभव है ?
तो भक्ति के लिए किसी भी भाषा या बोली कि अनिवार्यता नहीं है । ऐसा नहीं है कि केवल संस्कृत भाषा वाले ही भक्ति कर सकते हैं । भगवान और गुरू किसी भी विशेष भाषा के पोषक नहीं है । वो सर्वज्ञ हैं , सर्वांतर्यामी है, भावक ग्राही हैं ,  मर्मज्ञ है, सर्वसुह्रत है । वो देश , काल,  भाषा, भेष, भूषा, नियम , निषेध आदि से परे हैं । 

इसलिए चाहे जिस भाषा का मनुष्य हो वो अपनी अपनी भाषा में , अपने भाव में भगवान और गुरू का चिंतन करने का अधिकारी है । भक्ति भगवान और गुरू से प्रेम करने का नाम है इसलिए इसमें शब्दों या भाषा की कोई अनिवार्यता नहीं है । भाषा और शब्द अपने मन के भावों को व्यक्त करने का माध्यम भर है । भक्ति जीवात्मा द्वारा उसके मन में भगवान तथा गुरू के नाम रूप लीला तथा धाम के चिंतन से उठे अपने प्रेम भावों को मन ही मन भगवान और गुरू को अर्पित करने का नाम है । 

इसमें कोई भी भेष भूषा,भाषा, शब्द बाधक नहीं हो सकता । डाकु रत्नाकर मरा मरा मरा बोल कर महान ऋषि बन गए , इतिहास गवाह है । इसलिए भक्ति में शब्द आदि का महत्व नहीं है । भक्ति में भाव , चिंतन तथा गुरू अनुकूल बिचार प्रमुख हैं जो मन के उपर निर्भर है । बाहर के क्रिया से इसका कोई मतलव नहीं । भक्ति गोपनीय बस्तू है , यह मनुष्य के ह्रदय में गुप्त रूप से अंकुरित भगवद् प्रेम का नाम है । 

बाहर प्रकट करने से यह प्रेम कि लता सुख जाती है , कुम्हला जाती है , अगर भक्ति परिपक्व न हुआ हो तो । क्योंकि भगवद् प्रेम को बाहर प्रकट करने से लोक रंजन नामक रोग इस लता में लग जाता है, लोक रंजन के फल के रूप में उपजे मान सम्मान तथा अभिमान रूपी खर पतवार भक्ति के लता को प्रारंभ में ही सुखा देती है और जीव भक्ति के राह से भटक सकता है अगर उसका तत्वज्ञान परिपक्व नहीं हुआ हो तो ।

इसलिए तत्वज्ञान तथा भक्ति जबतक परिपक्व न हो जाए तब तक इसे छुपाने के लिए कहा गया है गुरू द्वारा  । जब भक्ति परिपक्व होने लगती है , तब अष्ट सात्विक भाव के कुछ लक्षण अनजाने में कभी कभी अपने आप बिना चाहे बाहर प्रकट होने लगती है तो दोष नहीं है । लेकिन जानबूझ कर भाव भरने या प्रकट करने का दंभ करने से भक्त का पतन संभव है। 
इसलिए साधना काल में भक्ति में गोपनीयता अनिवार्य है  । 

11. भक्ति में क्या क्या नियम और निषेध है ? 
तो भक्ति में कोई नियम निषेध नहीं, केवल निम्नलिखित बातों को छोड़ कर :- 

भक्ति मार्ग के पथिक को अपने गुरू तथा ईंष्ट का अपने साथ उपस्थिति को एक पल भी नहीं भूलना चाहिए । अत: भक्ति में भगवान और गुरू को एक पल के लिए भी भूलना निषेध है । 
और नियम यह है कि भक्ति निरंतर हो , भक्ति अनन्य हो तथा भक्त केवल अपने गुरू तथा ईष्ट का ही शरणागत हों हमेशा के लिए  । गुरू के सिद्धांतों के अनुकूल चिंतन करना , बतलाए मार्ग पर  चलना तथा व्यवहार करना ही शरणागति है । 

12. भक्ति में क्या क्या अर्पित तथा समर्पित करना है ? 
तो भक्ति में अपना सर्वस्व समर्पित करना है अपने गुरू तथा ईंष्ट को मन से । यानि तन मन धन तथा आत्मा । आत्म दान सबसे बड़ी भक्ति है । और मन के संकल्प शक्ति से इन बस्तूओं को एक बार समर्पित करने के बाद कभी भूल कर भी हमें इन सब बस्तूओं को अपना नहीं मानना चाहिए। यह विशेष रूप से ख्याल हमेशा रहे, तो यह भाव हमेशा रहे कि अब जो भी है मेरे पास वो सभी गुरू और ईष्ट का है , मेरा नहीं है । 

बस ये 12 प्वाइंट भक्ति करने वाले को हमेशा याद रहना चाहिए । इन बारह बातों  में से अगर हम एक को भी भूले तो भक्ति से भटकने का खतरा रहता है । श्री राधे ।

( तो लगभग सैकड़ों लोगों ने जो मुझसे मेरे मैसेंजर पर जिज्ञासा कि थी तथा आग्रह किया था कि मैं पोस्ट लिख कर बता दूं तो  मैंने अपने गुरू श्री महाराज जी की कृपा से जो बातें ग्रहण किया है अपने अभी तक के साधना जीवन की यात्रा में वो बातें अपने स्मृति से लिख दिया है यहां । इसको सेभ करके रख लिजिए , ताकि भविष्य में फिर पुछने की आवश्यकता न हो ) श्री राधे ।।

नयनं गलदश्रुधारया वदनं गदगदरुद्धया गिरा। पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥६॥

चैतन्य महाप्रभु जी :- 
चेतोदर्पणमार्जनं भव-महादावाग्नि-निर्वापणम् श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधू-जीवनम् । आनंदाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम् सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्ण-संकीर्तनम् ॥१॥

अर्थात -श्रीकृष्ण-संकीर्तन की परम विजय हो जो हृदय में वर्षों से संचित मल का मार्जन करने वाला तथा बारम्बार जन्म-मृत्यु रूपी दावानल को शांत करने वाला है । भगवान श्री कृष्ण का नाम रूप लीला गुण धाम का चिंतन कीर्तन आदि मानव जीव के लिए परम कल्याणकारी है क्योंकि यह चन्द्र-किरणों की तरह शीतलता प्रदान करता है। समस्त अप्राकृत विद्या रूपी वधु का यही जीवन है । यह आनंद के सागर की वृद्धि करने वाला है और नित्य अमृत का आस्वादन कराने वाला है ॥१॥

नाम्नामकारि बहुधा निज सर्व शक्तिस्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः। एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः॥२॥

अर्थात हे भगवन ! आपका मात्र नाम ही जीवों का सब प्रकार से मंगल करने वाला है-कृष्ण, गोविन्द जैसे आपके लाखों नाम हैं। आपने इन नामों में अपनी समस्त शक्तियां अर्पित कर दी हैं । इन नामों का स्मरण एवं कीर्तन करने में देश-काल आदि का कोई भी नियम नहीं है । प्रभु ! आपने अपनी कृपा के कारण हमें भगवन्नाम के द्वारा अत्यंत ही सरलता से भगवत-प्राप्ति कर लेने में समर्थ बना दिया है, किन्तु मैं इतना दुर्भाग्यशाली हूँ कि आपके नाम में अब भी मेरा अनुराग उत्पन्न नहीं हो पाया है ॥२॥

तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥३॥

अर्थात - स्वयं को मार्ग में पड़े हुए तृण से भी अधिक नीच मानकर, वृक्ष के समान सहनशील होकर, मिथ्या मान की कामना न करके दुसरो को सदैव मान देकर हमें सदा ही श्री हरिनाम कीर्तन विनम्र भाव से करना चाहिए ॥३॥

न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥४॥

अर्थात - हे सर्व समर्थ जगदीश ! मुझे धन एकत्र करने की कोई कामना नहीं है, न मैं अनुयायियों, न सुन्दर स्त्री अथवा न प्रशंसनीय काव्यों का इक्छुक हूँ । मेरी तो एकमात्र यही कामना है कि जन्म-जन्मान्तर मैं आपकी अहैतुकी भक्ति कर सकूँ ॥४॥

अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ। कृपया तव पादपंकज-स्थितधूलिसदृशं विचिन्तय॥५॥

अर्थात- हे नन्दतनुज ! मैं आपका नित्य दास हूँ किन्तु किसी कारणवश मैं जन्म-मृत्यु रूपी इस सागर में गिर पड़ा हूँ । कृपया मुझे अपने चरणकमलों की धूलि बनाकर मुझे इस विषम मृत्युसागर से मुक्त करिये ॥५॥

नयनं गलदश्रुधारया वदनं गदगदरुद्धया गिरा। पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥६॥

अर्थात हे प्रभु ! आपका नाम कीर्तन करते हुए कब मेरे नेत्रों से अश्रुओं की अविरल धारा बहेगी, कब आपका नामोच्चारण मात्र से ही मेरा कंठ गद्गद होकर अवरुद्ध हो जायेगा और कब मेरा शरीर रोमांचित हो उठेगा ॥६॥

युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्। शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द विरहेण मे॥७॥

अर्थात - हे गोविन्द ! आपके विरह में मुझे एक क्षण भी एक युग के बराबर प्रतीत हो रहा है । नेत्रों से मूसलाधार वर्षा के समान निरंतर अश्रु-प्रवाह हो रहा है तथा समस्त जगत एक शून्य के समान दिख रहा है ॥७॥

आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मामदर्शनान्-मर्महतां करोतु वा। यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्-तु स एव नापरः॥८॥

अर्थात - एकमात्र श्रीकृष्ण के अतिरिक्त मेरे कोई प्राणनाथ हैं ही नहीं और वे ही सदैव बने रहेंगे, चाहे वे मेरा आलिंगन करें अथवा दर्शन न देकर मुझे आहत करें। वे नटखट कुछ भी क्यों न करें -वे सभी कुछ करने के लिए स्वतंत्र हैं क्योंकि वे मेरे नित्य आराध्य प्राणनाथ हैं ॥८॥ :- चैतन्य महाप्रभु जी

Thursday, 15 February 2024

साधक साधना तथा सावधानी।

साधक साधना तथा सावधानी। 
श्री महाराज जी के पुराने सत्संगी 50, 60 तथा 70 के दशक वाले लोग साधना के दरम्यान धड़ाम धड़ाम नीचे जमीन पर गिरने लगते थे , श्री महाराज जी द्वारा साधना शुरू कराने के कुछ देर के अंदर हीं , क्योंकि उनकी अपने चेतनावस्था की विस्मृति हो जाती थी । वो रूपध्यान के समय अपने भाव शरीर द्वारा गहरी ध्यान की अवस्था में भगवान और गुरू के लीला में शामिल में हो जाते थे ।‌
यह आजकल के हम साधकों में नहीं है क्योंकि हमारा फोकस डाईवर्ट हो चुका है साधना के प्रैक्टिस के जगह हम लोग बढ़िया गवईया , बढ़िया बजईया और बढ़िया नृत्य कला की ओर बढ़ रहे हैं और इसी को साधना समझ बैठे हैं । सिर पद के ताल लय सुर में खोने लगा है और हिलने लगा है । सिद्धि गाने बजाने तथा नृत्य में जरूर मिल गया, लेकिन भगवान और गुरू का रूप ध्यान कब छूट गए पता नहीं हीं चला । 
इसलिए जाना है जापान पहुंच रहे चीन वाली बात हो रही है आजकल । मन झूम रहा है सुर ताल सरगम तथा लय पर और हमको भ्रम है कि साधना हो रही है । 

साधना में विशेष ध्यान रखने की बात यह है कि साधना किसकी करनी है ? साधना किससे करनी है ? कैसे करनी है ? किन बातों का ध्यान रखना परम आवश्यक है ? किन बातों का सावधानी जरूरी है ? 
नहीं तो भगवान तथा गुरू के रूपध्यान के साधना के जगह केवल सुर, ताल, लय, नृत्य संगीत और बाद्य यंत्र बजाने की साधना यानी प्रैक्टिस न हो जाए , लोग बेहरत गवईया या बजईया या नृत्यकार न बन जाए । अगर साधना के जगह पर यह होने लगे तो समझना चाहिए कि हरि गुरू के रूप ध्यान लीला के साधना की दिशा की जगह हम भटक कर कही और जा रहे हैं ।
क्योंकि जब हमारा ध्यान ताल सुर लय और बजाने का एक्सपर्ट बनने पर केंद्रित हो जाए तो साधना तो गया । 
क्योंकि अक्सर ऐसा ही होता है लोग साधना के बजाए बेहतर गवईया , बजईया बन जाने की ओर अग्रसर हो जाते हैं , क्योंकि साधना करते करते साधना के वास्तविक रास्ते पर से भटक कर लोग गीत गाने , बाद्य यंत्र बजाने और नृत्य का साधना यानि प्रैक्टिस की ओर कब डाईवर्ट हो जाते हैं पता ही नहीं चलता । 

रूपध्यान साधना में गुरू या भगवान या दोनों का रूपध्यान आवश्यक है , फिर पद् के भाव के अनुसार उनके उस जीवंत लीला में खूद के भाव शरीर द्वारा शामिल होना परम आवश्यक है । 

ध्यान रखने की बात है कि साधना का प्रैक्टिस हमको उस ओर ले जाएं , उस ऊंचाई पर ले जा रही है हमारे चिंतन को या नहीं जिसमें हम आभासीय चल चित्र की भांति भगवान या गुरू या दोनों के लीला में खूद को समायोजित करने लग रहे हैं या नहीं । अगर नहीं तो सावधानी कि जरूरत है कहीं हम साधना के दिशा से भटक कर कोई और दिशा में तो नहीं बढ़ रहे हैं । असली साधना के जगह हमारा गाने बजाने तथा नृत्य की साधना या प्रैक्टिस तो नहीं हो रही है ? 

क्योंकि गुरू द्वारा असली रूपध्यान साधना जैसे जैसे ऊंचाई पर पहुंचती है वैसे वैसे हम उनके रूपध्यान तथा पद् के भाव चिंतन के द्वारा एक प्रकार से जीवंत लीला में प्रविष्ट होने लगते हैं और जैसे जैसे हम लीला में आपने भाव शरीर के द्वारा प्रविष्ट होने लगते हैं हम अपने शारीरिक स्वरूप, यानि देह को भूलने लगते हैं , हम चेतन मन से निकल कर पहले अवचेतन मन के द्वारा लीला में प्रविष्ट करते हैं तथा और भी अधिक साधना के ऊंचाई के कारण अवचेतन मन से भी निकल कर अचेतन मन के रास्ते रूपध्यान द्वारा उनके लीला में प्रविष्ट कर जाते हैं जहां हम अपने देह तथा बाहरी दुनियां को साधना काल में विस्तृत कर देते हैं । 
ऐसे में भला ताल लय सुर , गाने बजाने तथा नृत्य का होश कैसे रहेगा ।
और फिर जीव का शरीर धड़ाम से जमीन पर गिरने लगता है । गला अवरूद्ध । 
अगर सुर ताल नृत्य के स्टेप का ख्याल है इसका मतलव साधना नहीं हो रही है , कुछ और उदेश्य की पूर्ति हो रही है । मन सुर ताल लय में खोया झूम रहा है । 

इसलिए श्री महाराज जी के पुराने सत्संगी 50, 60 तथा 70 के दशक वाले लोग साधना के दरम्यान धड़ाम धड़ाम नीचे जमीन पर गिरने लगते थे , श्री महाराज जी द्वारा साधना शुरू कराने के कुछ ही देर के अंदर हीं , क्योंकि उनकी अपने चेतनावस्था की विस्मृति हो जाती थी । वो रूपध्यान के समय अपने भाव शरीर द्वारा गहरी चिंतन की अवस्था में भगवान और गुरू के लीला में शामिल में हो जाते थे ।‌

स्वाभाविक है कि जैसे जैसे जीव साधना के लेवल के ऊंचाई को प्राप्त करने लगता हैं तो जीव पहले तो अवचेतन फिर अचेतन की अवस्था में जाने लगता है और ऐसे में उसकी वाणी अवरूद्ध , शरीर में कंपन , शरीर बेसुध , होश समाप्ति की ओर उन्मुख होने लगता है , भला उसके लिय सुर ताल लय गाने बजाने और नृत्य को संभाले रखना सब असभंव बन जाता है , सुर ताल तो लड़खाने लगता है । 

तो जब इन सब बातों के जगह सुर ताल लय 
और भी बढ़िया होते जा रहा है तो साधक को सावधान हो जाना चाहिए। हम रूपध्यान साधना के यानि प्रैक्टिस के जगह गाने बजाने , सुर ताल लय तथा नृत्य के प्रैक्टिस की ओर उन्मुख हो रहे हैं । कहीं एक अच्छा साधक बन कर साधना के गहराई में पहुंचने की जगह कुछ और बनने कि दिशा में तो नही बढ़ चले है ! कहीं फोकस डाईवर्ट तो नहीं हो चुका है हमारा ?? 

अगर ऐसा है तो कुछ भी हासिल नहीं होने वाला । कुछ भी अनुभव नहीं होगा , यह निश्चित है तथा स्वाभाविक है ।‌ हां बढ़िया गवईया , बजईया तथा नृत्यांगना जरूर बन जाएंगे क्योंकि साधना तो ( प्रैक्टिस ) गाने बजाने तथा नृत्य की हो रही है । 
साधना में चिंतन आवश्यक है और सुध बुध खोना आवश्यक है । लय ताल सुर मदहोश करता है , वेहोश नहीं । 
लय ताल सुर तो संसारिक गीत सुनने पर आम आदमी को भी मदहोश कर देता है । अत: सुर ताल के मदहोशी और साधना में सुध बुध खोने में जमीन आसमान का अंतर है । साधना में पद के अनुसार चिंतन जरूरी है , सुर ताल लय को एक सीमा तक सिमित रहना है प्रारंभिक अवस्था तक, उसके बाद सुर ताल की जरूरत नहीं रहता । साधना में पांच दस मिनट के बाद पद् के भाव के चिन्तन द्वारा लीला में प्रविष्ठ होना महत्वपूर्ण है , सुर ताल लय तो साधन है साध्य नहीं । यह तो केवल सहायक होते हैं मन को भाव लीला में प्रविष्ट कराने के लिय । 

जब साधना में गहरा रूपध्यान बनता है तो जीव उसी तरह का हो जाता है जैसे गहरी नींद में बाहर कितना भी खट पट की आवाज हो वो कान से सुन ही नहीं सकता । तो भला ये बाहरी सुर ताल लय तथा बाद्य यंत्र की आवाज कैसे रहेगी कान में । गहरी ध्यानावस्था में बाहरी दुनियां से वाह्य ईंद्रिया कट जाती है जीव समाधी में प्रविष्ट कर जाता है । जीव का मन तो भगवान की आभासिय लीला भाव में प्रविष्ट करने लग जाता है । लेकिन असली लगता है चल चित्र की तरह । सुर ताल लय में खोना तो स्व सुख है , कर्ण सुख है । 
श्री राधे ।

Wednesday, 14 February 2024

गुरू निर्देशित मानसिक रूपध्यान साधना तथा सेवा के उपरांत जब गुरू कृपा से प्रज्ञा चक्षु खुलता है तो शब्द का बंधन सीमा तथा जरूरत समाप्त हो जाती है

गुरू निर्देशित मानसिक रूपध्यान साधना तथा सेवा के उपरांत जब गुरू कृपा से प्रज्ञा चक्षु खुलता है तो शब्द का बंधन सीमा तथा जरूरत समाप्त हो जाती है , तब अनुभव का शुरूआत होता है फिर प्रेम को व्यक्त करने के लिए शब्द की जरूरत नहीं होती है, जब तक शब्द हमारे मन बुद्धि और मुख पर बने हुए हैं अपनी भावना को व्यक्त करने के लिए तबतक हम प्रेम नहीं करते । जब प्रेम करना वास्तव में शुरू करते हैं भगवान तथा गुरू को या किसी भी आत्मा को , जब मुख बंद, शब्द समाप्त तथा बचता है तो केवल वास्तविक प्रेम की शुरुआत और उसका मुक आदान प्रदान, एवं अनुभव । भगवद् प्रेम के पहले गुरू कृपा से सबसे पहले आत्म दर्शन तथा माया के वास्तविक स्वरूप का अनुभव होता है । 

जैसे जैसे इस अनुभव की शुरुआत होती है वैसे वैसे संसार से अटैचमेंट घटने तथा गुरू एवं ईष्ट से आत्मा के स्तर पर प्रेम के अनुभव की शुरुआत स्वत: होने लगती है गुरू कृपा से । 
अत: जब तक हम शब्दों के रूप में भगवान से , गुरू से या संसार में भी किसी से आई लव यू कहते रहते हैं तबतक हमें समझना चाहिए कि दरअसल हम प्रेम को हीं नही‌ समझा है जाना है और न अनुभव किया अभी तक तो भला प्रेम का दावा कैसे कर सकते हैं । 
अत: जिस प्रेम को शब्दों से व्यक्त किया जा रहा है वो प्रेम एक भ्रम के सिवा और कुछ भी नहीं । 
ए प्रेम , आत्म बल , आत्म विश्वास, धैर्य , निडरता, बोध आदि जो शब्द के रूप में जबतक हमारे अन्दर है तब तक वास्तव में यह घटित नहीं होती , सार्थक नहीं होती , सत्य नहीं होता । और यह तबतक घटित नहीं होगी जब तक सबसे पहले आत्मदर्शन याथार्थ में अनुभव स्तर पर नहीं हुआ हो ।  
शब्दों के रूप में या स्तर पर या समझ के स्तर पर जबतक ज्ञान , आत्मबल, आत्म शक्ति , प्रेम , विश्वास या धैर्य का भ्रम रहेगा तब ऐन वक्त पर इसकी सच्चाई का पता चल जाता है विपरित परिस्थितियां आने पर , सब डगमगा जाता है , समाप्त हो जाता है । 

जैसे कोई व्यक्ति यह मान ले वो आत्मबल , आत्मशक्ति , मनोबल तथा धैर्य से परिपूर्ण है और वो चला जाए माऊंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने तो पहली ही कठिनाई , पहाड़ों के कठीन बातावरण , विपरित परिस्थितियों में या तो भाग कर घर वापस आ जाएगा या मुर्खता रूपी जोश के कारण अपना जान गंवा बैठेगा और बैठता भी है । क्योंकि उसका आत्मबल , विश्वास, श्रद्धा संपत्ति, धैर्य , ज्ञान तथा जोश अभी तक केबल शाब्दिक स्तर पर ही हैं , यह अनुभव के स्तर पर नहीं आया है । 
इसलिए माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाले शेरपा को पहले ट्रैनिंग सेंटर पर आत्म बल , जोश , चढ़ाई करने का ज्ञान , तरीका , धैर्य आदि का ट्रेनिंग व्यवहारिक स्तर पर हासिल करना होता है , ट्रेनर के द्वारा उसे अनुभव के स्तर पर कराया जाता है। तब वो हर बाधा को पार करते हुए मुक बन कर माऊंट एवरेस्ट को फतह करने के काबिल बनता है वो फिर शब्दों से शोर नहीं करता कभी , गंभीर , अटल , दृढ़ तथा मनोबल से परिपूर्ण एवं अनुभवी हो जाता है और फिर वो फतह कर लेता है । 
अत: जब तक प्रेम शब्द के स्तर पर ही हैं तो समझना चाहिए कि प्रेम नहीं प्रेम का छलावा हमारे मन में है , हमारी मायिक बुद्धि और मायिक मन हमारे साथ छल करके हमको यह समझा रहा है कि तुम गुरू और ईष्ट से प्रेम और तथा उनकी सेवा कर रहे हो तुम तथा सबसे बड़ा प्रेमी तथा सेवक हो । 
प्रेम जबतक शब्द के स्तर पर है तबतक न हमारी साधना शुरू हुई है और न सेवा । ‌केवल‌ शब्दों के रूप में हम खुब शोर कर रहे हैं , आई लव यू श्री महाराज जी , आई लव यू राधाकृष्ण, आई लव यू मां ! ये शब्द शब्द भर है याथार्थ में कुछ नहीं । 
यह सबसे बड़ा प्रमाण है भ्रम के शिकार होने का । 
जब साधना , सेवा तथा प्रेम वास्तविक रूप से आत्मा के स्तर पर शुरू होता है तब शब्द समाप्त हो जाता है । इसको व्यक्त करने की जरूरत ही नहीं । 
जय जय श्री राधे । :- गुरू कृपा से यह मेरा अपना अनुभव है - संजीव कुमार।

मैंने श्री महाराज जी का एक बहुत पुरानी विडियो देखा था बहुत साल पहले , दिल को छू गया मेरे

मैंने श्री महाराज जी का एक बहुत पुरानी विडियो देखा था बहुत साल पहले , दिल को छू गया मेरे , जिसमें श्री महाराज जी बता रहे थे कि बहुत लोग ऐसे हैं जो शब्दों से मुझे कहते हैं फोन पर महाराज जी, आई लव‌ यू , मैं आपको बहुत प्यार करती हूं तो मैं भी बोल देता हूं आई लव यू टू और फोन रख देता हूं । 

फिर थोड़ी देर चार पांच सेकेंड चुप रहने के बाद श्री महाराज जी ने फिर आगे कहा कल एक ने विदेश से मुझे फोन किया - श्री महाराज जी आई लव यू , आइ मिस यू टू मच ! आप कैसे हैं महाराज जी ? मैंने कहा मैं ठीक हूं, तुम कैसी हो ? उसने कहा मैं भी आपके कृपा से विल्कूल ठीक हूं , घर में भी सब लोग आपकी कृपा से ठीक है । 
तो मैंने भी कहा आई आल्सो लव यू । फिर मैंने कहा अगर मुझे मिस करती हो तो ऐसा करो मैंने एक महिने की साधना रखी है मनगढ़ में तो तुम आ जाओ ! उसने कहा महाराज जी वो वो वो वो ऐसा है महाराज जी कि मेरी बेटी को बेबी हुआ है पिछले महीने , वो मेरे पास आकर रहने वाली है कुछ दिन , इसलिए महराज जी मुझे कुछ दिन उसका हेल्प करना है , मैं नहीं आ सकूंगी । तो मैंने भी कह दिया ओके ठीक है । और फोन रख दिया । 

तो ए शब्दों का प्रेम है, लोग मुझे मुख से बोल देते हैं आई लव यू , आंखों में वो मोटे मोटे आंसूओं के साथ । ए सब एक्टिंग है , तो मैं भी शब्दों से बोल देता हूं उनको आइ लव यू टू , मै भी एक्टिंग कर देता हूं । 
वो एक्टिंग कर रहा है तो मैं भी एक्टिंग कर देता हूं , करना परता है ।
मैं जानता हूं उसको प्यार वार नहीं है, मुझसे कोई अटैचमेंट नहीं है । अटैचमेंट तो उसको अपने बेटा बेटी , नाती पोते से है । 
जिसको सचमुच गुरू से भगवान से प्रेम होगा वो मुंह से भले न बोले आई लव यू लेकिन वो अंदर ही अंदर प्यार करेगा , दुर बैठा है लेकिन उसका मन केवल मुझमें है, भगवान में है ।

फिर श्री महाराज जी ने आगे कहा । बेटी है उसको अपनी मां से प्यार है ,‌ उसकी शादी हो गई , वो चली गई ससुराल वहां से मम्मी को फोन करती है मम्मी आई लव यू , आई मिस यू , मम्मी पापा भी खुश देखो ये मुझसे कितना प्यार करती है , आइ लव यू टू बेटा । दोनों के आंखों में वो मोटे मोटे आंसू हैं ।‌
कुछ साल बाद बेटी को एक दो बच्चा- वच्चा हो गया, वो व्यस्त हो गई । अब उसको फुर्सत नहीं मम्मी से बात करने के लिए, महीने में कभी एक-आध बार बात करके , मम्मी को कहा आई लव यू , मम्मी ने भी कहा आई लव यू टू , फिर उसने पुछा मम्मी तुम कैसी हो ? मम्मी ने कहा कुछ दिनों से तबियत ठीक नहीं, डौक्टर ने कहा है बेड से नहीं उठने के लिए कुछ दिन तक , तुम आ जाओ , मुझे तुम्हारी हेल्प की आवश्यकता है ! 
 बेटी कहती हैं मां कैसे आऊं मैं , सोनु मोनु को देखना पड़ता है , बहुत चंचल है , तैयार करके स्कूल भेजना पड़ता है , उनका भी आज कल प्रोजेक्ट चल रहा है वो औफिस में व्यस्त रहते हैं , उनको भी अभी मुझे समय पर खाना ऊना बना कर देना पड़ता है । तुम ऐसा करो एक फुल टाइम दाई रख लो । कुछ दिन की ही बात है, ठीक हो जाओगी । 

ये लो । तो कहां गया वो आई लव यूं ??? 
तो ये सब शब्दों से प्यार का एक्टिंग है, और आंसू भी एक्टिंग में लोग खुब बहाते हैं । और लोग ऐसा ही एक्टिंग यहां मेरे साथ भी करते हैं तो मैं भी उनके साथ एक्टिंग कर देता हूं प्यार का । लेकिन यह अटैचमेंट नहीं है , प्रेम नहीं है , यह छल है , भ्रम है , धोखा है जो वो खुद को दे रहा है ।  

जिससे सबसे ज्यादा अटैचमेंट जीव का रहता है, जीव को प्रेम भी उसी से होता है सबसे ज्यादा । और जिससे स्वार्थ अधिक है उसी से अधिक अटैचमेंट भी है जीव का , सीधी सी बात है ।‌ जिससे जितने मात्रा का स्वार्थ है जीव का उसी मात्रा का उससे प्रेम है , स्वार्थ खत्म प्रेम खत्म । तो इसको प्रेम नहीं व्यापार कहते है । 

तो अटैचमेंट अगर मुझसे सबसे ज्यादा रहता तो केवल मुख से आई लव यू महाराज जी , नहीं बोलते । अटैचमेंट तो अपने पति बेटे तथा नाती पोते से है । और मुझसे मुख से बोल रहा है आइ लव यूं । तो इससे कोई लाभ नहीं । 
जिसका लव वास्तव में होता है वो मुख से आई लव यू कभी नहीं बोलेगा ।‌
जो सचमुच भीतर से प्यार करता है भगवान और गुरू से , वो बाहर प्रदर्शित नहीं करता कभी । संसार में एक दुसरे से एक्टिंग करते करते लोग वही एक्टिंग भगवान और गुरू के साथ भी करते हैं तो भगवान और गुरू भी उनके साथ एक्टिंग कर देता है । 
 श्री राधे । 
:- श्री महाराज जी के मुख से सुनी हुई वाणी ।

Monday, 12 February 2024

शाब्दिक ज्ञानियो तथा व्यवहारिक ( प्रैक्टिकल ) ज्ञानियों में क्या अंतर एवं लक्षण होते हैं , एकांत साधना सबसे अधिक शक्तिशाली है क्यों ?

बात बड़ी गहरी और अकाट्य है । 
शाब्दिक ज्ञानियो तथा व्यवहारिक ( प्रैक्टिकल ) ज्ञानियों में क्या अंतर एवं लक्षण होते हैं , एकांत साधना सबसे अधिक शक्तिशाली है क्यों ? 

उत्तर :- सौ बातन की एक बात :- संसार में प्रत्येक जीव यहां तक कि पशु पक्षी, पेड़ पौधे कीड़े मकोड़े भी एक दुसरे को रिझाने में ही व्यस्त रहते हैं । 
आजकल बहुत कम मनुष्य ऐसे हैं जो संसार की परवाह न करके भगवान और गुरू को रिझाने के लिए प्रयत्नशील है, उनके सुख के लिए प्रयत्नशील है । आश्चर्यजनक बात तो यह है कि हममें से बहुत लोग आज गुरू द्वारा तत्वज्ञान होने के बाबजूद भी संसार को भी रिझाने में व्यस्त हैं, इसलिए तो हमलोग लोकरंजन में अधिक व्यस्त रहते हैं, खास कर मैं । खैर धीरे धीरे यह आदत भी हमारी मिट ही जाएगी गुरू कृपा से । आशावादी होना चाहिए। 

कोई अपने ज्ञान से लोगों को रिझाने का प्रयास करता है, कोई अपने धन ऐश्वर्य तथा वैभव से, कोई अपने बस्त्र से , कोई अपने श्रृंगार से, कोई अपने सुरीले गले तथा गायन से, कोई अपने बादन से, कोई अपने पदवी से, कोई अपने कला से , कोई अपने रूतवा से, कोई जिमखाने की अपने मांसल शरीर से, तो कोई अपने कविता से, कोई अपने शेरों शायरी से, कोई चिकनी चुपड़ी बातों से, कोई अपने रूप रंग तथा योवन से, कोई दान से, यहां तक कि कोई माता पिता के सेवा का फोटो तथा विडियो के द्वारा, कोई भाषा से, जैसे English , जहां जरूरत न हो वहां भी शुरू , तो कोई महापुरुषों की सेवा के दिखावे से हीं दुसरे को रिझाने में लगा है तो कोई अपने दीनता से, कोई अकड़ से , तो कोई अपनी गरीबी तथा लाचारी से दुसरे का सहानुभूति इकठ्ठा करने के प्रयास में लगा है । और संसार को भी यही सब पसंद है, रीझाने वाला ही पसंद है । क्योंकि हमारे स्वभाव में एकरूपता है , समानता है , यह सहज संसारिक स्वाभाविक गुण है हम साधारण जीवों का । 

लेकिन जो व्यक्ति गुप्त रूप से , गोपनीयता से भगवान और गुरू को रिझाने के प्रयास में लगा है , उसी जीव की साधना सच्ची है, भगवान और गुरू केवल उसी से खुश रहते हैं केवल उसी को प्राप्त होते हैं । 
वांकि जीवों का प्रयोजन तो संसार को हीं खुश करना , रिझाना , दुसरे का मनोरंजन करना अधिक है । 
यहां तक कि फुलो में रंग रस और खुशबू भी भंवरे को रिझाने के लिए होता है , जानवरों का शरीर खुबसूरत , मनमोहक तथा उसका गंध ( जैसे मृग के नाभी में कस्तूरी , हाथी का दांत , मोर का पंख ) अपने विपरित लिंगी साथी को रिझाने के लिए ही होता है, उसी प्रकार मनुष्यों में भी दुसरे को रिझाने की सहज वृत्ति है यह कोई दोष नहीं है । 

और भगवान को रिझाने के लिए जीव जब इसी सहज वृत्ति का उपयोग गोपनीयता के साथ करता है तब जीव भगवान को प्राप्त कर लेता है । जब तक हम लोग संसार को रिझाने में व्यस्त रहेंगे तब तक भगवान को नहीं पाया जा सकता। क्योंकि भगवान को तथा महापुरुषों को लोक रंजन एक रत्ती भी पसंद नहीं है , वो कहते हैं अगर तुम संसार को रिझाने का प्रयास करोगे तो मैं तेरी तरफ देखूंगा भी नहीं । 
इसलिए आध्यात्मिक एरिया में सफलता का मार्ग केवल एक ही है वो है एकांत साधना, गुप्त सेवा तथा आर्त पुकार । 
इस रहस्य के महत्व को हम जब तक नहीं समझेंगे, भगवान और गुरू के दृष्टि में न तो वास्तविक साधना समझी जाएगी और न असली सेवा । 
यही कारण है कि भगवान को प्यार करने वाला सच्चा प्रेमी एकांतवास को सबसे पहले प्रार्थमिकता देता है , इसलिए प्राचीन काल में अधिकतर लोग पहाड़ों में जाकर साधना करते थे और कुछ ही दिनों में दिव्य तत्व को प्राप्त कर लेते थे । 
और आज भी वास्तविक भगवद् प्रेमी एकांत वास को ही महत्वपूर्ण मानते हैं । 

हमलोग तो इतने गिरे हुए हैं कि तीर्थ स्थलों में जाकर, भगवान तथा गुरू धाम में जाकर, मंदिरों में जाकर वहां फोटू खिंचाकर , विडियो तथा रील बना कर वहां से भी संसार को हीं रिझाने में लगे रहते हैं ऐसे में भगवान और गुरू भला कैसे हमसे रिझेगें ? हद तो यह है कि आज का अधिकांश साधु सन्यासी भी पाखंडी है क्योंकि वो भी संसार को हीं रिझाने में व्यस्त हैं , कोई आग में चल रहा है , कोई माथे पर लंबी जटा बांधे घुम रहा है , कोई कांटों पर चल कर दिखा रहा है , तो कोई पानी में समाधी लगा कर लोगो को रिझाने में व्यस्त हैं और ऐसे ही पाखंडी को लोग सनातन धर्म का पर्याय मानते हैं आज, इस ठग विद्या को रिझाना नहीं कहेंगे , हां इसको ठगना कहेंगे, इसलिए इसे ठीक नहीं कह सकते । 

हां कुछ लोग अपवाद है जो अपने ज्ञान का उपयोग दुसरे को भी सन्मार्ग पर प्रेरित करने के लिए करते हैं वो भी निस्वार्थ भाव से । लेकिन उनकी संख्या आज बहुत कम है । क्योकि दुसरे की प्रेरणा बनने से पहले स्वयं का निर्माण बहुत आवश्यक है । प्रैक्टिकल नॉलेज होना आवश्यक है । जब प्रैक्टिकल नॉलेज होगा तो खूद के व्यवहार में सबसे पहले दिखेगा । 
कथनी और करनी में अंतर नहीं झलकेगा । 
सैद्धांतिक ज्ञान वाला प्रभावहीन होता है , तथा प्रैक्टिकल ज्ञान वाला ही प्रभावशाली। 
प्रैक्टिकल ज्ञान वाला भगिरथ ही धरा धाम पर गंगा को उतार कर प्रवाहित करने में सफल होता है ।  

अब कैसे पहचानें कि कौन शाब्दिक ज्ञानी है और कौन प्रैक्टिकल ज्ञानी है ! 
तो प्रथम लक्षण है अहंकार, शाब्दिक ज्ञानियों में अहंकार कूट कूट कर भरा होता है , जरा सा भी उसके अहंकार को चोट लगा वो क्रोधित हो जाता है , क्योंकि शाब्दिक ज्ञानी भीतर से खोखला होता है , 'थोथा चना बाजे घना' वाली कहावत ऐसे लोगों के लिए ही कहा गया है । 

शाब्दिक ज्ञानियों का दुसरा लक्षण है स्वयं को हमेशा उपर रखने और दुसरे को निचा दिखाने तथा रखने का प्रयत्न करना तथा दुसरे को निम्न मानना । 

शाब्दिक ज्ञानियो का तीसरा लक्षण है स्वगुणों का बखान करना और दुसरों का मज़ाक़ उड़ाना तथा दुसरे की भावना का निरादर करना एवं तिरस्कार करना । 

शाब्दिक ज्ञानियों का चौथा लक्षण है बोलना अधिक, सुनना कम या तो सुनना हीं नहीं किसी का । 

अत: शास्त्र कहता है :- 
विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परपीड़नाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतद् ज्ञानादानाय च रक्षणाय॥

यानि :- शाब्दिक ज्ञानी और दुर्जन की विद्या विवाद के लिये, धन उन्माद के लिये, और शक्ति दूसरों का दमन करने के लिये होती है। वहीं व्यवहारिक ज्ञानी अपने ज्ञान का इस्तेमाल दुसरे को सन्मार्ग दिखाने के लिए, गुप्त दान जीवों का भलाई के लिए और बल दूसरों के रक्षा के लिये उपयोग करते हैं।

अत: व्यवहारिक ज्ञानी, ( प्रैक्टिकल नॉलेज वाला ) स्वाभाविक रूप से सरल , विनम्र , दीन तथा सहिष्णु होते हैं वो हर किसी को सम्मान देते हैं, मान देते हैं और खूद को निचे रखते हैं एवं दुसरो को उपर उठाने का प्रयास करते हैं ।  
श्री राधे ।:- गुरू ज्ञान से