Tuesday, 11 May 2021

प्रत्येक दिन सभी भगवान का है । सब एक हीं भगवान श्री कृष्ण का स्वांस है ।

मेरा उन सबसे बहुत प्रार्थना है जो हर दिन , दिन के हिसाब से अलग भगवान के मंदिर में मत्था टेकते हैं और अलग अलग दिन अलग अलग भगवान का फोटो  मुझे भेजते हैं ,‌वे सभी कृप्या मुझे प्रमाण दे उन मुल विनिर्गत ग्रथों या स्मृत ग्रंथों शास्त्रों का केवल जिसमें लिखा हो कहीं पर भी  कि सोमवार भगवान शंकर का है , मंगलवार भगवान बजरंगबली का है , बुधवार गणेश जी का है आदि आदि मुर्खतापूर्ण बातें ।
पर ध्यान रहे मुझे यह प्रमाण केवल भागवद् गीता , वेद ,रामायण से ही चाहिए या पांचों मूल जगद्गुरू के लिखे किसी भी ग्रंथों से , या भगवद् प्राप्त प्रैक्टिकल दिव्य महापुरुष जिन्होंने भगवान को देखा है साक्षात , सुना है गले लगाया है , (सपने में या आभासिय नहीं , साक्षात सामने से देखा है ) जैसे तुलसीदास सुरदास , रै दास ,रविदास , मीरा , बिद्यापति , तुकाराम , नरहरि , गुरू नानक देव आदी वास्तविक भगवद् प्राप्त संतों के कथन और पुस्तकों को छोड़ मैं किसी का नहीं मानूंगा । 
पोंगा पंडित , गद्दी धारी शंकराचार्य , या स्वघोषित जगद्गुरूओं और वाकी किसी भी शास्त्रों को मैं प्रमाण नहीं मानुंगा ।

मुझे हर रोज  काफी पढ़ें लिखे लोग हर रोज के अलग अलग भगवान का फोटो भेजते हैं । इतना पढ़ें लिखे होकर भी नहीं समझते की प्रत्येक दिन प्रत्येक क्षण ,प्रत्येक बस्तु में एक हीं भगवान श्री कृष्ण है और सभी भगवान उनका हीं स्वांस है ।
हम आदमी को प्रायः  संप्रदाय , जाति  समुदाय में बांट दिए नादान क्षुद्र लोगों के बहकावे में आकर । 
और कहते हैं अंग्रेज डिभाइड रूल सिखाया ।

नहीं जी आपलोगों ने जो अंग्रेजों को सिखाया वहीं हमारे देश पर लागु किया हमसे हीं सिख के वो ।

हमारे देश में सनातन धर्म में वर्ण व्यवस्था और जाति कर्म पर आधारित था पर पोंगा पंडितों ने अपने स्वार्थ के हित के लिए यह सब किया ।
दिन भी वांट दिया , भगवान में भी भेद सिखा दिया ।
वो सोमवार को शंकर जी को जल , रविवार को सूर्य भगवान को जल , शनिवार को शनिदेव को तेल , वो बुधवार को किसी अन्य भगवान को देखना भी‌ नहीं गणेश जी को छोड़ कर , बृहस्पतिवार बार को केवल विष्णु की आराधना करना , और शुक्रवार को कोई भगवान नहीं मिला तो नया भगवान गढ़ लिए संतोषी माता । छी , छी, छी , ।
भाई साहब घर में भी क्यों नहीं बांट‌ लेते हैं आप लोग , 
सोमवार को अपने पिता को पुजेगे़ , मंगलवार को अपने छोटे ब्रह्मचारी भाई को , बुधवार को अपने बड़े भाई को बृहस्पतिवार को अपने चाचा को , शुक्रवार को अपने चाची को , रविवार को अपने नाना को । यह भी कर लिजिए ।
हमलोग पढ़ें लिखे हैं ‌। हमलोग वांकी बातों में तो बड़ा वैज्ञानिक बनते हैं और कहते हैं विज्ञान से साबित करो । प्रमाण मांगते हैं यहां कहां चला जाता है यह बात , अंधविश्वास को मानते हैं यहां और अपने अगले पिढी को भी यही सौपतें है , इसलिए तो पुजा पाठ का फल तो दुर उल्टा नुकासान होता है सबको ।
तो इसमे हम कैसे मान लेतें है विना असली शस्त्रों के प्रमाण को देखें समझे और जाने ???

प्रमाण देखना चाहिए हमको  वो भी पोंगा पंडितों या थ्योरिटिकल मैंन व स्वघोषित तथा कथित विद्वानों का कहा और उसके लिखे शास्त्रों का नहीं ।

हमें मांगना चाहिए प्रमाण केवल वेद , भागवद् , गीता , रामायण आदि विनिर्गात शास्त्र और श्रौत्रिए ब्रह्मनिष्ट महापुरूषों का कहा और उनका लिखा पुस्तकों का केवल । दिखा दिजिए प्रमाण तो हम मानेंगे ,‌नही तो हम पाप नहीं करेंगें । 
वो छुटभैय्ए ज्योतिषि और उनके मिलावटी शास्त्रों को प्रमाण मैं नहीं मानुगां ।

काल कर्म में पुराणों , उपनिषदों और अन्य शास्त्रों में खुब मीलावट हुआ है तथाकथित क्षुद्र स्वघोषित विद्वानों द्वारा । इसलिए इनको प्रमाण कभी नहीं मानूंगा ।

पर वेद , श्रीमदभगावद् , रामायण एवं गीता अभी भी पु्र्णत: निष्कलंक है और  पुनदोष पंक रहित है इसलिए इन्हीं शास्त्रों और पांचो मूल जगद्गुरूओं के लिखे शास्त्रों और उनके कथन और भगवान के निज जन यानि हरि का जन , यानि हरिजन जैसे तुलसी सुर मीरा , कबीर , रै दास ,रविदास, विद्यापति रसखान , तुकाराम , नरहरी , हरिदास , हित हरिवंश , चैतन्य महाप्रभु रामानंदाचार्य  , अष्ट गोस्वामी आदि  जैसे जीव  गोस्वामी सनातन गोस्वामी का प्रमाण दिजिए ।
मुझे अन्य मिलावटी  ग्रंथों और किसी के भी तर्क कुतर्क का प्रमाण नहीं चाहिए । 

अंत में यही कहुंगा सनातन का मूल कोई भी शास्त्र इन सब अंधविश्वासों का कभी समर्थन और सिद्ध नहीं करता , सनातन कि बदनामी पढ़ें लिखे मुर्ख करवाते हैं और खुद तो पाप करते हैं और अंधविश्वासों को भी बढ़ावा देकर पुरे विश्व  में सनातन को बदनाम करवाते हैं , पाखंड और पाखंडियों से बचें ।
जिस भगवान में श्रद्धा हो , आपने उनको अपना  एक मात्र इष्ट माना है जिन भगवान को उनको हीं  प्रत्येक दिन , हर क्षण , हरेक समय  तीन सौ पैंसठो दिन भक्ति करिए । नहीं तो लाभ के बदला हानी सुनिश्चित होगा ।‌ सम्मान सभी भगवान का करना चाहिए पर प्रेम एक से हीं ।‌
"एक हीं साधे सब सधै , सब साधे सब जाए "
आपका भाई संजीव । श्री राधे ।

Saturday, 8 May 2021

हम भगवद् प्रेमिजन इन सभी से कोसों दुर रहते हैं । हम सब भक्ति मार्गी है और भक्ति को अष्टांग योग आदि की कोई जरूरत नहीं ।

हरि के   जो   वल्लभ है ,  दुर्लभ  भुवन   मांझ ,
तिनहिं  के  पद्  रेनु ,    आसा   जिए    करिहें ।
जोगी , जपि, तपि  जासों मोको कछु काम नाहिं
प्रीति    परतिति ,   रिति     मेरी    मति   हरीहें ।।

हरि के जो वल्ल्भ हैं , मतलव  जिनको खुद भगवान श्रीकृष्ण  अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करतें हैं । जिनके  पीछे पीछे  स्वयं भगवान चलते हैं । ऐसे संत बहुत दुर्लभ होतें हैं , बहुत हीं दुर्लभ ।

 हरि जिनके वल्लभ हैं ऐसे संत तो बहुत मिल जायेगें संसार में । 
लेकिन ऐसे रसिक संत बहुत हीं दुर्लभ होतें हैं जगत में जिसके पीछे-पीछे स्वयं हरि चले । 
ऐसे हीं रसिक संतों में अग्रगण्य रसिक सिरोमणी संत ,  कृपावतार स्वयं हमारे गुरूदेव , श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणपारावारीण,वेदमार्गप्रतिष्ठापनाचार्य,निखिलदर्शनसमन्वयाचार्य,सनातनवैदिकधर्मप्रतिष्ठापनसत्संप्रदायपरमाचार्य,भक्तियोगरसावतार,भगवदनन्त श्रीविभूषित , पंचम मुल जगद्गुरूत्तमई , १००८ स्वामि श्री कृपालु जी महाराज हैं,  जो इस कलिकाल में हम कलिमल ग्रसित जीवों के कल्याण हेतु इस धराधाम पर अवतार लेकर युगलसरकार के ब्रज रस का वितरण हम सभी के मध्य किए । ऐसे कृपावतार विरले हीं संसार में आतें हैं । 
जिनकी पद रेणु भगवान चाहते हैं अपने माथे से लगाते हैं । और इन्ही के पद रेनु की चाहत व लक्ष्य हमारा है ।

भक्ति मार्गी , प्रेम मार्गी , प्रेमीजन इन योगी , जपी  , तपी , ध्यानी आदि से बहुत दुर रहतें हैं । 
 क्यों दुर रहतें हैं , तो इसलिए कि जो हरि के वल्लभ है,  ऐसे दुर्लभ, प्रेमी रसिक संत का हमने संग किया है और उन्ही को हम भजते हैं , उन्ही का संग करते हैं , सत्संग करते हैं । 
 हमारे गुरूदेव ने तो हमें ऐसे  प्रेमरस का पथिक  बनाया है,  जो बड़े बड़े बृहस्पति , सरस्वती , और ब्रह्मा के लिए भी दुर्लभ है । हम युगलसरकार के निजधन , प्रेमरस के पथिक है  । उनके प्रेम , प्रीति  परतिति की रिति ने तो हमारी मति सदा के लिए हर लिया है । 

हमें , अष्टांग योगी , षठ् सम्पत्तिवान , और साधन चातुष्ट्य सम्पन्न जीव ,  ज्ञानि ध्यानी की कोई आवश्यकता नहीं है ।
 हम भगवद् प्रेमिजन इन सभी से  कोसों दुर रहते हैं । 
हम सब भक्ति मार्गी है और भक्ति को अष्टांग योग आदि की कोई जरूरत नहीं ।

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता ।। ( रामचरितमानस)

" यज्ञ, दान , व्रतादि में जो त्रुटि रह जाती है, 
जब भक्ति ही उसे पुरा करती है , तब भला भक्ति को उन कर्मों की क्या अपेक्षा हो सकती है |" 

"ज्ञान, विज्ञान, तपस्या , योग , यज्ञादि का जो  कुछ भी फल हो सकता है, वह सब भक्ति से अनायास ही प्राप्त हो जाता है | किंतु भक्ति का फल किसी भी कर्म से नही प्राप्त हो सकता |" 
" अन्त:करण शुद्धि हेतु एक मात्र भगवद्भक्ति ही साधन है, अन्य कोई मार्ग नही " 
" भक्ति के अनेक भेद हैं | किंतु श्रवण, कीर्तन, एवं स्मरण तीन ही प्रमुख हैं |„
" सर्वप्रमुख स्मरण भक्ति ही है, अन्य इन्द्रियादिकों की भक्ति हो या न हो |„
 - कृपालु बचनामृत , पेज ५९, ६०,६१„ ६२ एवं ६३

 :- पूज्यनियां मां रासेस्वरी देवी जी के प्रवचन से ।।

हमारे वेद् शास्त्र , वास्तविक संत , महापुरूषों ने केवल उन्हीं मां बाप की पुजा करने के लिए कहते है, जो भगवान श्री कृष्ण का भक्त हैं ।

हमारे वेद् शास्त्र , वास्तविक संत , महापुरूषों ने केवल उन्हीं मां बाप की पुजा करने के लिए कहते है, जो भगवान श्री कृष्ण या कोई भी भगवान या उनके नीज जन  यानि परम भक्त यानि वास्तविक संतो को गुरू मान कर  ( सभी भगवान श्री कृष्ण की हीं स्वगत् भेद शुन्य शक्ति है जैसे दुर्गा जी , बजरंग बली , शंकर पार्वती जी , गणेश जी , विष्णु लक्ष्मी जी या उनके संत ) उनका भक्ति करतें हैं । 
वैसे को नहीं जो खुद शराब व मांस भक्षण करतें हैं और अपने बच्चे को भी करने के लिए प्रेरित करतें हैं, घर परिवार और समाज में ही दुसरो से दुर्भावना रखते हैं और बच्चों में कुसंस्कार भरते हैं, वो खुद अपने सास ससुर और बड़ों  का कभी ख्याल नहीं रखते  और भगवान में उन्हे जरा भी श्रद्धा और रूची नहीं, ऐसे मां बाप हिरण्यकशिपु की तरह त्याज्य हैं । 
भगवान से विमुख करने वाले कैकई को भरत त्याग दिए और हमें सिखाया  । भगवान से बैर करने बाले बड़े भाई रावण को विभिषण त्याग दिया, अतः ऐसे दुष्ट माता पिता जो अपने बच्चे को भगवान की तरफ प्रेरित ना करें , और ना खुद भगवद् प्रेमी हो उनसे भीतर से  सदा उदासीन रहकर उनके जरूरत को यथा शक्ति पुरा करने के अलावा कुछ नहीं करना चाहिए । 
माता पिता श्रवण के माता पिता जैसा भगवान् का भक्त होना चाहिए फिर श्रवण कुमार ने अपने माता पिता की भक्ति की । 
कहने का मतलब जो भगवान का बैरी हो उनसे दुर रहना श्रेयकर है । चाहे वो अपना मां बाप , भाई बहन , पत्नी पुत्र या पति ही क्यूं ना हो । यह शास्त्र का उद्घोष है । श्री राधे ।

एक साधिका दीदी का प्रश्न - Jo sadhak hai pr abhi bhav bhakti pr abhinhi hai use mrne ke baad turnt manusya sarir mil jatta hai ya sukshm sarir me bhog bhogna padta hai

एक साधिका दीदी का प्रश्न - Jo sadhak hai pr abhi bhav  bhakti pr abhinhi hai use mrne ke baad  turnt manusya sarir mil jatta hai ya sukshm sarir me bhog bhogna padta hai

उत्तर - Radha Rani दीदी सुक्ष्म शरीर और कारण शरीर से मुक्ति वास्तविक मौक्ष के पश्चात् ही होती है । इधर मौक्ष हुआ उधर जीव तीनों शरीर - स्थूल , सूक्ष्म और कारण शरीर से निकल कर ब्रह्म में लय हो जाता है ।
पर भगवान को और उनकी सेवा की कामना वाला  साधक जब भगवद् प्राप्त कर लेता है तो उसका सुक्ष्म शरीर और कारण शरीर दोनों दिव्य हो जाता है । 
इधर भगवद् प्राप्ति हुआ और उधर शरीर दिव्य हुआ । 
आत्मा बिना बर्तन का एक पल भी नहीं रह सकता है । 
मौक्ष पाने वाले का भी आत्मा जिस क्षण मुक्त होगा उसी क्षण में ब्रह्म में लय हो जाता है । यह बड़ा टेक्निकल है । यानि इधर निकला उधर लय हुआ । 

पर हमारे महाराज जी पांचों मुक्ति को पिशाचनी कहें है । तो फिर भगवद् प्राप्ति बाले का क्या होगा ?
तो हम लोग भगवान की सेवा चाहते हैं केवल  ।
"नित सेवा मांगु श्यामा श्याम तेरी 
ना मैं मुक्ति ना ही मुक्ति मांगु मैं " - श्री महाराज जी ।

तो केवल भगवद् प्राप्ति की कामना रखने वाला साधकों का कारण शरीर में एक हीं वासना होती है कि उसको गोलोक में  भगवान कि सेवा मिल जाए । 
कारण शरीर का मतलब हमारे वासना का शरीर ।
चाहे वो  वासना संसार को पाने का हो यानि भुक्ति का हो तो भोग के कामना रूपी करण शरीर - नंबर वन ।

नंबर टु मौक्ष की प्राप्ति की हो तो मौक्ष के कामना का कारण शरीर । यहां यह समझना होगा की संसार को पाने की कामना और मौक्ष की कामना दोनों एक साथ कभी नहीं हो सकती है । आग और पानी दोनों एक साथ नहीं रह सकता कभी ।
मौक्ष की कामना होगी तो संसार की कामना स्वत: समाप्त हो जाती है ध्यान साधना से । 

नंबर तीन । श्री महाराज जी के साधकों को मुक्ति और भुक्ति दोनों की कामना को त्यागना होता है  , उनको  केवल भगवान और भगवान के धाम को प्राप्त कर उनके सेवा की कामना रहती है । इसलिए यहां उसका कारण शरीर उसी दिव्य कामना के परिणामस्वरूप गुरू द्वारा  दिव्य बना दिया जाता  है । यह अंतर है । 
यहां भी वांकी दो कामना यानी मुक्ती या भुक्ति दोनों की कामना समाप्त होने के बाद ही भगवान के सेवा की कामना ठहर सकती है । तीनों या दो अन्य कामना कभी एक साथ नहीं ठहर सकती है । 

तो साबित हुआ की कारण शरीर केवल‌ और केवल तीन प्रकार का ही होता है ।
जिसमें एक माईक और दो दिव्य ।
माइक उसका जिसको संसार के सुख पाने‌ की और भोगने की कामना  यानि भुक्ति की कामना ।

दुसरा - मौक्ष की कामना का कारण शरीर , यह भी दिव्य बना दिया जाता है मौक्ष मार्गी  गुरू द्वारा ।

तीसरा - ऐसा जीव जिसको सगुण साकार भगवान श्री कृष्ण को और उनके धाम को प्राप्त करने कि कामना शेष बच जाती है वाकी दोनों कामना समाप्त हो जाती है तो उनका  कारण शरीर और सुक्ष्म शरीर दोनों दिव्य बना दिया जाता है श्री महाराजजी जैसे उच्च कोटी के रसिक संत और गुरू द्वारा ।। 

अब इसके अलावा भी एक चौथे प्रकार का कारण शरीर होता है जो पूर्णत: निष्काम‌ का  होता है । उपर्युक्त तीनों कामना का आभाव होता है इनमें । यह है गोपी महाभाव कारण शरीर  । जिसमें जीव हमेशा अपने प्रेमास्पद की सुख की कामना रखता है । यानि वो भगवान से कहते हैं कि तुम मुझे प्रेम दो या ठुकरा दो । हर हाल में मैं तुम्हारे सुख में ही सुख अनुभव करता हुं । यह केवल नित्य सिद्ध भगवान तुल्य  महापुरूषों के होता है जैसे श्री महाराज जी , गौरांग महाप्रभु ,  ललिता आदि । यह रेयर है ये स्वयं भगवान ही है । । 
 
तो साधक को जब भगवद् प्राप्ति होती है तो उसका कारण शरीर , सुक्ष्म शरीर दोनों दिव्य हो जाता है उसी क्षण । याद रखिय पहले ही बतलाया  गया है कि आत्मा बिना बर्तन के एक पल भी नहीं रह सकती । 

अब आपके दुसरे सबाल का ज़बाब तो याद किजिए श्री महाराज जी का दिया तत्व ज्ञान,  साधक को अपने साधना के स्तर के अनुसार उसको मानव शरीर मिल जाता है फिर से वहां से , जहां तक कमाई किया था पिछले मानव शरीर में वहां तक फिर मिल जाता है और फिर वहां से आगे शुरूआत होती है साधना की । 
जैसे कोई इस जन्म में मैट्रिक कर गया और मर गया तो फिर अगले शरीर में वो इंटरमीडिएट से शुरू करेगा । यह होता है साधको के साथ । श्री राधे ।- संजीव 

एक व्यवहारिक बात या कहिए की स्व अनुभव ।यह दृढ़ सत्य है , अटल सत्य है कि हमारा जिस विषय में गहरा रूची होता है , जिससे गहरा प्रेम होता है उसके बातों को हमेशा याद रखते है और व्यवहार में भी लाते हैं ।

एक व्यवहारिक बात या कहिए की स्व अनुभव ।
यह दृढ़ सत्य है , अटल सत्य है कि हमारा जिस विषय में गहरा रूची होता है , जिससे गहरा प्रेम होता है उसके बातों को हमेशा याद रखते है और व्यवहार में भी लाते हैं ।
संसार में भी जब हमलोग अपने पिता या माता या बहन या किसी से भी सच्चा  प्रेम करते हैं, श्रद्धा और विश्वास करते हैं  तो उनकी बातों को हमेशा याद रखते हैं और व्यवहार में भी लातें है ।
यानि संसार में भी जिस तरह  हमलोग  जितना जिस व्यक्ति , बिषय , बस्तु ,‌स्थान से प्रेम करते हैं उतना‌ ही वो याद रहता है हमेशा । या वास्तविकता तो है कि याद रखने की और व्यवहार में लाने का श्रम भी नहीं करना‌ परता , यह अपने आप याद रहता है और व्यवहार में भी आ जाता है अपने आप । बस एक हीं आधार है प्यार व प्रेम की गहराई अपने प्रेमास्पद से । 
ठीक उसी प्रकार अगर हम वास्तव में दिलों‌ जान से अपने गुरू और इष्ट से प्यार करते हैं तो उनका एक एक बात व्यवहार , आदेश , तत्त्वज्ञान , आदि उनसे प्रेम के मात्रा के अनुसार और बराबर मात्रा में याद रहता है हि रहता है और व्यवहार में भी अपने आप आता रहता है । 
भुलने का मतलब हमारा प्रेम कम है ।

जब हम किसी बात को आत्म शात कर लेतें है ठीक से तो जागते हुए हीं नहीं सोते हुए भी हमलोग उन बातों को कभी नहीं भुल सकते । और ना भुलते हैं।

संसार में पढ़ाई के दौरान गणित , भौतिकी , इतिहास भुगोल , या कोई भी शब्जेक्ट हो हम पढ़ते हैं प्रैक्टिस और व्यवहार में जब लातें है बार बार तो सोते हुए भी नहीं भुलते । वसरर्ते वो सब्जेक्ट हमारे मन को भाए । उसमें पुरा इंटरेस्ट हो और प्रैक्टिकल भी हो । 
इसलिए संसार में संसारिक ज्ञान को भी हम सोते हुए भी याद रखते है तो श्री महाराज जी के सिद्धांत को कैसे नहीं 24 सो घंटा याद रख सकते हैं । भुलने का मतलब प्यार में कमी हैं पसंद में कमी है , इंटरेस्ट में कमी है। 
उदाहरण =बचपन में प्रैटीस किया 2+2 =4 होता है तो यह बात आज तक याद है और उसको व्यवहार में लाते हैं जब कोई हिसाब करते हैं तो । किसी सोते को अचानक उठा कर पुछिए वो दो प्लस दो चार ही बोलेगा ।
पांच या छः नहीं बोलेगा कभी ।
हां जिसका प्रैटीस कच्चा है बचपन से , वो तो गलती करेगा ही जागते हुए भी । 
इसी प्रकार श्री महाराज जी के दिए गय तत्वज्ञान का प्रैक्टीस , बार बार रीभिजन और उसके बाद प्रैक्टिकल करने के बाद वो हमेशा याद रहता है । इसी प्रैक्टीकल प्रैक्टिस को साधना कहते हैं । श्री महाराज जी के सिद्धांत पर गहरा चिंतन करने से वो दिमाग में दृढ़ हो जाता है । 
हम जिससे प्यार दिल से करते हैं संसार में भी तो उसके बातों को , उसके आदत को उसके कहने बोलने के स्टाइल को हमेशा याद रखते है। 

फिर वो तो हमारे परम पिता है , वो तो हमारे ऐसे पिता है जिनको हम दिलों जान प्राण से प्यार करते हैं । तो उनके एक एक बात को कैसे ना दिमाग दृढ़ करके याद रखें भला ।
महाराज जी ने हीं कहें है कि साधकों को बार बार रीभिजन के द्वारा तत्त्वज्ञान के द्वारा दृढ़ करना चाहिए , जब यह दृढ़ हो जाएगा तो शास्त्रोक्ति यानि तत्त्वज्ञान में निपुणता से साथ शास्त्र युक्ति में भी निपुणता हासिल हो जाएगी यानि तत्वज्ञान को व्यवहार में लाने की आदत हो जाएगी । फिर होश में  तत्त्वज्ञान को कभी भुलना तो दुर वेहोशी में यानी सुसुप्ति में भी हम हमेशा याद रखेंगे और उससे अलग सोचेंगे नहीं कभी ।
तो यह तो तभी हो सकता है कि हम अपने गुरू के द्वारा दिया गए तत्वज्ञान को कितना आत्मसात किया ।
और मेरा खुद का अनुभव है कि श्री महाराज जी और अपने प्रीतम से जितना प्यार होगा हम उतना हीं उनके बातों को आत्मसात् करते हैं ।
संसार में भी देखते हैं ना आप जिससे प्यार करते हैं तो वो अगर आपके विपरीत बात बोल दे तो आप कहते हैं न कि दुनिया चाहे कुछ भी कहे तुम कुछ ऐसा वैसा बोल देते हो तो हमको बुरा लगता है ।
बस यही फार्मुला यहां भी काम करता है हम जितना जिससे प्यार करते हैं उतना हीं उसके कहे बातों को मानते हैं और हमेशा याद रखतें हैं । भुलने का मतलव‌ प्यार कच्चा है । और थोडा बहुत याद रखने का मतलब थोड़ा प्यार है । और पुरा भुलने का मतलब प्यार , श्रद्धा और विश्वास की पुरी कमी ।
श्री राधे । :- संजीव ।।

भक्ति से सब शुलभ हैं , अष्टांग योग के बड़े बड़े नियम है ।

ये साधनचतुषट्य , षठ्सम्पत्ति मार्गी, अष्टांगयोगादियों की बात करने वाले इन चीजों को हीं सबसे उपर, अच्छा और महत्त्वपूर्ण बता देतें हैं और भक्ति को इसका एक मात्र अंग, जबकि भक्ति को इन साधनों की आवश्यकता कभी नहीं है  !  ए  क्यों भुल जातें हैं कि इसी कलयुग में भक्ति मार्गी मीरा कब इन सभी का सहारा लिया ??
रविदास , सुरदास , तुलसीदास , कबीरदास, कालिदास , रैदास , हितहरिवंश , श्रीहरिदास ,  तुकाराम , संत ज्ञानेस्वर , सखुबाई , रसखान  , बिद्यापती  आदी ने तो कभी योग तोग , जप , तप , अष्टांगयोगादि का सहारा नहीं लिया । ए  केवल भगवान और संतों  की सीधी सादी एवं सरल भक्ति हीं किए  , अपने गुरू एवं भगवान की शरणागति किया और अपने आंसुओं द्वारा उनको रिझाकर  उनको एवं उनके दिव्यप्रेम रस को प्राप्त किया । 
इसी कलयुग में षठ्गोस्वामीं जैसे सनातन गोस्वामीं , जीव गोस्वामी आदि ने आज से पांच सौ साल पहले कौन से योगादि का सहारा लिया था ? 

भगवान श्रीकृष्ण ने तो स्वयं कहें हैं अंबरीश कांड में  दुर्वासा जी को , कि 
अहं भक्त पराधीनो ह्यस्वतंत्र इव द्विज ।
साधूभिर्ग्रस्तहृदयों भक्तैर्भक्तजनप्रियः ।।

भावार्थ :- "भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा- दुर्वासा जी से  ! मैं पूरी तरह से भक्तों के अधीन हूँ, मेरे वश में कुछ भी नहीं है । मेरे सीधे-सादे सरल भक्तजन अपने उदार ह्रदय से विनम्रता पूर्वक मेरी भक्ति करते हैं, तो मैं स्वतः उनके वशीभूत हो जाता हूँ, और उनसे प्यार करने लगता हूँ, अब वो जो कहें वही होता है, मेरे कहे अनुसार कुछ होता ही नहीं, अत: मैं आपकी मदद नहीं कर सकता ।।"

भगवान‌ ने तो कभी नहीं कहा कि - 
अहं योगी पराधीनो या अहं ज्ञानि पराधिनों  ???

तुलसी दासजी ने भी भक्ति को स्वतंत्र हीं माना है :- 
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता ।। ( रामचरितमानस)

त्रेता में भी भक्ति की महारानी शबरी आदि का उदाहरण है जो यहां तक नहीं जानती थीं कि उनमें नवधा भक्ति कुट कुट कर भरी हुई है । यह तो भगवान राम के मिलन के पश्चात्  उनको , नवदा भक्ति उनमें है ऐसा पता चला । 

द्वापर में लाखों गोपियां कब योग तोग का सहारा लिया ??? निष्काम भक्ति कि परमाचार्या गोपियां तो योग , ध्यानादि मार्गी श्री उद्ध्व जी को भी यह सब भुलवाकर भक्ति मार्ग का पथिक बना दिया था । 

यहां तक की प्रथम जगद्गुरु स्वामी श्री शंकराचार्य जी ने भी अंत में सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण की हीं भक्ति किए थे । यह जग जाहिर है ।

कहां तक कहा जाय ! 
श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने भी मां काली की आज्ञानुसार  वृन्दावन धाम जाकर श्रीकृष्ण की भक्ति किए । मां काली ने वृन्दावन में हीं  श्रीकृष्ण का दर्शन करा कर उनको प्रेमाभक्ति प्रदान किए ।
और तो और उन्होने भी अपने शिष्य  विवेकानंद जी ( नरेंद्र) को  वृन्दावन भेज कर श्रीकृष्ण की हीं भक्ति कराकर भगवत् प्रेम रस प्रदान करवाया । 
इसलिए यह साबित है कि बड़े बड़े ज्ञानियों , ध्यानियों को भी सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण की हीं भक्ति और शरणागति करनी परती है और भक्ति एवं भगवान  के शरणागति  के पश्चात हीं अपने लक्ष्य की प्राप्ति होती है । वर्णा पतन हो जाता है । 
अतः हमें सदा अपने हरि गुरू की हीं शरणागति करना चाहिए ।
: -अपने गुरूदेव के दिए तत्त्व ज्ञान से ।

Thursday, 6 May 2021

भगवान बुद्ध के बारे में जरूरी जानकारी :-

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आप सभी को भगवान बुद्ध जयंती की शुभकामनाएं ।
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भगवान बुद्ध के बारे में जरूरी जानकारी :- 
भगवान बु्द्ध , भगवान राम के हीं वंशज थे । वो भगवान राम के पुत्र कुश के वंश में आगे जन्म लिए । यह बहुत कम लोग हीं जानते हैं । इसलिए सारे धर्म की जननी सनातन धर्म हीं है । सारे धार्मिक विचार धारा सनातन धर्म की हीं शाखा है । शाखा का अस्तित्व अपने मुल तना से होता है । और मुल तना का आधार बृक्ष का मुल होता है । डिटेल्स के लिए पढ़ीए :- 
श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णुपुराण में हमें शाक्यों की वंशावली के बारे में उल्लेख पढ़ने को मिलता है। कहते हैं कि राम के 2 पुत्रों लव और कुश में से कुश का वंश ही आगे चल पाया। कुश के वंश में ही आगे चलकर शल्य हुए, जो कि कुश की 50वीं पीढ़ी में महाभारत काल में उपस्थित थे। इन्हीं शल्य की लगभग 25वीं पीढ़ी में ही गौतम बुद्ध हुए थे। इसका क्रम इस प्रकार बताया गया है।
 
 
शल्य के बाद बहत्क्षय, ऊरुक्षय, बत्सद्रोह, प्रतिव्योम, दिवाकर, सहदेव, ध्रुवाश्च, भानुरथ, प्रतीताश्व, सुप्रतीप, मरुदेव, सुनक्षत्र, किन्नराश्रव, अंतरिक्ष, सुषेण, सुमित्र, बृहद्रज, धर्म, कृतज्जय, व्रात, रणज्जय, संजय, शाक्य, शुद्धोधन और फिर सिद्धार्थ हुए, जो आगे चलकर गौतम बुद्ध कहलाए। इन्हीं सिद्धार्थ के पुत्र राहुल थे। राहुल को कहीं-कहीं लांगल लिखा गया है। राहुल के बाद प्रसेनजित, क्षुद्रक, कुलक, सुरथ, सुमित्र हुए। इस तरह का उल्लेख शाक्यवंशी समाज की पुस्तकों में मिलता है। शाक्यवार समाज भी ऐसा ही मानता है। 

बुद्ध के प्रमुख गुरु गुरु विश्वामित्र, अलारा, कलम, उद्दाका रामापुत्त थे जबकि बुद्ध के प्रमुख दस शिष्य- आनंद, अनिरुद्ध (अनुरुद्धा), महाकश्यप, रानी खेमा (महिला), महाप्रजापति (महिला), भद्रिका, भृगु, किम्बाल, देवदत्त, और उपाली (नाई) थे। दूसरी ओर बौद्ध धर्म के प्रचारकों में प्रमुख रूप से अंगुलिमाल, मिलिंद (यूनानी सम्राट), सम्राट अशोक, ह्वेन त्सांग, फा श्येन, ई जिंग, हे चो, बोधिसत्व या बोधिधर्मा, विमल मित्र, वैंदा (स्त्री), उपगुप्त (अशोक के गुरु), वज्रबोधि, अश्वघोष, नागार्जुन, चंद्रकीर्ति, मैत्रेयनाथ, आर्य असंग, वसुबंधु, स्थिरमति, दिग्नाग, धर्मकीर्ति, शांतरक्षित, कमलशील, सौत्रांत्रिक, आम्रपाली, संघमित्रा आदि का नाम लिया जाता है।

भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं के आग्रह पर उन्हें वचन दिया था कि मैं 'मैत्रेय' से पुन: जन्म लूंगा। तब से अब तक 2500 साल से अधिक समय बीत गया। कहते हैं कि बुद्ध ने इस बीच कई बार जन्म लेने का प्रयास किया लेकिन कुछ कारण ऐसे बने कि वे जन्म नहीं ले पाए। अंतत: थियोसॉफिकल सोसाइटी ने जे. कृष्णमूर्ति के भीतर उन्हें अवतरित होने के लिए सारे इंतजाम किए थे, लेकिन वह प्रयास भी असफल सि‍द्ध हुआ। अंतत: ओशो रजनीश ने उन्हें अपने शरीर में अवतरित होने की अनुमति दे दी थी। उस दौरान जोरबा दी बुद्धा नाम से प्रवचन माला ओशो के कही थी । देह छोड़ने के पूर्व बुद्ध के अंतिम वचन थे 'अप्प दिपो भव:...सम्मासती। अपने दीये खुद बनो...स्मरण करो कि तुम भी एक बुद्ध हो।

बुद्ध अनेक हो चुके हैं। वाल्मीकि रामायण में भी बुद्ध का उल्लेख मिलता है, वाल्मीकि जी भगवान राम के समकालिन एक महान ऋषि थे, जिन्होने रामावतार से पहले हीं रामायण लिख दिया था। अत: बुद्धत्व एक दिव्य सिद्धा अवस्था का नाम है जो समय समय पर अनेकों महामानवों में उत्पन्न हुआ।
अंतिम पुर्ण बुद्धत्व सिद्धार्थ में प्रकट हुआ जो भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज हीं थे।

भगवान गौतम बुद्ध का सम्यक दर्शन अवैदिक था । इन्होंने सामयिक परिस्थितियों के अनुसार बुद्ध दर्शन का प्रतिपादन और प्रचार किया था ।

भगवान गौतम बुद्ध का सम्यक दर्शन अवैदिक था । इन्होंने सामयिक परिस्थितियों के अनुसार बुद्ध दर्शन का प्रतिपादन और प्रचार किया था ।